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Thursday, June 11, 2009

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की कीमत


@mishrashiv I'm reading: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की कीमतTweet this (ट्वीट करें)!

हम ब्लॉगर लोग आम आदमी हैं. इसलिए ब्लॉग लिखते हैं. आते-जाते जो कुछ भी देखते हैं, टांक देते हैं ब्लॉग पर. ई ससुर गूगल ने सर्वर क्या दिया हमारी तो खिल गईं. अरे मैं बाँछों की बात कर रहा हूँ. खिल गईं. एक आईडी क्रीयेट किये और शुरू हो गए. क्या-क्या नहीं लिख डाला.

आज हमको रास्ते में यह दिखा. कल शाम को वह दिखा था. ई राजनीति बहुत गंदी हो गई है. आतंकवाद बहुत बढ़ गया है. मंहगाई बढ़ गई है. अंग्रेजी बढ़ गई है. हिंदी कम गई है. अंग्रेजी को बढावा देना गुलामी की निशानी है. आतंकवादी से सख्ती से निबटना होगा. कसाब को डायरेक्ट फांसी काहे नहीं दे देती सरकार? अफ़ज़ल गुरु की फांसी में इतना दिन काहे लग रहा है? वर्ण व्यवस्था कब ख़तम होगी? किसान काहे आत्महत्या कर रहा है? महिला आरक्षण को लेकर इतना हंगामा क्यों है? कसाब अपना बयान काहे बदल दिया? हम सेकुलर हैं, तो तुम कम्यूनल काहे हो? साध्वी प्रज्ञा के साथ इतनी बदसलूकी काहे हो रही है? हिन्दू आतंकवाद शब्द काहे इस्तेमाल किया जा रहा है? कम्यूनिष्ट इतनी बुरी तरह से काहे हारे? क्या दुनियाँ से कम्यूनिज्म के ख़तम होने की शुरुआत हो गई है? उड़ीसा में चर्च पर काहे हमला हो रहा है? मुतालिक जैसों की धुलाई काहें नहीं होनी चाहिए?

भारतीय भुजंग काट लेगा तो क्या होगा? वेद में व्यवस्था को लेकर ई कहा गया है. जंगल की आग से छुटकारा कैसे पाया जा सकता है? पर्यावरण खराब क्यों हो रहा है? हबीब तनवीर को श्रद्धांजलि. आदित्य जी को श्रद्धांजलि. गत्यात्मक ज्योतिष खराब है. फलित ज्योतिष अच्छा है. जलित ज्योतिष उससे भी अच्छा है. हम ऐसा मानते हैं तुम क्या कर लोगे? हिन्दू कौन थे? हिंदी भाषा किधर जा रही है? किस रफ़्तार से जा रही है? परसों तक कहाँ पहुँच जायेगी? कविता क्या है? कविता इंसान को जगाती है या फिर गौरैया के लिए लिखी जाती है?

काहे? काहे? काहे?

मतलब यह है कि आम आदमी हैं तो यही सब लिखेंगे न. ख़ास होते तो किसी मैगजीन में लिख रहे होते. केंचुकी फ्रायड चिकेन और मैकडोनाल्ड की वजह से एक ख़ास समाज किस दिशा में जा रहा है उसका विश्लेषण कर रहे होते. तब अगर कसाब के मुक़दमे की बात करते तो इस बात को ध्यान में रखकर करते कि अंतर्राष्ट्रीय कूटिनीति का इस मुक़दमे पर क्या असर पड़ता है. अमेरिका का मीडिया क्या चाहता है? एमनेस्टी इंटरनेशल के लोग इस मुद्दे पर क्या विचार रखते हैं? अफ़ज़ल गुरु को फांसी देने की बात करते तो यह ध्यान में रखते कि यूरोपियन यूनियन भारत से क्या चाहता है? मैकडोनाल्ड की किसी खास वर्ग के लोगों पर पड़े प्रभाव को देखते तो उससे उपजने वाली आर्थिक नीतियों का अध्ययन करते हुए लिखते.

लेकिन भैया, हम तो आम आदमी हैं. ऐसे में जो कुछ लिखेंगे वह सब आम आदमी की भाषा में ही होगा. हम तो यह सुनकर लिखना शुरू किये थे कि; "ब्लॉग अभिव्यक्ति का सबसे सशक्त माध्यम है."

किसी ब्लॉग विशेषज्ञ ने यह लाइन गढी होगी. लेकिन हमें तो मरवाने पर उतारू दीखता है यह ब्लॉग विशेषज्ञ.

यह वाक्य सुनकर हम तो उड़ने लगे. जो मन में आया, लिख डाला. ऊपर से संविधान ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी वाला सर्टिफिकेट दिया है. अब इस सर्टिफिकेट और कुछ टूटे-फूटे विचारों से लैस हम निकल लिए ब्लॉग लिखने. आम आदमी छोटे-छोटे काम कर के महान होने के सपने देखता रहता है. वही बात हम ब्लॉगर लोगों के साथ है. सोचते हैं;"चलो ब्लॉग लिखकर महान हो लेते हैं."

अब ऐसे में अगर कोई आकर यह कहे कि ऐसा करने से फंस जाओगे तो? हमें तो लगेगा न कि यहाँ हम ब्लॉग लिखकर महान हुए जा रहे थे और आप आ गए बीच में. हमारी महानता पर ताला लगाने. महान होने का हमारा प्लान चौपट करने. आम आदमी को महान होने का हक़ नहीं है क्या?

हम ब्लॉग लिखेंगे तो आम आदमी की तरह. इसलिए जब अफ़ज़ल गुरु की बात करते हैं तब केवल यह याद रहता है कि उसे फांसी की सज़ा हो गई है. यह भी याद रहता है कि कुछ नेताओं ने और कुछ मानवाधिकार वालों उसे बचाने की मुहिम छेड़ रखी है. हमें इस बात से क्या लेना-देना कि यूरोपियन यूनियन अफ़ज़ल गुरु के मामले में भारत पर क्या दबाव डाल रहा है?

ऐसे में हम क्या लिखें?

हम जब किसानों की आत्महत्या की बात करेंगे तो यही न लिखेंगे कि सरकार की नीतियों की वजह से किसान मारा जा रहा है? हमें नहीं मालूम कि विदर्भ और बुंदेलखंड की आर्थिक दशा क्या है? किसान किस फसल की खेती करता है? वहां उपलब्ध साधन क्या हैं? हम तो जी आम आदमी की तरह यही सोचते मरे जा रहे हैं कि न जाने कितने लोग अपना जीवन ख़त्म कर ले रहे हैं.

हम जब न्याय-व्यवस्था पर लिखेंगे तो एक आम आदमी की धारणा लिए लिखेंगे. हमें तो केवल इतना पता है कि अदालतें न जाने कितने वर्षों से चल रहे न जाने कितने मुकदमें निबटा नहीं पा रही. क्यों नहीं निबटा पा रही, उसपर दिया जलाकर रौशनी दिखाना ख़ास लोगों का काम है. हमें केवल इतना जानते हैं कि वकील अपने दांव-पेंच कैसे चलाते हैं. हमें केवल इतना पता है कि इसकी वजह से मुकदमें कैसे खिंचते हैं.

हमें क्या पता कि आम आदमी की सोच लिए हम अगर कुछ लिख देंगे तो उससे अदालत की अवमानना होगी? हमें तो बस इतना मालूम है कि नेता टाइप लोग न जाने कितनी बार उच्चतम न्यायालय तक की अवमानना करते नहीं अघाते. लेकिन उनके खिलाफ कुछ नहीं होता. हमें तो बस इतना पता है कि आये दिन न्याय पालिका में भ्रष्टाचार की बातें होती रहती हैं.

इन मुद्दों के फ़ाइनर पॉइंट्स पर प्रकाश डालने का काम किसी प्रशांत भूषण, किसी फली नारीमन या किसी सोली सोराबजी के जिम्मे है.

ऐसे में हम और क्या लिखेंगे? ब्लॉग लिखने से बदलाव होता है, ऐसा कोई गुमान नहीं पाल रक्खा है हमने. हमें तो यही समझ में आता है कि टीवी के पैनल डिस्कशन या फिर सेमिनार आयोजित करने से अगर बदलाव नहीं आ पाया तो फिर शायद ब्लॉग का नंबर आये..:-)

लेकिन अब क्या अनिवार्य हो जाएगा कि ब्लॉग लिखने से पहले भारतीय अचार संहिता की धाराएं रट लो? साइबर कानूनों को घोंट डालो. हमारे लेख से किस-किस को नाराजगी होगी उसकी एक लिस्ट बना लो. इतना सबकुछ कर लो उसके बाद लिखना. चार साल लग जायेंगे सारी तैयारी करने में. हो सकता है उसके बाद जब लिखने की बारी आये तो पता चले कि गूगल जी ने फ्री की सुविधा हटा ली. ऐसे में हमारा ब्लॉग कैरियर तो शुरू होने से पहले ही ख़त्म हो जाएगा.

अभिव्यक्ति का माध्यम क्या केवल ब्लॉग ही है?

यह तो अभी आया है. हाल ही में. इससे पहले जो लोग व्यंग वगैरह लिख डालते थे उन्हें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं थी? क्या होता अगर कोई अधिकारी, कोई मास्टर, कोई नेता, कोई राजनीतिक पार्टी, कोई डॉक्टर, कोई वकील, कोई थानेदार, कोई गवर्नर, कोई मुख्यमंत्री किसी परसाई जी, किसी शरद जोशी जी या किसी श्रीलाल शुक्ल जी से नाराज़ हो जाता तो?

समाज में न जाने किन-किन विसंगतियों पर इन लोगों ने लिखा. किसी को छोड़ा नहीं. लेकिन मैंने तो नहीं सुना कि किसी ने इन्हें अदालत में घसीट लिया हो. ऐसा होता तो क्या-क्या हो सकता था?

देखते कि सन पचहत्तर से ही परसाई जी केवल अदालतों के चक्कर काट रहे हैं. किसी दिन जबलपुर में मुक़दमे की सुनवाई रहती तो यह कहते सुने जाते कि;"क्या कहें, वकालत में व्याप्त विसंगतियों के बारे में लिख दिया था. गवाह कैसे तोडे जाते हैं. तारीख कैसी ली जाती है. जबलपुर बार असोसिएशन ने मुकदमा ठोक दिया. अब तो झेलना पड़ेगा ही. मेरी भी मति मारी गई थी. काहे व्यंग लिखने गए?"

कोई कहता कि; " कोई बात नहीं. ऐसा होता रहता है. सब ठीक हो जाएगा."

इस बात पर शायद बोलते; "अरे क्या ख़ाक ठीक हो जाएगा? अभी कल ग्वालियर में मुक़दमे की सुनवाई है. रानी नागफनी की कहानी में डॉक्टर भाई लोगों के बारे में लिख दिया था कि कैसे जब मार्केट में कोई दवाई भारी मात्रा में आ जाती है डॉक्टर लोग हर रोग में मरीज को वही दवाई प्रिस्क्राईब कर देते हैं. कल की तारीख निबट जाए तो अगले मंगलवार को हैदराबाद जाना है. राजनीति पर लिखे गए एक लेख में चेन्ना रेड्डी को खींच लिए थे. भाई ने आंध्रप्रदेश हाई कोर्ट में मुकदमा दायर कर दिया है."

देखते कि सन पचहत्तर के बाद उन्होंने कुछ लिखा ही नहीं. तब से सन पंचानवे तक बेचारे मुकदमों में उलझे-उलझे इस असार संसार से कूच कर जाते.

कैसा लगता अगर ऐसा कुछ हो जाता तो?

संजय गांधी की खिंचाई न जाने कितनी बार की होगी उन्होंने. अशोक मेहता से लेकर राम मनोहर लोहिया, और जय प्रकाश नारायण से लेकर राज नारायण तक किसी को नहीं छोड़ा. लेकिन क्या इन लोगों ने उनको मुकदमों में फंसाकर जोत डालने की कसम खाई?

या फिर उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के कुछ और मायने थे? या कहीं ऐसा तो नहीं कि परसाई जी अपने समय के बाहुबली थे जिनसे सब डरते थे इसलिए किसी ने डर के मारे मुकदमा नहीं दायर किया?

आखिर एक आम आदमी की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की कीमत क्या है? जेलयात्रा?

55 comments:

  1. बहुत असरदार लेख!!

    ब्लोगर के मन की बात कह दी आपने.. हमें क्या पता... हम जैसा सोचते थे लिख दिये...

    "ब्लॉग लिखने से बदलाव होता है, ऐसा कोई गुमान नहीं पाल रक्खा है हमने. हमें तो यही समझ में आता है कि टीवी के पैनल डिस्कशन या फिर सेमीनार आयोजित करने से अगर बदलाव नहीं आ पाया तो फिर शायद ब्लॉग का नंबर आये..."

    बहुत सही..

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  2. देखिये पंगेबाज ने अपनी पोस्ट मे अधिवक्ताओ की जिस मानसिकता की और ध्यान आकर्षित किया था.दिनेश राय द्विवेदी ने पंगेबाज को मेल भेजकर उसी मानसिकता का परिचय देते हुये पंगेबाज के कहे पर प्रमाणिकता की मोहर लगाई है.
    गाजियाबाद लखनऊ मे हाल ही मे छोटे छोटे मामलो पर हुये वकीलो की हडताल मे उनका संगठित गुंडो जैसा व्यवहार इसी मानसिकता को दर्शाता है.तो दिनेश जी से इस से अलग व्यवहार की क्यो उम्मीद की जानी चाहिये ?

    ऐसे मे पंगेबाज को अपनी पोस्ट डीलीट नही करनी चाहिये थी .नाही आपको इस तरह परेशान होना चाहिये.आप अपनी बात खुले दिल से रखते रहे बिना किसी की परवाह किये.यहा पंगेबाज ने गलत किया है उसे इस तरह की गीदड भभकियो से नही डरना था

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  3. शिव कुमार जी ॥

    सादर अभिनन्दन,

    बहुत छोटी हूँ आपसे इसलिए यदि यह कहूँ कि आपने बहुत बेबाकी से एक उत्कृष्ट लेख लिखा है तो छोटा मुंह बड़ी बात हो जायेगी ..

    अभी इस बात पर दुखी ही थी की क्यों अरुण जी अपना लेख किसी के कहने पर हटा लिया कि आप के ब्लॉग पर आना हुआ और आपकी लिखी हर बात दिल को छू गई।

    मैं सहमत हूँ आपसे ..क्या अभिव्यक्ति की आजादी संविधान के पन्नों में लिखने भर के लिए है ? दरबारियों के इस देश में एक आम आदमी की मतदान के एक दिन के बाद वैसे ही कोई पहचान नहीं रहती तो क्या अब उसे अपनी बात अपने अंदाज़ में कहने का हक़ भी नहीं है ? क्यों एक आम आदमी हर नियम कानून का पालन करे जब लाल बत्ती धारी हर दिन हर पल उन नियमों को कुचलते जाते हैं ... कुछ लोग लिखने में संयम बरतने की सलाह देते हैंकचहरी मुकदमों का खौफ दिखाते हैं इन्ही दरबारियों की जमात में आते हैं । यह तो यूँ हुआ कि चोट खाते जाओ वह तुम्हारी बदी है पर उफ़ मत करो ,उसका हक़ नहीं है।

    इतने उत्तम और चोट करते लेखन के लिए बधाई स्वीकारें !

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  4. शिव जी, सभी ब्लागर बहुत समझदार हैं। जो चाहें समझें। मेरी आलोचना से कोई फर्क नहीं पड़ता। मेरी बिरादरी वकील की है तो ब्लागर भी हूँ। मुझे कुछ भी कहेंगे मैं प्रतिक्रिया तो व्यक्त करूंगा लेकिन किसी को अदालत में घसीटने नहीं जा रहा हूँ। पंगेबाज की उस पोस्ट को आप लोग ध्यान से देखेंगे तो उन में उन के विचारों के साथ कुछ पंक्तियाँ ऐसी थीं जो संपूर्ण वकील समुदाय के लिए अपमानजनक हैं। इस तरह की पंक्तियों के प्रकाशन पर कुछ मामलों में सजाएँ हो चुकी हैं। मैं ने केवल उन से विनम्र निवेदन किया था। उन्हों ने माना मैं उन का आभारी हूँ। जिन्हों ने न माना उन का भी आभारी हूँ।

    कुछ दिन पहले ही यह चर्चा ब्लाग जगत में हो चुकी है कि हमारी आलोचना की सीमा क्या होनी चाहिए। सभ्य समाज में कानूनन स्वीकार किए जाने की सीमा तक होनी चाहिए। उस सीमा तक होनी चाहिए जिस से वह कानून की किताबों में वर्णित अपराध की परिधि में न आए।

    यहाँ तक कि किसी ब्लाग पर प्रकाशित अपमान जनक टिप्पणी की जिम्मेदारी भी ब्लाग स्वामी की मानी गई है। सभी ब्लागर साथी हैं। अनजाने या जानबूझ कर उन से यह गलती होती है तो साथी को यह बताना फर्ज था, सो निभा दिया। आगे भी कोशिश रहेगी तो निभाएँगे।

    पहले भी कुछ ब्लागरों ने अपने ब्लाग पर पोस्ट को प्रकाशित करने के पहले यह सलाह ली है कि इस में कुछ आपत्तिजनक तो नहीं है। और उस दायित्व को यथासंभव निभाया भी है।

    किसी को सचेत करने को भी धमकी समझा जाए तो समझा जाए। जो इसे दायित्व समझता है वह तो करेगा। आप भी तो सावधानी रखते हैं भाषा को संयत बनाए रखने की। इस आलेख में आप की भाषा पूरी तरह संयत है। यदि ऐसा रहेगा तो कोई बात नहीं। लेकिन किसी अभियोजन चले के दौरान होने वाली परेशानी को शायद आप लोग समझ नहीं पा रहे हैं। वह भी तब जब कि वह पूरे देश में कहीं भी की जा सकती हो। मैं नहीं समझता कि उस परेशानी को उठाने में एक ब्लागर समर्थ हो सकता है। मुकदमे में फैसला तो दूर की बात है।

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  5. सचमुच ही आप बधाई के पात्र हैं.ISO ९००१. लेकिन यह लिख कर कि "आये दिन न्याय पालिका में भ्रष्टाचार की बातें होती रहती हैं"
    एक मामला तो बन ही जाता है. भाई यह तो ,मात्र अफवाह है. आप ऐसी अफवाहों को relay कर रहे हो. अब न्याय पालिका रुष्ट हो सकती है. एक आम आदमी हमारी चड्डी उतार रहा है, अफवाहों को हवा देकर.

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  6. स्वतंत्रता दायित्त्व पर सवार हो कर आती है. जो जिम्मेदारी नहीं निभाते अपनी स्वतंत्रता खो देते है.

    ब्लॉग आम आदमी के हाथ आया दमदार हथियार है, सरकारें घबराती है इससे. मगर आम आदमी भी जो लिख रहा है, वह उसकी जिम्मेदारी तो है ही.

    व्यंग्यकार वार तो करता है, ऐसा की काटो तो खून न निकले. मगर पूरी जिम्मेदारी के साथ.

    मैं यहाँ किसने क्या कहा, क्या हटाया, सही या गलत की बात नहीं कर रहा. आपके लिखे पर टिप्पणी कर रहा हूँ. आपने बहुत ही सभ्य भाषा में क्यों लिखा है? काहे भड़ास नहीं निकाली, क्यों सीधे सीधे किसी का नाम नहीं लिया? एक दो गाली भी हो सकती थी.... मगर नहीं हुई... क्यों? क्या इससे आपकी स्वतंत्रता का हनन हुआ है?

    ब्लॉग मन का गुबार निकलने का सही साधन है. और लिखते हो तो उसका परिणाम भोगने के लिए भी तैयार रहना चाहिए.

    यहाँ फिर से दोहराना चाहता हूँ, अफ्जल और कसाब पर सरकार का रवैया संदेहास्पद है. एक भारतीय के नाते इस पर मैं दुखी हूँ.

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  7. गुरुदेव ..इसमें कोई शक नहीं की पंगेबाज ने तगड़ा पंगा कर दिया..देखो न पोस्ट हटा ली मगर कमबख्त हट कहाँ रही है..कभी किसी ब्लॉग पर तो कभी किसी पर मुई लटकी हुई है..खैर...अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता..उफ़ ये पंक्तियाँ सुन सुन कर तो मन व्यथित हो गया है...किसी को गाली दो ..किसी को छेड़ दो..किसी पर फब्ती कास दो..सब स्वतन्त्रता है और जाहिर है की कुछ न कुछ अभिव्यक्त करने के लिए ली है..मगर..मगर..हाँ मगर.. ये सब तभी तक स्वतन्त्रता के दायरे में आयेगी जब तक किसी दुसरे के अधिकार का ..उसके मान सम्मान का हनन न करने लगे..अजी छूट है..बिलकुल छूट है..यदि ऐसा ही है तो फिर ये अपने अनाम लोग ..मुंह क्या नाम तक छुपा कर काहे गरियाते हैं..बोलिए न खुल्लम खुल्ला गरियाने के लिए...हे भगवान् कौनो अनाम हमरा नाम भी न पढ़ ले..ज्ञान जी..अज्ञान वश कुछ ज्यादा लिख दिए हैं..क्षमा प्रभु....

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  8. दो मुद्दे हैं -
    १) क्या लिखना उचित है ब्लॉग पर और क्या नहीं और भाषा क्या हो। इसपर कस कर बहस हो सकती है और अंग्रेजी ब्लॉगों पर देखें तो बहुत सार्थक बहस होती नजर भी आती है।
    २) क्या (जैसा भी लिखा हो, को) यह कह कर धमकाया जाना उचित है कि कोई इसको ले कर कोर्ट पंहुच जायेगा तो कोर्ट कचहरी में मामला लम्बा चलाने की दशा में, भले ही वह ब्लॉगर सही हो या गलत, बहुत फजीहत होगी। यह परेशान करने का मुद्दा है। मेरे जैसे व्यक्ति जो अपनी फ्रीडम-ऑफ एक्स्प्रेशन की बजाय अपनी निरर्थक फजीहत से बचना चाहेंगे, ब्लॉग पर न लिखना बेहतर ऑप्शन नजर आता है। लोग भले की कायर कहें - पर जो है सो है।
    आखिर जब ब्लॉग नहीं लिखते थे, तब भी सार्थक जी रहे थे।
    कुछ पोस्टें मेरे ड्राफ्ट में बची हैं। पर मन खिन्न हो गया है।

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  9. भाई जी ब्लॉग अपनी खिचडी और अपनी ढपली अपना राग अलापने के लिए ही बनाए गए है . .....

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  10. जय हो !

    क्या घबराने या खिन्न होने से काम चलेगा ? कल क्या होगा इसकी चिन्ता में आज का जीना स्थगित ?

    कोई गुंडा गैर-कानूनी रूप से या कोई पुलिसवाला कानूनी रूप से हमें सड़क पर रोक कर गर्दन नाप देगा तो क्या सड़क पर चलना छोड़ देंगे ?

    क्या नियम-कानून सिर्फ़ मानने वालों के लिए हैं ?

    यूं किसी को भी परेशान करने के हज़ार तरीके हर समय उपलब्ध हैं .

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  11. मैथिली गुप्तJune 11, 2009 at 4:40 PM

    जब हमारे जैसे आम आदमी की खुद कोई कीमत नहीं तो हमारी अभिव्यक्ति की क्या कीमत!

    काश हम आम आदमी न होकर खासुलखास होते

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  12. अपने आम आदमी है इसी लिए समस्याओं को लेकर बावले हुए जा रहे है..वरना ख़ास लोगों को तो टाइम ही नहीं है सोचने को...!इस लिए चिंता छोडो और लिखते रहो....!रही बात पढने की तो कम से कम सभी ब्लॉग भाई तो आपस में चर्चा कर ही रहे है..परिवार की तरह..और क्या चाहिए हमें..?

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  13. आपने मेरे मन की बात कह दी :-)

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  14. अपनी पूरी उर्जा लगा कर मैं ये साबित कर भी दूं कि सामने वाला ग़लत हैऔर इस साबित करने को अपनी उपलब्धि भी मान लूं। फिर भी ये उपलब्धि मेरी रचनात्मक कृति नहीं है। हम कोशिश करें कि जब उर्जा लगा ही रहे हैं तो कुछ रचनात्मक हो। मुझे नहीं लगता जानबुझ दुनिया में कोई दोयम दर्जे की सोच रखता हो। अपना सच ही अगर अंतिम सत्य है तो बहस किस बात की। बस दुनिया को हम बताएं कि वो सच क्या है।न कि उस सच के लिए मुकदमें लड़ें।

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  15. ज्ञान दादा की बात बिलकुल सही है .मै भी उन्ही की राह पर चलना चाहूंगा .मेरा भी मन खिन्न हो है.हम तो खुद को तालीबानी कहलाकर भी चुप ही रहे .वरना ये रास्ते तो सबको पता है.लेकिन हम यहा मुकदमे बाजी या अन्य कोई तनाव लेने देने या बाटने नही आते.लगता है अब हमे भी यहा आना बंद ही कर देना चाहिये. ताकी आराम से लोग यहा कश्मीर से भारतीय सेना हटाओ से लेकर वेदो मे क्या लिखा है. कसाब से लेकर अफ़जल तक के मानवाधिकार तथा उनके वकील के द्वारा उन्हे आजाद कराने के हर घृणित प्रयास पर भारत सरकार द्वारा भारत रत्न दिलाने की पैरवॊ करने वालो के लिये सुरक्षित रह सके . बाकी या तो सम्मन से डर कर या फ़िर मुकदमो मे फ़स कर चले ही जायेगे . पता नही अभिव्यक्ती के इस स्थल पर इस प्रकार के हमले कसाब के द्वारा किये गये हमलो की अगली नीति तो नही . आखिर ये मामला भी हमारे कसाब को न्याय दिलवाने के विरोध से शुरू हुआ था . जिस का विरोध हमे तालीबानी बताने से शुरू होकर हमे ब्लोग से पोस्ट हटाने तक मजबूर किये जाने तक चलता रहा .

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  16. बहुत सटीक लेख है, लेकिन एक बात यहां कहना चाहूंगा.

    किसी सरफिरे वकील या उसके दोस्तों के मुकदमों से डरकर ब्लागिंग ही नहीं जीना भी छोड़ा जा सकता है, बस डर की मात्रा काफी होनी चाहिये.

    मुकदमा कोई भी कर सकता है, किसी पर भी कर सकता है, किसी वकील पर भी. कोई जबर्दस्ती मुद्दा निकालना चाहे तो इस दुनिया में कौन बचेगा? मैंने आज एक वकील को यह लेख पढ़वाया, फिर एक दूसरे लेख तक भी वह पहुंच गये, लेख पर उनके शब्द यहां न छाप कर अपना ही सम्मान बचा रहा हूं.

    तो वकील बिरादरी क्या चाहती है यह भी किसी एक वकील के लिये निर्धारित करना मुश्किल है, वरना कसाब का केस शायद ही किसी के हाथ में होता.

    क्योंकि किसी के भी मन की बात उनके लिखे शब्द पढ़कर नहीं जानी जा सकती इसलिये यह कहना मुश्किल है कि मंतव्य समझाना था या डराना, लेकिन कानून का जो रूप उन शब्दों में था, यह ही वह रूप है जिसकी वजह से नागरिकों के मन में कानून और वकीलों के लिये इज्जत कम होती है.

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  17. शिव जी धन्य हैं आप… अवमानना भी कर दी और वो भी मखमल में लपेटकर… मान गये गुरुजी आपको… लिखना कोई आपसे सीखे…।

    क्या मैं भी कसाब के पक्ष में, कश्मीरियों की आज़ादी के पक्ष में, नक्सलवादियों और उनके खैरख्वाहों के पक्ष में, धर्मनिरपेक्षता के पक्ष में लिखना शुरु कर दूं??? एकाध-दो साल में पुलित्ज़र या बुकर तो मिल ही जायेगा ना?

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  18. सच कहते हैं बंधू बहुत ध्यान से आपकी पोस्ट पढ़े...ध्यान से माने बहुत ही ध्यान से लेकिन ये नहीं पता लगा पाए की कमेन्ट किस बात पर करें...अब जब आप सच्ची बात लिखें हैं तो कमेन्ट क्या करें...अच्छा लिखें हैं क्या इस पे कमेन्ट करें...कनफुजिया गए हैं..सच में....क्या कमेन्ट करें बताईये ना...ससुरी बुद्धि से शेर तो फिर भी किसी तरह निकल जाता है कमेन्ट नहीं निकलता...चलो ये कमेन्ट करते हैं की: "बंधू बहुत खूब... लिखते रहो..." (बतर्ज़... बजाते रहो...रेड ऍफ़ एम्....)
    नीरज

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  19. लगता है आने वाले वक्त मे हर कोई यहा एक नोटिस ड्राफ़ट कर बैठा होगा.पोस्ट तो दूर की बात है चैट पर ही थमा देगा कल आ जाना चिंचपोकली की अदालत मे.
    ब्लोगवाणि मे भी सबसे ज्यादा पसंद की जगह लिखा होगा सबसे ज्यादा सम्मन प्राप्त पोस्ट
    सबसे ज्यादा सम्मन प्राप्त ब्लोगर

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  20. कुछ साथी निराश लग रहे हैं. मगर अतीत में इससे से बड़े विवाद हुए और आरोप लगे हैं. "गंदा नेप्किन", "मुस्लमानों का हत्यारा", पता नहीं क्या क्या शब्द प्रयोग में आए थे. कहाँ है वे आरोप लगाने वाले सब?

    ब्लॉगिंग मन की कहने का साधन है. सबको कहने का अधिकार है. लिखते जाओ....पूरी ठसक से....इस अंदाज में कि किसी को मिर्ची लगे तो लगे..... :)

    रही बात बुकर पाने की तो उसका फार्मूला सुरेशजी को मिल ही गया. मगर भैया "डूकर" (सुअर) बन कर बुकर किसे चाहिए? अतः न आपको मिलना है न हमें. ब्लॉगिंग करो, यही अच्छा है.

    आपके व्यंग्य का प्रसंशक रहा हूँ, आशा है जल्दी ही कोई डायरी पढ़ने को मिलेगी और स्कूल भी खोलना है अभी तो.... :)

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  21. आम हम जैसे ब्लोगरों के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तो है लेकिन सिर्फ उतनी ही जिस से हम स्वयं निपट सकते हो।(:))
    बहुत बढिया आलेख लिखा है।

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  22. जिस तरह से पोस्ट हटाई गई और जैसा घटना क्रम मे बहुत चला या चल रहा है, इसने सच मे बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया. क्या हमको अपने विचार व्यक्त करने की आजादी है?

    अगर है तो कहां हैं?

    पंगेबाज की उस पोस्ट मे ऐसा तो कुछ भी नही था कि उसे हटाया जाना ही जरुरी था? उस पोस्ट को हटाये जाने के बहुत से मतलब हैं जो आगे जाकर सामने आयेंगे.

    अगर इतनी सी बातों पर कोर्ट मे खींच लेने की धमकी दी गई है तो गलत है.

    अभी चार दिन पहले मुझे ही सरे आम कम्युनल की पदवी देदी गई...आप मे से ज्यादातर लोग जानते हैं कि मेरा लेखन कैसा है?

    रही बात टिपणीयों मे कही गई बात की तो आज सरे आम घोषणा करता हूं कि ना तो मैं किसी सेक्युलर/नान्सेक्युलर की स्पेलिंग जानता हूं पर
    जो भी लेख मेरे मन मे जैसी छवि बनायेगा मैं वैसी ही टिपणी करुंगा.

    अब अगर किसी को मुझ पर केस मुकदमा करना हो तो शौक से करे. अपना क्या है? जहां ब्लागिंग करते हैं वहां केस लडेंगे. पर किसी डर या धमकी से अपनी आत्मा की आवाज को दबा नही सकते.

    हमको कोई गाली सरेआम देजाये तो हम को चुप रहना चाहिये..और हमने अपनी बात बःइ रखदी तो हमको फ़ांसी पर टांग दो.

    वाह् रे न्याय..जब हमको गालियां दी गई तब उस पोस्ट को हटाने की राय भी दी जानी चाहिये थी.

    रामराम.

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  23. ज्ञान जी से सहमत हूँ शत प्रतिशत.... ओर अंग्रेजी ब्लोगों पर जबरदस्त बहस का साक्षी हूँ...पर हाँ .भाषा पर नियंत्रण की अपेक्षा ओर किसी बहस के निजी नहीं होने का पक्षधर हूँ...
    बाकी मैंने अरुण जी के ब्लॉग पर कह ही दिया है

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  24. मैं भी दिनेशराय द्विवेदी को बिना मांगे और बिना पैसे लिये सलाह दे रहा हूं कि वे अपने चिट्ठों पर देशी विदेशी वेबसाईटों और ब्लागों से जो फोटो उचका कर डाल रहे हैं वह गैरकानूनी है, कभी भी कोई इन पर मुकदमा कर सकता है और इन्हें भारी शर्मिन्दगी/फजीहत झेलनी पड़ सकती है।

    इस तरह फोटो उचका कर डालने के बारे में चिठ्ठाजगत के शास्त्री जी ने कई पोस्टें लिखीं है द्विवेदी उन्हें पड़ लें।

    हो सकता है कि अभी उन वेबसाईटों को पता न चल पा रहा हो, लेकिन गलत बात तो गलत बात है, कभी तो मामला खुल ही जायेगा।

    यह तिप्पनी निवेदन है, "धमकात्मक स्नेह" नहीं है :)

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  25. I wish all Hindi bloggers who feel that "common man " should be told what needs to be done to keep him/her safe should see movie "A Wednesday" The power that common man has none has . Its just that we need to have a will to keep protesting till we can get the desired result . Blogging in hindi
    is not growing because we are not bloging we are merely writing . And Shiv you have very rightly said that the topics are just few that we are dealing with . And exceptions , who write away from those topics or who constantly write on issues and comment on blogs where those issues are being talked , are given bad names and told time and again what needs to be done . This post is good but it lacks links . Its important to link each post with another post so that the continuity is made and readers can make out what is going on. TO make your reach far and wide make small posts and link them for the benefit of common blogger so that OUR VOICE reaches millions . Bloging is the VOICE Of MIND

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  26. एक सिक्‍के के दो पहलू की बारे में सभी लोग जानते है। उस लेख में ऐसा कुछ भी नही था जिससे वकील विरादरी छुई मुई की तरह मुरझा जाती है। आज मै विधि का छात्र हूँ करीब एक साल बाद मुझे भी इसी बिरादरी का हिस्‍सा बनना है।

    अगर हम हर बात के लिये अपनी प्रतिष्‍ठा से जोड़ लेगे तो निश्चित रूप से यह दुर्भाग्‍य पूर्ण होगा। कानून की धमकी का प्रश्‍न नही है, न इसे धमकी बनने और बनने देना चाहिये। पंगेबाज हिन्‍दी चिट्ठाकारी में मेरे सबसे अच्‍छे मित्रों में एक है,उन्होने एक बार भी लेख हटाने से पूर्व मुझसे नही पूछा इसका मुझे दुख है, लेख हटाने की मै सर्वथा निन्‍दा करता हूँ। इसके पीछे सभी लोग निन्‍दनीय है चाहे वो पंगेबाज हो या और कोई। लेख हटने बाद मैने कई विधि जानकारो से राय ली उनका भी कहना था कि इसमें ऐसा कुछ नही था कि इससे वकीलो में नारजगी होनी चाहिये।

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  27. जय हो।

    हम तो आपके खिलाफ़ अदालत में मुकदमा ठोकने के लिये बस निकल ही लिये थे कि अभी तक चर्चा नहीं किये और इहां मुकदमा चौपाल पर हुक्का पानी का डौल बना रहे हैं। वो तो कहो अदालत बंद हो गयी और आप आजकी चर्चा कर के डाल दिये तो मामला अदालत के बाहर ही निपट गया।

    अरुण अरोरा की जिस पोस्ट का जिक्र हुआ यहां उसके बारे में द्विवेदीजी ने जैसा उचित समझा वैसा उनको अपना समझते हुये मेल किया। यह उनके आपसी संबंध और सौहार्द की बात है। इसको द्विवेदीजी की धमकी (गीदड़ भभकी) बताना और उनकी सलाह मानकर अरुण अरोरा द्वारा अपनी पोस्ट हटा लेने को उनका डर जाना कहकर प्रचारित करना दोनों के साथ अन्याय है।

    जब अरुण अरोरा ने ब्लागिंग शुरू की थी तब उनको अनेक धमकियां मिलीं थीं । भयंकर परिणाम झेलने और देख लेने और शायद जान-माल की धमकियां भी। उनके सामने यह एक शुभेक्छु की सलाह कुछ नहीं है। इसलिये अरुण अरोरा ने डरकर इसे हटा लिया हुआ होगा मुझे यह सही नहीं लगता। इसे धमकी के रूप में देखना एक शुभेक्छु के साथ अन्याय करना है। अगली बार शायद वे या उनकी तरह का अन्य कोई कोई भी सलाह देने में हिचकिचाये।

    अरुण अरोरा के उनकी पोस्ट में लिखे भाव और यहां टिपियाये गये भाव में दिन और रात का नहीं तो कम से कम सुबह और दोपहर का अंतर तो है ही। यह अफ़सोस जनक है।

    परसाईजी का जिक्र आया इस लेख में। परसाई जी को कम नहीं झेलना पड़ा अपने लेखन के चलते। लोग उनके लेख लौटा देते थे क्योंकि उनके लेख सत्ता प्रतिष्ठान के खिलाफ़ होते थे। लेखन के चलते ही उनकी टांग भी तोड़ दी लोगों ने। परसाई जी बाहुबली नहीं थे लेकिन आम आदमी के पैरोकार थे। यही उनकी ताकत थी।

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  28. Pangebaj used wordings "हमारे ब्लोगर वकील दोस्त " couple of times in his post. Vakil Dost ne turant eak dhamkibhari e-mail bhej di. Everyone knows how our judiciary works and how our lawyers exploit the system.
    Common man don't want to involve in this and immediately remove his post from his blog. Our this lawyer friend always comment against Hindu religion and hinduism. You won't find even a single comment of his against any other religion. The action of this Blogger lawyer friend indicate the mentality of our lawyer community.
    Lawyer goes to the court everyday but a common man cannot afford to go to court. Trust me if this lawyer friend send you simmilar e-mail, you will also remove your post.

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  29. एक बात स्पष्ट रूप से यहाँ देखी जा रही है कि प्रत्येक व्यक्ति की भाषा संयत लग रही।

    ये परिवर्तन सुखद है।

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  30. Lokesh Bhai - Eak Vakil Blogger mitr ban kar dusre blogger ko dhamkaye aur post hatane par majboor kare esko aap ये परिवर्तन सुखद है। samjhate hai

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  31. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तो है ही, कौन किसके रोके, रूका है।

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  32. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तो है ही, कौन किसके रोके, रूका है।

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  33. आम तौर पर मैं किसी अन्य के ब्लॉग पर अनामी को जवाब देने का पक्षधर नहीं हूँ, किन्तु आपने मेरी समझदानी पर प्रश्न चिन्ह लगाया है इसलिए …

    जब मैंने यहाँ शब्द का प्रयोग किया था तो इसका तात्पर्य था यहाँ। मेरा उस कथित विवाद की ओर इशारा नहीं था।

    समझते ही नहीं :-)

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  34. जो आदमी खुद के बारे में न सोंच कर इतनी बांते सोचे वो आम आदमी तो हरगिज नहीं हो सकता
    (और ये बात मैं मजाक में नहीं कह रहा हूँ )

    वीनस केसरी

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  35. अरे बाबा इन लोगो मे इतना ही गुस्सा है, अगर इतनी ही हिम्मत है तो भाई एक काम करो प्लीज, कृप्या, मेहरबानी कर के अपना सारा गुस्सा सीमा पर जा कर उतारो, या फ़िर जो गुंडे मवाली शरीफ़ लडकियो को सडको पर छेडते है उन पर उतारो, भाई यहां सब अपनी अपनी बात करते है, सलाह करते है, एक दुसरे का दुख बांट रहे है, फ़िर कोई एक जगह तो छोडो जहां हम प्यार से मिल बेठ कर एक दुसरे की बात सह सके, एक दुसरे की बात सुन सके , अपने मन की बात तो कह सके, दिनेश जी ने कुछ गलत नही लिखा, बस अपनी राय दी है फ़िर इतना हंगामा क्यो.
    आज सुबह मेरे ब्लांग "छोटी छोटी बाते पर एक अनाम टिपण्णी आई, जिसे मेने पहले हल्के फ़ुल्के आंदाज मे लिया, फ़िर मेने ध्यान से पढी जिस मै दिनेश जी ओर पंगे वाज जी का जिकर था, मेने उसे उसी समय डिलीट कर दिया, जब की वो मेरे पास शायद मेल मै पढी हो,आओ प्यार बांटे, ओर प्यार ले.
    शिव कुमार जी आप ने बहुत सुंदर शब्दो मे अपने दिल की नही, हम सब के दिल की आवाज को एक रुप दिया है, काश हम सब इस बात को मनन करे,मै सभी का धन्यवादी होऊगां,
    आप का धन्यवाद

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  36. चलिए जो कुछ भी पंगेबाज ने और द्विवेदी जी ने किया और कहा उससे कम से कम बहस का एक मुद्दा तो निकल आया। ज्ञान जी की बात सही लग रही है।

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  37. हम तो मजे में पढ़ रहे थे. टिपण्णीयों को देखकर सीरियस हो गए.

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  38. चलिए, बहुत कुछ तस्वीर साफ़ हुई।
    ब्लॉग्स पर सभी का उज्ज्वल चहरा सामने आता है, इस प्रसंग में सब हमाम में नंगे हो लिए।
    काफ़ी लोगो का अंतस सामने आ गया।

    सोच की असली तस्वीर ऐसे ही साधारण चर्चाओं मॆं सामने आती है।

    काफ़ी मुगालते दूर हुए, और मुखौटों के पीछे झांकने का अवसर मिला।

    बहुत-बहुत धन्यवाद!!

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  39. विरोध, आलोचना, याकि बहस में भाषा संयत हो इसमें दो राय नहीं हो सकती। लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ही लोकतंत्र की प्राणशक्ति है। दिनेशराय जी का यह कहना कि ‘कुछ पंक्तियाँ ऎसी थी जो सम्पूर्ण वकील समुदाय के लिए अपमानजनक हैं’ यह आपत्तिजनक है और इस पर मानहानि का मुकदमा चलाया जासकता है और कुछ मामलों में सजाएँ हो चुकी है।


    लेकिन मान हानि और वह भी सामुदायिकता को आधार बना कभी किसी की मान-हानि हुई है_

    १-साम्यवादी/समाजवादी व्यापारियों को भ्रष्ट, ड़ंण्ड़ीमार, चोर, टैक्सचोर, गरीबों का खून चूसनेंवाला, पूंजीवादी और न जानें क्या क्या कहते रहे हैं और आज भी कहते है, क्या यह एक पूरे समाज की मानहानि नहीं है?
    २-तिलक तराजू और तलवार इनको मारो जूता चार, यह सामुदायिक मानहानि नहीं है क्या?
    ३-हिन्दू देवी-देवताओं के चित्रों पर जूते लगाते जुलूस रामास्वामी नायकर के चेले निकालते थे उससे कोई मानहानि होती थी या नहीं?
    ४-आजमखाँ नें जब भारत माता को ‘ड़ाईन’ कहा था तो भारत माता की जय कहनें वालों की मान-हानि हुई थी या नही?
    ५-धवन और दूसरे वकला साहब जब कैमरे पर लेन-देन करते पकड़े जाते हैं तो वकील समुदाय की मान-हानि हुई थी कि नहीं?
    ६-बच्चे बेंचनें वाले, किड़नीं बेंचने वाले, स्त्री भ्रूण हत्या करनें वाले ड़ाक्टर्स के पकड़े जानें और जनता द्वारा गरियानें से उस समुदाय की मान-हानि होती है या नहीं?
    ७-सरकारी कर्मचारी,बाबू,अधिकारी कामचोर और भ्रष्ट कहा जाता है तो मान-हानि होती है या नहीं?
    ८-जब वकील अटैची लिफ्टिंग, घर पर जबरन कब्जा करने, हत्या के अपराध में पकड़े जाते है तो मान-हानि होती है या नहीं?
    ९-जब कैमरे पर नेता पैसे लेते पकड़े जाते हैं या सदन में पैसे से सांसद खरीदनें की बात देश देखता है तो पूरे देश की मान-हानि होती है क्या?


    पब्लिक पर्सनैलिटी पर लगाये गये आरोप में बर्ड़्न आफ प्रूफ आरोपित पर होता है कि वह साबित करे कि लगाया गया आरोप बेबुनियाद है और उसे वास्तविक कोई क्षति हुई है। कसाव का वकील सरकार से पैसे पा रहा है अतः पब्लिक ड़ोमेन में आता है। किसी इण्ड़िविजुल के मामले में भी बीसियो साल मुकदमा चलनें के बाद भी मान-हानि प्रूव कर पाना आसान नहीं है। द्विवेदी जी से मेरा आग्रह है कि कृपया ब्लाग जगत में इमर्जेंसी का माहौल न बनायें।

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  40. @लेकिन किसी अभियोजन चले के दौरान होने वाली परेशानी को शायद आप लोग समझ नहीं पा रहे हैं। वह भी तब जब कि वह पूरे देश में कहीं भी की जा सकती हो। मैं नहीं समझता कि उस परेशानी को उठाने में एक ब्लागर समर्थ हो सकता है। मुकदमे में फैसला तो दूर की बात है""जिस ब्लागर पर पूरे देश में मुकदमा चलाये जाने की धमकी दी जा रही है क्या वह ब्लागर आरोप लगाने वाले पर काउण्टर केस पूरे देश में छै जगह से नहीं लगा सकता?
    @चारों तरफ सन्नाटा है,
    सब और खामोशी है,
    जो सुनाई देता है,
    नोटों की सरसराहट है,
    हाँ ये अदालत है..... अजय झा बड़ा ज्ञान समझा रहे हैं उनके ब्लाग( कोर्ट कचहरी) पर यह कविता क्या न्यायालय की मानहानि नहीं कर रही है?

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  41. वीनस केसरी जी ने कहा है;

    "जो आदमी खुद के बारे में न सोंच कर इतनी बांते सोचे वो आम आदमी तो हरगिज नहीं हो सकता
    (और ये बात मैं मजाक में नहीं कह रहा हूँ )"

    @ वीनस जी

    वीनस जी, मुझे तो इसका ठीक उल्टा लगता है. मुझे तो यह लगता है कि आम आदमी है इसीलिए इतनी बातें सोचता है. ख़ास होता तो यह सब नहीं सोचता. कितने खास हैं, जो इतनी बातें सोचते हैं?

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  42. ज्‍यादातर ब्‍लॉगर तो यही कर रहे हैं, इधर उधर जो भी मिला, टीप दिये। पर यदि ब्‍लॉग जगत में एक अलग मकाम बनाना है, तो कुछ नया करके दिखाना होगा।

    -Zakir Ali ‘Rajnish’
    { Secretary-TSALIIM & SBAI }

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  43. Abhi shahar ke bahar hun aur shaniwaar tak wapas pahunchunga. Pure ghatnakram par nazar hai. Kahna kuch chahta tha magar yahan se sambhav nahi. Swa vivek kaa istemaal jaroori hai aur adhiktar log kar rahe hain. Baki Toronto pahunch kar.

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  44. आपने बहुत ही स्पष्ट तरीके से मनोदशा व्यक्त की है एक ब्लागर की । अभिव्यक्ति सर्वोपरि है, विषय कोई भी हो । कभी कभी कोई विचार ऐसा आ जाता है जो सारे पाठकों को उद्वेलित कर देता है । अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता भी उनमें से एक विषय है । हमको हमेशा से ही मर्यादा से रहना सिखाया जाता है और अच्छा भी है । लेकिन हर व्यक्ति के जीवन में ऐसे क्षण आते हैं जब मर्यादा बोझ लगने लगती है और मन करता है कि उतार दी जाये । कड़े शब्दों में कहें तो इसे विद्रोह कहेंगे और सौम्य शब्दों में इसे विचार परिवर्तन कहेंगे । यदि सबकुछ यथावत रखना है तो विचार की क्या आवश्यकता ? लेकिन क्या परिस्थितियाँ ऐसी हैं कि हमें सब यथावत रखने में गर्व हो । चारो तरफ फैली गन्दगी को देख आँख मूँदना था तो लिखना क्यों चालू किया गया ? यदि लिखना प्रारम्भ किया तो काहे की सीमा ।
    सत्य भी सापेक्षिक है । घर का बुजुर्ग यदि किशोर को दुष्ट कहे तो वह दुलार और पड़ोस का व्यक्ति उसे दुष्ट कहे तो वह गाली ? यही शायद ब्लाग जगत में हो रहा है ।

    इस परिप्रेक्ष्य में मुझे दो पंक्तियाँ बहुत भाती हैं -

    काँटा कठोर है, तीखा है, उसमें उसकी मर्यादा है,
    मैं कब कहता हूँ, वह घट कर प्रान्तर का ओछा फूल बने । - अज्ञेय

    न दैन्यं, न पलायनं

    इसे मेरी प्रार्थना समझी जाये न कि उपदेश ।

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  45. हरिशंकर गुरूजी की याद आ गई आपकी पोस्ट पढ़ कर । उन को पढ पढ कर ही इतना गरियाने की आदत पड़ गई है । सोचते हैं कि जाओ ससुरों बहुत करोगे तो एक दिन पीट ही दोगे न । लगे हाथ हम भी गुरूदेव की परंपरा में अपना नाम लिखवा लेंगे ।

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  46. दो दिन से चल रहे इस विवाद को बारीकी से देखनें पर यह समझ आरहा है कि मामला सीधा-साधा नहीं है। पूरे देश की मीड़िया चाहे वह प्रिंट मीड़िया हो या इलेक्ट्रानिक मीड़िया पर, एक विशेष मानसिकता और विचारधारा के लोगों का कब्जा है। वैसा ही प्रयास अभिव्यक्ति के इस माध्यम के साथ किया जा रहा लगता है।

    द्विवेदी जी ने जो बात कही, सिद्धन्ततः वह सही है लेकिन सदाशयता से दी गई सलाह में शुभेच्छुभाव कम धमकी अधिक दिखी। उचित शब्दों का चयन भी एक कारण हो सकता है।

    मेरे मत में इस सब से न निराश होंने की आवश्यकता है और न ही भयाक्रान्त होकर अपनी अभिव्यक्त्ति का गला घोंटनें की। बल्कि इससे सीख लेकर संयत किन्तु दृढ़ शब्दों में अधिक प्रखरता से अपनीं बात कहनीं चाहिये। जो लोग इस माध्यम पर एकाधिकार करना चाहते हैं, उन का जवाब तभी दिया जा सकेगा। मत भुले की यह अपनें विचार के प्रसार का भी साधन है। यतो धर्मः ततो जयः।

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  47. किस किस डर से क्या-क्या छोडोगे जी ....क्या कल सांस लेना भी इस डर से छोड दोगे कि हवा दिनबदीन जहरीली होती जा रही है ?


    कल फ़ुल-पत्ती पर कविता सुनाइयेगा :)

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  48. इतने वरिस्ठ और अनुभवी लोगों के बीच ऐसे विवाद तो नए ब्लौगर्स को हतोत्साहित ही करेंगे.

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  49. मैं यहाँ उल्टी दिशा में चलता हुआ देर से पहुँचा हूँ। पूरे प्रकरण से एक निष्कर्ष निकलता है। वह ये कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ब्लॉग जगत में पूरी तरह से अक्षुण्ण है। सबने अपने मन की बात पूरी निर्भयता से कही है। शायद इतनी जितनी सामने बैठकर नहीं कर पाते। उदाहरण के लिए इसी मुद्दे को ले लीजिए।

    आदरणीय द्विवेदी जी इस समय जरूर व्यथित होंगे। क्योंकि अरुण जी को उन्होंने जो व्यक्तिगत सलाह मेल से दी थी उसका यह हश्र होगा, उन्होंने कतई नहीं सोचा होगा। मुझे लगता है कि द्विवेदी जी ने एक अच्छे आशय से अपनी बात कही थी। लेकिन इस माध्यम की अतिशय स्वतंत्रता और सुलभता ने उनकी बात को कुछ ज्यादा दूरी तक खींच डाला।

    शिव भ‍इया का आलेख पढ़कर कहीं नहीं लगा कि वो सच्चाई के अतिरिक्त कुछ गलत भी कह रहे हैं लेकिन इसका अन्तिम प्रभाव जो पैदा हुआ उससे आदरणीय द्विवेदी जी को अनावश्यक कठघरे में खड़ा होना पड़ा जिसके वो पात्र नहीं थे। उनका लेखन बहुतों के लिए प्रेरक और ज्ञानवर्द्धक होता है। अभी भी उनके संयत विचारों की कद्र की जानी चाहिए।

    अरुण जी ने उनका सम्मान करते हुए अपनी पोस्ट हटा तो ली लेकिन अगली पोस्ट में जिस रूप से इस मुद्दे को उठाया गया और उसपर जो टिप्पणियाँ आयीं उससे बात का बतंगड़ बनता गया।

    मुझे इसका खेद है।

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  50. मुझे लगता है कि जो बात मैं कहना चाहता था वह सिद्धार्थ शंकर जी ने कह दी है।

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  51. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर शिव जी की यह एक कालजयी प्रविष्टि है ! अब इसके निहितार्थ क्या हैं यह एक अलग विषय है !

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टिप्पणी के लिये अग्रिम धन्यवाद। --- शिवकुमार मिश्र-ज्ञानदत्त पाण्डेय