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Friday, February 4, 2011

बीरबल का ईनाम


@mishrashiv I'm reading: बीरबल का ईनामTweet this (ट्वीट करें)!

बीरबल आज फिर से बहुत प्रसन्न थे. वैसे प्रसन्न रहना उनके लिए कोई नई बात नहीं थी. उन्हें जो भी देखता, यही सोचता कि ये इंसान प्रसन्न रहने के लिए ही इस धरा पर आया है. एक बार फिर से उन्होंने अपनी बुद्धि का लोहा मनवा लिया था. बादशाह के साथ सारे दरबारी खुश नज़र आ रहे थे.

बीरबल बाबू से जलने वाले दरबारी खुश दीखने की एक्टिंग कर रहे थे. उनसे जलने वाले दरबारियों के पास और कोई चारा नहीं था. इनलोगों ने मन ही मन सोच लिया था कि जलने-भुनने का काम 'ऐज यूजुवल' दरबार से बाहर निकलने के बाद कर लेंगे. बीरबल बाबू जितनी बार अपनी तीक्ष्ण बुद्धि का प्रदर्शन करते, उनसे जलने वाले दरबारियों का खून कम हो जाता.

वैसे आज इन दरबारियों का खून कुछ ज्यादा ही जलने वाला था.उसका कारण यह था कि बादशाह जी ने बीरबल को ईनाम में दो सौ किलो चावल और पचास किलो मसूर की दाल और एक क्विंटल प्याज दिया था. इतना कीमती ईनाम पाकर बीरबल की प्रसन्नता दूनी हो गई थी.

उनसे जलने वाले दरबारी ये सोचते हुए दुखी थे कि 'एक बीरबल है जिसे आज ईनाम में चावल, दाल और प्याज मिली और एक हम हैं, जिन्हें मुद्राओं से संतोष करना पड़ता है. पता नहीं हमारे दिन ऐसे कब आयेंगे जब हमें भी ईनाम में यह सबकुछ मिलेगा.

ऐसा पहली बार हुआ था कि बीरबल को ईनाम में चावल, दाल और प्याज की प्राप्ति हुई थी. कारण ये था कि बादशाह अकबर आज कुछ ज्यादा ही खुश हो लिए थे. बादशाहों को खुश होने के अलवा और काम ही क्या था? उनके पास दो ही तो काम थे. या तो बैठे-बैठे बोर हो लें या फिर खुश हो लें. कई बार बोरियत से बचने की कोशिश करते तो खुशी अपने आप डेरा दाल देती.

कई लोगों का तो ये भी मानना था कि 'बादशाह दरबार में हंसने का उपक्रम ख़ुद ही करते हैं.'

आज बीरबल बाबू की बुद्धि का लोहा मानते हुए उन्होंने बीरबल से कहा;"बीरबल, आज हम तुम्हारी बुद्धि पर ज़रूरत से ज्यादा खुश हैं. यही कारण है कि आज हम तुम्हें कोई कीमती चीज देना चाहता हैं. वैसे भी तुम्हें ईनाम में मुद्राएं देते-देते हम बोर हो चुके हैं."

बादशाह जी की बात सुनकर बीरबल धन्य हो गए. बोले; "ये तो आलमपनाह की नाचीज पर दया है, वरना कीमती चीज पाने की हमारी क्या औकात?"

बादशाह को जोश दिलाने और अपने लिए ईनाम की राशि दूनी करवाने का इससे अच्छा साधन और क्या हो सकता है कि दरबारी अपनी औकात को पाताल तक पहुँचा दे? वैसे भी, कितना भी बुद्धिमान दरबारी हो, अगर बादशाह के सामने अपनी औकात को जीरो न बताये तो उसको दरबारत्व का ज्ञान लेने वापस पाठशाला चले जाना चाहिए.

बीरबल का तीर सही निशाने पर लगा. उनकी औकात वाली बात पर बादशाह अकबर का जोश कुलांचे मारने लगा. वे बोले; "नहीं-नहीं, ऐसा मत कहो बीरबल. तुम सचमुच कीमती चीज डिजर्व करते हो. बस, ये बताओ कि तुम्हें क्या चाहिए?"

बादशाह की बात सुनकर बीरबल बोले; "जहाँपनाह, जैसे आप मुद्राएं देकर बोर हो लिए हैं, उसी तरह मैं लेकर बोर हो गया हूँ. आप जो मुद्राएं ईनाम में देते हैं, उसे लेकर जब घर पहुँचता हूँ तो और पत्नी को बताता हूँ कि आज ईनाम में मुद्राएं मिलीं, तो पत्नी ताने मारती है. कहती है मुझ जैसे निकम्मे को इनाम में और क्या मिलेगा?"

"तो क्या तुम्हारी पत्नी खुश नहीं होती?"; बादशाह ने बीरबल से पूछा.

बादशाह की बात सुनकर बीरबल ने कहा; "कैसे खुश होगी, आलमपनाह? मुद्रा पाकर आज के ज़माने में कौन गृहणी खुश रहेगी?"

ये कहते हुए बीरबल मन ही मन मुस्कुरा रहे थे. सोच रहे थे 'मुद्रा की जगह स्वर्ण आभूषण रहता तो ये ताने मारने का कार्यक्रम होता ही नहीं.'

बीरबल की बात सुनकर बादशाह जी को बड़ा आश्चर्य हुआ. कोई मुद्राएं पाकर खुश न हो, ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था. वे बोले; "तो क्या तुम्हारी पत्नी की निगाह में मुद्राओं की कोई कीमत नहीं है?"

बादशाह की बात सुनकर बीरबल बाबू को समझ नहीं आया कि वे क्या कहें? लेकिन बहुत साहस बटोर कर बोले; "आपके राज की मुद्रा की घटती कीमत का अंदाजा आपको नहीं है आलमपनाह. वैसे आपके के राज में चलने वाली मुद्रा की कीमत कितनी गिरी है, इसका अंदाजा आपको कैसे लगेगा?"

"क्या मतलब है तुम्हारा?"; बादशाह ने अचम्भे से पूछा.

"आपको शायद मालूम नहीं जहाँपनाह कि आपके राज में चलने वाली मुद्रा से खरीदारी करने पर आजकल झोले में कुछ नहीं आता. वैसे भी आपको इस बात की जानकारी कौन देगा? आपके पास जितना समय है, वो तो हँसने या फिर हँसने की कोशिश करने में चला जाता है. ऊपर से या तो आप महल से निकलते ही नहीं, या फिर निकलते हैं तो कूटनीति की प्रैक्टिस करने परदेस चले जाते हैं"; बीरबल बाबू ने बादशाह के करीबी होने का फायदा उठाते हुए सच कह डाला.

बीरबल बाबू की बात सुनकर बादशाह जी कुछ सोचने लगे. सोचते हुए बोले; "तो कोई बात नहीं. मैं तुम्हें ईनाम में एक कार दे देता हूँ."

बादशाह की बात सुनकर बीरबल ने मन ही मन अपना माथा ठोक लिया. बोले; "कार तो दे देंगे जहाँपनाह, लेकिन पेट्रोल की कीमत का जो हाल है, मैं कार लेकर करूंगा क्या? देना ही है तो कोई सच में कीमती चीज दीजिये."

"तो तुम्ही बताओ, तुम्हें क्या चाहिए?"; बादशाह ने बीरबल से पूछा.

"आप देना ही चाहते हैं तो मुझे चावल और दाल दे दें. और अगर उसके साथ में प्याज मिल जाती तो मेरा यह जनम सफल हो जाता. आजकल यही सबसे कीमती चीज है"; बीरबल ने कीमती सामान का नाम बता दिया.

बादशाह ने मंत्री को आदेश दिया कि बीरबल को ईनाम में चावल, दाल और प्याज दे दिया जाय. बीरबल बाबू को जब यह सबकुछ मिल गया तो बादशाह ने पूछा; "बीरबल तुमने चावल, और प्याज क्यों माँगा?"

बीरबल बोले; "आलमपनाह, जिस तरह से आपके राज्य में कृषि की जमीन लगातार कम होती जा रही है, मेरी बुद्धि कहती है कि आनेवाले दिनों में चावल, दाल और गेंहूं ही सबसे कीमती रहेंगे. वैसे भी किसान आत्महत्या करते जा रहे हैं. जमीन की कमी के साथ-साथ किसानों की कमी हो जायेगी तो खेती-बाड़ी का काम क्या आपके नौ रत्न करेंगे? इसीलिए मैं अभी से खाने-पीने की चीजें इकठ्ठा करने में लगा हूँ."

बादशाह जी बीरबल की बुद्धि पर एक बार फ़िर से फ़िदा हो गए. खुश होते हुए बोले; "मैं एक बार फिर तुम्हारी बुद्धि पर फ़िदा हो गया हूँ. बोलो, तुम्हें और क्या चाहिए?"

बादशाह को अधिकार है कि वह जब चाहे, जिस चीज पर चाहे फ़िदा हो सकता है.

उनकी बात सुनकर बीरबल बोले; " आपसे एक वचन चाहिए. जो दरबारी मुझसे जलते हैं, आज से आप उन्हें ईनाम में मिड-कैप कंपनियों के शेयर दिया करेंगे."

बादशाह जी ने बीरबल को वचन दे दिया. ईनाम लिए बीरबल घर की तरफ़ रवाना हो गए.

16 comments:

  1. तारीफ़ को अलफ़ाज़ कहाँ से लाऊं ????

    सटीक सार्थक व्यंग्य...

    आज अखबार में पढ़ा :

    प्रदेश सरकार ने ग्रांड स्केल पर लोक कल्याणकारी योजना के तहत गरीबों को स्वास्थ्य केंद्र से मुफ्त विटामिन की गोलियां बंटवायेगी...

    चूँकि अनाज की अनुपलब्धता है,इसलिए विभिन्न विटामिन खिलाये जायेंगे...

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  2. alampanah.....khas darbari ko pyaz aur hum jaison ko chilka bhi nahi..
    lagta hai jahapanah....ke darwar me
    andher hone lagi hai......

    jaoon koi aur darbar dekhun........


    pranam.

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  3. बीरबल हम से सदा उन्नीस ही रहेंगे...हम होते तो बादशाह सलामत से चावल दाल और प्याज़ के साथ में आम का आचार भी मांगते...खाने का मज़ा दुगना हो जाता और दरबारियों में जलन की मात्र तिगुनी...शानदार दमदार व्यंग्यात्मक पोस्ट...हर बार आप बढ़िया लिखते हैं अब बार हम तारीफ़ के नए शब्द कहाँ से लायें..हिंदी व्याकरण जब लिखी गयी तब आपने पोस्ट लिखना शुरू नहीं किया था वर्ना प्रशंशा के तीन चार हजार शब्द और डाल दिए जाते...जितने थे हमने सब आपकी पोस्टों पे खर्च कर डाले...जर्मन शब्द "ज़ेर गुट" (बहुत बढ़िया) का प्रयोग हम इसी मारे कर रहे हैं...ज़ेर गुट...
    नीरज

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  4. शानदार पोस्ट है। वैसे, बीरबल को बादशाह कार की बजाय साइकिल देते तो बीरबल का और काम बन गया होता, उसी पर दाल चावल और प्याज लाद ओद कर घेरराते हुए पहुंच जाते।

    उधर बीरबलाइन दाल चावल और प्याज के साथ साइकिल देखती तो और खुश हो जाती। संभवत: डबलसीट में नगर घूमने की इच्छा भी व्यक्त करती और बीरबल अपनी साइकिल पर बीरबलाइन को बैठा कर बाजार में घुमा भी देते :)

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  5. `'बादशाह दरबार में हंसने का उपक्रम ख़ुद ही करते हैं.'

    हां जी, उन्होंने सिद्धू से हंसने की ट्रेनिंग जो ली थी:)

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  6. इधर बीरबल को चावल, दाल, प्याज का जुगाड़ हो ही गया है, और मसाला हल्दी जुड़ जाए तो बीरबलों की खिचड़ी पक ही जएगी।

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  7. मिड-कैप कंपनियों के शेयर :)
    वाह रे बीरबल मान गए.

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  8. yah lajwaab kaha aapne :) "उनकी बात सुनकर बीरबल बोले; " आपसे एक वचन चाहिए. जो दरबारी मुझसे जलते हैं, आज से आप उन्हें ईनाम में मिड-कैप कंपनियों के शेयर दिया करेंगे."

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  9. महाराज की जय हो...

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  10. बादशाह अकबर बादशाह है कोई ज्योतिषी नहीं कि उन्हें अपनी मुद्राओ की घटती कीमत का पता चले

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  11. मरवा दिया जलने वालों को....शायद ही कभी उठ पायें बेचारे !
    शुभकामनायें !

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  12. सबसे बढ़िया चीज का तो स्टाक कर ही लिया, अब जब दाम बढ़ जायेंगे फिर मार्केट में उतारेंगे..

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  13. एल्लो… हम तो सोचे थे कि बीरबल एक चतुर दरबारी हैं… लेकिन ये तो आम आदमी निकले…

    जब बादशाह इतने ही खुश थे, तो एक ठो "स्पेक्ट्रम" माँग लिये होते, खास दरबारियों को रेवड़ियों की तरह मिले हैं…। एक स्पेक्ट्रम हाथ लग जाता, तो प्याज की तरफ़ देखते तक नहीं, बल्कि प्याज़ खरीदने वाले को भी हिकारत से देखते…

    खैर अगली बार सही… ध्यान रहे… जब भी अकबर बहुत खुश हों… हर बार एक स्पेक्ट्रम ले ही लिया जाये… :) :)

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  14. जलने वाले दरबारियों की तो मौत है ।

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टिप्पणी के लिये अग्रिम धन्यवाद। --- शिवकुमार मिश्र-ज्ञानदत्त पाण्डेय