न्यूयार्क से प्रकाशित होनेवाली टाइम पत्रिका ने हमारे प्रधानमंत्री को अंडर-अचीवर करार दे दिया. वैसे अगर शायरों और गीतकारों की मानें तो करार देना कोई बुरी बात नहीं. याद कीजिये पुरानी फिल्मों में जब नायिका तमाम बहाने बनाकर नायक से मिलने आती थी और उसे लता मंगेशकर जी की आवाज़ में बताती कि; "मैं तुमसे मिलने आई मंदिर जाने के बहाने.." तो नायक के दिल को करार मिल जाता था और वह भी फट से रफ़ी साहब या किशोर कुमार जी की आवाज़ में नायिका को बता देता था कि; "तुम मुझसे जो मिलने आई सनम, मेरे दिल को करार आया..."
लगता है विषयांतर हो गया. पोस्ट २०१० के ब्लॉगर की यही त्रासदी है. वह कहीं से भी चलता है, बालीवुड पहुँच जाता है. ठीक वैसे ही जैसे पुरानी फिल्मों में कोई भी भारत के किसी भी कोने से भागता तो मुंबई जाने वाली गाड़ी में ही बैठता था और अगले शॉट में वह वीटी स्टेशन से बाहर निकलते हुए बरामद होता था.
आप इसे बालीवुडिश हैंग-ओवर कह सकते हैं.
खैर, मैं बता रहा था कि टाइम पत्रिका ने हमारे प्रधानमंत्री को अंडर-अचीवर करार दे दिया. लेकिन यह वाला करार शायद वह वाले करार जितना मज़ेदार नहीं था. लिहाजा इसपर तमाम लोग़ बेक़रार हो गए. टीवी न्यूज चैनल समेट पूरे भारतवर्ष को बहस का एक नया मुद्दा मिला. कुछ विद्वानों ने याद दिलाया कि हम अभी भी विदेशी मानसिकता के शिकार हैं और जब कोई विदेशी कुछ कहता है तभी उसे सच मानते हैं. इन विद्वानों ने यह भी बताया कि; "टाइम पत्रिका ने तो प्रधानमंत्री को आज अंडर-अचीवर बताया है, हम तो उन्हें पहले ही अंडर-अचीवर करार दे चुके हैं."
काफी टीवी पैनल डिस्कशन हो चुके हैं. कुछ पाइप-लाइन में भी होंगे. तमाम विद्वान इस मुद्दे पर टीवी स्टूडियो में बोलने के लिए नई टाई खरीद रहे होंगे. कुछ अपनी विट को धो-मांज रहे होंगे. तैयारी जोरों पर होगी. सरकार के कुछ योद्धा यह भी देख रहे होंगे कि टाइम पत्रिका का भारत में क्या-क्या है और उसे कौन-कौन से डिपार्टमेंट से नोटिस भेजी जा सकती है? कुछ अति उत्साही योद्धा यह भी सोच सोच सकते हैं - क्या पत्रिका का पिछले ५-६ साल का इनकमटैक्स असेसमेंट री-ओपन किया जा सकता है? मनीष तिवारी जी जैसे प्रवक्ता सरकार और प्रधानमंत्री के बचाव के लिए पुरानी टाइम पत्रिका की कॉपी खोज रहे होंगे जिसमें पत्रिका ने अटल बिहारी बाजपेयी या अडवाणी की बुराई की होगी.
ऐसे में यह जानने के लिए कि और तमाम विद्वानों का इस मुद्दे पर क्या मत है, चंदू चौरसिया ने दिल्ली और कई शहरों में जाकर लोगों की राय इकठ्ठा की. पेश है उनमें से कुछ वक्तव्य;
लालू प्रसाद जी; "इसमें का राय जानना चाहता है तुम? ...आ सुनो पहिले.. बीच में मत बोलो. आ ई जो प्रधानमंत्री को ई लोग़ बताया है...का बताया है? अंडर? का? टेकर? अंडरटेकर?..अंडरअचीभर? अच्छा...अरे वोही अंडरअचीभर. देखो ई कुछ खराब नहीं है. एकदम्मे कुछ नहीं अचीभ करने से बढ़िया है अंडरअचीभ करना. आ देखो सरकार चलाने का मतलब ई नहीं होता कि कुछ अचीभ करना ही है. देखो प्रधानमंत्री हैं बिदबान... बूझो की डिग्री है उनके पास, उनका ईज़त पूरा दुनियाँ में है...सो जब जो चाहेंगे ऊ अचीभ कर लेंगे..जल्दी कौन बात का है? ... आ सबसे बड़ा बात है कि सेकुलर हैं..प्रधानमंत्री जे हैं से सेकुलर आदमी हैं. आ देश को सेकुलर आदमी का ज़रुरत पहिले है अचीभर का बाद में. सेकुलर लोग़ सत्ता में नहीं रहेगा तो फ्रिकाप्रस्त लोग़ राज करने लगेगा... आ फिर सोनिया जी भी हैं साथ में... जो चीज परधानमंत्री नहीं अचीभ कर पाए ऊ सोनिया जी अचीभ कर लेंगी... बैलेंस हो जाएगा न. केतना टाइम लगता है कुछ अचीभ करने में? आ हामी को देखो, रेलमंत्री थे तब केतना कुछ अचीभ कर लिए थे.. त हमारा कहना एही है ई पत्रिका फत्रिका का कहता है उसपर मत जाओ...ई सब सच नहीं बोलता...देखो न, हम रेलमंत्री होकर एतना कुछ अचीभ किये, हमरा लिए त नहीं लिखा कि हम ओभर-अचीभर हैं. ज़रूरी बात है कि सेकुलर हाथ में देश का बागडोर है."
मनीष तिवारी; "मेरा यह कहना है कि विदेशी पत्रिकाओं की बात को हमें तभी सच मानना चाहिए जब वे हमारी सरकार की प्रशंसा करें. हमारा यह मानना है कि जब ये पत्रिकाएँ आलोचना करती हैं तब ये झूठ बोल रही होती हैं. यह हमारी पार्टी का ऑफीशियल स्टैंड है जिसे भारत के हर नागरिक का समर्थन है. हमारी पार्टी अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गाँधी जी के नेतृत्व में सरकार ने बहुत कुछ अचीव किया है जिसे टाइम पत्रिका ने तवज्जो ही नहीं दी. उन्ही के नेतृत्व में ही मनरेगा जैसा प्लान चलाकर सरकार ने कितना अचीव किया है सबके सामने है. एक प्लान चलाकर हमने देश को गड्ढों से भर दिया, वह तो टाइम को दिखाई नहीं देता. और फिर अंडर-अचीवर की बात पर मैं टाइम के एडिटर से पूछता हूँ कि रिचर्ड बाबुराव स्टेंजेल, तुम्हें क्या हक है कि तुम दूसरों को अंडर-अचीवर कहो? तुम खुद सर से पाँव तक अंडर-अचीवमेंट में डूबे हुए हो. मैं केवल इतना जानना चाहता हूँ कि भारत जैसे बड़े देश में टाइम की कितनी कॉपी बेंचते हो तुम? टाइम को कितने भारतीय जानते हैं? ऐसे में अंडर-अचीवर कौन हुआ, तुम कि डॉक्टर मनमोहन सिंह?...क्या कहा? एडिटर के नाम में बाबुराव नहीं है? अच्छा मैं गूगल करके पता करता हूँ कि एडिटर के फादर का क्या नाम है?"
प्रधानमंत्री; "मैं ग़ालिब को कोट करना चाहूँगा और टाइम मैगेजीन से यही कहूँगा कि; माना कि तेरी दीद के काबिल नहीं हैं हम, तू मेरा शौक तो देख, मेरा इंतज़ार तो देख."
अन्ना जी; "देखो लोकशाही है..लोकशाही में कोई किसी को कुछ भी कह सकता है. पंथ-प्रधान को भी कुछ भी कह सकता है. आज अगर सरकार जनलोकपाल बिल पारित कर देती तो जनलोकपाल इस मामले की जांच कर के बता सकता था कि पंथ-प्रधान अंडर-अचीवर है या नहीं? और एक बार ये बात गलत साबित हो जाती तो फिर हम टाइम पत्रिका की आफिस के सामने अनशन कर देते. पत्रिका से पूछते कि उसने हमारे पंथ-प्रधान को ऐसा कैसे कहा?"
हिंदी रक्षक प्रोफ़ेसर मनराज किशोर; "पहले तो मुझे इस बात का जवाब चाहिए कि टाइम नामक पत्रिका का कोई हिंदी संस्करण भी है क्या? अगर नहीं है तो क्या अधिकार है इस पत्रिका को उस देश के प्रधानमंत्री को अंडर-अचीवर बताये जिसमें अस्सी करोड़ से ज्यादा लोग़ हिंदी बोलते हैं? क्या टाइम के सम्पादक यह बता सकते हैं कि अंडर-अचीवर शब्द के लिए हिंदी का कौन सा शब्द है? क्या उन्हें पता है? अगर नहीं तो उन्हें यह अधिकार नहीं है कि वे ऐसा कहें. जो पत्रिका का हिंदी संस्करण तक नहीं निकलता उस पत्रिका ने क्या कहा यह बात हमारे लिए जरा भी महत्वपूर्ण नहीं है."
दिग्विजय सिंह जी; "अभी मैं कुछ नहीं कहना चाहूँगा. फिलहाल मैं यह पता करने की कोशिश कर रहा हूँ कि टाइम मैगेजीन और आर एस एस के बीच क्या सम्बन्ध हैं? कल मुझे अजीज बरनी ने बताया है कि प्रधानमंत्री को अंडर-अचीवर बताने में आर एस एस का हाथ है. एकबार मैं यह कन्फर्म कर लूँ फिर मैंने प्रेस कान्फरेन्स करके बताऊंगा कि असल मामला क्या है?"
अरनब गोस्वामी; "वेट फॉर अ डे ऐज आई ऍम ट्राइंग तो गेट लीजा कर्टिस अलांग विद कुमार केतकर, विनोद शर्मा, लॉर्ड मेघनाद देसाई एंड सुहेल सेट ऑन न्यूज-आवर. ओनली दे विल बी एबुल टू टेल हाउ करेक्ट इज टाइम्स असेसमेंट ऑफ आर प्राइममिनिस्टर. आई अस्योर यू एंड आल आर व्यूवर्स दैट आई विल पुट सम डायरेक्ट एंड टफ क्वेश्चंस टू दिस वेरी एमिनेंट पैनल."
येदुरप्पा जी; "आई डिक्लाइन टू कमेन्ट ऐज माई एस्ट्रोलॉजर हैज एडवाइज्ड मी टू नॉट स्पीक ऑन द इश्यू टिल ट्वेल्व थर्टी पीएम ऑफ फोरटेंथ जुलाई."
प्रनब मुख़र्जी जी; "ओलदो, आई हैभ स्टाप कोमेंटिंग ऑन पोलिटिकल मैटार्स बाट सीन्स इयु आर सेयिंग दैट ईट इज ए मैटोर रिलेटेड टू ओभरआल आचीभमेंट ईंक्लुडिंग इकोनोमी, आल आई हैभ टू से ईज, इभेन ऐन अचीभमेंट आफ एट पारसेंट आफ दा टोटल मैटोर ईज नाट बैड. सो, उइ शूड नाट फारगेट दैट दीस सो कोल्ड अंडरअचीभमेंट ईज ओल्सो ड्यू टू दा फैल्योर आफ दा यूरोपीयन इकोनोमी ओल्सो."
श्री कपिल सिबल; "ये तो देखिये इस पर एक बैलेंस व्यू लेने की ज़रुरत है. एक सरकार का लीडर क्या अचीव करता है उसको उसके बाकी मंत्रियों के अचीवमेंट के साथ देखना होगा. अगर आप यह कहते हैं कि प्रधानमंत्री जी अंडरअचीवर हैं तो वहीँ पर मेरे जैसे मंत्री भी हैं जो ओवर-अचीवर हैं. ऐसे में टाइम मैगेजीन को यह भी देखने की ज़रुरत है कि कुल मिलाकर मामला बैलेंस हो जाता है. और फिर टाइम के इस कमेन्ट को सीरियसली लेने की ज़रुरत नहीं है. जब हमारे पास अचीवमेंट और ओवर-अचीवमेंट हैं, तो फिर हम अंडर-अचीवमेंट की बात क्यों करें? वैसे भी टाइम के इस असेसमेंट का इम्पैक्ट इलेक्शंस में जीरो रहने वाला है और जिस बात का इम्पैक्ट इलेक्शन में जीरो है उसको सीरियसली वैसे भी नहीं लेना चाहिए."
श्री चन्दन सिंह हाटी, मैनेजर हिमालय रुद्राक्ष प्रतिष्ठान; "क्या आप अंडर-अचीवर कहे जाने से परेशान रहते हैं? क्या आप अंडर-अचीवर कहे जाने से दुखी रहते हैं? क्या आप ओवर-अचीव करते हैं और फिर भी लोग़ आपको अंडर-अचीवर कहते हैं? क्या इसकी वजह से आपका दिन का चैन और रात की नींद गायब हो जाती है? तो फिर खुश हो जाइए क्योंकि हिमालय रुद्राक्ष प्रतिष्ठान पहली बार लेकर आया है ओवर-अचीवर यन्त्र. जी हाँ, यह ओवर-अचीवर यन्त्र वैदिक मन्त्रों के जाप और उनकी शक्ति से परिपूर्ण है. आपको ओवर-अचीवर कहलाने के लिए अब मेहनत करने की जरूरत नहीं है. आपको बस यह यन्त्र हमारे द्वारा बताये गए विधि के अनुसार अपने कार्यालय में पूजा के बाद लगा लेना है. फिर देखिएगा कि दुनियाँ कैसे आपको न सिर्फ ओवर-अचीवर मानने लगेगी बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर की पत्र-पत्रिकाएँ आपकी तस्वीर कवर-पेज पर छापकर नीचे बड़े-बड़े अक्षरों में लिखकर आपको ओवर-अचीवर बतायेंगी. जी हाँ, भारतवर्ष में पहली बार....."
अभी तो इतने ही महान लोगों के वक्तव्य से काम चलिए. पब्लिक डिमांड पर और लोगों के वकतव्य छाप दिए जायेंगे:-)
Wednesday, July 11, 2012
अंडर-अचीवर प्रधानमंत्री और ओवर-अचीवर यन्त्र.
Wednesday, June 20, 2012
राष्ट्रपति चुनाव बमचक - एक ट्विटर टाइम-लाइन.
शायद कुछ ऐसी:
Tuesday, June 5, 2012
बाबाओं को चरणस्पर्श
नेता जी ने बाबाजी के पाँव छू लिए. बाबाजी ने भी छुआ लिए. छु-छुआ कर दोनों धन्य हुए. त्रेता टाइप युग की घटना होती तो देवता लोग़ ऊपर से पुष्पवर्षा वगैरह भी कर देते लेकिन यह तो ठहरा कलियुग. ऐसा युग जिसमें जमाना हमेशा से खराब ही रहा है. लिहाजा पुष्पवर्षा का चांस नहीं बना. बाबा और नेता, दोनों को केवल धन्य होकर संतोष करना पड़ा. अब इस जुग में देवता कहाँ से आयेंगे? हमें भी यही सोचकर संतोष करना चाहिए कि हमारे नेता और हमारे बाबा लोग़ ही इस युग के देवता हैं. ऐसे में होना यह चाहिए था कि बाबा जी के कुछ लोग़ और नेता जी के कुछ लोग़ लोग़ पुष्प वगैरह बाज़ार से खरीद कर रखते और जैसी ही छुआ-छूत कार्यक्रम हुआ वैसे ही ये लोग़ एक-दूसरे के ऊपर पुष्पवर्षा कर डालते. हमारी संस्कृति की रक्षा भी होती और दोनों देवता पुष्प से नहा भी लेते.
नेताजी जी ने तो वैसे भी पाँव छूने के बाद घोषणा कर दी थी कि वे भारतीय संस्कृति की रक्षा का जिम्मेदारी पूर्ण कार्य कर रहे थे.
भारतीय संस्कृति की रक्षा के तमाम महत्वपूर्ण कर्मों में बाबाओं के पाँव छू लेना सबसे महत्वपूर्ण कर्म है जिसकी जिम्मेदारी बाबा और उनके भक्तों ने अपने कन्धों पर लाद रखी है. मैंने ऐसी अफवाह भी सुनी है कि अगर किसी बाबा का पाँव दो घंटे से ज्यादा समय तक न छुआ जाय तो वह हलकान च परेशान होने लगता है. कुछ लोग़ तो यहाँ तक बताते हैं कि कि ऐसे बिकट समय में बाबा लोग़ अपने चेलो-चपाटों को इशारा कर देते हैं और वे उनके पाँव छू लेते हैं ताकि बाबाजी का ब्लड प्रेशर कंट्रोल में रहे. उधर चेलों ने पाँव छुआ और इधर बाबा की हलकानियत गई.
वैसे देखा जाय तो इस मामले में योगगुरु टाइप बाबा लोग़ बहुत लकी हैं. उन्हें कभी इसकी वजह से परेशानी नहीं उठानी पड़ती. वे योगशिविर में सुबह-शाम अपने पाँव खुद ही छूते रहते हैं.
बाबाओं के लिए पाँव छुआ लेना अपने आप में बड़ा एक्सपर्टात्मक कार्य है. ठीक वैसे ही जैसे पाँव छू लेना. इस कार्य में छूने और छुआने वाले, दोनों को हमेशा अलर्ट रहना पड़ता है. ठीक वैसे ही जैसे सीमा पर खड़ा सिपाही हमेशा अलर्ट रहता है. यह सोचते हुए कि उधर से कोई घुसने की कोशिश किया नहीं कि इधर से गोली दागनी है. कुल मिलाकर अब न चूक चौहान टाइप परिस्थिति हमेशा बनी रहती है. ऐसे में अगर पाँव छूने-छुआने की प्रैक्टिस होती न रहे तो मामला गड़बड़ा सकता है. जैसे अगर छूने वाले के मन में अचानक पाँव छूने की इच्छा जाग उठे तो छुआने वाले को चाहिए कि वह तुरंत अपना पाँव आगे कर दे. अगर वह इस क्षण में चूक जाता है तब कुछ भी हो सकता है. हो सकता है कि छूने वाले को लगे कि; "जब यही अपना पाँव छुआने में इंट्ररेस्ट ही नहीं दिखा रहा तो मुझे क्या ज़रुरत है आगे बढ़कर जबरदस्ती पाँव छूने की?" छूने वाले के मन में यह विचार भी आ सकता है कि; "हटाओ जाने दो. जो यह नहीं जानता कि पाँव कैसे छुवाया जाता है उसका पाँव छूकर भी क्या फायदा? दरअसल इसका पाँव छूने लायक ही नहीं है."
संस्कृति रक्षा के इस कर्म में बाबाजी लोग़ बड़े एक्सपर्ट होते हैं. कुछ बाबा तो बैठे-बैठे अपना पाँव फैलाकर आगे किये रहते हैं. एवर-अलर्ट टाइप. ऐसे बाबाओं को पाँव न छुए जाने का कष्ट कभी नहीं सताता. कोई न कोई उनका पाँव छूता ही रहता है. उन्होंने पाँव आगे कर दिया तो कर दिया. आनेवाले को झक मार के पाँव छूना ही पड़ेगा. अगर उसने ऐसा नहीं किया तो फिर बाबाजी से आगे की बात ही नहीं हो सकती. ऐसे बाबा से वार्तालाप भी पाँव छूने से ही शुरू होता है. कह सकते हैं कि छूने वाले के हाथ को ही वार्तालाप शुरू करना है और बाबा जी के पाँव को उस शुरुआत के लिए इशारा करना रहता है. पाँव का छुआ जाना या न छुआ जाना ही यह तय करता है कि वार्तालाप किस तरह का होगा? भक्त ने अगर पाँव छू लिए तो गारंटी है कि बाबा जी उसके बेटे चुन्नू और बेटी गुड़िया का कुशल-क्षेम और उनकी पढ़ाई के बारे में भी पूछेंगे लेकिन अगर पाँव छूने के मामले में भक्त चूक गया तो फिर कोई गारंटी नहीं कि बाबाजी उसके कुशल-क्षेम के बारे में भी पूछें.
लगातार विचरण करने वाले बाबा जी को अलग तरह से अलर्ट रहना पड़ता है. चलते समय वे अपना दाहिना पाँव आगे फेंकते हुए चलते हैं ताकि भक्त को उनका पाँव छूने में न तो कोई कष्ट हो और न ही असमंजस. बाबा जी का पाँव आगे है मतलब भक्त को छूने का सिग्नल मिल रहा है. ऐसा करने से भक्त को सुभीता रहता है. उसका सेवेंटी परसेंट असमंजस अपने आप चला जाता है. वह पहला मौका मिलते ही बाबा का पाँव छू लेता है. बाबा भी अपना हाथ भक्त के सिर पर रखकर उसके पाँव छूने का फल उसे तुरंत दे देते हैं. भक्त अगर पैसेवाला रहा तो उसे उठकर अपने हृदय से भी लगा सकते हैं. बाबा जी का यह कर्म निश्चित करता है कि दोनों के हृदय मिल जायें और एक बड़े हृदय की सृष्टि करें ताकि वह अपने अन्दर बहुत कुछ समो ले.
पाँव छूने के एवज में मिलनेवाले आशीर्वाद भी अलग-अलग तरह के होते हैं. जैसे बाबागीरी के धंधे में आया नया-नया बाबा हर भक्त के ऊपर हाथ रख देता है. वहीँ सीजंड बाबा उस पोज में केवल हाथ ऊपर कर देता है जिस पोज में हमारे देवतागण आशीर्वाद देते थे. बाबाजी अगर डबल-सीजंड हुए तो वह अपना हाथ भी नहीं उठाते. वे केवल मुस्कान में अपना आशीर्वाद मिक्स करके भक्त के लिए ठेल देते हैं और भक्त उसे रिसीव कर लेता है. ऐसे बाबाओं के भक्तों का रिसीवर हमेशा ऑन रहता है, यह सोचते हुए कि क्या पता बाबा कब मुस्कुरा दें? कुछ बाबा तो हमेशा मुस्कुराते रहते हैं. उन्हें देखकर लगता है कि चुटकुलों की रेडिओ तरंगें उनके कानों से हमेशा टकराती रहती हैं और उसके प्रभाव से बाबा मुस्कुराते रहते हैं. वैसे मैंने एक बाबा के बारे में यह सुना है कि वे आशीर्वाद स्वरुप भक्त के सिर पर अपना पाँव दे मारते थे. फिर भक्त चाहे प्रधानमंत्री ही क्यों न हो. एक और बाबा अपना आशीर्वाद देने के लिए अंडे की उल्टी करते थे. कड़ी मेहनत करके उल्टी करते और फिर जीवविज्ञान के तमाम सिद्धांतों को धता बताते हुए मुँह से अंडा निकालते और भक्त को दे देते थे. भक्त और बाबा दोनों धन्य हो लेते.
यह अलग बात है कि बाबा द्वारा इतना कठिन कार्य करने के बावजूद देवताओं ने कभी आकाश से पुष्पवर्षा नहीं की.
यह तो हुई बाबाओं की बात. लेकिन क्या हमारी संस्कृति में पाँव छूने का कार्यक्रम बाबाओं और भक्तों तक ही सीमित है? बिलकुल नहीं. गुरुओं और बड़े-बुजुर्गों के पाँव छूने की भी संस्कृति है हमारे यहाँ. यह अलग बात है कि पाँव छूते-छुआते हुए ज्यादातर बाबाओं और भक्तों को ही देखा जाता है. कई गुरु तो शिष्य द्वारा पाँव न छुए जाने पर समाजशास्त्र के पर्चे में शिष्य के नंबर तक काट लेते हैं. युवराज दुर्योधन ने खुद अपनी डायरी के एक पेज में इस बात का जिक्र किया था कि कैसे क्रीड़ास्थल पर पाँव न छुए जाने पर एकबार गुरु द्रोण उनसे नाराज़ हो गए थे.
बहुत कम गुरु ऐसे होते हैं जो सार्वजनिक स्थल पर शिष्य द्वारा पाँव छू लिए जाने पर नाराज़ हो जाते हैं. ऐसे में वे अपने शिष्यों को क्लास-रूम में हिदायत देकर रखते हैं कि; "बाहर मिलने पर मेरे पाँव कभी मत छूना." शायद गुरु को मालूम रहता है कि अगर शिष्य ने कहीं सड़क पर आते-जाते पाँव छू लिए तो दुनियाँ को पता चल जाएगा कि वे गुरु हैं. ऐसे में इस बात का चांस बनता है कि दुनियाँ वाले अगले साल अपने बेटे-बेटियों, पोते-पोतियों के एडमिशन के समय गुरु जी को स्कूल-कालेज में मिलकर परेशान करें. यह कहते हुए कि; "बॉबी का नंबर कम आया है इसलिए एडमिशन नहीं हो रहा. आप अगर कह देते तो एडमिशन कमिटी उसका केस कंसीडर कर लेती."
बुजुर्गों के पाँव छूने को लेकर भी तमाम बातें हैं. कई बुजुर्ग भी इस बात से परेशान रहते हैं कि फलाने की शादी में फलाने के बेटे ने उनका पाँव नहीं छुआ. कई बुजुर्ग तो बेटे के माँ-बाप से शिकायत तक कर देते हैं. यह कहते हुए कि; "देखो कैसा बिगड़ गया है. मुझे देखा और पहचान भी लिया लेकिन पाँव नहीं छुआ उसने." उधर बच्चे की हालत ख़राब है और उसे माँ-बाप के सामने झूठ बोलना पड़ता है, यह कहते हुए कि; 'मैंने नानाजी का पाँव छुआ था. इनको ही याद नहीं."
वैसे पाँव छूने की रश्म धीरे-धीरे बदलती रही है. पहले बच्चे अपने बुजुर्गों के दोनों पाँव छूते थे. कालांतर में जैसे-जैसे जमाना थोड़ा ख़राब हुआ, एक पाँव छूने लगे. जमाना थोड़ा और ख़राब हुआ तो बुजुर्ग के सामने केवल झुकने लगे. आज हालत यह है कि दाहिना हाथ आगे करके बुजुर्ग के घुटने तक ले जाते हैं और वही हाथ खींचकर छाती से लगा लेते हैं. एक नौजवान ने पाँव छूने की इस 'इश्टाइल' कि व्याख्या करते हुए मुझे बताया कि; "भइया, इस तरह से पाँव छूने का मतलब और ही होता है."
मैंने पूछा; "वह और ही मतलब क्या है?"
वह बोला; "नौजवान अपना हाथ बुजुर्ग के घुटने तक ले जाता है फिर उसे खींचकर अपने छाती से लगा लेता है जिसे देखकर यह लगता है जैसे वह बताना चाहता हो कि आपका घुटना टूटे तो मेरे दिल को ठंडक पहुंचे."
एक और केस होता है...खैर, जाने दीजिये.

