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Tuesday, August 12, 2008

अभिनव बिंद्रा से दुखी (?) लोग


@mishrashiv I'm reading: अभिनव बिंद्रा से दुखी (?) लोगTweet this (ट्वीट करें)!

ब्लॉगर जिन कारणों से दुखी हो सकता है, उन कारणों की कम्प्रेहेंसिव सूची अभी तक नहीं बनी है. या फिर बनी भी है तो अभी तक जारी नहीं की गई. पोस्ट पर कमेन्ट न मिलना आपार दुःख का एक कारण हो सकता है. पोस्ट में लिखी बातों के ख़िलाफ़ कमेन्ट मिलना दुःख का दूसरा कारण हो सकता है. ऐसी ही और भी बातें हैं जो एक ब्लॉगर को दुखी कर सकती हैं. लेकिन कोई ब्लॉगर किसी खिलाड़ी को ओलिम्पिक में मिले गोल्ड मेडल से दुखी हो जाए, इस बात की कल्पना भी नहीं की जा सकती. हुआ ऐसा कि कल दोपहर के करीब बारह बजे बालकिशन ने मुझे फ़ोन किया. मैंने फ़ोन पर हैलो कहा तो उधर से आवाज़ आई; "मैंने एक बहुत ज़रूरी बात जानने के लिए तुम्हें फ़ोन किया है."

मैंने कहा; "हाँ-हाँ बोलो. कौन सी बात के बारे में जानना चाहते हो?" मुझे लगा इनकम टैक्स से सम्बंधित कोई समस्या होगी. या फिर किसी शेयर के बारे में जानकारी चाहते होंगे. लेकिन मेरा अनुमान पूरी तरह से ग़लत निकला.

उन्होंने मुझसे पूछा; "अच्छा, क्या ये सच है कि भारत को ओलिम्पिक में एक गोल्ड मेडल मिला है."

मैंने कहा; "हाँ भाई ये सच है. अभिनव बिंद्रा को शूटिंग में गोल्ड मेडल मिला है. हमसब के लिए सचमुच आज खुशी का दिन है."

मेरी बात सुनकर चुप हो लिए. उधर से आवाज़ नहीं सुनाई दी तो मैंने कहा; "हैलो, क्या हुआ? कुछ बोल क्यों नहीं रहे हो?"

उनकी चुप्पी के बारे में सोचकर एक बार तो मन में ये बात भी आई कि शायद बन्दे ने किसी के साथ शर्त लगा ली हो. मैंने जब उनकी चुप्पी के बारे में दुबारा याद दिलाया तो बड़ी ठंडी साँस लेते हुए बोले; "सत्यानाश हो गया. मेडल मिल गया, वो भी गोल्ड मेडल."

उनकी बात सुनकर मुझे बड़ा अजीब लगा. मैंने सोचा एक तरफ़ पूरा देश खुशी मना रहा है. कितने ब्लॉगर बन्धुवों ने पोस्ट लिखकर अभिनव और देशवासियों को बधाई दी और ये कह रहे है कि सत्यानाश हो गया. ऐसा भी क्या हो गया? मैंने पूछा; "क्या कह रहे हो ये? किसी से कोई शर्त लगा लिए थे क्या?"

मेरी बात सुनकर बोले; "पूछो मत यार. पिछले दो दिनों से ओलिम्पिक में भारत की हार देखकर मुझे लगा था कि एक ब्लॉग पोस्ट लिखूंगा. हरिशंकर परसाई जी की पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धांजलि देने के बाद सोचा था कि लगे हाथों शरद जोशी जी को भी श्रद्धांजलि दे डालूँगा. मैंने उनका लेख 'ओलिम्पिक' कल ही टाइप करके रख लिया था. सोचा था परसाई जी वाला लेख ब्लॉगवाणी से हटेगा तो तुंरत शरद जोशी जी वाला लेख पब्लिश कर डालूँगा. आज सुबह ही नेट पर जोशी जी की तस्वीर खोजकर ब्लॉग पोस्ट पर चढ़ा ली थी लेकिन इस अभिनव बिंद्रा ने सब किए कराये पर पानी फेर दिया."

उनकी बात सुनकर मुझे उनसे सचमुच बड़ी सहानुभूति हुई. एक बार तो मन में आया कि कह दूँ कि भइया उस पोस्ट को डैशबोर्ड पर ऐसे ही पड़े रहने दो, हो सकता है चार साल बाद काम आए. फिर भी मैंने उनसे कहा; "कोई बात नहीं है. अब दुबारा एक पोस्ट डाल दो, अभिनव बिंद्रा को शाबासी देते हुए. साथ में देशवासियों को मुबारकबाद भी दे डालो."

मेरी बात सुनकर भी उनका दुःख कम नहीं हुआ. बोले; "टाइप तो करना पड़ेगा न. कितनी मेहनत करनी पड़ेगी तुम्हें तो पता ही है."

एक बार तो सोचा कि उनसे कह दूँ कि कम से कम बीस पोस्ट आई हैं, अभिनव के गोल्ड मेडल जीतने के बारे में. किसी एक को कॉपी करके अपने ब्लॉग पर डाल दो लेकिन मैंने सोचा ऐसा करने पर उनके ऊपर चोरी का आरोप न लग जाए और फिर किसी ब्लॉगर को शाम तक एक और पोस्ट लिखनी पड़े; "मिलिए एक और ब्लॉग चोर से."

अच्छा, ऐसा नहीं है कि अभिनव के गोल्ड मेडल से केवल बालकिशन ही दुखी हैं. एक और महाशय मिल गए. मैं अपने निंदक जी की बात कर रहा हूँ. कल रतीराम की पान दुकान पर मिल गए. मैंने पूछा; "कैसे हैं?"

बोले; "का कहें, बड़ी दुखी हैं."

मैंने कहा; "क्या हुआ? आज किसी की निंदा करने का मौका हाथ से निकल गया क्या?"

बोले; "हाँ, अईसा ही समझ लीजिये. असलियत में एगो प्रोगराम बनाए थे कि एक प्रदर्शन का आयोजन करेंगे लेकिन सब गडबडा गया."

मैंने पूछा; "किसके ख़िलाफ़ प्रदर्शन करने वाले थे जो मामला गड़बड़ हो गया?"

निंदक जी मुझे देखा और मेरे पास आकर बोले; "अब आपको का बताएं. ओलिम्पिक में देश का खिलाड़ी लोग जइसन खेल देखा रहा था, सोचे थे कि सरकार के ख़िलाफ़ प्रदर्शन करेंगे. नारा-वोरा लिख लिए थे. पोस्टर तैयार कर लिए थे. लेकिन ई बिन्दरा तो गोल्ड मेडल जीतकर सब गड़बड़ कर दिया."

मैंने कहा; "लेकिन सरकार के ख़िलाफ़ क्यों प्रदर्शन करना चाहते थे? खिलाडी खेल रहे हैं, इसमें सरकार क्या करेगी?"

मेरी बात सुनकर बोले; "काहे? सरकार का जिम्मेदारी नहीं बनता का? ई देखने का कि पईसा कहाँ खर्चा करे? आप ही बताईये, एक तरफ़ देश का किसान सब मर रहा है दूसरा तरफ़ सरकार एतना पईसा खरचा करके खिलाड़ी लोगों को भेजता है. और एक्कौ मेडल भी नहीं जीत पाता ई लोग."

मैंने पूछा; "हाँ, आपकी बात अपनी जगह ठीक है. वैसे अब क्या करेंगे?"

बोले; "देखिये, हम ठहरे राजनीतिक लोग. आ हम लोगों को रास्ता ढूढने का तकलीफ नहीं है. अब हम ई फैसला किए हैं कि प्रदर्शन तो सरकार के ख़िलाफ़ ही करेंगे. हाँ, अब मुद्दा बदल देंगे."

मुझे उनकी बात सुनकर उत्सुकता हुई. मैंने पूछा; "अब किस मुद्दे पर प्रदर्शन करेंगे?"

बोले; "अब सोचे हैं ई बात पर रैली निकालें कि सरकार खेल पर बहुत कम बजट खरचा करती है. आज अगर ठीक से और बजट खरचा करे तो हमारे देश में बिन्दरा जैसन और भी खिलाड़ी उभर कर आएगा सामने. देश में प्रतिभा का कमी नहीं है."

उनकी बात सुनकर लगा जैसे मनुष्य चाहे तो हर दुःख से निकल सकता है, बस एक अदद आईडिया की ज़रूरत है.

18 comments:

  1. mujhe to lagta hai ki sarkar ko bloggers ko bhi paisa dena chahiye.. is se blogging ko protsahan milega..

    waise is baar jab bal kishan ji ka phone aaye to unhe hamare numbar dijiyega.. kya hai ki unka call aapke pas aate hi aapko naya topic mil jata hai..

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  2. ई रतिरम्वा के पास धेरे आईडिया है का हो.... ससुर जब देखो तब पलटी मार देता है! :)

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  3. हमे तो आप की यह बात बहुत ही अच्छी लगी साहब...बोले; "अब सोचे हैं ई बात पर रैली निकालें कि सरकार खेल पर बहुत कम बजट खरचा करती है. आज अगर ठीक से और बजट खरचा करे तो हमारे देश में बिन्दरा जैसन और भी खिलाड़ी उभर कर आएगा सामने. देश में प्रतिभा का कमी नहीं है."
    ओर होना भी चाहिये ऎसा, धन्यवाद एक सुन्दर लेख के लिये,

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  4. हंस हंस के दुख जाहिर हो रहा है। आज तो कुछ भी नहीं मिला। हाथ फिर खाली।

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  5. भाई साब, पहले आफिस आता था तो उसपर पोस्ट लिख देते थे.
    अब फ़ोन पर जो बात होती है उसपर भी लिख देते हो. लेकिन
    तुम्ही बताओ. इतनी मेहनत करके पोस्ट टाइप की और वो किसी
    काम नहीं आई. दुःख तो होगा ही न.

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  6. ये क्या मामला है ? सुदामा कह रहा था कि बालकिशन जी के दुख पर मै उनका साक्षात्कार ले आऊ . उधर वो बिंद्रा के सुख से दुखि है इधर ये कमबख्त टि ए डी ए का थूक हमे लगाने की प्लान मे हमे दुखि कर रहा है :)

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  7. सबका अपना अपना दुख। इसी बहाने आपने अच्छी खिंचाई की है।

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  8. सच है , दुख तो हर परिस्थिति में पैदा की जा सकती है। अच्छा व्यंग्य।

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  9. बंधू
    अब हम भी आप को बता दूँ की दुखी होने वालों में हमरा नाम भी है...तीन दिन से दुःख के सागर में गोते लगा रहा हूँ....ना डूब रहा हूँ...ना तर रहा हूँ....अरे देखिये ना...ये कल का छोकरा...अपने देश के ११८ साल के गौरवशाली इतिहास को मिटटी में मिला दिए हैं....का मुहं दिखाएँ हम दुनिया को?(हमें तो बिदेश यात्रा के लिए बहुत जाना पढता है ना)... कैसे कहेंगे की हम.....की मैं उस देश का संतान हूँ जिसके लिए स्वर्ण धूल सामान है...हमारे लिए सिर्फ़ संतोष ही एकमात्र धन है...हमेशा हम ओलम्पिक से संतोष धन ही तो लेकर लौटे हैं...और ये...अकेले ही स्वर्ण ले कर लौटेगा...दस ग्यारह मिल कर होकी शोकी में ले आते थे पहले तो भी ठीक था...हे धरती माँ तूने फटना क्यूँ बंद कर दिया रे...हम समां जाता उसमें... "जब दिल ही टूट गया, अब जी के क्या करेंगे???????"
    नीरज

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  10. बहुत बढ़िया.....

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  11. बहुत सुन्दर लिखा है। बधाई स्वीकारें।

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  12. अच्छा व्यंग्य है. बधाई श्रीमान. समसामयिक भी और गुदगुदाता हुआ भी.

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  13. रवी रतलामी जी की व्यथा कल पढ़ी थी मैने। जो कह रहे थे कि अभिनव तूने क्या कर डाला! उसको लानतें भेजने वालों का ज्वार थम नहीं रहा है। क्या अधिकांश ब्लॉगर एक सा सोचने लगे हैं?

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  14. रतिराम से बोलिये कि वो अपनी तैय्यारी जारी रखे-विदर्भ के किसानों की आत्महत्या, गरीबी, भुखमरी जैसे मुद्दों को अभिनव के लिए घोषित की जा रही इनाम राशियों से जोड़ कर रैली निकाले. सफलता मिलेगी.

    बालकिशन जी के लिए जरुर दो बूँद आँसू बहाने को मन कर आया. सारी मेहनत पानी कर दी इस अभिनव ने.

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  15. बहुत दुख हुआ जानकर :)

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  16. hadd hai,ajeeb log hai duniya me, kya blog par post likhna inta jaroori hai ki uske liye bharat ko mili itni badi jeet se dukh hone lage. karare dhang se baat kahi hai aapne,padh ke accha laga

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टिप्पणी के लिये अग्रिम धन्यवाद। --- शिवकुमार मिश्र-ज्ञानदत्त पाण्डेय