सिवाय गीतकार के बाकी सब के लिए फ़िल्मी गीत सुनने के लिए होते हैं. उधर गाना बजा इधर आवाज़ कान तक पहुंची और हमने सुन लिया. मन में आया तो गुनगुना लिया. अन्दर 'बाथरूमी' टैलेंट रहा तो गा लिया. अन्दर के टैलेंट को बाहर निकालने वाले मिल गए तो उनके सहयोग से उसे रियलिटी शो में निकाल बाहर किया. अपने लिए वोट डलवा लिया और जीत गए. लेकिन यह सब करते समय लोग़ फ़िल्मी गीतों के बारे में सवाल नहीं करते.
इतिहास बताता है कि किसी ने गुलशन बावरा से सवाल नहीं किया कि; "भाई साहब, किस देश की धरती सोना, हीरे-मोती नहीं उगलती? क्या केवल हमारे देश की ही धरती ऐसा करती है? आप क्या हमें यह बताना चाहते हैं कि पाकिस्तान में सोना आसमान से बरसता है? वहाँ भी तो धरती से ही निकलता होगा."
किसी ने साहिर साहब को इस बात के लिए नहीं कोसा कि उन्होंने "इस देश का यारों क्या कहना, ये देश है दुनियाँ का गहना" लिखकर भारत की ऐसी-तैसी करवा दी. उसके गाने का अर्थ अपने अंदाज़ में निकालते हुए दुनियाँ ने भारत को गहना समझ कर लूट लिया. इधर हम हम बजाते रहे "....यह देश है दुनियाँ का गहना" और उधर वे लूटते रहे. अब इतिहास बताता है कि हमें लुटने में मज़ा आता है लिहाजा हम लुटते हुए मज़े लेते रहे. कुछ कर नहीं सके.
अभी दो दिन हुए, टीवी पर एक गीत देख रहा था. फिल्म पाकीजा का; 'चलो दिलदार चलो, चाँद के पार चलो...'
बड़ा सुन्दर दृश्य था. रात थी. चांदनी थी. झील थी. नाव थी. नाव पर पाल थी. नायिका थी. और एक अदद नायक था. इतने 'थी' के बीच एक 'था'. जैसे गोपियों के बीच बांके बिहारी.
ऐसा नहीं है कि पहले यह गीत नहीं देखा था. पहले भी देखा था और अच्छा भी लगा था लेकिन पता नहीं इस बार क्यों देखते-देखते एक सवाल मन में आया कि "यार, ये नायक बड़ा अजीब है. नायिका से कह रहा है कि चलो दिलदार चलो चाँद के पार चलो" और जब नायिका कह रही है कि "हम हैं तैयार चलो" तो फिर बात को टाल दे रहा है. नायिका के अग्रीमेंट वाली लाइन गाने के बाद चाँद के पार जाने पर कोई बात ही नहीं कर रहा. कोई प्रोग्राम नहीं बता रहा कि कैसे जाएगा? चाँद के कितने पार तक जाएगा? वहाँ जाकर क्या करेगा? कुल मिलाकर बात को टालने के चक्कर में है.
मैं कहता हूँ कि भैय्ये, जब नायिका को चाँद के पार ले जाने का लालच दे रहे हो तो उसे निभाओ भी. ये क्या बात हुई कि उधर नायिका बार-बार तैयार हो रही है और तुम हो कि उसके बाद उसे भाव नहीं दे रहे हो. मजे की बात यह कि ऐसा आज से चालीस साल पहले हो रहा था. पाकीजा सन इकहत्तर में बनी थी. जिन बुजुर्गों को आज के नौजवानों से शिकायत रहती है वे प्रेम में सीरियस नहीं रहते मैं उनसे कहता हूँ कि; "तब के नौजवानों की करतूत देखें. देखें कि तब के नौजवान प्रेम में कितना सीरियस रहते थे? देखें कि किस तरह से वे नायिका को झांसा देते थे. देखें कि नायिका को कितना मान देते थे."
मैंने सोचा कि इस मुद्दे पर लोगों से बात की जाय. फिर समस्या यह आई कि अपने देश में इतने तरह के लोग़ हैं. न जाने कितने समाज हैं. इन समाजों के न जाने कितने कितने महत्वपूर्ण प्रतिनिधि हैं. किनसे-किनसे बात करूंगा? फिर लॉटरी करके पाँच-छ लोगों का नाम निकलना पड़ा. देख रहे हैं न कि हम इस मुद्दे पर कितना सीरियस हैं? खैर, जिन लोगों की लॉटरी लगी मैंने उनसे इस गीत की बाबत सवाल पूछा. आप पढ़िए कि उन्होंने क्या कहा?
सबसे पहले पूछा श्री राम खेलावन मल्लाह से. जब नायक-नायिका यह गाना बड़े मीठे सुर में नाव पर बैठे गा रहे थे तब खेलावन ज़ी नाव खे रहे थे. पढ़िए कि उन्होंने क्या कहा?
राम खेलावन ज़ी; "देखिये, हीरो का नीयत पर त हमको भी शंका था. सही बताएं त कई बार मन में आया कि इनको टोंके कि भइया जब हीरोइन कह रही है कि ऊ चाँद के पार आपके साथ जाने के लिए तैयार है त आप इस मुद्दे पर अउर बात काहे नहीं कर रहे. आप अपना परपोजल बड़ा राग में गाकर ओनके सुनाये.कि; "चलो दिलदार चलो, चाँद के पार चलो.." आपकी बात सुनकर ऊ आपसे भी बढ़िया राग में गाकर उसका जवाब दिए कि; "हम हैं तैयार चलो". उसके बाद आप चुप. हम कहते हैं एतना राग में अगर ऊ कोई रियलिटी शो में गाती त चैपियन हो जाती. अच्छा, बात खाली एहीं ख़तम नहीं होती है. ऊ आगे गाकर बताई कि; "आओ खो जायें सितारों में कहीं, छोड़ दें आज ये दुनियाँ ये ज़मीं..." इसका मतलब क्या है? इसका मतलब है कि उनको आपके ऊपर एतना भरोसा है कि ऊ पूरा तरह से दुनियाँ अउर ज़मीन छोड़कर जाने के बास्ते तैयार हैं. लेकिन आप हैं कि आगे कुछ करते ही नहीं. अच्छा ई सुनिए, जब उनको लगा कि आप भाव नहीं दे रहे हैं त ऊ बोलीं कि; "हम नशे में हैं संभालो हमें तुम, नीद आती है जगा लो हमें तुम." मतलब कि हमारे उप्पर ध्यान दो तुम.
अउर ई सुनकर आप क्या किये? आप अउर राग में गाने लगे; "चलो दिलदार चलो, चाँद के पार चलो..." हम आपसे पूछते हैं कि जब ऊ कह रही हैं कि उनको नींद आ रही है अउर आपसे खुद को जगाने का डिमांड कर रही हैं त आपका धरम बनता है कि आप उनको नींद से जगाएं अउर चाँद के पार ले जाने का अपना वादा निभाएं. बाकी आप क्या कर रहे हैं? आप अउर तान छेंड दे रहे हैं. आपको ख़याल नहीं है कि बढ़िया राग में गायेंगे तो उनको अउर नींद आएगी? .......अउर एही नहीं, आगे सुनिए. शंका त हमको ई बात पर भी हुई कि आप किसका भरोसे चाँद के पार जाने का बात कर रहे हैं? आपके पास न तो कौनो बिमान है. ना ही कौनो स्पेसशिप है. महराज आप बैठे हैं नाव में अउर चाँद के पार जाने का बात करते हैं? आज तक रेकाड है कि कोई भी आदमी नाव पर सवार होकर चाँद पर नहीं जा सका है. आपको एतना सिम्पुल बात नहीं बुझाया?...खाली एक लाइन पर अटके रहे. बार-बार एक ही बात; "चलो दिलदार चलो..चलो दिलदार चलो..." ऐसा कहीं होता है? जे हीरो अपना हीरोइन का बात पर ध्यान नहीं देगा ऊ लभ स्टोरी को कैसे आगे बढ़ाएगा?.....
उसके बाद मेरी बात हुई नेता गिरधारी लाल फोतेदार ज़ी से. इस गीत पर अपने विचार व्यक्त करने के लिए उतावले थे. छूटते ही बोले; "आये दिन हमारे ऊपर आरोप लगता है कि हम अपना वादा नहीं निभाते. चुनाव के समय जनता से वादा करते हैं लेकिन भूल जाते हैं अउर नहीं निभाते. आज आप खुद ही सोचिये कि यह हमने कहाँ से सीखा है? जनता से वादा न निभाने का जो रोग आज हर राजनैतिक पार्टी में पनपा है वह हम नेताओं ने इस गीत को देखकर सीखा है. सच्चाई यह है कि पाकीजा आने से पहले तक हम नेता लोग़ जनता से किया गया वादा निभाते थे लेकिन जैसा कि आप जानते हैं एक फिल्म का नेताओं पर बहुत असर पड़ता है, इस फिल्म का भी हमारे ऊपर असर पड़ा. इतना गहरा असर कि हमने वादा वगैरह निभाने के बारे में सोचना बंद कर दिया. आप देखिये और मानिए कि केवल राजनीति फिल्मों को प्रभावित नहीं करती, फिल्में भी राजनीति को प्रभावित करती हैं. खुद ही सोचिये कि एक आदमी वन टू वन लेवल पर अपना वादा निभाने के लिए तैयार नहीं है. ऐसे में आप नेताओं से कैसे आशा कर सकते हैं कि वे जनता से किये गए वादे निभाएं? आपको नहीं लगता कि..... "
इसी मुद्दे पर समाजशास्त्री दीपांकर गुप्ता ने बात करते हुए कहा; "देखिये शोध बताता है कि सत्तर के दशक के शुरुआत में गीतों में नायकों ने सामाजिक स्तर पर एक-दूसरे को नीचा दिखाना शुरू कर दिया था. इस गीत को ही लीजिये. नायक अपनी नायिका को चाँद के पार ले जाना चाहता है. आप अगर ध्यान देंगे तो इसके पहले तक फ़िल्मी गीतों में नायक अपनी नायिका से चाँद, तारे, ग्रह, उपग्रह वगैरह को तोड़ लाने की बात करता था. मुझे लगता है कि शायद दूसरे नायकों के आगे यह नायक खुद को हीन भावना से ग्रस्त पाता होगा. यही कारण होगा कि अपने गीत में उसने नायिका से सीधे चाँद के पार जाने का वादा कर लिया. इस गीत को अगर हम सोसियो-इकॉनोमिक-पोलिटिकल ऐंगल से देखें तो पायेंगे कि कभी-कभी आदमी ऐसा कुछ कहता है जो वह कर नहीं सकता. और ऐसा नहीं कि उसे इस बात का भान नहीं है कि वह कर नहीं सकता. उसे यह बात पता है लेकिन समाज से इतना सताया हुआ रहता है कि एक तरह जिद उसके अन्दर घर कर जाती है. आप अगर उस समय की घटनाएं देखें तो पायेंगे कि यह वह समय था जब भारतीय समाज एक विकट परिवर्तन के मुहाने पर खड़ा था. इस गीत का सोशल और ह्यूमन आस्पेक्ट अगर ध्यान से देखें तो हम पायेंगे कि......"
इसी मुद्दे पर अपने मनोहर भइया यानि महान समाजवादी राम मनोहर ज़ी बोले; "शिव, मेरा ऐसा मानना है कि यह गीत अपने आप में एक ऐतिहासिक गीत है. यह गीत एक तरह से हमारे अन्दर आशा का संचार करता है. यह हमें बताता है कि हम काव्य के सहारे किस तरह से साम्राज्यवादी अमेरिका पर चोट कर सकते हैं. यह गीत साम्राज्यवाद के मुँह पर एक तमाचा है. मुझे मालूम है कि तुम सोच रहे हो कि मैं ऐसा क्यों कह रहा हूँ? चलो तुम्हें बता ही देता हूँ. घटनाओं को देखो तो तुम्हें याद पड़ेगा कि सन १९६९ में अमेरिका ने यान भेजकर अपने दो अंतरिक्ष यात्रियों को चाँद पर उतारा था. अब अगर इस गीत में नायक यह कहता कि वो नायिका को चाँद पर ले जाना चाहता है तो नायिका को लगता कि चाँद पर जाना कौन सी बड़ी बात है? अभी दो साल पहले ही अमेरिका के दो लोग़ चाँद पर गए थे. इसीलिए कैफ साहब ने ऐसा लिखा कि चलो दिलदार चलो चाँद के पार चलो, माने यह कि भले ही नायक आम भारतीय है लेकिन सोच में वह किसी अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री से कम नहीं है. अगर अमेरिका वाले चाँद पर जा सकते हैं तो एक आम भारतीय चाँद के पार तक जा सकता है. वैसे भी कैफ भोपाली साहब की गिनती इंकलाबी शायरों में होती है. तुम मानों या न मानो, यह गीत हिंदुस्तान के लिए एक धरोहर है. एक ऐसा धरोहर जिसने अमेरिकी साम्राज्यवाद के मुँह पर करार तमाचा जड़ा था...."
जब मैंने प्रसिद्द अंतरिक्ष वैज्ञानिक एस वेंकटेसन नायर से इसके बारे में बात करनी चाही तो वे बोले; "दिस्स यिज याल रब्बिस. अई मीन हाऊ कुड यि हैव गान बियांड मून, दैट टू, सिटिंग यिन या याच? यैंड यिवेन यिफ्फ़ ई ऐड या प्लान, ई शुड हैव यिस्पेसिफाइड यिट. अई मीन नेम याफ दा प्लानेट, ई वांटेड टू ल्यैंड यपान. दिस्स सांग यिज टोटली यन-साइंटिफिक. वन्न शुड नाट यिस्पिक यबाउट समथिंग विच यि कैन नॉट डू यैंड विच इज्ज नॉट सपोर्टेड बाइ साइंस..."
Monday, May 2, 2011
चलो दिलदार चलो चाँद के पार चलो.....
Thursday, April 28, 2011
दुखीराम ज़ी का इंटरव्यू
कई महीनों से उनसे आग्रह कर रहा था कि वे मेरे ब्लॉग के लिए एक इंटरव्यू दें. वे राजी तो हो जाते लेकिन फिर दुखी होकर ना कह देते. आप कह सकते हैं कि इंटरव्यू के लिए दुखी होकर ना कहने वाली बात समझ में नहीं आई. तो मेरा जवाब यह है कि सारी समस्या दुःख की ही है. आपको बता दूँ कि आज उनकी गिनती टॉप के दुखियारों में होती है. वे जब-तब दुखी हो लेते हैं. दुखी होने के लिए उन्हें किसी कारण की ज़रुरत नहीं पड़ती. हालाँकि उनके ऊपर आरोप भी लगते रहते हैं. कि उनका दुःख प्रायोजित होता है. कि वे बिना मतलब के दुखी रहते हैं. कि उनका दुःख दिखावा है. कि वे इसलिए दुखी रहते हैं क्योंकि दुःख को आसानी से भजाया जा सकता है. कि....
खैर, आज पता नहीं क्या हुआ कि जब मैंने उन्हें इंटरव्यू के उनके वादे की याद दिलाई तो दुखी होते हुए तैयार हो गए. बोले; "देखो जो भी कहूँ या करूँगा वह बिना दुःख के तो हो नहीं सकता. पहले दुखी होकर इंटरव्यू के लिए मना कर देता था लेकिन आज दुखी होकर इंटरव्यू के लिए तैयार हो गया हूँ. तो इससे पहले कि मुझपर दुःख का एक नया दौरा पड़े, आज ले ही लो मेरा इंटरव्यू."
तो पेश है उनका इंटरव्यू. आप बांचिये.
शिव: नमस्कार दुखीराम जी. इंटरव्यू के लिए धन्यवाद. ये बताइए कि कैसा लग रहा है?
दुखीराम जी: दुखी हूँ. इस बात पर दुखी हूँ कि लोग़ एक इंटरव्यू के लिए इतना हलकान किये रहते हैं. ज़रूरी है कि किसी को इंटरव्यू के लिए इतना परेशान किया जाय कि वह दुखी होकर इंटरव्यू देने के लिए हाँ कर दे?
शिव: नहीं ज़रूरी तो नहीं है लेकिन चूंकि आपने वादा किया था इसलिए....वैसे मेरा सवाल यह है कि कितने साल हो गए आपको दुखी रहते? मेरा मतलब आप पहली बार दुखी कब हुए?
दुखीराम जी: ये मैं कैसे बताऊँ? अब देखिये कोई हिसाब रखकर तो दुखी होता नहीं है? दुःख का कोई लॉगबुक होता है क्या? नहीं न? ऐसा तो है नहीं कि आदमी किसी सरकारी कोटे के तहत दुखी होगा. कि भइया सरकार ने मुझे दिन में केवल ढाई घंटे का दुःख-कोटा अलॉट किया है इसलिए मुझे केवल ढाई घंटे दुखी रहना है. उससे ज्यादा दुखी हुए तो सरकार दुःख का कोटा जब्त कर लेगी..... देखा जाय तो दुःख अपने आप में इतना बड़ा होता है कि मनुष्य को यह सुध-बुध नहीं रहती कि वह दुखी है. ऐसे में इस तरह का सवाल बेमानी है. वैसे अगर मुझे इसका उत्तर देना ही पड़े तो मैं कहूँगा कि करीब छियालीस वर्षों से मैं दुखी रहता आया हूँ. दो-चार महीने इधर-उधर हो सकते हैं लेकिन....
शिव: अच्छा ये बताइए कि पहली बार कब दुखी हुए?
दुखीराम ज़ी: वैसे कुछ ठीक से याद नहीं लेकिन मुझे लगता है कि पहली बार मैं नौ साल की उमर में दुखी हुआ था जब दादाजी ने मुझे गधा कहा था. उसके बाद मुझे याद है कि मेरे भाई साहब ने जब सबके सामने मुझे अच्छा बच्चा बताया था तब मैं दुखी हुआ था. लेकिन हाँ, पहली बार दुखी होने का सारा श्रेय मैं दादाजी को ही दूंगा.
शिव: भाई साहब ने आपको अच्छा बच्चा बताया उसके लिए आप दुखी हो गए?
दुखीराम जी: यह दुखी होने की बात ही है. अगर किसी बच्चे को अच्छा बता दिया जाय तो उसके साथ उससे बुरा और क्या हो सकता है? इतने लोगों के सामने अच्छा बता देने से उसके ऊपर परफ़ॉर्म करने का प्रेशर बन जाता है. मेरे ऊपर अच्छा दिखने, अच्छा करने, अच्छा कहने का प्रेशर आया तो मैं दुखी रहने लगा.
शिव: फिर?
दुखीराम ज़ी: फिर क्या? धीरे-धीरे दुखी रहने की आदत पड़ गई.
शिव: वैसे यह बताइए कि दुखी रहने के लिए प्रैक्टिस करना कितना ज़रूरी है?
दुखीराम जी: देखिये वह तो आपके ऊपर डिपेंड करता है कि आप कितने जल्दी दुःख को अपने अन्दर समो लेते हैं. जैसे पहले-पहल मुझे सुबह-शाम कम से कम दो घंटे दुःख दुखी होने की प्रैक्टिस करनी पड़ती थी लेकिन अब ऐसा नहीं है. अब मैं कहीं भी कभी भी दुखी हो सकता हूँ.
शिव: अच्छा यह बताइए कि आप दुखी रहने की प्रैक्टिस कैसे करते थे?
दुखीराम ज़ी: दुखी होने की प्रैक्टिस के लिए तमाम इक्विपमेंट्स टाइप मुद्दे हैं जिनका इस्तेमाल करके आदमी एक दुखियारे का अपना जीवन शुरू कर सकता है. जैसे मैं शुरू-शुरू में यह कहकर दुखी होता था कि ज़माना बड़ा खराब है. फिर यह कहकर दुखी रहने लगा कि हमारा ज़माना बड़ा अच्छा था. बाद में यह कहकर रहने लगा कि जो ज़माना चला गया वह दोबारा लौट कर नहीं आएगा. फिर बेटों की दशा और दिशा को लेकर दुखी रहने लगा. जीवन आगे बढ़ा तो पोतों के चाल-चलन पर दुखी रहने लगा. कुल मिलाकर भगवान के आशीर्वाद से दुखी होने के लिए कम से कम मुझे तो मुद्दों की कमी कभी नहीं रही. आज जब मैं उम्र के इस पड़ाव पर खड़ा हूँ तो गर्व से कह सकता हूँ कि दुखी होने के लिए अब मुझे किसी बहाने की ज़रुरत नहीं रहती. दुःख के मामले में मैं अब आत्मनिर्भर हो गया हूँ.
शिव: आपसे मेरा एक सवाल यह है कि जो दुखियारा बनना चाहते हैं उनके लिए आप और क्या-क्या मुद्दे सजेस्ट कर सकते हैं जिसका इस्तेमाल करके दुखी होने की प्रैक्टिस की जा सकती है? मेरे कहने का मतलब यह है कि सभी आप जैसे भाग्यशाली तो नहीं हैं. सभी के बड़े भाई साहब नहीं होंगे जो उन्हें अच्छा बच्चा बता दें. या कह सकते हैं कि सभी के बेटे-बेटियां नहीं हो सकती या फिर सभी के पोते नहीं हो सकते जिनके सहारे वह दुःख की प्रैक्टिस करते रहें. आज जैसे...
दुखीराम ज़ी: समझ गया. समझ गया. मैं आपकी बात पूरी तरह से समझ गया हूँ. आप को सच बताऊँ तो दुखी होने के लिए मुद्दों की कमी कभी नहीं रही. आज भी नहीं है. आप छोटे से छोटे और बड़े से बड़े मुद्दे के सहारे दुखी हो सकते हैं. जैसे एक तरफ दुखी होने के लिए आप भ्रष्टाचार का सहारा ले सकते हैं तो दूसरी तरफ आप इस बात से दुखी हो सकते हैं कि आप इस देश के प्रधानमंत्री नहीं बन सके. आप इस बात से दुखी हो सकते हैं कि मसालों में मिलावट बढ़ गई. मिलावट का बहाना बड़ा व्यापक है. जैसे आप मिलावटी दूध, मिठाई, दाल, सब्जी, मसाला, हल्दी, धनियाँ वगैरह की बात करके दुखी हो सकते हैं. आपकी इच्छा हो तो आप इन्ही चीजों के मंहगे होने की बात करके दुखी हो सकते हैं. आप चाहें तो यह कहकर दुखी हो लें कि एक तरफ तो चीजें मिलावटी हैं और दूसरी तरफ इतनी दामी भी हैं....... जो बड़े दुखियारे होते हैं उनके लिए विषय और बड़े हो सकते हैं. जैसे आप इजराइल और फिलिस्तीन या चीन और तिब्बत के झगड़े को लेकर दुखी हो सकते हैं. जापान के ऊपर चीन की दादागीरी को लेकर दुखी हो सकते हैं. ईराक और अफगानिस्तान पर अमेरिकी दादागीरी एक बहुत बड़ा मुद्दा हो सकता है. साहित्य वाले भाषा की गिरावट को लेकर दुखी हो सकते हैं. आज से सत्तर साल बाद भाषा का स्वरुप अच्छा नहीं रहेगा, यह बात अपार दुःख का विस्तार कर सकती है. चूंकि दुःख जो है वह एक साधन है...
शिव: मैं समझ गया. आपकी बात मैं समझ गया. लेकिन ये बताइए कि सामाजिक बदलाव दुखी होने में कितना मदद करता है?
दुखीराम ज़ी: गुड क्वेश्चन. देखिये सामाजिक बदलाव के सहारे भारी मात्रा में दुःख पैदा किया जा सकता है. सामाजिक बदलाव का सहारा लेकर युवाओं की बात करके दुखी हो सकते हैं. भरी जवानी में अपने बुढापे के खराब होने की बात पर दुखी होने की प्रैक्टिस की जा सकती है. आपको मैं यह बताना ज़रूरी समझता हूँ कि जब जवानी में बुढापे के खराब होने की बात की जाती है तब सैकड़ों लोग़ धीरज बंधाते हैं. यह प्रोसेस अपार दुःख का संचार करता है. धार्मिक अनेकता की बात करके दुखी हुआ जा सकता है. अब तो ब्लॉग वगैरह लिखकर भी लोग़ दुखी हो लेते हैं. कवितायें लिख कर भी दुखी हुआ जा सकता है. कविता का तो यह समझिये कि आचार्यों के अनुसार पुराने जमाने से ही कविता दुःख से उपजती आयी है. लेकिन असली दुखियारा वह है जो अपनी काबिलियत दिखाते हुए कविता से दुःख निकाल लें. जैसे आप यह कहकर दुखी हो सकते हैं कि हाय मैं कविता लिखना बंद कर दूंगा तो अच्छी कवितायें कहाँ मिलेंगी?....... कुल मिलाकर यह समझिये कि दुखी होने के लिए मुद्दे तैयार करने पड़ते हैं. आपको अपने कान, आँख, नाक वगैरह का सहारा लेते रहना पड़ेगा. हमेशा तैनात रहना पड़ेगा. दुखी होने का मुद्दा आपको कहीं से भी मिल सकता है. इसके लिए बस आपको...
शिव: समझ गया. जैसा कि आपने बताया अब आपको दुखी होने के लिए प्रैक्टिस करने की ज़रुरत नहीं पड़ती. इसके क्या कारण हैं?
दुखीराम जी: देखिये यह तो परिपक्वता से हुआ है. अब दुखी होने के लिए मुझे किसी आउट-साइड सपोर्ट की ज़रुरत नहीं पड़ती. अब मैं बिना प्रैक्टिस के दुखी हो लेता हूँ. दुखी होने के मामले में अब मैं आत्मनिर्भर हो गया हूँ. और आपको सच बताऊँ तो अब मैं पाँच मिनट तक की शॉर्ट नोटिस पर दुखी हो सकता हूँ. एक दुखी आदमी के जीवन में यह स्टेज बड़ी मुश्किल से आता है. आपको यह बताते हुए मुझे अपार दुःख हो रहा है कि आज इस स्टेज पर पहुँचने वाले देश में कुछ गिने-चुने लोग़ ही हैं. पिछले वर्ष की रैंकिंग के हिसाब से मेरा नाम देश के टॉप टेन दुखी लोगों में शुमार है.
शिव: सर, आपने कविता की बात करके मुझे एक बात याद दिलाई. अच्छा ये बताइए कि आप अपनी कविताओं के सहारे भी काफी दुखी होते रहे हैं. कुछ लोगों का आरोप है कि आप ताज़ा लिखी दुःख वाली कविताओं को वर्षों पुरानी बताते हैं. क्या यह सही है? और अगर सही है तो इन कविताओं को पुरानी बताने से क्या दुःख की मात्रा में बढ़ोतरी होती है?
दुखीराम जी: यह सवाल पूछकर आपने अच्छा किया. देखिये इस सवाल के जवाब में भावी दुखियारों के के लिए एक गाइड-लाइन छिपी हुई है. होता क्या है? समझिये आपने कोई दुखी कर देने वाली कविता कल ही लिखी है. अगर आप यह बताते हैं कि आपने वह कविता कल ही लिखी है तो जो लोग़ उसे पढेंगे वे उसपर थोड़ा दुखी होंगे. यह सोचकर थोड़ा दुखी होंगे कि मैं कल से याने कविता की उम्र से दुखी हूँ. लेकिन उसी जगह अगर आप यह बता देते हैं कि मैंने यह कविता आज से बाईस साल पहले लिखी थी तो उससे उपजने वाला दुःख कई गुना बढ़ जाती है. कारण क्या है? कारण यह है कि पाठक समझता है कि अगर मैंने यह कविता बाईस साल पहले लिखी थी तो इसका मतलब यह है कि मैं पूरे बाईस साल से दुखी हूँ. दरअसल इसे ही दुःख की दुनिया में डोमिनो पिज्जा... सॉरी सॉरी डोमिनो इफेक्ट कहते हैं. तो इससे आप समझ ही....
शिव: यह आपने बहुत अच्छी बात बताई. वैसे दुखी होने का ऐसा और कोई साधन जिसकी चर्चा अभी तक इस इंटरव्यू में नहीं हो सकी?
दुखीराम ज़ी: हाँ, हैं न. बिलकुल है. आप सोच रहे होंगे कि वह क्या है? तो मेरा जवाब है कि जहाँ भी दो-चार ही-ही, ठी-ठी करने वाले इकट्ठे होते हों वहाँ एक दुखियारे को ज़रूर जाना चाहिए. वहाँ जाने का असर यह होता है कि दुखी आदमी और दुखी हो सकता है. ऊपर से अगर वहाँ जाकर उसने अपने दुःख की अभिव्यक्ति कर दी तो समझिये कि उसके दुःख का ईमेज बड़ा धाँसू होकर उभरता है. इसलिए दुखी होने के इच्छुक लोगों को ही-ही, ठी-ठी करने वालों 'उजड्डों' के बीच अवश्य जाना चाहिए. यह एक ऐसी सीख है जो मैंने दुखी होने एक हज़ार तरीके नामक किताब में पढ़ी थी इसलिए सोचा कि.....
शिव: कुछ लोगों का कहना है कि आपके ऊपर दुखी होने के दौरे पड़ते हैं. क्या यह सच है?
दुखीराम जी: अब नहीं पड़ते. अब आपसे क्या छिपाना. करीब बारह साल पहले तक पड़ते थे लेकिन अब मैं दुःख के ऐसे शिखर पर जा पहुँचा हूँ कि मुझे दुखी होने के लिए दौरों की ज़रुरत नहीं पड़ती.
शिव: कुछ लोगों का मानना है कि आपका दुःख प्रायोजित दुःख है. आप इससे कितना सहमत हैं?
दुखीराम ज़ी: देखिये इसका जवाब मैं क्या दूँ? अब देखा जाय तो आज के ज़माने में कौन सी बात प्रायोजित नहीं है? वैसे दुःख प्रायोजित हो ही सकता है. इसका बाज़ार बहुत बड़ा है. वैसे सच कहूँ तो अब ज्यादातर मेरे दुःख आयोजित ही होते हैं. अब दुःख और दुःख मिलाकर ऐसा वातारवरण बना है कि प्रायोजित होने का कोई केस ही नहीं बनता.
शिव: कोई संदेश जो आप भावी दुखियारों को देना चाहते हों?
दुखीराम जी: यही कि दुखी होने की प्रैक्टिस करते रहें. दुःख के बाज़ार को कभी छोटा न समझें. दुखी होने में बड़ी बरक्कत है. एक और बात यह कि आप हमेशा अपना दुःख बाँटते रहिये. मतलब सार्वजनिक तौर पर दुःख की नुमाइश का असर यह होता है कि दुःख बढ़ता जाता है. एक दुखियारे के लिए यह ज़रूरी है कि वह अपनी जमात में में नए-नए लोगों को शामिल करता जाए. देखिये सुख आता है तो फट से चला जाता है. क्यों? क्योंकि वह एक और बड़े सुख की तमन्ना लिए रहता है. लेकिन दुःख के साथ ऐसा नहीं है. छोटा दुःख कभी भी बड़े दुख की तमन्ना नहीं रखा. दर्शनशास्त्र के अनुसार.....
शिव: समझ गया. समझ गया. सर, आज आपने मेरी वर्षों की तमन्ना पूरी कर दी. आपने अपने बहुमूल्य समय से कुछ क्षण निकाले और यह इंटरव्यू दिया. इसके लिए मैं आपका आभारी हूँ.
दुखीराम ज़ी: वह सब तो ठीक है. आप तो आभारी हो गए लेकिन जितनी देर इंटरव्यू लेते रहे उतनी देर के लिए तो दुखी होने का मौका मेरे हाथ से जाता रहा. आज शाम को कुल बावन मिनट एक्स्ट्रा दुखी होना पड़ेगा.
तो यह था दुखीराम ज़ी का इंटरव्यू. आज चंदू चौरसिया के छुट्टी पर जाने की वजह से मुझे ही दुखीराम ज़ी का इंटरव्यू लेना पड़ा. लेकिन मैं दुखी नहीं हूँ.
Tuesday, April 26, 2011
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की कीमत
हम ब्लॉगर लोग आम आदमी हैं इसलिए ब्लॉग लिखते हैं. आते-जाते जो कुछ भी देखते हैं, ब्लॉग पर टांक देते हैं. ई ससुर गूगल ने सर्वर क्या दिया हमारी तो खिल गईं. अरे मैं बाँछों की बात कर रहा हूँ. खिल गईं. एक आईडी क्रियेट किया और शुरू हो गए.
क्या-क्या नहीं लिख डाला?
आज हमको रास्ते में यह दिखा. कल शाम को वह दिखा था. ई राजनीति बहुत गंदी हो गई है. आतंकवाद बहुत बढ़ गया है. मंहगाई बढ़ गई है. अंग्रेजी बढ़ गई है. हिंदी कम गई है. अंग्रेजी को बढावा देना गुलामी की निशानी है. आतंकवादी से सख्ती से निबटना होगा. कसाब को डायरेक्ट फांसी काहे नहीं दे देती सरकार? अफ़ज़ल गुरु की फांसी में इतना दिन काहे लग रहा है? वर्ण व्यवस्था कब ख़तम होगी? किसान काहे आत्महत्या कर रहा है? महिला आरक्षण को लेकर इतना हंगामा क्यों है? कसाब अपना बयान काहे बदल दिया? हम सेकुलर हैं, तो तुम कम्यूनल काहे हो? साध्वी प्रज्ञा के साथ इतनी बदसलूकी काहे हो रही है? हिन्दू आतंकवाद शब्द काहे इस्तेमाल किया जा रहा है? कम्यूनिष्ट इतनी बुरी तरह से काहे हारे? क्या दुनियाँ से कम्यूनिज्म के ख़तम होने की शुरुआत हो गई है? उड़ीसा में चर्च पर काहे हमला हो रहा है? मुतालिक जैसों की धुलाई काहें नहीं होनी चाहिए?
भारतीय भुजंग काट लेगा तो क्या होगा? वेद में व्यवस्था को लेकर ई कहा गया है. जंगल की आग से छुटकारा कैसे पाया जा सकता है? पर्यावरण खराब क्यों हो रहा है? हबीब तनवीर को श्रद्धांजलि. आदित्य जी को श्रद्धांजलि. गत्यात्मक ज्योतिष खराब है. फलित ज्योतिष अच्छा है. जलित ज्योतिष उससे भी अच्छा है. हम ऐसा मानते हैं तुम क्या कर लोगे? हिन्दू कौन थे? हिंदी भाषा किधर जा रही है? किस रफ़्तार से जा रही है? परसों तक कहाँ पहुँच जायेगी? कविता क्या है? कविता इंसान को जगाती है या फिर गौरैया के लिए लिखी जाती है?
काहे? काहे? काहे?
मतलब यह है कि आम आदमी हैं तो यही सब लिखेंगे न. ख़ास होते तो किसी मैगजीन में लिख रहे होते. केंचुकी फ्रायड चिकेन और मैकडोनाल्ड की वजह से एक ख़ास समाज किस दिशा में जा रहा है उसका विश्लेषण कर रहे होते. तब अगर कसाब के मुक़दमे की बात करते तो इस बात को ध्यान में रखकर करते कि अंतर्राष्ट्रीय कूटिनीति का इस मुक़दमे पर क्या असर पड़ता है. अमेरिका का मीडिया क्या चाहता है? एमनेस्टी इंटरनेशल के लोग इस मुद्दे पर क्या विचार रखते हैं? अफ़ज़ल गुरु को फांसी देने की बात करते तो यह ध्यान में रखते कि यूरोपियन यूनियन भारत से क्या चाहता है? मैकडोनाल्ड की किसी खास वर्ग के लोगों पर पड़े प्रभाव को देखते तो उससे उपजने वाली आर्थिक नीतियों का अध्ययन करते हुए लिखते.
लेकिन भैया, हम तो आम आदमी हैं. ऐसे में जो कुछ लिखेंगे वह सब आम आदमी की भाषा में ही होगा. हम तो यह सुनकर लिखना शुरू किये थे कि; "ब्लॉग अभिव्यक्ति का सबसे सशक्त माध्यम है."
किसी ब्लॉग विशेषज्ञ ने यह लाइन गढी होगी. लेकिन हमें तो मरवाने पर उतारू दीखता है यह ब्लॉग विशेषज्ञ. यह वाक्य सुनकर हम तो उड़ने लगे. जो मन में आया, लिख डाला. ऊपर से संविधान ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी वाला सर्टिफिकेट दिया है. अब इस सर्टिफिकेट और कुछ टूटे-फूटे विचारों से लैस हम निकल लिए ब्लॉग लिखने. आम आदमी छोटे-छोटे काम कर के महान होने के सपने देखता रहता है. वही बात हम ब्लॉगर लोगों के साथ है. सोचते हैं;"चलो ब्लॉग लिखकर महान हो लेते हैं."
अब ऐसे में अगर कोई आकर यह कहे कि ऐसा करने से फंस जाओगे तो? हमें तो लगेगा न कि यहाँ हम ब्लॉग लिखकर महान हुए जा रहे थे और आप आ गए बीच में हमारी महानता पर ताला लगाने? महान होने का हमारा प्लान चौपट करने? आम आदमी को महान होने का हक़ नहीं है क्या?
हम ब्लॉग लिखेंगे तो आम आदमी की तरह. इसलिए जब अफ़ज़ल गुरु की बात करते हैं तब केवल यह याद रहता है कि उसे फांसी की सज़ा हो गई है. यह भी याद रहता है कि कुछ नेताओं ने और कुछ मानवाधिकार वालों उसे बचाने की मुहिम छेड़ रखी है. हमें इस बात से क्या लेना-देना कि यूरोपियन यूनियन अफ़ज़ल गुरु के मामले में भारत पर क्या दबाव डाल रहा है?
ऐसे में हम क्या लिखें?
हम जब किसानों की आत्महत्या की बात करेंगे तो यही न लिखेंगे कि सरकार की नीतियों की वजह से किसान मारा जा रहा है? हमें नहीं मालूम कि विदर्भ और बुंदेलखंड की आर्थिक दशा क्या है? किसान किस फसल की खेती करता है? वहां उपलब्ध साधन क्या हैं? हम तो जी आम आदमी की तरह यही सोचते मरे जा रहे हैं कि न जाने कितने लोग अपना जीवन ख़त्म कर ले रहे हैं.
हम जब न्याय-व्यवस्था पर लिखेंगे तो एक आम आदमी की धारणा लिए लिखेंगे. हमें तो केवल इतना पता है कि अदालतें न जाने कितने वर्षों से चल रहे न जाने कितने मुकदमें निबटा नहीं पा रही. क्यों नहीं निबटा पा रही, उसपर दिया जलाकर रौशनी दिखाना ख़ास लोगों का काम है. हमें केवल इतना जानते हैं कि वकील अपने दांव-पेंच कैसे चलाते हैं. हमें केवल इतना पता है कि इसकी वजह से मुकदमें कैसे खिंचते हैं.
हमें क्या पता कि आम आदमी की सोच लिए हम अगर कुछ लिख देंगे तो उससे अदालत की अवमानना होगी? हमें तो बस इतना मालूम है कि नेता टाइप लोग न जाने कितनी बार उच्चतम न्यायालय तक की अवमानना करते नहीं अघाते. लेकिन उनके खिलाफ कुछ नहीं होता. हमें तो बस इतना पता है कि आये दिन न्याय पालिका में भ्रष्टाचार की बातें होती रहती हैं.
इन मुद्दों के फ़ाइनर पॉइंट्स पर प्रकाश डालने का काम किसी प्रशांत भूषण, किसी फली नारीमन या किसी सोली सोराबजी के जिम्मे है.
ऐसे में हम और क्या लिखेंगे? ब्लॉग लिखने से बदलाव होता है, ऐसा कोई गुमान नहीं पाल रक्खा है हमने. हमें तो यही समझ में आता है कि टीवी के पैनल डिस्कशन या फिर सेमिनार आयोजित करने से अगर बदलाव नहीं आ पाया तो फिर शायद ब्लॉग का नंबर आये..:-)
लेकिन अब क्या अनिवार्य हो जाएगा कि ब्लॉग लिखने से पहले भारतीय अचार संहिता की धाराएं रट लो? साइबर कानूनों को घोंट डालो. हमारे लेख से किस-किस को नाराजगी होगी उसकी एक लिस्ट बना लो. इतना सबकुछ कर लो उसके बाद लिखना. चार साल लग जायेंगे सारी तैयारी करने में. हो सकता है उसके बाद जब लिखने की बारी आये तो पता चले कि गूगल जी ने फ्री की सुविधा हटा ली. ऐसे में हमारा ब्लॉग कैरियर तो शुरू होने से पहले ही ख़त्म हो जाएगा.
अभिव्यक्ति का माध्यम क्या केवल ब्लॉग ही है?
यह तो अभी आया है. हाल ही में. इससे पहले जो लोग व्यंग वगैरह लिख डालते थे उन्हें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं थी? क्या होता अगर कोई अधिकारी, कोई मास्टर, कोई नेता, कोई राजनीतिक पार्टी, कोई डॉक्टर, कोई वकील, कोई थानेदार, कोई गवर्नर, कोई मुख्यमंत्री किसी परसाई जी, किसी शरद जोशी जी या किसी श्रीलाल शुक्ल जी से नाराज़ हो जाता तो?
समाज में न जाने किन-किन विसंगतियों पर इन लोगों ने लिखा. किसी को छोड़ा नहीं. लेकिन मैंने तो नहीं सुना कि किसी ने इन्हें अदालत में घसीट लिया हो. ऐसा होता तो क्या-क्या हो सकता था?
देखते कि सन पचहत्तर से ही परसाई जी केवल अदालतों के चक्कर काट रहे हैं. किसी दिन जबलपुर में मुक़दमे की सुनवाई रहती तो यह कहते सुने जाते कि;"क्या कहें, वकालत में व्याप्त विसंगतियों के बारे में लिख दिया था. गवाह कैसे तोडे जाते हैं. तारीख कैसी ली जाती है. जबलपुर बार असोसिएशन ने मुकदमा ठोक दिया. अब तो झेलना पड़ेगा ही. मेरी भी मति मारी गई थी. काहे व्यंग लिखने गए?"
कोई कहता कि; " कोई बात नहीं. ऐसा होता रहता है. सब ठीक हो जाएगा."
इस बात पर शायद बोलते; "अरे क्या ख़ाक ठीक हो जाएगा? अभी कल ग्वालियर में मुक़दमे की सुनवाई है. रानी नागफनी की कहानी में डॉक्टर भाई लोगों के बारे में लिख दिया था कि कैसे जब मार्केट में कोई दवाई भारी मात्रा में आ जाती है डॉक्टर लोग हर रोग में मरीज को वही दवाई प्रिस्क्राईब कर देते हैं. कल की तारीख निबट जाए तो अगले मंगलवार को हैदराबाद जाना है. राजनीति पर लिखे गए एक लेख में चेन्ना रेड्डी को खींच लिए थे. भाई ने आंध्रप्रदेश हाई कोर्ट में मुकदमा दायर कर दिया है."
देखते कि सन पचहत्तर के बाद उन्होंने कुछ लिखा ही नहीं. तब से सन पंचानवे तक बेचारे मुकदमों में उलझे-उलझे इस असार संसार से कूच कर जाते.
कैसा लगता अगर ऐसा कुछ हो जाता तो?
संजय गांधी की खिंचाई न जाने कितनी बार की होगी उन्होंने. अशोक मेहता से लेकर राम मनोहर लोहिया, और जय प्रकाश नारायण से लेकर राज नारायण तक किसी को नहीं छोड़ा. लेकिन क्या इन लोगों ने उनको मुकदमों में फंसाकर जोत डालने की कसम खाई?
या फिर उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के कुछ और मायने थे? या कहीं ऐसा तो नहीं कि परसाई जी अपने समय के बाहुबली थे जिनसे सब डरते थे इसलिए किसी ने डर के मारे मुकदमा नहीं दायर किया?
आखिर एक आम आदमी की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की कीमत क्या है? जेलयात्रा?

