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Thursday, January 31, 2008

बुक फेयर नहीं हुआ तो क्या, उसका उद्घाटन तो हो ही सकता है

भगवान ने इंसान को बनाया और इंसान ने सरकार. भगवान को इंसान बनाने के लिए नोबल प्राईज मिल सकता है तो इंसान को सरकार बनाने के लिए. ऐसा कहने के पीछे मेरे पास कारण हैं. ये बात दावे के साथ कही जा सकती है कि इंसान द्वारा किए गए आविष्कारों में सबसे बड़ा और गूढ़ आविष्कार है इंसान का सरकार बनाना. मैं वैसे भी सरकार को नज़दीक से देखता हूँ. मेरा आफिस कलकत्ते में सरकार के आफिस मतलब राईटर्स बिल्डिंग के पास ही है. लिहाजा सड़क पर आते-जाते सरकार के दर्शन हो ही जाते हैं. अगर किसी दिन नहीं दर्शन नहीं होता तो सरकार घर में रखे टेलीविजन सेट पर अपना दर्शन देकर धन्य कर जाती है.

सरकार के बारे में ऐसे विचार कल एक अखबार में एक समाचार पढ़कर आए. समाचार में लिखा था; 'इस साल कलकत्ते में बुक फेयर का उद्घाटन तो होगा लेकिन बुक फेयर नहीं होगा.' सरकार के लिए जरूरी है की बुक फेयर का उद्घाटन हो. बुक फेयर नहीं होने से भी काम चल जायेगा. ये उद्घाटन का सरकारी काम होना बहुत जरूरी है. हमारे शहर में सरकार ने कई ऐसे फ्लाई ओवर और पुल का उद्घाटन कर डाला है जो अभी तक बन रहे हैं. खैर, बात हो रही थी बुक फेयर की.

कलकत्ते में हर साल एक बुक फेयर होता है. साल १९७६ से होता रहा है. लेकिन पिछले कई सालों से किताबों का ये मेला किताबी मेला बनकर रह गया है. पिछले चार सालों से सरकार जनवरी महीने में केवल बुक फेयर और उससे संबंधित विवाद पर काम करती है. बाकी के सरकारी काम लगभग बंद रहते हैं. और फिर सरकार ही क्यों, पिछले चार सालों से बुक फेयर के मौसम में सरकार, कोर्ट, आर्मी, अखबार, जनता, नेता, पब्लिशर्स गिल्ड, सबके सब एक ही मुद्दे को ओढ़ते-बिछाते हैं, बुक फेयर. यह बुक फेयर पहले जिस स्थान पर होता था, वहाँ का मालिकाना आर्मी के पास है. पहले आर्मी को बुक फेयर के आयोजन पर कोई आपत्ति नहीं थी. लेकिन शायद हाल के वर्षों में आर्मी कुछ ज्यादा मुस्तैद और चुस्त-दुरुस्त हो गई है. आर्मी के मुस्तैद होने का नतीजा यह है कि सरकार बुक फेयर नहीं करवा पा रही.

आर्मी का मानना है कि बुक फेयर की वजह से उसका मैदान दूषित हो जाता है. सरकार का मानना है कि किताबों से वातावरण दूषित नहीं होता. आर्मी अपनी बात लेकर कोर्ट में चली जाती है. लिहाजा सरकार को भी कोर्ट में जाना पड़ता है. सरकार कोर्ट में हार जाती है क्योंकि आर्मी का वकील साबित कर देता है कि बुक फेयर की वजह से वातावरण दूषित हो जाता है. मजे की बात ये है कि जो मैदान बुक फेयर की वजह से दूषित होता है, वही मैदान राजनैतिक पार्टियों की रैलियों के आयोजन के बावजूद दूषित नहीं होता. ऐसी रैलियों में बीस लाख लोग आते हैं जो माछ-भात से लेकर चना-चबैना और प्लास्टिक की थैलियाँ इसी मैदान में विसर्जन कर जाते हैं. कहते हैं और ऐसी मान्यता भी है कि सरकारी चीजें सस्ती होती हैं. लिहाजा सरकार का वकील भी सस्ता ही होगा नहीं तो अदालत को बताता कि; 'योर आनर, अगर बीस लाख लोगों की रैली के बावजूद मैदान साफ-सुथरा रहता है तो बुक फेयर की वजह से दूषित कैसे हो सकता है.'

इस बार बुक फेयर का आयोजन सरकार ने एक और मैदान में करवाने की बात की. तैयारी हो चुकी थी. लेकिन जब उद्घाटन की बात आई, तो और लोग सामने आए और बताया कि ये मैदान भी दूषित हो जायेगा. फिर मामला उसी कोर्ट में पहुँच गया. कोर्ट ने भी बताया कि बुक फेयर की वजह से मैदान दूषित हो जायेगा. साल में एक बार आयोजित किया जानेवाला बुक फेयर, इस बार नहीं हो सकेगा. मजे की बात ये है कि आर्मी के मैदान में राजनैतिक रैलियां होती हैं तो इस मैदान में भी दुर्गा पूजा का पंडाल लगता है. सर्कस लगता है. लेकिन इन आयोजनों से मैदान दूषित नहीं होता. हर साल कलकत्ता बुक फेयर का विषय किसी अन्य देश को बनाया जाता है. कभी वियतनाम, कभी क्यूबा, कभी पोलैंड. मेरा सुझाव ये है कि जिस देश को विषय के रूप में चुना जाय, वहीं जाकर कलकत्ता बुक फेयर का आयोजन भी कर लिया जाय तो ठीक रहेगा.

सड़कों पर प्रदूषण, पार्कों में प्रदूषण, तालाबों में तैरती प्लास्टिक की थैलियाँ, लगभग सब जगह प्रदूषण बिखरा पड़ा है. उसकी फिक्र न तो कोर्ट को है न ही पर्यावरण मंत्रालय को. न ही आम आदमी को और न ही सरकार को. लेकिन बुक फेयर से होनेवाले प्रदूषण से सबको ख़तरा नज़र आता है. लेकिन सरकार की हिम्मत की भी दाद देनी पड़ेगी. उसकी इस सोच की, कि बुक फेयर नहीं हुआ तो क्या, उसका उद्घाटन तो हो ही सकता है.

Wednesday, January 30, 2008

काकेश जी, ये आपके (?) लिए


आज बाल किशन के ब्लॉग पर इराक की मशहूर कवियित्री नजीक अल-मलाईका की एक बहुत सुंदर कविता पढने को मिली. बाल किशन ने अंतराष्ट्रीय कवियों और कवियित्रियों की कवितायें काफी पढ़ी हैं. मुझे कविता बहुत पसंद आई. लेकिन इस पोस्ट पर काकेश जी का कमेंट है कि बाल किशन कभी दिनकर जी और पन्त जी की कवितायें भी पब्लिश करें. बाल किशन तो भविष्य में पब्लिश करेंगे ही. लेकिन काकेश जी की इस बात पर मैं दिनकर जी के दो छंद पब्लिश कर रहा हूँ, जो कुरुक्षेत्र से लिये गये हैं.


युद्ध क्यों शुरू हुआ, इसके बारे में युधिष्ठिर कहते हैं:
"किंतु हाय, जिस दिन बोया गया युद्ध-बीज ,
साथ मेरा दिया नहीं मेरे दिव्य-ज्ञान ने;
पलट दी मति मेरी भीम की गदा ने और
पार्थ के शरासन ने, अपनी कृपाण ने;
और जब अर्जुन को मोह हुआ रण बीच
बुझती शिखा में दिया घृत भगवान ने;
सबकी सुबुद्धि पितामह, हाय, मारी गई
सबको विनष्ट किया एक अभिमान ने।

"कृष्ण कहते हैं, युद्ध अनघ है, किंतु, मेरे
प्राण जलते हैं पल-पल परिताप से;
लगता मुझे है, क्यों मनुष्य बच पाता नहीं
दह्यमान इस पुराचीन अभिशाप से!
और महाभारत की बात क्या? गिराए गए
जहाँ छल-छद्म से वरेण्य वीर आपसे,
अभिमन्यु वध औ’ सुयोधन का वध हाय,
हममे बचा है यहाँ कौन किस पाप से?

Monday, January 28, 2008

तुम मुझे पैसे दो, मैं तुम्हें नेता दूँगा.


मीडिया समूह बड़ा दुखी था. उसे दुःख इस बात का था कि करोड़ों भारतीयों ने हजारों बार वोट दिया लेकिन एक ऐसा नेता नहीं चुन पाये, जो भारत को 'लीड' कर सके. अभी तक जितने नेता चुने गए, ज्यादातर ने भारत को लीद ही किया, 'लीड' नहीं कर सके. बस, फिर क्या था. इस मीडिया समूह ने जनता को बताया कि; "तुम सब अंधे हो. नेता तुम्हारे बीच है और तुमने देखा नहीं. तुम्हें उसकी पहचान नहीं है. तुमसे कुछ नहीं होगा. अब नेता चुनने का काम तुम हमपर छोड़ दो और देखो कि हम बिना वोट दिए कितना बढ़िया नेता चुनते हैं."

जनता को फटकार लगाना नेता चुनने की पहली सीढ़ी थी. उसके बाद चुनाव प्रचार शुरू हुआ. गुलज़ार साहब से गीत लिखवाया गया. उन्होंने लिखा; "भारत उम्मीद से है." अमिताभ बच्चन साहब को प्रचार के लिए बुलाया गया. वे चुनाव प्रचार में उतरे. बाद में शाहरुख़ खान और जूनियर बच्चन भी उतरे. सब ने चुनाव प्रचार शुरू किया. करते गए. 'नेताओं' की तलाश हुई. जनता से कहा गया कि जिन्हें नेता बनना हो, अपना हाथ ऊपर करें टाइप से. बहुत सारे हाथ ऊपर किए गए. जनता आशा लगाए मीडिया समूह का मुंह ताक रही थी. भारत का भविष्य अब मीडिया समूह के हाथों में है.

लेकिन ये क्या? जिस नेता को चुनने का विश्वास इस समूह ने दिया था, उसी को चुनने के लिए ये लोग वापस जनता के पास हाजिर हैं. कहते हैं; "टीवी प्रोग्राम देखो, वोट दो, तब जाकर एक अदद नेता की प्राप्ति कर सकोगे." मतलब नेता चुनने के लिए वोट तो देना ही पडेगा. जनता लग चुकी है वोट देने में. पैसा खर्च कर रही है, इस आशा के साथ कि 'एक दिन ऐसा नेता मिलेगा, जो हमें वैतरणी पार कर के ही दम लेगा.' टीवी प्रोग्राम में दिखाने के लिए सवाल पूछने का सांस्कृतिक कार्यक्रम भी है; "अच्छा भैया ये बताओ कि मुद्रास्फीति की वजह से अर्थव्यवस्था को क्या नुकसान हो सकता है?" जवाब मिल गया. दूसरा सवाल; "अच्छा ये बताईये, विदर्भ में किसानों की समस्या कैसे सुलझाई जा सकती है?" बहुत बढ़िया जवाब. आपको इस जवाब के मैं पांच नंबर दूँगा.

अरे तारनहार, इसी तरह के सवाल-जवाब करके नेता चुनना था तो हमारे अफसर क्या कर रहे हैं? उनसे काबिल कौन है? जो नेता जज की कुर्सी पर बैठे भारत को लीड करने वाले इन नेताओं का चुनाव कर रहे हैं, वे अपने अफसरों से ये सारी समस्याएं सुलझाने के लिए क्यों नहीं कहते? और सिनेमा और एनजीओ के नेताओं के गले ये बात क्यों नहीं उतरती कि वे भी तो दिन भर आज के नेताओं के सम्पर्क में हैं, वे क्यों नहीं उन्हें रास्ता दिखाते. इस तरह से नेता चुनने की नौबत ही नहीं आती.

अब जनता थोडी निराश टाइप दिख रही है. जनता के बीच से एक जन ने कहा; "ये लोग भी पैसा कमाने में लग गए हैं. बताओ, ये भी कोई बात है. कहते हैं, एसएम्एस कर के वोट दो, तब जाकर एक नेता देंगे हम तुम्हें. अरे यही वोटिंग करवानी थी तो हम साल दर साल वोट कर ही रहे थे. कभी तो ऐसा होता कि हमारा वोट एक अच्छा नेता खोज लेता. ऊपर से इन नेताओं को चुनने के लिए जिन्हें बैठा रखा है वे ख़ुद भी नेता हैं. कुछ तो राजनीति में नेता हैं. जो राजनीति में नेता नहीं हैं, वो एक्टिंग के नेता हैं, सिनेमा के नेता हैं. कुछ की नेतागीरी 'एनजीओ समाज' में चलती है. अरे भइया नेता दूसरे नेता को चुने, इससे अच्छा तो यही था कि जनता ही नेता चुन लेती."

जनता शायद महसूस कर रही है कि अब नारा बदल चुका है. अब नारा है; "तुम मुझे पैसे दो, मैं तुम्हें नेता दूँगा."

Saturday, January 26, 2008

ज्ञान भैया, आपके लिए मेरे पास कुछ सुझाव हैं

हमारे ज्ञान भैया भी गजब हैं. पिछले तीस सालों से हमारी भाभी से चाय बनवा कर पीते हैं और उन्हें ये पता नहीं कि उनकी इस हरकत की वजह से दुनियाँ भर की औरतों के साथ अत्याचार हो रहा है. मजे की बात ये कि अपना अपराध कुबूल भी कर रहे हैं. वो भी ऐसी पोस्ट में जो सबकी समझ में आए. अब भैया जब पोस्ट सबकी समझ में आएगी तो उसपर टिप्पणियां भी आएँगी ही. और जब आएँगी तो बचना मुश्किल होगा ही. वैसे भी इस केस में केवल टिपण्णी से काम चलना मुश्किल था लिहाजा लोगों को पोस्ट तक लिखनी पडी.

मैंने कई बार भैया से कहा है कि ऐसी पोस्ट लिखते ही क्यों हैं, जो सबकी समझ में आ जाए. ऊपर से ऐसे मुद्दों पर लिखते हैं जिनके बारे में सब जानते हैं. अरे भैया, मैं कहता हूँ कि आपको कलकत्ते में होने वाली मीटिंग की फोटो लगाकर पोस्ट लिखनी ही क्यों? और फिर आप किसी समस्या पर डिस्कशन करना ही चाहते हैं तो आठ-दस साल और इंतजार कीजिये. रिटायर होने के बाद ये सारी समस्याओं की लिस्ट लेकर कहीं कोलोम्बिया, ब्राजील, चीन, उज़बेकिस्तान जैसी जगह चले जाईयेगा और वहाँ के लोगों के साथ भारत की आजकी समस्याओं को डिस्कस कर लीजियेगा. कौन रोकता है आपको. डिस्कशन करने से जो निष्कर्ष निकलेगा, उसे पोस्ट दर पोस्ट ठेलते रहियेगा. चाहे वहीं से या फिर भारत आने के बाद. भारत आ गए तो मेरी कोलोम्बिया यात्रा-भाग ५२७ तक ठेलते रहें. अज़दक जी से कुछ सीखिए. देखा नहीं आपने, चीन के एक नदी के किनारे बसे होनसीसी गांव में बैठकर वहाँ की एक बुढ़िया हूँचीची के साथ बिहार के चम्पारण जिले की समस्याएं डिस्कस कर आए. हाल ही में मुम्बई में बैठे-बैठे रूस से आए ब्रजनेव के पोते कसेल्निकोव के साथ भारत की पानी की समस्या डिस्कस किया है उन्होंने. ऐसा कुछ कीजिये.

नेरुदा आपकी समझ में नहीं आते फिर भी उनके बारे में लिखिए, बोलिए. उनकी कवितायें ठेलिए पोस्ट दर पोस्ट. आप रहते थे इलाहबाद के शुकुलपुर गाँव में लेकिन सबको ये बताईये कि आपने बचपन में ही इटली के महान फिल्मकार की १९५० में बनाईं गई फ़िल्म देख ली थी और इस फ़िल्म पर आप पीएचडी कर चुके हैं. आप लोगों को ये बताईये कि जॉर्ज बर्नाड शा के नाटक मैन एंड द सुपरमैन और आर्म्स एंड द मैन की सबसे बढ़िया व्याख्या आपने की है. किसी माडर्न आर्ट के 'पेंटर' की बनाईं गई 'जलेबी' को अपनी पोस्ट पर छापिये और लोगों को ये बताईये कि ये पेंटिंग आपको इस आर्टिस्ट ने भेंट में दी थी. पूरे साल भर पोस्ट में ऐसी भाषा लिखिए जो पाठक तो क्या पाठक की माँ (बाप इसलिए नहीं लिख रहा कि इसको लेकर भी बवाल न खडा हो जाए) की समझ में भी न आए. लेकिन जब किसी को गाली देना हो तो ऐसी भाषा लिखिए तो सबकी समझ में आए.

और आप हैं कि अपने घर और अपनी सच्ची सोच के बारे में पोस्ट ठेल रहे हैं. वो भी ऐसी जो सबकी समझ में आए. थोड़ा मेहनत करके एक 'डुयल पर्सनालिटी' तैयार नहीं कर सकते? माफ़ कीजियेगा, अगर ऐसा नहीं कर सकते तो फिर आप असली ब्लागिंग के लायक कतई नहीं हैं. और छोड़ दीजिये ये ब्लागिंग वागिंग. और हाँ, जो भी लिखिए बहुत सोच-समझ के लिखिए. हो सके तो लिखिए ही मत. क्योंकि आपकी लिखी हुई पोस्ट की एक भी लाइन लोगों को नागवार गुज़री तो भारत का सत्यानाश हो जायेगा. आपको सोचना चाहिए कि आपका लिखा हुआ शाश्वत है. आनेवाले समय में ये कोर्स की किताबों में पढाया जायेगा और इसे छात्रों ने पढ़ा तो भारत का भविष्य चौपट हो जायेगा.

और फिर केवल अज़दक जी से ही क्यों, प्रत्यक्षा जी से भी कुछ सीखिए. अभय भाई ने अपने ब्लॉग पर इन दोनों को शब्द धनी बताया है. देखा नहीं कि प्रत्यक्षा जी मिसेज मजुमदार के बारे में पूरी की पोस्ट लिख डालती हैं. लेकिन क्या लिखती हैं वह मिसेज मजुमदार की माँ की भी समझ में नहीं आएगा. लेकिन अगर आपकी पोस्ट पर आपको धिक्कारने की बात आती है तो ऐसी भाषा लिखती हैं जो गली का कुत्ता भी पढे तो समझ जाए. प्रमोद जी ने अपनी ही पोस्ट में उन्हें हरियाणा में औरतों के साथ होनेवाले जुल्म को लेकर कुछ कहा है. मुझे भी समझ में नहीं आया कि वे कभी वहाँ की औरतों के साथ हो रहे अत्याचार के बारे में क्यों नहीं लिखती? खैर, ये उनका अपना मामला है.

इसलिए भैया, मेरा तो यही कहना है कि आप ख़ुद को बदलिए. ट्राई कीजिये कि ऐसा कुछ लिखिए जो लोगों की समझ में न आए. कम से कम गालियाँ खाने की नौबत तो नहीं आएगी.

Friday, January 25, 2008

बॉलर ने रतीराम का पान खाया और बैट्समैन बोल्ड हो गया

रतीराम चौरसिया, अरे वही चौरसिया पानवाले, कल बीसीसीआई दफ्तर के बाहर दिखाई दे गए. कभी इधर जाते, कभी उधर. जो सामने मिल जाता, उसी को पकड़ लेते. कुछ बात करते और फिर चेहरा लटक जाता. मुझसे टकरा गए. मैंने पूछा; "आप और यहाँ? कैसे आना हुआ?"

बोले; "टीम खरीदने आए रहे. पर ई लोग कह रहा है सब बिक गवा."

मैंने कहा; "आप भी टीम खरीद रहे हैं. लेकिन अब तक तो सारी टीमें बिक गईं. अब तो कुछ नहीं बचा."

बोले; "हाँ. एही बात का तो रोना है. हमरे आने से पहिले ही ई लोग सब बेंच-बांच कर खतम कर दिया."

मैंने कहा; "अब तो कुछ कर भी नहीं सकते. लेकिन आप क्रिकेट के धंधे में कब से कूद गए? पान का धंधा छोड़ दिए क्या?"

बोले; "अरे भइया पान का धंधा बढ़िया चल रहा है एही वास्ते क्रिकेट के धंधे में आए हैं. सभी खरीद रहा था. हम सोचे, हम भी खरीद लें. अरे जब एअरलाइन वाला से लेकर कपड़ा वाला और दारू वाला से लेकर फिलिम वाला खरीद रहा है, तो हम भी तो टिराई मार ही सकते हैं. पान बेंचते हैं तो का हुआ, करते तो धंधा ही हैं."

मैंने सोचा ठीक ही तो कह रहे हैं. सब अपना-अपना बिजनेस छोड़कर क्रिकेट के बिजनेस में जा रहे हैं तो रतीराम जी ने कौन सा पाप किया है. वे भी जा सकते हैं. मैंने कहा;" लेकिन जिन लोगों ने टीम खरीदी हैं, कह रहे थे कि उनकी वजह से क्रिकेट का भला होगा. आप भी भला करेंगे क्या इस क्रिकेट का?"

रतीराम ने मुस्कुराते हुए कहा; "कौन भला करेगा क्रिकेट का? ई लोग जो टीम खरीदा है? इन लोगों को क्रिकेट का बारे में का पता है? जो जो लोग खरीदा है, उसमें कौन क्रिकेट खिलाड़ी था, बोलिए तो."

मैंने सोचा सही ही तो कह रहे हैं. लेकिन मन में ये बात भी आई कि जिन लोगों ने टीमें खरीदी हैं, वे लोग तो यही कह रहे थे कि क्रिकेट का भला करेंगे. यही सोचते हुए मैंने रतीराम से पूछा; "तो आपको क्या लगता है. जिन लोगों ने टीमें खरीदी हैं, उनका अपना कोई स्वार्थ है?"

बोले; "और नहीं तो का. आपको का लगता है, हमें कोई टीम मिल जाती तो का हम क्रिकेट का भला करते?"

मैंने पूछा; "तो आप क्या करते?"

बोले; "प्रचार करवाते. जो ई लोग भी करवाएगा. अन्तर एही है कि ई लोग दारू, फिलिम, कपड़ा और गैस का प्रचार करवाता, हम पान का करवाते."

उनकी बात सुनकर हंसी आ गई. मैंने कहा;" क्या बात कर रहे हैं. पान का प्रचार करवाते. ये भला क्यों?

आपको नहीं लगता कि क्रिकेट के खेल में पान का प्रचार कुछ भद्दा मजाक नहीं लगेगा?"

रतीराम जी ने मेरी बात सुनकर मेरे ऊपर ऐसी दृष्टि डाली जैसे दुनियाँ में मुझसे बड़ा 'खतम' आदमी और कोई नहीं. मुझे देखते हुए बोले; "आप रेडियो नहीं न सुनते हैं. आ सुनते तो अईसा नहीं कहते."

मैंने कहा; "आप ठीक कह रहे हैं. मैं रेडियो नहीं सुनता. वैसे इस रेडियो में ऐसा क्या है?"

बोले; "रेडियो में क्रिकेट का कमेंटरी आता है. जब भी चौका लगता है, रेडियो से आवाज आता है 'और ये बीएसएनएल चौका'. सुनकर बड़ा हंसी आता है. एक बार सुनकर लगता है जैसे ई बीएसएनएल ने ही ई चौका लगवाया है. ई कंपनी नहीं होती त चौका नहीं लगता."

मैंने सोचा अगर ऐसा है तो ठीक ही तो कह रहे हैं. यही सोचते हुए मैंने उनसे पूछा; "अगर आपको टीम मिल जाती तो क्या आप अपनी पान दुकान का प्रचार करवाते खिलाडियों से?"

बोले; "काहे नहीं. जरूर करवाते. जब पैसा लगाकर टीम खरीदेंगे तो प्रचार भी करवाएंगे. और ओइसे भी जो लोग टीम सब को लिया है, वो भी तो एही कराएगा सब. काल को देखियेगा, ई खिलाड़ी सब दारू से लेकर कपड़ा तक बेंचते हुए दिखेगा. फिलिम का प्रचार करेगा, सो अलग."

मैंने पूछा; "लेकिन अब तो आपको टीम मिलेगी नहीं. सब तो बड़ा-बड़ा लोग खरीद लिया. कलकत्ते से लेकर मुम्बई और बंगलूरु तक की टीमें बिक चुकी हैं."

बोले; "असल में सुने रहे कि आजकल छोटा-छोटा शहर और कस्बा से खिलाड़ी आ रहा है सब. मुम्बई और दिल्ली वगैरह से कम खिलाड़ी आता है. एही वास्ते हम बीसीसीआई को सुझाव दिए हैं कि पटना, इलाहाबाद, कानपुर, रायबरेली अ चाहे भटिंडा का भी टीम बनाये जिससे हम जैसे छोटे धंधेबाजों को क्रिकेट का धंधा करने का मौका मिले."

इतना कह कर वे बीसीसीआई के एक पदाधिकारी की पीछे-पीछे चले गए.

उनकी बात सुनकर हम आनेवाले समय में ऐसे विज्ञापन के लिए तैयार हो चुके हैं जिसमें दिखाया जायेगा कि बॉलर को विकेट नहीं मिल रहा है. हारकर वह रतीराम की दुकान का बनारसी पान खाकर बोलिंग करता है और सामने वाले बैट्समैन को बोल्ड कर देता है.

Thursday, January 24, 2008

गनीमत है मछलियों और बकरों को बर्ड फ्लू नहीं होता

पश्चिम बंगाल में मौसम इस कदर ख़राब हुआ कि मुर्गियां भी फ्लू का शिकार हो गईं. राज्य सरकार परेशान है. थोड़ा इस फ्लू की वजह से और थोड़ा केन्द्र सरकार के मंत्रियों की वजह से जो आए दिन कह रहे हैं कि 'राज्य सरकार ने ठीक समय पर काम नहीं किया.' जनता ने चिकेन खाना पहले ही छोड़ दिया था लेकिन अब तो नेता भी मुर्गियों से डरने लग गए हैं. कैसे डरपोक नेता हैं जो इंसानों से नहीं डरते लेकिन मुर्गियों से डरते हैं. शादी के मेन्यू में अब मछली और बकरे कट रहे हैं. कारण केवल इतना है कि इन्हें बर्ड फ्लू नहीं होता. गनीमत है कि मछलियों और बकरों को बर्ड फ्लू नहीं होता नहीं तो कितने लोग भूखे रह जाते और न जाने कितनी शादियाँ रुक जातीं.

पहले राज्य सरकार के कर्मचारियों ने मुर्गियों को मारना शुरू किया. बाद में पता चला कि ये कर्मचारी टाइम पर काम नहीं कर पा रहे. लिहाजा केन्द्र सरकार ने अपने एक हज़ार कर्मचारी भेज दिए हैं जो मुर्गियों को मारेंगे. प्लान के मुताबिक कई लाख मुर्गियों को मारने का इंतजाम कर लिया गया है. वैसे आज ही वामपंथी नेता श्री बिमान बोस ने बताया है कि उन्होंने अपने कैडरों को भी इस काम पर लगा दिया है. ठीक ही किया. वैसे भी वामपंथियों को अपने कैडरों पर ज्यादा विश्वास रहता है. लोगों को भी पता है कि कैडरों से आजतक कोई नहीं बच सका तो मुर्गियों की क्या औकात. सीन पर कैडरों के आ जाने से केन्द्र सरकार भी आश्वस्त हो गई है. उसे भी विश्वास हो गया है कि अब मुर्गियां नहीं बचेंगी और उनका काम-तमाम निश्चित है.

राज्य सरकार द्वारा अपने कैडरों को लगाने के बाद मुर्गियों में हलचल मच गई. आख़िर पश्चिम बंगाल की मुर्गियां हैं. मीटिंग और भाषण का महत्व उन्हें भली-भाँति पता है. लिहाजा उन्होंने 'मुर्गी रुदन मंच' बनाया और ब्रिगेड परेड में एक रैली कर डाली. रैली में एक वरिष्ठ मुर्गी को नेता चुन लिया गया. उसे मुर्गियों को संबोधित करने के लिए स्टेज पर बुलाया गया. स्टेज पर आते ही उसने भाषण शुरू किया;

बहनों और भाईयों,

हम बहुत दुखी हैं. वैसे हम दुखी तो हमेशा ही रहते हैं लेकिन इस बार कुछ ज्यादा ही दुखी हैं. कारण केवल इतना है कि ये इंसान पहले हमें खाने के लिए काटता था लेकिन आज केवल मारने के लिए काट रहा है. ऐसी बात नहीं है कि खाने के लिए कटने पर हमें कोई खुशी होती थी. हमें दुःख केवल इस बात का है कि इंसानों को जब फ्लू हो जाता है तो वह दवाई वगैरह खाकर ठीक हो जाता है ताकि हमें खा सके. लेकिन जब हमें फ्लू हो जाता है तो हमें मार डालता है. यही इंसान उठते-बैठते ये बताना नहीं भूलता कि अब इसने कैंसर का इलाज भी खोज लिया है. मेरा कहना यही है कि अपने लिए कैंसर का इलाज खोजा तो हमारे लिए कम से कम फ्लू का इलाज तो खोज लेता. लेकिन नहीं, हमारे लिए क्यों खोजेगा. फ्लू से तो अच्छा होता कि हमें कैंसर ही हो जाता. कम से कम हम अपनी मौत तो मरते. लेकिन अब हम क्या करें अगर हमारे फ्लू का इसके पास केवल एक ही इलाज है, हमारी मौत.

अजीब होता है ये इंसान भी. केवल ठूसना जानता है. जब तक हम जिंदा हैं तो हमें दड़बे में ठूस कर रखता है. और जब हमें मार देता है तो मुहँ में ठूसता है. केवल खाने में बिजी रहता है. घूस और गाली खाने से समय मिलता है तो हमें खाता है. ख़ुद तो आराम से बड़ी जगह में रहता है और हमें छोटी सी जगह में ठूस देता है. अब हमें फ्लू हो ही गया है तो मरना तो हमें पड़ेगा ही. लेकिन एक बात हमें हमेशा आश्चर्यचकित करती है. हम भले-चंगे रहते हैं तो ये हमसे नहीं डरता. लेकिन हम बीमार हो जाते हैं तो इसे हमसे डर लगता है. इस इंसान ने हमेशा हमें खाया ही है. हम बीमार नहीं रहते तो इसका पेट भरते हैं. बीमार हो जाते हैं तो मर कर भी इसका भला ही करते हैं. क्योंकि हमारे मरने से ये इंसान बच जायेगा. वैसे हमें इस बात का संतोष है कि हमारा शरीर हर हाल में इस इंसान के काम ही आता है.

और मैं क्या कहूं.............

Wednesday, January 23, 2008

शादी का सर्कस

टीवी पर न्यूज़ देख रहा था. पंजाब में एक शादी के दौरान शराब पीकर नाचते हुए एक साहब की पिस्तौल चल गई. अपने आप नहीं चली, साहब चला रहे थे. अब पिस्तौल चली तो गोली भी निकलेगी ही. निकल पड़ी और शादी की विडियो रेकॉर्डिंग कर रहे युवक के दिल के पते पर पहुँच गई. नतीजा, युवक मारा गया. चैनल ने यह भी बताया कि शादी हाई-प्रोफाईल थी. हाई-प्रोफाइल इस लिए कि शादी अटेंड करते हुए एक मंत्री को देखा गया.

मुझे लगा कितनी टुच्ची बात है. अरे शादियों में पिस्तौल-बंदूक तो यूपी-बिहार में चलती है. लेकिन पंजाब में भी पिस्तौल ही चलती है, ये आईडिया नहीं था. सुना है पंजाबी ज्यादा खुश रहने वाले लोग हैं. भारत में खुशी के जितने गाने हैं, आजकल पंजाबियों के मुंह से ही सुने जाते हैं. शेर की तरह जीते हैं. लेकिन शादी में केवल पिस्तौल बजाते है. शेर की तरह जीने वालों को तो शादियों में तोप बजाने चाहिए. लेकिन बजाई भी तो केवल पिस्तौल. लानत है. हाल ही में यह ख़बर भी आई थी कि पंजाबियों को शादियों में दिखावा न करने की हिदायत शिरोमणि अकाली दल वगैरह से मिली है. अब दिखावा न करने की हिदायत दे रहे थे तो साथ-साथ ये भी कह देते कि बंदूक, पिस्तौल और तोपों की सलामी पर भी रोक लगे. ऐसी हिदायत नहीं दी गई तो बाराती बेचारे क्या करें. वे तो बजायेंगे ही.

लेकिन ये बाराती भी क्या करें. अब पिस्तौल ली है तो उसका भी तो मन रखना पड़ेगा. हो सकता है कि पिछली शादी में पिस्तौल लेकर नहीं गए हों. वापस आने पर पिस्तौल ने शिकायत की होगी कि आजकल आप अकेले ही शादियाँ अटेंड कर आते हैं, मुझे नहीं ली जाते. साथ में इस पिस्तौल ने परिवार के लोगों से शिकायत भी कर डाली हो कि; "साहब बदल गए हैं. आजकल हमें शादियों में नहीं लेकर जाते." ये भी हो सकता है कि पिस्तौल ने इन्हें ब्लैकमेल करने की धमकी दी हो. कहा हो कि; "अगर अगली शादी में मुझे नहीं ले गए तो आपके मित्र की पिस्तौल से शिकायत कर दूँगी कि अब आप में वो दम नहीं रहा." बस, बेचारा बाराती क्या करे, ले जाना पडा होगा.

शादियों में नृत्य-प्रतिभा का नज़ारा तो मिलता ही है. हर शादी में दो-चार पप्पू भइया टाइप लोग होते हैं जिनका भांगडा से लेकर नागिन डांस तक पर समान अधिकार रहता है. वे नाच नाच कर जमीन तक हिला डालते हैं. कई बार तो बाकी के बाराती पचास मीटर दूर चले जाते हैं, ये सोचते हुए कि भूकंप आ जाए तो कम से कम एपीसेंटर से कुछ दूरी पर तो रहे, नहीं तो बचने की उम्मीद कम ही रहती है. मैं सन २००४ में एक शादी में जौनपुर गया था. वहाँ ऐसे ही तीन-चार पप्पुवों को देखा डांस करते हुए. लगभग एक घंटे डांस किया इन लोगों ने. दुल्हे के दोस्त थे. जब डांस खत्म हुआ तो मैंने एक से कहा; "भाई बहुत अच्छा नाचते हैं आप. कमाल कर दिया. लेकिन थोड़ा और नाचते तो अच्छा लगता. दुल्हन की बहुत सारी सहेलियां अभी तक पंहुची नहीं थीं."

मुझे लगा मेरी बात सुनकर थोड़ा शर्मायेंगे. लेकिन उन्होंने तुरंत जवाब दिया; "क्या है भैया कि जगह थोडी छोटी थी. नहीं तो और मज़ा आता." उनका जवाब सुनकर मैं चारों खाने चित. फिर उन्होंने पिछले तीन साल में किए गए अपने शादी-डांस का पूरा व्यौरा सुनाया. मुंह से शराब नामक पेय पदार्थ की गंध ऊपर से. मुझे लगा कहाँ चला जाऊं कि इनसे बचूं. डांस करते हुए एपीसेंटर से काफ़ी दूर था लेकिन इनके साथ बात करके तो वैसा ही महसूस हुआ जैसे सीधा-सीधा ज्वालामुखी में उतर गए हैं.

जिस तरह से शादियाँ आयोजित की जा रही हैं, उसे देखकर लगता है कि आने वाले समय में शादी के कार्ड में लिखा मिलेगा कि; 'फलां की शादी में आयोजित होने वाले सर्कस में आप आमंत्रित हैं.' ये भी लिखा मिल सकता है कि; 'आप साथ में पत्नी को लायें या न लायें लेकिन अपनी पिस्तौल या बंदूक लाना मत भूलियेगा. नृत्य-प्रतिभा में पारंगत लोगों को प्रेफेरेंस दिया जायेगा.'

चलते-चलते

ख़बर आई है कि एक समाजवादी को लोगों ने समाजवादी मानने से इनकार कर दिया है. लोगों का मानना है कि अब उसके अन्दर पर्याप्त मात्रा में कन्फ्यूजन नहीं रहा. इस समाजवादी की पार्टी ने इसे हिदायत दी है कि अगले एक महीने तक वो रोज तीन घंटे अपने अन्दर कन्फ्यूजन पैदा करने की प्रैक्टिस करे. ठीक जयप्रकाश बाबू की तरह.

Tuesday, January 15, 2008

भारत-रत्न का इतिहास- साल २००७






पिछले कुछ दिनों में भारत-रत्न नामक पुरस्कार लेने-देने की काफी चर्चा है. पता नहीं ये पुरस्कार किसे मिलेगा. लेकिन आज से सौ साल बाद अगर कोई छात्र 'भारत-रत्न का इतिहास' नामक पुस्तक पढ़ेगा तो साल २००७ के भारत-रत्न पुरस्कार के बारे में शायद ऐसा कुछ पढने को मिले. अब आए दिन हम सुनते हैं कि इतिहास की किताब में लिखी गई फला बात सच नहीं है. ऐसे में इस किताब में भी ऐसा कुछ हो सकता है जो सच नहीं हो.
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देश में मौसम बदल चुका था. अभी चुनाव का मौसम कूच कर ही रहा था कि भारत-रत्न का मौसम आ गया. सचिन, नारायण मूर्ति वगैरह की दावेदारी पर टीवी पैनल डिस्कशन का सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित हो चुका था. अभी टीवी कीर्तन शुरू ही हुआ था कि विपक्ष के तत्कालीन नेता और 'प्रधानमंत्रित्व कैंडीडेट' आडवानी जी ने सरकार को चिट्ठी लिख दी. वे चाहते थे कि उनकी पार्टी के अटल बिहारी बाजपेई जी को भारत-रत्न मिलना चाहिए. अब लेफ्ट वालों की चिट्ठी होती तो बात और थी. लेकिन बीजेपी वालों की चिट्ठी थी इसलिए सरकार ने इसे सार्वजनिक करने में देर नहीं की. बस, फिर क्या था. चिट्ठी लेखन और मीडिया संबोधन का राजनैतिक कार्यक्रम शुरू हो गया. कांशी राम जी का नाम आया तो दूसरी तरफ़ से करूणानिधि का नाम आया. ज्योति बसु का नाम भी कहाँ पीछे रहने वाला था, वो भी आया. जब सब राहत की साँस ले ही रहे थे कि और किसी नेता का नाम नहीं आएगा ठीक उसी समय महान नेता चौधरी देवीलाल का नाम आगे आया.

कुछ इतिहासकार मानते हैं कि भारत-रत्न के लिए और भी नेताओं, अभिनेताओं, अभिनेत्रियों और कलाकारों के नाम भी आए. जहाँ एक और राखी सावंत, हिमेश रेशैम्मैया और उस समय के महान गायक मीका का नाम आया वहीं दूसरी ओर सुभाष घिसिंग, रामदास अथावले और तिलंगाना पार्टी के चंद्रशेखर राव और 'कर-नाटक' के प्रसिद्ध सेकुलर नेता एच डी देवेगौडा के नाम सामने आने की अटकलें भी लगीं. साथ में उनके पुत्र एच डी कुमारस्वामी ने अपने लिए 'मिनी भारत-रत्न' की मांग भी कर डाली थी.

(नोट: कुछ इतिहासकार तो ये भी मानते हैं कि आई बी द्वारा ट्रैक किए गए संवाद के अनुसार पाकिस्तान के तत्कालीन शासक परवेज़ मुशर्रफ भी भारत-रत्न पाने की फिराक में थे. जब किसी अफसर ने उन्हें बताया कि ये पुरस्कार तो केवल भारत के नागरिकों के लिए था तो मुशर्रफ साहब ने कहा कि; भारत में किसी बाहरी आदमी के लिए राशनकार्ड बनवाना बहुत आसान था लिहाजा वे राशनकार्ड आसानी से बनवा लेते और साबित कर देते कि वे भारत के ही नागरिक थे.)

राजनैतिक कद-काठी वाले लोगों के नाम आने शुरू ही हुए थे कि वोटर जाग गया. देश के किसी शहर में रमेश वोटर ने सुरेश वोटर से पूछा; "सरकार नेता लोगों को ही क्यों भारत रत्न बनाने पर अमादा हैं?"

सुरेश वोटर ने बताया; "भारत का सारा रत्न नेताओं के कब्जे में हैं. ऐसे में कोई नेता ही भारत-रत्न बनने लायक है."

रमेश वोटर ने दूसरा सवाल दागा; "लेकिन अगर इन नेताओं को भारत-रत्न नहीं मिला तो इसका परिणाम क्या हो सकता है?"

सुरेश वोटर ने अपने ज्ञान का खुलासा करते हुए कहा; " परिणाम यही होगा कि सरकार गिर सकती है. जो पार्टियां सरकार को अपने एमपी गिफ्ट कर चुकी है वो अपना गिफ्ट वापस ले लेंगी."

रमेश वोटर के ज्ञान-चक्षु अचानक खुल गए. उसने कहा; "लेकिन एमपी लोग तो हमारे वोट से ही एमपी बनते हैं. ऐसे में ये कहाँ तक उचित है कि हमारा वोट लेकर वे अपने नेता को भारत-रत्न बनवायें. वोट हमारा और भारत-रत्न इनका, ये बात तो ठीक नहीं है."

सुरेश वोटर ने हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा; "हाँ यार, बात तो तेरी ठीक है. जब हमारा वोट है तो भारत-रत्न भी तो हमें ही मिलना चाहिए. क्यों न हमलोग भी अपना-अपना नाम भारत-रत्न के लिए सरकार को दें. क्या बोलता है? कैसा है मेरा आईडिया?"

रमेश वोटर बोला; "एक दम धाँसू आईडिया है. हम सरकार को चिट्ठी लिखेंगे कि वो हमें भारत-रत्न दे नहीं तो हम आनेवाले चुनाव में उसे वोट नहीं देंगे."

करीब दो महीने बाद भारत सरकार के सांस्कृतिक मंत्रालय से एक रिपोर्ट गृह मंत्रालय और प्रधानमंत्री कार्यालय पहुँची. रिपोर्ट में लिखा था:
ज्ञात हो कि मंत्रालय को अब तक करीब सत्तर करोड़ चिट्ठियां प्राप्त हुई हैं. देश का हर वोटर चाहता है कि उसे ही भारत-रत्न दिया जाय. सब ने सरकार को धमकी दी है कि अगर भारत-रत्न उन्हें नहीं मिला तो वे आनेवाले चुनाव में सरकार को वोट नहीं देंगे.चूंकि सरकार आनेवाले चुनाव के बाद गिरना नहीं चाहती, इसलिए सरकार ने फैसला किया है कि सरकार एक आयोग बनाएगी जो ये रिपोर्ट देगा कि इतनी भारी मात्रा में भारत-रत्न पुरस्कार का वितरण कैसे किया जाय.


ये पोस्ट मैंने कल लिखी थी. लिखने के बाद मेरे मन में विचार आया कि कहीं इस पोस्ट की वजह से ऐसा न लगे कि भारत-रत्न पुरस्कार का मजाक उड़ाया गया है. इसीलिए मैंने इस पोस्ट को पब्लिश नहीं किया. लेकिन आज के समाचार पत्रों में जिस तरह से कुछ और लोगों के नाम सामने आए, मुझे लगा कि भारत-रत्न पुरस्कार का असम्मान इनलोगों की वजह से हो रहा है. फिर भी मैं कहना चाहता हूँ कि पुरस्कार के प्रति मेरे मन में कोई असम्मान नहीं है. ऐसे पुरस्कार किसी तरह के लेख और व्यंग के ऊपर हैं. ठीक वैसे ही, जैसे राष्ट्रपति का पद.

Saturday, January 12, 2008