जीवन में हास्य के लिये हाईटेक साधनों का मुंह जोहने की जरूरत नहीं है। हास्य चहुं ओर बिखरा है| समेटने वाले चाहियें|
आजकल रामलीला प्रारम्भ होने का समय है| मैं उस विषय में अपनी अतीत की स्मृतियों को आपके सामने रख कर यह बताने का यत्न करूंगा कि टेलीवीजन युग न होने पर भी कितना सशक्त हास्य रामलीला के माध्यम से उभारा जाता था और सर्वजन उसमें कितना रस लिया करते थे| याद आने पर सोचता हूँ कि रामलीला के कामेडी ट्रैक भी गजब होते थे| लगभग हर दिन हर प्रसंग में कामेडी दिखाई देती थी| एब्सर्ड कामेडी के अनेक नमूने देखने को मिलते थे| जरा आप अवलोकन करें - सबसे पहले याद आया सीता-स्वयंवर|
"आई ऍम हियर टू मैरी सीता, डाटर आफ जनक"; एक आदमी सूट-बूट पहने, टाई बांधे, स्टेज पर आता था और आते ही अवधी उच्चारण वाली अंग्रेजी में ये संवाद दे मारता था। जनक के दरबार में बैठे लोग अचंभित हो जाते थे. सबके चहरे पर 'भाषाई-विस्मय' उभर पड़ता था. जनक के दरबार का सबसे अनुभवी अनुवादक कुछ देर तक इस आदमी से बातें करने के बाद सारे दरबारियों को बताता था कि 'ये जॉन हैं और इंग्लैण्ड से आए हैं. इन्हें भी सीता के स्वयंवर के लिए निमंत्रण पत्र भेजा गया था. ये भी धनुष तोड़कर सीता से विवाह करना चाहते हैं.' दरबार में बैठे लोग इतनी जानकारी पा लेने के बाद चहरे के विस्मय को किनारे लगा उस आदमी का अभिवादन करते थे.
इसी स्वयंवर में एक आदमी और आता था।सिर पर रेडियो का एरियल बांधे रहता था. आकर जनक के दरबारियों से बताता था कि वह आकाशवाणी में काम करता है. उसे देवताओं का रेडियो सिग्नल मिला कि सीता का स्वयंवर होने वाला है, सो वह भी अपनी किस्मत आजमाने आया है.
अद्भुत आनंद आता था जब राम-जन्म के पहले वाला एपिसोड देखते थे। राजा दशरथ शिकार करके वापस आते थे. अपने कक्ष में बैठने के बाद अचानक आईना देखते थे. आईने में ख़ुद को देखकर उन्हें पता चलता था कि उनकी दाढी के बाल सफ़ेद हो गए लेकिन उन्हें संतान नहीं हुई. सही बात है. जो राजा दिन-रात शिकार में मशगूल रहे, उसे पता भी कैसे चले कि उसकी उम्र काफी हो गई. उनकी इस हरकत से एक बात स्पष्ट हो जाती थी. तब भी लोग ख़ुद के बारे में जानने के लिए आईना ही देखते थे. उनको भी पता था कि 'जड़ दो चांदी में चाहे सोने में, आईना झूठ बोलता ही नहीं.' तो राजा दशरथ अपनी दाढी के सफ़ेद बाल देखकर अचंभित हो जाते थे. स्टेज पर ढोल और 'हरमुनिया' लेकर बैठी मंडली गाना शुरू कर देती थी...
भजु सिया रामा होइस तरह की कामेडी उस एपिसोड में भी दिखाई देती थी, जब विश्वामित्र राम और लक्ष्मण को लेकर जनकपुर के बाज़ार में जाते थे। बाज़ार में लगभग हर चीज की दुकानें सजाई जाती थीं. मिठाई से लेकर मूंगफली तक, पान से लेकर पकौड़े तक - सब कुछ बिकता था. मजा तो तब आता था जब हम एक आदमी को उसी बाज़ार में अखबार बेचते हुए देखते थे. अखबार बेचने वाला गाँव की ताज़ा ख़बर बताकर अखबार बेचता था. जिस दिन ये एपिसोड होता था उस दिन अपने गांव में हुई सारी घटनाओं के बारे में बताता था, जैसे किसके साथ किसकी मार-पीट हुई, किसकी भैंस किसके खेत में चरती हुई पाई गई. एक बार तो उसी दिन गाँव में एक बुजुर्ग के मरने की ख़बर भी अखबार वाले ने बताई और रामचन्द्र जी को अखबार बेच डाला!
रामा एक बार भूपति मन माही
भजु सिया रामा हो
हो रामा भई गलानि हमारे सुत नाही।

कॉमेडी एक एपिसोड में और दिखाई देती थी. रावण मारीच के पास जाता है और उससे सोने का हिरन बनने की गुजारिश करता है. सोपारी लाल शर्मा, हमारे गाँव के 'नाऊ ठाकुर' यानि नाई थे। बड़ा प्यारा व्यक्तित्व. मारीच का रोल करते थे. बेचारे धोती-कुर्ता और चश्मे के साथ ही अपना पार्ट कर जाते थे. मारीच को स्टेज पर सोते हुए दिखाया जाता था. रावण जब आता था तो मारीच उसकी आरती करता था. आरती के बोल भी मजेदार...
ॐ जय रावण देवाहमारे गाँव के अर्जुन सिंह मास्टर सुखेन वैद्य का रोल करते थे. वही रामलीला कमेटी के कोषाध्यक्ष भी थे. कई बार ऐसा भी होता था कि अर्जुन सिंह माईक पर गाँव वालों द्वारा दिए गए चंदे का व्योरा देते-देते ही सुखेन का रोल करने के लिए चल देते थे, वही कपडे पहने हुए.
स्वामी जय रावण देवा
आधी रात को आयो
मोरे प्राण लेवा
ॐ जय रावण देवा॥
रामलीला का एक और प्रसंग बड़ा दिलचस्प रहता था. राम का चरित्र बाक़ी के दिन कोई और करता. लेकिन जिस दिन लक्ष्मण को मेघनाद का बाण लगता, उस दिन केवल राजेंद्र पाण्डेय राम का रोल निभाते थे. कारण केवल इतना कि उस दिन राम को विलाप करना होता था और राजेंद्र पाण्डेय का गला बड़ा अच्छा था. वे अच्छा विलाप करने में माहिर थे. लक्ष्मण का सिर अपनी गोद में लिए विलाप करते थे -
भाई कोई मुझे ये बतायेरामलीला में काम करने वाले कलाकार भी कुछ कम नहीं थे. चंद्र बली मिश्र के बारे में मैंने पहले भी लिखा है कि किस तरह से मिश्र जी मौका मिलते ही संवाद के बीच में शेर बोल जाते थे. राम उजागिर दुबे दशरथ का रोल करते थे; और दशरथ मरण के बाद वही हनुमान का भी रोल करते थे. कुल मिलाकर रामलीला से मिलने वाला मनोरंजन अदभुत था.
किसने दुनिया में दुःख ऐसे पाए
किसपर यूँ बज्र भीषण गिरा है
किसका यूँ छोटा भाई मरा है
समय बदला है - तेजी से। गंवई रामलीला की बजाय टेलीवीजन चलने लगा है - तेज तेज! पर इस तेजी में कहीं वह चंहु ओर बिखरा हास्य छिप गया है। और हम लोगों के पास समय की ऐसी किल्लत हो गयी है कि उस हास्य को ढ़ूंढने की फुर्सत ही बिला गयी है।
आपके पास कुछ यादें हैं उस हास्य की? अगर हां, तो जरा बतायें!



