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Friday, October 12, 2007

गंवई रामलीला और हास्य के विभिन्न प्रसंग





जीवन में हास्य के लिये हाईटेक साधनों का मुंह जोहने की जरूरत नहीं है। हास्य चहुं ओर बिखरा है| समेटने वाले चाहियें| आजकल रामलीला प्रारम्भ होने का समय है| मैं उस विषय में अपनी अतीत की स्मृतियों को आपके सामने रख कर यह बताने का यत्न करूंगा कि टेलीवीजन युग न होने पर भी कितना सशक्त हास्य रामलीला के माध्यम से उभारा जाता था और सर्वजन उसमें कितना रस लिया करते थे| याद आने पर सोचता हूँ कि रामलीला के कामेडी ट्रैक भी गजब होते थे| लगभग हर दिन हर प्रसंग में कामेडी दिखाई देती थी| एब्सर्ड कामेडी के अनेक नमूने देखने को मिलते थे| जरा आप अवलोकन करें -

सबसे पहले याद आया सीता-स्वयंवर|

"आई ऍम हियर टू मैरी सीता, डाटर आफ जनक"; एक आदमी सूट-बूट पहने, टाई बांधे, स्टेज पर आता था और आते ही अवधी उच्चारण वाली अंग्रेजी में ये संवाद दे मारता था। जनक के दरबार में बैठे लोग अचंभित हो जाते थे. सबके चहरे पर 'भाषाई-विस्मय' उभर पड़ता था. जनक के दरबार का सबसे अनुभवी अनुवादक कुछ देर तक इस आदमी से बातें करने के बाद सारे दरबारियों को बताता था कि 'ये जॉन हैं और इंग्लैण्ड से आए हैं. इन्हें भी सीता के स्वयंवर के लिए निमंत्रण पत्र भेजा गया था. ये भी धनुष तोड़कर सीता से विवाह करना चाहते हैं.' दरबार में बैठे लोग इतनी जानकारी पा लेने के बाद चहरे के विस्मय को किनारे लगा उस आदमी का अभिवादन करते थे.

इसी स्वयंवर में एक आदमी और आता था।सिर पर रेडियो का एरियल बांधे रहता था. आकर जनक के दरबारियों से बताता था कि वह आकाशवाणी में काम करता है. उसे देवताओं का रेडियो सिग्नल मिला कि सीता का स्वयंवर होने वाला है, सो वह भी अपनी किस्मत आजमाने आया है.

अद्भुत आनंद आता था जब राम-जन्म के पहले वाला एपिसोड देखते थे। राजा दशरथ शिकार करके वापस आते थे. अपने कक्ष में बैठने के बाद अचानक आईना देखते थे. आईने में ख़ुद को देखकर उन्हें पता चलता था कि उनकी दाढी के बाल सफ़ेद हो गए लेकिन उन्हें संतान नहीं हुई. सही बात है. जो राजा दिन-रात शिकार में मशगूल रहे, उसे पता भी कैसे चले कि उसकी उम्र काफी हो गई. उनकी इस हरकत से एक बात स्पष्ट हो जाती थी. तब भी लोग ख़ुद के बारे में जानने के लिए आईना ही देखते थे. उनको भी पता था कि 'जड़ दो चांदी में चाहे सोने में, आईना झूठ बोलता ही नहीं.' तो राजा दशरथ अपनी दाढी के सफ़ेद बाल देखकर अचंभित हो जाते थे. स्टेज पर ढोल और 'हरमुनिया' लेकर बैठी मंडली गाना शुरू कर देती थी...
भजु सिया रामा हो
रामा एक बार भूपति मन माही
भजु सिया रामा हो
हो रामा भई गलानि हमारे सुत नाही।
इस तरह की कामेडी उस एपिसोड में भी दिखाई देती थी, जब विश्वामित्र राम और लक्ष्मण को लेकर जनकपुर के बाज़ार में जाते थे। बाज़ार में लगभग हर चीज की दुकानें सजाई जाती थीं. मिठाई से लेकर मूंगफली तक, पान से लेकर पकौड़े तक - सब कुछ बिकता था. मजा तो तब आता था जब हम एक आदमी को उसी बाज़ार में अखबार बेचते हुए देखते थे. अखबार बेचने वाला गाँव की ताज़ा ख़बर बताकर अखबार बेचता था. जिस दिन ये एपिसोड होता था उस दिन अपने गांव में हुई सारी घटनाओं के बारे में बताता था, जैसे किसके साथ किसकी मार-पीट हुई, किसकी भैंस किसके खेत में चरती हुई पाई गई. एक बार तो उसी दिन गाँव में एक बुजुर्ग के मरने की ख़बर भी अखबार वाले ने बताई और रामचन्द्र जी को अखबार बेच डाला!

कॉमेडी एक एपिसोड में और दिखाई देती थी. रावण मारीच के पास जाता है और उससे सोने का हिरन बनने की गुजारिश करता है. सोपारी लाल शर्मा, हमारे गाँव के 'नाऊ ठाकुर' यानि नाई थे। बड़ा प्यारा व्यक्तित्व. मारीच का रोल करते थे. बेचारे धोती-कुर्ता और चश्मे के साथ ही अपना पार्ट कर जाते थे. मारीच को स्टेज पर सोते हुए दिखाया जाता था. रावण जब आता था तो मारीच उसकी आरती करता था. आरती के बोल भी मजेदार...
ॐ जय रावण देवा
स्वामी जय रावण देवा
आधी रात को आयो
मोरे प्राण लेवा
ॐ जय रावण देवा॥
हमारे गाँव के अर्जुन सिंह मास्टर सुखेन वैद्य का रोल करते थे. वही रामलीला कमेटी के कोषाध्यक्ष भी थे. कई बार ऐसा भी होता था कि अर्जुन सिंह माईक पर गाँव वालों द्वारा दिए गए चंदे का व्योरा देते-देते ही सुखेन का रोल करने के लिए चल देते थे, वही कपडे पहने हुए.

रामलीला का एक और प्रसंग बड़ा दिलचस्प रहता था. राम का चरित्र बाक़ी के दिन कोई और करता. लेकिन जिस दिन लक्ष्मण को मेघनाद का बाण लगता, उस दिन केवल राजेंद्र पाण्डेय राम का रोल निभाते थे. कारण केवल इतना कि उस दिन राम को विलाप करना होता था और राजेंद्र पाण्डेय का गला बड़ा अच्छा था. वे अच्छा विलाप करने में माहिर थे. लक्ष्मण का सिर अपनी गोद में लिए विलाप करते थे -
भाई कोई मुझे ये बताये
किसने दुनिया में दुःख ऐसे पाए
किसपर यूँ बज्र भीषण गिरा है
किसका यूँ छोटा भाई मरा है
रामलीला में काम करने वाले कलाकार भी कुछ कम नहीं थे. चंद्र बली मिश्र के बारे में मैंने पहले भी लिखा है कि किस तरह से मिश्र जी मौका मिलते ही संवाद के बीच में शेर बोल जाते थे. राम उजागिर दुबे दशरथ का रोल करते थे; और दशरथ मरण के बाद वही हनुमान का भी रोल करते थे. कुल मिलाकर रामलीला से मिलने वाला मनोरंजन अदभुत था.

समय बदला है - तेजी से। गंवई रामलीला की बजाय टेलीवीजन चलने लगा है - तेज तेज! पर इस तेजी में कहीं वह चंहु ओर बिखरा हास्य छिप गया है। और हम लोगों के पास समय की ऐसी किल्लत हो गयी है कि उस हास्य को ढ़ूंढने की फुर्सत ही बिला गयी है।

आपके पास कुछ यादें हैं उस हास्य की? अगर हां, तो जरा बतायें!

Tuesday, October 9, 2007

हिंदी-रक्षा अभियान





तमाम संगठनों की जायज-नाजायज मांगों को मानने का सरकार का रेकॉर्ड अच्छा था। ये देखते हुए कि हिन्दी-सेवी भी संगठन बनाकर आए थे, सरकार ने उनकी माँग भी मान ली. सरकार इस बात से आश्वस्त थी कि इंसान की सेवा तो हर कोई कर सकता है लेकिन भाषा की सेवा करने की योग्यता बहुत कम लोगों में होती है. हिन्दी-सेवियों ने सरकार को बताया; " सरकार, हिन्दी केवल बोल-चाल की भाषा बनकर रह गई है. इसकी हालत बड़ी ख़राब है. इसकी ऐसी ख़राब हालत के लिए आपकी नीतियाँ भी जिम्मेदार हैं. केवल बोलने से भाषा कैसे बचेगी. हम अपने खोज से इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि अगर ऐसा ही चलता रहा तो हिन्दी ५० साल में खत्म हो जायेगी."

"लेकिन इतने सारे लोग हिन्दी बोलते हैं। हिन्दी इन्टरनेट पर भी प्रचलित हो रही है. अब तो हिन्दी में ब्लागों की संख्या भी बढ़ रही है. हिन्दी फिल्में सारी दुनिया में देखी जा रही हैं. अब तो रूस और स्पेन में भी लोग हिन्दी गानों पर नाचते हैं.", सरकार ने समझाने की कोशिश की.

"देखिए, यही बात है जिससे हिन्दी की ये दुर्दशा हुई है। आप चिट्ठे को ब्लॉग कहेंगे तो हिन्दी का विकास कैसे होगा?" हिन्दी-सेवियों ने समझाते हुए कहा.

"ठीक है ठीक है। आप हमसे क्या चाहते हैं?", सरकार ने खीझते हुए पूछा.

"सरकार हमारा सोचना है कि हिन्दी के इस्तेमाल को व्यापक बनाने के लिए हमें त्वरित कदम उठाने चाहिए। हमारी माँग है कि विज्ञानं और तकनीकी की पढाई हिन्दी में हो. सरकार का काम हिन्दी में हो. व्यापार और वाणिज्य का सारा काम हिन्दी में हो. हिन्दी को बचाने की जिम्मेदारी आज हमारे कन्धों पर है. अपने खोज से हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि अगर ऐसा हुआ तो हिन्दी बच जायेगी", हिन्दी-सेवियों ने सरकार को माँग-पूर्ण शब्दों में समझाया.

सरकार ने कहा; "ठीक है हम आपकी माँग कैबिनेट कमिटी के सामने रखेंगें। आप लोग दो महीने बाद हमसे मिलिये."

हिन्दी-सेवियों की मांगों को सरकार की कैबिनेट कमेटी के सामने रखा गया। मध्यावधि चुनावों को देखते हुए कमेटी ने सरकार को सलाह दी; "हिन्दी-भाषी क्षेत्रों में हमारे गिरते हुए वोट-बैंक को संभालना है तो हमें हिन्दी-सेवियों की इन माँगों को तुरंत मान लेना चाहिए. वैसे तो हम दिखाने के लिए भगवान् में विश्वास नहीं करते, लेकिन सच कहें तो हिन्दी-सेवियों को भगवान् ने ही हमारे पास भेजा है. हम कहेंगे कि उनकी माँगों को मान लेना चाहिए."

हिन्दी-सेवियों की माँगों को मान लिया गया। सरकार ने हुक्म दिया कि वाणिज्य और व्यापार, शिक्षा और सरकारी कामों में केवल हिन्दी का प्रयोग अनिवार्य होगा. जल्दी-जल्दी में वोट बटोरने के चक्कर में सरकार ने अपना हुक्म लागू कर दिया. ऐसा पहली बार नहीं हुआ था. ऐसा पहले भी देखा गया था कि फैसला लागू करने के बाद सरकार को मुद्दे पर बहस करने की जरूरत महसूस हुई थी. एस.ई.जेड. के मामले में ऐसा देखा जा चुका था. उद्योग घरानों को जमीन देने के बाद सरकार को याद आया कि एस.ई.जेड. को लेकर पहले एक नीति बनाने की जरूरत है.

क़रीब दो महीने बीते होंगे। नागरिकों के एक प्रतिनिधिमंडल ने प्रधानमंत्री से मुलाक़ात की. उस प्रतिनिधिमंडल में लगभग सभी क्षेत्रों के लोग थे. उनकी शिकायतों को सुनकर प्रधानमंत्री के माथे पर पसीने आ गए. प्रतिनिधिमंडल में से सबसे पहले एक बैंक मैनेजर सामने आया. बहुत दुखी था. सामने आकर और उत्तेजित हो गया. उसने बताया:

"सर जब से हमने हिन्दी में रेकॉर्ड रखने शुरू किए हैं, तब से हमें बहुत समस्या हो रही है। कल की ही बात लीजिये. हमने एक कस्टमर को अकाउंट स्टेटमेंट भेजते हुए लिखा; 'हमारे यहाँ रखे गए बही-खातों से पता चलता है कि आप हमारे बैंक के ऋणी हैं. और ऋण की रकम रुपये ५१४७५ है.' सर वह कस्टमर तुरंत बैंक में आया. बहुत तैश में था. उसने मेरी पिटाई करते हुए कहा; 'मैंने ख़ुद को कभी अपने बाप का ऋणी नहीं समझा, तुम्हारे बैंक की हिम्मत कैसे हुई ये कहने की, कि मैं तुम्हारे बैंक का ऋणी हूँ.' अब आप ही बताईये, कैसे काम करेगा कोई."
अभी बैंक मैनेजर अपनी बात बता ही रहा था कि एक महिला प्रोफेसर सामने आयी। बहुत गुस्से में थी. अपनी समस्या बताते हुए बोली;

"मेरी बात भी सुनिये. मैं फिजिक्स पढाती हूँ. जब से हिन्दी में पढ़ाना शुरू किया है, किस तरह की समस्याएं झेलनी पड़ रही हैं, कैसे बताऊँ आपको. कुछ तो ऐसी समस्याएं है कि बताते हुए भी शर्म आती है."

प्रधानमंत्री ने उन्हें ढाढस बधाते हुए कहा; "आप अपनी बात बेहिचक बताईये. क्या समस्या है आपको?" महिला प्रोफेसर बहुत गुस्से में थीं, बोलीं:

"क्या बताऊँ। क्लास में ग्रेविटी के बारे में पढ़ाना था. मैं क्लास में गई और मैंने छात्रों से कहा कि आज हम गुरुत्वाकर्षण के बारे में पढायेंगे. जानते हैं, बच्चों में खुसर-फुसर शुरू हो गयी. छात्रों ने मजाक उड़ाते हुए कहा, गुरुत्वाकर्षण माने हम गुरू के तत्वों में आकर्षण के बारे में पढेंगे. मैं गति के नियम पढाने की बात करती हूँ तो छात्र मजाक उड़ाते हुए कहते हैं कि गति के तीन प्रकार हैं, अगति, दुर्गति और सत्गति. अब आप ही बताईये, कोई कैसे पढायेगा?"
ये महिला प्रोफेसर अपनी शिकायत बता रही थी कि एक मानवाधिकार कार्यकर्त्ता सामने आया। उसने बताया;
"मुम्बई के 'भाई' लोगों ने हमारे संगठन से शिकायत की है. उनका कहना है कि जब से सरकार ने व्यापार और पेशे में हिन्दी में काम करना 'कम्पलसरी' किया है, तब से 'भाई' लोगों का व्यापार खर्च पढ़ गया है. इन लोगों के पास फ़ोन पर धमकी देने के लिए अच्छी हिन्दी बोलने वाले लोग नहीं हैं. बाहर से आदमी रेक्रूट करना पड़ रहा है. आप उनके बारे में भी जरा सोचिये. सरकार का कर्तव्य है कि वह समाज के हर वर्ग के हित के बारे में सोचे."

लगभग सभी ने अपनी शिकायत प्रधानमंत्री से दर्ज की। इन लोगों ने प्रधानमंत्री से आग्रह भी किया कि तुरंत सरकार के 'हिन्दी रक्षा अभियान' पर रोक लगाई जाय. लेकिन प्रधानमंत्री अपनी बात पर अड़े हुए थे. उन्हें आने वाले चुनावों में वोट बैंक दिखाई दे रहा था. उन्होंने लोगों के अनुरोध को ठुकरा दिया. लोग निराश होकर लौटने ही वाले थे कि प्रधानमंत्री का निजी सचिव दौड़ते हुए आया. बहुत परेशान दिख रहा था.

आते ही उसने प्रधानमंत्री से कहा; "डीएमके से सरकार की बातचीत टूट गई है. डीएमके वाले अपनी बात पर अड़े हुए थे. उनका कहना था कि अगर सरकार ने अपना हिन्दी कार्यक्रम वापस नहीं लिया तो वे सरकार से अपना समर्थन वापस ले लेंगे. सरकार का गिरना लगभग तय है."

प्रधानमंत्री ने सोचा कि चुनाव तो बाद में होंगे, पहले तो मौजूदा सरकार को बचाना जरूरी है। उन्होंने जनता के प्रतिनिधियों को रोकते हुए कहा; "हमने आप की बातें सुनी. हमें आपसे पूरी हमदर्दी है. हम अपने 'हिन्दी रक्षा अभियान' को आज ही वापस ले लेंगे."

दूसरे दिन समाचार पत्रों में ख़बर छपी; "सरकार ने समाज के हर वर्ग के प्रतिनिधियों की बात सुनने के बाद फैसला किया कि सभी कार्य-क्षेत्रों में हिन्दी में काम करने के फैसले को वापस ले लेना चाहिए क्योंकि आम जनता को वाकई बड़ी तकलीफ हो रही थी।"

हिन्दी-सेवी अब एक ऐसी सरकार के आने का इंतजार कर रहे हैं जो बहुमत में हो.


Monday, October 8, 2007

M & A : ब्लॉग जगत में क्या होगा?





Merger&Acquisition-services शिव कुमार मिश्र ने बतौर व्यंगकार अपना टेण्ट जमा लिया है। पुराणिक इससे किलकित मुदितश्च हैं. उनकी ***टोली में लोग बढ़ रहे हैं। यह सब उसी प्रकार है जैसे कई कम्पनियों का मर्जर/एक्वीजीशन/कॉंसोलिडेशन (merger/acquisition/consolidation) होता हो।

मजे की बात यह है कि दोनो आर्थिक निवेश के क्षेत्र से सम्बन्ध रखते हैं. पुराणिक स्मार्ट निवेश नामक ब्लॉग चलाते हैं और शिवकुमार मिश्र के पास मुख्य काम आर्थिक सलाहकार का है।

problogger-birthday-bash अंग्रेजी में बहुचर्चित ब्लॉग है प्रोब्लॉगर (Problogger)| यह अपनी वर्षगांठ मनाते हुये $54000 के ईनाम जो 115 स्पॉंसरों ने दिये हैं, बांट रहा है। $54000 का अर्थ है रुपये 21-22 लाख। मित्रों अगर ब्लॉगिंल से भी इतने सारे ईनाम बंट सकते हैं, तो यह जबरदस्त आर्थिक गतिविधि बन सकता है। तब इसके लिये मर्जर/एक्वीजीशन/कॉंसोलिडेशन जैसे शब्द सटीक बन जाते हैं। मुझे यह नहीं मालुम की हिन्दी ब्लॉगिंग में यह कब और कैसे होगा। पर यही है जो मेरी इस पोस्ट की कल्पना को ईन्धन प्रदान कर रहा है। (प्रोब्लॉगर की पोस्ट पर जाने के लिये बाजू के चित्र पर क्लिक करें)

ब्लॉगों की बढ़ती संख्या इस जरूरत को रेखांकित करती है कि लाइक-माइण्डेड ब्लॉगों का मर्जर/एक्वीजीशन/कॉंसोलिडेशन निकट भविष्य में एक उभरती हुयी आर्थिक सम्भावना बन जायेगी. मेरे विचार से एक टीम जिसमें एक सॉफ्टवेयर विशेषज्ञ, एक व्यंगकार, एक कवि और एक अन्य क्षेत्र का विशेषज्ञ हो; एक लीथल टीम साबित होगी। बस जरूरत यही है कि इस टीम के सदस्य पूरे तालमेल से चलें और सक्रिय हों ब्लॉगरी में। उदाहरण के लिये अगर नीरज गोस्वामी, शिवकुमार और मेरे साथ अगर एक सॉफ्टवेयर जानने वाले सज्जन जुड़ जायें और नीरज तथा शिव कुमार अपनी ब्लॉग सुषुप्तावस्था में कुछ कमी करदें तो ब्लॉगरी में दुकान बहुत जम सकती है।

मैं तो लाउड थिंकिंग कर रहा हूं। कुछ और लोग तो इस दिशा में कार्य कर ही रहे होंगे। लोगों की M&A के बारे में क्या सोच और सुगबुगाहट है - लोग बतायेंगे क्या?