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Sunday, March 15, 2015

पाप




नेता और पत्रकार एक शाम शराब पर "देश के लोकतंत्र को और मजबूत कैसे किया जाय?" नमक गंभीर प्रश्न पर चिंतन कर रहे थे. पास ही ताल ठोककर ब्लास्ट की जिम्मेदारी लेनेवाले एक आतंकवादी संगठन ने बम फोड़ दिया. दोनों भगवान को प्यारे हो गए. इधर इन दोनों ने धरती त्यागी और उधर धर्मराज का दूत दोनों को लेने आ पहुँचा. घटनास्थल पर पहुँचकर इस दूत के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा क्योंकि नेता की आत्मा से तो उसकी भेंट हो गई लेकिन पत्रकार की आत्मा आस-पास दिखाई नहीं दी. दूत ने बड़ी खोजबीन की. पत्रकार की आत्मा को आवाज़ भी लगाईं लेकिन उसकी तरफ से जवाब नहीं मिला.

परेशान होकर धर्मराज का दूत केवल नेता की आत्मा काँधे पर लादे धर्मराज के पास पहुँचा। वहाँ पहुँच जब लाई गई आत्मा की एंट्री रजिस्टर में करवा रहा था तब धर्मराज ने पूछा; "पत्रकार की आत्मा क्यों नहीं लाये? तुम्हारा काम अब आउटसोर्स करने लगे हो क्या?"

दूत बोला; "क्षमा करें धर्मराज, पत्रकार की आत्मा की मैंने बहुत खोज की लेकिन वह मिली ही नहीं. मैंने आवाज भी लगाईं थी लेकिन कोई जवाब नहीं मिला. आपको मेरी बात पर विश्वास न हो तो मैंने घटनास्थल पर जो आवाज लगाईं थी उसका खुद स्टिंग भी कर लिया है ताकि आप गुस्सा हों तो आपके सामने सबूत दे दूँ."

धर्मराज ने स्टिंग देखा. उसके बाद वे भी सोच में पड़ गए कि पत्रकार की आत्मा कहाँ गायब हो गई? वे सोच ही रहे थे कि कांख में दुनियाँ की करनी का खाता लिए चित्रगुप्त पधारे. धर्मराज को सोचते हुए देख शायद कारण भांप गए. छूटते ही बोले; "प्रभु कहीं आप उस पत्रकार की गायब आत्मा के बारे में सोचकर चिंतित तो नहीं हैं?"

धर्मराज बोले; "हाँ चित्रगुप्त, ये कैसे हुआ कि नेता की आत्मा तो दूत को मिल गई लेकिन पत्रकार की आत्मा गायब हो गई?"

चित्रगुप्त बोले; "भगवन, मेरे और मेरे खता-बही के रहते आप नाहक परेशान हो रहे हैं."

धर्मराज ने पूछा; "तो क्या तुम्हें पता है कि पत्रकार की आत्मा कहाँ है?"

चित्रगुप्त ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया; "मुझे सब पता है प्रभु. सबकी करनी का हिसाब रखता हूँ तो उनकी आत्माओं का भी हिसाब रखना ही पड़ेगा. दरअसल पत्रकार की आत्मा इस नेता की आत्मा की टेंट में है"

धर्मराज के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा. बोले; "पत्रकार की आत्मा नेता की आत्मा की टेंट में? लेकिन ऐसा हुआ कैसे चित्रगुप्त?"

चित्रगुप्त ने रहस्य खोला. बोले; "हे भगवन, वो इसलिए क्योंकि इस पत्रकार ने अपनी आत्मा इस नेता को बेंच दी थी और वर्षों से उस आत्मा का मालिक ये नेता ही था. ये देखिये इसके टेंट से मैंने पत्रकार की आत्मा निकाल ली" कहते हुए चित्रगुप्त ने नेता की आत्मा के जेब से पत्रकार की आत्मा निकालकर धर्मराज के सामने रख दिया.

उसके बाद उन्होंने नेता और पत्रकार की करनी का हिसाब करना शुरू किया।

जब हिसाब हो गया तो धर्मराज बोले; "हाँ तो क्या हिसाब निकला चित्रगुप्त?"

चित्रगुप्त बोले; "हे भगवन, जब से यह पत्रकार कार्यक्षेत्र में आया है तभी से इसने इस नेता के लिए काम किया है. इसने इस नेता और उसकी पार्टी के लिए सत्य को छिपाया है, तोड़-मरोड़ कर दिखाया है, आधा सच बोला है, पोल नहीं खोला है, इससे रुपया खाया है और झूठ फैलाया है"

धर्मराज बोले; "दोनों ने एकसाथ मिलकर पाप किया है. करोड़ों लोगों से एकसाथ सत्य छिपाने से बड़ा पाप और क्या होगा? दोनों को कम से कम अगले दस जनम तक मुक्ति नहीं मिल सकती. इन्हें मुक्ति न मिले उसके लिए जरूरी है कि ये पाप करते जाएँ. जबतक पाप करते रहेंगे, मुक्ति का इनका रास्ता कठिन होता जाएगा. इन्हें फिर से मनुष्य बनाकर पृथ्वी पर भेज दो."

चित्रगुप्त ने पूछा; "मनुष्य बनकर ये वहां तो जायेंगे ही लेकिन इनसे ऐसा कौन सा काम करवाया जाय प्रभु जिससे इनके ऊपर पाप चढ़ता रहे?"

धर्मराज बोले; "किसी बड़े मंदिर में नेता को जानवरों का व्यापारी बना दो और पत्रकार को वो पंडित बना दो जो जानवरों की बलि देता है. बाकी का काम पाप खुद कर लेगा"

चित्रगुप्त आसाम का नक्शा लिए अपने टाइपिस्ट को आर्डर.....

Monday, March 24, 2014

२०१७ में इस वर्ष के भारतीय आम चुनाव सम्बंधित संभावित विकिलीक्स




चुनावों के शुभ अवसर पर एकबार फिर से विकिलीक्स चर्चा में है. विकिलीक्स ने वक्तव्य देकर बताया कि जूलियन असांज ने हल्ला मचाने वाली कोई बात नहीं कही. इस वक्तव्य को लेकर फिर हल्ला मचा. मैं तो कहता हूँ कि चुनाव का मौसम होता ही है हल्ला मचाने के लिए. आखिर इस मौसम में हल्ला नहीं मचेगा तो कब मचेगा? पिछले कुछ वर्षों में विकिलीक्स की वजह से बहुत हल्ला-गुल्ला मचा. जिस तरह के केबिल्स लीक हुए उन्हें पढ़कर यही लगा कि दुनियाँ भर में अमेरिकी डिप्लोमैट की नियुक्त ही इसलिए हुई है ताकि वे केबिल्स लिखकर अमेरिका की विदेशनीति को मजबूत करते रहे और विकिलीक्स उन्हें पूरी दुनियाँ को परोस सके.

चूँकि चार-पाँच साल पहले भेजे गए केबिल्स अब लीक हो रहे हैं, ऐसे में साल २०१७ में विकिलीक्स जो केबल्स लीक करेगा उनमें से महत्वपूर्ण केबल्स इस वर्ष के भारतीय आम चुनाव से सम्बंधित होंगे। आज सोच रहा था कि उन केबल्स में कैसे-कैसे खुलासे हो सकते हैं? शायद कुछ ऐसे;

केबल संख्या ए-१४५७००९ चुनावों को लेकर बीजेपी की नीति;

आज शाम इंडिया हैबिटैट सेंटर में बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता ने शाम की ड्रिंक पर हमारे एक अधिकारी पीटर स्कॉट को बताया कि पार्टी मानती है कि अब एक इतिहासकार की खोज कर ही ली जाय जो पार्टी के पीएम उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की हर रैली से पहले उन्हें इतिहास का पाठ पढ़ा सके. इस नेता का मानना है कि बुद्धिजीवियों को यह चिंता सताने लगी है कि प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार अगर इतिहास को उलट-पलट कर सकता है तो सरकार बना प्रधानमंत्री बनकर वो इतिहास का न जाने क्या-क्या कर देगा। भारतीय बुद्धिजीवियों का इसबात में प्रबल विश्वास है कि पीएम कैंडिडेट को वर्त्तमान की जानकारी भले ही न हो, इतिहास कि जानकारी होनी आवश्यक है.

केबल संख्या ए-१४५९२११ चुनावों को लेकर आम आदमी पार्टी की रणनीति;

आज सुबह आम आदमी पार्टी के नेता भगवानदास ने हमारे एक डिप्लोमैट को बताया कि पार्टी के नेता अरविन्द केजरीवाल किस साइज की शर्ट पहनकर असली आम आदमी लगेंगे, इसबात को लेकर पार्टी में घमासान मचा है. केजरीवाल को चालीस यानि मीडियम साइज की शर्ट फिट होती है लेकिन वे चाहते हैं कि एक्स एक्स एल साइज की शर्ट पहनने से ही वे परफेक्ट आम आदमी लगेंगे। पार्टी कार्यकारिणी में इसको लेकर मतभेद उभरा क्योंकि कुछ नेताओं का मानना था कि वे लार्ज साइज का शर्ट पहनकर भी आम आदमी लगेंगे। काफी मान-मनौव्वल के बावजूद वे एक्स एल साइज से नीचे आने के लिए तैयार नहीं थे. ऐसे में यह फैसला हुआ कि पार्टी के नेताओं के बीच एक एस एम एस सर्वे के आधार पर फैसला लिया जाएगा कि अरविन्द केजरीवाल कौन सी साइज की शर्ट पहनेंगे?

केबल संख्या ए-१४६९०२२ चुनावों को लेकर कांग्रेस पार्टी की रणनीति;

कांग्रेस वर्किंग कमिटी ने राहुल गांधी के खिलाफ कविवर कुमार विश्वास के चुनाव लड़ने को लेकर एक गम्भीर और समग्र चिंतन किया। पार्टी के एक नेता ने कल शाम हमारी कॉकटेल पार्टी में हमारे दूतावास के दोनों अधिकारियों, ह्वाइट एंड मैक्के को बताया कि वर्किंग कमिटी यह प्रस्ताव लाना चाहती थी कि कविवर कुमार विश्वास का मुकाबला करने के लिए जरूरी हो गया है कि राहुल गांधी कविता लिखना सीख लें. कुछ सदस्यों ने इसबात पर आशंका जताई कि इतने कम समय में राहुल के लिए कवि बनना ईजी नहीं है और अगर वे कविता करना सीख भी जाते हैं तो उन कविताओं को याद करके जनता में बीच उन्हें सुनाना उनके लिए लगभग असंभव है. बाद में जनार्दन द्विवेदी ने वर्किंग कमिटी को बताया कि राहुल को कवि बनाने और उन्हें कविता रटवाने का जिम्मा वे खुद लेंगे। जनार्दन द्विवेदी वही हैं जिन्होंने सोनिया गांधी को हिंदी सिखाई है.

केबल संख्या ए-१४६९०८५ चुनावों को लेकर कांग्रेस नेताओं की रणनीति;

कांग्रेस के एक नेता ने कल शाम हमारे एक अफसर को बताया कि इस चुनाव में पार्टी की हालत को देखते हुए कुछ नेता राहुल गांधी से नाराज हैं. दरअसल इन नेताओं की नाराजगी का कारण यह है कि राहुल गांधी ने केवल देश की जनता के लिए कानून बनाये या बनाने की कोशिश की और उनका ही ध्यान रखा. ये नेता चाहते थे कि राहुल इनके लिए भी राइट टू डेफ़ेक्शन नामक कानून ले आते जो इन नेताओं को चुनाव के ऐन मौके पर दूसरी पार्टी में जाने के लिए और उकसाता। भारतीय चुनावों की यह खासबात रही है कि चुनावों के आते ही नेता यह मानकर चलता है कि उसे अपनी पार्टी से असंतुष्ट होने का अधिकार है और वह असंतोष का दिखावा करके जिस पार्टी में घुसता है उस पार्टी को उसके असंतोष को उचित मान-सम्मान देने का अधिकार है. इन्हें अपने अधिकारों का पता वर्षों से रहा है, बस वे इसे एक कानूनी कुरता पहनाना चाहते थे.

केबल संख्या ए-१४६९०९८ चुनावों को लेकर दलों की नीति;

एक चुनावी पंडित ने हमारे एक अधिकारी को बताया कि कुछ पार्टियां इसबात पर विचार कर रही है कि वे डिफेक्शन को लेकर एक आम सहमति पर पहुंचें जिससे भारतीय लोकतंत्र को मजबूती प्रदान की जा सके. इसी कड़ी में कुछ नेताओं की तरफ से यह प्रस्ताव आया कि चुनावों के अवसर पर डिफेक्शन को और सरल बनाने के लिए पार्टियां अपने-अपने बैज बनावाएं। जैसे अगर कोई कांग्रेसी, सपाई, जेडीयुवी या राजदी नेता अपनी पार्टी छोड़कर बीजेपी में जाए तो पार्टी उसे तत्काल एक बैज प्रदान करे जिसपर "राष्ट्रभक्त" लिखा हो और अगर कोई नेता बीजेपी छोड़कर इन पार्टियों में जाए तो इन पार्टियों की तरफ से उसको एक बैज मिले जिसपर "सेक्युलर" लिखा हो. पार्टियों का मानना है कि अगर ऐसा हो गया तो फिर भारतीय लोकतंत्र की मजबूती पर एक मजबूत मुहर लग जायेगी।

केबल संख्या ए-१४७११६७ चुनाव फंड को लेकर आम आदमी पार्टी का फैसला;

हमारे अफसर को आम आदमी पार्टी के एक नेता ने बताया कि चूंकि पिछले कुछ दिनों में पार्टी को जनता की तरफ से पैसा नहीं मिल रहा है इसलिए पार्टी नेता योगेन्द्र यादव ने सुझाव दिया कि क्यों न सर्दियों में अरविन्द केजरीवाल द्वारा इस्तेमाल किये मफ़लर का ऑक्शन करके पार्टी के लिए कुछ फंड इकठ्ठा किया जाय. इसी नेता ने बताया कि अरविन्द केजरीवाल को मफ़लर लपेटने का सुझाव योगेन्द्र यादव ने ही दिया था और इस प्रयोग का आईडिया उन्हें उनके खुद के ईमेज बनाने में इस्तेमाल किये गए गमछे से मिला था. फोर्ड फाउंडेशन ने पार्टी नेताओं को अस्योर किया है कि फाउंडेशन जल्द ही क्रिस्टीज या सॉथबीज से बातकर ऑक्शन कराने की तारीख तय करेगा।

केबल संख्या ए-१४७११८७ चुनाव को लेकर बीजेपी की रणनीति;

बीजेपी के एक नेता ने हाल ही में बताया कि चुनावों के लिए नरेंद्र मोदी तो पार्टी का केवल एक मुखौटा हैं. इस बात का किसी पुराने केबल से मिलना महज संयोग है. विद्वान बताते हैं कि इतिहास खुद को दोहराता है.

केबल संख्या ए-१४७११९२ चुनाव को लेकर कुमार विश्वास की रणनीति;

कुमार विश्वास के बेहद करीबी एक नेता ने बताया कि कविवर ऐसा मानते हैं कि वे राहुल गांधी के खिलाफ चुनाव लड़कर अगर जीत गए तो संसद जायेंगे ही लेकिन अगर हार भी गए तो भी चिंता की बात नहीं। वे मानते हैं कि वे हार भी गए तो राहुल गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ने का हवाला देकर वे भविष्य में होनेवाले कवि सम्मेलनों के लिए अपनी फीस करीब सवा सौ प्रतिशत बढ़ा सकेंगे।

केबल संख्या ए-१४७२३३६ अडवाणी की चिंता;

बीजेपी के एक नेता ने हमें बताया है कि अडवाणी पिछले कुछ हफ़्तों से चिंतित हैं. चिंता का कारण उन्हें मिली यह जानकारी है जिसमें पार्टी के नेता एक-दूसरे से मिलते तो है तो कहते हैं कि अडवाणी जी अब पहले वाले अडवाणी नहीं रहे. नेताओं को इसबात पर आश्चर्य है कि अडवाणी पिछले कई महीनों से नाराज नहीं हुए. इसबात को लेकर अडवाणी जी ने फैसला लिया है कि अगर उन्हें गुजरात में गांधीनगर से टिकट मिला तो वे भोपाल से चुनाव लड़ने की बात करेंगे और अगर भोपाल से टिकट मिला तो गांधीनगर से लड़ने की बात करेंगे ताकि नाराज हो सकें और पार्टी नेताओं को विश्वास हो जाए कि आडवाणी अब भी वही पुराने आडवाणी हैं और साथ ही ऐक्टिव भी हैं.

केबल संख्या ए-१४७२७७४ वामपंथी बुद्धिजीवी का विरोध;

हमारे अफसर से मुलाक़ात के दौरान एक वामपंथी बुद्धिजीवी ने बताया कि वे और उनके जैसे कई बुद्धिजीवी नया आंदोलन खड़ा करेंगे जिसके तहत अंग्रेजी साम्राज्यवाद के खिलाफ नए सिरे से लड़ाई छेड़ी जायेगी। इन बुद्धिजीवियों का मानना है कि अगर अँगरेज़ अपने साथ भारत में चाय न ले आते तो नरेंद्र मोदी इतने लोकप्रिय नहीं होते जितने वे आज हैं. जैसा कि हमने अपने केबल संख्या ए-१४४७८८१ में बताया था कि मोदी पूरे देश में चाय पर चर्चा कार्यक्रम चलाकर अपना चुनाव प्रचार कर रहे हैं.

केबल संख्या ए-१४७२८०१ चुनाव प्रचार;

केरल में एक कांग्रेसी उम्मीदवार के चुनावी मैनेजरों ने हमारे अपने देश याने यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ़ अमेरिका की सबसे बढ़िया हाइवेज में से एक कंसास हाइवे का फ़ोटो कांग्रेस के पोस्टर में लगाकर बताया कि कांग्रेस की नेता सोनिया जी के आशीर्वाद से ही यूपीए सरकार वह सड़क बनवा सकी. जहाँ कांग्रेस पार्टी ने हमारे अपने हाइवे को अपना बताया वहीँ यहाँ के सबसे बड़े स्टेट यूपी में सरकार चलानेवाली समाजवादी पार्टी के चुनाव प्रचारकों ने विक्टोरिया, ऑस्ट्रेलिया के ग्रेट एल्पाइन रोड का फ़ोटो दिखाकर यूपी की जनता को बताया कि वह रोड वहाँ के यंग चीफ मिनिस्टर अखिलेश यादव ने खुद बनवाया है. बीजेपी वालों ने न्यूजीलैंड के एक हाइवे का फ़ोटो लेकर उसे गुजरात का बता डाला। यह सब देखकर हमारे दूतावास के अधिकारी यही सोच रहे हैं कि गूगल की वजह से अब हाइवेज को कहीं से भी टेलीपोर्ट करके भारत लाया जा रहा है.

भारतीय चुनावों से रिलेटेड हमारे केबल्स हम अगले हफ्ते फिर भेजेंगे।

Tuesday, October 1, 2013

गाँधी जी थैंक यू





हर साल की तरह इस साल भी २ अक्टूबर आ ही गया. हर साल की तरह इस साल भी भाषणों की झड़ी लगेगी, टीवी पर गाँधी फिल्म दिखाई जाएगी, रेडिओ पर "दे दी हमें आज़ादी बिना खडग बिना ढाल.…." बजेगा और टीवी पर चल रहे रियलिटी शो में लोग गाँधी जी के बहाने ऐ मेरे वतन के लोगों ………….गायेंगे. ऐसे में पेश है एक नेता का भाषण जो उसने २ अक्टूबर २०१२ के दिन अपनी जनता पर चेंप दिया था. आप बांचिये.

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सभा में उपस्थित देशवासियों, आज गाँधी जी का जन्मदिन है. यह न सिर्फ गाँधी जी के लिए बल्कि हमारे लिए भी सौभाग्य की बात है कि आज यानि २ अक्टूबर को गाँधी जी का जन्मदिन है. आज अगर उनका जन्मदिन नहीं होता तो न ही हमारे लिए यह सौभाग्य की बात होती और न ही हम उनका जन्मदिन मना पाते. ऐसे में हम कह सकते हैं कि आज के दिन जन्म लेकर उन्होंने हमसब को उनका जन्मदिन मनाने का चांस दिया जिसके लिए हम उनके आभारी हैं. भाइयों, देखा जाय तो मौसम के हिसाब से भी अक्टूबर के महीने में जन्म लेकर उन्होंने हमें एक तरह से उबार लिया. फर्ज करें अगर वे मई या जून के महीने में पैदा हुए होते तो गरमी की वजह से उनके जन्मदिन पर मैं शूट नहीं पहन पाता. अब आप खुद ही सोचिये कि बिना शूट के गाँधी जी जैसे महान व्यक्ति का जन्मदिन समारोह कितना फीका लगता. सच बताऊँ तो बिना शूट के मैं गाँधी जी का जन्मदिन मना ही नहीं पाता और अगर ऐसा नहीं होता तो बहुत बड़ा नुक्सान हो जाता. मुझे भाषण देने का चांस नहीं मिलता और आपको भाषण सुनने का चांस नहीं मिलता. ऐसे में हमारी और आपकी मुलाक़ात नहीं हो पाती. और आपतो जानते ही हैं कि नेता और जनता की मुलाकात न हो तो लोकतंत्र को क्षति पहुँचती है. इससे साबित होता है कि २ अक्टूबर लोकतंत्र के लिए भी शुभ है.

इन सारे संयोंग पर गहरे से सोचें तो कह सकते हैं कि गांधी जी हमसब का थैंक्स डिजर्व करते हैं. आइये लगे हाथ हम उन्हें थैंक्स कह ही दें. मैं कहूँगा गांधी जी और आपसब एक स्वर में कहेंगे थैंक यू.

गांधी जी
थैंक यू

गाँधी जी
थैंक यू

भाइयों, आपका तो नहीं पता लेकिन हमें बचपन से ही सिखाया गया कि हमें गांधीजी के रस्ते पर चलना है. हमारे पिताजी ने तो हमें यह सीख चार वर्ष की उम्र में ही दे दी थी कि हमें गाँधीजी के रस्ते पर चलने की जरूरत है. यह मैं आपको तब की बात बता रहा हूँ जब वे अपने एरिया के म्यूनिसिपल काउंसिलर थे. मुझे अच्छी तरह से याद है उन्होंने म्यूनिसिपल कारपोरेशन में संघर्ष करके हमारे मोहल्ले में पाँच सौ मीटर की एक सड़क बनवाई और उसका नाम गाँधी जी के नाम पर एम जी रोड रखा. मैं और मेरा छोटा भाई दोनों उस रोड पर चलकर स्कूल जाते थे. बाद में जब पिताजी ने म्यूनिसिपल कारपोरेशन में मेयर का पद हथिया लिया तब हम दोनों भाई उनकी आफिसियल कार में बैठकर उसी एम जी रोड के ऊपर से जाते थे. वैसे मोहल्ले के कुछ दुष्ट लोगों ने कानाफूसी करके यह बात फैला दी थी कि चूंकि मेरे दादाजी का नाम मुकुंदीलाल गुप्ता था इसलिए पिताजी ने रोड का नाम एम जी रोड रखा था. पिताजी और भगवान को पता है कि यह सच नहीं है.

भाइयों, आप खुद देखें कि अपने पिताजी के पढाये पाठ पर हम कितनी छोटी उम्र से अमल कर रहे हैं.

भाइयों, यह तो हुई मेरे पिताजी और मेरी बात. लेकिन आपलोग उनके रस्ते पर चलें उसके लिए सबसे पहले जरूरत है कि आप गाँधी जी के बारे में जानें. आखिर उनके बारे में बिना जाने आप उनके रस्ते पर कैसे चलेंगे? इसलिए मैं अब आपको गाँधी जी के बारे में बताता हूँ. भाइयों, गांधी जी ने वकालत की पढाई की थी जिससे वे वकील बन सकें. आप पूछ सकते हैं वे डॉक्टर या इंजिनियर क्यों नहीं बने? तो इसका जवाब यह है कि उन दिनों वकालत में जितना पैसा था, उतना डाक्टरी में नहीं था. दूसरी बात कह सकते हैं कि वकालत करना उस ज़माने में फैशन की तरह था. ऊपर से गाँधी जी इंटेलिजेंट थे और उनको पता था वकालत में बहुत पैसा था. भाइयों, वकालत में पैसा था तभी गांधी जी उस जमाने में फर्स्ट क्लास में चलते थे.

भाइयों, वकील बनकर उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में अपनी प्रैक्टिस शुरू की. वही दक्षिण अफ़्रीका जहाँ के हैन्सी क्रोनिये थे. हैन्सी क्रोनिये से याद आया कि जब मैं क्रिकेट बोर्ड का अध्यक्ष था तब एकबार दक्षिण अफ्रीकी टीम भारत के दौरे पर आई और मुझे हैन्सी क्रोनिये से मुलाकात करने का सौभाग्य प्राप्त …… (पब्लिक शोर करती हैं)

अच्छा अच्छा मैं मुद्दे पर आता हूँ. मैं जरा अलग लैन पर चला गया था. नहीं.. नहीं.. ऐसा न कहें, मैंने सोचा कि मैं आपसे अपना अनुभव बाटूंगा तो आपलोगों को प्रेरणा मिलेगी. वैसे आप चाहते हैं तो मैं वापस मुद्दे पर आता हूँ. तो भाइयों मैं कह रहा था कि गाँधी जी ने दक्षिण अफ्रीका में अपनी वकालत की प्रैक्टिस शुरू की. आप तो जानते ही हैं कि दक्षिणी अफ्रीका सोने की खानों के लिए प्रसिद्द है. इसीलिए मैंने गाँधी जी से प्रेरणा ली और आज आप खुद ही देखिये कि सोना मुझे कितना प्रिय है. मैं न सिर्फ सोना पहनता हूँ बल्कि संसद में भी सोने का कोई चांस हाथ से जाने नहीं देता.

भाइयों दक्षिणी अफ्रीका की बात चली हैं तो मैं आपको गांधी जी से संबंधित एक संस्मरण सुनाता हूँ. गाँधी जी हमेशा फर्स्ट क्लास में ही सफ़र करते थे. पैसे की कोई कमी तो थी नहीं उनको. तो एकबार वे फर्स्ट क्लास में बैठे कहीं जा रहे थे तो हुआ क्या कि वहां के एक अँगरेज़ टीटी ने उन्हें डिब्बे से बाहर फेंक दिया. मुझे पता है आपके मन में यह उत्सुकता होगी कि उस टीटी ने गाँधी जी को डिब्बे से बाहर कैसे फेंका? तो मैं कहना चाहूँगा कि जिन्होंने गाँधी फिल्म देखी है उन्हें तो पता होगा ही कि उस टीटी ने गाँधी जी को डिब्बे के बाहर कैसे फेंका था लेकिन जिन्होंने वह फिल्म नहीं देखी है उनके लिए मैं बताता चलूँ कि उस टीटी ने उन्हें वैसे ही फेंका जैसे हमलोग कई बार इमरजेंसी पड़ने पर फर्स्ट क्लास या सेकंड क्लास के यात्रियों को डिब्बे से बाहर फेंक देते हैं. अब देखिये हमने इतना बता दिया. जो नहीं बताया वो आपलोग कल्पना कर लीजिये.

तो मैं कह रहा था कि उस अँगरेज़ टीटी ने गाँधी जी को डब्बे से बाहर फेंक दिया. सच तो ये है कि उन दिनों वहां अंग्रेजों का राज था. और अँगरेज़ बहुत ख़राब होते थे. बहुत ख़राब माने बहुत खराब. लेकिन इसका मतलब क्या वे कुछ भी करते और गाँधी जी बर्दाश्त कर लेते? कदापि नहीं. अब वे अगर गाँधी जी को डिब्बे से बाहर फेंकेंगे तो क्या गाँधी जी चुप रहते? क्यों चुप रहते? क्या कोई विदाउट टिकेट चल रहे थे जो चुप रहते? बस जब टीटी ने उन्हें बाहर फेंका उसी दिन से गाँधी जी का अंग्रेजों से लफड़ा शुरू हो गया. उन्होंने उसी दिन कसम खाई कि वे अंग्रेजों को भारत में नहीं रहने देंगे. उनको पता था कि जो अँगरेज़ दक्षिण अफ्रीका में राज करते थे वहीँ अँगरेज़ भारत में भी राज करते थे. फिर क्या था, अंग्रेजों से बदला लेने के लिए वे भारत वापस आ गए. भारत आकर उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया. जाकर उनसे सीधा-सीधा कह दिया कि अंग्रेजों भारत छोड़ दो. अँगरेजों ने आना-कानी तो की लेकिन गाँधी जी भी कहाँ छोड़ने वाले थे? उन्होंने उनको भारत से भगा कर ही दम लिया. वो गाना तो सुना ही होगा आपने. अरे वही जो आज के दिन खूब बजता है. अरे वही बस मुंह में है याद नहीं ……हाँ, याद आ गया. वो गाना था न कि दे दी हमें आजादी बिना खडग बिना ढाल साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल.

मुझे पता है आपके मन में सवाल उठा रहा होगा कि ये साबरमती का संत कौन है? तो मैं आपको बता ही देता हूँ कि ये और कोई नहीं खुद गाँधी जी ही थे. वो क्या था कि साबरमती में ही उनका आश्रम था और आपतो जानते ही हैं कि आश्रम में संत रहते हैं इसलिए उनको साबरमती का संत कहा जाता है.

भाइयों, अब मैं आपको गांधी जी से सम्बंधित अन्य पहलुओं के बारे में बताता हूँ. आपको जानकर हैरानी होगी कि उनको बंदरों से बहुत प्यार था. आपके मन में बात आती होगी कि बन्दर भी कोई प्यार करने की चीज हैं? तो इसका जवाब मैं ये दूंगा कि दरअसल गाँधी जी श्री रामचन्द्र से बहुत प्रभावित थे इसलिए वे कई बार न सिर्फ रामराज की बात करते थे बल्कि वे श्री रामचन्द्र जी की तरह ही बंदरों से प्यार भी करते थे. सच तो ये हैं कि उन्हें बंदरों से उतना ही प्यार था जितना आजकल हम कुत्तों, गधों वगैरह से करते हैं.

आप पूछ सकते हैं कि गाँधी जी को बन्दर ही प्रिय क्यों थे? हमारी तरह उन्हें कुत्ते या गधे प्रिय क्यों नहीं थे? भाइयों, इस सवाल का जवाब जानने के लिए आपको थोडा इतिहास की पढाई करनी पड़ेगी. लेकिन चूँकि पढाई करने के लिए आपका साक्षर होना जरूरी है और हमने आपको साक्षर होने नहीं दिया इसलिए हमारी जिम्मेदारी बनती है कि हम आपको बताएं कि इतिहास में क्या लिखा गया गया है या फिर गाँधी जी के इस पहलू को लेकर इतिहासकार क्या कहते हैं? क्या विचार रखते हैं? तो भाइयों वैसे तो इतिहासकारों में इसको लेकर भिन्न-भिन्न मत हैं लेकिन ज्यादातर इतिहासकार यह मानते हैं कि उन दिनों देश के कुत्तों और गधों पर राजाओं और नवाबों का कब्ज़ा था. उन लोगों ने ही सारे कुत्तों और गंधों को पाल रखा था.

ऐसे में गाँधी जी ने बंदरों को चुना. आप ने देखा भी होगा कि उनके तीन बन्दर थे जो अपना कान, मुंह और आँख बंद रखते थे. भाइयों, वैसे तो बहुत लोग इन बंदरों से बहुत इम्प्रेस्ड रहते हैं लेकिन मैं आपको अपना पर्सनल विचार बताऊँ तो मुझे ये तीनों बन्दर कोई बहुत इम्प्रेसिव नहीं लगे. मैं पूछता हूँ कि जब भगवान ने आँख, कान, मुंह वगैरह दिए हैं तब उनको बंद रखने का क्या तुक है? मैं पूछता हूँ कि खुला रखने में कौन सा पैसा खर्च हो जाता? ऊपर से अगर आप साइंस के लिहाज से देखें तो वैज्ञानिक बताते हैं कि अगर अंगों का इस्तेमाल न हो तो उनके नष्ट हो जाने का भय रहता है. अब इन सब बातों को देखा जाय तो ये बन्दर सच में कोई इम्प्रेसिव बन्दर नहीं थे.

भाइयों, वैसे तो गाँधी जी महान थे लेकिन एक बात में वे कच्चे थे. वे अपने बेटों को आगे नहीं बढ़ा सके. देखा जाय तो एक पिता का असली कर्त्तव्य नहीं निभा सके. आप तो जानते ही हैं कि वे राष्ट्रपिता थे. मतलब भारत उनका था. ऐसे में उन्हें चाहिए था कि वे अपने बेटों को, पोतों को आगे बढाते. उन्हें प्रेजिडेंट, प्राइम मिनिस्टर, मिनिस्टर बनाते. लेकिन वे ऐसा नहीं कर पाए. मैं पूछता हूँ कि एक पिता का कर्त्तव्य क्या केवल अपने बच्चों का लालन पालन ही होता है? क्या पिता का यह कर्त्तव्य नहीं कि वह उसे पद दिलाये? अपने प्रभाव से जमीन का प्लाट दिला दे? कोई कंपनी खोल दे? यह सब वे नहीं कर सके तो यही एक बात है जहाँ वे न सिर्फ कच्चे साबित हुए बल्कि हमलोगों से पीछे रह गए. आखिर बच्चों का भला करना एक पिता का कर्त्तव्य है. आज मुझे ही देख लीजिये. मैं खुद केन्द्रीय मंत्री हूँ. मेरा एक बेटा सांसद है. दूसरा बेटा स्टेट कैबिनेट में है. उसका बेटा अपने शहर का मेयर …… भाइयों अब आप ही बताइए, इस मामले में हम बड़े कि वे?

फिर मैं यह सोचकर संतोष कर लेता हूँ भाइयों कि मैं भी तो उन्ही की संतान हूँ. अरे जो राष्ट्रपिता है उसकी संतान तो उस राष्ट्र का एक-एक नागरिक है. अब मैं आगे बढ़कर नेता बन गया तो समझ लीजिये कि उन्होंने मुझे आशीर्वाद दिया. आप वहीँ रह कर जनता बने रहे तो समझ लीजिये कि उन्होंने आपको आशीर्वाद नहीं दिया. सब आशीर्वाद का खेल है. मुझे तो गाँधी जी के अलावा मेरे पूज्यनीय पिताजी का भी आशीर्वाद प्राप्त था.

भाइयों, गाँधी जी तो महान थे. इतने महान थे कि उनकी गाथा का कोई अंत नहीं है. खुद मैं पिछले चालीस साल से आज के दिन उनके बारे में भाषण देता आ रहा हूँ लेकिन हर साल मुझे लगता है कि अभी कितना कुछ है उनके बारे में कहने को. हर साल मुझे सुनाने में मज़ा आता है और आपको सुनने में. इसका एक फायदा यह है कि उनकी गाथा पीढ़ी दर पीढ़ी चलती जा रही है. मुझे आशा है कि अगले वर्ष भी हमलोग इसी मैदान में मिलेंगे और मैं आपको उनके बारे में और बहुत सारी बातें बताऊँगा. तबतक चांस यह है कि मैं गृहराज्य मंत्री से प्रमोट होकर कोल मिनिस्ट्री में चला जाऊं. आजकल सबसे मलाईदार मिनिस्ट्री वही है. मैं कोयला मंत्री बन गया तो फिर गाँधी जी के बारे में कहानियां सुनाने का मजा और आएगा. भाइयों, कहानी जितनी पुरानी हो, उतनी मज़ा देती है. इसलिए मैं अपने इस वादे के साथ कि अगले साल इसी मैदान आपको फिर से कहानी सुनाऊंगा, आपसे विदा लेता हूँ.

तबतक के लिए बोलो गाँधी जी की जय!


डिस्क्लेमर: मैंने गाँधी-जयंती पर एक नेता का भाषण साल २००८ में लिखा था. अब आप नेताओं के स्पीच राइटर्स को तो जानते ही हैं. किसी ने उस नेता के भाषण को ब्लॉग से कॉपी कर के थोड़ी-बहुत हेर-फेर करके अपने मंत्री को दे दिया और उस मंत्री ने यह भाषण अपनी जनता पर २ अक्टूबर २०१२ के दिन चेंप दिया. यह वही भाषण है. यह डिस्क्लेमर मैंने उन लोगों के लिए लिखा है जिन्होंने २००८ वाला भाषण पढ़ रक्खा है:-)



Friday, July 26, 2013

आइये बवाल काटें




बवाल काटने के दिन हैं. जिसको जब इच्छा हो वह बवाल काट सकता है. उधर पैंसठ सांसदों ने अमेरिकी राष्ट्रपति को चिट्ठी लिखकर नरेन्द्र मोदी को वीजा न देने का बवाल उठाया. बवाल उठा तो उन्हें पता चला कि लोग मीर जाफर और जयचंद को याद करने लगे. ऐसे में जरूरी था कि कुछ ऐसा कहा जाय जिससे लोग किसी और को याद करने लगें. इसी प्रयास के तहत राज बब्बर, रशीद मसूद और फारुख अब्दुल्ला ने क्रमशः १२ रूपये, ५ रूपये और १ रूपये में लोगों को खाने की थाली परोस दी. नया बवाल खड़ा हुआ. लोगों ने जयचंद वगैरह को भुलाकर फ्रांस की रानी साहिबा मारिया एंटोनिया को याद करना शुरू कर दिया. कुछ न्यूज़ चैनल्स की चाँदी और कुछ का सोना हो गया.

ऐसे में हमारे ब्लॉग संवाददाता चंदू चौरसिया ने इस मुद्दे पर तमाम लोगों के विचार इकठ्ठा किये. पेश है उन्ही विचारों से कुछ चुने हुए विचार. आप बांचिये.


लालू जी; "का मिलता है पाँच रुपिया में? ई देश के बुरबक बना रहा है लोग. आ ऊ बोल दिया अउर तुमलोग भी उसको लेकर बतियाने लगा. आज का ज़माना में मंहगाई जइसा बढ़ा है, पाँच रुपिया में त गाय का एक बखत का चारा नै मिलेगा आ ई लोग आदमी का चारा … कहने का मतलब आदमी का खाना का बात कर रहा है सब? सरकार अपना तरफ से कुछ देगा तब न मिलेगा जी? बाकी हमारा सरकार आया त हम दू रुपिया में खाना देंगे पब्लिक सब को. गरीब-गुरबा, माइनोरिटी भाई लोग के, वोमेन चिल्ड्रेन एंड भीकर सेक्शन आफ़ द सोसाइटी को खाली हमारा सरकार जो है सो दू रुपिया में खाना देगी …. अरे बीच में मत टोको … आ इधर देखो इधर … ई केतना अंगुली दिखाई दे रहा है? है न दू गो? त हमको कांग्रेस का नेता सब पर शक है बाकी हमारा सरकार एही दू रुपिया में पेटभर के खान देगा …. "

अमिताभ बच्चन; "देखिये हम नेता नहीं हैं. हम ठहरे अभिनेता. लोग बारह रुपया में खाना क्यों खाना चाहते हैं जब वे कौन बनेगा करोड़पति पर आकर पाँच करोड़ जीत सकते हैं? तो फिर फ़ोन उठाइये … और चंदू जी, आप भी पांच करोड़ जीत सकते हैं. क्योंकि बारह रूपये या पाँच रूपये में भोजन मिले या न मिले, लेकिन आपका ज्ञान जो है बस वही आपको ढंग का भोजन खिला सकता है. वैसे इस बारह रूपये वाले बयान पर मुझे पूजनीय बाबूजी की मधुशाला की एक रुबाई याद आ रही है. उन्होंने लिखा था;

बारह रुपये रख पॉकेट में निकला है खानेवाला
पस्त हो गया, नहीं मिला उसको फिर भी भोजन आला
बारह घंटे बीत चुके हैं, भूख गई, अब प्यास गई
इन रुपयों को खर्च करेगा अब जाकर वह मधुशाला


मुलायम सिंह जी; "अखियेश से जो है हमयें पूछा कि किसी अफसअ से पता लगाकअ बताएं कि बाअह में खाआं मिअ सकता ऐ? अखियेश एं बताआ कि नई मिएगा. राअ बब्बअ जब समाअवादी पाअटी में थे तो केवअ अमअ सिंअं जी के खिआफ़ बोअते थे कांगेस में गए ऐं तो पब्बइक के खिआफ बोअ अहे ऐं. केंद सअकाअ के लोग जनता से कट गए ऐं. ऐसा कएंगे तो संपदाइक शक्तिओं को बहावा मिएगा. हमाआ समअथन इस सअकाअ को सांपदाइक शक्तिओं को ओकने के लिए अहेगा "

भाग मिल्खा भाग वाले मिल्खा सिंह जी; "हम अभी बात नहीं कर सकते. हमसे हमारे डायरेक्टर राकेश ओमप्रकाश मेहरा जी ने कहा कि भाग मिल्खा भाग और जाकर देख कि कहाँ बारह रूपये में भोजन मिल रहा है? उन्होंने मुझे चार रूपये पानी के लिए एक्स्ट्रा दिए और अब हम सोलह रूपये लेकर पूरे इंडिया में भाग रहे हैं. यह जानने के लिए इन रुपयों में कहाँ भोजन और पानी मिलेगा? मैंने इसीलिए जर्सी भी सोलह नंबर की पहन रखी है और जर्सी पर लिखा इंडिया यह बता रहा है कि हमें वह जगह पूरे इंडिया में भागकर देखना है. परसों मिलोगे तब हम बता पाएंगे कि वह ढाबा मिला या नहीं."

बरखा दत्त जी ; "टू से दैट वन कैन गेट अ मील फॉर ट्वेल्व रुपीज वाज सर्टेनली ऐन एरर ऑफ़ जजमेंट ह्विच राज बब्बर डिड नॉट रियेलाइज. हाउएवर आई ऐम स्योर दिस इज नॉट ऐन ऑफिसियल स्टैंड ऑफ़ द कांग्रेस पार्टी एंड वी गिव इट अ बेनिफिट ऑफ़ डाऊट हीयर "

मिथुन दा; "राज बब्बर के बयान पर मैं कहूँगा; क्या बात! क्या बात! क्या बात!

संजय झा; "मैं राज बब्बर के बयान पर कुछ नहीं कहना चाहूँगा. जरूर उनका कोई फेवरिट रेस्टोरेंट होगा जिसमें बारह रूपये में खाना मिलता होगा. वे झूठ नहीं बोल सकते. वे तो क्या कोई कांग्रेसी कभी झूठ नहीं बोलता. हाँ, मैं रशीद मसूद के बयान पर जरूर कहूँगा कि बारह रूपये में खाना मिले या न मिले पाँच रूपये में खाना पक्का मिलेगा क्योंकि पंजे में पाँच अंगुलियाँ होती हैं. आप तो देख ही रहे हैं कि मेरे पीछे मेरी पार्टी का हाथ है. वैसे मैं यहाँ आपको डेल कार्नेगी का एक प्रसिद्द कोट बताना चाहूँगा. डेल ने कहा था ; हैपीनेस डजन्ट डिपेंड ऑन एनी एक्सटर्नल कंडीशंस. इट इज गवर्रन्ड बाई आवर मेंटल ऐटीच्यूड. डेल और मेरे कहने का मतलब है कि खुश होने के लिए खाने की क्या जरूरत है? अगर आप आप अपने मन में सोच लें कि आपने खाना खा लिया है तो फिर आपको पाँच रूपये खर्च करने की जरूरत नहीं. अब जो लोग यह रहस्य समझ जायेंगे उन्हें किसी भोजन से क्या लेना-देना?"

नितीश कुमार जी; "आ पाँच रुपया वाला आदमी त स्पेशल स्टेटस का हकदार हो जाता है. आप हमारे बिहार को ही ले लें. हमारे इहाँ त बिना पइसा के ही मिड डे मील मिलता है. त जब बिना खर्च किये ही भोजन मिल रहा है त ई पाँच रुपया या बारह रुपया पर बहस जो है ऊ बेमानी है. और देखने वाली बात यह है कि ये सब बात बोल कौन है? तीनो लीडर सेक्युलर हैं. आ सेक्युलर कभी गलत बोल ही नहीं सकता."

रॉबर्ट वाड्रा ; "इफ यू हैव प्रॉपर चैनल, यू कैन बाई टू बनानाज फॉर फ़ाइव रुपीज. एंड ह्वाट वुड बी बेटर फ़ूड दैन बनाना इन अ बनाना रिपब्लिक? रशीद मसूद इज राईट."

राहुल गाँधी; "यूथ कांग्रेस ने मुझे बताया है कि बारह रूपये में चार किलो आलू मिलता है. और क्या चाहिए आपको? चार किलो आलू आप चार दिन तक खा कर भी ख़तम नहीं कर सकते. मुझे तो लगता है कि राज बब्बर ने जो कुछ भी कहा है वह सही कहा है. और अब हम डायरेक्ट आलू ट्रान्सफर प्रोग्राम ला रहे हैं. जिसके पास भी आधार कार्ड है उसके आलू अकाउंट में रोज सुबह चार किलो आलू डायरेक्टली ट्रान्सफर हो जायेगा. इससे यह होगा कि जिसका आलू है वह उसके पास पहुंचेगा और बिचौलिये उसमें से कुछ भी नहीं ले सकेंगे. अभी परसों मैंने पार्टी प्रवक्ताओं को बताया कि अगर यह डायरेक्ट आलू ट्रान्सफर प्रोग्राम सक्सेसफुली लागू कर लेते हैं तो अगला तीन चुनाव जीत सकते हैं."

चन्दन मित्रा; "राज बब्बर का यह बयान भारत के गरीबों का अपमान है. बीजेपी २०१४ में चुनाव जीत जाएगी तो हमलोग उनको मिला हर अवार्ड वापस ले लेंगे."

अडवाणी जी; "देखें इतने महत्वपूर्ण मुद्दे पर मैं कुछ कह नहीं सकता. इसपर कल मैं एक ब्लॉग पोस्ट लिखूंगा. आप मेरे विचार वहीँ से ले लीजियेगा."

योगेन्द्र यादव; "मैं हमेशा से कार्टूनों के द्वारा फ्री स्पीच का हिमायती रहा हूँ. जिन्होंने जो बयान दिया है वह देने का उनका अधिकार उनसे कोई छीन नहीं सकता. जहाँ तक मेरी पार्टी के स्टैंड का सवाल है तो मैं यही कहना चाहूँगा कि बारह रूपये में एक फ्रूटी भी नहीं आती जिसे पीकर हमारे नेता अरविन्द केजरीवाल अनशन तोड़ सकें. अब आ जाते हैं इन बयानों से होने वाले फायदे और नुक्सान पर. मेरा मानना है कि आनेवाले विधानसभा चुनावों में इन बयानों का असर साफ़ दिखाई देगा. राज बब्बर के बारह रूपये वाले बयान से निश्चित तौर पर कांग्रेस को यादवों और कुर्मियों के वोट कम मिलेंगे. राजपूत वोट की जहाँ तक बात है वह बंटने के आसार हैं. अगर राज बब्बर ने पाँच रुपया कहा होता तो कांग्रेस को ब्राह्मणों का वोट मिलता क्योंकि ब्राह्मण पांच की संख्या को शुभ मानते हैं. जहाँ तक दलितों का सवाल है तो मुझे लगता है कि दलित मायावती को ही वोट देंगे."

दिग्विजय सिंह; "हिंदुस्तान के कोने-कोने से लोगों ने मुझे फोन करके बताया कि बारह रूपये में बहुत अच्छा भोजन मिलता है. अगर कहीं न मिलता हो तो समझ जाइये कि उस जगह पर आरएसएस वालों ने साजिश के तहत खाने को मंहगा कर दिया होगा. जैसे मैं बटला हाउस पर अपने बयान पर कायम हूँ वैसे ही राज बब्बर के बयां पर भी कायम हूँ."

मायावती जी; "राज बब्बर का बयान दलितों के खिलाफ है. बारह रूपये में खाने की जहाँ तक बात है तो वह कहीं नहीं मिलेगा. ये देखिये मेरे हार तक में एक भी नोट दस रूपये का नहीं है. सारे हज़ार के नोट हैं. इसलिए मुझे लगता है कि खाना हज़ार रूपये में ही मिल सकता है."

अरनब गोस्वामी; "तमाम रिकार्ड्स, रेट-चार्ट, एक्सपर्ट्स ओपिनियन, बयान पढने के बाद और हमारी पोलिटिकल एडिटर नाबिका से सलाह लेने के बाद अदालत इस नतीजे पर पहुंची है कि बीजेपी भी इन बयानों के लिए उतनी ही जिम्मेदार है जितना कांग्रेस के नेता राज बब्बर, रशीद मसूद और फारुख अब्दुल्ला हैं. अदालत पोलिटिकल पार्टीज को यह सलाह भी देती है कि इन मुद्दों को पोलिटिसाइज न किया जाय और न ही अदालत ऐसा होने देगी. और चूंकि आज न्यूज़-आवर पर राज बब्बर नहीं आये और बिकॉज नेशन वांट्स टू नो द ट्रुथ, हम इस मुद्दे पर तबतक न्यूज-आवर करते रहेंगे जबतक कोई और मुद्दा ……"

Wednesday, June 26, 2013

भारतीय राजनीति का शेरकाल




नेताजी जी गठबंधन टूटने की ब्रेकिंग न्यूज दान में देते हुए पत्रकारों से बोले; "ऊ लोग त दवा देते मरने की, आ दुआ देते हैं जीने की।"

पत्रकार लोग उन्हें लगातार देखे जा रहे थे। शायद इस आशा के साथ की वे शेर की दूसरी लाइन भी बोलेंगे जो शायद "टीने की" या फिर "पीने की" पर आ रुके। खैर, ऐसा हुआ नहीं और पत्रकार लोग निराश हो गए। कईयों ने अपनी रपट में लिखा तो नहीं लेकिन मन ही मन जरूर सोचा होगा कि कैसा नेता है जो शेर भी पूरा नहीं करता? जो नेता पत्रकारों के सामने शेर पूरा नहीं कर सकता वह जनता को किया गया वादा कैसे निभाएगा? जो पत्रकारों का नहीं हुआ वह जनता का क्या होगा? अगर यही हाल रहा तो न ही पालिटिक्स मजबूत रहेगी और न ही सेकुलरिज्म। क्या होगा इस देश का? आखिर आज पॉलिटिक्स में शेर के अलावा बचा ही क्या है जिसे थाम के रक्खेगा ये नेता?

वैसे देखा जाय तो इसमें पत्रकारों की भी क्या गलती है? नेता कहीं भी जाता है तो शेर से लैस होकर जाता है। पार्लियामेंट में बजट पढ़ रहा है तो टैक्स का प्रपोजल देते हुए शेर दे मारता है। टैक्स रिबेट अबोलिस कर रहा है उसपर भी शेर बक डालता है। नया गठबंधन बना रहा होता है तो उसके जस्टिफिकेशन के सवाल को शेर मारकर धरासाई कर डालता है। किसी दूसरे नेता की प्रशंसा करना चाहता है तो उसपर शेर कुर्बान कर देता है। किसी नेता की बुराई करनी हो तब भी एक शेर पिला देता है। संसद में घोटाले की बात होती है तो उसका जवाब शेर से देता है। स्कैम पर शेर, कैम पर शेर।

उधर विपक्ष का नेता भी शेर का जवाब देने के लिए शेर ठोंक देता है। प्रेस कांफ्रेंस की शुरुआत शेर से करता है। प्रेस कांफ्रेंस के बीच में शेर भर देता है। प्रेस कांफ्रेंस का अंत शेर से कर देता है। पिछले कई वर्षों से शेर ही भारतीय नेताओं का कवच-कुंडल बना हुआ है।

कुल मिलकर कहा जा सकता है कि फिलहाल भारतीय राजनीति का शेरकाल चल रहा है।

कई बार सोचता हूँ कि मंत्री जी संसद में प्रश्नकाल के लिए तैयारी करते हुए अपने पीए से बोलते होंगे; "अरे भाई, आज संसद में सड़क घोटाले पर प्रश्न का जवाब देना है। आंकड़ों के साथ शेर वाले पेज रक्खे या नहीं?"

पीए बोलेगा; "सर, मैंने ग़ालिब के तीन शेर चुने थे। आप उन्हें देख लेते तो ठीक रहता। अगर आपको पसंद न हों तो फिर मीर के शेर चुनकर रख देता। मैं मीर का दीवान साथ ही लाया हूँ। कोई टेंशन की बात नहीं है, बस मुझे पंद्रह मिनट लगेंगे।"

पीए की बात सुनकर मंत्री जी कहेंगे; "अरे, ये मीर और ग़ालिब के शेर समझने में मुश्किल होती है। ऐसा शेर दो जो मुझे भी समझ में आये और विपक्षी सांसद को भी।"

पीए बोलेगा; "सर, फिर तो मेरा सुझाव है कि बशीर बद्र साहब के शेर इसके लिए उपयुक्त रहेंगे। उनका लिखा समझ में आ जाता है। अपने शेर सलाहकार राशिद साहब भी यही कह रहे थे।"

मंत्री जी हाँ कर देंगे और पीए नए शेर चुनने निकल जाएगा। यह हिदायत देते हुए कि; "सर, आप पिछले दो प्रश्नकाल के दौरान "मैं तो दरिया हूँ मुझे अपना हुनर मालूम है, जिस तरफ से चल पडूँगा रास्ता हो जायेगा" कह चुके है। इसलिए इसको इसबार मत कहियेगा क्योंकि अमर सिंह ये दो लाइनें इतनी बार बोल चुके हैं कि कुछ लोग समझते हैं कि ये उन्ही का शेर है।"

हाल यह है कि प्रधानमंत्री, मंत्री और सांसद ही नहीं, राजनीतिक दलों के प्रवक्ता भी जब-तब शेर ठेलते रहते हैं। कोई सी एम पार्टी अध्यक्ष से नाराज है या नहीं इसका जवाब शेर से देते हैं। सी एम के ऊपर अध्यक्ष का हाथ है या नहीं, इस सवाल का जवाब भी शेर में ही दिया जाता है। पार्टी के भीष्मपितामह कोप भवन में हैं या शरशैय्या पर, यह बताने के लिए शेर का इस्तेमाल किया जाता है। और सी एम को अमेरिकी वीजा की जरूरत है या नहीं यह बताने के लिए भी शेर ही ठोंका जाता है। मुझे तो लगता है की पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में कुछ इस तरह की बातें होती होंगी;

अध्यक्ष; "देखिये, उनको प्रवक्ता बनाने के आपके प्रस्ताव से मैं सहमत हूँ लेकिन मेरे लिए यह जानना जरूरी है कि उनका शायरी और गजलों का ज्ञान कैसा है?"

महासचिव; "अध्यक्ष जी, उनका शायरी और ग़ज़लों का ज्ञान कमाल का है। अभी हाल ही में एक टीवी पैनल डिस्कशन में उन्होंने विपक्षी प्रवक्ता को ऐसे-ऐसे शेर खींच कर मारे कि मैं भी हथप्रभ रह गया। यह सोचते हुए कि ये बिजनेसमैन होते हुए भी इतना टाइम कब निकाल पाए कि ऐसे-ऐसे शेर याद कर लिया? माने इनकी शेरो शायरी का टैलेंट देखकर एंकर की भी बोलती बंद हो गई थी।"

अध्यक्ष; "फिर तो ये कमाल के प्रवक्ता साबित होंगे। आखिर एक प्रवक्ता को और किस चीज का ज्ञान चाहिए? ग़ज़लों और शेरो का ज्ञान ही सबसे उत्तम ज्ञान है।"

अध्यक्ष जी उनको पार्टी प्रवक्ता बना देंगे।

हालात ऐसे हैं कि आनेवाले समय में पार्टियों की प्राइमरी मेम्बरशिप देते हुए पार्टी की सारी कवायद इसबात पर टिकी होगी कि मेंबर का कविताओं और ग़ज़लों का ज्ञान कैसा है? इस ज्ञान को जांचने परखने के लिए पार्टियाँ समय-समय पर ग़ज़ल ऑडिशन करवाएंगी। उसके लिए पार्टी के मेंबर दिनों तक ग़ज़लों और कविताओं की किताबें रटेंगे। हर मौके के लिए चुनचुन कर शेर नोट करेंगे और रात-रात भर उन्हें याद करेंगे ताकि पार्टी नेताओं को खुश किया जा सके। उधर नेता खुश हुआ और इधर मेंबर का प्रवक्ता बनना तय।

पार्टियाँ अपने-अपने कार्यालय में नए-नए शायर रिक्रूट करेंगी ताकि जिन सदस्यों को मीर, ग़ालिब, जौक वगैरह के शेर समझ में नहीं आते उन्हें उनका मतलब समझाया जा सके। मंत्री, सांसद और महासचिवों के लिए कम्पलसरी हो जायेगा कि सीनियोरिटी को ध्यान में रखते हुए वे जब भी कोट करें किसी बड़े शायर के शेर ही कोट करें। अगर भूल से भी वे कम मशहूर शायरों के शेर कहें तो उन्हें अगली कार्यकारिणी में वार्निंग दे दी जाएगी कि अगर वे दूसरी बार ऐसा करेंगे तो अप्रेजल के समय इसबात को ध्यान में रखते हुए उन्हें डिमोट भी किया जा सकता है। वहीँ अगर छोटा नेता बड़े शायरों के शेर कोट करेगा तो चाहे वे शेर उसकी समझ कें आये या न आये, उसके इस कृत्य को अप्रेजल के समय ध्यान में रखा जाएगा और अगर उसके ग्रहों का संयोग ठीक रहा तो उसे प्रमोशन भी दिया जायेगा।

अगर कोई प्रवक्ता या नेता प्रेस कांफ्रेंस में या टीवी पैनल डिस्कशन में शेर को गलत ढंग से पढ़ेगा तो पार्टी उपाध्यक्ष को अधिकार रहेगा की वह उस प्रवक्ता या नेता को मेमो इश्यू करे और उससे जबाब-तलब करे। बड़े मजेदार दृश्य दिखाई देंगे। जैसे;

उपाध्यक्ष; "ये क्या सुन रहा हूँ मैं? कल आपने प्रेस कांफ्रेंस में शेर पढ़ते हुए गलती कर दी?"

प्रवक्ता; "वो क्या था कि गलती हो गई।"

उपाध्यक्ष; "इस तरह की गलती की अपेक्षा आपसे नहीं थी मुझे। आपको पता है कि पूरा मीडिया हंसी उड़ा रहा है। आपकी भी और पार्टी की भी।"

प्रवक्ता; "दरअसल वो शेर पढने से पहले पत्रकार ने कोल स्कैम की बाबत सवाल पूछा और उसमें कानूनमंत्री को दोषी साबित करने की कोशिश की, इसलिए मुझे गुस्सा आ गया। आप तो जानते ही हैं कि विज्ञान ने भी साबित कर दिया है कि गुस्से में मनुष्य का दिमागी संतुलन खराब हो जाता है। इसलिए मैं शेर पढ़ते हुए गलती कर बैठा।"

उपाध्यक्ष; "देखिये बहाने मत बनाइये। शेर कहना एक कला है। जब मैं कला की बात कर रहा हूँ तो आप विज्ञान की बातें कर के मुझे बहकाने की कोशिश न करें।"

प्रवक्ता; "मैं आपके सामने ऐसी धृष्टता कदापि नहीं कर सकता।"

उपाध्यक्ष; "पहले तो आप ऐसे शब्द न बोलें जो मुझे समझ में न आयें। और सबकुछ छोड़कर पहले मुझे धृष्टता और कदापि का मतलब समझाइये। वैसे आपसे गलती क्या हुई थी?"

प्रवक्ता; "वो दरअसल हुआ ऐसा कि माना कि तेरी दीद के काबिल नहीं हूँ मैं की जगह मैं माना कि तेरी ईद के काबिल नहीं हूँ मैं पढ़ गया।"

उपाध्यक्ष; "अरे तो यह तो छोटी से गलती थी। इसको आप संभाल नहीं पाए?"

प्रवक्ता; "मैंने कोशिश की थी कि ईद की बात करके इसे सेकुलरता का मोड़ दे दूँ लेकिन आप तो जानते ही हैं कि कई पत्रकार आजकल विरोधी पार्टी की तरफ से भी काम करने लगे हैं।"

उपाध्यक्ष प्रवक्ता को मेमो इश्यूं कर देगा जिसमें लिखा होगा; "आप मुझे एक सप्ताह के अन्दर जवाब दें कि प्रेस कांफ्रेंस में शेर को गलत ढंग से बोलने के लिए आपको सस्पेंड क्यों न किया जाय? जबतक आप जवाब नहीं देते, आपकी जगह माखनलाल जी पार्टी प्रवक्ता का काम करेंगे।"

कुल मिलाकर पूरी भारतीय राजनीति शेर-ओ-शायरी प्रधान होगी।

मोहल्ले के वे शायर जिन्हें मुशायरों में कोई नहीं सुनता और जिनके माँ-बाप उन्हें उठते-बैठते शायर बनने के नुकशान गिनाते रहते हैं वे राजनीतिक पार्टियों द्वारा रिक्रूट कर लिए जायेंगे। जाहिल जौनपुरी, नवाब आसनशोला और कट्टा कानपुरी को रोजगार मिल जाएगा। उन्हें सफल होने के लिए मोहल्ले के लोकल मुशायरों का मुंह नहीं ताकना पड़ेगा। अमेरिकी प्रेसिडेंशियल एलेक्शन में होने वाले डिबेट की तर्ज पर राजनीतिक पार्टियाँ शेर डिबेट करवाएंगी। पूरा भारत तुकबंदी की गिरफ्त में आ जायेगा।

लोकतंत्र को मजबूत करने का एक और रास्ता मिल जाएगा।

इस मौके पर आपको कट्टा कानपुरी के एक शेर के साथ छोड़ जाता हूँ। वे लिखते हैं;

जो चाहो कर बैठो स्कैम या घोटाला
क्यों डरना जब साथ है ये शेर-ओ-शायरी।

--कट्टा कानपुरी

Tuesday, March 26, 2013

नेताओं का गुझिया कम्पीटीशन - पार्ट २




........आगे का हाल

रविशंकर प्रसाद बोले; "मैं माननीय लालू जी से पूछना चाहता हूँ कि प्राचीन भारत के समय से ही गुझिया के मसाला में जो गरी काटकर डाली जाती थी वह रंगी नहीं जाती थी। यहीं देख लीजिये कि इन्होने जो मसाला यहाँ रखा है उसमें इस्तेमाल होने वाली गरी को इन्होने हरे रंग में रँग दिया है।"

रविशंकर प्रसाद की बात पर लालू जी बोले; "आ जो हरे रंग से रंगी गरी देख रहे हैं, ऊ रंगी नहीं है। उसको कहते हैं सेकुलर गरी ... आपका निगाह ही हरा हो गया है। आ अंधे को सब जगह गरी की हरियाली ही दिखाई देती है।"

लालू जी की बात पर जोर का ठहाका लगा।

अपनी पार्टी के एम पी को समर्थन देने आये प्रकाश करात बोले; "यह बात केसरिया गुझिया बनाने वालों को समझ कैसे आएगी लालू जी?"

रविशंकर प्रसाद कुछ कहते उससे पहले मोदी जी बोल पड़े; "मित्रों केसरिया रंग ही नहीं, केसरिया गुझिया भी भारतीय राष्ट्रखाद्य का प्रतीक है। और यही कारण है कि माननीय अटल बिहारी बाजपेयी जी के नेतृत्व में हमारी पार्टी ने मित्रों पांच वर्षों में उतनी गुझिया बनाई जितनी बाकी की पार्टियों ने पचास वर्षों में नहीं बनाई थी। आपको जानकार आश्चर्य होगा कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय भी यह मानता है .... और फिर प्रश्न यह है मित्रों ....."

वे बोल ही रहे थे कि तभी कांग्रेस पार्टी को रिप्रेजेंट करनेवाले राहुल गाँधी बोल पड़े; "प्रश्न वह नहीं जो आप कह रहे हैं मोदी जी। महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि भारत में गुझिया कौन लाया? और फिर आप अपनी पार्टी की गुझिया की बात कर रहे हैं। हमारी पार्टी ने पिछले नौ वर्षों से देश में जिस मात्रा में गुझिया बनाया है ...."

राहुल गाँधी के प्रश्न पर कि "देश में गुझिया कौन लाया?" पैवेलियन में बैठे किसी दर्शक ने कहा; "राजीव जी लाये। और कौन ला सकता है?"

उनको काटते हुए मोदी जी ने कहा; "राहुल जी कि मैं इज्ज़त करता हूँ लेकिन ये यह भूल रहे हैं कि जिन मसालों का इस्तेमाल करके इनकी पार्टी ने गुझिया बनाया, मित्रों वे सारे मसाले आदरणीय अटल जी के नेतृत्व में हमारी पार्टी ने भारी मात्रा में खरीदे थे। अगर हमारी पार्टी ने उन मसालों का भारी मात्रा में स्टॉक नहीं किया होता तो राहुल जी की पार्टी इतनी गुझिया का निर्माण नहीं कर सकती।"

उधर अपनी पार्टी की तरफ से मुलायम जी आये थे। गुझिया बनाने के लिए सारा सामान साइकिल पर ले आये थे ताकि जमीन से जुड़े प्रतियोगी लगें। मोदी जी की बात सुनकर बोले; "आपएं मासाला खईदा था तो गोईया भी बआं एते।"

उनकी बात पर रविशंकर प्रसाद बोले; "मैं माननीय मुलायम सिंह जी से कहना चाहूँगा कि लोकतान्त्रिक गुझिया ऐसे ही बनती है। मसाला कोई और खरीदे और गुझिया कोई और तले, ऐसा हो ही सकता है।"

तभी अचानक अरनब ने देखा कि डीएमके की तरफ से आये एलेंगोवन जी बड़ी अजीब आकार की गुझिया बना रहे थे जो कुछ-कुछ तिकोनी थी और श्रीलंका के आकार से मिलती-जुलती थी। अरनब ने पूछा; "आई हैव अ डायरेक्ट क्वेश्चन टू यू मिस्टर एलेगोवन। ह्वाई आर यू मेकिंग गुझियाज व्हिच रेजेम्बेल श्रीलंकाज शेप ऑन वर्ल्ड मैप?"

उनके इस डायरेक्ट सवाल के जवाब में एलेंगोवन जी बोले; "सी यारनाब, आवर ल्यीड्डर, डाक्टर कलयैङ्गार सार वास यगेंस्ट्स आवर पार्टिसिपेशन यिन दिस्स गुजिया क्याम्पीटीशन यैज यिट्ट यिज्ज टाटली यागेंस्ट्स आवर द्रविड़ काल्चार। बाट ऐट लास्ट ई याग्रीड़ टू यिट्ट यान द क्यान्डीश्यान दैट हूयेव्वर वुड रिप्रेसेन्ट द पार्टी वुड्ड कुक गुजिया याफ द शेप याफ़ श्रीलंका येन्ड यीट दोज गुजियास देन्न यैंड देय्यर। आवर ल्यीड्डर डाक्टर कलैङ्गार सार टोल्ड दैट डूइंग दिस्स वुड येसटेब्लिशड आवर येट पार श्रीलंका येण्ड यिट्स प्रेजिडेंट। यिन्न पैक्ट यिट्ट यिज्ज आवर वे ऑफ़ प्रोटेयेस्ट यगेंस्ट्स ह्वाट श्रीलंकन गावंमेंट ड्यिड्ड टू आवर तामिल ब्रेदार्न।"

एलेंगोवन जी को चीयर करने आये एम्डीएमके के वाईको ने ताली बनाई।

एलेंगोवन जी की तरफ मुखातिब होते हुए लालू जी बोले; "आ आपलोग सेकुलर रसोई में एतना बरस से हमलोग का साथ मिलकर गोझिया बनाए आ खाए, बाकी आज खाली ई बात पर छोड़कर चले गए कि कांग्रेस जो है सो आपको छोहाड़ा खाने नै दिया? आपलोग को नहीं बुझाया कि ई सेकुलर रसोई का अपमान है?"

लालू जी की बात पर नितीश कुमार बोले; "अभी भी रसोई का याद नहीं गया है? आ सही भी है, देश को गोझिया का पहिला किचेन कैबिनेट देने वाला सब याद नहीं रक्खेगा त कौन याद रक्खेगा?"

नितीश कुमार की किचेन कैबिनेट वाली बात पर राहुल जी को लगा कि शायद उनके घर के बारे में कुछ कहा गया। वे क्या करते, उनका दिमाग जहाँ तक दौड़ा वहां तक वे सोच लिए। अचानक कुर्ते की बांह चढाते हुए बोले; "नितीश जी, सार्वजनिक जगह पर व्यक्तिगत बातें नहीं करनी चाहिए। देखिये हमने पिछले कई वर्षों से इतना गोझिया बनाया। अगर आप चाहें तो हम कुछ गोझिया स्पेशल कूरियर से आपके प्रदेश पहुंचवा देंगे।"

नितीश कुमार बोले; "आ आपकी पार्टी लगातार गोझिया नहीं बनाएगी तो कौन बनाएगा? और फिर कितना बना लिए है? पहले जिस रफ़्तार से बना रहे थे, अब तो वह रफ़्तार भी नहीं रही। ऊपर से गोझिया का सामान और मसाला लाने के लिए आपके पास सीबीआई है। जब चाहें आप उनसे मसाला मंगवा लेते है। तेल ख़तम हो जाए तो सी बी आई ला देती है। मैदा ख़तम हो जाए तो भी .... ऐसे में आप गोझिया नहीं बनायेंगे तो कौन बनाएगा?"

मुलायम जी को लगा कि यहाँ उन्हें सी बी आई का पक्ष लेने की ज़रुरत है। बोले; "एखिये, ऐसी बात नई ऐ। हअबाअ सी बी आई जो ऐ मासाआ नई लाती। असोई चअती अहे, उसके लिए दूकानदाअ कई बाअ खुदै मसाआ पौंचा जाता ऐ। हमयें खुद अपई आँखों से जो ऐ सो देखा ऐ।"

पास खड़े रविशंकर प्रसाद बोले पड़े; "माननीय मुलायम सिंह जी फर्स्ट हैण्ड इनफार्मेशन दे रहे हैं। उनसे बेहतर कोई नहीं जानता कि कई दुकानदार खुद गुझिया का मसाला कांग्रेस पार्टी को दे जाते हैं। लेकिन अरनब, मैं ये भी कहना चाहता हूँ कि सी बी आई कुछ दुकानदारों को परेशान भी करती है। इसबात के लिए कि वे अगर मसाला नहीं पहुंचाएंगे तो फिर उनकी दूकान पर छापा भी ......"

राहुल जी बोले; "लेकिन सी बी आई के बारे में कहीं गई बात से मैं सहमत नहीं हूँ। दुकानदार स्वतंत्र हैं इसबात के लिए कि वे चाहें तो मसाला दें और न चाहें तो न दें। हम किसी न किसी तरीके से मसाला ले ही लेंगे।"

मोदी जे बोले; "मित्रों राहुल जी एकबात भूल रहे हैं और वह ये कि मुद्दा दुकानदारों की स्वतंत्रता का नहीं बल्कि सी बी आई की स्वतंत्रता है।"

मोदी जी की बात पर पास ही खड़े नारायणसामी बोले;"लेट मी रिमाइन्ड एवरीबॉडी प्रेजेंट हीयर दैट सी बी आई ईज्ज मोस्ट यिंडीपेंडेंट गाब्म्येंट बाड़ी।"

सबने एकसाथ ठहाका लगाया। राहुल जी को समझ नहीं आया कि सब लोगों ने एकसाथ ठहाका क्यों लगाया। वे कुछ पूछने ही वाले थे कि अचानक अरनब की निगाह उनकी बनाई गुझिया पर गई जिन्हें देखकर अरनब चौंक गए। सबने देखा कि राहुल जी ने गुझिया में सारे मसाले डाले तो हैं लेकिन उन्होंने एक भी गुझिया बंद नहीं की है।

सब हंसने लगे। सब मन ही मन राहुल जी का मजाक उड़ा रहे थे। अरनब ने पूछा; "राहुल, आपने इतनी सारी गुझिया बनाई लेकिन एक को भी बंद नहीं किया। इसके पीछे क्या कारण हो सकता है? ह्वाट कैन बी द रीजन बिहाइंड दिस स्ट्रेटेजी?"

राहुल कुछ एक्सप्लेन करते उनसे पहले केतकर जी बोल पड़े। जिस चपलता के साथ उन्होंने सफाई देनी शुरू की, देखकर लगा कि उन्हें वहां हाईकमान की तरफ से भेजा गया था। शायद यह कहकर कि कुछ गड़बड़ हो तो संभाल लीजियेगा।

वे बोले; "इन खुली हुई गुझिया के पीछे क्या कारण है वह मैं समझाता हूँ अरनब। मैं यहाँ केवल एक जज ही नहीं बल्कि कांग्रेस पार्टी के शुभचिंतक की हैसियत से भी आया हूँ। दरअसल राहुल जी ने जो बनाया है वह कांग्रेसी गुझिया है। इसे बंद नहीं किया जाता। बंद न करके पार्टी बताना चाहती है कि वह जब भी चाहे गुझिया में से कोई एक मसाला निकालकर दूसरा मसाला फिट कर सकती है। यहाँ मसालों को छूट है कि वे जब चाहें गुझिया छोड़कर जा सकते हैं। हाँ यह बात अलग है कि पार्टी गुझिया छोड़कर जाने वाले मसालों को ही फ्राई कर देती है। अभी हाल में आपने देखा होगा कि चेन्नई में किस तरह से स्टालिन के घर की रसोई में ......"

उनकी एनाल्यसिस से सभी प्रभावित थे। लालू जी बोले; "आ खाली टीभी पर समाचार पढने से नै न होता है अरनब। आ, जिस तरह से केतकर जी एनेलाइसिस किये हैं कंग्रेस का गोझिया का, उससे बुझा ही गया होगा कि केतना फरक है आपका औउर केतकर जी का कैपेभिलिटी में। अनुभव का बड़ी महत्व है।"

अरनब ने लालू जी के साथ हामी भरी।

रविशंकर प्रसाद बोले; "मित्रों, अनुभव का तो महत्व है ही। केतकर जी कांग्रेसी गुझिया का स्वाद आज से नहीं ले रहे हैं, वे तो इमरजेंसी के जमाने से कांग्रेसी गुझिया खा रहे हैं। ऐसे में अनुभव तो बोलेगा ही।"

किसी ने पास ही कड़ी ममता जी से पूछा; "दीदी, आपकी पार्टी ने किसी को गुझिया बनाने के लिए नहीं भेजा? क्या आपकी पार्टी चुनाव से पहले अपनी गुझिया नहीं खोलना चाहती?"

उसके इस सवाल पर लालू जी बोले; "आ इनका पार्टी अभी बांगाल में लपसी बना रही है। गोझिया बनाने के लिए ई लोग के पास समय कहाँ है?"

दीदी को यह बात अच्छी नहीं लगी। उन्होंने कहा; "आइसा बात नेही है लालू जी। हामारा पार्टी भी गोझिया बनाने सोकती है किन्तु बनाना नेही चाहती। एही बास्ते कि हामसोब मीलकर जो गोझिया बनाएगा, सोब वालमार्ट ख़रीद लेगा ऊ भी आधा दाम में। हामारा पार्टी को एही बात मोंजूर नही है। औउर जे बात है कि हामारा बेंगोल में गुझिया नही बनता है। उहाँ पे पीठे बनता है। कोभी पीठे बनाने का कोम्पीटीशोन होगा तोब हामलोग सोचेगा।"

पता नहीं कहाँ से पास खड़े वाड्रा जी को दीदी की बात "हामारा पार्टी गुझिया बनाना नेही चाहती" धंस गई। वे फट से बोले; "बनाना की जो बात ममता दीदी आज कह रही हैं वो मैंने तो पहले ही ...."

उनकी बात को लालू जी कटते हुए बोले; "आ चुप रहो, ई गोझिया का बात हो रहा है। ई तुम्हारा रीयल एस्टेट नै न है कि जहाँ चाहो ओहीं बोल ...."

खैर, सारी कलाएं दिखाने के बाद जुरी ने सबकी गुझिया चेक की। जुरी के अध्यक्ष कुमार केतकर जी बोले; "अरनब, मैंने सबकी गुझिया चेक की। मुलायम सिंह जी और लालू जी की गुझिया अच्छी लगी मुझे। नरेन्द्र मोदी की गुझिया कुछ ख़ास नहीं लगी। मुझे तो यह समझ नहीं आता कि अगर मोदी की गुझिया अच्छी है ही, तो गुजरात में में बच्चों में इतना कुपोषण क्यों है? वे गुझिया क्यों नहीं खा रहे? यह एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब शायद तीश्ता जी दे पाएं। एलेंगोवन जी की गुझिया मैं चेक नहीं कर सका क्योंकि प्रोटेस्ट रजिस्टर करने के चक्कर में वे सारी गुझिया खा गए। हाँ, जो सबसे ज्यादा पसंद आई मुझे, वह राहुल जी की गुझिया है। क्या गुझिया बनाया है उन्होंने। स्वादिष्ट, मीठी और पूरी तरह से सेक्युलर गुझिया। मुझे यह लगता है कि राहुल जी बहुत बड़े अंतर से जीते हैं इस कम्पीटीशन में।"

दूसरे दिन अखबारों में छपा;"राहुल गांधी ने गुझिया कम्पीटीशन जीता। नौजवानों में आशा का नया संचार"

Saturday, March 23, 2013

टाइम्स नाऊ का मास्टर शेफ इंडिया - नेताओं का गुझिया कम्पीटीशन







"आ हम गोझिया कम्पीटीशन में तभिये आयेंगे जब ई बात किलियर हो जाएगा कि बीजेपी का तरफ से कोई आएगा या एनडीए का तरफ से"; लालू जी ने अपना दो टूक फैसला अरनब गोस्वामी को फ़ोन पर सुना डाला।

उनकी बात सुनकर अरनब गोस्वामी बोले; "लालू जी, आप अपने पार्टी को रिप्रेजेंट कीजिए न। आपको इससे क्या कि बीजेपी से कोई आएगा या एनडीए से? फिर तो मैं कहूँगा कि आर जे डी की बजाय केवल यूपीए से कोई आये।"

"ऐसा नै न होता है। आ यूपीए अलग है औ आरजेडी अलग। उप्पर से ई ..."

"लेकिन लालू जी, मेरा आपसे एक डायरेक्ट सवाल ये है ....."

अभी अरनब ने इतना ही कहा था कि लालू जी भड़क गए। बोले; "आ सुनो पाहिले। बात सुनो, ई तुम्हारा न्यूजआवर नै न है जो पब्लिक सब को बोलने नहीं देगा। ई अभी तुम टेलीफोन पर न बतिया रहा है। ता हमको पूरा बोलने देगा कि नहीं?"

अरनब गोस्वामी के चैनल ने होली पर नेताओं का एक गुझिया कम्पीटीशन आयोजित करने का फैसला किया और गोस्वामी जी ने नेताओं और विशेषज्ञों को फ़ोन पर इनवाईट करना शुरू कर दिया। कुछ को इनवाईट कर लेने के बाद वे लालू जी से बात कर रहे थे। उन्होंने लालू जी से कहा; "लेकिन लालू जी, आप तो यूपीए के साथ इतने सालों से हैं।"

"देखो, ई साला लोग का बात नै करो। आ ऊ लोग से हमरा कोई बास्ता नै है अब"; लालू जी फिर भड़क गए।

उनकी भड़क से अरनब गोस्वामी एकबार के लिए चुप हो गए। आगे बोले; "आप मुझे गलत समझ रहे हैं लालू जी। मैं आपके सालों की बात नहीं कर रहा था। मैं तो आपको रिमाइन्ड कर रहा था कि आप यूपीए के साथ इतने सालों से थे।"

वे बोले; "आछा ऊ बात कह रहे थे? देखो, हम यूपीए का साथ एही खातिर हैं कि हम सोनिया जी का बड़ा ईजत करते हैं। आ नै रहेंगे त केंद्र में फ्रिकापरस्त ताकत, सांप्रदायिक ताकत आ जाएगा।"

खैर काफी मान मनौव्वल के बाद लालू जी आने के लिए राजी हो गए। समारोह कब होगा, कैसे होगा, कौन आयेंगे यह सब फाइनल हो गया। टाइम्स नाऊ पर विज्ञापन आने लगे। उन विज्ञापनों को देखकर राजदीप सरदेसाई ने ट्वीट किया; "महाराष्ट्रा इज रीलिंग अंडर ड्राऊट ऑफ़ द डबल सेंचुरी बट पीपुल आर ओर्गेनाइजिंग गुझिया कम्पीटीशन। कांट वी डू विदाऊट सच ...ऑर इज इट अस्किंग टू मच?"

उनकी इस ट्वीट पर अरनब गोस्वामी ने एक न्यूज-आर कर डाला और विनोद मेहता, कुमार केतकर, आर्यमा सुन्दरम, लार्ड मेघनाद देसाई, सुहेल सेठ, मारूफ रज़ा और पाकिस्तानी एक्सपर्ट ज़फर हिलाली के साथ मुद्दे को डिस्कश करके इस नतीजे पर पहुंचे कि भारत के लोकतंत्र में उनके मीडिया हाउस के योगदान को देखते हुए यह गुझिया कम्पीटीशन आयोजित करने का अधिकार उनके पास है।

कम्पीटीशन के दिन रामलीला मैदान में बड़ी भीड़ थी। दर्शक, पुलिस, जेड केटेगरी सिक्यूरिटी, नेता, नारे, बेचारे और चौबारे, सब एक जगह जमे थे। कम्पीटीशन शुरू होने वाला था। हर पार्टी की तरफ से एक नेता कम्पीटीशन में हिस्सा ले रहा था लेकिन उसे चीयर करने के लिए उसके पार्टी के और नेता वहां थे। उधर विशेषज्ञों का दल भी वहां था जिसे नेताओं की गुझिया देखकर उन्हें नंबर देना था। भारत के सबसे बड़े एक्सपर्ट सुहेल सेठ थे। उनके साथ आर्यमा सुन्दरम थे। चूंकि कम्पीटीशन दिन में था और विनोद शर्मा अपना ड्रिंक दिन में सिप नहीं कर सकते थे इसलिए उन्होंने जूरी में रहने से इनकार कर दिया था।

कुल मिलाकर भारत दर्शन टाइप माहौल की सृष्टि हो गई थी।

हरतोष सिंह बाल थे। अरनब गोस्वामी के हाथ में माइक था। उन्होंने ऐन्करीय धर्म का पालन करते हुए श्रीगणेश किया; "लेडीज एंड जेंटिलमैन, इट्स होली टाइम एंड टूनाईट ऑन न्यूजआवर ........."

अभी उन्होंने इतना ही कहा था कि लालू जी बोल पड़े; "आरे ई तुम गोझिया कम्पीटीशन कर रहा है कि अपना रात वाला प्रोग्राम चला रहा हैं? हे अरनब, अरे इधर इधर ... आ इहाँ टीबी पर नै न हो। इहाँ त कम्पीटीशन न कराना है ..."

उनकी बात सुनकर अरनब जी लजा टाइप गए। बोले; "लालू जी क्या करें, आदत पड़ गई है।'

लालू जी बोले; "आ देखो, तुम लोग हम लोग के त बोलता है ..हमलोग के देखो, चुनाब परचार में एतना बोलता है चुनाब जीतने के बाद संसद में बोलते सुना है हमलोग को?"

अरनब गोस्वामी बोले; "सॉरी लालू जी।"

आगे बोले; "लेडीज एंड जेंटलमैन, जैसा कि आपसब जानते हैं हमारे चैनल ने इस गुझिया कम्पीटीशन को ऑर्गेनाइज किया है ताकि भारत में लोकतंत्र मजबूत हो सके और नेक्स्ट ईयर होने वाले एलेक्शन की फील मिल सके कि कौन सी पार्टी क्या करने वाली है ..."

अभी वे इतना बोले थे कि बीजेपी के रविशंकर प्रसाद बोले; "माई गुड फ्रेंड अरनब गोस्वामी, लेट मी टेक दिस ऑपरच्यूनिटी टू थैंक यू एंड योर चैनल फॉर ऑर्गेनाइजिंग दिस कम्पीटीशन ...और अरनब, यह कम्पीटीशन आयोजित करके टाइम्स नाऊ की टीम ने एकबार फिर से साबित कर दिया कि पिछले आठ-नौ वर्षों में देश में जो भी जो कुछ भी अच्छा हुआ है वह केवल टाइम्स नाऊ ने किया है।"

उनकी इस बात पर कहीं से आवाज़ आई; "पिछले नौ वर्षों का तो नहीं पता लेकिन पिछले दो-तीन वर्षों में अर्नब ही भारत की एक मात्र अपोजीशन पार्टी रहे हैं।"

रविशंकर प्रसाद की बात पर लालू जी बोले; "आ आपलोग भी त अपोजिशने में थे, आपने काहे कुछ आछा नहीं कर दिया?"

रविशंकर प्रसाद बोले; "लालू जी की मैं बड़ी इज्ज़त करता हूँ लेकिन मैं कहना चाहूँगा कि हमारी पार्टी ने पिछले नौ वर्षों में कन्स्ट्रक्कटिव अपोजीशन की भूमिका का निर्वाह किया है और एक नहीं कई बार गुझिया बनाया है। और यही नहीं, जब भी यूपीए ने घटिया गुझिया बनाई, हमारी पार्टी ने उसे नहीं खाया।"

लालू जी ने में पूछा; "आ कह त ऐसे रहे हैं जैसे अपोजीशन में रहकर भारत को गोझिया से भर दिए हैं। कौन जगह गोझिया का महल कन्स्ट्रक्ट किये तानी हमें भी बताइए?"

अरनब ने देखा कि मामला फिसल रहा है तो बोले; "प्लीज प्लीज लालू जी, आई विल नॉट अलाऊ दिस कम्पीटीशन टू गेट पौलिटीसाइज्ड। हमें गोझिया के इश्यू पर ही रहना चाहिए।"

उधर बी जे पी की तरफ से भाग ले रहे नरेन्द्र मोदी जी ने गुझिया बनाना शुरू भी कर दिया था। उनके पास पहुंचकर अरनब ने ध्यान से सबकुछ देखा और बोले; "मोदी जी, सुना है आपकी पार्टी का एक फैक्सन नहीं चाहता था कि आप इस कम्पीटीशन में भाग लें। हमारे सोर्सेस तो यहाँ तक बताते हैं कि संघ के कुछ लोगों ने आपके द्वारा यहाँ यूज किया जाने वाला मैदा भी कहीं चुराकर रखा दिया था ताकि आपके हाथ न आये और आप गुझिया न बना सकें। उधर शिवसेना वाले भी चाहते थे कि सुषमा जी यहाँ ......"

मोदी जी बोले; "मित्रों, मैं कुछ करने में विश्वास रखता हूँ। मित्रों मैं गुझिया बनाता हूँ, उसे बनाने के सपने नहीं देखता। और मेरा कर्त्तव्य मुझसे यह कहता है कि मैं छ करोड़ गुजरातियों के लिए गुझिया बनाऊँ। वैसे मैं पार्टी का सिपाही हूँ और पार्टी जहाँ चाहेगी मैं वहां गुझिया बनाने के लिए तैयार हूँ। मुझे तो आश्चर्य होता है मित्रों कि आपके पास ये अफवाहें आती कहाँ से हैं?"

उनकी बात सुनकर केतकर बोले; "मोदी जी, ये अफवाहें नहीं हैं। ये सच है। और फिर पूरा भारतवर्ष, इन्क्लूडिंग तीश्ता सेतलवाड और संजीव भट्ट, यह मानता है कि आप जिस तरह की गुझिया बनाते हैं, वह पूरे भारतवर्ष को पसंद नहीं आएगी।"

मोदी जी बोले; "मेरे मीडिया के मित्र ऐसा मानते होंगे लेकिन ये बात सच नहीं है। मेरी बनाई गुझिया हर गुजराती को पसंद है। और मित्रों, मेरे गुजरात की गुझिया तो अब यूरोप तक जाती है। सिंगापुर तक जाती है। आपको जानकार आश्चर्य होगा मित्रों कि आज से बारह साल पहले तक गुजरात में गुझिया बहुत कम मात्रा में बनती थी। मैंने इस बारे में एक प्रयास किया। मैंने मेरे गुजरात के अफसरों के साथ मिलकर ऐसा प्रोग्राम बनाया जिसके तहत मित्रों गुझिया बनाने का मसाला से लेकर पानी तक, उस जगह पर उपलब्ध करवाया जहाँ मैदे की मिलें है। इसका फायदा यह हुआ मित्रों कि हर चीज एक ही जगह .... और आज मेरा गुजरात पूरे विश्व में गुझिया के लिए जाना जाता है। ...मित्रों आज से एक वर्ष पहले की बात है, मेरे पास एक आदमी आया। बोला साहब, हमें नवसारी में गुझिया बनाने का कारखाना खोलना है। मैंने कहा ......"

वे बोल रहे थे कि लालू जी ने उन्हें टोक दिया। बोले; "आ बस कीजिये। भार्टन के लिए जो लेक्चर का तइयारी किये थे ऊ एहीं डेलिभर कर देंगे का?"

यह सुनकर सब हंसने लगे। सुषमा स्वराज ने कहा; "अध्यक्ष जी, मैं ऐसा मानती हूँ कि संसद में केवल गुझिया पर बात हो। व्यक्तिगत आक्षेपों के लिए संसद के मंच का प्रयोग वर्जित किया जाना चाहिए।"

लालू जी बोले; "आ ए सुषमा जी, बिपच्छ का नेता रहने का एतना आदत पड़ गया है कि ई भी भूल गई हैं आप इहाँ कम्पीटीशन में हैं, संसद में नहीं। अइसा आदत पड़ जाएगा त रह जाएँगी विपच्छ में ही। आ उप्पर से मोदी जी रेसकोर्स रोड में गोझिया बनाना त दूर प्रगती मैदान में भी नहीं बना पायेंगे।"

उनके बात सुनकर मोदी जी बोले; "मित्रों, मेरा विश्वास गुझिया बनाने में है। वह रेसकोर्स रोड में बने या प्रगति मैदान में, मुझे उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। और मैं तो कहता हूँ मित्रों कि हमें केवल गुझिया के विकास की ही बात करनी चाहिए। हम कबतक पुराने तरीके से गुझिया बनाते रहेंगे? मित्रों, मेरे गुजरात ने पूरे देश को विकसित गुझिया बनाने का रास्ता दिखाया है। मेरे गुजरात ने इस क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति की है। मित्रों आपको यह जानकार आश्चर्य होगा कि जब यूरोपियन यूनियन के राजदूत ने हमारे अहमदाबाद की गुझिया का रंगरूप देखा तो वे आश्चर्य में पड़ गए। कहने लगे ....."

अभी वे इतना बोले थे कि कुमार केतकर कुछ कहने लगे। ऐसे में अरनब गोस्वामी ने मोदी जी को रोकते हुए कहा; "मोदी जी, मोदी जी, कुमार केतकर वांट्स टू रिबट यू। गो अहेड मिस्टर केतकर।"

कुमार केतकर बोले; "मोदी जी, आप तो ऐसा कह रहे हैं कि आपके आने के बाद ही गुजरात में अच्छी गुझिया बननी शुरू हुई। इतिहास गवाह है कि गुजराती श्रीकृष्ण के जमाने में, याने द्वारिका नगरी के समय से ही अच्छी गुझिया बनाते रहे हैं। और फिर जहाँ तक गुजरात के बाहर दिल्ली का सवाल है तो मैं अभी भी मानता हूँ कि श्रीमती गांधी सबसे बढ़िया गुझिया बनाती थी। मुझे तो इमरजेंसी के समय में भी उनकी बनाई गुझिया बहुत पसंद आई थी। मैं उन चाँद पत्रकारों में से हूँ जो आज भी यह मानते हैं कि उसके बाद उतनी बढ़िया गुझिया पूरे भारत में कहीं नहीं बनी।"

अभी वे यह कह हे रहे थे कि नितीश कुमार जो अपनी पार्टी को रिप्रजेंट कर रहे थे और स्पेशल बिहारी गुझिया बना रहे थे उन्होंने केतकर को टोंक दिया। बोले; "आ पता है कैसी गोझिया बने थी उन्होंने। आप जैसे लोगों की बजह से ही उनकी पूरी गोझिया तेल में डूबी रहती थी। मुझे भी पता है सबकुछ। मैंने भी उसी क्रांति से ही गोझिया बनाना शुरू किया। जैप्रकाश बाबू के साथ हमने गांधी मैदान पटना से ही गुझिया का मसाला सब इकठ्ठा किया आ दिल्ली आते-आते गोझिया तल डाली। ये बात औउर है कि कुछ और मित्र जो जैप्रकाश बाबू से गोझिया बनाना सीखे थे, अब भूल गए हैं और बहुत ज्यादा तेल वाली गोझिया बनाने लगे हैं।"

उनकी बात सुनकर लालू जी बोले; "जादा तेल बाला गोझिया जो है ऊ फ्रिकाप्रस्त गोझिया से तो नीक ही है। आ आप बीच में रास्ता भूलकर ऐसे लोगों के साथ रसोईया शेयर करने लगे जो गोझिया में भी केसर इस्तेमाल करता है। समाजवादी होकर भी आप केसरिया गोझिया खाने लगे। इसका बारे में काहे नै सोचते कभी? आ ई सोचे है कि पराचीन भारत से ही गोझिया में कभी केसर नहीं पड़ता था?"

उनकी बात सुनकर वहीँ खड़े सुशिल कुमार शिंदे बोल पड़े; "यह तो मैंने अखबारों में पढ़कर देश को बताया ही था कि बीजेपी और आरएसएस वाले केसरिया गुझिया बनाने का कैम्प चलाते हैं। और केसरिया गुझिया के कैम्प की बात दिग्विजय सिंह ने भी की थी।"

रविशंकर प्रसाद बोले; "मैं माननीय लालू जी से पूछना चाहता हूँ कि प्राचीन भारत के समय से ही गुझिया के मसाला में जो गरी काटकर डाली जाती थी वह रंगी नहीं जाती थी। यहीं देख लीजिये कि इन्होने जो मसाला यहाँ रखा है उसमें इस्तेमाल होने वाली गरी को इन्होने हरे रंग में रँग दिया है।"

........आगे का हाल अगले एपिसोड में।

Tuesday, November 6, 2012

मंत्री वक्तव्य मैन्युअल और क्लीन चिट




कहते हैं मंत्री जी ने बेटी की शादी के लिए सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग कर लिया। अब इसमें आश्चर्य कैसा? सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग अगर न हो, तो किसे विश्वास होगा कि वह सरकारी है? बेसरकारी मशीनरी का दुरुपयोग कभी होता है क्या? वैसे भी बेटी की शादी करना आसान काम है क्या? कहते हैं गंगा में जौ बोने के सामान है बेटी की शादी करना। और यह आज से नहीं, हजारों वर्षों से गंगा में जौ बोने के ही सामान रहा है। कभी किसी को कहते हुए नहीं सुना कि बेटी की शादी करना मतलब गंगा में धान बोना। बड़ी उथल-पुथल होती है तब जाकर बेटी की शादी हो पाती है। ये मंत्री लोग तो जनता के सेवक हैं, ऐसे में इनकी बात जाने दें, राजा-महाराजा के लिए भी यह काम ईजी नहीं रहा कभी। याद करें महाराज जनक को, महाराज ध्रुपद को। इतने बड़े राजाओं को भी कितने पापड़ बेलने पड़े थे बेटियों की शादी करने के लिए, यह न तो बाल्मीकि जी से छिप सका और न ही व्यास जी से।

खैर फिर से सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग हुआ इसलिए फिर से लोग चाहते हैं कि मंत्री जी इसके लिए नैतिक जिम्मेदारी लें और इस्तीफ़ा वगैरह दें। क्या मजाक है? इस्तीफ़ा न हुआ बीड़ी हो गई कि सरजू साहु ने माँगा और मंत्री जी ने टेंट से निकलकर थमा दिया। गोस्वामी जी ने खुद लिखा है; "बड़े भाग मंत्री पद पावा।" क्या कहा? गोस्वामी तुलसीदास ने नहीं लिखा? तो फिर नीरज गोस्वामी जी ने लिखा होगा। बढ़िया लिखने के लिए केवल दो गोस्वामी जाने जाते हैं भारतवर्ष में।


लेकिन असल सवाल यह है कि एक मंत्री से नैतिक जिम्मेदारी ले लेने की मांग जायज है क्या? यह तो वही बात हो गई कि आप शेर से डिमांड करें कि वह वेजिटेरियन हो जाए। अमेरिका से डिमांड करें कि वह बाकी के देशों में अपनी नाक घुसाना बंद करे दे। पाकिस्तान से डिमांड करें कि वह आतंकवाद को बढ़ावा देना बंद करे दे। बैंको से डिमांड करें कि उसके टेलिकालर लोन की मार्केटिंग करने के लिए फोन न करें। सचिन से डिमांड करें कि वे रिटायर हो जाएँ। अब ऐसे में मंत्री जी अगर नैतिक जिम्मेदारी नहीं लेंगे तो और क्या कर सकते हैं? क्या मरदे, ये भी कोई सवाल है? ऐसे कठिन समय में रेफरेंस के लिए ही मंत्री वक्तव्य मैन्युअल है। तमाम वक्तव्यों से लदा पड़ा। साठ-पैंसठ वर्षों की केस स्टडी करके बनाया गया मैन्युअल। हर तरह के आरोपों के जवाब वाला मैन्युअल। मंत्री जी को तमाम संभावनाओं से लैस करने वाला। वे मैन्युअल बांचें और उसमें से जिस वक्तव्य को पढ़ने में मज़ा आया, उसे दे दें। जब वक्तव्य है तो इस्तीफ़ा देने जैसा तुच्छ काम मंत्री टाइप लोग करें तो लानत है उनके मन्त्रीपन पर।

मैन्युअल बांचकर वे कह सकते हैं कि "हमारे ऊपर लगाए गए आरोप झूठे हैं।" ये कह सकते हैं कि ;"आरोप लगाकर हमें बदनाम किया जा रहा है।" कह सकते हैं कि ;"विरोधियों की साजिश के तहत ऐसा किया जा रहा है।" इन सबके ऊपर यहाँ तक कह सकते हैं कि; "कोई भी इन आरोपों की जांच कर सकता है। मुझे इस देश के कानून पर पूरा भरोसा है।"

जी हाँ देश के कानूनों पर मंत्री जी टाइप लोगों का जितना भरोसा है उतना किसी का है क्या?

परन्तु सवाल यह भी है कि ऐसे तुच्छ आरोपों के लिए ये सारे ऑप्शन्स क्या बहुत मेहनत वाले नहीं हैं? इतने बिजी मंत्री जी के पास इतना कुछ कहने का समय बहुत मुश्किल से मिलता है। ऐसे में सबसे सरल काम है एक क्लीन चिट ले लेना। अब कौन इतना बोलकर मेहनत करे? वैसे भी जो मज़ा क्लीन चिट लेने में है वह जवाब देने में है कहाँ? जब से यह क्लीन चिट वाला ऑप्शन चलन में आया है, देश का फायदा ही फायदा हुआ है। इस ऑप्शन को लाकर देश के खजाने पर इतना बड़ा एहसान किया जा रहा है कि वित्तमंत्री अगला आम बजट पेश करते समय गृह मंत्रालय का खर्च पचास प्रतिशत तक कम कर सकते है। कमीशन बैठाओ, पैसे खर्च करो, कमीशन की समय सीमा बढाने के लिए बैठकें करो, उसे कम से कम दस साल का समय दो तब जाकर एक अदद रिपोर्ट की प्राप्ति होती है। और यहाँ एक क्लीन चिट की वजह से इतना सारा कुछ करने की जरूरत ही नहीं है।

मैं तो कहता हूँ कि यह क्लीन चिट सरकारी विभागों के घोटालों की जांच पर होनेवाले खर्च को रोकने के लिए संजीवनी सामान है। लोग भले ही शिकायत करें कि सरकारी लोग राज-काज चलाने के लिए नए आईडिया नहीं लाते लेकिन सच यही है कि पिछले वर्षों में सरकारी विभागों ने क्लीन चिट इश्यू करके देश का हजारों करोड़ रुपया बचाया है। ऐसे में मैं तो शिकायत करनेवालों पर लानत भेजता हूँ। मेरा तो मानना है कि जिस तरह से सी बी आई, इनकम टैक्स, कस्टम, एक्साइज, आई बी, ईडी, विदेश मंत्रालय, गृह मंत्रालय, कोयला मंत्रालय, खेल मंत्रालय, रेल मंत्रालय, मुख्यमंत्रालय, इसरो, उसरो, योजना आयोग, पुलिस आयोग, लोकायुक्त, पुलिस आयुक्त, राज्य सरकार, केंद्र सरकार, अरविन्द केजरीवाल, अन्ना हजारे वगैरह ने क्लीन चिट इश्यू कर के आरोपियों को ईमानदार साबित कर दिया है, कई बार लगता है कि हिटलर बेवकूफ था। उसने आत्महत्या क्यों की? अपने ऊपर लगने वाले आरोपों पर उसे क्लीन चिट लेकर मामला सलटा देना था।

फिर मन में आता है कि हिटलर क्लीन चिट कैसे लेता? इसका आविष्कार तो भारत में हाल में हुआ। अविष्कार समय पर न हुआ तो एक आदमी को अपनी जान गंवानी पडी।

क्लीन चिट इश्यू करने की गति से यही लगता है कि आनेवाले समय में चुनाव आयोग भी प्रत्याशी के इनकम वगैरह के रिकार्ड की डिमांड नहीं करेगा। उसका काम बस क्लीन चिट ले-देकर हो जायेगा। किसी ने किसी के ऊपर आरोप लगाया तो वह फट से किसी डिपार्टमेंट से क्लीन चिट लेकर मामला ख़त्म कर लेगा। अगर भ्रष्टाचार विरोधी लोग प्रेस कान्फरेन्स करके घोषणा करेंगे कि वे किसी के ऊपर आरोप लगाने वाले हैं लेकिन यह नहीं बताएँगे कि किसके ऊपर आरोप लगायेंगे, तो एक साथ कई लोग क्लीन चिट ले सकते हैं। उधर भ्रष्टाचार विरोधी ने आरोप लगाया और इधर आरोपी ने क्लीन चिट उसके मुंह पर मारा। तुरंत दान महा कल्यान। जिन्होंने इस डर से क्लीन चिट ले ली है कि हो सकता है आरोप उनके ऊपर लगने वाले हैं, उनका क्लीन चिट बेकार जाने का भी चांस नहीं। वे उसको अपने पास रख लेंगे और जब उन्हें आरोप-गति की प्राप्ति होगी तो उनके काम आ जाएगा।

जिसे भी इस बात की शंका होगी कि उसके ऊपर आरोप लग सकते हैं वह एंटीसिपेटरी क्लीन चिट ले सकता है। जिसे यह लगे कि जबतक वह मंत्री है तबतक उसके ऊपर आरोप नहीं लगेंगे लेकिन सरकार बदलने के बाद लगने के चांस हैं वह पहले से यह कह कर अप्लाई कर सकता है कि उसे दो साल या ढाई साल बाद क्लीन चित की ज़रुरत है। जिस तरह से सोशल मीडिया में मंत्रियों के बेटों और नेताओं के दामादों के खिलाफ आरोप लगाये जा रहे हैं और आरोप लगाने वालों को गिरफ्तार किया जा रहा है, यह क्लीन चिट वाला सिस्टम उसके भी काम आ सकता है। मंत्री जी का बेटा क्लीन चिट लेकर उसे स्कैन करके सोशल मीडिया में आरोप लगानेवाले के नाम अपनी ट्वीट के साथ सेंड कर देगा। आरोप लगनेवाले को गिरफ्तार करनेवाली पुलिस के पास और समय रहेगा और वह बलात्कारियों को धरा करेगी। हाल यह होगा कि मंत्री टाइप लोगों के घर में क्लीन-चिट शो-केस में बाकायदा इस तरह से रखी जायेंगी जैसे सचिन के घर में शो-केस में मैं ऑफ़ द मैच की ट्राफी रखी गई होगी। नेता टाइप प्राइवेट परसन जेब में नोटों की जगह क्लीन चिट रखा करेंगे। क्या पता कब ज़रुरत पड़ जाए।

आगे चलकर अगर सरकार को लगे कि वह पर्याप्त मात्रा में क्लीन चिट की डिमांड को पूरा नहीं कर पा रही है तो वह क्लीन चिट मंत्रालय भी खोल सकती है। अगर उसे लगे कि क्लीन चिट की उपलब्धता में दिक्कत आ रही है तो वह इंटर-मिनिस्टीरियल पैनल ऑन क्लीन चिट मैनेजमेंट बना सकती है। अगर यह लगे कि सरकार के पास समय पर क्लीन चिट डिलीवर करने के लिए वर्क-फ़ोर्स नहीं है तो फिर एन जी ओ को इस काम में लगाया जा सकता है। देखेंगे कि सलमान खुर्शीद के जिस एन जी ओ ने विकलांगों की बैशाखियाँ और हियरिंग एड नहीं बांटी, वही कल क्लीन चिट बांटेगा। अगर सरकार को यह लगेगा कि क्लीन चिट पर्याप्त मात्रा में समय पर इश्यू नहीं हो पा रही हैं तो गृह मंत्रालय के तहत वी आई पी डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम का नेटवर्क बना सकती है।

कहते हैं कोई उद्योग फूले-फले उसके लिए ऍफ़ डी आई का होना ज़रूरी है। ऐसे में ज़रुरत पड़ने पर सरकार क्लीन चिट सेक्टर में ऍफ़ डी आई भी ला सकती है। अगर सरकार चाहेगी तो क्लीन चिट वाले इस आईडिया का पेटेंट करवाकर रख लेगी और आनेवाले समय में यह आईडिया विदेशी सरकारों को फीस लेकर मुहैय्या कराएगी।

कुल मिलाकर बड़ी बिकट ईमानदारी लहराएगी और फिर अबतक आर टी आई एक्ट लाने के लिए क्रेडिट लेने वाले राहुल गांधी क्लीन चिट लाने के लिए भी कांग्रेस पार्टी को न सिर्फ क्रेडिट देंगे बल्कि कहकर लेंगे भी।

Thursday, October 18, 2012

ईमेज को बढ़ावा देनेवाली कैबिनेट कमिटी...




टेबिल पर अखबारों की ढेर सारी कटिंग्स पड़ी हैं। प्रधानमंत्री ने उन्हें उलट-पलट कर देखा। शायद उन्हें लगा की फिर से देखना चाहिए। उन्होंने उन्हें फिर से उलटा-पलटा। कुछ सोचने का उपक्रम किया। इसके तहत उन्होंने आफिस की सीलिंग को निहारा। उसके बाद शायद उन्हें लगा कि एक बार टेबिल को देखकर भी सोचा जाय। उन्होंने वह भी किया।

सबकुछ करने के बाद संतुष्ट नहीं दिखे। सचिव से मुखातिब हुए। बोले; "ये हेल्थ मिनिस्टर जी की वही फोटो पोलिओ टीकाकरण अभियान के लिए छपी जो पिछले साल छपी थी। मिनिस्ट्री ने नई फोटो भी नहीं छपवायीं? सालभर पहले जिस बच्चे को दवा पिलाते हुए फोटो खिचाई थी, वही बच्चा इस साल वाली फोटो में भी है। ऐसा क्यों? क्या देश में बच्चों की कमी है?"

सचिव बोले; "सर, बच्चों की कमी तो नहीं है लेकिन मेरा ख़याल है कि मंत्री जी बहुत बिजी होंगे इसलिए उन्हें फोटो खिंचाने का समय नहीं मिला होगा।"

प्रधानमंत्री; "हेल्थ मिनिस्टर इतने बिजी किसलिए होंगे? क्या वे खुद ही पोलिओ टीकाकरण के लिए बच्चों को दवा पिलाते हैं?"

सचिव; "हे हे हे ..सर अगर ऐसा होता तब तो फोटो खिंच ही जाती।"

प्रधानमंत्री; "तब किसलिए समय नहीं मिला उन्हें?"

सचिव; "सर पिछले छ महीने में मंत्री जी को पांच बार अपने बयानों को लेकर बीस सपष्टीकरण देने पड़े। उसके बाद और भी काम में बिजी रहना पड़ा उन्हें।"

प्रधानमंत्री; "अपने मंत्रालय के अलावा एक मंत्री और कहाँ बिजी रहेगा? और कुछ नहीं तो किसी ब्लड-डोनेशन कैम्प का उद्घाटन करके खून देते हुए ही फोटो खीचा लेते। जिस पार्टी के पहले प्रधानमंत्री पंडित जी थे, उसी पार्टी की सरकार आज ईमेज बिल्डिंग नहीं कर पा रही है। हम पंडित जी तक को भूलते जा रहे है। हमें उनसे सीखना चाहिए कि ईमेज बिल्डिंग होती क्या है? रक्तदान करते हुए उनकी छ दर्जन तसवीरें तो खुद मैंने देखी हैं। "

सचिव; "सर, वो समय अलग था। पंडित जी इतना काम करते थे फिर भी रक्तदान करते हुए फोटो खिचाने का टाइम मिल जाता था उन्हें। सर, जो बिजी रहता है वह समय निकाल ही लेता है। वैसे सर, याद दिला दूँ कि आपने ही तो तेलंगाना मुद्दे को संभालने के लिए मंत्री जी को कहा था। पिछले आठ महीने में कुल ग्यारह बार उन्हें हैदराबाद जाना पड़ा। फिर जगनमोहन रेड्डी को मनाने का काम भी तो उन्ही के जिम्मे था। सर, मुझे लगता है कि ये जगनमोहन रेड्डी वाला मामला नहीं फंसा होता तो और कुछ नहीं तो मंत्री जी की नई फोटो तो ज़रूर खिंच जाती।"

प्रधानमंत्री; "अरे हाँ, तब तो वे सचमुच बहुत बिजी थे। आपका कहना सही है। ये फोटो नहीं खींचे जाने के पीछे जगनमोहन रेड्डी ही जिम्मेदार हैं। लेकिन वो काम भी ज़रूरी है। अगर इसी तरह से चला तो सरकार की ईमेज नष्ट हो जाएगी। वैसे ये सिविल एवियेशन की भी कोई ऐसी तस्वीर नहीं दिखाई दे रही जिसे देखकर लगे कि वे कुछ काम के आदमी हैं। एयर इंडिया के लिए नया एयर-लाइनर आया लेकिन उसके साथ भी उनकी एक फोटो नहीं है? नए एयर्लाइनर की अखबारों में जो फोटो छपी हैं उनमें मिनिस्टर कहीं दिखाई ही नहीं दिए।

सचिव; "जब एयर लाइनर की डिलीवरी हुई, उस समय मंत्री जी किंगफिशर को संभालने में लगे थे। एयर इंडिया के लिए नए फंड भी रिलीज करवाने थे। फंड नहीं रिलीज होते तो स्टाफ को सैलेरी नहीं मिलती।"

प्रधानमंत्री; "क्या फायदा हुआ? फिर भी तो किंगफिशर का कुछ नहीं हुआ। मैं कहता हूँ मंत्रालय का काम-धाम तो वैसे ही नहीं हो रहा है, ऐसे में जांच के बहाने किसी एयरक्राफ्ट की कॉकपिट में बैठकर फोटो खिचाने में क्या जाता है? और ये शिक्षा मंत्री की क्या रिपोर्ट है?"

सचिव; "सर कोई रिपोर्ट नहीं है। कई महीने हो गए उन्होंने प्राईमरी एडुकेशन तक पर चिंता व्यक्त नहीं की।"

प्रधानमंत्री; "प्राइमरी एडुकेशन पर किसी सेमिनार वगैरह का उद्घाटन तो किया होगा?"

सचिव; "नहीं सर, पिछले छ महीने में तो ऐसा भी कुछ नहीं हुआ।"

प्रधानमंत्री; "बड़े मीडिया हाउस के सेमिनार में बोलने के लिए ये लोग हमेशा तैयार रहते हैं। मैं कहता हूँ किसी स्कूल का बिना बताये दौरा ही कर लेना चाहिए था। दो-चार टीवी चैनल वालों को लेकर किसी स्कूल की वर्किंग देखने के बहाने ही फोटो खिंचा लेते। ग्रेडिंग की बात की थी तो देशवासियों को बहस करने का बहाना मिल गया था। उसके बाद उन्होंने कुछ किया ही नहीं।"

सचिव; "नहीं सर, उसके बाद ही तो आई आई टी वाला मसला खड़ा किया था उन्होंने।"

प्रधानमंत्री; "अरे एक मसला कितने दिन बहस-प्रेमी जनता को बिजी रखेगा? और नया मसला खड़ा नहीं करेंगे तो जनता को भी नहीं लगेगा कि सरकार काम कर रही है। वहीँ फिनांस मिनिस्टर को देखो, उन्होंने ऍफ़ डी आई का मसला खड़ा करके कुछ तो राहत पंहुचाई। एडुकेशन मिनिस्टर पिछली बार आकाश टैबलेट के साथ दिखे थे। कितना पुराना मामला है। टैबलेट फेल हो गया, इम्प्रूव्ड आकाश आने का समय हो गया लेकिन एक भी नई फोटो दिखाई नहीं दी उनकी।"

सचिव; "अब सर, पाँचों उंगलियाँ एक सामान तो नहीं होती। वैसे भी वित्तमंत्री जितने काबिल सारे मंत्री तो नहीं हो सकते न। वैसे भी सर यही दोनों तो स्कैम की बात होनेपर प्रेस कान्फरेन्स करते हैं। कैसे समय मिलेगा? सर, आपसे एक बात कहनी थी कि सड़क और यातायात मंत्री के बारे में आई बी की रिपोर्ट है कि सोशल मीडिया पर लोग उनके एक दिन में बीस किलोमीटर सड़क वाले प्लान की बड़ी हंसी उड़ाते है। "

प्रधानमंत्री; "हंसी नहीं उड़ायेंगे? मैं कहता हूँ न्यूजपेपर में मंत्रालय का विज्ञापन लगाने में क्या जाता है? और कुछ नहीं तो किसी दिन का सेलेक्शन करके सड़क विकास दिवस ही मना लेना चाहिए था। हाथ में कुदान और सर पर इंजिनियर की हैट पहनकर फोटो खिचाने में कितना टाइम लगता है? पंडित जी हर दो महीने में कारखाने का दौरा करके हाथ में कुदान और इंजीनियर्स कैप पहनकर फोटो खींचा लेते थे। आज भी वो तसवीरें ईमेज बिल्डिंग के लिए किसी को भी इंस्पायर कर सकती हैं। लेकिन जब हमीं उनका अनुसरण नहीं कर सकते तो औरों से कैसे आशा करें?"

सचिव; "सर, पंडित जी की बात ही कुछ और थी। सर, याद कीजिये कि कैसे वे नॉर्थ -ईस्ट जाकर वहां की पारंपरिक पोशाक में नाचते हुए फोटो खीचा आते थे। आज भी उन तस्वीरों को देखकर लगता है जैसे अभी बोल पड़ेंगी। सर ये वाली तस्वीर ही देखिये। ये उन्होंने मणीपुरी महिलाओं के साथ नाचते हुए खिचाई थी। और ये वाली देखिये सर, कैसे बच्चे को गोद में लिए वात्सल्य रस की बृष्टि कर रहे हैं। उनके साथ खड़े बच्चे कित्ते तो हैपी हैं। मैं कहता हूँ सर, आज भी कोई चाहे तो बहुत कुछ सीख सकता है इन तस्वीरों से।"

प्रधानमंत्री; "अब क्या कहें? कहते हैं चिराग तले अँधेरा होता है। बस हमारी सरकार की हालत वैसी ही हो गई है। आज जब हमें जरूरत है कि हम पंडित जी और इंदिरा जी की ईमेज बिल्डिंग के तरीकों से कुछ सीखें, हमीं चूक जा रहे हैं। रूरल डेवेलपमेंट मिनिस्टर की एक तस्वीर ऐसी नहीं जिसमें वे किसानों की सभा को संबोधित कर रहे हों। मैं कहता हूँ रूरल एरिया में नहीं जाना हो, मत जाओ लेकिन क्या दस -पांच किसानो को दिल्ली बुलाना बहुत कठिन काम है? उनको यहाँ बुलाकर तो फोटो खिंचवा ही सकते हैं।"

सचिव; "सही कह रहे हैं सर। उनसे अच्छे तो कृषि मंत्री हैं। अभी परसों दुबई से आई सी सी की मीटिंग करके लौटे लेकिन कल ही बारामती जाकर किसानों की सभा को संबोधित कर डाला। ये देखिये सर, पगड़ी में कित्ते फब रहे हैं।"

प्रधानमंत्री; "इसीलिए तो मैं पवार साहब की बड़ी इज्जत करता हूँ। इतनी उम्र हो गई उनकी लेकिन आज भी किसान लगते हैं। अब और किसकी बात करूं? अब तो हाल ये है कि रेलमंत्री को आजकल कोई झंडा दिखाकर गाडी रवाना करते नहीं देखता। शासन करने के इतने अच्छे-अच्छे तरीके थे हमारे पास लेकिन वही आज कहीं दिखाई तक नहीं देते।"

सचिव; "सर, डोमेस्टिक मिनिस्टरी की तो जानें दें अब तो फॉरेन मिनिस्टर भी नहीं दिखाई देते कहीं। 2009 तक तो यूनाइटेड नेशंस सिक्यूरिटी काऊंसिल में परमानेंट सीट लेने की बात करते थे तो लगता था कि फॉरेन मिनिस्ट्री में कुछ हो रहा है। सर, मुझे लगता है एकबार फिर से अगर सिक्यूरिटी कॉउन्सिल में परमानेंट सीट की बात शुरू की जाती तो ..."

प्रधानमंत्री; "नहीं-नहीं, हर आईडिया का एक लाइफ होता है। दिस आईडिया हैज आउटलिव्ड इट्स लाइफ। कुछ और सोचना पड़ेगा। ईमेज बिल्डिंग नहीं करेंगे तो सरकार चलेगी कैसे? आप एक काम कीजिये। ईमेज को बढ़ावा देनेवाली कैबिनेट कमिटी की मीटिंग की व्यवस्था कीजिये, हमें सरकार की ईमेज बिल्डिंग एक्सरसाइज का क्रिटिकल एक्जामिनेशन करना है।"

सचिव नोटिस भेजने का इंतज़ाम करने निकल जाते हैं।

Wednesday, October 10, 2012

अरविन्द केजरीवाल की ट्विटर टाइम लाइन...




घोटाले हुए हैं तो खुलासे भी होंगे ही। घोटालों की यही खासियत होती हैं कि ये अकेले नहीं होते। बिना खुलासे का घोटाला वैसा ही होता है जैसे बिना सचिन तेंदुलकर के क्रिकेट मैच। आरोप और प्रत्यारोप के बीच हर सीमा पर लड़ाई छिड़ी है। मेन स्ट्रीम मीडिया से लेकर सोशल मीडिया कोई भी मैदान बचा नहीं है। ऐसे में मन में आया कि अरविन्द केजरीवाल की ट्विटर टाइम लाइन पर पिछले दो दिनों में हुए घमासान पर बहस चलती तो कैसी रहती? शायद कुछ ऐसी :

Arvind Kejriwal's Twitter Timeline

Wednesday, July 11, 2012

अंडर-अचीवर प्रधानमंत्री और ओवर-अचीवर यन्त्र.




न्यूयार्क से प्रकाशित होनेवाली टाइम पत्रिका ने हमारे प्रधानमंत्री को अंडर-अचीवर करार दे दिया. वैसे अगर शायरों और गीतकारों की मानें तो करार देना कोई बुरी बात नहीं. याद कीजिये पुरानी फिल्मों में जब नायिका तमाम बहाने बनाकर नायक से मिलने आती थी और उसे लता मंगेशकर जी की आवाज़ में बताती कि; "मैं तुमसे मिलने आई मंदिर जाने के बहाने.." तो नायक के दिल को करार मिल जाता था और वह भी फट से रफ़ी साहब या किशोर कुमार जी की आवाज़ में नायिका को बता देता था कि; "तुम मुझसे जो मिलने आई सनम, मेरे दिल को करार आया..."

लगता है विषयांतर हो गया. पोस्ट २०१० के ब्लॉगर की यही त्रासदी है. वह कहीं से भी चलता है, बालीवुड पहुँच जाता है. ठीक वैसे ही जैसे पुरानी फिल्मों में कोई भी भारत के किसी भी कोने से भागता तो मुंबई जाने वाली गाड़ी में ही बैठता था और अगले शॉट में वह वीटी स्टेशन से बाहर निकलते हुए बरामद होता था.

आप इसे बालीवुडिश हैंग-ओवर कह सकते हैं.

खैर, मैं बता रहा था कि टाइम पत्रिका ने हमारे प्रधानमंत्री को अंडर-अचीवर करार दे दिया. लेकिन यह वाला करार शायद वह वाले करार जितना मज़ेदार नहीं था. लिहाजा इसपर तमाम लोग़ बेक़रार हो गए. टीवी न्यूज चैनल समेट पूरे भारतवर्ष को बहस का एक नया मुद्दा मिला. कुछ विद्वानों ने याद दिलाया कि हम अभी भी विदेशी मानसिकता के शिकार हैं और जब कोई विदेशी कुछ कहता है तभी उसे सच मानते हैं. इन विद्वानों ने यह भी बताया कि; "टाइम पत्रिका ने तो प्रधानमंत्री को आज अंडर-अचीवर बताया है, हम तो उन्हें पहले ही अंडर-अचीवर करार दे चुके हैं."

काफी टीवी पैनल डिस्कशन हो चुके हैं. कुछ पाइप-लाइन में भी होंगे. तमाम विद्वान इस मुद्दे पर टीवी स्टूडियो में बोलने के लिए नई टाई खरीद रहे होंगे. कुछ अपनी विट को धो-मांज रहे होंगे. तैयारी जोरों पर होगी. सरकार के कुछ योद्धा यह भी देख रहे होंगे कि टाइम पत्रिका का भारत में क्या-क्या है और उसे कौन-कौन से डिपार्टमेंट से नोटिस भेजी जा सकती है? कुछ अति उत्साही योद्धा यह भी सोच सोच सकते हैं - क्या पत्रिका का पिछले ५-६ साल का इनकमटैक्स असेसमेंट री-ओपन किया जा सकता है? मनीष तिवारी जी जैसे प्रवक्ता सरकार और प्रधानमंत्री के बचाव के लिए पुरानी टाइम पत्रिका की कॉपी खोज रहे होंगे जिसमें पत्रिका ने अटल बिहारी बाजपेयी या अडवाणी की बुराई की होगी.

ऐसे में यह जानने के लिए कि और तमाम विद्वानों का इस मुद्दे पर क्या मत है, चंदू चौरसिया ने दिल्ली और कई शहरों में जाकर लोगों की राय इकठ्ठा की. पेश है उनमें से कुछ वक्तव्य;

लालू प्रसाद जी; "इसमें का राय जानना चाहता है तुम? ...आ सुनो पहिले.. बीच में मत बोलो. आ ई जो प्रधानमंत्री को ई लोग़ बताया है...का बताया है? अंडर? का? टेकर? अंडरटेकर?..अंडरअचीभर? अच्छा...अरे वोही अंडरअचीभर. देखो ई कुछ खराब नहीं है. एकदम्मे कुछ नहीं अचीभ करने से बढ़िया है अंडरअचीभ करना. आ देखो सरकार चलाने का मतलब ई नहीं होता कि कुछ अचीभ करना ही है. देखो प्रधानमंत्री हैं बिदबान... बूझो की डिग्री है उनके पास, उनका ईज़त पूरा दुनियाँ में है...सो जब जो चाहेंगे ऊ अचीभ कर लेंगे..जल्दी कौन बात का है? ... आ सबसे बड़ा बात है कि सेकुलर हैं..प्रधानमंत्री जे हैं से सेकुलर आदमी हैं. आ देश को सेकुलर आदमी का ज़रुरत पहिले है अचीभर का बाद में. सेकुलर लोग़ सत्ता में नहीं रहेगा तो फ्रिकाप्रस्त लोग़ राज करने लगेगा... आ फिर सोनिया जी भी हैं साथ में... जो चीज परधानमंत्री नहीं अचीभ कर पाए ऊ सोनिया जी अचीभ कर लेंगी... बैलेंस हो जाएगा न. केतना टाइम लगता है कुछ अचीभ करने में? आ हामी को देखो, रेलमंत्री थे तब केतना कुछ अचीभ कर लिए थे.. त हमारा कहना एही है ई पत्रिका फत्रिका का कहता है उसपर मत जाओ...ई सब सच नहीं बोलता...देखो न, हम रेलमंत्री होकर एतना कुछ अचीभ किये, हमरा लिए त नहीं लिखा कि हम ओभर-अचीभर हैं. ज़रूरी बात है कि सेकुलर हाथ में देश का बागडोर है."

मनीष तिवारी; "मेरा यह कहना है कि विदेशी पत्रिकाओं की बात को हमें तभी सच मानना चाहिए जब वे हमारी सरकार की प्रशंसा करें. हमारा यह मानना है कि जब ये पत्रिकाएँ आलोचना करती हैं तब ये झूठ बोल रही होती हैं. यह हमारी पार्टी का ऑफीशियल स्टैंड है जिसे भारत के हर नागरिक का समर्थन है. हमारी पार्टी अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गाँधी जी के नेतृत्व में सरकार ने बहुत कुछ अचीव किया है जिसे टाइम पत्रिका ने तवज्जो ही नहीं दी. उन्ही के नेतृत्व में ही मनरेगा जैसा प्लान चलाकर सरकार ने कितना अचीव किया है सबके सामने है. एक प्लान चलाकर हमने देश को गड्ढों से भर दिया, वह तो टाइम को दिखाई नहीं देता. और फिर अंडर-अचीवर की बात पर मैं टाइम के एडिटर से पूछता हूँ कि रिचर्ड बाबुराव स्टेंजेल, तुम्हें क्या हक है कि तुम दूसरों को अंडर-अचीवर कहो? तुम खुद सर से पाँव तक अंडर-अचीवमेंट में डूबे हुए हो. मैं केवल इतना जानना चाहता हूँ कि भारत जैसे बड़े देश में टाइम की कितनी कॉपी बेंचते हो तुम? टाइम को कितने भारतीय जानते हैं? ऐसे में अंडर-अचीवर कौन हुआ, तुम कि डॉक्टर मनमोहन सिंह?...क्या कहा? एडिटर के नाम में बाबुराव नहीं है? अच्छा मैं गूगल करके पता करता हूँ कि एडिटर के फादर का क्या नाम है?"

प्रधानमंत्री; "मैं ग़ालिब को कोट करना चाहूँगा और टाइम मैगेजीन से यही कहूँगा कि; माना कि तेरी दीद के काबिल नहीं हैं हम, तू मेरा शौक तो देख, मेरा इंतज़ार तो देख."

अन्ना जी; "देखो लोकशाही है..लोकशाही में कोई किसी को कुछ भी कह सकता है. पंथ-प्रधान को भी कुछ भी कह सकता है. आज अगर सरकार जनलोकपाल बिल पारित कर देती तो जनलोकपाल इस मामले की जांच कर के बता सकता था कि पंथ-प्रधान अंडर-अचीवर है या नहीं? और एक बार ये बात गलत साबित हो जाती तो फिर हम टाइम पत्रिका की आफिस के सामने अनशन कर देते. पत्रिका से पूछते कि उसने हमारे पंथ-प्रधान को ऐसा कैसे कहा?"

हिंदी रक्षक प्रोफ़ेसर मनराज किशोर; "पहले तो मुझे इस बात का जवाब चाहिए कि टाइम नामक पत्रिका का कोई हिंदी संस्करण भी है क्या? अगर नहीं है तो क्या अधिकार है इस पत्रिका को उस देश के प्रधानमंत्री को अंडर-अचीवर बताये जिसमें अस्सी करोड़ से ज्यादा लोग़ हिंदी बोलते हैं? क्या टाइम के सम्पादक यह बता सकते हैं कि अंडर-अचीवर शब्द के लिए हिंदी का कौन सा शब्द है? क्या उन्हें पता है? अगर नहीं तो उन्हें यह अधिकार नहीं है कि वे ऐसा कहें. जो पत्रिका का हिंदी संस्करण तक नहीं निकलता उस पत्रिका ने क्या कहा यह बात हमारे लिए जरा भी महत्वपूर्ण नहीं है."

दिग्विजय सिंह जी; "अभी मैं कुछ नहीं कहना चाहूँगा. फिलहाल मैं यह पता करने की कोशिश कर रहा हूँ कि टाइम मैगेजीन और आर एस एस के बीच क्या सम्बन्ध हैं? कल मुझे अजीज बरनी ने बताया है कि प्रधानमंत्री को अंडर-अचीवर बताने में आर एस एस का हाथ है. एकबार मैं यह कन्फर्म कर लूँ फिर मैंने प्रेस कान्फरेन्स करके बताऊंगा कि असल मामला क्या है?"

अरनब गोस्वामी; "वेट फॉर अ डे ऐज आई ऍम ट्राइंग तो गेट लीजा कर्टिस अलांग विद कुमार केतकर, विनोद शर्मा, लॉर्ड मेघनाद देसाई एंड सुहेल सेट ऑन न्यूज-आवर. ओनली दे विल बी एबुल टू टेल हाउ करेक्ट इज टाइम्स असेसमेंट ऑफ आर प्राइममिनिस्टर. आई अस्योर यू एंड आल आर व्यूवर्स दैट आई विल पुट सम डायरेक्ट एंड टफ क्वेश्चंस टू दिस वेरी एमिनेंट पैनल."

येदुरप्पा जी; "आई डिक्लाइन टू कमेन्ट ऐज माई एस्ट्रोलॉजर हैज एडवाइज्ड मी टू नॉट स्पीक ऑन द इश्यू टिल ट्वेल्व थर्टी पीएम ऑफ फोरटेंथ जुलाई."

प्रनब मुख़र्जी जी; "ओलदो, आई हैभ स्टाप कोमेंटिंग ऑन पोलिटिकल मैटार्स बाट सीन्स इयु आर सेयिंग दैट ईट इज ए मैटोर रिलेटेड टू ओभरआल आचीभमेंट ईंक्लुडिंग इकोनोमी, आल आई हैभ टू से ईज, इभेन ऐन अचीभमेंट आफ एट पारसेंट आफ दा टोटल मैटोर ईज नाट बैड. सो, उइ शूड नाट फारगेट दैट दीस सो कोल्ड अंडरअचीभमेंट ईज ओल्सो ड्यू टू दा फैल्योर आफ दा यूरोपीयन इकोनोमी ओल्सो."

श्री कपिल सिबल; "ये तो देखिये इस पर एक बैलेंस व्यू लेने की ज़रुरत है. एक सरकार का लीडर क्या अचीव करता है उसको उसके बाकी मंत्रियों के अचीवमेंट के साथ देखना होगा. अगर आप यह कहते हैं कि प्रधानमंत्री जी अंडरअचीवर हैं तो वहीँ पर मेरे जैसे मंत्री भी हैं जो ओवर-अचीवर हैं. ऐसे में टाइम मैगेजीन को यह भी देखने की ज़रुरत है कि कुल मिलाकर मामला बैलेंस हो जाता है. और फिर टाइम के इस कमेन्ट को सीरियसली लेने की ज़रुरत नहीं है. जब हमारे पास अचीवमेंट और ओवर-अचीवमेंट हैं, तो फिर हम अंडर-अचीवमेंट की बात क्यों करें? वैसे भी टाइम के इस असेसमेंट का इम्पैक्ट इलेक्शंस में जीरो रहने वाला है और जिस बात का इम्पैक्ट इलेक्शन में जीरो है उसको सीरियसली वैसे भी नहीं लेना चाहिए."

श्री चन्दन सिंह हाटी, मैनेजर हिमालय रुद्राक्ष प्रतिष्ठान; "क्या आप अंडर-अचीवर कहे जाने से परेशान रहते हैं? क्या आप अंडर-अचीवर कहे जाने से दुखी रहते हैं? क्या आप ओवर-अचीव करते हैं और फिर भी लोग़ आपको अंडर-अचीवर कहते हैं? क्या इसकी वजह से आपका दिन का चैन और रात की नींद गायब हो जाती है? तो फिर खुश हो जाइए क्योंकि हिमालय रुद्राक्ष प्रतिष्ठान पहली बार लेकर आया है ओवर-अचीवर यन्त्र. जी हाँ, यह ओवर-अचीवर यन्त्र वैदिक मन्त्रों के जाप और उनकी शक्ति से परिपूर्ण है. आपको ओवर-अचीवर कहलाने के लिए अब मेहनत करने की जरूरत नहीं है. आपको बस यह यन्त्र हमारे द्वारा बताये गए विधि के अनुसार अपने कार्यालय में पूजा के बाद लगा लेना है. फिर देखिएगा कि दुनियाँ कैसे आपको न सिर्फ ओवर-अचीवर मानने लगेगी बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर की पत्र-पत्रिकाएँ आपकी तस्वीर कवर-पेज पर छापकर नीचे बड़े-बड़े अक्षरों में लिखकर आपको ओवर-अचीवर बतायेंगी. जी हाँ, भारतवर्ष में पहली बार....."

अभी तो इतने ही महान लोगों के वक्तव्य से काम चलिए. पब्लिक डिमांड पर और लोगों के वकतव्य छाप दिए जायेंगे:-)

Tuesday, June 5, 2012

बाबाओं को चरणस्पर्श




नेता जी ने बाबाजी के पाँव छू लिए. बाबाजी ने भी छुआ लिए. छु-छुआ कर दोनों धन्य हुए. त्रेता टाइप युग की घटना होती तो देवता लोग़ ऊपर से पुष्पवर्षा वगैरह भी कर देते लेकिन यह तो ठहरा कलियुग. ऐसा युग जिसमें जमाना हमेशा से खराब ही रहा है. लिहाजा पुष्पवर्षा का चांस नहीं बना. बाबा और नेता, दोनों को केवल धन्य होकर संतोष करना पड़ा. अब इस जुग में देवता कहाँ से आयेंगे? हमें भी यही सोचकर संतोष करना चाहिए कि हमारे नेता और हमारे बाबा लोग़ ही इस युग के देवता हैं. ऐसे में होना यह चाहिए था कि बाबा जी के कुछ लोग़ और नेता जी के कुछ लोग़ लोग़ पुष्प वगैरह बाज़ार से खरीद कर रखते और जैसी ही छुआ-छूत कार्यक्रम हुआ वैसे ही ये लोग़ एक-दूसरे के ऊपर पुष्पवर्षा कर डालते. हमारी संस्कृति की रक्षा भी होती और दोनों देवता पुष्प से नहा भी लेते.

नेताजी जी ने तो वैसे भी पाँव छूने के बाद घोषणा कर दी थी कि वे भारतीय संस्कृति की रक्षा का जिम्मेदारी पूर्ण कार्य कर रहे थे.

भारतीय संस्कृति की रक्षा के तमाम महत्वपूर्ण कर्मों में बाबाओं के पाँव छू लेना सबसे महत्वपूर्ण कर्म है जिसकी जिम्मेदारी बाबा और उनके भक्तों ने अपने कन्धों पर लाद रखी है. मैंने ऐसी अफवाह भी सुनी है कि अगर किसी बाबा का पाँव दो घंटे से ज्यादा समय तक न छुआ जाय तो वह हलकान च परेशान होने लगता है. कुछ लोग़ तो यहाँ तक बताते हैं कि कि ऐसे बिकट समय में बाबा लोग़ अपने चेलो-चपाटों को इशारा कर देते हैं और वे उनके पाँव छू लेते हैं ताकि बाबाजी का ब्लड प्रेशर कंट्रोल में रहे. उधर चेलों ने पाँव छुआ और इधर बाबा की हलकानियत गई.

वैसे देखा जाय तो इस मामले में योगगुरु टाइप बाबा लोग़ बहुत लकी हैं. उन्हें कभी इसकी वजह से परेशानी नहीं उठानी पड़ती. वे योगशिविर में सुबह-शाम अपने पाँव खुद ही छूते रहते हैं.

बाबाओं के लिए पाँव छुआ लेना अपने आप में बड़ा एक्सपर्टात्मक कार्य है. ठीक वैसे ही जैसे पाँव छू लेना. इस कार्य में छूने और छुआने वाले, दोनों को हमेशा अलर्ट रहना पड़ता है. ठीक वैसे ही जैसे सीमा पर खड़ा सिपाही हमेशा अलर्ट रहता है. यह सोचते हुए कि उधर से कोई घुसने की कोशिश किया नहीं कि इधर से गोली दागनी है. कुल मिलाकर अब न चूक चौहान टाइप परिस्थिति हमेशा बनी रहती है. ऐसे में अगर पाँव छूने-छुआने की प्रैक्टिस होती न रहे तो मामला गड़बड़ा सकता है. जैसे अगर छूने वाले के मन में अचानक पाँव छूने की इच्छा जाग उठे तो छुआने वाले को चाहिए कि वह तुरंत अपना पाँव आगे कर दे. अगर वह इस क्षण में चूक जाता है तब कुछ भी हो सकता है. हो सकता है कि छूने वाले को लगे कि; "जब यही अपना पाँव छुआने में इंट्ररेस्ट ही नहीं दिखा रहा तो मुझे क्या ज़रुरत है आगे बढ़कर जबरदस्ती पाँव छूने की?" छूने वाले के मन में यह विचार भी आ सकता है कि; "हटाओ जाने दो. जो यह नहीं जानता कि पाँव कैसे छुवाया जाता है उसका पाँव छूकर भी क्या फायदा? दरअसल इसका पाँव छूने लायक ही नहीं है."

संस्कृति रक्षा के इस कर्म में बाबाजी लोग़ बड़े एक्सपर्ट होते हैं. कुछ बाबा तो बैठे-बैठे अपना पाँव फैलाकर आगे किये रहते हैं. एवर-अलर्ट टाइप. ऐसे बाबाओं को पाँव न छुए जाने का कष्ट कभी नहीं सताता. कोई न कोई उनका पाँव छूता ही रहता है. उन्होंने पाँव आगे कर दिया तो कर दिया. आनेवाले को झक मार के पाँव छूना ही पड़ेगा. अगर उसने ऐसा नहीं किया तो फिर बाबाजी से आगे की बात ही नहीं हो सकती. ऐसे बाबा से वार्तालाप भी पाँव छूने से ही शुरू होता है. कह सकते हैं कि छूने वाले के हाथ को ही वार्तालाप शुरू करना है और बाबा जी के पाँव को उस शुरुआत के लिए इशारा करना रहता है. पाँव का छुआ जाना या न छुआ जाना ही यह तय करता है कि वार्तालाप किस तरह का होगा? भक्त ने अगर पाँव छू लिए तो गारंटी है कि बाबा जी उसके बेटे चुन्नू और बेटी गुड़िया का कुशल-क्षेम और उनकी पढ़ाई के बारे में भी पूछेंगे लेकिन अगर पाँव छूने के मामले में भक्त चूक गया तो फिर कोई गारंटी नहीं कि बाबाजी उसके कुशल-क्षेम के बारे में भी पूछें.

लगातार विचरण करने वाले बाबा जी को अलग तरह से अलर्ट रहना पड़ता है. चलते समय वे अपना दाहिना पाँव आगे फेंकते हुए चलते हैं ताकि भक्त को उनका पाँव छूने में न तो कोई कष्ट हो और न ही असमंजस. बाबा जी का पाँव आगे है मतलब भक्त को छूने का सिग्नल मिल रहा है. ऐसा करने से भक्त को सुभीता रहता है. उसका सेवेंटी परसेंट असमंजस अपने आप चला जाता है. वह पहला मौका मिलते ही बाबा का पाँव छू लेता है. बाबा भी अपना हाथ भक्त के सिर पर रखकर उसके पाँव छूने का फल उसे तुरंत दे देते हैं. भक्त अगर पैसेवाला रहा तो उसे उठकर अपने हृदय से भी लगा सकते हैं. बाबा जी का यह कर्म निश्चित करता है कि दोनों के हृदय मिल जायें और एक बड़े हृदय की सृष्टि करें ताकि वह अपने अन्दर बहुत कुछ समो ले.

पाँव छूने के एवज में मिलनेवाले आशीर्वाद भी अलग-अलग तरह के होते हैं. जैसे बाबागीरी के धंधे में आया नया-नया बाबा हर भक्त के ऊपर हाथ रख देता है. वहीँ सीजंड बाबा उस पोज में केवल हाथ ऊपर कर देता है जिस पोज में हमारे देवतागण आशीर्वाद देते थे. बाबाजी अगर डबल-सीजंड हुए तो वह अपना हाथ भी नहीं उठाते. वे केवल मुस्कान में अपना आशीर्वाद मिक्स करके भक्त के लिए ठेल देते हैं और भक्त उसे रिसीव कर लेता है. ऐसे बाबाओं के भक्तों का रिसीवर हमेशा ऑन रहता है, यह सोचते हुए कि क्या पता बाबा कब मुस्कुरा दें? कुछ बाबा तो हमेशा मुस्कुराते रहते हैं. उन्हें देखकर लगता है कि चुटकुलों की रेडिओ तरंगें उनके कानों से हमेशा टकराती रहती हैं और उसके प्रभाव से बाबा मुस्कुराते रहते हैं. वैसे मैंने एक बाबा के बारे में यह सुना है कि वे आशीर्वाद स्वरुप भक्त के सिर पर अपना पाँव दे मारते थे. फिर भक्त चाहे प्रधानमंत्री ही क्यों न हो. एक और बाबा अपना आशीर्वाद देने के लिए अंडे की उल्टी करते थे. कड़ी मेहनत करके उल्टी करते और फिर जीवविज्ञान के तमाम सिद्धांतों को धता बताते हुए मुँह से अंडा निकालते और भक्त को दे देते थे. भक्त और बाबा दोनों धन्य हो लेते.

यह अलग बात है कि बाबा द्वारा इतना कठिन कार्य करने के बावजूद देवताओं ने कभी आकाश से पुष्पवर्षा नहीं की.

यह तो हुई बाबाओं की बात. लेकिन क्या हमारी संस्कृति में पाँव छूने का कार्यक्रम बाबाओं और भक्तों तक ही सीमित है? बिलकुल नहीं. गुरुओं और बड़े-बुजुर्गों के पाँव छूने की भी संस्कृति है हमारे यहाँ. यह अलग बात है कि पाँव छूते-छुआते हुए ज्यादातर बाबाओं और भक्तों को ही देखा जाता है. कई गुरु तो शिष्य द्वारा पाँव न छुए जाने पर समाजशास्त्र के पर्चे में शिष्य के नंबर तक काट लेते हैं. युवराज दुर्योधन ने खुद अपनी डायरी के एक पेज में इस बात का जिक्र किया था कि कैसे क्रीड़ास्थल पर पाँव न छुए जाने पर एकबार गुरु द्रोण उनसे नाराज़ हो गए थे.

बहुत कम गुरु ऐसे होते हैं जो सार्वजनिक स्थल पर शिष्य द्वारा पाँव छू लिए जाने पर नाराज़ हो जाते हैं. ऐसे में वे अपने शिष्यों को क्लास-रूम में हिदायत देकर रखते हैं कि; "बाहर मिलने पर मेरे पाँव कभी मत छूना." शायद गुरु को मालूम रहता है कि अगर शिष्य ने कहीं सड़क पर आते-जाते पाँव छू लिए तो दुनियाँ को पता चल जाएगा कि वे गुरु हैं. ऐसे में इस बात का चांस बनता है कि दुनियाँ वाले अगले साल अपने बेटे-बेटियों, पोते-पोतियों के एडमिशन के समय गुरु जी को स्कूल-कालेज में मिलकर परेशान करें. यह कहते हुए कि; "बॉबी का नंबर कम आया है इसलिए एडमिशन नहीं हो रहा. आप अगर कह देते तो एडमिशन कमिटी उसका केस कंसीडर कर लेती."

बुजुर्गों के पाँव छूने को लेकर भी तमाम बातें हैं. कई बुजुर्ग भी इस बात से परेशान रहते हैं कि फलाने की शादी में फलाने के बेटे ने उनका पाँव नहीं छुआ. कई बुजुर्ग तो बेटे के माँ-बाप से शिकायत तक कर देते हैं. यह कहते हुए कि; "देखो कैसा बिगड़ गया है. मुझे देखा और पहचान भी लिया लेकिन पाँव नहीं छुआ उसने." उधर बच्चे की हालत ख़राब है और उसे माँ-बाप के सामने झूठ बोलना पड़ता है, यह कहते हुए कि; 'मैंने नानाजी का पाँव छुआ था. इनको ही याद नहीं."

वैसे पाँव छूने की रश्म धीरे-धीरे बदलती रही है. पहले बच्चे अपने बुजुर्गों के दोनों पाँव छूते थे. कालांतर में जैसे-जैसे जमाना थोड़ा ख़राब हुआ, एक पाँव छूने लगे. जमाना थोड़ा और ख़राब हुआ तो बुजुर्ग के सामने केवल झुकने लगे. आज हालत यह है कि दाहिना हाथ आगे करके बुजुर्ग के घुटने तक ले जाते हैं और वही हाथ खींचकर छाती से लगा लेते हैं. एक नौजवान ने पाँव छूने की इस 'इश्टाइल' कि व्याख्या करते हुए मुझे बताया कि; "भइया, इस तरह से पाँव छूने का मतलब और ही होता है."

मैंने पूछा; "वह और ही मतलब क्या है?"

वह बोला; "नौजवान अपना हाथ बुजुर्ग के घुटने तक ले जाता है फिर उसे खींचकर अपने छाती से लगा लेता है जिसे देखकर यह लगता है जैसे वह बताना चाहता हो कि आपका घुटना टूटे तो मेरे दिल को ठंडक पहुंचे."

एक और केस होता है...खैर, जाने दीजिये.