इस्लामाबाद १९ जुलाई
इस्लामाबाद से कासिफ अब्बासी
आज अंडरअचीवर वार ने एक नया मोड़ ले लिया. सूत्रों के मुताबिक़ पाकिस्तान के सदर जनाब आसिफ अली ज़रदारी इस बात से नाराज़ हो गए हैं कि दुनियाँ की किसी मैगेजीन ने उन्हें अंडरअचीवर नहीं कहा. आपकी जानकारी के लिए बता दूँ कि पहले अमेरिकी मैगेजीन टाइम ने इंडिया के वजीर-ए-आज़म जनाब मनमोहन सिंह को अंडरअचीवर करार दिया था जिसका जवाब एक इंडियन मैगेजीन आऊटलुक ने अमेरिकी सदर बराक ओबामा को अंडरअचीवर कहकर दिया. ऐसे में अनुमान लगाया जा रहा है कि जल्द ही दुनियाँ के तमाम मुल्क की मैगजीन एक-दूसरे के सदर और वजीर-ए-आज़म को अंडरअचीवर कहकर पूरी दुनियाँ के लीडरान को अंडरअचीवर करार दे देंगी.
दुनियाँ भर के दानिशमंद और तर्जियानिगार ऐसा मानते हैं कि एक बार ऐसा हो जाने से पूरी दुनियाँ एक नई शुरुआत कर सकेगी.
उधर कुछ पाकिस्तानी इदारों और हलकों में यह बात भी की जा रही है कि जब अमेरिका ने नाटो सप्लाई को बहाल करने के लिए पाकिस्तान से कहा तब सदर जरदारी ने अमेरिका के समाने रखी तमाम शर्तों में एक शर्त यह भी रखी थी कि नाटो सप्लाई के एवज में अमेरिका पाकिस्तान को रुपया-पैसा वगैरह देगा ही, साथ ही अमेरिकी मैगेजीन टाइम सदर जरदारी को अपने फ्रंट-कवर पर रखेगी. जब टाइम ने इस बात के लिए यह कहते हुए मना कर दिया कि सदर ज़रदारी को वह फ्रंट-पेज पर नहीं रख सकती क्योंकि वे तमाम मुद्दों पर फेल रहे हैं तब प्रेसिडेंट ओबामा ने टाइम मैगेजीन को यह कहते राजी कर लिया था कि मैगेजीन चाहे तो उन्हें फ्रंट-कवर पर रखने के लिए अंडरअचीवर करार दे सकती है.
दोनों मुल्कों के सदर और मैगेजीन के बीच यह फैसला यह हुआ था कि जुलाई महीने के एक एडिशन में सदर जरदारी को फीचर किया जाएगा लेकिन नाटो सप्लाई खुलने के बाद अमेरिकी मैगेजीन अपने वादे से मुकर गई और इंडिया के वजीर-ए-आजम जनाब मनमोहन सिंह को अंडरअचीवर बताते हुए उन्हें अपने फ्रंट-कवर पर रख दिया. टाइम मैगेजीन के एक तर्जियानिगार ने अपना नाम न लिए जाने की शर्त पर यह खुलासा किया है कि मैगेजीन को हमेशा से यह लगता था कि इंडिया के वजीर-ए-आजम जनाब मनमोहन सिंह का अंडर-अचीवमेंट पाकिस्तानी सदर ज़रदारी से बड़ा है लिहाजा मैगेजीन ने अपने फ्रंट-कवर पर उन्हें मौका दिया.
इधर इस्लामाबाद में ऐसी बातें भी की जा रही हैं कि अब अंडरअचीवर टैग पाने के लिए अब सदर जरदारी ने अफगानिस्तानी सदर जनाब हामिद करजई से अपील की है. सदर ज़रदारी चाहते हैं कि अफगानी सदर जनाब हामिद करजई काबुल से निकलेवाले न्यूजपेपर अनीस डेली से कहकर उन्हें अंडरअचीवर का टैग दिला दें. कुछ दिफाई तर्जियानिगारों का यह भी मानना है कि पाकिस्तानी सदर ने आई एस आई को हिदायत दी है कि वह तालिबानी लीडरान से डायरेक्ट बात करके यह काम करवा दे. पाकिस्तानी सदर यह भी चाहते थे कि अमेरिकी वजीर मोहतरमा हिलेरी क्लिंटन भी इस काम में अपनी टांग अड़ा दें तो काम जल्दी हो जाने की उम्मीद रहेगी. अमेरिका की तरफ से फिलहाल यह आईडिया ड्रॉप कर दिया गया है क्योंकि मोहतरमा हिलेरी क्लिंटन को यह समझ नहीं आ रहा था कि अनीस डेली पर सदर ज़रदारी को फीचर करने के लिए उन्हें गुड तालिबान से बात करने की ज़रुरत है या बैड तालिबान से.
उधर दुनियाँ भर में आइडेंटिटी क्राइसिस के मारे तमाम लीडरान चाहते हैं कि उन्हें किसी न किसी मैगेजीन के कवर-पेज पर अंडरअचीवर करार देते हुए रखा जाय ताकि उन्हें आइडेंटीटी क्राइसिस के इस रोग से निजात मिले. हाल यह है कि चीन में आई हल्की सी इकॉनोमिक क्राइसिस के चलते वहाँ के प्रेसिडेंट हू जिंताओ तक यह चाहते हैं कि मेड इन चायना वाली टाइम पत्रिका अपने एक एडिशन में उन्हें अंडरअचीवर करार दे ताकि चीन की सरकार इकॉनोमी की फील्ड में अपने अचीवमेंट के नए-नए आंकड़ों में हेर-फेर करके पूरी दुनियाँ के सामने रखें और चाइनीज गवर्नमेंट खुद को ग्रेट बता सके. सरकार का ऐसा मानना है कि ऐसा करने से चायना की जनता में एक नया जोश आएगा, वह दिन में बाईस घंटे काम करेगी और और इकॉनोमिक क्राइसिस खत्म हो जायेगी.
आपकी जानकारी के लिए बता दूँ कि टाइम पत्रिका की एक डुप्लीकेट मैन्युफैक्चरिंग यूनिट चीन की एक कंपनी ने शंघाई में खोल रखी है.
उधर ब्रिटेन में रह रहे साबिर पाकिस्तानी सदर और जनरल जनाब परवेज़ मुशर्रफ ने भी अंडरअचीवर बनने की कवायद शुरू कर दी है. पिछले कई सालों से पाकिस्तानी मीडिया में उनको लेकर कोई बात नहीं होती लिहाज़ा मुशर्रफ चाहते हैं कि उनका नाम भी न लेनेवाले अगर उन्हें अंडरअचीवर कह के भी याद कर लें गे तो आनेवाले इलेक्शंस में कुछ लोगों को उनके बारे में पता चल जाएगा और उनकी पार्टी को कुछ वोट मिल जायेंगे.
हमारे इंडियन व्यूरो से यह खबर भी मिली है कि इंडिया के पेज-थ्री इंडसट्रीएलिस्ट और आईपीएल टीम रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर के मालिक जनाब विजय माल्या भी चाहते हैं कि उन्हें अंडरअचीवर करार दे दिया जाय ताकि उन्हें इंडिया की गवर्नमेंट से कुछ स्पेशल पॅकेज मिल जाए. वहीँ दूसरी तरफ एक्सपर्ट्स और तर्जियानिगारों का मानना है कि इंडिया की सिविल एवियेशन मिनिस्ट्री के डायरेक्टर जनरल सिविल एवियेशन जनाब भारत भूषण को हटाने में विजय माल्या का हाथ है लिहाजा उन्हें अंडरअचीवर बताना नामुमकिन होगा.
दूसरी तरफ एक्सपर्ट्स का मानना है कि इंडिया और अमेरिका के बीच पोलिटिक्स में शुरू हुई यह अंडरअचीवर जंग को आनेवाले समय में एक नया मोड़ मिल सकता है. ऐसे एक्सपर्ट्स यह मानते हैं कि लन्दन ओलिम्पिक्स में अगर अमेरिका को एथेलेटिक्स इवेंट्स में पचास से कम गोल्ड मेडल्स मिले तो इंडिया की कई मैगेजिंस अमेरिकी एथलीटों को अंडरअचीवर बतायेंगी. दूसरी तरफ अमेरिकी मैगेजिंस और न्यूजपेपर्स की निगाह श्रीलंका में इंडिया की क्रिकेट टीम के ऊपर भी रहेंगी ताकि आनेवाली श्रीलंकाई सीरीज और टी-ट्वेंटी वर्ल्ड कप में अगर इंडिया की टीम अच्छा न कर पाए तो टीम और उसके तमाम खिलाड़ियों को अंडरअचीवर बताया जा सके. पकिस्तान के साबिर कप्तान जनाब आसिफ इकबाल का मानना है कि अमेरिकी मैगेजिंस की निगाहें इंडिया के आलराऊंडर रवींद्र जडेजा और उनके मेंटोर कप्तान महेंद्र सिंह धोनी पर होंगी.
आनेवाले समय में हमारी निगाह इस अंडर अचीवर जंग पर रहेगी. जल्द ही इसपर एक और कॉलम लेकर हाज़िर होऊंगा.
नोट: कल रात को उड़ती खबर सुनाई दी है कि फेमस हॉलीवुड डायरेक्टर जनाब जेम्स कैमरोन ने अपनी नई मूवी पर काम शुरू कर दिया है. मूवी का नाम है लीग ऑफ एक्स्ट्राऑर्डिनरी अंडरअचीवर्स.
Friday, July 20, 2012
अंडरअचीवर बनने की जंग
Saturday, January 23, 2010
पकिस्तान प्रीमियर लीग
आई पी एल में खिलाड़ी बिकने के लिए तैयार थे. कुछ खरीद लिए गए तो कुछ को किसी ने पूछा ही नहीं. नहीं पूछा माने बिलकुल नहीं पूछा. जिन्हें नहीं पूछा गया ऐसे लोगों के लिए खरीदार मोल-भाव करने के लिए भी राजी नहीं हुए. वैसा भी नहीं हुआ जैसा बाज़ार ख़त्म होने के समय आनेवाला ग्राहक दुकानदारों के साथ करता है. मोल-भाव में चालीस परसेंट कम बोलता है तो भी दूकानदार उसे सबकुछ देकर चला जाता है. वैसा भी नहीं हुआ.
आस्ट्रेलिया के खिलाड़ी नहीं बिके. वेस्टइंडीज के भी पूरे नहीं बिक सके. श्रीलंका, न्यूजीलैंड, बरमूडा, कनाडा, बंगलादेश, मालदीव, अफगानिस्तान, चीन, दक्षिण अफ्रीका, केन्या, नामीविया, सूडान, इरान, ईराक, जापान, दक्षिण कोरिया, सीरिया, लीबिया और न जाने कहाँ-कहाँ के खिलाडियों को किसी खरीदार ने नहीं पूछा.
इन देशों की सरकारों ने भारत के ऊपर या फिर खरीदारों के ऊपर आरोप नहीं लगाया. किसी ने नहीं कहा कि वे भारत से रिश्ता तोड़ लेंगे. किसी ने नहीं कहा कि वे अब भारत में बना हैन्डीक्राफ्ट का सामान नहीं खरीदेंगे या अब वे भारत से आयातित चीनी का शरबत नहीं पीयेंगे. और तो और किसी ने यह भी नहीं कहा कि वे भारतीय साफ्टवेयर इंजीनीयरों को अपने देश में काम नहीं करने देंगे या वे अब भारतीय कॉल सेंटर में फ़ोन नहीं करेंगे.
लेकिन पकिस्तान एक ऐसा 'मुलुक' है जो बाकी सबसे अलग है. वहाँ की न केवल सरकार बल्कि, जनता, नेता, क्रिकेट खिलाड़ी, हॉकी खिलाड़ी, कबड्डी खिलाड़ी, डॉक्टर, इंजिनियर, ड्राईवर, कंडक्टर,अफसर, वकील, पत्रकार, पुलिस, सेना, आतंकवादी, नदी,सड़क, मस्जिद, पुल, मकान और न जाने कौन-कौन भारत से रिश्ता तोड़ने के लिए तैयार है.
कहते हैं कि ये उनके खिलाड़ियों की बेईज्जती है जो उन्हें किसी ने नहीं खरीदा. तुर्रा ये कि उनके खिलाड़ी वर्ल्ड चैपियन हैं. बता रहे हैं कि शाहिद आफरीदी विश्व के सबसे बड़े खिलाड़ी हैं. उन्हें तो कम से कम खरीदना चाहिए था. ऐसा नहीं होने से केवल खिलाडियों का ही नहीं, पूरे पकिस्तान का अपमान हुआ है.
पकिस्तान का अपमान इस बात पर निर्भर करता है कि उनके खिलाड़ियों को नहीं खरीदा गया? अगर क्रिकेट खिलाड़ियों की खरीद-बिक्री पर ही देश का मान-अपमान टिका है तो फिर पाकिस्तान का मान तब-तब चार गुना बढ़ जाना चाहिए था जब-जब इनके खिलाड़ी बिके हैं.
अरे भाई, माना कि आई पी एल में किसी ने नहीं खरीदा लेकिन पहले तो लोग पाकिस्तानी खिलाड़ियों को 'खरीदते' रहे हैं और ये खिलाड़ी बिकते भी रहे हैं. कितना मान बढ़ गया था तब, पाकिस्तान का?
जो खिलाड़ी बिके नहीं वे कह रहे हैं; "यह हमारे खिलाफ साज़िश है."
गज़ब शब्द है ये साज़िश भी. कभी-कभी लगता है जैसे इस शब्द का आविष्कार पकिस्तान में ही हुआ होगा. और पकिस्तान की वजह से ही यह शब्द अमर हो जाएगा. इस देश में या दुनियाँ में कुछ भी होता है उसे ये बेचारे साज़िश बताते हैं. यह देश ऐसा है जहाँ नेता जीता है तो साज़िश की वजह से, मरता है तो साजिश की वजह से. क्रिकेट टीम मैच जीत जाती है तो साज़िश की वजह से और हार जाती है तब तो साज़िश होनी ही है. यहाँ तक कि बाढ़ आती है तो भी साज़िश की वजह से और सूखा पड़ जाता है तो उसमें भी साज़िश है.
अब वहाँ के लोग कह रहे हैं कि इस साजिश का बदला ले लेंगे. कैसे लेंगे? कह रहे हैं कि भारत में होनेवाले हॉकी वर्ल्डकप का बहिष्कार कर देंगे. कबड्डी टीम को भारत नहीं आने देंगे. आई पी एल का टेलीकास्ट पकिस्तान में नहीं होने देंगे.
मैं कहता हूँ इतना सबकुछ करने की क्या ज़रुरत है? भारत को नीचा दिखाने का सबसे बढ़िया तरीका है कि पकिस्तान अपना एक प्रीमियर लीग शुरू कर ले.
क्या कहा? पैसा कहाँ से आएगा? अरे भाई आई एस आई ने जो नकली भारतीय नोट छापे हैं उन्हें असली डालर में कन्वर्ट कर लो. क्या कहा? ऐसा संभव नहीं है?
तो फिर भैया एक ही रास्ता है. बराक ओबामा से पकिस्तान सरकार कहे कि; "अमेरिका पकिस्तान को अपना प्रीमियर लीग शुरू करने के लिए पैसा दे."
अगर अमेरिका प्रीमियर लीग शुरू करने के लिए पैसा नहीं देता तो शिक्षा वगैरह के प्रसार के लिए अमेरिका से जो पैसा मिला है वो प्रीमियर लीग में लगा दो. एक बार शुरू कर लो जो होगा देखा जाएगा.
आखिर पहले भी तो अमेरिकी सहायता राशि से हथियार खरीदे गए हैं.
सोचिये ज़रा क्या सीन होगा? पकिस्तान प्रीमियर लीग की शुरुआत होगी. बड़े धूम-धाम के साथ. उदघाटन समारोह में गाने वगैरह गाने के लिए उन कलाकारों को बुला लो जो भारतीय रीयलिटी शो में हिस्सा ले चुके हैं. उसको तो पक्का बुलाना जिसके घर में हिमेश रेशम्मैया रोटी खाना चाहते थे.
साथ ही पाकिस्तानी स्टैंड-अप कॉमेडियन लोगों को बुला लो जो भारतीय शो में पार्टिसिपेट करके मुंबई हमले के बाद अपने 'मुलुक' वापस चले गए हैं. अताउल्लाह खान को बुला लेना. वो स्टेज पर गायेगा; "अच्छा सिला दिया तूने मेरे प्यार का..."
आतिशबाजी का कान्ट्रेक्ट तालिबानियों को दे देना. विकट आतिशबाजी करेंगे तालिबानी. क्या कहा? उनके साथ सेना लड़ रही है. कोई बात नहीं. डॉक्टर अब्दुल कादिर खान को बुला लेना. वे चार ठो न्यूक्लीयर बम फोड़ देंगे. आतिशबाजी का कोरम पूरा हो जाएगा.
कुल मिलाकर "मस्त महौल में जीने दे" टाइप वातावरण हो जाएगा. बिलकुल झक्कास उदघाटन.
अब विदेशी खिलाड़ी तो पकिस्तान में खेलने से रहे. आठ दस टीम बनेगी तब जाकर प्रीमियर लीग चालू होगा. क्रिकेटर कम पड़ेंगे ही. इमरान खान, जावेद मियाँदाद, तसलीम आरिफ वगैरह को रिटायरमेंट से वापस आने के लिए उकसा दो. सरफ़राज़ नवाज़ को तो पक्का लाना. साज़िश शब्द उनसे ही परिभाषित है. पाकिस्तानी क्रिकेट में तीन-चौथाई साज़िश का क्रेडिट उन्हें ही जाता है.
टीम का नाम भी बढ़िया रखना. जैसे वजीरिस्तान वैरियर्स, करांची बाम्बर्स, लाहौर शूटर्स, स्वात चार्जर्स, और नोर्थ-वेस्ट गनरनर्स, रावलपिंडी बादशाह...
अब सरकार पैसा दे रही है तो टीम के मालिक भी सरकारी लोगों को ही बनाना. रहमान मलिक को रावलपिंडी बादशाह का मालिक बना देना और इमरान खान को उसी टीम का कैप्टेन. टीम का मालिक और कैप्टेन एक-दूसरे से भिड़ते आये हैं. यहाँ भी भिड़ लेंगे. इमरान खान अपने क्रिकेटीय अचीवमेंट का जो डोस्सियर रहमान मलिक को देंगे, रहमान मलिक उसे रिजेक्ट कर देंगे. यह कहते हुए कि डोस्सियर पूरा नहीं है.....
एक टीम शेरी रहमान को ज़रूर देना. उन्हें सरकार में लाने का यही तरीका है कि उन्हें किसी चीज की मालकिन बना दिया जाय.
कुल मिलाकर विकट प्रीमियर लीग बनेगी. जितनी टीमें होंगी और जितने खिलाडियों की खरीदारी होगी सब का दस परसेंट मिस्टर टेन परसेंट को घर पहुंचा देना.....
अब पूरा प्रोजेक्ट रिपोर्ट बनावावोगे क्या?
जितना दिमाग भारत पर हमला करवाने के लिए लगाते हो, उसका आधा भी लगा दोगे तो बड़ी झक्कास प्रीमियर लीग बनेगी...
मेरी तरफ से आल द बेस्ट!!
Thursday, October 1, 2009
दो घंटे तो यूं गुजर जायेंगे....
बैठकबाज लोग हैं भारतीय और पाकिस्तानी सरकार में. वो भी आज से नहीं, न जाने कब से. आदि काल से भारत और पाकिस्तान के विदेश सचिव, विदेश मंत्री, प्रधानमंत्री, वगैरह-वगैरह की बैठक होती ही रही है. कभी मिश्र में तो कभी यूनान में. कभी अमेरिका में तो कभी तेहरान में. चार महीने बिना बैठक के बीते नहीं कि विदेश मंत्री टाइप लोग अकुताने लगते हैं. अकुता कर बोर हो जाते हैं तो बैठक कर लेते हैं.
कभी-कभी भारत छईला जाता है. कहता है; "आतंकवाद पर रोक नहीं लगी तो हम बैठक नहीं करेंगे."
जवाब में पकिस्तान कहता है; "बात-चीत होती रहनी चाहिए. बिना बात-चीत के न तो हमारी राजनीति चलेगी और न ही आपकी. हमने आपसे बातचीत नहीं कि तो अमेरिका से हमें डॉलर मिलना बंद हो जाएगा."
भारत कहता है; "अच्छा, ऐसी बात है? तो फिर आओ, बैठक कर लेते हैं. आखिर हमारी वजह से तुम्हारे पेट पर लात क्यों पड़े? वैसे भी हम किसी पाप में भागीदार नहीं बनना चाहते. "
भारत बातचीत के लिए तैयार तो हो जाता है. तैयार तो हो जाता है लेकिन सरकारी लोग तक कहते रहते हैं कि जब तक पाकिस्तान आतंकवादियों के खिलाफ कार्यवाई नहीं करेगा, तब तक किसी बैठक का कोई मतलब नहीं है. अब सरकारी लोग कहेंगे तो ठीक ही कहेंगे.
भारत की इस बात पर विद्वान टाइप लोग हंसते हैं. मीडिया के महारथी पैनल डिस्कशन में घोषणा कर देते हैं कि बैठक तो होगी लेकिन कुछ परिणाम नहीं निकलेगा.
अब बताइए, जब कुछ परिणाम नहीं ही निकलना है तो फिर बैठकी क्यों? कुछ-कुछ ब्लॉग जगत में चलने वाली बहस टाइप बात है न. बहस शुरू होती है. तर्क दिए जाते हैं. कुतर्क लिए जाते हैं. परिणाम कुछ नहीं निकलता.
आज सोच रहा था कि जब पहले से मालूम है कि बिना परिणाम वाली बातचीत ही होनी है तो फिर दो घंटे कैसे काटते होंगे ये विदेश मंत्री लोग? कौन सी बातें होगी जो दोनों को बैठकी के लिए मोटिवेट करती होंगी? क्या-क्या बात करते होंगे ये लोग?
शायद कुछ ऐसे;
कृष्णा साहब: नमस्कार कुरैशी साहब. कैसे हैं?
कुरेशी: अस्सलाम वालेंकुम.. हा हा.. बढ़िया. आप कैसे हैं?
कृष्णा साहब: मैं भी बढ़िया हूँ. वैसे कल शाम से गले में कुछ खराश है.
कुरैशी साहब: मौसम चेंज हो रहा है न. ये मौसम की वजह से है. तीन-चार दिन पहले तक...
कृष्णा साहब: हाँ, ये मौसम चेंज की वजह से ही है. एक बार तो सोचा कि बैठक में न आऊँ. फिर सोचा..
कुरैशी साहब: हा हा...देखिये सारी दुनियाँ को पता था कि हम मिलने वाले हैं. ऐसे में आप न आते तो...
कृष्णा साहब: आता कैसे नहीं? प्रधानमंत्री ने कहा...
कुरैशी साहब: गजब करते हैं आपके प्रधानमंत्री भी. शर्म-अल-शेख में बोले कि बातचीत करेंगे. आपके देश जाकर मुकर गए. एक बार के लिए तो हमारे वजीर-ए-आजम घबरा गए. फिर मैंने समझाया कि हिन्दुस्तान में किसी स्टेट में इलेक्शन होने वाले होंगे इसलिए वहां के वजीर-ए-आजम ने....
कृष्णा साहब: हाँ, हैं न इलेक्शन. महाराष्ट्र में हैं. इम्पार्टेंट स्टेट हैं न. ऐसे में...
कुरैशी साहब: वही तो. मैंने तो हमारे वजीर-ए-आजम को समझाया कि हिन्दुस्तान के प्राइम मिनिस्टर ने ऐसा इसलिए कहा कि किसी स्टेट में इलेक्शन होने वाले होंगे....... वैसे एक बात बताइए. आपलोग इतना इलेक्शन क्यों करवाते हैं?
कृष्णा साहब: हा..हा...इलेक्शन न हो तो जम्हूरियत कहाँ मिलेगी जनाब?
कुरैशी साहब: सही कहते हैं. लेकिन आपके इतने इलेक्शन से हमारी तो खाट खड़ी हो जाती है न. आप इलेक्शन के चक्कर में हमारे मुल्क से बातचीत बंद कर देते हैं. उधर अमेरिका वाले डॉलर रोक देते हैं.....ऊपर से इलेक्शन के मौसम में आपके अनालिस्ट लोग यह कहना नहीं भूलते कि हिन्दुस्तान दुनियाँ का सबसे बड़ा डेमोक्रेटिक मुल्क है....
कृष्णा साहब: वो तो है ही...
कुरैशी साहब: हाँ. वो तो है. लेकिन उनके ऐसा कहने से हमें शर्म-अल-शेख..सॉरी सॉरी शर्म आने लगती है न. वैसे एक बात की दाद दूंगा.
कृष्णा साहब: कौन सी बात?
कुरैशी साहब: यही कि सरकार चलाने में आपलोगों का मुकाबला नहीं.....चाय में कितनी शक्कर लेंगे?
कृष्णा साहब: एक चम्मच.
कुरैशी साहब: हा हा...एक चम्मच? बस? आपके पहले वाले विदेश मंत्री मुख़र्जी साहब भी एक चम्मच लेते थे. आप भी एक चम्मच?
कृष्णा साहब: मुख़र्जी साहब तो पहले से ही एकॉनोमी चाय पीते हैं. माने एक चम्मच शक्कर पहले से ही लेते हैं. हम तो दो से एक पर हाल ही में आये हैं.
कुरैशी साहब: हा हा...वो आस्टेरिटी प्रोग्राम के तहत?
कृष्णा साहब: हाँ. अब तो हालत यह है कि...
कुरैशी साहब: हाँ. मैंने टीवी पर देखा था. आपके जूनियर ने ट्विट्टर पर कुछ लिख दिया थे. कुछ केतली के बारे में. और कुछ काऊ के बारे में.
कृष्णा साहब: केतली नहीं केटल क्लास के बारे में.
कुरैशी साहब: हाँ..हाँ..याद आया. वैसे आपका भी ट्विट्टर अकाउंट है क्या?
कृष्णा साहब: क्या बात करते हैं आप भी? हमारे जूनियर का ट्विट्टर अकाउंट रहेगा तो मेरा भी ट्विट्टर कैसे रहेगा? प्रोटोकाल कुछ होता है कि नहीं?
कुरैशी साहब: ठीक कह रहे हैं. प्रोटोकाल के हिसाब से उनका ट्विट्टर है तो आपका तो ब्लॉग होना चाहिए.
कृष्णा साहब: हा हा..सही है. ब्लॉग रहने से मनोरंजन का साधन बढ़िया रहता है. वैसे आप मनोरंजन के लिए क्या करते हैं?
कुरैशी साहब: मैं फिल्में देखता हूँ. हाल ही में दिल बोले हड़ीपा देखी...आपने देखी ये मूवी?
कृष्णा साहब: नहीं देखी. मैंने क्विक गन मुरुगन देखी. वैसे एक बात बताइए. दिल बोले हडीपा तो अभी रिलीज़ नहीं हुई. फिर आपने कैसे देख ली?
कुरैशी साहब: हा हा..हमें रिलीज़ होने का इंतज़ार क्यों करना साहब? हम तो दुबई से डीवीडी मंगा लेते हैं. आपकी हिंदी फिल्में दुबई में डीवीडी पर पहले रिलीज़ होती हैं और आपके सिनेमा हाल में बाद में.
कृष्णा साहब: क्या बात कर रहे हैं? ये तो ठीक नहीं है.....लेकिन हमें तो मनोरंजन के लिए ब्लॉग पर ज्यादा भरोसा है. वैसे भी आजकल चीनी लोगों ने परेशान कर दिया है. ऐसे में ब्लॉग रहेगा तो एक स्ट्रेस बस्टर जैसा कुछ होने का एहसास रहेगा.
कुरैशी साहब: नहीं साहब, ये आप ठीक कह रहे हैं. आप ब्लॉग बना ही लीजिये.
कृष्णा साहब: हाँ...लेकिन मैंने सोचा है कि मैं हिंदी ब्लॉग बनाऊंगा.
कुरैशी साहब: क्यों? आप इंग्लिश में लिखिए.
कृष्णा साहब: असल में जब से ये फाइव स्टार के प्रेसिडेनशियल स्वीट वाला मामला उछला है तब से मैं ईमेज बनाने की कोशिश कर रहा हूँ. इसीलिए हिंदी सीख रहा हूँ. मैं हिंदी ब्लॉग बनाऊंगा. हिंदी में ब्लॉग रहेगा तो ज़मीन से जुड़ा दिखाई दूंगा.
कुरैशी साहब: आपके विचार सही हैं. असली राजनीति तो यही है साहब.
तब तक कृष्णा साहब का फ़ोन बज उठेगा. फ़ोन पर बात करके वे चिंतित दिखाई देंगे.
कुरैशी साहब: क्या हुआ जनाब? कुछ चिंतित दिखाई दे रहे हैं. कोई खास बात?
कृष्णा साहब: नहीं खास बात तो नहीं है. वो इंडिया से फ़ोन था. सेक्रेटरी बता रहा था कि हिंदी ब्लॉग के एग्रीगेटर अब ब्लॉगर भाइयों से फीस लें, इस बात का सुझाव दिया जा रहा है. कुछ लोगों का सुझाव है कि ब्लॉगवाणी ब्लॉगर लोगों से बारह सौ रुपया साल का फीस ले ले.
कुरैशी साहब: अरे तो जनाब बारस सौ रुपया साल कौन सा ज्यादा है?
कृष्णा साहब: जनाब आपको हमारी हिंदी न्यूज़ चैनलों की जानकारी नहीं है. उन्हें पता चल गया कि मैं बारह सौ रुपया साल फीस देकर ब्लागिंग कर रहा हूँ तो वे शोर मचा देंगे कि सरकार के आस्टेरिटी प्रोग्राम की दुर्गति हो रही है.
कुरैशी साहब: कोई बात नहीं. कह दीजियेगा कि फीस आप अपने पाकेट से दे रहे हैं. जैसे होटल का बिल...
कृष्णा साहब: वो तो है लेकिन फिर भी लोग शक की निगाह से देखेंगे. आपको नहीं पता है कि....
कुरैशी साहब: ऐसा भी क्या है साहब? अच्छा मीटिंग से निकलेंगे तो पत्रकार लोगों को क्या कहना है?
कृष्णा साहब: क्या कहेंगे? कह दीजियेगा कि बातचीत सफल रही. हम और बातचीत करेंगे.
कुरैशी साहब: यह भी कह दूँ कि हम बैक चैनल डिप्लोमेसी से बातचीत जारी....
कृष्णा साहब: क्या बैक चैनल?...आपने अपने मुल्क में केवल एक भारतीय चैनल दिखाने के लिए अलाऊ किया है. ऐसे में......
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और दो घंटे की बातचीत पूरी हो जायेगी.

