नीरज भैया (नीरज गोस्वामी) : एक परिचय
तुम्हें जब याद करता हूं, मैं अक्सर गुनगुनाता हूं
हमारे बीच की जो दूरियां हैं, यूं मिटाता हूं

इबादत के लिए तुम ढूढते फिरते कहां रब को
गुलों को देख डाली पर, मैं अपना सर झुकाता हूं
नहीं औकात है अपनी, मगर ये बात क्या कम है
मैं सूरज को दिखाने दिन में भी दीपक जलाता हूं
मुझे मालूम है तुम तक नहीं आवाज पंहुचेगी
मगर तनहाईयों में मैं तुम्हें अक्सर बुलाता हूं
मैं हूं तनहा तो दरिया में मगर डरता नहीं यारों
जो कश्ती डगमगाती है, उसे मैं साथ पाता हूं
अन्धेरी सर्द रातों में ठिठुरते उन परिन्दों को
अकेले देखकर कीमत मैं घर की जान जाता हूं
घटायें, धूप, बारिश, फूल, तितली, चांदनी ‘नीरज’
ये सब हों साथ तेरे, सोचकर मैं मुस्कुराता हूं
ये वो गजल है, जिसे मैनें
ई-बज़्म पर पढी।
मेरी एक आदत थी। जब भी मुझे कोई गजल पसन्द आती थी, तो मैं उस गजल के शेरों से मिलते-जुलते एक-दो शेर लिखकर वहां चिपका देता था। इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ. मैने काफी मेहनत करके एक शेर लिखा और वहां पर दे मारा. शेर था:

खडे हो जाओगे नीरज कभी तुम उन कतारों में
जहां जब भी नजर जाये, तो मैं ‘नीरज’ को पाता हूं
मेरी इस पचास ग्राम शुद्ध तुकबन्दी वाले शेर को उन्होनें पढा. मुझे एक मेल लिखा. वहां से शुरु हुआ ये ‘मेल-मिलाप’ आजतक चल रहा है. और भगवान करें कि हमेशा चलता रहे.
अब मैं आपको नीरज भैया (जी हां एक मेल के बाद ही पता चल गया कि उनको नीरज या फिर नीरज जी कहना मेरी गलती थी) के बारे में बताता हूं. उनके बारे में लिखना मुझ जैसे इंसान के लिए सम्भव नहीं है.
नीरज गोस्वामी, जिन्हें मैं बडे प्यार से नीरज भैया बुलाता हूं, एक सामान्य से दिखने वाले असामान्य इंसान हैं. मुम्बई के पास एक जगह है, खोपोली. वहां रहते हैं. एक स्टील कम्पनी में वाईस प्रेसीडेंट के पद पर कार्यरत हैं. लेकिन उन्हें इस बात की शिकायत रहती है. कहते हैं -
“बन्धुवर हम वहां हैं, जहां हमें नहीं होना चाहिए. कभी-कभी तंग आ जाते हैं समझदारों की बीच में रहते-रहते”. नीरज भैया अच्छी गजलें लिखते हैं, अच्छा साहित्य पढते हैं. दुनियां की सारी अच्छी बातों में रुचि रखते हैं. जीवन जीने का तरीका अद्भुत है. अभी भी बच्चों के साथ क्रिकेट खेलते हैं. हंसते हैं तो दिल खोलकर. जब कभी हम दोनो फोन पर बतियाते हैं तो पूरा लाफ्टर क्लब खोलकर बैठ जाते हैं. कई बार उन्होने मुझे बताया है - “जब भी मैं आपके साथ बात करते हंसता हूं तो मेरे आफिस के कई सारे लोग आकर देख जाते हैं कि मेरी तबीयत ठीक है कि नही”.
जब मैने नीरज भैया से पहली बार बात की उन्होने मुझे बताया;
“बन्धुवर इस दुनिया में दो मूर्खन के सरताज हैं, आप और मैं”. उन्होंने मेरी भेजी चिट्ठियों को पढकर ये बात कही थी. जब कभी मैं उनसे शिकायत करता हूं कि; “क्या बात है भैया, आजकल आप चिट्ठी नहीं भेज रहे” तो जवाब आता है - “बन्धुवर आजकल मुझे समझदारों को समय देना पड रहा है. अब आप बतायें समझदारों के बीच में रहते हुए कैसे चिट्ठी भेजूं आपको. अगर आपको लिखी चिट्ठी किसी समझदार ने देख ली, तो मेरी मूर्खता लोगों को पता चल जायेगी”. मैनें कई बार उनसे कहा कि समझदारों के बीच में रहकर तो बहुत कुछ सीखा जा सकता है, तो कहते हैं; “हां सीखा तो जा ही सकता है कि; दो और दो का जोड चार होता है”.
पिछले दिनों मैनें उनसे हिन्दी ब्लाग लिखने के लिये कहा। मुझे पता नहीं कि वे लिखेंगे कि नहीं. लेकिन एक बात हुई है जरूर. उन्होने पिछले दिनों कुछ ब्लाग पोस्ट पर अपनी टिप्पणी लिखनी शुरु कर दी है. और मेरा मानना है कि टिपियाना ब्लागर बनने की पहली सीढी है. सो मेरी आशा बनी है कि वे एक न एक दिन हिन्दी ब्लाग लिखना शुरु करेंगे.
वैसे जब तक वे हिन्दी ब्लाग लिखना शुरु नहीं करते हम उनकी गजलें और कवितायें पढ कर आनंद ले सकते हैं. हम उनकी गजलें सहित्यकुंज और अनुभूति पर पढ सकते हैं.
चलते-चलते: पिछले कई दिनों से कई सारे ब्लाग पोस्ट पर उनके कमेंट देखकर

ज्ञान भैया ने उनके बारे में कहा “अगर वे हमारे समय की पैदाइश हैं तो मैं उन्हें बधाई दूंगा कि उन्होने अपने में बचपन और हंसोड़ - दोनो को सहेजे रखा है। जबरन बुद्धिमत्ता के सलीब पर नहीं चढ़ा दिया.”
एक दिन मैने जब नीरज भैया को बताया कि मैं उनके ऊपर एक पोस्ट लिखना चाहता हूं तो उनका कहना था;
“आप जो मुझ पर ब्लॉग लिखने की रिस्क ले रहे हैं उससे उपजे परिणामों के लिए मेरी कोई जिम्मेदारी नहीं होगी ये पहले बता देता हूँ ताकी सनद रहे और वक्त पे काम आए.”