Show me an example
Showing posts with label मौज. Show all posts
Showing posts with label मौज. Show all posts

Monday, May 2, 2011

चलो दिलदार चलो चाँद के पार चलो.....




सिवाय गीतकार के बाकी सब के लिए फ़िल्मी गीत सुनने के लिए होते हैं. उधर गाना बजा इधर आवाज़ कान तक पहुंची और हमने सुन लिया. मन में आया तो गुनगुना लिया. अन्दर 'बाथरूमी' टैलेंट रहा तो गा लिया. अन्दर के टैलेंट को बाहर निकालने वाले मिल गए तो उनके सहयोग से उसे रियलिटी शो में निकाल बाहर किया. अपने लिए वोट डलवा लिया और जीत गए. लेकिन यह सब करते समय लोग़ फ़िल्मी गीतों के बारे में सवाल नहीं करते.

इतिहास बताता है कि किसी ने गुलशन बावरा से सवाल नहीं किया कि; "भाई साहब, किस देश की धरती सोना, हीरे-मोती नहीं उगलती? क्या केवल हमारे देश की ही धरती ऐसा करती है? आप क्या हमें यह बताना चाहते हैं कि पाकिस्तान में सोना आसमान से बरसता है? वहाँ भी तो धरती से ही निकलता होगा."

किसी ने साहिर साहब को इस बात के लिए नहीं कोसा कि उन्होंने "इस देश का यारों क्या कहना, ये देश है दुनियाँ का गहना" लिखकर भारत की ऐसी-तैसी करवा दी. उसके गाने का अर्थ अपने अंदाज़ में निकालते हुए दुनियाँ ने भारत को गहना समझ कर लूट लिया. इधर हम हम बजाते रहे "....यह देश है दुनियाँ का गहना" और उधर वे लूटते रहे. अब इतिहास बताता है कि हमें लुटने में मज़ा आता है लिहाजा हम लुटते हुए मज़े लेते रहे. कुछ कर नहीं सके.

अभी दो दिन हुए, टीवी पर एक गीत देख रहा था. फिल्म पाकीजा का; 'चलो दिलदार चलो, चाँद के पार चलो...'

बड़ा सुन्दर दृश्य था. रात थी. चांदनी थी. झील थी. नाव थी. नाव पर पाल थी. नायिका थी. और एक अदद नायक था. इतने 'थी' के बीच एक 'था'. जैसे गोपियों के बीच बांके बिहारी.

ऐसा नहीं है कि पहले यह गीत नहीं देखा था. पहले भी देखा था और अच्छा भी लगा था लेकिन पता नहीं इस बार क्यों देखते-देखते एक सवाल मन में आया कि "यार, ये नायक बड़ा अजीब है. नायिका से कह रहा है कि चलो दिलदार चलो चाँद के पार चलो" और जब नायिका कह रही है कि "हम हैं तैयार चलो" तो फिर बात को टाल दे रहा है. नायिका के अग्रीमेंट वाली लाइन गाने के बाद चाँद के पार जाने पर कोई बात ही नहीं कर रहा. कोई प्रोग्राम नहीं बता रहा कि कैसे जाएगा? चाँद के कितने पार तक जाएगा? वहाँ जाकर क्या करेगा? कुल मिलाकर बात को टालने के चक्कर में है.

मैं कहता हूँ कि भैय्ये, जब नायिका को चाँद के पार ले जाने का लालच दे रहे हो तो उसे निभाओ भी. ये क्या बात हुई कि उधर नायिका बार-बार तैयार हो रही है और तुम हो कि उसके बाद उसे भाव नहीं दे रहे हो. मजे की बात यह कि ऐसा आज से चालीस साल पहले हो रहा था. पाकीजा सन इकहत्तर में बनी थी. जिन बुजुर्गों को आज के नौजवानों से शिकायत रहती है वे प्रेम में सीरियस नहीं रहते मैं उनसे कहता हूँ कि; "तब के नौजवानों की करतूत देखें. देखें कि तब के नौजवान प्रेम में कितना सीरियस रहते थे? देखें कि किस तरह से वे नायिका को झांसा देते थे. देखें कि नायिका को कितना मान देते थे."

मैंने सोचा कि इस मुद्दे पर लोगों से बात की जाय. फिर समस्या यह आई कि अपने देश में इतने तरह के लोग़ हैं. न जाने कितने समाज हैं. इन समाजों के न जाने कितने कितने महत्वपूर्ण प्रतिनिधि हैं. किनसे-किनसे बात करूंगा? फिर लॉटरी करके पाँच-छ लोगों का नाम निकलना पड़ा. देख रहे हैं न कि हम इस मुद्दे पर कितना सीरियस हैं? खैर, जिन लोगों की लॉटरी लगी मैंने उनसे इस गीत की बाबत सवाल पूछा. आप पढ़िए कि उन्होंने क्या कहा?

सबसे पहले पूछा श्री राम खेलावन मल्लाह से. जब नायक-नायिका यह गाना बड़े मीठे सुर में नाव पर बैठे गा रहे थे तब खेलावन ज़ी नाव खे रहे थे. पढ़िए कि उन्होंने क्या कहा?

राम खेलावन ज़ी; "देखिये, हीरो का नीयत पर त हमको भी शंका था. सही बताएं त कई बार मन में आया कि इनको टोंके कि भइया जब हीरोइन कह रही है कि ऊ चाँद के पार आपके साथ जाने के लिए तैयार है त आप इस मुद्दे पर अउर बात काहे नहीं कर रहे. आप अपना परपोजल बड़ा राग में गाकर ओनके सुनाये.कि; "चलो दिलदार चलो, चाँद के पार चलो.." आपकी बात सुनकर ऊ आपसे भी बढ़िया राग में गाकर उसका जवाब दिए कि; "हम हैं तैयार चलो". उसके बाद आप चुप. हम कहते हैं एतना राग में अगर ऊ कोई रियलिटी शो में गाती त चैपियन हो जाती. अच्छा, बात खाली एहीं ख़तम नहीं होती है. ऊ आगे गाकर बताई कि; "आओ खो जायें सितारों में कहीं, छोड़ दें आज ये दुनियाँ ये ज़मीं..." इसका मतलब क्या है? इसका मतलब है कि उनको आपके ऊपर एतना भरोसा है कि ऊ पूरा तरह से दुनियाँ अउर ज़मीन छोड़कर जाने के बास्ते तैयार हैं. लेकिन आप हैं कि आगे कुछ करते ही नहीं. अच्छा ई सुनिए, जब उनको लगा कि आप भाव नहीं दे रहे हैं त ऊ बोलीं कि; "हम नशे में हैं संभालो हमें तुम, नीद आती है जगा लो हमें तुम." मतलब कि हमारे उप्पर ध्यान दो तुम.

अउर ई सुनकर आप क्या किये? आप अउर राग में गाने लगे; "चलो दिलदार चलो, चाँद के पार चलो..." हम आपसे पूछते हैं कि जब ऊ कह रही हैं कि उनको नींद आ रही है अउर आपसे खुद को जगाने का डिमांड कर रही हैं त आपका धरम बनता है कि आप उनको नींद से जगाएं अउर चाँद के पार ले जाने का अपना वादा निभाएं. बाकी आप क्या कर रहे हैं? आप अउर तान छेंड दे रहे हैं. आपको ख़याल नहीं है कि बढ़िया राग में गायेंगे तो उनको अउर नींद आएगी? .......अउर एही नहीं, आगे सुनिए. शंका त हमको ई बात पर भी हुई कि आप किसका भरोसे चाँद के पार जाने का बात कर रहे हैं? आपके पास न तो कौनो बिमान है. ना ही कौनो स्पेसशिप है. महराज आप बैठे हैं नाव में अउर चाँद के पार जाने का बात करते हैं? आज तक रेकाड है कि कोई भी आदमी नाव पर सवार होकर चाँद पर नहीं जा सका है. आपको एतना सिम्पुल बात नहीं बुझाया?...खाली एक लाइन पर अटके रहे. बार-बार एक ही बात; "चलो दिलदार चलो..चलो दिलदार चलो..." ऐसा कहीं होता है? जे हीरो अपना हीरोइन का बात पर ध्यान नहीं देगा ऊ लभ स्टोरी को कैसे आगे बढ़ाएगा?.....

उसके बाद मेरी बात हुई नेता गिरधारी लाल फोतेदार ज़ी से. इस गीत पर अपने विचार व्यक्त करने के लिए उतावले थे. छूटते ही बोले; "आये दिन हमारे ऊपर आरोप लगता है कि हम अपना वादा नहीं निभाते. चुनाव के समय जनता से वादा करते हैं लेकिन भूल जाते हैं अउर नहीं निभाते. आज आप खुद ही सोचिये कि यह हमने कहाँ से सीखा है? जनता से वादा न निभाने का जो रोग आज हर राजनैतिक पार्टी में पनपा है वह हम नेताओं ने इस गीत को देखकर सीखा है. सच्चाई यह है कि पाकीजा आने से पहले तक हम नेता लोग़ जनता से किया गया वादा निभाते थे लेकिन जैसा कि आप जानते हैं एक फिल्म का नेताओं पर बहुत असर पड़ता है, इस फिल्म का भी हमारे ऊपर असर पड़ा. इतना गहरा असर कि हमने वादा वगैरह निभाने के बारे में सोचना बंद कर दिया. आप देखिये और मानिए कि केवल राजनीति फिल्मों को प्रभावित नहीं करती, फिल्में भी राजनीति को प्रभावित करती हैं. खुद ही सोचिये कि एक आदमी वन टू वन लेवल पर अपना वादा निभाने के लिए तैयार नहीं है. ऐसे में आप नेताओं से कैसे आशा कर सकते हैं कि वे जनता से किये गए वादे निभाएं? आपको नहीं लगता कि..... "

इसी मुद्दे पर समाजशास्त्री दीपांकर गुप्ता ने बात करते हुए कहा; "देखिये शोध बताता है कि सत्तर के दशक के शुरुआत में गीतों में नायकों ने सामाजिक स्तर पर एक-दूसरे को नीचा दिखाना शुरू कर दिया था. इस गीत को ही लीजिये. नायक अपनी नायिका को चाँद के पार ले जाना चाहता है. आप अगर ध्यान देंगे तो इसके पहले तक फ़िल्मी गीतों में नायक अपनी नायिका से चाँद, तारे, ग्रह, उपग्रह वगैरह को तोड़ लाने की बात करता था. मुझे लगता है कि शायद दूसरे नायकों के आगे यह नायक खुद को हीन भावना से ग्रस्त पाता होगा. यही कारण होगा कि अपने गीत में उसने नायिका से सीधे चाँद के पार जाने का वादा कर लिया. इस गीत को अगर हम सोसियो-इकॉनोमिक-पोलिटिकल ऐंगल से देखें तो पायेंगे कि कभी-कभी आदमी ऐसा कुछ कहता है जो वह कर नहीं सकता. और ऐसा नहीं कि उसे इस बात का भान नहीं है कि वह कर नहीं सकता. उसे यह बात पता है लेकिन समाज से इतना सताया हुआ रहता है कि एक तरह जिद उसके अन्दर घर कर जाती है. आप अगर उस समय की घटनाएं देखें तो पायेंगे कि यह वह समय था जब भारतीय समाज एक विकट परिवर्तन के मुहाने पर खड़ा था. इस गीत का सोशल और ह्यूमन आस्पेक्ट अगर ध्यान से देखें तो हम पायेंगे कि......"

इसी मुद्दे पर अपने मनोहर भइया यानि महान समाजवादी राम मनोहर ज़ी बोले; "शिव, मेरा ऐसा मानना है कि यह गीत अपने आप में एक ऐतिहासिक गीत है. यह गीत एक तरह से हमारे अन्दर आशा का संचार करता है. यह हमें बताता है कि हम काव्य के सहारे किस तरह से साम्राज्यवादी अमेरिका पर चोट कर सकते हैं. यह गीत साम्राज्यवाद के मुँह पर एक तमाचा है. मुझे मालूम है कि तुम सोच रहे हो कि मैं ऐसा क्यों कह रहा हूँ? चलो तुम्हें बता ही देता हूँ. घटनाओं को देखो तो तुम्हें याद पड़ेगा कि सन १९६९ में अमेरिका ने यान भेजकर अपने दो अंतरिक्ष यात्रियों को चाँद पर उतारा था. अब अगर इस गीत में नायक यह कहता कि वो नायिका को चाँद पर ले जाना चाहता है तो नायिका को लगता कि चाँद पर जाना कौन सी बड़ी बात है? अभी दो साल पहले ही अमेरिका के दो लोग़ चाँद पर गए थे. इसीलिए कैफ साहब ने ऐसा लिखा कि चलो दिलदार चलो चाँद के पार चलो, माने यह कि भले ही नायक आम भारतीय है लेकिन सोच में वह किसी अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री से कम नहीं है. अगर अमेरिका वाले चाँद पर जा सकते हैं तो एक आम भारतीय चाँद के पार तक जा सकता है. वैसे भी कैफ भोपाली साहब की गिनती इंकलाबी शायरों में होती है. तुम मानों या न मानो, यह गीत हिंदुस्तान के लिए एक धरोहर है. एक ऐसा धरोहर जिसने अमेरिकी साम्राज्यवाद के मुँह पर करार तमाचा जड़ा था...."

जब मैंने प्रसिद्द अंतरिक्ष वैज्ञानिक एस वेंकटेसन नायर से इसके बारे में बात करनी चाही तो वे बोले; "दिस्स यिज याल रब्बिस. अई मीन हाऊ कुड यि हैव गान बियांड मून, दैट टू, सिटिंग यिन या याच? यैंड यिवेन यिफ्फ़ ई ऐड या प्लान, ई शुड हैव यिस्पेसिफाइड यिट. अई मीन नेम याफ दा प्लानेट, ई वांटेड टू ल्यैंड यपान. दिस्स सांग यिज टोटली यन-साइंटिफिक. वन्न शुड नाट यिस्पिक यबाउट समथिंग विच यि कैन नॉट डू यैंड विच इज्ज नॉट सपोर्टेड बाइ साइंस..."

Wednesday, June 30, 2010

डायलाग इज द ओनली वे फॉरवर्ड - पार्ट २




अगर यह पार्ट -२ है तो जाहिर सी बात है कि पार्ट -१ भी होगा ही. तो पार्ट -१ को पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक कीजिये.


अब आगे का हाल....


एक नेता जी से पत्रकार ने सवाल किया कि; "कट-मोशन में तो आप सरकार के साथ थे. आज उसके विरुद्ध क्यों हैं?"

उन्होंने जवाब दिया; "ढेर दिन हो गया था जे हम सरकार का विरोध नहीं किये थे. पब्लिक सब सोच रहा था कि कहीं हम सरकार के साथ त नहीं हो गए? दू महीना हो गया था आ हमलोग को विरोध करने का कोई मुद्दा नहीं मिल रहा था एही बास्ते हम विदेश नीति का बात पर सरकार के विरोध में चले गए."

उसके बाद पत्रकारों का सवाल और नेता जी का जवाब. पत्रकारों के हर सवाल का नेता जी ने जवाब दे डाला. विद्यार्थी जीवन में कॉपी में जवाब लिखते तो कम से कम ग्रैजुएट तो होकर निकलते लेकिन कोई बात नहीं. जब जवाब दो तभी सबेरा. पूरी प्रेस कॉन्फरेंस ख़त्म होने के बाद तीन-चार मोटी बातें निकल कर आयीं. जैसे नेताजी बहुत इम्पार्टेंट हैं. उनके पास तीन सांसद हैं तो क्या हुआ, सरकार चलाने के लिए उनका समर्थन चाहिए ही चाहिए. सरकार को आगे 'वूमेन रिजरभेशन' बिल, न्यूक्लियर लायबिलिटी बिल वगैरह-वगैरह लाना है. और लास्ट बट नॉट द लिस्ट जो बात थी वह ये थी नेता जी को सरकार हल्के में नहीं ले सकती.

ये तो रही अशुद्ध विपक्ष के नेता की बात.

उधर विशुद्ध विपक्ष के नेता लोग भी सरकार के खिलाफ बोल रहे थे. दबाव वगैरह बनाने में जब सफल नहीं हो सके तो बोले कि; "हम इस मुद्दे को जनता के बीच ले जायेंगे."

बताइए, जनता के बीच क्या मुद्दों की कमी है? ये नेता लोग बोलते समय कुछ सोचते नहीं. यहाँ तक कह देते हैं कि; "मंहगाई के मुद्दे को हम जनता के बीच ले जायेंगे." अब इन्हें कौन समझाये कि; "हे चिरकुट, तुम मंहगाई के मुद्दे को जनता के बीच क्या ले जाओगे? वह मुद्दा वहीँ से तो निकला है."

लेकिन वही बात है न. राजू श्रीवास्तव के शब्दों में; "मुँह खोला और भक्क से बोला."

विषयांतर हो गया. ब्लॉग पर रिपोर्टिंग में यही सुविधा है कि जब चाहे रिपोर्टिंग को छोड़कर अपना ज्ञान और दर्शन ठेल दो. अब बताइए अगर मैं अखबार का संवाददाता होता तो ऐसा कर पाता? नहीं न.

खैर, आगे बढ़ते हैं. हाँ तो जब विशुद्ध विपक्ष ने भी मामले को गरमा दिया तो अपनी ईमेज बनाने के लिए सरकार इस बात पर राजी हो गई कि वह एक सर्वदलीय बैठक बुला देगी. उसमें सभी दलों को विश्वास में लेने की कोशिश के जायेगी. अगर ठीक उस दिन विश्वास की शार्ट सप्लाई नहीं हुई तो शायद इन दलों को सरकार सिश्वास में ले ले.

मीटिंग के दिन एक जगह सभी दलों के प्रतिनिधि इकठ्ठा हुए. मेज थी. मिनरल वाटर की बोतलें थीं. कुर्सी के आगे नेमप्लेट थीं. सब अपनी-अपनी नेम प्लेट के पीछे बैठ गए. कुछ लोगों ने दबे स्वर में प्रोटेस्ट भी किया कि नेमप्लेट अंग्रेजी में क्यों लिखी गईं हैं? प्रोटेस्ट वगैरह करके जब सब शांत हुए तो सरकार की तरफ से डिप्यूट किये गए मंत्री ने इन प्रतिनिधियों को संबोधित करते हुए शुरू किया; "ऐज उई आल आर अभेयार, गभार्मेंट हैज रिसेंटोली डिस्कोभार्ड द फैक्ट दैट उइथ द हेल्प आफ डायोलाग..."

अभी वे इतना ही बोल पाए थे कि मीटिंग हाल में बत्ती गुल हो गई. अँधेरा हो गया. एक आवाज़ आई, " मानीय मंत्री महोय अंगेजी में मीटिंग शुरू करेंगे तो ऐसा ही होगा. अंगेजी निशानी है अँधेरे की."

उस आवाज़ को समर्थन देते हुए पास से ही एक और आवाज़ आई; "आप ठीक कहे हैं. ओही खातिर गई है बत्ती. दादा सरकार की बत्ती शुरुवे में गुल हो गया?"

ये आवाज़ सुनकर सब हँस पड़े. मंत्री महोदय को भी हँसना पड़ा.

अभी सब हँस ही रहे थे कि एक गंभीर आवाज़ आई; "पॉवर जनरेशन एंड डिस्ट्रीब्यूशन में रेफोर्म्स के लिए ग्रुप ऑफ़ मिनिस्टर बनाया होता तो कम से कम बिजली तो नहीं जाती."

"अरे त आप जब बोले थे कि कायद-ए-आजम सेकुलर हैं तब त बिजली नहीं गया था. तब त बिजली था औ तब भी त नहीं लौका आपको? दस महीना बाहर रहकर पाटी में आये हैं त बड़ा-बड़ा बात?"; फिर से आवाज़ आई.

इन आवाजों के बीच मंत्री महोदय ने सोचा कि मौज-मस्ती में विषयांतर न हो जाए. यही सोचते हुए वे बोले; "में आई हैव इयोर अटेंशोन...."

फिर से एक आवाज़ आई; "फेर ओही अंग्रेजी? पहला बार बोले तो बत्ती गुल हो गया. फेर ओही भाषा में शुरू करेंगे त अबकी बार हाल में आगे न लग जाए.."

"आच्छा ठीक है. हाम हिंदी में बोलता है. रेस्पेक्टेड डेलिगेट्स जैसा कि जानता है कि सोरकार ने पकिस्तान के साथ सोभी सोमस्सा को डायलाग..."

अभी उन्होंने अपनी हिंदी में संबोधन शुरू ही किया था कि एक तरफ से आवाज़ आई;"वाट यिज दिस सार? यानरेबल
मिनिस्टार यिज यिस्पिकिंग इन यिंदी? वी वांट टाल रेट यिट. आवर रिस्पेक्टेड डाक्टर कलैन्य्गार सार विल नाट याल्लो यिट. प्लीज यिस्पीक यिन यिन्ग्लिश."

फिर से झमेला. अंग्रेजी और हिंदी की लड़ाई में आखिर में अंग्रेजी जीत गई. मंत्री महोदय ने फिर से शुरू किया; "ऐज उई आर अभेयार, उई आर हीयार टू मेक सोम काइंड ऑफ़ कोंसेंसोस ऑन द डायोलाग डोस्सियोर हूविच उई उविल साब्मिट टू द पाकिस्तान फार देयार अप्रूभाल..."

अभी तक बिजली नहीं आई थी लेकिन देश के बड़े दिमागों का एक मिनट भी व्यर्थ न हो, इसलिए मीटिंग जारी थी.

अँधेरे में एक आवाज़ उठी; "हाँ त सरकार सही सोचा है. बढ़िया डायलाग लिखने वाला सब को बुलाया जाय और उससे डायलाग लिखवाया जाय. हम अनुमोदन करते हैं ऊ आदमी का नाम जो फिलिम मुग़ल-ए-आजम का डायलाग लिखे रहे. का नाम था उनका...एक मिनट हम लिख के लाये हैं..नेता जी तनी अपना मोबाइलवा जलाइए..हाँ..अमानुल्ला खान..उनसे लिखवायें. ऊ बढ़िया लिखेंगे और पाकिस्तान का मामला है त उर्दू में डायलाग रहने से ही ठीक रहेगा ."

"आई नोट डाउन इयोर रेकोमेंडेशोन बाट आई थिंक ही में नॉट बी अलाइभ नाऊ. बाट आई अस्योर इयु दैट उई उविल चेक ह्वेदार...."; मंत्री जी ने नेता जी को आश्वासन दिया.

मंत्री जी का आश्वासन पूरा हुआ ही था कि एक आवाज़ आई; "वी हैव आब्जेक्शान सार. वी तिंक यिट विल बे बेटर यिफ डायलाग्स यार रीटेन यिन तमिल. आवर रिस्पेक्टेड डाकटार कलैन्यगार सार येज रीसेंटली डिमांडेड दैट तमिल बी मेड या नेशनल लैंग्वेज. ही विल बी वेरी हैपी यिफ डास्सियर टू बी सबमिटेड टू पाकिस्तान विल बी रिटेन यिन क्लासिकल तमिल..आवर रिस्पेक्टेड डाकटार कलैन्यगार सार आर्गेनाइज्ड यिन्टरनेशनल क्लासिकल तमिल कांफेरेंस टू टेल टू दा वाल्ड..."

एक आवाज़ और आई; "बस करो. बस करो. खुदे बोलते रहोगे कि औउर भी कोई बोलेगा? अरे डायलाग लिखायेगा त हिंदी में या उर्दू में. तमिल कौन समझेगा वहाँ?"

ये बात सुनकर पहले वाली आवाज़ फिर आई; "बट यिफ यू रिमेम्बर सार, वन ऑफ़ द डास्सियर सबमिटेड टू पकिस्तान यिन दा ट्वेंटी-सिक्स एलेवेन केस येज समथिंग रिटेन यिन मराठी..."

"अरे ऊ छोड़ो..ऊ त गलती था. एक ही गलती केतना बार करेगा सरकार?"; फिर से वही विरोध जताने वाली आवाज़ आई.

"दीस इज नाट दा स्टेज टू फाईट ईच-ओदर"; मंत्री जी ने सलाह दी.

अँधेरे में एक धीर-गंभीर आवाज़ उभरी; "हमारी पार्टी का ऐसा मानना है कि हमारे पार्टी माऊथपीस के जो सम्पादक हैं उनसे लिखवाया जाय..बढ़िया लिखते हैं. वे बढ़िया डायलाग लिखेंगे."

"अरे त आप भी त किताब लिखे हैं. किसको-किसको सेकुलर बताते फिरते हैं. आप किताब लिख सकते हैं त डायलाग भी लिख दीजिये. दस महीना बाद पार्टी में लौटे हैं और पार्टी भेज भी दिया मीटिंग में"; पूरी मीटिंग में डोमिनेंट आवाज़ फिर से उभरी.

अब बारी थी एक नई आवाज़ के उभरने की. उसने कहा; "अभी प्रकाश झा की फिल्म राजनीति हिट हुई है. हमारा कहना है कि उन्हें डायलाग लेखन की समझ है. उनसे डायलाग लिखवाया जाना चाहिए. हमारे नेता और मुख्यमंत्री भी इस पक्ष में हैं."

एक बार फिर से डोमिनेंट आवाज़ उभरी; "का कहे? प्रकाश झा? अरे नाम लेना था त किसी सेकुलर डायलाग राइटर का नाम नहीं मिला? ओइसे भी मिलेगा कैसे? आपके मुख्यमंत्री का फोटो किसके साथ अखबार में प्रकाशित हुआ ऊ त सब देखा ही है."

"हमारी पार्टी बिहार के किसी राइटर को डायलाग नहीं लिखने देगी. वईसे भी पकिस्तान की बात पर किसी भी बात का विरोध पहिले महाराष्ट्र से ही होगा"; एक नई आवाज उभरी.

"नै..नै..ई नहीं चलेगा. बिहार के लोगों का बिरोध बम्बई में त करता ही था तुम लोग, अब पाकिस्तान में भी करने लगा? आ सुनिए दादा, हम एक और नाम देते हैं. जाभेद अख्तर. सबसे बड़ा बात है कि आदमी सेकुलर है. उर्दू भी जानते ही होंगे. औउर ऊ अब त पार्लियामेंट में भी है"; डोमिनेंट आवाज़ ने फैसला जैसा कुछ सुनाते हुए कहा.

"बाट सार, वी रेकमेंड नेम ऑफ़ बासंती, दा प्येमस तमिल राइटर फॉर दिस काज"; पहले वाली आवाज़ ने एक बार फिर से ट्राई मारा.

"प्रकाश झा"

"जाभेद अख्तर"

"बासंती"

"सुनील गंगोपाध्याय"

सब अपना-अपना रेकमेंडेशन अँधेरे में ही दोहराते जा रहे थे.

मंत्री महोदय को लगा कि अँधेरे में पता भी नहीं चल रहा है कि केवल गले काम कर रहे हैं या फिर और भी अंग? कहीं ऐसा तो नहीं कि हाथ-पैर भी काम करने पर उतर आयें. उन्हें लगा कि मीटिंग अगर ख़त्म न की गई तो कोई अनहोनी हो सकती है. यही सोचते हुए वे बोले; "ओके..ओके..भाट आई हैभ कोंक्लूडेड ईज, दैट उई हैभ नाट एराइव्ड ऐट एनी कोंसेंसोस.... आई उविल आस्क आनरेबल प्राइम मिनिस्टर टू फार्म आ ग्रूप आ मिनिस्टोर हुविच उविल कोऑर्डिनेट बिटभीन गभार्मेंट ऐंड दा अपोजीशोन"

मीटिंग ख़त्म हुई. अब सरकार को-ओर्डिनेशन बनाने के लिए डायलाग राइटर ढूढ़ रही है.

Monday, June 28, 2010

डायलाग इज द ओनली वे फॉरवर्ड - पार्ट 1




पूरा देश साँसे थाम कर बैठा था. भारत और पकिस्तान के विदेश सचिव वार्ता कर रहे थे. पिछला रिकॉर्ड बताता है कि जब भी पाकिस्तान के साथ अपने देश की वार्ता होती, देश के लोगों की सांसें थम जाती थीं. उसी परंपरा और संस्कृति का निर्वाह आज भी हो रहा था. लोग गुटों में बैठे थे और गुटों में ही खड़े थे. गुटों की ये सक्रियता आभास दिला रही थी कि गुटबाजी ही भारत को एक एक्टिव देश का दर्जा दिलवाती है. टीवी चैनल के संवाददाता वार्ता स्थल के बाहर अपनी हार्ट-बीट थामने की एक्टिंग करते हुए क्यूट जैसे कुछ लग रहे थे. कैमरे क्लिक होने के लिए बेताब थे. टीवी न्यूज चैनल के स्टूडियो में बैठे पैनेलिस्ट कयास लगा रहे थे.

नुक्कड़ों पर गुट चर्चारत थे. कुछ गुटों को देखकर डर लग रहा था कि कहीं ये लोग उसी जगह खड़े-खड़े अपनी पॉलिटिकल पार्टी न लॉन्च कर डालें. चाय की बिक्री बढ़ गई थी. बाज़ारों में पान की कमी हो गई थी. लोगों को खाने-पीने की सुध नहीं थी. टेंशनग्रस्त देश यही सोच रहा था कि क्या होगा आज? वार्ता ख़त्म होने के बाद सुनने को क्या मिलेगा? कुछ लोगों को वार्ता करने वालों पर पता नहीं किन कारणों से विश्वास तो नहीं लेकिन विश्वास जैसा कुछ था. ये लोग यह सोचते हुए डर रहे थे; "ऐसा तो नहीं कि पकिस्तान के साथ हमारी समस्याएं आज ही सॉल्व हो जायेंगी?" फिर उन्ही मन में सांत्वना के स्वर उभरते; "नहीं-नहीं ऐसा नहीं हो सकता."

सांत्वना के ये स्वर सही थे. जिन दिलों से ये स्वर निकल रहे थे उनके मालिकों को अपने देश के नेताओं पर पूरा भरोसा था. उन्हें पता था कि जवाहरलाल से लेकर देवीलाल तक, सभी ने जबानी जमाखर्च तो बहुत किया था लेकिन किसी ने आजतक पकिस्तान के साथ एक भी समस्या नहीं सुलझाया था. ऐसे में समस्या न सुलझा पाने की हमारी संस्कृति की रक्षा करने का काम वर्तमान पीढ़ी के जिम्मे है और हमारे नेता देशवासियों के इस विश्वास की रक्षा कर के छोड़ेंगे.

इन स्वरों को थोड़ा-बहुत बल इस सिद्धांत से भी मिल रहा था कि हर देश का अपने पड़ोसी देश के साथ कुछ न कुछ लफड़ा रहना ही चाहिए. लफड़ा नहीं रहे तो लगता ही नहीं कि देश जिन्दा है. लफड़े ही देश के जिंदा रहने का सुबूत होते हैं.

इन्ही सोच-विचार की लहरों में दिन डूबा जा रहा था. अचानक शाम को कॉन्फरेंस रूम का दरवाजा खुला. दरवाज़ा खुलने के बाद जो हरकतें हुई उन्हें देखकर लगा कि कुछ दरवाजे कितने महत्वपूर्ण होते हैं. खैर, दरवाजा खुला और अन्दर से दोनों देशों के विदेश सचिव निकले. भारतीय विदेश सचिव मुस्कुराते हुए आगे बढीं. संवाददाताओं ने उन्हें घेर लिया. इन संवाददाताओं को देख कर लगा जैसे उन्हें पूरा विश्वास था कि आज विदेश सचिव कुछ ऐसा कहने वाली थीं जो भारत और पकिस्तान के पंगात्मक इतिहास में किसी प्रधानमंत्री, विदेश मंत्री या विदेश सचिव ने नहीं कहा था.

विदेश सचिव ने संवाददाताओं के इस विश्वास को थाम लिया और कहा; "विद टूडेज मीटिंग, वी हैव अराइव्ड ऐट द कान्क्लूजन दैट डायलाग इज द ओनली वे फॉरवर्ड."

उनकी बात सुनकर वहाँ उपस्थिति लोगों की बांछें खिल गईं. सब हतप्रभ होकर एक-दूसरे को देखने लगे. लोगों को देखकर लग रहा था जैसे उन्हें विश्वास हो चला था कि विदेश सचिव द्वारा कही गई डायलाग वाली बात बहुत गहरी थी और अब भारत और पकिस्तान के बीच समस्याओं का सुलझना निश्चित है. कुछ लोगों ने इस विदेश सचिव की सराहना करते हुए पुराने विदेश सचिवों की आलोचना कर डाली. यह कहते हुए कि; "इतनी-इतनी सैलेरी लेते थे वे लोग, कहने को बढ़िया दिमाग रखते थे लेकिन उनके दिमाग में कभी यह बात नहीं आई कि; "डायलाग इज द ओनली वे फॉरवर्ड."

लानत है.

विदेश सचिव द्वारा बोले गए 'बयानीय सेंटेंस'को सुनकर मन में भाव आ रहे थे जैसे देश के एक सौ बीस करोड़ लोग डायलाग बोलते हुए पाकिस्तान की तरफ बढ़ते जा रहे थे और उनके रास्ते की तमाम मुश्किलें अपने आप हटती जा रही थीं.

बधाइयाँ दी जा रही थीं. बधाइयाँ ली जा रही थीं. विदेशी टीवी चैनलों के रिपोर्टर्स भी खुश थे, खासकर अमेरिकी रिपोर्टर्स, जिन्हें यह लगता है कि भारत और पकिस्तान के बीच अगर मारपीट न हो सके तो कम से कम बातचीत या वैसा ही कुछ होते रहना चाहिए. वे अपने-अपने चैनलों के लिए अपनी रिपोर्ट रिकॉर्ड करवा रहे थे. चारों दिशायें मुस्कुराहटों से भरी हुई थीं. भारतीय दल खुश था तो पाकिस्तानी दल महाखुश.

शाम को सरकार ने इस डायलाग वाली बात के बारे में बताया कि यह इक्कीसवीं सदी का सबसे बड़ा रहस्योद्घाटन है और इस रहस्य के साथ ही पाकिस्तानी पंगों का अंत तय है. प्रधानमन्त्री खुश थे. विदेश मंत्री तो बहुत खुश थे. कूटनीति की सफलता ने सबके चेहरे चमका दिए थे. रूलिंग पार्टी के प्रवक्ता से लेकर उठभैये और छुटभैये नेता तक माइक्रोफोन के सामने बाईट देने में बिजी थे. प्रस्ताव पारित करके लड्डू वितरण समारोह का आयोजन किया गया. तमाम पत्रकार इस बात से चकित थे कि एक रहस्योद्घाटन कितना महत्वपूर्ण हो सकता है.

विदेश सचिव की डायलाग वाली बात पर पूरा देश ही कयास लगा रहा था. सब अपने-अपने अंदाज़ में बातें कर रहे थे. सरकार किसे चुनेगी डायलाग लिखने के लिए? क्या किसी पुरानी फिल्म के डायलाग राइटर को लाया जाएगा? कहीं ऐसा तो नहीं कि पकिस्तान के साथ समस्याएं सुलझाने के लिए सलीम-जावेद एक बार फिर से जोड़ी बना लेंगे? कोई कह रहा था कि कादर खान जी से लिखवाना चाहिए. कोई बोला कि अब के ज़माने में कादर खान जी के डायलाग नहीं चलेंगे. अब जमाना बदल गया है. अब किसी नए राइटर को ट्राई किया जाएगा. किसी ने सुझाव दिया कि पाकिस्तान की बात है लिहाज़ा डायलाग उस राइटर से लिखवाना चाहिए जिसने सनी देओल की फिल्म में एक डायलाग लिखा था कि "दूध मांगोगे तो खीर देंगे, कश्मीर मांगोगे तो चीर देंगे." किसी ने कहा धत्त, उससे लिखवाओ जिसने ग़दर एक प्रेम कथा का डायलाग लिखा था. कोई बोला हो सकता है सरकार किसी पत्रकार को हायर कर ले.

टीवी चैनलों ने सात-आठ नामों को दिखाकर एस एम एस वोटिंग करवाना शुरू कर दिया था.

उधर लड्डू बँटे. मीटिंग्स हुईं. लोग जमा हुए. कहीं-कहीं लोग जमे भी. देश-विदेश के टीवी चैनलों ने भारतीय सरकार की सराहना की. अमेरिकी राष्ट्रपति ने राहत की सांस लेने की एक्टिंग की. उन्होंने हमारे प्रधानमंत्री को बधाई दी. हमारे प्रधानमन्त्री ने फट से बधाई लेकर उसे अपनी उस एक्सक्लूसिव आलमारी के हवाले किया जिसमें वे अमेरिकी राष्ट्रपति की बधाइयाँ और सन्देश बड़े करीने से सजाते थे.

जब अमेरिकी राष्ट्रपति के सन्देश आलमारी के हवाले हो गए और इनिशियल सेलिब्रेशन की धूल-धक्कड़ सेटल हुई तो विदेश सचिव ने एक राज खोला. डिप्लोमेसी की यही विशेषता है कि सबकुछ एक बार में सामने नहीं आता. वैसे भी बातें रह-रह कर सामने आयें तो डिप्लोमेसी में दिलचस्पी बनी रहती है. इसी दिलचस्पी को बरकरार रखते हुए विदेश सचिव ने बताया कि यह डायलाग वाली बात पर पाकिस्तान की तरफ से एक रायडर लगा दिया गया है.

जब विदेश सचिव से इस रायडर के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा; "पाकिस्तान चाहता है कि भारत पहले डायलाग के कम से कम दस डोस्सियर बनाकर पकिस्तान को दे जिससे उसके डोस्सियर एक्सपर्ट उसे जांच सकें. वे जब डायलाग को जांचकर उसे अप्रूव कर देंगे तब अगला स्टेप लिया जाएगा."

विदेश सचिव की बात सुनकर प्रधानमन्त्री मुस्कुरा दिए. पीए ने धीरे से पूछा; "सर आपकी मुस्कराहट देखकर लगता है जैसे आपको कुछ याद आ गया."

अपने पीए की बात सुनकर प्रधानमंत्री बोले; "हाँ. दरअसल मुझे अचानक एक लाइन याद आ गई कि; म्यूचुअल-फंड इन्वेस्टमेंट्स आर सब्जेक्ट टू मार्केट रिस्क. प्लीज रीड द ऑफर डाक्यूमेंट केयरफुली बिफोर इन्वेस्टिंग."

उसके बाद दोनों ने एक दूसरे को देखा और दोनों मुस्कुरा दिए.

खैर, उसके बाद प्रधानमंत्री विदेश सचिव से मुखातिब होते हुए बोले; "तो इसमें कौन सी बड़ी बात है? डायलाग का डोस्सियर ही तो बनवाना है. पहले की बात होती तो कोई चिंता भी थी लेकिन अब बिलकुल चिंता नहीं है. अब तो हमारे पास ग्रुप ऑफ़ मिनिस्टर्स का फंडा भी है. एक काम करता हूँ. मैं एक ग्रुप ऑफ़ मिनिस्टर्स बना देता हूँ जो मीटिंग्स करके बताएगा कि किस राइटर से डायलाग लिखवाना है? अपने यहाँ डायलाग लिखने वालों की कमी थोड़ी है. देश के ट्वेंटी परसेंट लोग कई सालों से डायलाग बोल रहे हैं और बाकी सुन रहे हैं. कहिये तो पूरा देश ही डायलाग से ही चल रहा है. आप बिलकुल निश्चिन्त रहें. हम डायलाग के ऐसे-ऐसे डोस्सियर देंगे कि वहाँ के डोस्सियर एक्सपर्ट उसे रिजेक्ट नहीं कर पायेंगे. मुझे अपने ग्रुप ऑफ़ मिनिस्टर्स पर पूरा भरोसा है."

दूसरे दिन लोकसभा में प्रधानमंत्री ने सदन को जानकारी देते हुए कहा; "हमें यह बताते हुए ख़ुशी हो रही है कि पाकिस्तान के साथ हमारी समस्याएं अब ख़त्म हो जायेंगी. हमें पता चल गया है कि डायलाग का सहारा लेकर सबकुछ ठीक किया जा सकता है. मैंने आज आफिस पहुँचते ही एक ग्रुप ऑफ़ मिनिस्टर्स बना दिया है जो उन राइटर्स का सेलेक्शन करेगा जो डायलाग लिखेंगे और साथ ही उन एक्टरों का भी सेलेक्शन करेगा जो लिखे गए डायलाग की डेलिवरी करेंगे."

प्रधानमंत्री की बात सुनकर विपक्ष और साथी दल वाले भड़क गए. शोर जब थमा तो पता चला कि बाकी के दल चाहते हैं कि चूंकि यह विदेश नीति का मामला है इसलिए बाकी दलों को विश्वास में लेना ज़रूरी है. वैसे भी कई महीने हो गए थे सरकार ने सभी दलों को विश्वास में नहीं लिया था. पिछली बार सरकार ने सांसदों की सैलेरी बढ़ाने के मामले में सभी दलों को विश्वास में लिया था. लेकिन उस बात को करीब सात महीने बीत गए थे. ऐसे में बाकी दलों की यह बात जायज भी लगी.

कभी विपक्ष में और कभी पक्ष में रहने वाले एक नेता जी बोले; "भाट इज दिस? ऐसा नै चलेगा. हम नाराज हूँ. सरकार का ड्यूटी है कि ऊ जेतना सेकुलर दल है ऊ सबको विशबास में ले.... आल दी सेकुलर पार्टी...का समझा? आ हम क्लीयर कर दें कि ई मुद्दा पर पर हम आ नेताजी साथ-साथ हैं. टूगेदर...कह सकता है सब कि ई मुद्दा पर हम विपक्ष में हैं...एतना इम्पार्टेंट फैसला बिना सब सेकुलर पार्टी से बात किये लिया कैसे सरकार ने? हमर डिमांड है कि इसके लिए 'सर्भदलीय' बैठक बुलाई जाय...आल पार्टी मीटिंग..तब जाके फैसला फाइनल होगा."

शोर मच गया. हंगामा हो गया. वाक आउट हो गया. अध्यक्ष ने लोकसभा की कार्यवाई स्थगित कर दी. विपक्ष ने जहाँ इसे लोकतंत्र की हत्या बताया वहीँ सरकार ने इसे लोकतंत्र को मजबूती प्रदान करने वाला कदम बताया. एक ही मुद्दे पर लोकतंत्र के ट्रीटमेंट को लेकर सरकार और विपक्ष एक्सट्रीम पर थे. यह देखकर एक बार फिर से लगा कि देश में केवल और केवल लोकतंत्र है, लोकतंत्र के अलावा कुछ नहीं है.

मीडिया में भी लोकतंत्र छाया रहा. जहाँ इस मुद्दे पर मीडिया का एक ग्रुप सरकार के पक्ष में था वहीँ दूसरा ग्रुप विपक्ष के पक्ष में था. दूसरा ग्रुप चाहता तो सरकार के विपक्ष में भी हो सकता था लेकिन पता नहीं क्यों उसे इस मुद्दे पर विपक्ष के पक्ष में होना ज्यादा उचित लगा. खैर, दोनों तरफ के लोग अपने-अपने स्टैंड पर डटे रहे.

नेता जी से पत्रकार ने सवाल किया कि; "कट-मोशन में तो आप सरकार के साथ थे. आज उसके विरुद्ध क्यों हैं?"

उन्होंने जवाब दिया; "ढेर दिन हो गया था जे हम सरकार का विरोध नहीं किये थे. पब्लिक सब सोच रहा था कि कहीं हम सरकार के साथ त नहीं हो गए? दू महीना हो गया था आ हमलोग को विरोध करने का कोई मुद्दा नहीं मिल रहा था एही बास्ते हम विदेश नीति का बात पर सरकार के विरोध में चले गए."

...जारी...

Wednesday, March 24, 2010

ईर्ष्या पर वे कहते हैं....




आज प्रवीण पाण्डेय जी ने ईर्ष्या पर एक बढ़िया पोस्ट लिखी. बढ़िया तो वे हर विषय पर लिखते हैं. ईर्ष्या की जगह मसला सत्य या असत्य का होता तो भी वे उतना ही बढ़िया लिखते. कविता का मामला होता तो भी बढ़िया ही लिखते.

ईर्ष्या पर ब्लॉगर बन्धुवों ने टिप्पणी कर दी लेकिन सोचने वाली बात यह है कि दुनियाँ में क्या केवल ब्लॉगर ही रहते हैं? दुनियाँ तो नेता, अभिनेता, क्रिकेट खिलाड़ी, टेनिस खिलाड़ी, बाबा जी लोग, योगी, भोगी, रोगी, निरोगी, आयोगी और न जाने किन-किन से बनी है. जिस दुनियाँ में मनुष्य रहते हैं उसी में शरद पवार भी रहते हैं.

मेरा कहना यह है कि जब इतने सारे लोग रहेंगे तो ईर्ष्या जैसे महत्वपूर्ण विषय पर केवल ब्लॉगर बन्धुवों की टिप्पणी का होना तो सरासर अन्याय है. ऐसे में मैंने तमाम और लोगों की टिप्पणी इकठ्ठा की और उसे छाप रहा हूँ. आप पढ़िए.

बाबा रामदेव (अपने एक शिविर में) : "हे हे हे..मुझसे लोग पूछते हैं बाबाजी, ईर्ष्या क्या है? क्या है ईर्ष्या? चरक-संहिता और पतंजलि योगपीठ...क्षमा कीजिये मेरा मतलब पतंजलि योगदर्शन में लिखा गया है कि ईर्ष्या एक प्रकार का रोग है. तमाम बाबा लोग..खुद को साधू कहने वाले लोग मुझसे बड़ी ईर्ष्या करते हैं कि मैं इतना सफल कैसे हूँ?. परन्तु घबराने की बात नहीं. ईर्ष्या का इलाज है. रोज सुबह-शाम कपालभांति और अनुलोम-विलोम प्राणायाम से ईर्ष्या जैसी गंभीर बीमारी से छुटकारा पाया जा सकता है. हे..हे..बड़ी-बड़ी बीमारियाँ ठीक हो जाती हैं. ह्रदय रोग, कैंसर जैसी बीमारी ठीक हो जाती है. हे हे ...करो बेटा करो...एक बहन आयी हैं पानीपत से...क्या नाम बताया आपने अपना?...हाँ?.. बहन बिमला...ये पिछले बारह वर्षों से ईर्ष्या की बीमारी से पीड़ित थी लेकिन कपालभांति और अनुलोम-विलोम से...कितना बताया बहन तुमने...कितना? बाईस किलो...हे हे ..बाईस किलो ईर्ष्या कम हुई है इनकी...हाँ.. करो बेटा..करो."

सुश्री मायावती : " .....हमारी सरकार के ऊपर आरोप लग रहे हैं. पहले केवल मनुवादी आरोप लगाते थे प्रंतु अब कांगरेस भी ऐसा कर रही है. ये सब लोग बहुजन समाज से ईर्ष्या करते हैं. मुझसे ईर्ष्या करते हैं. अब तो इस बात से भी ईर्ष्या कर रहे हैं कि मुझे बहुजन समाज रुपयों की माला पहना रहा है. उधर बाबा जी लोग हैं. पहले कसरत कराते थे अब ईर्ष्या करते हैं. राजनीति में आना चाहते हैं. बहुजन समाज की बढ़ती ताकत का असर ईर्ष्या के रूप में उभर कर....."

लालू जी : " भक्क..हट्ट..ई ईर्ष्या भी कोई करने का चीज है. करना है तो विरोध करो. नीतीश का विरोध करो..सब फ्रिकापरस्त..फासिस्ट ताकतों का विरोध करो..आई हैव टेकेन ओथ..का लिया? ओथ लिया है कि हमसब सेकुलर ताकत मिलके ई ईर्ष्या करने वालों को शासन में नहीं आने देना है...का कहा? ममता सेकुलर है? भक्क...जिसको रेलवे चलाने नहीं आता ऊ का सेकुलर होगी?"

शरद पवार : "मंहगाई बढ़ने का सबसे बड़ा कारण मीडिया द्वारा फैलाई गयी ईर्ष्या है...मीडिया की वजह से पिछले तीन-चार महीने में इतनी ईर्ष्या फ़ैल गई कि चीनी, तेल, दाल...ये सब मंहगा हो गया. अगर ईर्ष्या इसी तरह से फैलती रही तो अगले पंद्रह दिन में दूध मंहगा हो जाएगा. आशा है रवी की फसल में ईर्ष्या की पैदावार कम होगी और मंहगाई घटेगी.."

प्रणब मुखर्जी : " आल दो ईट इज नॉट गूड फॉर द इकोनोमी बाट कुटिल्लो (इनका मतलब कौटिल्य से है) हैड सेड दैट बाई बीइंग जीलोस ऑफ़ साम उवान इयु डू साम गूड फॉर इयोर सेल्फ.. एंड इफ सेल्फ इज गूड, कोंट्री उविल आलवेज बी गूड.."

सचिन तेंदुलकर : " कोई जब तक ईर्ष्या करना एन्जॉय कर सकता है, उसे करते रहना चाहिए..."

नारायण दत्त तिवारी : " ईर्ष्या ही तो मुख्य कारण बनी मुझे राजभवन से निकालने का. नौजवान मुझसे ईर्ष्या करने लगे थे.मैंने सुना है कांग्रेस पार्टी में नौजवानों की बड़ी सुनवाई होती है. लेकिन मेरा कहना यही है कि ईर्ष्या जितनी कम की जाय मेरे लिए उतनी ही अच्छी."

शशि थरूर : " आधे से ज्यादा भारत अंग्रेजी के मेरे ज्ञान की वजह से मुझसे ईर्ष्या करता है. जिनलोगों को इंटरलोक्यूटर का मतलब मुझे चार बार समझाना पड़े, वे तो मुझसे ईर्ष्या करेंगे ही. एक तो मेरे अंग्रेजी ज्ञान की वजह से और दूसरे अपने नासमझी की वजह से. वैसे ईर्ष्या भी दो तरह की होती है. कैटेल क्लास ईर्ष्या और होली काऊ ईर्ष्या.."

अटल बिहारी बाजपेयी जी : " ये अच्छी बात नहीं है. ईर्ष्या करना अच्छी बात नहीं. वैसे इस बात पर राय लेने के लिए आप अगर आडवानी जी के पास जाते तो वे आपको और अच्छी तरह से बताते. याद आया. मैंने ईर्ष्या पर एक कविता लिखी थी जब मै बीए का विद्यार्थी था. कविता कुछ यूं थी;

ईर्ष्या तू बैठी हैं मन में
इधर-उधर दिन भर करती है
नए रंग मन में भरती है
नहीं दिखी बचपन में
ईर्ष्या तू बैठी है मन में

मन विचलित है तेरे कारण
नहीं दीखता कोई निवारण
कभी-कभी ये सोचा करता
जा भटकूँ अब वन में
ईर्ष्या तू बैठी है मन में

..................................

प्रधानमंत्री जी : " मुझे उन लोगों से ईर्ष्या होती है जिनके पास पोस्ट के साथ-साथ पॉवर भी है. जैसे जब भी मैं ओबामा साहब को देखता हूँ मुझे......"

चन्दन सिंह हाठी सेल्स मैनेजर गंगोत्री यन्त्र प्रतिष्ठान, हरिद्वार : "ईर्ष्या आज से नहीं बल्कि सदियों से लोगों के दुख का कारण बनी है. लेकिन अब चिंता की बात नहीं क्योंकि हमारे संस्थान ने ईर्ष्या 'स्टापर' यन्त्र बनाया है जो दूसरों की आपके प्रति ईर्ष्या को आपके शरीर को छूने नहीं देता. इस यन्त्र के इस्तेमाल से आप हमेशा ईर्ष्या की किरणों से अपनी रक्षा कर सकेंगे. हमारे संस्थान ने खोज की है कि ईर्ष्या की किरणें सूर्य की अल्ट्रावायलेट किरणों से भी ज्यादा खतरनाक होती हैं. जल्द ही आर्डर करें. याद रखें इस यन्त्र की सहायता से आप न सिर्फ दूसरों की ईर्ष्या से बच सकेंगे बल्कि आपकी दूसरों के प्रति ईर्ष्या में भयंकर वृद्धि होगी. जल्द ही आर्डर करें और सरप्राइज गिफ्ट का लाभ उठाएं."

........................................................................

नोट: बाकी के बयान थोड़ी देर में टाइप करता हूँ. आपके पास भी कोई बयान हो टिप्पणी में लिख दीजिये.

Friday, October 3, 2008

पोस्टर पर हीरोगीरी




हिन्दी सिनेमा के पोस्टर भी अपने साथ मनोरंजन का ढेर सारा सामान लेकर चिपकते थे. हीरोगीरी करता हुआ हीरो, और हिरोइनगीरी पर उतारू हिरोइन तो रहती ही थी, परम चिरकुटई करता हीरो का कामेडियन दोस्त भी पोस्टर से चिपकना नहीं भूलता था. इनलोगों से थोड़ी जगह सेव करके विलेन को एक बन्दूक के साथ छाप दिया जाता था. वो भी विलेन अगर रिसोर्सफुल रहा तो बन्दूक की जगह रॉकेट लांचर लेकर चिपकता था. इनलोगों से जितनी जगह बचती थी, उसमें प्रोड्यूसर और डायरेक्टर का नाम समा जाता था.

कुल मिलाकर बड़ा बम्फाट पोस्टर बनाया जाता था, पब्लिक को सिनेमा घर तक लाने के लिए. कई बार तो पोस्टर देखकर मन में सवाल आता है कि जितनी मेहनत पोस्टर पर की गई है, उतनी अगर फ़िल्म पर की गई होगी तो फ़िल्म हिट हो जायेगी.

लेकिन अब हिसाब थोड़ा अलग हो गया है. थोड़ा क्या, पूरा ही अलग हो गया है. अब बेचारे कामेडियन और विलेन के लिए जगह ही नहीं बची है. पूरे पोस्टर पर हीरो-हिरोइन का कब्जा हो चुका है. विलेन लोग भी अब बन्दूक वगैरह नहीं रखते. सिक्स पैक एब्स वाला हीरो रहता है. देखकर दर्शकगण समझ नहीं पाते कि ये हीरो हीरोगीरी पर उतारू है कि विलेनगीरी पर. कुल मिलाकर विकट कन्फ्यूजियाहट से जूझते दर्शक फिलिम के बारे में आईडिया नहीं लगा पाते.

ये तो हुई हिन्दी फिलिम के पोस्टरों की बात.

लेकिन फिलिम अगर भोजपुरी भाषा की रही तो? तो फिर भइया पोस्टरवा में और बहुत कुछ इनकार्पोरेट करना पड़ता है. तीन-चार पोज में हीरो-हिरोइन, दो पोज में विलेन, तीन पोज में हीरो का माई-बाबू और दो पोज में आइटम गाना पर डांस करने वाली लड़की. लेकिन एक बात और है. ई फोटो-सोटो से भोजपुरी सिनेमा का पोस्टर पूरा नहीं होता. नीचे में कम से पाँच गाना का पहिला दू लाइन. मतलब कुल मिलाकर दस लाइन का जगह खाली गाना खातिर. अब ई पाँच गाना में से कम से कम दू गाना तो डबल मीनिंग वाला रहता है. साथ में म्यूजिक डायरेक्टर का नाम और गाना लिखने वाले का नाम.

देखकर लगता है जैसे डायरेक्टर पोस्टर पर ही पूरा फिलिम देखाने का कोशिश किया रहा लेकिन थोड़ा सा जगह कम पड़ गया. इसलिए पूरा फिलिम देखने के लिए सिनेमा हाल में पधार ल्यो.

हाल ही में एक बांगला फ़िल्म का पोस्टर देखा. फ़िल्म का नाम था 'लव'. अंग्रेज़ी नाम पर मत जाइये, फ़िल्म पूरी तरह से बांग्ला में है. और आजकल बांग्ला में भी लव ही होता है, प्रेम नहीं होता. टीवी पर इस फ़िल्म के बारे में चर्चा सुनी थी. डायरेक्टर बता रहे थे कि टीन-एज लव स्टोरी है. मतलब ये कि हीरो-हिरोइन स्कूल या फिर कालेज में पढ़ते होंगे.

अब ये टीन-एज लव स्टोरी बनाने का मामला बड़ा उलझा हुआ रहता है. कारण है लगभग सारे हीरो तीस साल से ऊपर के हैं. अब उन्हें कैसे टीन-एज कैसे बनाएं? इसी फ़िल्म के हीरो को देखकर लगता है कि कम से कम पैंतीस साल का है. आंखों के नीचे या बड़े-बड़े आई बैग. हिरोइन भी देखने से तीस साल से कम की नहीं लग रही. मेकअप करने की बावजूद. कैसे बनाएं इनदोनों को टीन-एज?

शायद इन्ही सवालों के जवाब के लिए क्रिएटिव डायरेक्टर रहता होगा. ऐसे ही कठिन समय में उसकी ज़रूरत पड़ती होगी. पहले प्रयास के तहत हीरो को टीन-एज बनाने के लिए उसे लाल रंग का जैकेट पहना दिया जाता है. साथ में जींस. लेकिन ये क्या? अब भी हीरो टीन-एज नहीं लग रहा. अब क्या करें? अच्छा ठीक है, एक काम करो, इसके हाथ में एक गिटार थमा दो. अब देखो, कैसा लग रहा है? थोड़ा-थोड़ा टीन-एज लगने लगा है.

यही हाल हिरोइन के साथ भी है. हिरोइन को देखकर लग रहा है कि ये तो तीस साल की है. मेकअप के बावजूद आंखों के नीचे झुर्री दिखाई दे रही है. अब क्या करें? एक काम करो, इसके हाथ में एक टेडी बीयर थमा दो. अब देखो, कुछ टीन-एज लग रही है? नहीं लग रही है! एक काम करो, इसे छोटी सी साईकिल पर बैठकर इसका एक फोटो ले लो. हाँ, अब ठीक है. अब ये टीन-एज लग रही है.

पहले प्रदीप कुमार जी को भी देख चुके हैं. वो भी कालेज से टॉप करके निकलते हुए. अब सोचिये कि प्रदीप कुमार जी कालेज से टॉप करके निकल रहे हैं. मुझे भीगी रात फ़िल्म याद है. उसमें कालेज से ताजा-ताजा निकले प्रदीप कुमार जी, मीना कुमारी जी से इश्क फरमाते हैं. एक सीन में अशोक कुमार जी को बताते हैं; "मैं कालेज में निशानेबाजी में चैम्पियन था."

बात आगे बढ़ती है. एक जगह तैरने की बात होती है. वहां भी वही बखान; "आपको शायद मालूम नहीं कि मैं कालेज में तैराकी का चैम्पियन था." मतलब ये कि खेल का नाम ले लो. जितने खेल का नाम लोगे, मैं सब में चैम्पियन. चैम्पियन होने का ये हाल कि; " आपको शायद मालूम नहीं कि मैं पढाई में भी चैम्पियन था."

समझने की बात ये कि चैम्पियन होने का कॉपी राईट्स थोक में इनके ही पास था.

उनदिनों हीरो के इतने बड़े चैम्पियन होने के बावजूद पोस्टरों पर उन्हें हाथ में किताब लेकर कालेज जाते नहीं दिखाया जाता था. शायद प्रोड्यूसर को मालूम था कि ऐसा करने से फ़िल्म का फ्लॉप होना तय था. लेकिन अब समय बदल गया है. अब तो हीरो जो कुछ भी कर सकता है (या नहीं भी कर सकता है), उसे पोस्टर पर दिखाया जाना ज्यादा ज़रूरी है.

Monday, January 7, 2008

सांताक्लाज के साथ बतडंग - भाग एक






सांता क्लाज मिल गए. जी हाँ, कलकत्ता पहुँच चुके हैं. परसों ही दिल्ली के मेंटल हॉस्पिटल से छुट्टी मिली. छुट्टी मिलते ही भाग लिए. प्रण किया कि अब दिल्ली नहीं जायेंगे कभी. मुझे देखते ही दूसरी तरफ़ भागने लगे. मैंने आवाज लगाई तो रुके. मैंने पूछा; "क्यों भाग रहे हैं?"

बोले; "तुम भी तो ब्लॉगर हो न. मैंने तुम्हारी फोटो देखी है. इसीलिए डर के मारे भाग रहा हूँ." इतना कहकर फिर से भागने लगे. मैंने आवाज़ लगे; "अरे सांता अंकल, सुनो तो."

मेरी बात सुनकर एकदम से रुक गए. नाराज होते हुए बोले; "क्या, तुमने मुझे अंकल कहा?"

मैंने कहा; "तो क्या हुआ जो मैंने आपको अंकल कहा? आपको बुरा लगा क्या?"

बोले; "क्यों, तुम्हें कोई अंकल कहता है तो तुम्हें अच्छा लगता है क्या?"

मैंने कहा; "नहीं मुझे एकदम अच्छा नहीं लगता. लेकिन ये बताईये, आप ब्लागरों से डरते हैं क्या?"

बोले; "डरते हैं. ब्लागरों से कौन नहीं डरता? तुम ख़ुद एक ब्लॉगर हो, लेकिन क्या तुम भी ब्लागरों से नहीं डरते?"

मैंने कहा; "आप ठीक कह रहे हैं. लेकिन आप ब्लागरों से इतना डरते क्यों हैं?"

बोले; "पुराणिक जी से मुलाक़ात के बाद जो अनुभव रहा, उसके बाद कोई भी ब्लागरों से डरेगा ही. पूरे चार पोस्ट तक मुझसे सवाल-जवाब करते रहे. ऐसा तो मेरे साथ ऍफ़बीआई वालों ने भी नहीं किया."

ऍफ़बीई का नाम सुनकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ. मुझे लगा ऐसा क्या हो गया कि ऍफ़ बी आई वालों ने इन्हें पकड़ लिया. मैंने उनसे पूछा; "क्या ऐसा भी कभी हुआ है कि ऍफ़बीआई वालों ने आपसे भी पूछ-ताछ की है?"

बोले; "हाँ, पिछले साल उन लोगों ने मुझे पकड़ लिया था. उन्हें मेरे ऊपर शक था."

मैंने पूछा; "आपके ऊपर भी लोग शक करते हैं. लेकिन ऍफ़ बी आई वालों को किस बात का शक था आपके ऊपर?"

सांता ने इधर-उधर देखा. फिर उदास होकर बोले; "उनलोगों को शक था कि मेरी इस झोली में डब्लूएमडी है."

"डब्लूएमडी, आपका मतलब वीपन आफ मास...."; मैंने अपनी बात पूरी करने वाला था कि उन्होंने कहा; "हाँ-हाँ, वही. उन्हें शक था कि मैं अपनी झोली में डब्लू एम डी रखता हूँ"

मेरी उत्सुकता बढ़ गई. मैंने पूछा; "लेकिन ऐसा हुआ कैसे? उन्हें आपके ऊपर ऐसा शक क्यों हुआ?"

बोले; "तुम्हें तो मालूम ही है. इराक में चार सालों से अमेरिकी सैनिक हैं. मर रहे हैं, मार रहे हैं. कुछ तो पूरी तरह से टूट चुके हैं. तो उन्हें खुश रखने के लिए मैं पिछले साल इराक चला गया था. उनके साथ कुछ दिन था. वहाँ से जब निकला और अमेरिका पहुँचा तो वहाँ किसी ने ऍफ़ बी आई को बताया कि मैं इराक से अमेरिका में घुसा हूँ. बस, ऍफ़ बी आई वालों ने पकड़ लिया."

मैंने पूछा; "फिर आप छूटे कैसे? मैंने तो सुना है कि ऍफ़ बी आई के पास जो फंस गया, उसका छूटना बहुत मुश्किल है."

बोले; " अरे, बहुत सारे अफसरों के बीच एक इंटेलीजेंट अफसर भी था. मेरी झोली की छान-बीन के बाद बोला कि जब तुम्हारी झोली में तेल का कुआँ ही नहीं है तो फिर डब्लू एम् डी होने का कोई चांस नहीं. तुम जा सकते हो."

मैंने कहा; "अच्छा हुआ ऍफ़ बी आई में कुछ इंटेलिजेंट अफसर हैं. नहीं तो आपको तो वे लोग छोड़ते ही नहीं. हो सकता है आपको भी जेल में रख देते."

बोले; "ठीक ही कह रहे हो. मैं तो बच गया."

"वैसे पुराणिक जी ने जो सवाल-जवाब किए, उससे आप विचलित नहीं हुए?"; मैंने उनसे पूछा.

बोले; "पहली पोस्ट में तो थोड़ा डरा लेकिन बाद में लगा कि पुराणिक जी तो शिक्षक हैं. उन्हें छात्रों से सवाल करने की आदत होगी. इसीलिए बाद की पोस्ट में उनके सवाल एन्जॉय करने लगा."