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Wednesday, June 9, 2010

बेल अप्लिकेशन - एपिसोड २




गतांक से आगे...

जै माता दी की चिंघाड़ सुनकर लोग भौचक्के हो एक-दूसरे को देखने लगे. अचानक लोगों ने देखा कि हाथ में माइक और सिर पर बाल रखे हुए हिमेश रेशम्मैया जी खड़े हैं. लोगों को समझते देर नहीं लगी कि जै माता दी नामक नारा उन्होंने ही लगाया है. वे अनु मलिक से गले मिले. पता नहीं चला कि किसने किसे गले लगाया. सरोज खान के पाँव छू लिए. उसके बाद एंकर ने तीनो को बताया कि उन्हें अपनी-अपनी कुर्सी संभाल लेनी चाहिए.

तीनो जब कुर्सी पर बैठ गए तो एंकर ने कहा; "कैसा लग रहा है आप लोगों को? अनु जी यह बताएं कि ये कांसेप्ट कैसा लगा आपको? मेरा मतलब अगर आप जैसे गुनी लोग इस तरह से देश की सेवा करेंगे तो एक तरह से अच्छा ही है?"

एंकर की बात सुनकर वे बोले; "लेट मी टेल यू हुसैन कि टैलेंटेड कलाकार कुछ भी कर सकता है. अगर वह सिंगिंग कम्पीटीशन जज कर सकता है तो वह कुछ भी जज कर सकता है. आज हम यहाँ हैं तो अपने टैलेंट के बूते पर हैं और जैसा कि मैंने कहा कि टैलेंटेड कलाकार कुछ भी कर सकता है. यहाँ तक कि देश सेवा भी."

उनका जवाब सुनकर एंकर हुसैन ने जनता से ताली पिटवा दी. उसके बाद तीनों जज स्टेज की तरफ देखने लगे. वे शायद कंटेस्टेंट लोगों के दर्शन करना चाहते थे. जब उन्हें लगा कि वे लोग वहां अभी तक नहीं आये हैं तो अनु मलिक नाराज हो गए. बोले; "ये लोग अभी तक यहाँ क्यों नहीं आये? किसे इंतज़ार करवा रहे हैं ये लोग मालूम है इन्हें? आई टेल यू हुसैन दे आर प्लेयिंग विद देयर लाइव्स. अनु मलिक ने आजतक किसी का इंतज़ार नहीं किया."

उनकी बात सुनकर हुसैन नामक एंकर बोले; "बस आ जायेंगे अनु जी."

तब तक लोगों ने देखा कि पाँचों कंटेस्टेंट रूपी मुलजिम स्टेज पर आ खड़े हुए.

पाँचों लोग बहुत मज़े में खड़े हुए थे. उनके चेहरे पर ख़ुशी व्याप्त थी. पता नहीं किस बात की ख़ुशी थी? सेलेब्रिटी जजों को देखने की या फिर वे यह सोच कर खुश हो रहे थे कि यहाँ बैठे जज उन्हें रिहा करके ही मानेंगे. एंकर हुसैन ने वहां के नियम वगैरह बता दिए. पता चला कि मुलजिमों से जज लोग ही पूछताछ कर लेंगे. सवाल-जवाब वही लोग करेंगे और उसके हिसाब से फैसला सुना देंगे.

सवाल-जवाब के लिए सबसे पहले राठौर साहब को चुना गया. उन्हें चांस मिला तो वे स्टेज पर आये. आते ही अनु मलिक से बोले; "सर, मैं आपका बहुत बड़ा फैन हूँ. आपका वो गाना 'एक गरम चाय की प्याली हो उसे कोई पिलाने वाली हो' मुझे बहुत पसंद है."

उनकी बात सुनकर अनु मलिक बोले; "लेट मी टेल यू राठौर कि आप मेरे फैन हैं, इसका मतलब यह नहीं कि मैं आपको मुंबई आने का टिकेट...सॉरी सॉरी मैं आपको जमानत दे दूंगा. आई एम अ टैलेंटेड सेल्फ मेड मैन...मैं हमेशा सच्चाई का साथ देता हूँ. मैं जो सवाल करता हूँ आप केवल उसका जवाब दीजिये."

राठौर साहब को लगा था कि अनु मलिक उनसे वही गाना यानि एक गरम चाय की प्याली हो वहीँ गवा लेंगे. लेकिन जब ऐसा नहीं हुआ तो वे मुँह लटकाए बोले; "समझ गया सर. मैं आपकी बहुत इज्जत करता हूँ. आप सवाल पूछिए मैं जवाब दूंगा."

अचानक एक फिर से हिमेश चिल्ला पड़े; "जै माता दी, लेट्स रॉक."

इतना सुनकर अदालत की कार्यवाई शुरू हो गई.

अनु मलिक ने राठौर साहब से पूछा; "हाँ तो ये बताओ राठौर कि आपके ऊपर जो आरोप हैं, उनमें कितनी सच्चाई है?"

सवाल सुनकर राठौर साहब बोले; "जरा भी सच्चाई नहीं है सर. जरा भी सच्चाई नहीं है. ये तो मेरे दुश्मनों की साजिश है. मुझे अनायास ही फंसाया जा रहा है."

"लेकिन कौन फंसा रहा है आपको?"; अनु मलिक ने दूसरा सवाल दागा.

उनका सवाल सुनकर राठौर साहब बोले; "मुझसे लोग जलते हैं सर. ये मीडिया वाले जलते हैं. सारे पत्रकार जलते हैं. मैं कहता हूँ सर कि पूरा देश जलता है मुझसे. पूरे देश ने मिलकर मेरे खिलाफ साजिश रची है."

अनु मलिक ने सवालों का सिलसिला आगे बढ़ाते हुए पूछा; "लेकिन उस लड़की ने तो आपकी वजह से आत्महत्या की. आरोप है कि आपने उसे मोलेस्ट किया था."

"झूठ है सर. सरासर झूठ है. वह लड़की तो मलेरिया की वजह से मरी थी. आपको तो मालूम ही है. वह लड़की टेनिस खेलती थी. घास में मलेरिया के एक मच्छर ने उसे काट लिया जिसकी वजह से उसे मलेरिया हो गया. मैंने तो डॉक्टर से कहा था कि उसके मलेरिया से मरने का एक सर्टिफिकेट बना दो. वो बोला आप इतने बड़े पुलिस अफसर हैं. आप कह देंगे कि वह मलेरिया से मरी तो मरी"; राठौर साहब ने जवाब दिया.

"लेकिन आपने उसे स्कूल से निकलवा दिया था. और आपने उसके भाई को भी अपनी ऑथोरिटी का इस्तेमाल करके पुलिस से पिटवाया. क्या यह सब झूठ है?"; अनु मलिक ने फिर से पूछा.

"सरासर झूठ है सर. मैंने उसे स्कूल से नहीं निकलवाया. मैंने उसके भाई को पिटवाया था लेकिन वह इसलिए कि वह एक दिन ट्रैफिक सिग्नल तोड़कर भाग रहा था. मुझे जब इसका पता चला तो मुझे उसी समय वह बात याद आई जो पुलिस ट्रेनिंग में सिखाई गई थी कि अगर पॉवर पास में है तो उसका इस्तेमाल भी करना चाहिए. मैंने तो केवल पॉवर का इस्तेमाल किया सर. अब मेरी पावर की वजह से उसका भाई पिट गया तो...."; राठौर साहब बोलते जा रहे थे.

"लेकिन आपके ही डिपार्टमेंट के अफसर ने इन्क्वाइरी करने के बाद रिपोर्ट दी थी कि आप दोषी हैं"; अनु मलिक ने कहा.

"डिपार्टमेंट की बात है सर. डिपार्टमेंट में लोग तो एक-दूसरे से जलते हैं न. आप डिपार्टमेंट में नहीं थे न इसलिए आपको यह बात पता नहीं रहेगी"; राठौर साहब ने अपनी सफाई दी.

"आपको क्या लगता है? आपको जमानत मिल जायेगी?"; अनु मलिक ने उनसे ही पूछ लिया.

"सर मुझे इस देश की न्याय-व्यवस्था पर पूरा भरोसा है. और अब तो आपके ऊपर भी यकीन हो चला है. आप सच्चे इंसान हैं और मैं भी एक सच्चा इंसान हूँ. मुझे मालूम है कि आप मेरी सच्चाई की क़द्र करेंगे"; राठौर साहब ने अपनी सच्चाई का बखान कर डाला.

जब राठौर साहब से सवाल-जवाब का दौर ख़तम हुआ तो एंकर स्टेज पर आ धमका. मामले को आगे बढाते हुए उसने अनु मलिक से पूछा; "अनु जी, क्या कहना चाहेंगे आप राठौर साहब के बारे में? कैसा लगा आपको?"

अनु मलिक बोले; "मैं तो यही कहना चाहूँगा कि; 'राठौर तेरा अंदाज़ निराला है, तूने हमसब को घायल कर डाला है. गजब की तेरी मुस्कान है, तूने चश्मा भी पहन रखा काला है."

अनु मलिक की बात सुनकर सबने ताली बजाई. उसके बाद एंकर सरोज खान से मुखातिब हुआ. बोला; "मास्टर जी, क्या कहना चाहेंगी आप? कैसा लगा आपको?"

"एक्सेलेंट. आपका 'प्रफार्मेंस' बहुत बढ़िया था. आप मुझे सीधा सेवेंटीज में ले गए. फिलिम विश्वनाथ की याद ताजा कर दी आपने. आपको याद हो तो उस फिलिम में प्राण साहब थे. गोलू गवाह के क्रिदार में. उनका प्रोफेशन ही गवाही का था. और वे कितनी सफाई से झूठ बोल जाते थे कि.....आपने वह याद ताजा कर दी. यू आर माई 'सी थ्री'. इधर आइये और अपना ईनाम ले जाइए." सरोज खान ने राठौर साहब के परफार्मेंस के बारे में बताया.

राठौर साहब दौड़ के सरोज खान के पास गए. उन्होंने राठौर को १०१ रुपया ईनाम दिया. ईनाम लेकर वे कूदने लगे. तीन-चार बार हवा में पंच मारा. उसके बाद बोले; "यस...यस...यस...आई न्यू इट..."

उसके बाद बोले; "थैंक यू मैम."

इतना कहकर वे चुप हो गए लेकिन लोगों के मन में एक बात आई कि ये सी थ्री क्या है? एंकर हुसैन बोला; "मास्टर जी, ये आपका सी थ्री क्या है?"

उसकी बात सुनकर सरोज खान ने क्लेरिफिकेशन दिया. बोलीं; "सी थ्री का मतलब है चिरकुट चरित्र, चिरकुट झूठ और चिरकुट बेहयाई. जिन भी कंटेस्टेंट के पास ये तीनों होंगे, ही विल बी माय सी थ्री.."

अचानक एंकर हुसैन बोले; "और अनु जी आज हमारे बीच में हैं राठौर साहब के चाचाजी जो सीधा पानीपत से आये हैं."

उसके इतना कहते ही कैमरा घूमते हुए एक बुजुर्ग के ऊपर जाकर ठहर गया. लोगों को पता चल गया कि वही राठौर साहब के चाचाजी थे. हुसैन ने उनसे पूछा; "नमस्कार चाचाजी. कैसा लग रहा है यहाँ आकर?"

वे बोले; "राम राम जी. बहुत बढ़िया लग रहा है..... मैं सरोज खान जी का बहुत बड़ा फेन हूँ. वो जी इनका कोरियोग्राफ किया गाना था मेरा पिया घर आया ओ राम जी वो मुझे बहुत पसंद है."

उनकी बात सुनकर सरोज खान खुद से थोड़ा और प्यार करने लगीं. अभी वे कुछ कहती तभी हुसैन ने चाचाजी से सवाल किया; "अच्छा ये बताइए चाचाजी कि राठौर साहब क्या शुरू से ही ऐसे थे?"

"हाँ जी शुरू से ही ऐसा था यह तो.लड़कियों को छेड़ने के मामले में बहुत मेहनती था. जब बारहवीं में पढ़ता था तो अपने कोलेज से तीन किलोमीटर पैदल चलकर जाता था दूसरे कोलेज में लड़कियों को छेड़ने के लिए. तब हम उतने पैसे वाले नहीं थे..... बस का किराया नहीं रहता था लेकिन ये पैदल चलकर दूसरे कोलेज जाता था. बहुत स्ट्रगल किया है जी इसने लड़कियों को छेड़ने के लिए....... स्ट्रगल का असर है कि एक दिन ऐसे मोकाम पर पहुँचा जब ये चेंबर में बैठकर लड़कियों को छेड़ने लायक बना. बहुत स्ट्रगल किया है जी....."; इतना कहते-कहते चाचाजी जी की आँखों में आंसू आ गए.

उनके आंसू देखकर राठौर जी की आँखें भी भर आईं. उसके बाद हुसैन ने चाचाजी से सवाल किया; "अच्छा ये बताइए चाचाजी कि जब राठौर साहब लड़कियों को छेड़ते थे तो घर पर शिकायत नहीं आती थी?"

वे बोले; "आती थी. मेरे फादर यानि इसके दादाजी इसे डाटते थे. जब तक यह उनके पास रहता था तब तक तो सिर झुकाकर सब कुछ सुनता था लेकिन जब उनके घर से बाहर निकलता था तो यह मुस्कुराता था. इसकी मुस्कराहट से लोग और नाराज़ हो जाते थे. लेकिन इसके ऊपर....इस मामले में इसने बड़ा स्ट्रगल किया है जी.."

उनकी बात सुनकर हिमेश रेशम्मैया बोले; "बिना स्ट्रगल के कुछ होता नहीं है. मुझे ही देख लीजिये. मैंने कितन स्ट्रगल किया तब जाकर आज इस मोकाम पर पहुँचा हूँ कि इंडिया का नंबर वन सिंगर बना हूँ....सब कहते हैं सलमान भाई ने मुझे आगे बढाया लेकिन यह बकवास है. हुसैन मैं बताता हूँ...मेरे फादर अपने समय के सबसे बड़े म्यूजिक डायरेक्टर थे. लेकिन जब मेरे भाई........तब मैंने अपने फादर से प्रोमिज किया कि मैं आपका बेटा एक दिन आपके सपने पूरा करूंगा. और आज मैं यहाँ हूँ. आज मैं जो कुछ भी हूँ अपने डैड की वजह से. आई लव यू डैड.."

अनु मलिक को हिमेश की बात सुनकर जम्हाई आने लगी थी. साथ ही वहां बैठी जनता भी मुँह बाए जम्हाई ले रही थी. शायद यह इस बात का असर था कि पिछले तीन सालों में कम से तीस बार सभी हिमेश की यह कहानी सुन चुके थे.

......जारी रखा जाय?

Tuesday, June 8, 2010

बेल अप्लिकेशन




राठौर साहब की बेल अप्लिकेशन रिजेक्ट हो गई. क्या कहा आपने? अंग्रेजी के शब्द इस्तेमाल करने के लिए मेरे ब्लॉग के सामने धरना दे देंगे? अच्छा चलिए सुधार कर लेता हूँ. कल राठौर साहब की जमानत की अर्जी नामंज़ूर हो गई. अब ठीक है? थैंक यू. ठीक है, ठीक है बाबा..अरे वही, धन्यवाद.

चलिए आगे की बात करता हूँ. हाँ तो मैं कह रहा था कि राठौर साहब की जमानत अर्जी खारिज हो गई. कभी-कभी खारिज भी हो जाती है. जब देश की अदालतों में कुछ बड़े लोगों की जमानत की अर्जी खारिज होती है तो उसे न्याय व्यवस्था में क्रांति कहते हैं. ऐसी घटनाओं की वजह से जनता का विश्वास न्याय व्यवस्था में पुनः स्थापित हो जाता है और वह दाल-रोटी खाओ अदालत के गुन गाओ नामक गाना गुनगुनाने लगते हैं.

वैसे मेरा मानना है कि ऐसे बड़े लोगों की जमानत की अर्जी खारिज करना एक तरह से स्ट्रेटेजिक जुडिशियरी मैनेजमेंट का नमूना है और जुडिशियरी की इमेज बिल्डिंग एक्सरसाइज का हिस्सा है. एक और मजे की बात. जब इस तरह के फैसले आते हैं और अपराधी के वकील से सवाल किया जाता है तो उसका उत्तर होता है; "मैंने अभी तक फैसला पूरी तरह से पढ़ा नहीं है. बिना पढ़े कमेन्ट करना संभव नहीं है."

दूसरी तरफ अपराधी कहता है ; "मुझे देश की न्याय-व्यवस्था में पूरा विश्वास है"; इतना कहकर वह कैमरे के सामने मुस्कुरा देता है. उसकी बेशर्मी देखकर कैमरा खुद शरमा लेता है. अपने देश की न्याय-व्यवस्था पर सबसे ज्यादा विश्वास अपराधियों को ही है.

खैर, राठौर जी की अर्जी के रिजेक्ट होने की बात चल रही थी. अब राठौर जी क्या करेंगे? किसी और अदालत में जायेंगे? वहां जायेंगे तो क्या होगा? मैं सोच रहा था तो मुझे लगा कि अगर सिंगल जज बेंच ने उनकी अर्जी नामंज़ूर कर दी है तो उन्हें किसी बड़ी बेंच के सामने अपनी अर्जी ठेल देनी चाहिए. फिर ख़याल आया कि हमारी अदालतें मुकदमों से लबालब भरी पड़ी हैं. मतलब मुकदमों की बाढ़ का पानी हमेशा खतरे के निशान से ऊपर बहता रहता है. ऐसे में तुरत-फुरत में बड़ी बेंच तो क्या मचिया भी नहीं मिलेगी जिसके सामने वे अपनी जमानत की अर्जी रख सकें.

तो फिर क्या हो सकता है?

मैं इस पर सोच ही रहा था कि मुझे देश की नई संस्कृति की पैदाइश रियलटी शो के जजों की याद आई. मुझे लगा कि क्यों न राठौर साहब जमानत की अपनी अर्जी इन रियलटी शो के जजों की अदालत में ठेल दें. भाई बुराई क्या है? ये भी तो जज ही हैं. वो जज नहीं तो ये जज. रियल्टी शो में जज लोग जिस तरह से कंटेस्टेंट को आंकते हैं, उस तरह से तो अदालतों के जज भी नहीं आंक सकेंगे.

पिछले तीन-चार साल में जिस तरह से फिल्म इंडस्ट्री के तमाम चिरकुट जजबाजी में उतरे हैं अगर उस रफ़्तार से न्याय प्रणाली में जजों की नियुक्ति होती तो तमाम मुक़दमे निबट गए होते. मेरा मतलब है जिस तरह से प्लान बनाकर फिल्म और टेलीविजन वाले चल रहे हैं उससे लग रहा है जैसे वे साल २०१५ तक इस देश में आठ करोड़ सिंगर और नौ करोड़ डांसर्स पैदा करके मानेंगे. लगता है जैसे यह प्लान कलाम साहब के ट्वेंटी-ट्वेंटी अजेंडा का एक हिस्सा है.

लेकिन अगर ऐसा हो गया, मेरा मतलब अगर राठौर साहब ने अपना बेल अप्लिकेशन इन जजों की कोर्ट में दाखिल किया तो कैसा सीन होगा? शायद कुछ ऐसा;

देश में फैले राठौर साहब के तमाम फैन्स, जो उन्हें अपना हीरो मानते हैं, उनलोगों ने राठौर साहब से सामूहिक आह्वान करते हुए लिखा; "आप हमारे आयडल हैं. हमने तमाम ट्रिक्स ऑफ़ द ट्रेड आपसे ही सीखें हैं. चूंकि आप हमारे आयडल हैं इसलिए हम चाहते हैं कि आप अपना केस इंडियन आयडल के जज अनु मलिक की अदालत में पेश करें. हमें आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि वे आपकी जमानत की अर्जी मंज़ूर कर लेंगे."

यह सामूहिक आह्वान पढ़कर राठौर साहब भाव विह्वल हो गए. जिस तरह से नेता अपने चमचों के आह्वान और नारे सुनकर खुश होता है उसी तरह से राठौर साहब खुश हो गए. अपने फैन्स को मान देते हुए उन्होंने अपनी अर्जी अनु मलिक की अदालत में पेश कर दी. अर्जी देखते हुए अनु मलिक बोले; "मुझे अकेले जज-गीरी करने की आदत नहीं है. मैं जबतक अपने अगल-बगल बैठे जजों से डिफर न हो लूँ, मेरा खाना नहीं पचता. दूसरी बात यह भी है कि अगर और जज न रहेंगे तो मैं अपने बनाए गाने सुनाकर किसे बोर करूंगा? मैं चाहूँगा कि कम से कम दो और जजों की नियुक्ति हो."

बहुत छान-बीन करके दो और जज खड़ाकर के तीन जजों की एक बेंच तैयार कर दी गई. इस बेंच में अनु मलिक के अलावा सरोज खान और हिमेश रेशम्मैया को रखा गया. जब बेंच तैयार हो गई तो वह उसने बताया कि उन्हें सिंगल कंटेस्टेंट कोर्ट की आदत नहीं है इसलिए वे चाहेंगे कि राठौर के साथ कम से कम चार और कंटेस्टेंट आयें जिन्हें जमानत की या उसी तरह के किसी चीज की ज़रुरत है. अगर ऐसा नहीं हुआ तो फिर बेंच कोर्ट में नहीं बैठेगी.

उनकी इस डिमांड पर राठौर साहब ने और लोगों की खोज शुरू की. ज्यादा खोज-बीन की ज़रुरत नहीं पड़ी. उन्हें दिल्ली में ही सज्जन कुमार मिल गए. सज्जन कुमार के ऊपर उनकी सज्जनता की वजह से तमाम धाराएं बह रही हैं. आये दिन उनके ऊपर वारंट इश्यू होता रहता है. राठौर साहब ने जब सज्जन कुमार को बताया कि अनु मलिक की अध्यक्षता वाली बेंच उनके लिए कुछ कर सकती है तो वे तुरंत तैयार हो गए. सज्जन कुमार के अलावा छत्रधर महतो, विकास यादव और अब्दुल करीम तेलगी भी अपना मुकदमा इस तीन जजों की बेंच के सामने रखने पर राजी हो गए.

वह दिन आया जब सुनवाई होनी थी. तीनो जज एक-एक करके अदालत में आये. अदालत तो क्या थी, किसी रियलटी शो का मंच था. मंच पर एनाउंसर था. पंद्रह सौ रूपये वाले बिग-बाजारीय सूट में घुसा हुआ. हाथ में माइक. अचानक उसने दहाड़ना शुरू किया; "जिस दिन का इंतज़ार था, आज वह दिन आ गया. जी हाँ दोस्तों आज तीन जजों की इस अदालत में पाँच महान लोगों के मामलों की सुनवाई होगी. चलिए सबसे पहले स्वागत करते हैं अपने पहले जज का हू इज नन अदर देन द
डैशिंग एंड लैशिंग अनु मलिक. लेडिज एंड जेंटिलमैन, गिव अ बिग राऊंड ऑफ़ अप्लाज तो अनु मलिक."

अनु मलिक स्टेज पर अवतरित हुए. बैकग्राऊंड म्यूजिक के साथ उनका गाना बज रहा था, 'ऐसा पहली बार हुआ है सतरा-अठरा सालों में..' अपने गाने के सामने वे बड़े गर्व के साथ खड़े हो गए. मुख पर कुछ इस तरह की संतुष्टि जैसे मन ही मन कह रहे हों; "पंचम दा, ऐसा गाना बनाकर दिखाओ तो जानें. अरे हम असली म्यूजिक बनाते हैं असली...." अचानक उन्होंने गाना शुरू कर दिया; "ऊंची है बिल्डिंग, लिफ्ट तेरी बंद है.."

एंकर ने कहा; "अनु जी, आपको मुक़दमे की सुनवाई करनी है. म्यूजिक कांटेस्ट जज नहीं करना है."

उसकी बात सुनकर अनु मलिक बोले; "बॉस, अनु मलिक इज अ सेल्फ मेड मैं. मजाक नहीं है. टैलेंट है तो दिखाएँगे नहीं?"

एंकर की समझ में नहीं आया कि वह क्या बोले. अभी उसने कोई जवाब सोचने का काम शुरू ही किया था कि अचानक बैकग्राऊंड से म्यूजिक शुरू हो गया. साथ में गाने का झरना फूट पड़ा; "एक दो तीन, चार पाँच छ सात आठ नौ..."

एंट्री हुई सरोज खान की. सौ-सौ के करीब पंद्रह नोटों से लैस सरोज खान न्यू सलवार-सूट में ठुंसी हुई स्टेज पर आई. 'एक दो तीन चार पांच छ सात आठ नौ...' गाने पर सरोज खान ने चार-पांच एनर्जेटिक ठुमके लगाए. देखकर लगा जैसे फिल्म प्रोड्यूसर्स को कन्विंस करना चाहती हों कि 'मैं अभी भी डांस डायरेक्शन कर सकती हूँ.'

दर्शकों ने अभी इन दो जजों की करतूत झेलना शुरू ही किया था कि अचानक स्टेज पर एक धड़ाका हुआ और कोई बड़े जोर से चिल्लाया; 'जय माता दी'.

..........जारी रहेगा.

Monday, August 25, 2008

स्टिंग आपरेशन और न्याय-व्यवस्था - एक री-ठेल पोस्ट




(सं) वैधानिक सूचना:

दिल्ली में हुए बीएमडब्लू केस में एनडीटीवी ने एक स्टिंग आपरेशन किया था. इस स्टिंग आपरेशन में दो महान वकील, श्री आर के आनंद और श्री आई यू खान खान को 'वकालत' करते पाया गया था. मैंने ये पोस्ट उस समय लिखी थी. वैसे पिछले दिनों दोनों वकीलों को अदालत ने दोषी करार दे दिया.

मैं इस पोस्ट को फिर से पब्लिश कर रहा हूँ. कारण यह है कि इस पोस्ट पर मुझे एक भी कमेन्ट नहीं मिला था. अब जैसा कि मैं हमेशा से कहता आया हूँ; "मैं कमेन्ट पाने के लिए लिखता हूँ." इसीलिए मेरी आप सब से गुजारिश है कि आप कमेन्ट जरूर करें. बिना पढ़े भी कमेन्ट करेंगे तो चलेगा. बस कमेन्ट कीजियेगा. प्लीज.
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करीब एक सप्ताह हो गया, देश की जनता का इस देश की न्याय व्यवस्था पर से विश्वास उठ गया है. वो भी इसलिये कि, देश के दो विख्यात वकील एक 'स्टिंग ऑपरेशन' में कुछ ऐसा करते दिखे जो न्याय व्यवस्था के हिसाब से ठीक नहीं माना जाता. टीवी चैनल ने इन वकीलों की करतूत दिखाने के साथ-साथ जनता के सामने एक सवाल भी दाग दिया;

'इस स्टिंग ऑपरेशन को देखने के बाद आपका विश्वास क्या देश कि न्याय व्यवस्था से उठा गया है?'

टीवी चैनल जब भी ऐसे सवाल करते हैं, जनता फूली नहीं समाती. जनता को लगता है कि देश के लिए कुछ करने का असली मौका आज हाथ लगा है. अगर उसने संदेश नहीं भेजे तो देश रसातल में चला जाएगा. नतीजा ये हुआ कि जनता ने संदेशों कि झड़ी लगा दी. टीवी चैनल को बताया कि 'आपने ये दिखाकर हमारी आंखें खोल दीं. कमाल कर दिया आपने. हमारा विश्वास सचमुच ऐसी न्याय व्यवस्था से उठ गया.

मानो कह रहे हों; "आज सुबह तक हम अपने देश कि कानून व्यवस्था को दुनिया में सबसे अच्छा मानते थे लेकिन आज हमने ऐसा मानने से इनकार करना शुरू कर दिया है." टीवी चैनल भी कुछ ऐसा बर्ताव करता है जैसे कह रहा हो; " देखा; अगर हम नहीं दिखाते तो तुम्हें कैसे पता चलता कि हमारे देश में क्या हो रहा है? एहसान मानो हमारा कि हम हैं."

सालों से हम ऐसी व्यवस्था देखते आ रहे हैं. लेकिन ऐसा क्यों है कि 'स्टिंग ऑपरेशन' देखने के बाद हमारे चेहरे पर ऐसे भाव हैं जैसे मिस वर्ल्ड का खिताब जितने के बाद उस सुंदरी के चेहरे पर होता है जिसने खिताब जीता है. हम सालों से ऐसी व्यवस्था के शिकार हैं. आंकड़े निकाले जायेंगे तो मिलेगा कि हम सभी न सिर्फ इस व्यवस्था के शिकार हैं, बल्कि इसका हिस्सा भी हैं. न्याय व्यवस्था कि धज्जी उड़ाते हुए न जाने कितनों को देखा जा सकता है. नेता हो या पुलिस, जनता हो या वकील, कोई अछूता नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने कावेरी जल-विवाद में फैसला दिया. लेकिन कर्णाटक के तत्कालीन मुख्यमंत्री ने नहीं माना. हड़ताल और बंद को लेकर न्यायालय के फैसले को कौन मानता है? हमारी मौजूदा केंद्र सरकार ने तो पिछले दो-तीन सालों में सुप्रीम कोर्ट के कितने ही फैसले विधेयक पास करके रद्द कर दिए हैं. आये दिन हमारी लोकसभा के स्पीकर न्यायपालिका को धमकी देते रहते हैं. तो फिर 'स्टिंग ऑपरेशन' देखकर चहरे पर ऐसे भाव क्यों हैं?

मुझे सत्तर के दशक कि एक हिन्दी फिल्म याद आती है. सुभाष घई ने बनाई थी. नाम था विश्वनाथ. उसमें प्राण साहब ने एक बड़ा ही मजेदार चरित्र निभाया था. गोलू गवाह का चरित्र. एक ऐसा आदमी जिसका काम ही है कोर्ट के बाहर मौजूद रहना और पैसे लेकर किसी के लिए गवाही देना. हम अंदाजा लगा सकते हैं; जब सत्तर के दशक में ऐसा हाल था, तो फिर आज कैसा होगा? तुलना की बात केवल इस लिए कर रह हूँ क्योंकि सुनाई पड़ता है कि ज़माना और खराब हो गया है. नैतिकता करीब ३० से ४० प्रतिशत और गिर गई है.

१९९१ में इस देश में आर्थिक सुधारों की शरुआत हुई. वैसे मुझे आजतक समझ में नहीं आया कि अपने शासन को सबसे अच्छा बताने वाले लोगों को अपने द्वारा किये गए कामों में सुधार कि ज़रूरत क्यों महसूस होने लगी? चलिये ये एक अलग विषय है. आर्थिक सुधारों के साथ-साथ क्या सरकार को और बातों में सुधार की आवश्यकता महसूस नहीं हुई? न्याय व्यवस्था में सुधार, पुलिस में सुधार, शिक्षा में सुधार; ये बातें सरकार के कार्यक्रम में नहीं हैं क्या? चलिये सरकार कि बात अगर छोड़ भी दें, तो हमने क्या किया? आरक्षण पाने के लिए हम ऐसा 'आंदोलन' कर सकते हैं, जिसमें लोगों का मरना एक आम बात है. लेकिन हम ऐसा आंदोलन नहीं कर सकते जिसकी वजह से सरकार से सवाल कर सकें कि हे राजा क्या हमें इन सुधारों कि ज़रूरत नहीं है? और अगर है तो फिर कब शुरू करेंगे आप इन सुधारों को?

हमारी ताक़त केवल आर्थिक सुधारों को रोकने में और आरक्षण पाने के लिए झगड़ा करने में लगी हुई है. टीवी पर बहस करके बात ख़त्म कर दी जाती है. बहस में नेता और विशेषज्ञ आते हैं. साथ में तथाकथित जनता भी रहती है जो सवाल करती है. वास्तव में वह सवाल करने नहीं आती वहाँ पर. आती है ये देखने कि टीवी कि स्क्रीन पर दिखने में मैं कैसा लगता हूँ.

टीवी पर एक बहस देखी मैंने. उसमें एक वकील आये थे. उनसे पूछा गया कि उन्हें क्या लगता है; न्याय व्यवस्था की ऐसी हालत क्यों हैं? क्यों जज और वकील घूस लेते हुए देखे जाते हैं? क्यों गवाह तोड़े जाते हैं या किसी किसी-किसी केस में ख़त्म कर दिए जाते हैं? उन्होने इन सवालों का बड़ा रोचक जवाब दिया. उन्होने बताया; वकीलों को बैठने की जगह नहीं है, अदालत में टाईपराइटर ठीक से काम नहीं करते, बुनियादी सुविधाओं की कमी है. आप खुद सोचिये. सुविधाओं की कमी है, इसलिये लोग घूस लेते हैं! गवाह तोड़े जाते हैं. किसी ने उनसे ये नहीं पूछा कि अगर ऐसी बात है तो फिर आपने क्या किया? कहीँ पर किसी को सुविधाएं बढाने के लिए आवेदन भी किया क्या? शायद अच्छा ही हुआ कि किसी ने नहीं पूछा. उनका जवाब शायद ये होता कि भैया मुझसे क्यों पूछते हो; मैं आम इन्सान हूँ क्या? मैं तो वकील हूँ. मैं न्याय व्यवस्था से तो पीड़ित नहीं हूँ. फिर मुझे क्या पडी है कि मैं सरकार से कहूँ कि सुविधाओं को बढाया जाय.

जब तक हम टीवी कि तरफ देखेंगे कि वो हमें बताये कि हमारे साथ क्या बुरा हो रहा है; जब तक हम संदेश भेजकर अपना नाम टीवी कि स्क्रीन पर देखने कि ललक मन में रखेंगें; जब तक हमारा 'आंदोलन' टीवी के पैनल डिस्कशन तक आकर रूक जाएगा; तब तक कहीँ भी सुधार की संभावना नहीं है. क्योंकि न्याय-व्यवस्था से जुड़े बहुत सारे लोग न्याय नहीं होने देंगे.


आख़िर न्याय व्यवस्था उनके हाथों में है - वे व्यवस्था से पीड़ित नही है.