शाम का समय. रतीराम जी की चाय-पान दुकान. पंद्रह मिनटी बरसात ख़त्म हुए आधा घंटा बीत चुके हैं. हवा भी मूड बनाकर बही जा रही है. मूडी हवा के साथ जैसे ही उधर से चाय की महक चली, उससे मिलने के लिए इधर से किमाम की महक लपकी. पता नहीं दोनों कौन से पॉइंट पर मिलीं? यह भी पता नहीं कि मिलने के बाद दोनों ने कौन से दुःख-सुख की बात की? चाय से भरे मिट्टी के मुँहलगे कुल्हड़ भी आस-पास के वातावरण को मिट्टी की खुशबू सप्लाई किये जा रहे हैं. कुछ बिजी और ईजी लोग़ हैं. थोड़े हलकान और ढेर परेशान लोग़ भी.
एक बेंच पर बैठे दो लोग़ पूडल नामक शब्द की व्याख्या कर रहे थे. निंदक जी किसी के साथ अंडरअचीवर नामक शब्द डिस्कश कर रहे हैं. कमलेश 'बैरागी' जी मुझे देखते ही अपना हाथ पाकिट की तरफ ले गए. शायद जेब में पड़े पन्ने पर टीपी नई कविता निकाल रहे थे लेकिन मैं रतीराम जी की तरफ बढ़ा तो उन्होंने ने भी अपना हाथ जेब से खींच लिया. मैंने नमस्ते किया तो दाहिना हाथ उठकर उन्होंने आशीर्वाद टाइप कुछ दिया.
इधर जैसे ही जगत बोस रतीराम जी की दुकान से चले रतीराम जी के होठों पर बुदबुदाहट उभर आई. मैं पास ही खड़ा था तो सुनाई भी दी. रतिराम जी की बुदबुदाहट से जो शब्द फूटा वह था; बकलोल. मुझे हँसी आ गई. मैंने पूछा; "क्या हो गया?"
वे बोले; "अरे पूछिए मत. कुछ लोग़ का पान हमको ही बड़ी मंहगा पड़ता है."
मैंने कहा; "क्या हुआ क्या? क्या दो बार सोपारी मांग लिए क्या जगत दा?"
रतीराम जी पान को कत्था समर्पित करते हुए बोले; "अब का कहें आपसे? केहू-केहू को बुझाता ही नहीं कि कहाँ चुप होना है. ई बस ओही प्रानी हैं."
मैंने कहा; "वैसे हुआ क्या?"
वे बोले; "अब आप से का कहें? जब आये तो हम इनका बेटा का तारीफ कर दिए. बस ओही भूल हो गया हमसे. हम तारीफ का किये, ई शुरू हो गए. पूरा इतिहास बांच दिए हियें. पहिला कच्छा में केतना नंबर मिला था. दूसरा में केतना मिला. कौन-कौन मास्टर कब-क़ब का बोला लड़िका के बारे में. आ शुरू हुए तो शेस होने का नाम ही नहीं. हम कहते हैं की ससुर एगो बात शुरू हुआ त कहीं ख़तम भी होना चाहिए की नहीं? बाकी इनको कहाँ खियाल है ई सब चीज का? आ पूरा आधा घंटा चाट के गए हैं."
मैंने कहा; "होता है ऐसा. लोग़ बेटे से प्यार करते हैं तो उसकी प्रशंसा सुनने पर उपलब्धि गिना ही सकते हैं."
रतीराम जी ने हमको ऐसे देखा जैसे मन ही मन कह रहे हों; आप कौन से कोई जगत बोस से कम हैं? फिर आगे बोले; "देखिये, ई खाली बेटा का उपलब्ध गिनाने का बात नहीं है. ई असल में उस बात से खुद को जोड़ने का बात है जहाँ आदमी का तारीफ़ हो. आ ई केवल जगत बाबू का समस्सा है? सबका एही प्राब्लम है. ऊ आपके हलकान भाई कम हैं का?"
मैंने कहा; "क्या बात कर रहे हैं? हलकान भाई भी आये थे क्या इधर?"
वे बोले; "आये थे? पिछला तीन दिन से सबेरे एहिये अड्डा लगा रहे हैं निंदकवा के साथ. आ काल शाम को निंदकवे बोला हमको, त पता चला. हलकान बाबू पंद्रह दिन से अउरी बात को लेकर दुखी हैं."
मैंने कहा; "उनको किस बात का दुःख है? आजकल ब्लॉग पोस्ट पर कमेन्ट कम मिल रहे हैं क्या?"
रतीराम जी मुस्कुराए. फिर बोले; "हा हा..ऊनको आ कमेन्ट का कमी? उसका कमी त उनको कभियो नहीं होगा. देखे नहीं अभी पिछला कहानी जंगल का रात पर पैसठ कमेन्ट मिला? बाकी उनका प्राब्लम दूसरा है."
इतना कहकर वे निंदक जी को आवाज़ लगाते हुए चिल्लाए; "ऐ निंदक..निंदक."
उनकी आवाज़ शायद निंदक जी को सुनाई नहीं दी या उन्होंने जानबूझकर रिसपोंड नहीं किया. उन्होंने एक बार फिर से आवाज़ लगाई; "ऐ निंदक जी..अरे तनी हेइजे सुनिए भाई."
उधर निंदक जी अपने डिस्कशन में मशगूल. रतीराम जी बोले; "आ ई निंदकवा को देखिये. ई हफ्ता भर से किसी न किसी के साथ में अंडरअचीभर वाला बात का चर्चा किये जा रहा है. मनमोहन सिंह के ओतना धक्का नहीं लगा होगा जेतना इसको लगा है. उप्पर से कहता है कि कौनो इश्पंसर मिल जाता त टाइम पत्रिका के खिलाफ प्रदर्शन कर देता."
इतना कहकर उन्होंने फिर आवाज़ लगाई; " हे निंदक...अरे सुनो भाई. कभी हमरो सुनो तनी.
अब की बार निंदक जी ने उनकी सुन ली. उठकर आये. रतीराम जी से बोले; "काहे ला एतना परशान कर रहे हैं? चेन से बतियाने भी नहीं देते हैं."
रतीराम जी बोले; "का उखाड़ ले रहे हो बतिया के? हफ्ता भर से ओही एगो मुद्दा लेकर सबसे बतियाये जा रहे हो. आ बतियाने का एतना ही है त काहे नहीं धर लेते कौनौ न्यूज चैनल. हम तो कहेंगे कि ऊ अरनब्वा का चैनल पर चल जाओ.बाकी उहाँ, अंग्रेजी में बौकना पड़ेगा सब." इतना कहकर रतीराम ने मुस्कुराते हुए आँख दबा दी.
रतीराम जी की बात को समझते हुए निंदक जी बोले; "माटी से जुड़े मनई हैं महराज. आ ई जनम में तो अंग्रेजी भाषा नहिये बोलेंगे. बाकी अगला जनम का बाद में देखा जाएगा. आ बकैती छोड़िये औ ई बताइए कि बोलाए काहे हमको?"
रतीराम जी ने मेरी तरफ इशारा करते हुए कहा; "हम कहाँ बोलाए? बोलाए हैं आपके बड़के फैन मिसिर बाबा. इनको जरा बताइए कि हलकान भई को कौन बात का दुःख है? ऊ जो कल आप बताये रहे न हमके."
निंदक जी मेरी तरफ देखते हुए रतीराम जी से बोले; "आप भी कौनो बात पचा भी नहीं सकते हैं. मिश्रा जी के भी बता दिए?"
उनकी बात सुनकर रतीराम जी बोले; "अरे त मिसिर बाबा के त ही बताये हैं. कौन सा आपका बताया रहस्स बराक ओबामा के बता आये?"
निंदक जी को लगा कि अब वे बात को टाल नहीं सकते. लिहाजा बोले; "अरे अब क्या कहें मिश्रा जी आपसे? आपके हलकान भाई को इस बात का दुःख है कि पंद्रह दिन से कोई उनका तारीफ़ नहीं किया है."
मैंने कहा; "हलकान भाई को तो तारीफ मिलती ही रहती है. फेसबुक से लेकर ब्लॉग तक हर पोस्ट में इतना कमेन्ट मिलता है."
निंदक जी बोले; "अरे ऊ त भर्चुअल वल्ड का तारीफ है महराज. हम रीयल वल्ड वाला तारीफ़ का बात कर रहे हैं."
मैंने कहा; "रीयल वर्ल्ड में भी तारीफ मिलती ही रहती है उनको."
वे बोले; "एही त प्रॉब्लम है...चलिए अब आपके सामने भेद खोल ही देते हैं. त सुनिए. हलकान भई का माडस अप्रेंडी और तरह का है. ऊ किसी न किसी ब्लॉगर से हर दो तीन दिन पर कहते रहते हैं कि ऊ ब्लॉगर बहुत अच्छा लिखता है. आ ऐसा इस लिए कहते हैं ताकि ऊ पलट कर कह दे कि आप भी बहुत अच्छा लिखते हैं. बाकी हुआ क्या कि जब से सावन शुरू हुआ है तब से कोई ब्लॉगर इनको मिला ही नहीं जिससे यह कह सके. कारण ये है कि कोई न कोई ब्लॉगर हमेशा भोलेबाबा को जल चढाने जा रहा है. ऊपर से दू दिन पहले झा जी फ़ोन पर मिले तो ई कह दिए कि आप बहुत अच्छा लिखते हैं मगर झमेला ये हुआ कि झा जी उधर से नहीं कहे कि आप भी बहुत अच्छा लिखते हैं. बस तभी से हलकान भाई दुखी हैं."
मैंने कहा; "अरे तो हमको फ़ोन कर लेते. हम तो उनको वैसे ही बताते रहते हैं कि वे बहुत अच्छा लिखते हैं."
निंदक जी बोले; "अब ई तो नहीं पता कि आपको काहे नहीं फ़ोन किये. बाकी इसीलिए दुखी हैं ऊ."
तबतक रतीराम जी बोले; "देखिये तारीफ सुनना सभी चाहता है लोग़, बाकी ज़बरजस्ती नहीं न कर सकता है. ऊ दत्तो दा भी ओइसे ही हैं. एक दिन मार्निंग वाक में अपना कुत्ता लेकर आये. कुत्ता त का पूरा शेर टाइप लगता है ऊ. आ उसी समय एगो औरी हैं मुखर्जी बाबू, ऊ भी अपना कुत्ता लेकर आ गए. दत्तो बाबू ने मुख़र्जी बाबू का कुत्ता का खूब सराहना किया बाकी मुख़र्जी बाबू ने उनका कुत्ता का तारीफ नहीं किया तो दत्तो बाबू भी नाराज़ हो गए. त कहने का मतलब ई कि पब्लिक सब नाराज़ होकर आजकाल तारीफ लेना चाहता है."
रतीराम जी की बात ख़तम होती उससे पहले ही निंदक जी बोल उठे; "आ खाली दत्तो बाबू ही काहे? भूल गए कविराज का काण्ड?"
रतीराम जी बोले; "भूलेंगे कईसे? उनका त हमेशा से एही हाल है. ऊ आपके फ़ुरसतिया जी की सूक्ति है न कि "कबी का तारीफ कर दो त ऊ फट से दीन हीन हो जाता है", ऊ सूक्ति पूरा फिट बैठता है उनपर. पहिले तो हर नया कविता सुनायेंगे औउर कोई तारीफ नहीं किया त उसका साथ दू दिन बात नहीं करेंगे. बाकी जो तारीफ कर दिया त फट से उसका सामने हाथ जोड़ कर खड़े हो जायेंगे, ई कहते हुए कि बास आपका कृपा है. देख के लगता है कि जईसे सामने वाला ही इनको कागज़-कालम खरीद के दिया है आ नहीं तो ई कविता नहीं लिख पाते."
निंदक जी बोले; "हा हा हा..सही कह रहे हैं. ऊनका हाल देखकर उस समय एही लगता है."
रतीराम जी ने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा; "अब ऊ जमाना नहीं रहा कि शम्मी कपूर जैसा हीरो भी शरमीला जी को सुन्दर बताने का बास्ते तारीफ ख़ुदा का करें जो उनको बनाया था.हम कहते हैं तारीफ त अईसे भी होता है बाकी सामने वाला माने तब."
तब तक मेरा पान बन गया था. रतीराम जी हमको देते हुए बोले; "आ लीजिये खाइए. ई तो हरि अनंत हरि कथा अनंता टाइप बात है. पूरा शास्त्र ही लिखा जा सकता है. बस वेद व्यास जईसा कोई चाहिए."
Monday, July 23, 2012
तारीफ़ करूं क्या उसकी....
Monday, April 30, 2012
हम किरपा के बदले दसबंद नहीं देंगे आपको..
बहुत दिन बाद कल रतिराम जी की दूकान से पान मंगवाया. पान खाना तो मैंने छोड़ दिया है लेकिन हमारे एक मित्र मिलने आये तो मैंने सोचा कि उनके लिए मंगवा लेते हैं. उनके लिए आएगा तो मेरे खाने का भी बहाना बन जाएगा. कुछ खाने के लिए बहाना बनाने का काम हम केवल पान के केस में करते हैं. मिठाई के केस में ऐसी बात नहीं होती. मिठाई न खाने की अभी तक वजह भी नहीं बनी है. लिहाजा उसके लिए बहाने बनाने की जरूरत नहीं रहती. मेरा ऐसा मानना है कि मिठाई खाना सहज मानव स्वाभाव है और ऐसा करते हुए मनुष्य सहजता के चरम पर रहता है.
ऑफिस से राजू को पान लाने के लिए भेजा गया. पान देते हुए रतिराम जी ने उससे पूछा; "है अफिसे में?"
वो बोला; "हाँ, इसीलिए तो पान लाने भेजे हैं. नहीं तो मैं थोड़ी न पान खाता हूँ."
रतिराम जी बोले; "ई बताने का जरूरत हैं का? आ तुम खाते हो कि नहीं, हमसे का लेना-देना? जेतना पूछे हैं ओतना का जबाब देने में का जान निकलता है? कहीं अईसा त नहीं कि बात को तान के बड़ा करने का काम तुम भी करने लगे हो? ऊ करते हैं त ओनका सोहाता है. ऊ ब्लाग लिखते हैं. बाकी तुम काहे कर रहे हो?"
राजू बोला; "नहीं मेरे कहने का मतलब वह नहीं था."
रतिराम बोले; "मतलब त हमको भी बुझाता है. बुझाता है कि तुम भी ओनका तरह ही बात को खीचने का प्रैक्टिस शुरू कर दिए हो. हमको देखकर तुमको एही न बुझाता है कि हमको खाली कत्था घिसने आता है? त सुनो बाबू, एही रतिराम जी चूना भी घिसते हैं. हमरा एगो सलाह मानो, आ सुनो. ई सब काम के चक्कर में मत पड़ो. पता चला ब्लाग लिखने लगे औउर कौनो काम के न रहे."
इस अचानक हुए हमले की उम्मीद राजू को नहीं रही होगी. वे हड़बड़ाकर कर बोला; "नहीं-नहीं, हम तो अपने काम से काम रखते हैं. "
रतिराम बोले; "सही करते हो. बाकी अपना काम से काम छोड़कर ब्लाग-फ्लाग लिखने-फिखने के चक्कर में पड़ोगे त कौनो काम के नहीं रहोगे. अच्छा सुनो, आ मिसरा जी कहना कि हम दुपहरे आयेंगे. हमरा एगो काम है."
राजू ने राजू-रतिराम संवाद का वर्णन कर डाला.
कुछ देर तक मैंने यह अनुमान लगाने की कोशिश की कि रतिराम जी हमसे क्यों मिलना चाहते हैं? एक बार मन में आया कि जब आयेंगे तो पता चल ही जाएगा इसलिए इस बात को छोड़ दिया जाय. फिर मन में यह आया कि छोडें क्यों? वैसे भी अगर अपने पास समय है तो फिर अनुमान लगाने में कोताही काहे बरती जाय? ऊपर से दोपहर का लंच करने के बाद मुँह में पान भी पड़ गया है. मुँह में पान रहता है तब सोचने के लिए एकाग्रता का निर्माणकार्य बड़ा ईजी रहता है. ऐसे में अनुमान नहीं लगाना माने कर्त्तव्य से मुँह मोड़ लेना होगा. आज की तारीख में अनुमान लगाने से मनोरंजक कोई काम नहीं है. यह पेड़ लगाने से सहल है और किसी को काम पर लगाने से बहुत सहल. यही कारण है कि दुनियाँ में अनुमानों की संख्या बढ़ती जा रही है और पेड़ की संख्या घटती जा रही है. काम करने वालों की संख्या और भी घटती जा रही है.
यह सब सोचते हुए मैं शुरू हो गया. एक बार के लिए सोचा कि बेटे की पढ़ाई के बारे में कुछ होगा? मैं बस सोचता जा रहा था. इस सोच को तब विराम मिला जब यह याद आया कि उनका बेटा तो आजकल मोटरसाइकिल चलाने की प्रैक्टिस करता है. पिछले साल वह डांस रिअलिटी शो में जाना चाहता था. अब उसने उस विचार का त्याग दिया है और अब वह रोडीज में जाना चाहता है. उस सोच को विराम मिला तो यह सोच मन में उभरी कि रतिराम जी के दिमाग में कहीं दूसरा बिजनेस शुरू करने की बात फिर से तो नहीं हलचल मचा रही? यह भी सोचा कि शायद यह पूछने आ रहे हों कि कहीं चाय-पान दूकान पर भी तो सर्विस टैक्स लागू नहीं हो गया? या फिर ऐसा तो नहीं कि रतिराम जी शेयर में इन्वेस्ट करना चाहते हैं? अनुमान और लगते लेकिन तब तक एक फ़ोन आ गया. पिछले कई वर्षों में अनुमान लगाने के रास्ते में फोन सबसे बड़ा रोड़ा बनकर उभरा है.
खैर, मैंने फोन रिसीव किया. पता चला आज चैताली ने नहीं बल्कि नेहा ने फोन किया था. उसने मुझे बताया कि मैं उनकी बैंक का एक क्रेडिट कार्ड होल्ड करता हूँ. मैंने यह बात कबूल कर ली. इसके बाद नेहा जी ने सूचना दी कि चूंकि मैं एक क्रेडिट कार्ड होल्ड करता हूँ इसलिए बैंक ने मुझे एक ऐसा लोन देने का फैसला किया है जिसके लिए मुझे कोई डोकुमेंट देने की ज़रुरत नहीं है. लोन पचास हज़ार से डेढ़ लाख तक मिल सकता है. और वह भी बहुत ही नॉमिनल इंटेरेस्ट रेट पर. मैंने रोज की तरह उन्हें बताया कि मुझे लोन मंज़ूर नहीं है. उन्होंने मुझे थैंक्स कहते हुए फोन काट दिया. मैंने भी फोन काट दिया. इस आशा के साथ कि कल निहारिका जी फोन करके फिर बतायेंगी कि "सर, आप मेरे बैंक का एक क्रेडिट कार्ड होल्ड करते हैं." मैं कहूँगा; "हाँ." और वे मुझे बैंक द्वारा लोन दिए जाने का फैसला सुनाएंगी और मैं उस लोन को डिक्लाइन कर दूंगा.
इस आशा के साथ कि नेहा जी फिर दो दिन बाद फोन करेंगी.
यह सब चल ही रहा था कि पता चला रतिराम जी आफिस में प्रवेश कर चुके हैं. वे आये. वे बैठे. वे वापस नहीं गए.
मैंने पूछा; "कैसा चल रहा है धंधा?"
वे बोले; "ओइसे ही जईसा चलता है. हमरे धंधा में में कौनो कमी नहीं है. चाह पीयो और पान खाओ. एही से देश है."
मैंने कहा; "अब तो चाय भी राष्ट्रीय ड्रिंक बन गई है."
वे बोले; 'का आप भी मजाक करते हैं? ई सब सरकारी चिरकुटई है. आ सरकार उसको राष्ट्रीय ड्रिंक बनाये आ चाहे अंतर्राष्ट्रीय, चाह तो चाह ही रहेगी."
मैंने कहा; "और क्या हाल है? आपका फेसबुक पेज कैसा चल रहा है? उसको बनाने के बाद पान की बिक्री बढ़ी कि नहीं?"
वे बोले; "आ उसको त ऐसेही बना दिए थे. ऊ सब तो मौज का बात है. बाकी ई फेसबुक और ट्विटरवा दुन्नो का ओही काम है जो चाह-पान का है. पब्लिच्क को बिझाये रखने का साधन है ई सब."
मैंने कहा; "नहीं ऐसी बात नहीं है. अब तो सोशल मीडिया पावरफुल हो गया है. इसको इस्तेमाल करके अब तमाम लोगों के ऊपर प्रेशर बना रहे हैं लोग़?"
वे बोले; "आ देखिये मिसिर बाबा, के किसको इस्तेमाल कर रहा है ई के जानता है? आ आप सोच रहे हैं कि पब्लिक सब इसको इस्तेमाल कर रहा है. हमरा नजरिया तनि अलग है इसपर?"
मैंने कहा; "मतलब?"
वे बोले; "आ आज से दस साल बाद ई भी त पता चल सकता है कि पब्लिक सब सोशल मीडिया का नहीं बल्कि सोशल मीडिया पब्लिक सब का इस्तेमाल कर रहा था. आ मिसिर बाबा, हमरा मन में बहुत बार ई आता है कि ई सब देकर पब्लिक को बिझा दिया गया है. पब्लिक सब बिझी रहेगी त सड़क पर नहीं आएगी. आलसी बना दे रहा है सब मिलकर आपलोगों को. अच्छा आप ही एक बात बोलिए? आपको लगता है कि ई सब चोचला पहिले होता त का इतिहास का बड़ा-बड़ा क्रान्ति सब होता? सोचिये कैसा सीन मिलता देखने को? फ्रांस का ही क्रांति ले लीजिये. उधर फ्रांस का रानी कहती कि पब्लिक के पास रोटी नहीं है त ई सब केक काहे नहीं खाता? आ इधर ट्विटर वाला पब्लिक सब रनिया का मजाक उड़ा देता. हजारों ट्वीट निकलता आ उसके से लाखों रि-ट्वीट. मामला ओही रफा-दफा हो जाता. उधर राजा देखता कि ट्विटर पर हज़ार लोग़ बिरोध कर रहा है त ऊ भी अपना पईसा-ओईसा खर्च करके अपना हज़ार ट्वीट करने वाला को बईठा देता. दुन्नो तरफ का ट्वीटर सब सिर-फुटव्वौल करता रहता औउर रजवा अपना राज."
मैंने कहा; "नहीं मेरा मानना है कि तब भी क्रांति ट्विटर से होती."
मेरी बात सुनकर रतिराम मुस्कुरा दिए. बोले; "आप भी बहुत भोले हैं. बाकी आपका गलती नहीं है. आपका जईसे ट्विटरवा पर खीच-पिच करने वाला सब एही सोचता है. देख नहीं रहे राष्ट्रपती जी ने ज़मीन लौटा दिया त कईसा जशन मना रहा है सब? आ हमको लगता है कि बात दुसरा है. ऊ आपलोग कहते हैं न कि वार जीतने के लिए ऊ का कहते हैं...देखिये याद नहीं आ रहा है. हाँ, वार जीतने के लिए कभी-कभी बैटिल हारना पड़ता है. त ई एही बात है. खैर जाने दीजिये. ई सब त चलता ही रहेगा. हम जो काम से आये हैं ऊ सुनिए."
मैंने कहा; "हाँ बोलिए, क्या काम है?"
वे बोले; "हम सोच रहे थे एक ठो टेक्सी निकलवा लें. थोड़ा पईसा हम जुटाए हैं. थोड़ा बैंक से लोन ले लेंगे. आपका अगर हमरा पेपरवर्क करवा देते बड़ा किरपा रहता. हमरा कहने का मतलब ऊ बाबाजी वाला किरपा नहीं चाहिए हमको."
मुझे हँसी आ गई. वे बोले; "हंसिये मत. आ ई बोल के हम किलीयर कर दिए हैं कि हम किरपा के बदले दसबंद नहीं देंगे आपको."
मैंने इंतजाम कर दिया है. रतिराम जी की टैक्सी जल्द ही निकल जायेगी सड़क पर.
Tuesday, April 27, 2010
हमरा त फ़ोन भी टैप नहीं होता....
बहुत दिन बाद कल रतिराम जी की दूकान पर जाना हुआ. करीब डेढ़ महीने के बाद. पिछले महीने आफिस से किसी को भेजकर पान मंगवा लेते थे. मैंने सोचा मार्च महीने में जाऊँगा तो रतिराम जी मन ही मन बहुत कुछ सोच लेंगे. मन में खुद से बात भी कर सकते हैं कि; "कैसा बैठा-ठाला मनई है कि इसको मार्च का महीना में भी कोई काम नहीं है. जब पूरा देश मार्च मना रहा है और देश का जीडीपी बढ़ा रहा है ता ई मनई आफिस से चलकर पान खाने आया है."
यही सब सोचकर नहीं गया मैं.
खैर, कल गया तो मुझे देखकर बोले; "अरे आइये-आइये. केतना दिन बाद लौके हैं. अब तो तबियत पहिले से ठीक-ठाक लग रहा है. बाकी चलने में अभी भी दिक्कत है. का कहता है डाक्टर?"
मैंने कहा; "डॉक्टर कहते हैं ठीक हो जाएगा."
मेरी बात सुनकर बोले; "ठीक हो जाएगा, ई बात त आठ महिना से कह रहे हैं. कोई नया बात नहीं बोले?"
मैंने कहा; "अब फिजियोथैरेपिस्ट आते हैं घर पर. पहले से काफी ठीक है. सच कहें तो अब डॉक्टर के पास जाना छोड़ दिया है मैंने."
मेरी बात सुनकर बोले; "अखीर में करना पड़ा ना वोही काम? आपके त हम नवंबरे में कहे थे कि ऊ डॉक्टर फंसा लिया है आपको. आ फायदा-ओयदा कुछ नहीं होगा. केतना का धक्का लगाया?"
मैंने कहा; "नहीं ऐसी बात नहीं है. मैंने तो इसलिए जाना छोड़ दिया कि उनका काम हो गया था. कोई इलाज नहीं समझ पाए होंगे. ऐसा होता है."
मेरी बात सुनकर उन्होंने एक तीखी सी मुस्कान छोड़ दी. देखकर लगा जैसे कह रहे हों 'हमको का समझाइएगा आप? बहुत दुनियां देखे हैं हम.' फिर मेरी तरफ देखकर बोले; " आप भी ना. कबूल थोड़े ना करेंगे हम ऊ समय जो कहे रहे, वोही सच था. ई डाक्टर सब को आप भी जानते हैं बाकी बोलेंगे नहीं. ई देखिये, इनको देखिये...देखिये-देखिये..देसाई साहेब हैं ई. ऊ का नाम है संस्था का? हां कौंसिल ...मेडिकल कौंसिल का सर्वेसर्वा. का करते हुए पकड़े गए? देखिये पेपर..खुदे देखिये."
मैंने कहा; "हर प्रोफेशन में कोई ना कोई खराब निकलता ही है. इसका मतलब सब खराब हैं, यह थोड़ी ना है."
मेरी बात सुनकर मुस्कुरा दिए. बोले; "आप महाराज...आप कूटनीतिज्ञ काहे नहीं हुए? आप होते त बहुत देश से अपना देश का सम्बन्ध ठीक हो जाता."
मैंने कहा; "क्या रतिराम जी? आप मेरी टांग खींच रहे हैं? खैर छोडिये ई सब. अपनी कहिये? का नया हो रहा है?"
बोले; "हाँ, आप त बहुत दिन से आये नहीं ना. आप बता नहीं पाए. एगो सीजनल बिजिनेस कर लिए इस साल."
मैंने सोचा ये सीजनल बिजनेस क्या करेंगे? गर्मी बढ़ गई है. ऐसे में शायद लस्सी की दूकान खोल लिया होगा इन्होने. यही सोचते हुए मैंने पूछा; " लस्सी और कोल्ड-ड्रिंक्स की दूकान कर लिए क्या?"
मेरी बात सुनकर हंस दिए. बोले; "अरे नहीं. कोल्ड-ड्रिंक्स त हम एही पान के दुकाने पर रखते हैं. असल में एक काम मिला था प्रिंटिंग का. वोही कर लिए."
उनकी बात सुनकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ. प्रिंटिंग के बिजनेस को कोई सीजनल बिजनेस क्यों कहेंगा भला? फिर मैंने सोचा कि शादी का मौसम है. ऐसे में रतिराम जी ने शायद विवाह के कार्ड छापने का काम शुरू कर दिया होगा. मैंने कहा; "समझ गया. विवाह का कार्ड छापने का धंधा शुरू कर दिया क्या आपने?"
वे बोले; "अरे नहीं-नहीं. असल में हमको प्रिंटिंग का एगो कांट्रेक्ट आई पी एल के चलते मिल गया था."
उनकी बात सुनकर लगा कि रतिराम जी ने निश्चित तौर पर कोई लम्बा हिसाब बैठा लिया है. मैंने कहा; "क्या बात है? कोलकाता नाईट राइडर्स के मैचेज के टिकेट प्रिंट करने का ठेका आपको ही मिला था क्या? इस बात पर तो पार्टी बनती है. कैसे बैठाए ये हिसाब?"
मेरी बात सुनकर बोले; "आप भी केतना दूर चले जाते हैं? अरे ऊ बात नहीं है. ई सब छापने के लिए हमीं हैं का? सौरव गांगुली के ससुर जी का छपाई का एतना बड़ा बिजनेस है आ आप हमरा नाम ले रहे हैं. असल में बात ई है कि हमको तीन-चार कंपनी से चौका-छक्का छापने का कांट्रेक्ट मिल गया था."
उनकी बात सुनकर मुझे हंसी आ गई. चौका-छक्का छापने का कांट्रेक्ट? ये कैसा कांट्रेक्ट है? यही सोचते हुए मैंने उनसे पूछा;" क्या बात करते हैं आप भी? चौका-छक्का भी कोई छापने की चीज है? आप क्या कहना चाहते हैं?"
मेरी बात सुनकर बोले; "हमको मालूम था कि आपको नहीं बुझाएगा. बताइए आप किरकेट के दीवाने बताते हैं खुद को अउर एही नहीं बुझाया आपको. अरे चौका-छक्का छापने का मतलब होता है ऊ सब पम्फलेट जो दर्शक सब हाथ में लेकर बैठा रहता है अउर चौका या फिर छक्का लगते ही हाथ उठा-उठाकर देखाता है. ओही सब छापने का कांट्रेक्ट मिल गया था. कमीशन पर छपवा दिए."
मैंने कहा; "क्या बात करते हैं आप भी महाराज? इस काम को आप सीजनल बिजनेस बता रहे हैं."
वे बोले; "त अउर का बताएं? ई सीजनल बिजनेस नहीं है? आप का समझते हैं? अब आई पी एल का खाली क्रिकेट टोनामेंट है? नहीं, अब ई उद्योग है. उद्योग तो उद्योग अब आई पी एल खुद एक सीजन है. जैसे जाड़ा, गर्मी, बरसात का सीजन होता है, ओइसे ही आई पी एल का भी सीजन होता है."
उनकी बात सुनकर लगा कि सही बात तो कह रहे हैं. मैंने पूछा; "तो आपको ये कांट्रेक्ट मिला कैसे?"
बोले; "अरे ऊ लेकरोड वाले राय बाबू हैं ना. अरे वोही जिनसे आपको मिलाये थे एकबार. उनका अब लम्बा हिसाब बैठ गया है आई पी एल में. मालूम नहीं आपको?"
मैंने कहा; "नहीं तो मुझे नहीं मालूम था.'
वे बोले; "अरे नहीं. अब ओंक हिसाब लम्बा हो गया है. अभी दू दिन पहिले ही त उनसे भी पूछताछ किया है इनकम टैक्स वाला सब. कल आये थे दूकान पर. बहुत खुश थे. कह रहे थे इनकम-टैक्स वाला सब एक बार पूछताछ कर लिया त अब नाम हो गया है."
मैंने कहा; "तब तो आपसे भी इनकम-टैक्स वाले पूछताछ कर सकते हैं. आखिर आप भी तो आई पी एल टीम खरीदने का कोशिश किये थे."
मेरी बात सुनकर बोले; "अरे कहाँ हमरा भाग्य ऐसा है? हम त भगवान् से बोले कि हे भगवान् हमरे दूकान पर भी अगर इनकम-टैक्स आई पी एल का कनेक्शन में रेड मार देता त केतना बढ़िया होता. बाकी कहाँ भाग्य में इनकम-टैक्स का रेड लिखा है. एक बार के लिए सोचे कि हमरे दूकान से ही मोदी जी के लिए तीन दिन पान गया था. ओही का रिलेशन में इनकम-टैक्स वाले कुछ पूछ लेते. बाकी हुआ नहीं ऐसा."
मैंने कहा; " मोदी जी माने ललित मोदी? वे पान भी खाते हैं?"
मेरी बात सुनकर हंस दिए. बोले; "अरे मिसिर बाबा, ई बड़े लोग का खाने के लिए अगर चार चीज ऐसा जाता जो ऊ लोग खाता है त साथ में बारह चीज ऐसा जाएगा जो ऊ लोग नहीं खाता है. पान भी ओही में से एक होगा."
मैंने कहा; "सही कह रहे हैं. वैसे मोदी जी अब बेचारे फंसे हुए हैं.'
मेरी बात सुनकर रतिराम जी बोले; "का बात करते हैं आप भी? फंसे-ओंसे कुछ नहीं हैं. सब ठीक हो जाएगा. समय थोड़ा खराब चल रहा है. बाकी किसी का कुछ होगा नाही."
मैंने उनसे पान लेते हुए कहा; "अच्छा चलता हूँ. और कुछ नया होगा तो बताइयेगा."
वे बोले; "अरे कहाँ हो रहा है नया कुछ? एक रात त सपना आया कि सरकार हमरा भी फ़ोन टैप कर लिया है. ऊ पत्रिका ..का कहते हैं उसको? हाँ, आऊटलुक में हमरा नाम भी छपा है फोटू के साथ. सपना में एतना ख़ुशी हुए कि कहिये मत. बाद में नींद खुला त बहुत दुःख हुआ. का करें, हम तो इतने गए-गुजरे हैं कि हमरा त फ़ोन भी टैप नहीं होता. एक बार इनकम-टैक्स का छापा या चाहे फ़ोन टैप हो जाता त जीवन सफल हो जाता..."
पान मुंह में दबाये मैं उनकी दूकान से चल.................

