नेता और पत्रकार एक शाम शराब पर "देश के लोकतंत्र को और मजबूत कैसे किया जाय?" नमक गंभीर प्रश्न पर चिंतन कर रहे थे. पास ही ताल ठोककर ब्लास्ट की जिम्मेदारी लेनेवाले एक आतंकवादी संगठन ने बम फोड़ दिया. दोनों भगवान को प्यारे हो गए. इधर इन दोनों ने धरती त्यागी और उधर धर्मराज का दूत दोनों को लेने आ पहुँचा. घटनास्थल पर पहुँचकर इस दूत के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा क्योंकि नेता की आत्मा से तो उसकी भेंट हो गई लेकिन पत्रकार की आत्मा आस-पास दिखाई नहीं दी. दूत ने बड़ी खोजबीन की. पत्रकार की आत्मा को आवाज़ भी लगाईं लेकिन उसकी तरफ से जवाब नहीं मिला.
परेशान होकर धर्मराज का दूत केवल नेता की आत्मा काँधे पर लादे धर्मराज के पास पहुँचा। वहाँ पहुँच जब लाई गई आत्मा की एंट्री रजिस्टर में करवा रहा था तब धर्मराज ने पूछा; "पत्रकार की आत्मा क्यों नहीं लाये? तुम्हारा काम अब आउटसोर्स करने लगे हो क्या?"
दूत बोला; "क्षमा करें धर्मराज, पत्रकार की आत्मा की मैंने बहुत खोज की लेकिन वह मिली ही नहीं. मैंने आवाज भी लगाईं थी लेकिन कोई जवाब नहीं मिला. आपको मेरी बात पर विश्वास न हो तो मैंने घटनास्थल पर जो आवाज लगाईं थी उसका खुद स्टिंग भी कर लिया है ताकि आप गुस्सा हों तो आपके सामने सबूत दे दूँ."
धर्मराज ने स्टिंग देखा. उसके बाद वे भी सोच में पड़ गए कि पत्रकार की आत्मा कहाँ गायब हो गई? वे सोच ही रहे थे कि कांख में दुनियाँ की करनी का खाता लिए चित्रगुप्त पधारे. धर्मराज को सोचते हुए देख शायद कारण भांप गए. छूटते ही बोले; "प्रभु कहीं आप उस पत्रकार की गायब आत्मा के बारे में सोचकर चिंतित तो नहीं हैं?"
धर्मराज बोले; "हाँ चित्रगुप्त, ये कैसे हुआ कि नेता की आत्मा तो दूत को मिल गई लेकिन पत्रकार की आत्मा गायब हो गई?"
चित्रगुप्त बोले; "भगवन, मेरे और मेरे खता-बही के रहते आप नाहक परेशान हो रहे हैं."
धर्मराज ने पूछा; "तो क्या तुम्हें पता है कि पत्रकार की आत्मा कहाँ है?"
चित्रगुप्त ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया; "मुझे सब पता है प्रभु. सबकी करनी का हिसाब रखता हूँ तो उनकी आत्माओं का भी हिसाब रखना ही पड़ेगा. दरअसल पत्रकार की आत्मा इस नेता की आत्मा की टेंट में है"
धर्मराज के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा. बोले; "पत्रकार की आत्मा नेता की आत्मा की टेंट में? लेकिन ऐसा हुआ कैसे चित्रगुप्त?"
चित्रगुप्त ने रहस्य खोला. बोले; "हे भगवन, वो इसलिए क्योंकि इस पत्रकार ने अपनी आत्मा इस नेता को बेंच दी थी और वर्षों से उस आत्मा का मालिक ये नेता ही था. ये देखिये इसके टेंट से मैंने पत्रकार की आत्मा निकाल ली" कहते हुए चित्रगुप्त ने नेता की आत्मा के जेब से पत्रकार की आत्मा निकालकर धर्मराज के सामने रख दिया.
उसके बाद उन्होंने नेता और पत्रकार की करनी का हिसाब करना शुरू किया।
जब हिसाब हो गया तो धर्मराज बोले; "हाँ तो क्या हिसाब निकला चित्रगुप्त?"
चित्रगुप्त बोले; "हे भगवन, जब से यह पत्रकार कार्यक्षेत्र में आया है तभी से इसने इस नेता के लिए काम किया है. इसने इस नेता और उसकी पार्टी के लिए सत्य को छिपाया है, तोड़-मरोड़ कर दिखाया है, आधा सच बोला है, पोल नहीं खोला है, इससे रुपया खाया है और झूठ फैलाया है"
धर्मराज बोले; "दोनों ने एकसाथ मिलकर पाप किया है. करोड़ों लोगों से एकसाथ सत्य छिपाने से बड़ा पाप और क्या होगा? दोनों को कम से कम अगले दस जनम तक मुक्ति नहीं मिल सकती. इन्हें मुक्ति न मिले उसके लिए जरूरी है कि ये पाप करते जाएँ. जबतक पाप करते रहेंगे, मुक्ति का इनका रास्ता कठिन होता जाएगा. इन्हें फिर से मनुष्य बनाकर पृथ्वी पर भेज दो."
चित्रगुप्त ने पूछा; "मनुष्य बनकर ये वहां तो जायेंगे ही लेकिन इनसे ऐसा कौन सा काम करवाया जाय प्रभु जिससे इनके ऊपर पाप चढ़ता रहे?"
धर्मराज बोले; "किसी बड़े मंदिर में नेता को जानवरों का व्यापारी बना दो और पत्रकार को वो पंडित बना दो जो जानवरों की बलि देता है. बाकी का काम पाप खुद कर लेगा"
चित्रगुप्त आसाम का नक्शा लिए अपने टाइपिस्ट को आर्डर.....
Sunday, March 15, 2015
पाप
Tuesday, March 26, 2013
नेताओं का गुझिया कम्पीटीशन - पार्ट २
........आगे का हाल
रविशंकर प्रसाद बोले; "मैं माननीय लालू जी से पूछना चाहता हूँ कि प्राचीन भारत के समय से ही गुझिया के मसाला में जो गरी काटकर डाली जाती थी वह रंगी नहीं जाती थी। यहीं देख लीजिये कि इन्होने जो मसाला यहाँ रखा है उसमें इस्तेमाल होने वाली गरी को इन्होने हरे रंग में रँग दिया है।"
रविशंकर प्रसाद की बात पर लालू जी बोले; "आ जो हरे रंग से रंगी गरी देख रहे हैं, ऊ रंगी नहीं है। उसको कहते हैं सेकुलर गरी ... आपका निगाह ही हरा हो गया है। आ अंधे को सब जगह गरी की हरियाली ही दिखाई देती है।"
लालू जी की बात पर जोर का ठहाका लगा।
अपनी पार्टी के एम पी को समर्थन देने आये प्रकाश करात बोले; "यह बात केसरिया गुझिया बनाने वालों को समझ कैसे आएगी लालू जी?"
रविशंकर प्रसाद कुछ कहते उससे पहले मोदी जी बोल पड़े; "मित्रों केसरिया रंग ही नहीं, केसरिया गुझिया भी भारतीय राष्ट्रखाद्य का प्रतीक है। और यही कारण है कि माननीय अटल बिहारी बाजपेयी जी के नेतृत्व में हमारी पार्टी ने मित्रों पांच वर्षों में उतनी गुझिया बनाई जितनी बाकी की पार्टियों ने पचास वर्षों में नहीं बनाई थी। आपको जानकार आश्चर्य होगा कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय भी यह मानता है .... और फिर प्रश्न यह है मित्रों ....."
वे बोल ही रहे थे कि तभी कांग्रेस पार्टी को रिप्रेजेंट करनेवाले राहुल गाँधी बोल पड़े; "प्रश्न वह नहीं जो आप कह रहे हैं मोदी जी। महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि भारत में गुझिया कौन लाया? और फिर आप अपनी पार्टी की गुझिया की बात कर रहे हैं। हमारी पार्टी ने पिछले नौ वर्षों से देश में जिस मात्रा में गुझिया बनाया है ...."
राहुल गाँधी के प्रश्न पर कि "देश में गुझिया कौन लाया?" पैवेलियन में बैठे किसी दर्शक ने कहा; "राजीव जी लाये। और कौन ला सकता है?"
उनको काटते हुए मोदी जी ने कहा; "राहुल जी कि मैं इज्ज़त करता हूँ लेकिन ये यह भूल रहे हैं कि जिन मसालों का इस्तेमाल करके इनकी पार्टी ने गुझिया बनाया, मित्रों वे सारे मसाले आदरणीय अटल जी के नेतृत्व में हमारी पार्टी ने भारी मात्रा में खरीदे थे। अगर हमारी पार्टी ने उन मसालों का भारी मात्रा में स्टॉक नहीं किया होता तो राहुल जी की पार्टी इतनी गुझिया का निर्माण नहीं कर सकती।"
उधर अपनी पार्टी की तरफ से मुलायम जी आये थे। गुझिया बनाने के लिए सारा सामान साइकिल पर ले आये थे ताकि जमीन से जुड़े प्रतियोगी लगें। मोदी जी की बात सुनकर बोले; "आपएं मासाला खईदा था तो गोईया भी बआं एते।"
उनकी बात पर रविशंकर प्रसाद बोले; "मैं माननीय मुलायम सिंह जी से कहना चाहूँगा कि लोकतान्त्रिक गुझिया ऐसे ही बनती है। मसाला कोई और खरीदे और गुझिया कोई और तले, ऐसा हो ही सकता है।"
तभी अचानक अरनब ने देखा कि डीएमके की तरफ से आये एलेंगोवन जी बड़ी अजीब आकार की गुझिया बना रहे थे जो कुछ-कुछ तिकोनी थी और श्रीलंका के आकार से मिलती-जुलती थी। अरनब ने पूछा; "आई हैव अ डायरेक्ट क्वेश्चन टू यू मिस्टर एलेगोवन। ह्वाई आर यू मेकिंग गुझियाज व्हिच रेजेम्बेल श्रीलंकाज शेप ऑन वर्ल्ड मैप?"
उनके इस डायरेक्ट सवाल के जवाब में एलेंगोवन जी बोले; "सी यारनाब, आवर ल्यीड्डर, डाक्टर कलयैङ्गार सार वास यगेंस्ट्स आवर पार्टिसिपेशन यिन दिस्स गुजिया क्याम्पीटीशन यैज यिट्ट यिज्ज टाटली यागेंस्ट्स आवर द्रविड़ काल्चार। बाट ऐट लास्ट ई याग्रीड़ टू यिट्ट यान द क्यान्डीश्यान दैट हूयेव्वर वुड रिप्रेसेन्ट द पार्टी वुड्ड कुक गुजिया याफ द शेप याफ़ श्रीलंका येन्ड यीट दोज गुजियास देन्न यैंड देय्यर। आवर ल्यीड्डर डाक्टर कलैङ्गार सार टोल्ड दैट डूइंग दिस्स वुड येसटेब्लिशड आवर येट पार श्रीलंका येण्ड यिट्स प्रेजिडेंट। यिन्न पैक्ट यिट्ट यिज्ज आवर वे ऑफ़ प्रोटेयेस्ट यगेंस्ट्स ह्वाट श्रीलंकन गावंमेंट ड्यिड्ड टू आवर तामिल ब्रेदार्न।"
एलेंगोवन जी को चीयर करने आये एम्डीएमके के वाईको ने ताली बनाई।
एलेंगोवन जी की तरफ मुखातिब होते हुए लालू जी बोले; "आ आपलोग सेकुलर रसोई में एतना बरस से हमलोग का साथ मिलकर गोझिया बनाए आ खाए, बाकी आज खाली ई बात पर छोड़कर चले गए कि कांग्रेस जो है सो आपको छोहाड़ा खाने नै दिया? आपलोग को नहीं बुझाया कि ई सेकुलर रसोई का अपमान है?"
लालू जी की बात पर नितीश कुमार बोले; "अभी भी रसोई का याद नहीं गया है? आ सही भी है, देश को गोझिया का पहिला किचेन कैबिनेट देने वाला सब याद नहीं रक्खेगा त कौन याद रक्खेगा?"
नितीश कुमार की किचेन कैबिनेट वाली बात पर राहुल जी को लगा कि शायद उनके घर के बारे में कुछ कहा गया। वे क्या करते, उनका दिमाग जहाँ तक दौड़ा वहां तक वे सोच लिए। अचानक कुर्ते की बांह चढाते हुए बोले; "नितीश जी, सार्वजनिक जगह पर व्यक्तिगत बातें नहीं करनी चाहिए। देखिये हमने पिछले कई वर्षों से इतना गोझिया बनाया। अगर आप चाहें तो हम कुछ गोझिया स्पेशल कूरियर से आपके प्रदेश पहुंचवा देंगे।"
नितीश कुमार बोले; "आ आपकी पार्टी लगातार गोझिया नहीं बनाएगी तो कौन बनाएगा? और फिर कितना बना लिए है? पहले जिस रफ़्तार से बना रहे थे, अब तो वह रफ़्तार भी नहीं रही। ऊपर से गोझिया का सामान और मसाला लाने के लिए आपके पास सीबीआई है। जब चाहें आप उनसे मसाला मंगवा लेते है। तेल ख़तम हो जाए तो सी बी आई ला देती है। मैदा ख़तम हो जाए तो भी .... ऐसे में आप गोझिया नहीं बनायेंगे तो कौन बनाएगा?"
मुलायम जी को लगा कि यहाँ उन्हें सी बी आई का पक्ष लेने की ज़रुरत है। बोले; "एखिये, ऐसी बात नई ऐ। हअबाअ सी बी आई जो ऐ मासाआ नई लाती। असोई चअती अहे, उसके लिए दूकानदाअ कई बाअ खुदै मसाआ पौंचा जाता ऐ। हमयें खुद अपई आँखों से जो ऐ सो देखा ऐ।"
पास खड़े रविशंकर प्रसाद बोले पड़े; "माननीय मुलायम सिंह जी फर्स्ट हैण्ड इनफार्मेशन दे रहे हैं। उनसे बेहतर कोई नहीं जानता कि कई दुकानदार खुद गुझिया का मसाला कांग्रेस पार्टी को दे जाते हैं। लेकिन अरनब, मैं ये भी कहना चाहता हूँ कि सी बी आई कुछ दुकानदारों को परेशान भी करती है। इसबात के लिए कि वे अगर मसाला नहीं पहुंचाएंगे तो फिर उनकी दूकान पर छापा भी ......"
राहुल जी बोले; "लेकिन सी बी आई के बारे में कहीं गई बात से मैं सहमत नहीं हूँ। दुकानदार स्वतंत्र हैं इसबात के लिए कि वे चाहें तो मसाला दें और न चाहें तो न दें। हम किसी न किसी तरीके से मसाला ले ही लेंगे।"
मोदी जे बोले; "मित्रों राहुल जी एकबात भूल रहे हैं और वह ये कि मुद्दा दुकानदारों की स्वतंत्रता का नहीं बल्कि सी बी आई की स्वतंत्रता है।"
मोदी जी की बात पर पास ही खड़े नारायणसामी बोले;"लेट मी रिमाइन्ड एवरीबॉडी प्रेजेंट हीयर दैट सी बी आई ईज्ज मोस्ट यिंडीपेंडेंट गाब्म्येंट बाड़ी।"
सबने एकसाथ ठहाका लगाया। राहुल जी को समझ नहीं आया कि सब लोगों ने एकसाथ ठहाका क्यों लगाया। वे कुछ पूछने ही वाले थे कि अचानक अरनब की निगाह उनकी बनाई गुझिया पर गई जिन्हें देखकर अरनब चौंक गए। सबने देखा कि राहुल जी ने गुझिया में सारे मसाले डाले तो हैं लेकिन उन्होंने एक भी गुझिया बंद नहीं की है।
सब हंसने लगे। सब मन ही मन राहुल जी का मजाक उड़ा रहे थे। अरनब ने पूछा; "राहुल, आपने इतनी सारी गुझिया बनाई लेकिन एक को भी बंद नहीं किया। इसके पीछे क्या कारण हो सकता है? ह्वाट कैन बी द रीजन बिहाइंड दिस स्ट्रेटेजी?"
राहुल कुछ एक्सप्लेन करते उनसे पहले केतकर जी बोल पड़े। जिस चपलता के साथ उन्होंने सफाई देनी शुरू की, देखकर लगा कि उन्हें वहां हाईकमान की तरफ से भेजा गया था। शायद यह कहकर कि कुछ गड़बड़ हो तो संभाल लीजियेगा।
वे बोले; "इन खुली हुई गुझिया के पीछे क्या कारण है वह मैं समझाता हूँ अरनब। मैं यहाँ केवल एक जज ही नहीं बल्कि कांग्रेस पार्टी के शुभचिंतक की हैसियत से भी आया हूँ। दरअसल राहुल जी ने जो बनाया है वह कांग्रेसी गुझिया है। इसे बंद नहीं किया जाता। बंद न करके पार्टी बताना चाहती है कि वह जब भी चाहे गुझिया में से कोई एक मसाला निकालकर दूसरा मसाला फिट कर सकती है। यहाँ मसालों को छूट है कि वे जब चाहें गुझिया छोड़कर जा सकते हैं। हाँ यह बात अलग है कि पार्टी गुझिया छोड़कर जाने वाले मसालों को ही फ्राई कर देती है। अभी हाल में आपने देखा होगा कि चेन्नई में किस तरह से स्टालिन के घर की रसोई में ......"
उनकी एनाल्यसिस से सभी प्रभावित थे। लालू जी बोले; "आ खाली टीभी पर समाचार पढने से नै न होता है अरनब। आ, जिस तरह से केतकर जी एनेलाइसिस किये हैं कंग्रेस का गोझिया का, उससे बुझा ही गया होगा कि केतना फरक है आपका औउर केतकर जी का कैपेभिलिटी में। अनुभव का बड़ी महत्व है।"
अरनब ने लालू जी के साथ हामी भरी।
रविशंकर प्रसाद बोले; "मित्रों, अनुभव का तो महत्व है ही। केतकर जी कांग्रेसी गुझिया का स्वाद आज से नहीं ले रहे हैं, वे तो इमरजेंसी के जमाने से कांग्रेसी गुझिया खा रहे हैं। ऐसे में अनुभव तो बोलेगा ही।"
किसी ने पास ही कड़ी ममता जी से पूछा; "दीदी, आपकी पार्टी ने किसी को गुझिया बनाने के लिए नहीं भेजा? क्या आपकी पार्टी चुनाव से पहले अपनी गुझिया नहीं खोलना चाहती?"
उसके इस सवाल पर लालू जी बोले; "आ इनका पार्टी अभी बांगाल में लपसी बना रही है। गोझिया बनाने के लिए ई लोग के पास समय कहाँ है?"
दीदी को यह बात अच्छी नहीं लगी। उन्होंने कहा; "आइसा बात नेही है लालू जी। हामारा पार्टी भी गोझिया बनाने सोकती है किन्तु बनाना नेही चाहती। एही बास्ते कि हामसोब मीलकर जो गोझिया बनाएगा, सोब वालमार्ट ख़रीद लेगा ऊ भी आधा दाम में। हामारा पार्टी को एही बात मोंजूर नही है। औउर जे बात है कि हामारा बेंगोल में गुझिया नही बनता है। उहाँ पे पीठे बनता है। कोभी पीठे बनाने का कोम्पीटीशोन होगा तोब हामलोग सोचेगा।"
पता नहीं कहाँ से पास खड़े वाड्रा जी को दीदी की बात "हामारा पार्टी गुझिया बनाना नेही चाहती" धंस गई। वे फट से बोले; "बनाना की जो बात ममता दीदी आज कह रही हैं वो मैंने तो पहले ही ...."
उनकी बात को लालू जी कटते हुए बोले; "आ चुप रहो, ई गोझिया का बात हो रहा है। ई तुम्हारा रीयल एस्टेट नै न है कि जहाँ चाहो ओहीं बोल ...."
खैर, सारी कलाएं दिखाने के बाद जुरी ने सबकी गुझिया चेक की। जुरी के अध्यक्ष कुमार केतकर जी बोले; "अरनब, मैंने सबकी गुझिया चेक की। मुलायम सिंह जी और लालू जी की गुझिया अच्छी लगी मुझे। नरेन्द्र मोदी की गुझिया कुछ ख़ास नहीं लगी। मुझे तो यह समझ नहीं आता कि अगर मोदी की गुझिया अच्छी है ही, तो गुजरात में में बच्चों में इतना कुपोषण क्यों है? वे गुझिया क्यों नहीं खा रहे? यह एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब शायद तीश्ता जी दे पाएं। एलेंगोवन जी की गुझिया मैं चेक नहीं कर सका क्योंकि प्रोटेस्ट रजिस्टर करने के चक्कर में वे सारी गुझिया खा गए। हाँ, जो सबसे ज्यादा पसंद आई मुझे, वह राहुल जी की गुझिया है। क्या गुझिया बनाया है उन्होंने। स्वादिष्ट, मीठी और पूरी तरह से सेक्युलर गुझिया। मुझे यह लगता है कि राहुल जी बहुत बड़े अंतर से जीते हैं इस कम्पीटीशन में।"
दूसरे दिन अखबारों में छपा;"राहुल गांधी ने गुझिया कम्पीटीशन जीता। नौजवानों में आशा का नया संचार"
Saturday, March 23, 2013
टाइम्स नाऊ का मास्टर शेफ इंडिया - नेताओं का गुझिया कम्पीटीशन

"आ हम गोझिया कम्पीटीशन में तभिये आयेंगे जब ई बात किलियर हो जाएगा कि बीजेपी का तरफ से कोई आएगा या एनडीए का तरफ से"; लालू जी ने अपना दो टूक फैसला अरनब गोस्वामी को फ़ोन पर सुना डाला।
उनकी बात सुनकर अरनब गोस्वामी बोले; "लालू जी, आप अपने पार्टी को रिप्रेजेंट कीजिए न। आपको इससे क्या कि बीजेपी से कोई आएगा या एनडीए से? फिर तो मैं कहूँगा कि आर जे डी की बजाय केवल यूपीए से कोई आये।"
"ऐसा नै न होता है। आ यूपीए अलग है औ आरजेडी अलग। उप्पर से ई ..."
"लेकिन लालू जी, मेरा आपसे एक डायरेक्ट सवाल ये है ....."
अभी अरनब ने इतना ही कहा था कि लालू जी भड़क गए। बोले; "आ सुनो पाहिले। बात सुनो, ई तुम्हारा न्यूजआवर नै न है जो पब्लिक सब को बोलने नहीं देगा। ई अभी तुम टेलीफोन पर न बतिया रहा है। ता हमको पूरा बोलने देगा कि नहीं?"
अरनब गोस्वामी के चैनल ने होली पर नेताओं का एक गुझिया कम्पीटीशन आयोजित करने का फैसला किया और गोस्वामी जी ने नेताओं और विशेषज्ञों को फ़ोन पर इनवाईट करना शुरू कर दिया। कुछ को इनवाईट कर लेने के बाद वे लालू जी से बात कर रहे थे। उन्होंने लालू जी से कहा; "लेकिन लालू जी, आप तो यूपीए के साथ इतने सालों से हैं।"
"देखो, ई साला लोग का बात नै करो। आ ऊ लोग से हमरा कोई बास्ता नै है अब"; लालू जी फिर भड़क गए।
उनकी भड़क से अरनब गोस्वामी एकबार के लिए चुप हो गए। आगे बोले; "आप मुझे गलत समझ रहे हैं लालू जी। मैं आपके सालों की बात नहीं कर रहा था। मैं तो आपको रिमाइन्ड कर रहा था कि आप यूपीए के साथ इतने सालों से थे।"
वे बोले; "आछा ऊ बात कह रहे थे? देखो, हम यूपीए का साथ एही खातिर हैं कि हम सोनिया जी का बड़ा ईजत करते हैं। आ नै रहेंगे त केंद्र में फ्रिकापरस्त ताकत, सांप्रदायिक ताकत आ जाएगा।"
खैर काफी मान मनौव्वल के बाद लालू जी आने के लिए राजी हो गए। समारोह कब होगा, कैसे होगा, कौन आयेंगे यह सब फाइनल हो गया। टाइम्स नाऊ पर विज्ञापन आने लगे। उन विज्ञापनों को देखकर राजदीप सरदेसाई ने ट्वीट किया; "महाराष्ट्रा इज रीलिंग अंडर ड्राऊट ऑफ़ द डबल सेंचुरी बट पीपुल आर ओर्गेनाइजिंग गुझिया कम्पीटीशन। कांट वी डू विदाऊट सच ...ऑर इज इट अस्किंग टू मच?"
उनकी इस ट्वीट पर अरनब गोस्वामी ने एक न्यूज-आर कर डाला और विनोद मेहता, कुमार केतकर, आर्यमा सुन्दरम, लार्ड मेघनाद देसाई, सुहेल सेठ, मारूफ रज़ा और पाकिस्तानी एक्सपर्ट ज़फर हिलाली के साथ मुद्दे को डिस्कश करके इस नतीजे पर पहुंचे कि भारत के लोकतंत्र में उनके मीडिया हाउस के योगदान को देखते हुए यह गुझिया कम्पीटीशन आयोजित करने का अधिकार उनके पास है।
कम्पीटीशन के दिन रामलीला मैदान में बड़ी भीड़ थी। दर्शक, पुलिस, जेड केटेगरी सिक्यूरिटी, नेता, नारे, बेचारे और चौबारे, सब एक जगह जमे थे। कम्पीटीशन शुरू होने वाला था। हर पार्टी की तरफ से एक नेता कम्पीटीशन में हिस्सा ले रहा था लेकिन उसे चीयर करने के लिए उसके पार्टी के और नेता वहां थे। उधर विशेषज्ञों का दल भी वहां था जिसे नेताओं की गुझिया देखकर उन्हें नंबर देना था। भारत के सबसे बड़े एक्सपर्ट सुहेल सेठ थे। उनके साथ आर्यमा सुन्दरम थे। चूंकि कम्पीटीशन दिन में था और विनोद शर्मा अपना ड्रिंक दिन में सिप नहीं कर सकते थे इसलिए उन्होंने जूरी में रहने से इनकार कर दिया था।
कुल मिलाकर भारत दर्शन टाइप माहौल की सृष्टि हो गई थी।
हरतोष सिंह बाल थे। अरनब गोस्वामी के हाथ में माइक था। उन्होंने ऐन्करीय धर्म का पालन करते हुए श्रीगणेश किया; "लेडीज एंड जेंटिलमैन, इट्स होली टाइम एंड टूनाईट ऑन न्यूजआवर ........."
अभी उन्होंने इतना ही कहा था कि लालू जी बोल पड़े; "आरे ई तुम गोझिया कम्पीटीशन कर रहा है कि अपना रात वाला प्रोग्राम चला रहा हैं? हे अरनब, अरे इधर इधर ... आ इहाँ टीबी पर नै न हो। इहाँ त कम्पीटीशन न कराना है ..."
उनकी बात सुनकर अरनब जी लजा टाइप गए। बोले; "लालू जी क्या करें, आदत पड़ गई है।'
लालू जी बोले; "आ देखो, तुम लोग हम लोग के त बोलता है ..हमलोग के देखो, चुनाब परचार में एतना बोलता है चुनाब जीतने के बाद संसद में बोलते सुना है हमलोग को?"
अरनब गोस्वामी बोले; "सॉरी लालू जी।"
आगे बोले; "लेडीज एंड जेंटलमैन, जैसा कि आपसब जानते हैं हमारे चैनल ने इस गुझिया कम्पीटीशन को ऑर्गेनाइज किया है ताकि भारत में लोकतंत्र मजबूत हो सके और नेक्स्ट ईयर होने वाले एलेक्शन की फील मिल सके कि कौन सी पार्टी क्या करने वाली है ..."
अभी वे इतना बोले थे कि बीजेपी के रविशंकर प्रसाद बोले; "माई गुड फ्रेंड अरनब गोस्वामी, लेट मी टेक दिस ऑपरच्यूनिटी टू थैंक यू एंड योर चैनल फॉर ऑर्गेनाइजिंग दिस कम्पीटीशन ...और अरनब, यह कम्पीटीशन आयोजित करके टाइम्स नाऊ की टीम ने एकबार फिर से साबित कर दिया कि पिछले आठ-नौ वर्षों में देश में जो भी जो कुछ भी अच्छा हुआ है वह केवल टाइम्स नाऊ ने किया है।"
उनकी इस बात पर कहीं से आवाज़ आई; "पिछले नौ वर्षों का तो नहीं पता लेकिन पिछले दो-तीन वर्षों में अर्नब ही भारत की एक मात्र अपोजीशन पार्टी रहे हैं।"
रविशंकर प्रसाद की बात पर लालू जी बोले; "आ आपलोग भी त अपोजिशने में थे, आपने काहे कुछ आछा नहीं कर दिया?"
रविशंकर प्रसाद बोले; "लालू जी की मैं बड़ी इज्ज़त करता हूँ लेकिन मैं कहना चाहूँगा कि हमारी पार्टी ने पिछले नौ वर्षों में कन्स्ट्रक्कटिव अपोजीशन की भूमिका का निर्वाह किया है और एक नहीं कई बार गुझिया बनाया है। और यही नहीं, जब भी यूपीए ने घटिया गुझिया बनाई, हमारी पार्टी ने उसे नहीं खाया।"
लालू जी ने में पूछा; "आ कह त ऐसे रहे हैं जैसे अपोजीशन में रहकर भारत को गोझिया से भर दिए हैं। कौन जगह गोझिया का महल कन्स्ट्रक्ट किये तानी हमें भी बताइए?"
अरनब ने देखा कि मामला फिसल रहा है तो बोले; "प्लीज प्लीज लालू जी, आई विल नॉट अलाऊ दिस कम्पीटीशन टू गेट पौलिटीसाइज्ड। हमें गोझिया के इश्यू पर ही रहना चाहिए।"
उधर बी जे पी की तरफ से भाग ले रहे नरेन्द्र मोदी जी ने गुझिया बनाना शुरू भी कर दिया था। उनके पास पहुंचकर अरनब ने ध्यान से सबकुछ देखा और बोले; "मोदी जी, सुना है आपकी पार्टी का एक फैक्सन नहीं चाहता था कि आप इस कम्पीटीशन में भाग लें। हमारे सोर्सेस तो यहाँ तक बताते हैं कि संघ के कुछ लोगों ने आपके द्वारा यहाँ यूज किया जाने वाला मैदा भी कहीं चुराकर रखा दिया था ताकि आपके हाथ न आये और आप गुझिया न बना सकें। उधर शिवसेना वाले भी चाहते थे कि सुषमा जी यहाँ ......"
मोदी जी बोले; "मित्रों, मैं कुछ करने में विश्वास रखता हूँ। मित्रों मैं गुझिया बनाता हूँ, उसे बनाने के सपने नहीं देखता। और मेरा कर्त्तव्य मुझसे यह कहता है कि मैं छ करोड़ गुजरातियों के लिए गुझिया बनाऊँ। वैसे मैं पार्टी का सिपाही हूँ और पार्टी जहाँ चाहेगी मैं वहां गुझिया बनाने के लिए तैयार हूँ। मुझे तो आश्चर्य होता है मित्रों कि आपके पास ये अफवाहें आती कहाँ से हैं?"
उनकी बात सुनकर केतकर बोले; "मोदी जी, ये अफवाहें नहीं हैं। ये सच है। और फिर पूरा भारतवर्ष, इन्क्लूडिंग तीश्ता सेतलवाड और संजीव भट्ट, यह मानता है कि आप जिस तरह की गुझिया बनाते हैं, वह पूरे भारतवर्ष को पसंद नहीं आएगी।"
मोदी जी बोले; "मेरे मीडिया के मित्र ऐसा मानते होंगे लेकिन ये बात सच नहीं है। मेरी बनाई गुझिया हर गुजराती को पसंद है। और मित्रों, मेरे गुजरात की गुझिया तो अब यूरोप तक जाती है। सिंगापुर तक जाती है। आपको जानकार आश्चर्य होगा मित्रों कि आज से बारह साल पहले तक गुजरात में गुझिया बहुत कम मात्रा में बनती थी। मैंने इस बारे में एक प्रयास किया। मैंने मेरे गुजरात के अफसरों के साथ मिलकर ऐसा प्रोग्राम बनाया जिसके तहत मित्रों गुझिया बनाने का मसाला से लेकर पानी तक, उस जगह पर उपलब्ध करवाया जहाँ मैदे की मिलें है। इसका फायदा यह हुआ मित्रों कि हर चीज एक ही जगह .... और आज मेरा गुजरात पूरे विश्व में गुझिया के लिए जाना जाता है। ...मित्रों आज से एक वर्ष पहले की बात है, मेरे पास एक आदमी आया। बोला साहब, हमें नवसारी में गुझिया बनाने का कारखाना खोलना है। मैंने कहा ......"
वे बोल रहे थे कि लालू जी ने उन्हें टोक दिया। बोले; "आ बस कीजिये। भार्टन के लिए जो लेक्चर का तइयारी किये थे ऊ एहीं डेलिभर कर देंगे का?"
यह सुनकर सब हंसने लगे। सुषमा स्वराज ने कहा; "अध्यक्ष जी, मैं ऐसा मानती हूँ कि संसद में केवल गुझिया पर बात हो। व्यक्तिगत आक्षेपों के लिए संसद के मंच का प्रयोग वर्जित किया जाना चाहिए।"
लालू जी बोले; "आ ए सुषमा जी, बिपच्छ का नेता रहने का एतना आदत पड़ गया है कि ई भी भूल गई हैं आप इहाँ कम्पीटीशन में हैं, संसद में नहीं। अइसा आदत पड़ जाएगा त रह जाएँगी विपच्छ में ही। आ उप्पर से मोदी जी रेसकोर्स रोड में गोझिया बनाना त दूर प्रगती मैदान में भी नहीं बना पायेंगे।"
उनके बात सुनकर मोदी जी बोले; "मित्रों, मेरा विश्वास गुझिया बनाने में है। वह रेसकोर्स रोड में बने या प्रगति मैदान में, मुझे उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। और मैं तो कहता हूँ मित्रों कि हमें केवल गुझिया के विकास की ही बात करनी चाहिए। हम कबतक पुराने तरीके से गुझिया बनाते रहेंगे? मित्रों, मेरे गुजरात ने पूरे देश को विकसित गुझिया बनाने का रास्ता दिखाया है। मेरे गुजरात ने इस क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति की है। मित्रों आपको यह जानकार आश्चर्य होगा कि जब यूरोपियन यूनियन के राजदूत ने हमारे अहमदाबाद की गुझिया का रंगरूप देखा तो वे आश्चर्य में पड़ गए। कहने लगे ....."
अभी वे इतना बोले थे कि कुमार केतकर कुछ कहने लगे। ऐसे में अरनब गोस्वामी ने मोदी जी को रोकते हुए कहा; "मोदी जी, मोदी जी, कुमार केतकर वांट्स टू रिबट यू। गो अहेड मिस्टर केतकर।"
कुमार केतकर बोले; "मोदी जी, आप तो ऐसा कह रहे हैं कि आपके आने के बाद ही गुजरात में अच्छी गुझिया बननी शुरू हुई। इतिहास गवाह है कि गुजराती श्रीकृष्ण के जमाने में, याने द्वारिका नगरी के समय से ही अच्छी गुझिया बनाते रहे हैं। और फिर जहाँ तक गुजरात के बाहर दिल्ली का सवाल है तो मैं अभी भी मानता हूँ कि श्रीमती गांधी सबसे बढ़िया गुझिया बनाती थी। मुझे तो इमरजेंसी के समय में भी उनकी बनाई गुझिया बहुत पसंद आई थी। मैं उन चाँद पत्रकारों में से हूँ जो आज भी यह मानते हैं कि उसके बाद उतनी बढ़िया गुझिया पूरे भारत में कहीं नहीं बनी।"
अभी वे यह कह हे रहे थे कि नितीश कुमार जो अपनी पार्टी को रिप्रजेंट कर रहे थे और स्पेशल बिहारी गुझिया बना रहे थे उन्होंने केतकर को टोंक दिया। बोले; "आ पता है कैसी गोझिया बने थी उन्होंने। आप जैसे लोगों की बजह से ही उनकी पूरी गोझिया तेल में डूबी रहती थी। मुझे भी पता है सबकुछ। मैंने भी उसी क्रांति से ही गोझिया बनाना शुरू किया। जैप्रकाश बाबू के साथ हमने गांधी मैदान पटना से ही गुझिया का मसाला सब इकठ्ठा किया आ दिल्ली आते-आते गोझिया तल डाली। ये बात औउर है कि कुछ और मित्र जो जैप्रकाश बाबू से गोझिया बनाना सीखे थे, अब भूल गए हैं और बहुत ज्यादा तेल वाली गोझिया बनाने लगे हैं।"
उनकी बात सुनकर लालू जी बोले; "जादा तेल बाला गोझिया जो है ऊ फ्रिकाप्रस्त गोझिया से तो नीक ही है। आ आप बीच में रास्ता भूलकर ऐसे लोगों के साथ रसोईया शेयर करने लगे जो गोझिया में भी केसर इस्तेमाल करता है। समाजवादी होकर भी आप केसरिया गोझिया खाने लगे। इसका बारे में काहे नै सोचते कभी? आ ई सोचे है कि पराचीन भारत से ही गोझिया में कभी केसर नहीं पड़ता था?"
उनकी बात सुनकर वहीँ खड़े सुशिल कुमार शिंदे बोल पड़े; "यह तो मैंने अखबारों में पढ़कर देश को बताया ही था कि बीजेपी और आरएसएस वाले केसरिया गुझिया बनाने का कैम्प चलाते हैं। और केसरिया गुझिया के कैम्प की बात दिग्विजय सिंह ने भी की थी।"
रविशंकर प्रसाद बोले; "मैं माननीय लालू जी से पूछना चाहता हूँ कि प्राचीन भारत के समय से ही गुझिया के मसाला में जो गरी काटकर डाली जाती थी वह रंगी नहीं जाती थी। यहीं देख लीजिये कि इन्होने जो मसाला यहाँ रखा है उसमें इस्तेमाल होने वाली गरी को इन्होने हरे रंग में रँग दिया है।"
........आगे का हाल अगले एपिसोड में।
Sunday, September 16, 2012
वंस अपॉन अ टाइम ऑन केबीसी...
बी बी पी यानि ब्लॉगर-ब्लॉगर पार्टनरशिप की एक और ब्लॉग पोस्ट. यह ब्लॉग-पोस्ट मैंने और विकास गोयल जी ने मिलकर लिखा है. पढ़कर देखिये.
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कौन बनेगा करोड़पति के सेट पर. अमिताभ बच्चन साहब अपनी दोनों हथेलियों का गठबंधन लिए हुए आते हैं और आते ही शुरू हो जाते हैं; "वेलकम वेलकम वेलकम...अ वेरी गुड एवेनिंग टू आल ऑफ यू...नमस्कार, आदाब, सत श्रीअकाल...देवियों और सज्जनों, मैं अमिताभ बच्चन आपसब का इस अद्भुत खेल में स्वागत करता हूँ जिसका नाम है कौन बनेगा करोड़पति...जैसा कि कल आपने देखा, मुंबई के बाबूराव गणपतराव आप्टे यहाँ से बारह लाख पच्चास हज़ार रूपये जीत कर गए.... और एकबार फिर से यह सिद्ध हुआ कि ज्ञान जो है, वही आपको आपका सही स्थान दिलाता है...और आज हमारे साथ दस नए कंटेसटेंट्स हैं. आइये उनका परिचय जान लेते हैं........तो फिर आइये शुरू करते हैं फास्टेस्ट फिंगर फर्स्ट..आपसब को पता है कि क्या करना है...और फास्टेस्ट फिंगर फर्स्ट के लिए आपका प्रश्न है;
इन भारतीय अभिनेताओं को उनकी अभिनय क्षमता के अनुसार नीचे से ऊपर के क्रम में लगायें..प्रश्न एक बार पुनः सुन लें...इन भारतीय अभिनेताओं को उनकी अभिनय क्षमता अर्थात ऐक्टिंग स्किल्स के अनुसार नीचे से ऊपर के क्रम में लगायें...और आपके ऑप्शंस हैं..
ए) डीनो मोरिया
बी) तुषार कपूर
सी) अर्जुन रामपाल और
डी) हरमन बावेजा.
ऑप्शंस एकबार फिर से देख लें...ए) डीनो मोरिया... बी) तुषार कपूर... सी) अर्जुन रामपाल और डी) हरमन बावेजा...
कंटेस्टेंट्स ने जवाब दिए और कम्यूटर की स्क्रीन देखते हुए अचानक बच्चन साहब ठीक वैसे ही चिल्लाने लगे जैसे फिल्म हम में सुदेश भोंसले की आवाज़ में चिल्लाते हुए उन्होंने जुम्मा जी को पुकारा था; "और सबसे पहले सही जवाब दिया है मुंबई के इक्कीस वर्षीय विकास गोयल ने... बहुत खूब! विकास जी, आपने केवल ढाई सेकंड्स में ही फास्टेस्ट फिंगर फर्स्ट पूरा किया...ओह! आह! वैसे इतने कठिन प्रश्न का आपने न केवल सही उत्तर दिया बल्कि बहुत ही कम समय में दिया... इस बात पर मैं यह अवश्य कहूँगा कि बहुत तेज़ दिमाग है आपका. क्या आप डाबर च्यवनप्राश का सेवन करते हैं?"
विकास; "नहीं सर, च्यवनप्राश नहीं, हाँ मैं हाजमोला खाता हूँ. वैसे तो सर क्वेश्चन रियली बहुत टफ था ...इन एक्टर्स में कौन ऊपर और कौन नीचे, यह बताना आम इंसान के बस की बात नहीं....फिर भी यह दिमाग की बात नहीं है सर, यह तो अँगुलियों को चलाने की बात...और सर, अगर आप चौबीस घंटों में से सोलह घंटे स्मार्टफोन पर फेसबुक और ट्विटर करेंगे तो आप भी ढाई सेकंड्स में यह कर लेंगे..."
अमिताभ बच्चन; "हा हा हा ...परन्तु आपने कोशिश की..जो हिम्मत दिखाई, उसके लिए आप बधाई के पात्र हैं. ...बिना कोशिश के यह कर पाना असंभव होता. इस बात पर मुझे बाबूजी की कविता याद आती है कि; लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती...."
विकास; "..कोशिश करने वालों की हार नहीं होती..सर, पिछले एपिसोड में आप यह कविता सुना चुके हैं."
अमिताभ बच्चन; "हा हा हा..तो चलिए फिर हम और आप मिलकर खेलते हैं कौन बनेगा करोड़पति. तो देवियों और सज्जनों आपने देखा कि किस तरह से मुंबई से आये विकास गोयल जी ने......."
हॉट सीट पर बैठने के बाद...
अमिताभ बच्चन; "तो विकास जी, आप हमें और हमारे दर्शकों को अपने बारे में कुछ बताइये.."
विकास; "सर, मैं मस्स्त.. आई लाइक रीडिंग...पढ़ना मुझे बहुत पसंद है."
अमिताभ बच्चन; "ओ..आपको पढ़ना पसंद हैं..बहुत खूब! वैसे क्या पढ़ना पसंद करते हैं आप? मेरा तात्पर्य है कि किस तरह की किताबें..?"
विकास; "सर, मैं बॉम्बे टाइम्स पढ़ता हूँ. बहुत पढ़ता हूँ. इसके अलावा मुझे पोलिटिक्स, क्रिकेट, सिनेमा..बहुत रूचि है मेरी..और आय ऐम अ बिग फूडी..आय लव ट्रैवेलिंग.."
अमिताभ बच्चन; "ओह, यह सब चीज़ें भी आपको बहुत पसंद हैं! बहुत खूब! वैसे आपकी पसंद ट्विटर सेलेब्रिटी जैसी है... तो क्या आप भी ट्विटर पर..."
विकास; "सर, बिलकुल सही पहचाना आपने. मैं ट्वीटर ही हूँ. और सर, आप भी तो ट्विटर पर..."
अमिताभ बच्चन; "हाँ, मैं भी ट्विटर पर हूँ..और अब तो मैं फेसबुक पर भी...वैसे आपने कभी ट्विटर पर मुझे फालो नहीं किया."
विकास; "सर, आप भी तो कहाँ मुझे फालो करते हैं?"
अमिताभ बच्चन; "हा हा हा..और अपने जीवन के बारे में कुछ बताइए."
विकास; "बताना क्या है सर, मैं बिलकुल मस्त...
अमिताभ बच्चन; "मेरे कहने का तात्पर्य यह था कि अपने आरंभिक जीवन के बारे में कुछ बताइए..मेरा मतलब बचपन में जब घर वालों को पैसे की तंगी...जैसे जब आप स्कूल में अपने पैसेवाले मित्रों को खर्च करते हुए देखते थे और आपके पास पैसे नहीं होते थे तो आपको कैसा लगता था?"
विकास; "पैसे की कमी कभी रही ही नहीं..अपने स्कूल में मैं ही सबसे पैसेवाला था सर. ..हमेशा मैं ही खर्च करता था. ...मॉम-डैड भी बिलकुल कूल हैं. "
यह सुनकर अमिताभ बच्चन के साथ-साथ ऑडिएंस का चेहरा भी उतर जाता है. वे यह सुनकर दुखी हो जाते हैं कि हॉटसीट पर एक ऐसा कंटेस्टेंट बैठा हैं जिसके पास बहुत पैसा है. जिसे पैसे की कमी की वजह से पिज्जा न खा पाने का दुःख कभी नहीं रहा और न ही मनचाही पढ़ाई न कर पाने का.
अमिताभ बच्चन; "तो फिर चलिए हम और आप मिलकर खेलते हैं कौन बनेगा करोड़पति. खेल के नियम तो आपको पता ही होंगे....."
विकास; "सर, पिछले १२ सालों से देख रहा हूँ...मैं ही क्यों पूरे इंडिया को गेम के रूल्स मालूम हैं. आप तो बस सवाल कीजिये."
अमिताभ बच्चन; "हा हा हा..तो फिर यह रहा पाँच हज़ार रुपयों के लिए आपका पहला प्रश्न; इन फिल्मों में से कौन सी फिल्म अभिषेक बच्चन की एक प्रसिद्द फिल्म है? प्रश्न एक बार फिर से सुन लें...इनमें से कौन सी मूवी अभिषेक बच्चन की एक प्रसिद्द मूवी है? और आप के ऑप्शंस हैं;
ए) बोल खान
बी) बोल कपूर
सी) बोल बच्चन और
डी) बोल देवगन.
विकास को लगा जैसे बच्चन साहब ऑप्शंस में "सी बोल बच्चन" कहकर मूवी देखने का इशारा कर रहे हैं. फिर उसके मन में आया कि चार की जगह अगर पाँच ऑप्शंस होते तो बोल कुमार को भी अकॉमोडेट किया जा सकता था.. सोचते-सोचते अचानक बोल पड़ा; "सर, मैं लाइफ-लाइन यूज करना चाहूँगा.."
अमिताभ बच्चन; "ओह! पहले ही प्रश्न में लाइफ-लाइन का प्रयोग ...वैसे आप चाहें तो प्रश्न को फिर से देख सकते हैं, हमें कोई जल्दी नहीं है. बहुत प्रसिद्द यह जो है फिल्म अभिषेक की...आपको एक हिंट दे दूँ कि इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर सौ करोड़ रूपये कमाये हैं..."
विकास; "सर, मैं सिर्फ अच्छे एक्टर्स की मूवी देखता हूँ.."
अमिताभ बच्चन; "तो फिर आप लाइफ लाइन इस्तेमाल करना चाहते हैं...जनता जनार्दन, विकास जी को आपके मदद की आवश्यकता है...आप उनकी मदद कीजिये...वे अपनी लाइफ-लाइन का इस्तेमाल करना चाहते हैं. अपने-अपने वोटिंग मीटर्स तैयार रखिर..और आपका समय शुरू होता है अब.."
कहते हुए बच्चन साहब ने अपने दाहिने हाथ की तर्जनी को हवा के ऊपर पटक दिया.
वोटिंग समाप्त ..रिजल्ट आते ही अमिताभ बच्चन; "ओह, जनता ने तो आपका काम काफी आसान कर दिया..हालाँकि करीब उनत्तीस प्रतिशत लोगों का मानना है कि सही जवाब है डी) "बोल देवगन" परन्तु वहीँ पर पैंसठ प्रतिशत लोगों का का मानना है कि सही जवाब है सी) "बोल बच्चन" ..और अपने पुराने अनुभवों से मैं कह सकता हूँ कि बहुत कम मौके ऐसे आते हैं जब जनता इतनी भारी मात्रा में एक-दूसरे के साथ सहमत होती है. तो आप जनता के साथ जाना चाहेंगे? लॉक कर दूँ सी) बोल बच्चन? "
विकास; "नहीं सर."
सुनकर स्टूडियो ऑडिएंस में खुसर-पुसर शुरू हो जाती है. कई लोग़ जिन्होंने सी) बोल बच्चन को वोट दिया था, उन्हें भी अपने ज्ञान पर शंका होने लगी. शायद प्रोडक्शन वालों में से किसी ने इशारा किया होगा कि ऑडिएंस चुप हो गई. अमिताभ बच्चन जी बोले; "ओह, विकास जी, आश्चर्य की बात है कि पैसठ प्रतिशत जनता सी) कह रही है फिर भी आप जनता के साथ नहीं जाना चाहते."
विकास; "सर, अगर जनता को सही गलत का पता होता तो ऐसी फिल्में सौ करोड़ कमा पाती क्या? और सर, सच कहूँ तो जनता को अगर सही-गलत का पता होता तो देश का जो हाल है, वह भी नहीं होता."
अमिताभ बच्चन; "तो फिर आप क्या करना चाहेंगे?"
विकास; "सर, मैं एक्सपर्ट एडवाइज यूज करना चाहूँगा."
अमिताभ बच्चन; "बहुत खूब! कम्प्यूटर जी, विकास जी एक्सपर्ट एडवाइज यूज करना चाहते हैं...आज की हमारी एक्सपर्ट हैं विख्यात अभनेत्री कटरीना कैफ जी. कम्प्यूटर जी, कटरीना जी से हमारा संपर्क स्थापित करवाइए."
अभी संपर्क स्थापित हो ही रहा था कि विकास बोल पड़ा; "सर, मैं कटरीना के साथ जाना चाहता हूँ."
अमिताभ बच्चन; "परन्तु अभी तक तो कटरीना जी ने जवाब भी नहीं दिया."
विकास; "सर मैं जवाब के साथ जाने की बात नहीं कर रहा हूँ, मैं कटरीना के साथ घर जाने की बात कर रहा हूँ."
अमिताभ बच्चन; "हा हा हा...कम्यूटर जी, कटरीना कैफ जी से संपर्क स्थापित करवाया जाय."
बहुत कोशिश के बाद भी संपर्क स्थापित नहीं हो सका. अमिताभ बच्चन जी ने कहा; "भाई साहब, लगता है कटरीना जी ने आपकी उनके साथ घर जाने की बात सुन ली और उन्होंने लाइन डिस्कनेक्ट कर दिया है. तो अब आपके पास सिर्फ दो ऑप्शंस बचे हैं. एक है फोन अ फ्रेंड और दूसरा है डबल डिप. आप कौन सा ऑप्शन इस्तेमाल करना चाहेंगे?"
विकास ; "सर, मैं फोन अ फ्रेंड करना चाहूँगा."
अमिताभ बच्चन; "कम्यूटर जी, विकास गोयल जी द्वारा फोन अ फ्रेंड ऑप्शन के लिए दी गई इनके मित्रों की सूची दिखाई जाय."
कम्यूटर जी स्क्रीन पर चार लोगों की सूची दिखाते हैं.
अमिताभ बच्चन; "इन चार में से आप किसे फोन कर करना चाहेंगे?"
विकास; "सर, शिव कुमार मिश्रा को."
अमिताभ बच्चन; "मित्र हैं आपके? आपके साथ कॉलेज में पढ़ते थे? क्या करते हैं शिव कुमार जी?"
विकास ; "नहीं सर, कॉलेज वॉलेज में नहीं थे, ट्विटर से फ्रैंडशिप हुई इसके साथ. और करेगा क्या? दिन भर ट्वीट करता रहता है.... ये लिस्ट में आपने जो चार फ्रेंड्स देखे हैं, इन सभी से सोशल मीडिया पर ही फ्रैंडशिप हुई. रीयल लाइफ के फ्रेंड मेरे हैं ही नहीं. जो हैं, सारे नेट फ्रेंड्स हैं."
अमिताभ बच्चन; "ओह, तो आपके सारे मित्र जो हैं, वह सोशल मीडिया की वजह से बने...यह बहुत अच्छी बात है कि तकनीकि ने पूरी दुनियाँ के लोगों को एक-दूसरे के साथ मिला दिया है. मित्रता करवा दिया है. तो कम्प्यूटर जी, शिव कुमार मिश्रा को कोलकाता में फोन लगाया जाय. "
कम्प्यूटर जी ने शिव कुमार मिश्रा को फ़ोन लगा दिया. जैसे ही उन्होंने फ़ोन उठाया अमिताभ बच्चन जी बोले; "हेलो, शिव कुमार जी..?"
उधर से आवाज़ आई; "जी, बोल रहा हूँ."
अमिताभ बच्चन; "शिवकुमार जी, नमस्कार, मैं अमिताभ बच्चन बोल रहा हूँ कौन बनेगा करोड़पति से."
उधर से आवाज़ आई; "हाँ बोलिए."
अमिताभ बच्चन; "शिव कुमार जी, मैं अमिताभ बच्चन बोल रहा हूँ कौन बनेगा करोड़पति से."
उधर से आवाज़ आई; "मैं आपको पहचान गया हूँ सर. आप आगे भी कुछ बोलना पसंद करेंगे?"
अमिताभ बच्चन; "हा हा हा..इस समय आपके मुंबईवासी मित्र विकास गोयल जी हमारे सामने हॉटसीट पर बैठे हैं."
उधर; "अच्छा! कुछ जीत भी लिया है क्या उसने?"
अमिताभ बच्चन; "नहीं, अभी यह उनका पहला ही प्रश्न है और उसका सही जवाब देने के लिए उन्हें आपके मदद की जरूरत है. अगली आवाज़ जो आप सुनेंगे, वह आपके मित्र विकास जी की आवाज़ होगी. आपको इसके लिए तीस सेकंड्स मिलेंगे. और आपका समय शुरू होता है अब."
कहकर अमिताभ बच्चन जी ने एकबार फिर अपने दाहिने हाथ की तर्जनी को हवा पर दे मारा. हवा को फिर से चोट लग गई.
विकास; "अबे, आखिर मिल ही गया न तू. सवाल जवाब ऑप्शंस गए भाड़ में पहले तू ये बता कि मेरे पचीस हज़ार रूपये और आई-फोन का चार्जर कब देगा बे? तीन महीने से जब भी तुझे फोन करता हूँ, तू मुंबई का नंबर देखकर उसको काट देता है. आज पहले तू बता कि मेरा पैसा वापस कब करेगा?......"
अमिताभ बच्चन; "ओह, विकास जी, आपका समय समाप्त हो गया. आपके हाथ से यह मौका जाता रहा. वैसे ये बताइए कि कितने महीने हो गए इन्हें आपसे उधार लिए हुए?"
विकास ; "अरे सर, पूछिए मत. चार महीने हो गए हैं. कितनी बार फोन किया, फोन ही नहीं उठाता. मेल किया, उसका भी जवाब नहीं दिया. डी एम तक का जवाब नहीं देता है. ऊपर से पिछले तीन महीने में तीन बार मुंबई आकर वापस जा चुका है. वापस गया और फेसबुक पर मुंबई की पिक्स लगाई तब मुझे पता चला...."
अमिताभ बच्चन; "परन्तु आपके हाथ से प्रश्न के सही जवाब देने का एक और मौका चला गया."
विकास ; "अरे सर, आपका क्वेश्चन तो पाँच हज़ार का था. मेरा तो यहाँ इस बन्दे ने पचीस हज़ार लिया हुआ है."
अमिताभ बच्चन; "तो फिर अब क्या करना चाहेंगे आप? आपके पास सिर्फ एक लाइफ-लाइन है और वह है डबल डिप. इसके बारे में मैं आपको बता दूँ. आप कोई भी ऑप्शन चुन सकते हैं. अगर वह गलत हुआ तो फिर आपको एक और मौका दिया जाएगा कि आप दूसरा ऑप्शन चुन सकते हैं."
विकास; "सर, कितना अच्छा होता कि भारत में इलेक्शंस भी ऐसे ही होते. हम एक सरकार चुनते और अगर वह हमारी उम्मीद पर खरी न उतरती तो हम बटन दबाकर दूसरी पार्टी को चुन लेते और अपनी गलती सुधार लेते."
अमिताभ बच्चन; "हा हा हा ..कौन बनेगा करोड़पति के इस ऑप्शन से देश की दिशा और दशा सुधर सकती है. चूँकि पूरा भारत उनकी बात सुनता है इसलिए मैं आमिर खान जी से अनुरोध करूँगा कि वे देश के लिए हमारी इस सौगात को भारत के चुनाव आयोग के पास.....वैसे विकास जी, अब आप क्या करना चाहेंगे?"
विकास; "सर, अब मैं क्विट करना चाहता हूँ. मुझे देर हो रही है. आज मेरा एम टीवी रोडीज का ऑडिशन है."
इतना कहकर विकास उठा खड़ा हुआ. जैसे ही वह बाहर गया अमिताभ बच्चन जी फिर शुरू हो गए; "ओह्ह, तो अभी अभी आपने देखा देवियों और सज्जनों कि एकमात्र ज्ञान ही ......"
Friday, May 11, 2012
द्वापर युग का एक टीवी पैनल डिस्कशन
दो-तीन दिन पहले महाभारत से युधिष्ठिर के राजसूय-यज्ञ का प्रसंग पढ़ रहा था. राजसूय-यज्ञ के समय हुए शिशुपाल वध की बात भी पढ़ी. श्रीकृष्ण पूजन पर शिशुपाल के ऑब्जेक्शन से इन्द्रप्रस्थ की सभा में धर्म की व्याख्या वगैरह पढ़ी गई. तर्कों के तीर चले. उन तीरों को काटने के लिए नए तर्क गढ़े गए. फिर उधर से तर्क-तीर चले. फिर इधर से उनको काटा गया. तर्क वगैरह काटने के बाद काटने के लिए एक ही चीज बची थी. शिशुपाल की गर्दन. ऐसे में श्रीकृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र को भेजकर शिशुपाल जी की गर्दन काटकर उनको यमपुरी भेज दिया. देवताओं ने उप्पर से पुष्पवर्षा की. धर्मराज युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ की समाप्ति हुई.
मन में आया कि वहाँ जो कुछ हुआ क्यों उसको बड़ी सहजता से स्वीकार कर लिया गया? वैसे देखा जाय तो और कर भी क्या सकते थे लोग़? उन दिनों टीवी चैनल भी तो नहीं थे कि पैनल डिस्कशन होते. रपट निकलती. विशेषज्ञ बैठते और बाल की खाल निकालते. ऐसा करने से शिशुपाल जी का मामला आराम से दस-बारह सालों तक चलता. इन्वेस्टिगेशन होता. एस आई टी जांच करती. उसकी रपट लीक होती. मानवाधिकार कार्यकर्त्ता नारे लगाते. मानवाधिकार नेता टीवी पर दलीलें देते. दूसरों की बात न सुनते. कैंडिल मार्च होता. शिशुपाल के लिए न्याय की मांग होती.
कुल मिलाकर बड़ी बमचक मचती.
शायद कुछ ऐसे;
न्यूज-आवर पर अरनब गोस्वामी जी आ चुके हैं. आते ही शुरू हो गए; "गुड़ इवेनिंग. इन अ बिजार टर्न ऑफ इवेंट, परसों करीब १० बजे सुबह श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर के इन्द्रप्रस्थ की एक भरी सभा में महाराज शिशुपाल का क़त्ल कर दिया. उस शिशुपाल का जो राजा तो थे ही, श्रीकृष्ण के फूफा भी थे. सभा में शिशुपाल के जो दोस्त थे उन्होंने इसका विरोध किया लेकिन उनकी आवाज़ को दबा दिया गया. सवाल यह है कि इस देश में अब रूल ऑफ धर्मा है कि नहीं? तमाम तरह के अलग-अलग दावे किये जा रहे हैं. एक तरफ चेदिप्रदेश के मानवाधिकार कार्यकर्त्ता चाहते हैं कि इस मामले की पूरी छानबीन हो. वहीँ उनकी बात नहीं सुनी जा रही है. ऐसे में द नेशन वांट्स टू नो द ट्रुथ. सच क्या है यह देश जानना चाहता है. और इसके लिए वी हैव अ फुल पैनल टूनाईट ऑन न्यूज-आवर. हमारे साथ हैं हस्तिनापुर से कृपाचार्य टू इन्टरप्रेट धर्मा. हस्तिनापुर से ही हमारे साथ हैं महामंत्री विदुर. वी आल्सो वांटेड श्रीकृष्ण टू कम एंड ..लेकिन वे नहीं आये. इसलिए हमारे साथ हैं बलराम. उधर चेदिप्रदेश से हमारे साथ हैं नरोत्तम कलसखा जो ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट हैं और जो चाहते हैं कि शिशुपाल के मर्डर की जांच एस आई टी करे. इन्द्रप्रस्थ से हमारे साथ है सहदेव. और हमारे स्टूडियो में मेरे साथ है बरिष्ठ पत्रकार आशुतोष. विदुर जी, मैं आपसे शुरू करना चाहता हूँ. क्या हुआ यह? भरी सभा में किसी को क़त्ल कर देना कहाँ तक जायज़ है?"
विदुर; "देखें ऐंकर श्री, पहले तो मैं आपको बता दूँ कि शिशुपाल श्रीकृष्ण के फूफा नहीं बल्कि उनके फूफेरे भाई थे. अब आप के सवाल पर आता हूँ. देखें, जिसे आप क़त्ल कह रहे हैं दरअसल वह क़त्ल नहीं है. उसे वध कहते हैं. धर्मनीति के अनुसार क़त्ल और वध में अंतर होता है."
अरनब; "लेकिन विदुर जी, एंड रिजल्ट तो दोनों का एक ही है न. आप उसको कोई भी वर्ड दे दें लेकिन दोनों का रिजल्ट यह है कि एक आदमी मारा जाता है."
विदुर; "ऐंकर श्री, पहले आप मेरी बात पूरी तो होने दें. देखें, किसी के अपराध की सज़ा के रूप में अगर किसी को मारा जाता है तो उसे वध....
नरोत्तम कालसखा; "आप ये बताएं..आप ये बताएं.."
अरनब; "ओके ओके. नरोत्तम जी वांट्स टू री-बट यू विदुर जी. मैं नरोत्तम जी के पास जाता हूँ. नरोत्तम जी, यह बताएं कि विदुर जो कह रहे हैं आप उससे सहमत हैं?"
नरोत्तम कालसखा; "बिलकुल नहीं. ये सो-काल्ड धर्म के जानकर केवल शब्दों से खेलते हैं. ये आज विदुर जी हस्तिनापुर में बैठकर धर्म सिखा रहे हैं लेकिन मैं आपको बता दूँ कि ये इनकी शब्दों की जादूगरी के अलावा और कुछ नहीं है. मैं पूछता हूँ कि केवल अपमान करने से किसी कि हत्या कर देना कौन सा धर्म है?"
अरनब; "विदुर जी, जवाब दें. नरोत्तम जी का कहना है कि केवल अपमान के बदले किसी का मर्डर कर देना कौन सा धर्म है?"
विदुर; "देखें, आप मुझे अपनी बात पूरी करने देंगे तब तो मैं कुछ कहूँगा. देखें, यह अपमान के एवज में हत्या का मामला नहीं है. असल मामला अधर्मी को दण्डित करने का है. बात केवल यह नहीं है कि शिशुपाल ने श्रीकृष्ण का अपमान किया. बात यह भी है कि शिशुपाल अपने इलाके में राजाओं से युद्ध, प्रजा को अशांति और ऋषि-मुनियों को वर्षों से सताता रहा है. यह केवल श्रीकृष्ण के अपमान का मामला नहीं है. यह धर्म और अधर्म का युद्ध...
नरोत्तम कालसखा; "विदुर जी, आज आपको धर्म याद आ रहा है. धर्म तो यह भी कहता है कि स्त्री की हत्या नहीं करनी चाहिए. अगर ऐसा ही है तब श्रीकृष्ण ने पूतना की हत्या क्यों की? उस समय धर्म का विचार उनके मन में क्यों नहीं आया? उनके मन में क्यों नहीं आया कि स्त्री की हत्या धर्म के विरुद्ध है?"
विदुर ; "देखें, पूतना एक राक्षसी थी. और वासुदेव कृष्ण ने उसकी हत्या नहीं बल्कि उसका भी वध ही किया था. वह श्रीकृष्ण को मारने के लिए गई थी. धर्म यह कहता है कि कोई भी अपने जीवन को बचाने के लिए किसी का भी वध कर सकता है."
नरोत्तम कालसखा; "मैं माननीय विदुर जी से पूछना चाहता हूँ कि हो सकता है पूतना हत्या करने के इरादे से गई होगी लेकिन उसने हत्या तो नहीं की न श्रीकृष्ण की. ऐसे में उसकी हत्या कर देना तो अक्षम्य हुआ."
विदुर; "तो कालसखा जी, आप क्या चाहते हैं कि पूतना पहले श्रीकृष्ण को मार देती क्या तभी उसका वध किया जा सकता था?"
नरोत्तम कालसखा; "मैं कहता हूँ कि क्या सबूत है कि पूतना श्रीकृष्ण की हत्या के इरादे से ही गई थी? श्रीकृष्ण ने कह दिया और आप मान गए? और फिर एक बात बताएं, क्या आप नहीं मानते कि हत्याऑं के मामले में श्रीकृष्ण का रिकार्ड ही खराब है. पूतना को तो जाने दें, श्रीकृष्ण ने उसे भी मार डाला जो उनका खुद का मामा था. महाराज कंस. आज शिशुपाल जी की हत्या कर दी जो खुद उनका फूफेरा भाई था. बचपन में ही इन्ही श्रीकृष्ण ने बकासुर की हत्या कर दी थी. वृषभासुर को मार डाला. मैं पूछता हूँ बचपन से ही केवल हत्याएं करना कौन से धर्म का है?"
विदुर; "नरोत्तम जी, पहले आप की जानकारी के लिए बता दूँ कि राक्षसों और अपराधियों को मारना...."
अरनब; "ओके ओके..मैं आशुतोष की तरफ आता हूँ. टेल मी आशुतोष, ये जो भरी सभा में हत्या हुई है, इसके बाद आप इस मामले को कहाँ जाता हुआ देखते हैं?"
आशुतोष; "अर्नब, यह मामला उतना सीधा नहीं है जितना दिखाई देता है. जहाँ तक मेरी जानकारी है, श्रीकृष्ण का इस तरह से रिएक्ट करना शायद ठीक नहीं था. और मैं एक बात और बता दूँ अर्नब. पहले यह बात सुनाई दी कि इन्द्रप्रस्थ की सभा में ही शिशुपाल ने श्रीकृष्ण का सौवीं बार अपमान किया लेकिन मेरी जानकारी के मुताबिक यह शिशुपाल द्वारा श्रीकृष्ण का सौवां अपमान नहीं था. मैंने इस केस को बहुत नजदीक से फालो किया है और मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि इस केस में ऐसे-ऐसे तथ्य सामने आ सकते हैं जो उन सभी बातों से भिन्न होंगे जो बातें अभी तक पब्लिक डोमेन में हैं."
अरनब; "जैसे? क्या खुलासा हो सकता है इस केस में?"
आशुतोष ; "जो मैंने खोजबीन की उससे तो बड़ी हैरत में डाल देने वाली बातें आई हैं सामने. जैसे मैंने अपमानों का रिकार्ड रखने वाले श्रीकृष्ण के कर्मचारी से भी बात की. उसका मानना है कि अपमानों का रिकार्ड रखने में गलती भी हो सकती है. ऐसा भी हो सकता है कि कोई अपमान दो बार रिकार्ड हो गए हों. या ऐसा भी हो सकता है कि कोई २-३ अपमान दो बार रिकार्ड हो गए हों. वैसे अर्नब, मैंने उडती खबर यह भी सुनी है कि अपमानो के रजिस्टर में कुछ उलट-फेर भी हुआ है. अब पता नहीं यह बात कितनी सच है लेकिन सवाल तो अपनी जगह है. और अर्नब, मैंने इस केस को जिस तरह से फालो किया है.."
विदुर; "ये तो अभी परसों की घटना है पत्रकार श्री. दो दिन में कितना फालो कर लिया आपने?
अरनब; "ओके ओके..लेट मी गो टू बलराम..बलराम जी, यह बताइए कि क्या यह सच है कि अपमानों के रजिस्टर में हेर-फेर हुई है. ऐसी बात सुनाई दे रही है कि ऐसा हुआ है. आप क्या कहना चाहते हैं?"
बलराम; "देखिये, ऐसी बात बिलकुल नहीं है. अपमानों का रजिस्टर कभी भी कोई भी आकर देख सकता है. हम कुछ छिपा नहीं रहे. रही बात..."
नरोत्तम कालसखा; "लेकिन...लेकिन..."
अरनब; "ओके, नरोत्तम जी वांट्स टू री-बट यू. गो अहेड नरोत्तम जी."
नरोत्तम कालसखा; "बलराम जी, ये बताइए कि क्या सबूत है कि श्रीकृष्ण ने अपनी बुआ को शिशुपाल जी महराज के केवल सौ अपमानों को क्षमा करने का वचन दिया था? हो सकता है उन्होंने सवा सौ अपमानों को क्षमा करने का वचन दिया हो. या हो सकता है कि एक सौ चालीस अपमानों को क्षमा करने का वचन दिया हो. कोई सबूत है किसी के पास कि उन्होंने सौ अपमानों की ही बात की थी?"
बलराम; "नरोत्तम जी, जब श्रीकृष्ण ने बुआ को वचन दिया था मैं वहीँ पर था. और मैं आपको सच बताता हूँ कि उसने सौवें अपमान के बाद ही मारने का वचन दिया था. अगर आपको मेरी बात का विश्वास न हो तो बुआ से पूछ सकते हैं."
नरोत्तम कालसखा; "देखिये बलराम जी मुझे आपकी बात का विश्वास क्यों हो? आप तो श्रीकृष्ण के भाई हैं. और रही बात बुआ से पूछने की तो क्या गारंटी है कि आप, श्रीकृष्ण और धर्मराज युधिष्ठिर बुआ जी पर दबाव डाल के उनसे नहीं कहलवा देंगे कि श्रीकृष्ण ने केवल सौ अपमानों को क्षमा करने की बात कही थी?"
बलराम; "अब देखिये वैसे तो आपको हमारी किसी बात का विश्वास नहीं होगा लेकिन मेरा कहना यही है कि तथ्यों को जाने बिना...."
अरनब; "ओके लेट मी गोबैक तो आशुतोष. आशुतोष ये बताइए कि अब क्या देखते हैं इस केस में? अब जबकि मीडिया ने इस केस को अपने हाथ में ले लिया है?"
आशुतोष; "अर्नब, ये नरोत्तम जी का प्वाइंट महत्वपूर्ण है. मेरी बात एक सैनिक से हुई जिसने ये बताया कि जब श्रीकृष्ण ने अपनी बुआ को महाराज शिशुपाल के अपमानों को क्षमा कर देने की बात कही थी तो वह वहीँ पर था. और आपको हैरत होगी कि उसने बताया कि श्रीकृष्ण ने एक सौ पचहत्तर अपमानों को क्षमा करने का वचन दिया था. अब इसमें कितना सही है और कितना गलत यह कह पाना मेरे लिए मुश्किल है लेकिन उस सैनिक ने मुझे यही बताया. और एक बात अर्नब. अब जिस तरह से सबूत एक-एक करके सामने आने लगे हैं उससे तो यही लगता है कि यह मामला बड़ा पेंचीदा होता जा रहा है. कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि यह क्लीयर नहीं है कि श्रीकृष्ण ने एक सौ अपमान होते ही महाराज शिशुपाल को मारना की बात कही थी या फिर एक सौ अपमान होने तक क्षमा कर देते और एक सौ एकवा अपमान होने के बाद मारते. यह बात कम महत्वपूर्ण नहीं है. और मेरा ऐसा मानना है..."
अरनब; "ओके ज्वाइनिंग मी नाऊ...अब हमें ज्वाइन कर रहे हैं हस्तिनापुर से आचार्य शकुनी. शकुनी जी, हमें ये बताएं...."
विदुर ; "ऐंकर श्री, महाराज शकुनी आचार्य नहीं हैं. आपको कम से कम इतनी जानकारी तो रहनी ही चाहिए. शकुनी गांधार नरेश हैं और पिछले कई वर्षों से अपनी बहन के घर बैठकर मुफ्त की रोटियां तोड़ रहे हैं."
अरनब; "सॉरी सॉरी..विदुर जी. चलिए गंधार नरेश शकुनी ही सही. शकुनी जी, हमें ये बताएं कि ये इन्द्रप्रस्थ में जो महाराज शिशुपाल की हत्या का मामला हुआ है, इसके बारे में आप क्या सोचते हैं?"
शकुनी; "यह तो बहुत ही क्रूर हत्या का मामला है भांजे अरनब. क्षमा करो, मैंने तुम्हें भी भांजा कह डाला. एक सौ भांजो से दिन-रात मामा-मामा सुनते-सुनते आदत ख़राब हो गई है. हाल यह है कि एक दिन मेरे मुँह से जीजाश्री के लिए भी भांजे धृतराष्ट्र निकल आया था... हाँ तो मैं यह कह रहा था कि यह तो वासुदेव कृष्ण द्वारा क्रूर हत्या का मामला है. ऐसे में मैंने और भांजे दुर्योधन ने यह निर्णय लिया है कि कुछ ही दिनों में काशीनरेश के दरबार में होने वाले राजाओं के सम्मलेन में हमलोग इस मामले को उठाएंगे और चाहेंगे कि श्रीकृष्ण को उनके इस अपराध के लिए घोर दंड मिले. मैंने तय किया है कि हम इस मामले को मीडिया में उछालते रहेंगे जिससे शिशुपाल की आत्मा को न्याय मिले."
अरनब; "ओके, लास्ट एक मिनट रह गया है मेरा पास. नरोत्तम जी, यह बताएं कि अब आपका क्या प्लान होगा? आप और आपके जैसे हजारों मानवाधिकार कार्यकर्त्ता क्या चाहते हैं?"
नरोत्तम कालसखा; "अरनब, हमारा स्टैंड बिलकुल क्लीयर है. हम यह चाहते हैं कि एक इंडिपेंडेंट एस आई टी से इस मामले की जांच कराई जाय और श्रीकृष्ण को तुरंत सज़ा दी जाय. जबतक यह नहीं होता, हम आन्दोलन करते रहेंगे और हम यह निश्चित करेंगे कि महाराज शिशुपाल की आत्मा को न्याय मिले."
अरनब; "जेंटिलमेन, अब हमारे पास वक़्त नहीं है. लेकिन वी प्रोमिस यू दैट वी विल मेक इट स्योर दैट जस्टिस इज डन इन दिस केस. योर चैनल विल फाईट फॉर जस्टिस. हस्तिनापुर में कृपाचार्य और इन्द्रप्रस्थ में सहदेव जी, आपको भी थैंक्स. समय की कमी के कारण हम आपको समय न दे सके बट आई प्रोमिस यू कि अगली बार हम आप दोनों को भी समय देंगे. गुडबाय एंड गुड़नाइट."
Thursday, September 22, 2011
ऐ मेरे दाता.....
गाने के रियलिटी-शो में दस साल के बच्चे ने हारमोनियम बजाते हुए एक ग़ज़ल इस तरह से गाई जैसे बड़े-बड़े उस्ताद गाते हैं. उसने मेंहदी हसन स्टाइल में ग़ज़ल के शेरों को सुर और मुर्कियों के बल पर पहले तो कंट्रोल में लिया फिर उन्हें पटका. उसके बाद उनका कॉलर पकड़ कर उनके ऊपर चढ़ बैठा. काफी देर तक वह उन्हें तरह-तरह से रगेदता रहा. कुछ मिनटों तक ग़ज़ल पर आवाज़ की ठनक, सरगम की सनक और राग का प्रहार होता रहा. जैसे-जैसे उसपर बच्चे का आक्रमण बढ़ता जा रहा था, ग़ज़ल के शेर कमज़ोर पड़ते जा रहे थे. दर्शक ताली बाजा रहे थे और जज-गुरु लोग़ बच्चे की आवाज़ के अनुसार अपना हाथ ऐसे ऊपर-नीचे कर रहे थे जैसे कोई बच्चा हवा में हाथों की गाड़ी बनाकर उसे उड़ाता है.
एक समय ऐसा आया जब लगा कि बेचारे शेर अब पूरी तरह से पस्त हो चुके हैं. उनमें अब कोई जान नहीं रही कि गायक बच्चा उन्हें और रगेदे. समय सीमा, समय का अभाव या फिर शायद ग़ज़ल के माफीनामे की वजह से बच्चे ने प्लेटफॉर्म पर धीरे-धीरे रुकने वाली रेलगाड़ी स्टाइल में अपना गाना रोका. स्टैंडिंग ओवेशन की बहार आ गई. ऐंकर ने बच्चे को दोनों हाथों से उठा लिया. महागुरु आश्चर्यचकित होने की अपनी चिर-परिचित मुख मुद्रा लुटाने लगीं. कुल मिलाकर विकट रियलटीय टेलीविजन के दर्शन होने लगे.
कुछ देर तक बच्चे को अपनी गोद में रखने के बाद ऐंकर ने उसे नीचे उतारा और अपने ऐन्करीय धर्म का पालन करते हुए शुरू हो गया; "गुरु कैलाश? क्या कहना चाहेंगे आज आप?"
गुरु कैलाश चूल्हे पर रखे पानी के पहले उबाल की तरह शुरू होना ही चाहते थे लेकिन शब्दों की शॉर्ट-सप्लाई के कारण अदबदा गए. कुछ क्षणों तक अ ब स करने के बाद और काफी मशक्कत और खोजबीन के बाद जब कुछ शब्द उनके मुँह लगे तो वे शुरू हो गए; "आज~~~ मैं मेरे दाता से कहना चाहूँगा कि ऐ मेरे दाता, ऐ मेरे मालिक, ऐ मेरे भगवान इन्हें ऐसे ही रखना. इनके ऊपर कृपा करना. मैं तो कहूँगा कि आज मेरे दाता ने इन्हें अपना आशीर्वाद दिया...ये भटकने न पाए... आज इनका यश, इनका ऐश्वर्य पूरी दुनियाँ देख रही है. बच्चे तो भगवान की मूरत होते हैं. 'प्रथ्वी' पर आज इनका जो नाम हो गया है.... आज पूरा ब्रह्माण्ड इन्हें दुआएं दे रहा है. तो ऐ मेरे दाता.......महागुरु, आज तो इसने बावला कर दिया."
जज-गुरु की गलती नहीं है. वे और क्या करेंगे जब ऐसे बिकट टैलेंटेड बच्चे प्रतियोगी बनकर स्टेज पर उतर जायेंगे और सुरों के चौके-छक्के जड़ने लगेंगे? टैलेंटेड, मेहनती और इतने परफेक्ट कि सुनकर मन में आता है जैसे इनका गला बाकायदा ऑर्डर देकर बनवाया गया है. पॉवर-पॉइंट प्रजेंटेशन के बाद. बिलकुल परफेक्ट. कहीं कोई दोष नहीं. हाँ, परफेक्ट होने के चक्कर में इन बच्चों ने अपना बचपना कहाँ और किसके पास गिरवी रख छोड़ा है वह शोध और जांच, दोनों का विषय है. अगर शोध या जांच के बाद यह पता चल भी जाए कि कहाँ और किसके पास रखा गया है तो भी उस बचपने को वापस पाने का कोई अर्थ नहीं क्योंकि तबतक ये इतने उस्ताद हो चुके होते हैं कि इन्हें बचपने और मासूमियत के तीर-कमान की ज़रुरत ही नहीं रहती.
गुरु, महागुरु, गेस्ट गुरु, बैंड वाले, दर्शक, संगीत प्रेमी वगैरह इन बच्चों को देखकर दाँतों तले ऊँगली दबाते हैं. और फिर ऐसा क्यों न हो? दस साल के बच्चे के मुँह से राहत फ़तेह अली खान की आवाज़ इस तरह से निकलती है कि अगर वे सुन लें तो सोचने लग जायें कि; 'ये बच्चा मुझसे मेरी आवाज़ कब चुरा ले गया?' सुनने वालों को यह भी लग सकता है कि 'दो-तीन महीने के लिए ये बच्चा राहत बाबू का गला उधार मांग लाया है.'
न तो इन बच्चों की आवाज में कोई कमी है और न ही हुनर में. अगर किसी ऑड-डे पर ख़ुदा न खास्ता इनसे कोई गलती हो जाती है तो जज साहब उन्हें बताते हैं कि; "ये जो हरकत-उल-आवाज़ तुमने ऐसे ली थी, उसे गाने में रफ़ी साहब ने वैसे लिया है", या फिर; "तुमने गाने को चार से उठाया. अगर तीन से उठाया होता तो जो ऊंची आवाज़ में तुम्हारा सुर गया, वह नहीं जाता."
सब तरह के नुक्श निकाल कर भी जज-गुरु यह कहना नहीं भूलते कि; "फिर भी तुमने कमाल का गाया."
गेस्ट-गुरु के रूप में आया कोई संगीतकार बच्चे को बताना नहीं भूलता कि उसकी आवाज़ रेकॉर्डिंग स्टूडियो के लिए ही बनी है. साथ ही वादा भी कर डालता है कि दो साल बाद वह अपने सारे गाने उसी बच्चों से गवायेगा. पूरे सेट पर ख़ुशी का मौसम आ जाता है. कई-कई बार तो इतनी ख़ुशी आ जाती है कि डर लगता है कि सेट की दीवारें फट न पड़ें. जितना खुश वह बच्चा नहीं होता उससे ज्यादा उसके माँ-बाप खुश होते हैं. ठीक वैसे ही एलिमिनेशन पर बच्चा जितना दुखी नहीं रहता उससे ज्यादा उसके माँ-बाप दुखी होते हैं. उन्हें देखकर लगता है जैसे अब इनका जीवन व्यर्थ हो गया. इनके ऊपर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है और अब ये इससे कैसे उबरेंगे?
इन बच्चों में परफेक्शन, गुण, मेहनत, कला वगैरह वगैरह कूट-कूट कर भर गए है.
लेकिन जो चीज इन्हें छोड़कर चली गई है उसकी बात?
जब से हमने तय किया है कि हम अपने देश को इकॉनोमिक सुपर पॉवर और सामरिक दृष्टि से भी महाशक्ति बनायेंगे तबसे देश में रियलिटी शो की संख्या में दिन दूनी नहीं तो रात में चौगुनी वृद्धि तो ज़रूर हुई है. तरह-तरह के विषयों पर रियलिटी शो बनाये जा रहे हैं. यहाँ तक कि अच्छे-खासे घर-दुआर वाले लोग़ जंगलों में जाकर वास कर रहे हैं ताकि रियलिटी शो बन सके. कई लोग़ सांप-छछूंदर, केकड़े-अजगर के साथ खुद को कांच के डब्बे में कैद कर ले रहे हैं और उन जानवरों को सता रहे हैं ताकि जानवरों को तंग करने वाली उनकी हरकतों को कैमरे में कैद करके उसे रियलिटी शो में बदला जा सके.
कई बार मन में आता है कि अच्छा हुआ जो श्री राम ने त्रेता युग में जन्म लेकर खुद को उसी युग में सरयू नदी के हवाले कर दिया. सोचिये अगर आज श्री राम खुद को सरयू नदी के हवाले करते तो क्या होता? उनके जल समाधि को लाइव टेलीकास्ट करने के लिए चैनलों में होड़ लग जाती. ये चैनल वाले एक कांख में अपनी पूरी बेशर्मी दबाये और दूसरी में रूपये की थैली लिए उनके पास एक्सक्ल्यूसिव राइट्स के लिए पहुँच जाते. गारंटी तो नहीं डे सकता लेकिन फिर भी ऐसा ज़रूर लगता है कि अगर वे आज होते तो ये रियलिटी शो वाले उनके वनवास की खबर पर उनके पास भीड़ लगा लेते और उनके वनवास को रियलिटी शो में बदल देने के लिए उन्हें पक्का लालच देते. जनक भले ही विदेह होंगे लेकिन सीता स्वयंवर के अवसर पर कोई न कोई चैनल वाला स्वयंवर के लाइव टेलीकास्ट की एक्स्क्यूसिव राइट्स के लिए पैसे लेकर रोज उनके राजमहल के चक्कर लगाता.
आज इन शो बनाने वालों को परफेक्ट सिंगर और परफेक्ट डांसर वगैरह की तलाश है लेकिन इस परफेक्शन से ये दर्शकों को कितने वर्षों तक चमत्कृत या फिर बोर कर पायेंगे? मुझे तो पक्का विश्वास है कि एक समय ऐसा भी आएगा जब शो बनाने वाले ये लोग़ ऐसे बच्चों को ढूढेंगे जिनके पास मासूमियत होगी. जिनमें बचपना होगा. जिनमें परफेक्शन नहीं होगा. जो बच्चे 'कम्प्लीट' सिंगर या 'कम्प्लीट' डांसर नहीं होंगे. और फिर ये लोग़ उन बच्चों की मासूमियत, तुतलाहट वगैरह पर रियलिटी शो बनायेंगे.
और तब हमें जज-गुरु द्वारा सुनने को मिलेगा; "आज~~ मैं मेरे दाता से कहूँगा कि ऐ मेरे दाता, ऐ मेरे ईश्वर, ऐ मेरे मालिक, इनको हमेशा मासूम बनाये रखो....ये जो इनकी तुतलाहट है वो हमेशा ऐसे ही बनी रही. ऐ मेरे दाता इनकी नाक ऐसे ही बहती रहे जिससे ये बच्चे लगें....आज पूरी 'प्रथ्वी' में इनकी मासूमियत की चर्चा हो रही होगी........................."
समस्या एक ही है. आज रियलिटी शो है...कल भी रियलिटी शो ही रहेगा. बिक्री के लिए केवल कमोडिटी बदल जायेगी.
Saturday, August 6, 2011
मॉंनसून स्कैम - पार्ट २
जैसा कि मैंने अपनी पिछली पोस्ट में बताया कि बारिश स्कैम के लिए जिम्मेदार सभी लोगों की प्रेस कांफ्रेंस के बारे में लिखूँगा. पिछली बार आपने कोलकाता के प्रभारी बादल की प्रेस कांफ्रेंस की रिपोर्टिंग देखी. आज पेश है कोलकाता के आकाश में छाने वाले बादलों को कंट्रोल करने वाले देवता की प्रेस कांफ्रेंस.
पत्रकार आ चुके हैं. देवता के सेक्यूरिटी गार्ड चाहते थे कि पत्रकार अपने जूते कांफ्रेंस हाल से बाहर उतार कर अन्दर घुसें. देवता ने मना कर दिया. बोले; "पत्रकार भी अपने हैं और जूते भी अपने ही हैं. जो अपने हैं उनसे कैसा खतरा? जूते समेत ही इन्हें अन्दर जाने दो."
उनकी बात सुनकर उनका एक सलाहकार बोला; "हे देव, चूंकि मामला बहुत गरमाया हुआ है और आपके द्वारा साध ली गई मीडिया को देखकर पूरे देवलोक के निवासी यह सोचते हैं कि आपकी यह प्रेस कांफ्रेंस केवल खानापूर्ती है, इसलिए मैं आपको एक सलाह देना चाहूँगा. अगर ऐसे मौकों पर मैं सलाह नहीं दे सकता तो फिर मेरे सलाहकार रहने का क्या फायदा? और तो और, हे देव, बिना सलाह लिए मैं अपनी सैलेरी लेकर गिल्टी फील करूँगा."
देव बोले; "सलाह दीजिये. जरूर दीजिये. सलाह के लिए ही तो आपको स्वर्ण मुद्राएं मिलती हैं. सलाह देने का आपका अधिकार बनता है."
अपने देव से ग्रीन सिग्नल मिलते ही सलाहकार बोला उठा; "तो हे देव, यह रही मेरी सलाह. ध्यान देकर सुनें.... मेरी सलाह यह है कि यहाँ उपस्थित पत्रकारों में से किसी एक को कहकर अपने ऊपर जूता फेंकवा लें. इससे दो बातें होंगी. एक तो आपकी अपनी मीडिया की क्रेडिबिलिटी बनी रहेगी और दूसरा उस पत्रकार को क्षमा करके आप अपना कद बढ़ा लेंगे."
सलाहकार की बात सुनकर देव प्रसन्न हो गए. बोले; "वाह! वाह! तुम्हारी सलाह पाकर हम धन्य हुए. ऐसा सलाहकार किसी और देवता के पास कहाँ? कहो तो अभी गैजेट साइन करके तुम्हें देवलोक महारत्न सम्मान दिलवा दूँ?"
सलाहकार हमेशा की तरह लजाने की एक्टिंग करने लगा. 'लजाते' हुए बोला; "सेवक को केवल देव का आशीर्वाद चाहिए. महारत्न सम्मान तो मिल ही जाएगा. महारत्न सम्मान देव के आशीर्वाद से ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं है."
देवता अपने सलाहकार के चमचत्व गुण से भाव विभोर हो गया. वातावरण में चारों तरफ चमचत्व के कण तैर रहे थे. ऊपर से बाकी देवता इस दृश्य को देखकर खुश हुए जा रहे थे. एक देवता ने इस प्रेस कांफ्रेंस पर पुष्पवर्षा कर डाली. सलाहकार ने एक पत्रकार को इस बात के लिए पटा लिया कि कोई कठिन सवाल पूछकर देवता से उचित उत्तर की कामना भंग होने का अभिनय करते हुए वह पत्रकार देवता के ऊपर जूता फेंकेगा. बाद में देवता उसे क्षमा कर देंगे. मीडिया की क्रेडिबिलिटी भी बन जायेगी और उधर उस देवता का कद भी एवेरेस्ट टाइप हो जाएगा.
प्रेस कांफ्रेंस शुरू हुई. देव बोले; "फ्रेंड्स, ऐज यू आर अवेयर, देयर हैव बीन सम....."
अभी देवता ने बोलना शुरू ही किया था कि तीन-चार पत्रकारों ने देवता से देवभाषा में बोलने के लिए कहा. उनकी बात सुनकर देवता बोले; "देवताओं से क्यों देवभाषा बोलवाना चाहते है आपलोग? हम देवता हैं. हमें आंग्ल भाषा में बोलना ही शोभा देता है."
इधर-उधर की बातें हुई. मौका देखते हुए देवता ने अपने सेन्स ऑफ ह्यूमर का प्रदर्शन किया. कुछ ठहाके लगे. उसके बाद पत्रकारों ने प्रश्न दागना शुरू किया. नमूना देखिये;
पत्रकार: क्या यह सही है कि आपके आदेश पर ही कोलकाता के बादलों ने कोलकाता पर वर्षा नहीं करके वहाँ के पानी का कोटा किसी और जगह दे दिया?
देवता: देखिये, यह पहली बार नहीं हुआ है. ऐसा पहले भी होता आया है. मुझसे पहले कोलकाता के प्रभारी देव ने ऐसा कई बार किया था. एक जगह के पानी को दूसरी जगह गिरवा देना कोई नई बात नहीं है.
पत्रकार: लेकिन पहले जो होता आया है उसकी आड़ में ऐसा करना आपको शोभा देता है क्या?
देवता: देखिये, देवों के काम करने का एक तरीका है. हमारा हर फैसला पहले किये गए फैसलों के आधार पर होता है. और जैसा कि मैंने बताया कि हमारे पहले भी वहाँ के प्रभारी देव यह करते रहे हैं....
पत्रकार: क्या यह सच है कि आपने इस बात का फैसला बिना किसी और को बताये कर लिया? क्या यह तानाशाही का प्रतीक नहीं है?
देवता: देखिये, यह तानाशाही है या नहीं वह तो आप पूरा सच जानकर ही निश्चित करें.
पत्रकार: लेकिन डी बी आई (देवलोक ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन) की इन्टेरिम रिपोर्ट में यह कहा गया है कि आपने यह फैसला खुद ही लिया है.
देवता: यह सच नहीं है. यह फैसला लेने से पहले जीओडी यानि ग्रुप ऑफ देवाज की कम से कम तीन मीटिंग्स हुई. इन मीटिंग्स की जानकारी देवराज को भी थी.
पत्रकार: परन्तु देवराज का कहना है कि उन्हें इस फैसले की जानकारी नहीं दी गई. आपने उन्हें अँधेरे में रखा.
देवता: यह सच नहीं है. देवराज को इसकी जानकारी थी. जिस दिन मैंने मिनट्स ऑफ मीटिंग्स उन्हें भेजी थी, वे डांस कंसर्ट में बिजी थे और शायद इसीलिए उन्होंने मिनट्स बुक नहीं देखा.
पत्रकार: आपके ऊपर यह आरोप भी है कि आप मेनका के दूर के रिश्तेदार हैं और इसीलिए उसने देवराज को कहकर आपको कोलकाता जैसे मलाईदार इलाके का प्रभारी बनाया गया. क्या यह रिश्तेदारवाद को बढ़ावा देना नहीं हुआ?
देवता: किसी का रिश्तेदार होना कोई अपराध नहीं है. वैसे हम आपको बता दें कि हमारी नियुक्ति हमारी योग्यता की वजह से हुई है.
पत्रकार: यह अफवाह भी है कि उड़ीसा के कुछ इलाकों से पिछले महीने आपको करीब सात हज़ार घंटे की पूजा-अर्चना मिली और इसलिए आपने कोलकाता का पानी उड़ीसा के उन्ही इलाकों को दे दिया?
देवता: देखिये, देवताओं में चूंकि मैं बहुत पॉपुलर हूँ इसलिए मेरे भक्त हर इलाके में हैं. आप उड़ीसा की बात करते हैं? मेरे भक्त तो रांची में भी हैं. मुझे वहाँ से भी कई हज़ार घंटे की पूजा-अर्चना मिलती रहती है. लेकिन कोलकाता में बरसात न होने की बात को मुझे मिली पूजा से जोड़ना उचित नहीं होगा.
पत्रकार: लेकिन ऐसी खबर आई है कि डीबीआई ने देवराज इन्द्र से ख़ास तौर इस ऐंगिल की जांच करवाने की सिफारिश की है?
देवता: अब यह तो देवराज पर निर्भर करता है कि वे क्या करते हैं. लेकिन मैं यहाँ बता देना चाहता हूँ कि देवराज हमारे देव हैं. हमें उनमें पूरा विश्वास है.
पत्रकार: आपके ऊपर यह आरोप भी हैं कि आपके क्षेत्र के बादल बहुत उद्दंड हो गए हैं. उनके अन्दर डिसिप्लिन नाम की कोई चीज ही नहीं रही. इसी की वजह से वे ढंग से बरसात नहीं कर पाते.
देवता: यह भी गलत आरोप है. जब मैंने अपने इलाके का कार्यभार संभाला था तब वहाँ बादलों की पैदावार बहुत कम होती थी. ऐसे में पानी भी कम ही बरसता था. अब ऐसा नहीं है. अब बादल भी खूब पैदा होते हैं और पानी भी खूब बरसता है.
पत्रकार: कहाँ खूब बरसता है? अगर खूब ही बरसता तो फिर इतना बवाल क्यों होता?
देवता: आप कदाचित उत्तेजित हो रहे हैं. आप बात समझ नहीं रहे हैं. अगर आप देखेंगे तो....
अभी वे बोल ही रहे थे कि पत्रकार ने दाहिने हाथ से अपने दाहिने पाँव का जूता उठाकर इस तरह से देवता की तरफ फेंका कि वह जूता उनके दाहिनी कनपटी के दाहिने तरफ से निकल गया. वहाँ उपस्थित बाकी पत्रकारों, देवता के सिक्यूरिटी गार्ड्स और उसके सलाहकार ने इस पत्रकार को पकड़ लिया. इधर देवता के सिक्यूरिटी गार्ड्स उस पत्रकार को पुलिस को सौंपने की धमकी दे ही रहे थे कि देवता ने कहा; "जाने दो. जाने दो. इस पत्रकार को देखकर लगता है जैसे इसे बहकाया गया है. इसकी गलती नहीं है. किसी ने इसे बहका कर हमारे ऊपर यह आक्रमण करवाया है. इसमें असुरों का हाथ है. यह तो निष्कपट निश्छल पत्रकार मात्र है. इसे छोड़ दो. मैं देवराज से भी आग्रह करूँगा कि वे इसके विरुद्ध कोई कार्यवाई न करें. इसे कारवास की सजा न मिले."
देवता की बात सुनकर उसके सलाहकार ने पत्रकार को देखते हुए अपनी बाएँ आँख दबा दी. पत्रकार मुस्कुरा उठा.
दूसरे दिन ही देवलोक वासियों ने मीडिया की भरपूर सराहना की. उस पत्रकार का नागरिक अभिनन्दन किया गया. देवलोक वासियों में मीडिया की क्रेडिबिलिटी एकबार फिर से वापस आ गई थी. सब इस बात से आश्वस्त थे कि जबतक मीडिया है तबतक उनके अधिकारों की रक्षा होती रहेगी.
Thursday, August 4, 2011
मॉंनसून स्कैम
कोलकाता में करीब पंद्रह-बीस दिनों तक बरसात नहीं हुई. ऐसा नहीं कि बादल छाये नहीं. ऐसा भी नहीं कि बादल भाये नहीं. जब-जब बादल छाये तब-तब बादल भाये (इस कहते हैं आँसू कविता. लिखने वाला लिखे और पढनेवाला आँसू बहाए). ट्विटर पर हजारों ट्वीट दिखाई दीं, जिनमें ट्विटर योद्धाओं ने कोलकाता के आसमान पर छाए गोरे, भूरे, काले, लाल, पीले, सब तरह के बादलों को इतना खूबसूरत बताया कि अगर कटरीना कैफ पढ़ लेतीं तो डिप्रेशन में चली जातीं. जरा सी रिम-झिम हुई तो इन ट्विटर योद्धाओं ने ट्वीट करके अपने पछतावे के बारे में बताया कि क्या बिडम्बना है कि; "ऐसे मौसम में आफिस जाना पड़ेगा." मन ही मन गरम पकौड़े और चाय के संहार का सपना देखा और मन ही मन उन सपनों पर पसीना फेर दिया.
न जाने कितनो ने ने रवींद्र संगीत सुना. कितने तो गुनगुनाते पकड़े गए कि; "पागला हवा बादोल दिने पागोल आमार मोन जेगे उठे.." कवि-हृदय मानवों ने श्री सुमित्रा नंदन पन्त से इंस्पायर होते हुए कवितायें लिखीं. रेन-कोट की बिक्री बढ़ी. दूकान में रखे छातों को घरों का कोना नसीब हुआ. टैक्सी वालों ने टैक्सी यात्रियों से बरसात में एक्स्ट्रा भाड़ा मांगने के प्लान बनाये. प्यासी सड़कों ने पानी पीने के सपने देखे. महानगर पालिका ने भारी बरसात की संभावना को देखते हुए अपने कर्मचारी और पम्प तैयार किये जिससे रास्तों और गलियों में जमे पानी को जल्द-जल्द से निकाला जा सके.
लेकिन बरसात नहीं हुई. सारी तैयारियों पर बादल फिर गए.
कोलकाता के नागरिकों ने देवराज इंद्र को गरियाना शुरू किया. पहले पाँच दिन तो देवलोक की मीडिया ने यह मुद्दा उठाया ही नहीं. कारण यह था कि तमाम बड़े पत्रकार, सम्पादक वगैरह देवराज के साथ डांस कर्सर्ट देखने में बिजी थे. बाद में जब मीडिया को लगा कि बीच-बीच में उसे मीडिया-धर्म का पालन भी करते रहना है, तब उसने यह मुद्दा उठाया. पहले तो देवराज इन्द्र के चेले-चमचों ने साफ़-साफ़ कह दिया कि उनकी इंटीग्रिटी पर सवाल उठाने का अधिकार किसी को नहीं है. कुछ संपादकों ने भी देवराज का बचाव यह कहते हुए किया कि; "देवलोक के छोटे-मोटे कर्मचारियों की लापरवाही के लिए लिए उन्हें दोषी करार देना उचित नहीं है. वे तो दैवीय कार्यों में व्यस्त रहते हैं. किसी इलाके में बारिश हुई या नहीं, ऐसी टुच्ची बात से उनका का क्या लेना-देना?
उनके कुछ चमचों ने तो यहाँ तक कह दिया कि "देवराज को इस मामले में फंसाया जा रहा है. यह शुक्राचार्य की चाल है."
लेकिन तब तक मामला गरमा गया था. मामले ने इतना तूल पकड़ा कि देवराज का मन डांस और सोमरस से भटकने लगा. बाद में उनके सलाहकारों ने उन्हें सलाह दी कि दो-चार प्रेस कांफेरेंस करके मामले को दफनाया जा सकता है. इन्ही परिस्थियों में तमाम लोगों ने प्रेस कांफेरेंस की.
पेश है उन्ही में से एक प्रेस कांफेरेंस कोलकाता के प्रभारी बादल ने किया जिसे कोलकाता में बारिश मैनेजमेंट का प्रभार सौंपा गया था;
कोलकाता के प्रभारी बादल की प्रेस कांफेरेंस:
पत्रकार: आपके ऊपर जो आरोप हैं, क्या वह सही हैं?
बादल: देवलोक के कर्मचारियों पर लगे आरोप कभी सही होते हैं क्या?
पत्रकार: क्या यह सच नहीं है कि देवलोक से कोलकाता के लिए जल लेकर तो आप चले लेकिन कोलकाता के ऊपर बरसात न करके आपने कहीं और बरसात कर दी?
बादल: यह सही नहीं है.
पत्रकार: परन्तु कोलकाता की सूखी सड़कें इस बात की गवाह हैं कि आपने वहाँ बरसात नहीं की.
बादल: हमने तो बरसात की थी. अब ग्लोबल वार्मिंग की वजह से पृथ्वी की ऊपरी सतह पानी सोख ले, तो हम क्या कर सकते हैं?
पत्रकार: लेकिन लोगों ने आपको बरसात करते नहीं देखा.
बादल: देखिये, यह आरोप बदले की भावना से लगाया जा रहा है. पिछले वर्ष जो सूखा पड़ा था उसकी वजह से पत्रकार हमसे बदला लेना चाहते हैं.
पत्रकार: यह आरोप केवल पत्रकारों का नहीं है. कोलकाता के लोगों ने भी आरोप लगाया है.
बादल: लोग़ तो आरोप लगाते रहते हैं लेकिन उन आरोपों में सच्चाई कितनी होती है? अगर लगता है कि जांच की ज़रुरत है तो हम किसी भी तरह की जांच के लिए तैयार हैं.
पत्रकार: जांच की क्या ज़रुरत है? यह तो सीधा-सीधा दिखाई दे रहा है कि पानी कहीं नहीं है. आप चाहें तो अपने हाथों से मिट्ठी छूकर देख लें. किसी तालाब में पानी नहीं है. झील में पानी का स्तर नहीं बढ़ा. सबकुछ तो वैसे ही देखा जा सकता है. इसके लिए जांच की क्या ज़रुरत है?
बादल: देखिये, देवलोक के काम करने का अपना एक तरीका है. हम बिना सुबूत के कुछ नहीं मानते. हाथ से छूकर हम नहीं देखेंगे.
पत्रकार: तो फिर आप क्या चाहते हैं?
बादल: देवराज डी बी आई को निर्देश दें, वह जांच करे. वे चाहे तो किसी अवकाश प्राप्त देवता की अध्यक्षता में एक कमीशन बैठा दें. हमें कोई आपत्ति नहीं.
पत्रकार: जब तक कमीशन जांच करेगा, तब तक अगर आप पानी लाकर फिर से बारिश कर देंगे तो?
बादल: कोलकाता के लिए जितना कोटा इस महीने का था, वह सब ख़त्म हो गया है. अब अगले महीने जितना मिलेगा हम वही आपको दे सकेंगे.
पत्रकार: ऐसी बात है? कोलकाता का कोटा तो आपने कहीं और दे दिया.
बादल: आप चाहें तो ओवर-ड्राफ्ट के लिए अप्लाई कर दें. कोटा बढाया जा सकता है.
पत्रकार: आपके पास कोई सुबूत है कि आपने पानी बरसाया?
बादल: हाँ, हमारे पास सुबूत है. मैं अकेले तो बरसात करने नहीं आया था. मेरे साथ इस समय जो चार बादल और दो बदली बैठी हुई हैं, उनसे पूछ लीजिये. वे आपको बतायेंगे कि पानी बरसाया गया था.
पत्रकार: ये तो सब आपके मातहत काम करते हैं. वो छुटकी बदली बेचारी आपके खिलाफ कैसे जा सकती है?
बादल: हम देवलोक के बादल हैं. हमारे यहाँ सबको छूट है कहीं भी जाने की. वो बादल हो या बदली.
पत्रकार: आप मुद्दे से हमें भटका रहे हैं.
बादल: हम आपको मुद्दे से क्या भटकायेंगे? आपलोग मुद्दे पर थे ही कब?
पत्रकार: आप कहना क्या चाहते हैं?
बादल: हम यही कहना चाहते हैं कि हमें इस बारे में और कुछ नहीं कहना. अब आपको जो कुछ पूछना है वह हमारे बॉस, यानि कोलकाता के प्रभारी देव से पूछिए. उन्होंने हमें जो करने के लिए कहा, हमने किया. अब हम और कोई सवाल नहीं लेंगे.
प्रेस कांफेरेंस ख़त्म हो गई. मामला गरमाया हुआ है. पत्रकार अब कोलकाता के प्रभारी देव से सवाल करेंगे. देव के प्रेस कांफेरेंस के लिए एक दिन का इंतजार कीजिये.
Monday, May 16, 2011
नई दिल्ली, ५ जून, २०१६
दिल्ली से संवाददाता चंदू चौरसिया, चेन्नई से आर राजारामन और मुंबई से रजत सावंत
कल लगातार सत्रहवें दिन सड़क जाम, हड़ताल और हिंसा से देश भर में जनजीवन अस्त-व्यस्त रहा. हालाँकि देश के कुछ प्रमुख शहरों में जनता द्वारा निकाले गए ज्यादातर जुलूस शांतिपूर्ण रहे परन्तु कुछ छोटे शहरों में स्थिति पहले जैसी बनी रही. जहाँ एक तरफ इलाहाबद में प्रदर्शनकारियों ने बुंदेलखंड एक्सप्रेस के तीन डिब्बे आग के हवाले कर दिए वहीँ आगरा में जनशताब्दी एक्सप्रेस के गार्ड और ड्राईवर को किडनैप कर लिया गया. मेरठ में जनता और पुलिस के बीच जमकर झड़पें हुईं जिनमें करीब सैतीस लोगों के घायल होने की खबर है. चंडीगढ़, जालंधर, जयपुर, वाराणसी, पटना, रायपुर, भोपाल, इंदौर, गुवाहाटी, औरंगाबाद, बंगलौर, हैदराबाद और कई महत्वपूर्ण शहरों में हिंसा की घटनाओं की वजह से जाना-माल को भारी क्षति पहुँची है.
उधर दक्षिण भारत के प्रमुख शहरों में भी हिंसा की खबर है. जहाँ चेन्नई में स्थिति कुल मिलाकर शांतिपूर्ण रही वहीँ मदुरै और कोयंबटूर में पुलिस और जनता के बीच संघर्ष में करीब सत्तर लोगों के घायल होने की खबर है. आज एक संवाददाता सम्मलेन में केन्द्रीय गृहमंत्री ने देशवासियों से अपील की है कि वे हिंसा का रास्ता त्यागकर सरकार के साथ बातचीत करें जिससे हिंसा के अलावा एक और रास्ता निकाला जा सके. उधर आज अपनी सरकार के दो वर्ष पूरे होने पर एक स्वागत समारोह में प्रधानमंत्री ने एक बार फिर से दोहराया कि देश में हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं.
प्रधानमंत्री के इस वक्तव्य की आलोचना करते हुए अखिल भारतीय जनता महासभा के अध्यक्ष श्री मानेक राव बाबू राव पाटिल ने मुंबई में एक संवाददाता सम्मलेन में कहा; "प्रधानमंत्री का यह बयान बेहद बचकाना है जब वे कहते हैं कि देश में हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं है. अभी हमारे कार्यकर्ताओं ने कल ही कोल्हापुर, सतारा और वर्धा में हिंसा की है. इससे यह साबित होता है कि हमेशा की तरह इस बार भी प्रधानमंत्री को देश के बारे में कोई जानकारी नहीं है."
उधर चेन्नई में एक जनसभा को संबोधित करते हुए अखिल भारतीय जनता महासभा की तमिलनाडु इकाई के अध्यक्ष श्री रंगनाथन एम श्रीनिवास ने कहा; "जब तक हमारी मांगे पूरी नहीं होंगी हम तमिलनाडु में हिंसा करते रहेंगे. केंद्र सरकार की तरफ से टेलीकम्यूनिकेशन मिनिस्टर ने लोकसभा में अपने एक भाषण में देश को विश्वास दिलाया था कि फोर-ज़ी स्पेक्ट्रम के ऑक्शन में उनकी तरफ से बहुत बड़ा घोटाला किया जाएगा और देश को करीब तीन लाख चौहत्तर हज़ार करोड़ रूपये का चूना लगेगा परन्तु जब हमने आर टी आई के थ्रू जानकारी हासिल की तो हमें पता चला कि यह मिनिस्टर पूरी तरह से निकम्मा है और इसके निकम्मेपन की वजह से देश को केवल एक लाख सत्तर हज़ार करोड़ का नुकशान हुआ. आपको अगर याद हो तो टू-ज़ी स्पेक्ट्रम में ही देश को कुल एक लाख सतहत्तर हज़ार करोड़ का नुकशान हुआ था. ऐसे में हम यह बर्दाश्त नहीं कर सकते कि फोर-ज़ी में किया गया घोटाला टू-ज़ी घोटाले से छोटा हो. मिनिस्टर के इस निकम्मेपन की वजह से पूरी दुनियाँ में भारतवर्ष की साख को भारी धक्का पहुँचा है."
ज्ञात हो कि सरकार और जनता के बीच हिंसा की वारदातें उस दिन से शुरू हुई हैं जब देश भर में जुलूस निकालकर जनता ने सरकार के ऊपर आरोप लगाया कि अपने दो वर्ष के अभी तक के शासनकाल में इस सरकार की तरफ से उतना भ्रष्टाचार नहीं किया जा सका जितना सरकार ने देश की जनता से वादा किया था. जनता के प्रतिनिधियों का यह आरोप है कि यह सरकार भ्रष्टाचार के मामले में किसी भी मंत्रालय के अपने टारगेट पूरा नहीं कर सकी है.
कल इंदौर में बोलते हुए अखिल भारतीय जनता महासभा की मध्यप्रदेश इकाई के महासचिव शिवभंजन सिंह ने कहा; "वर्ष २०१४ के लोकसभा चुनावों के अवसर पर इस सरकार के घोषणा पत्र पर भरोसा करते हुए हमने इसे एक बार फिर से सत्तासीन करवाया परन्तु यह सरकार अपने घोषणा पत्र में किये वादों में से कोई भी वादा ढंग से पूरा नहीं कर पाई है. एक मिनट..एक मिनट..आज आपके समक्ष मैं इस सरकार के घोषणा पत्र की एक कॉपी लेकर आया हूँ. इस घोषणा पत्र के पेज चार पैराग्राफ तीन में सरकार ने वादा करते हुए लिखा था कि अगर इसे सत्ता में पुनः वापस लाया गया तो सरकार रक्षा सौदों में करीब साठ हज़ार करोड़ रूपये का घोटाला करेगी. आप को जानकारी दूँ कि दो वर्ष हो गए इस सरकार को काम करते हुए लेकिन सी ए ज़ी की रिपोर्ट के अनुसार अभी तक केवल इक्कीस हज़ार करोड़ के घोटालों की ही जानकारी मिल पाई है. मैं पूछता हूँ जब अपने वादे के मुताबिक पाँच साल में केवल साठ हज़ार करोड़ के छोटे-मोटे घोटाले करने के अपने वादे को इस सरकार के मंत्री नहीं पूरा कर पा रहे हैं तो हम इस सरकार से क्या उम्मीद करें? ऐसे में हम चाहते हैं कि यह सरकार जल्द से जल्द इस्तीफ़ा दे जिससे देश इससे भ्रष्ट सरकार चुन सके."
उधर मध्यप्रदेश इकाई की अध्यक्षा सुश्री रेवती पटेल ने सरकार की आलोचना करते हुए कहा; "यह सरकार बेशर्म हो गई है. सात महीने पहले जब हमने अपनी मांग रखते हुए यह कहा था कि सरकार जल्द से जल्द पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी करे तो सरकार ने हमें आश्वासन दिया था कि हमारी इस मांग को मानते हुए सरकार पंद्रह दिन के भीतर पेट्रोल की कीमत १८० रूपये प्रति लीटर और डीजल की कीमत १६० रूपये प्रति लीटर करे देगी. लेकिन आज सात महीने बीत गए और अभी तक सरकार ने पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढाने की हमारी मांग को नहीं माना है. हम एक बार फिर से इस सरकार को आगाह करना चाहेंगे कि अगर अगले तीन दिन के भीतर पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढाई नहीं गईं तो हमारा आन्दोलन और हिंसक हो जाएगा."
जब वित्तमंत्री से इस बाबत सवाल पूछा गया तो उन्होंने बताया; "जनता की मांग जायज नहीं है. ऐसा नहीं है कि हम पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ाना नहीं चाहते. हम अपने वादे पर अभी भी टिके हुए हैं. मामला इस बात पर आकर अटक गया कि कीमतों में कितनी बढ़ोतरी की जाय? हम चाहते थे कि पेट्रोल की कीमत केवल बारह रूपये साठ पैसे और डीजल की केवल आठ रूपये दस पैसे बढें वहीँ जनता के प्रतिनिधि इस बात पर अड़े थे कि पेट्रोल की कीमत कम से कम सत्रह रूपये अस्सी पैसे और डीजल की कीमत कम से कम बारह रूपये पचास पैसे बढाई जाय. हम जनता के प्रतिनिधियों से बात कर रहे हैं और जल्द ही एक समझौता करके पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ा दी जायेंगी. इस बीच हम जनता से अपील करते हैं कि वह अपना आन्दोलन वापस ले ले. सरकार पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ाने के लिए वचनबद्ध है."
करीब पंद्रह दिनों से ज्यादा समय से चल रहे इन आन्दोलनों में रोज नई कड़ियाँ जुडती जा रही है. कल दोपहर नागपुर में विदर्भ किसान महासभा और पुलिस के बीच हुई झड़प में बारह पुलिस वाले और सत्रह किसान घायल हो गए. ज्ञात हो कि सरकार विदर्भ के किसानों को फर्टीलाइज़र सब्सिडी, लोन-माफी और बाकी की सहूलियतें देना चाहती है मगर किसान लेने के लिए राजी नहीं हैं. महाराष्ट्र के सबसे कद्दावर नेता श्री जवार ने सरकार की तरफ से किसानों से बातचीत करने की कोशिश की थी परन्तु किसानों ने उन्हें फटकार के भगा दिया था. श्री जवार चाहते थे कि विदर्भ के किसान करीब दो लाख करोड़ रूपये की सराकरी मदद लेने के लिए राजी हो जायें वहीँ किसान इस बात पर अड़े रहे कि उन्हें किसी सरकारी मदद की जरूरत नहीं है. अब करीब दस दिन पुराने मामले ने इतना तूल पकड़ लिया है कि किसान हिंसा पर उतारू हो गए हैं.
ज्ञात हो कि पिछले दिनों वर्तमान सरकार के दो वर्ष पूरे होने पर पी सी मेल्सन और बाउटलुक पात्रिका द्वारा किये गए सर्वेक्षण में जो तथ्य सामने आये थे उनके अनुसार भ्रष्टाचार के मामले में वर्तमान सरकार पूरी तरह से विफल रही है. सर्वे के अनुसार देश की करीब सत्तासी प्रतिशत जनसँख्या यह मानती है कि सरकार ने अपने घोषणा पत्र में किये गए भ्रष्टाचार संबंधी वादे पूरे नहीं किये. वहीँ तेरह प्रतिशत लोगों का यह मानना था कि इस सरकार को भ्रष्टाचार फ़ैलाने के अपने टारगेट को अचीव करने के लिए एक चांस देना चाहिए. ऐसे लोगों का मानना था कि भ्रष्टाचार को फ़ैलाने के अपने वादे पूरे करें के लिए केवल दो वर्ष का समय काफी नहीं है. इसलिए सरकार को और समय देना चाहिए.
आज इस अखबार के सम्पादक से बात करते हुए महान भ्रष्टाचार विशेषज्ञ श्री प्रमोद मेहता ने बताया; "हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इस सरकार को पाँच साल के लिए चुना गया है. ऐसे में केवल दो सालों के भ्रष्टाचार के रेकॉर्ड्स देखकर उसे नाकारा बता देना उचित नहीं होगा. हमें धीरज रखना चाहिए. मुझे पूरा विश्वास है कि अगले तीन वर्षों के अपने शासनकाल में यह सरकार भ्रष्टाचार की स्पीड बढ़ाएगी और अपना टारगेट ज़रूर अचीव करेगी. भ्रष्टाचारियों के एक प्रतिनिधिमंडल ने हाल ही में प्रधानमंत्री से मुलाकात की है और उन्हें भ्रष्टाचार के कुछ नए तरीकों को ट्राई करने की सलाह दी है. मेरे सोर्स बताते हैं कि प्रधानमन्त्री जल्द ही उन सलाहों को लागू करेंगे और अगर जरूरत पड़ी तो वे कैबिनेट रि-सफल भी करेंगे. आज जरूरत है कि देश की जनता द्वारा धैर्य न खोने की. आज ज़रुरत है कि देश की जनता प्रधानमंत्री में अपने विश्वास को कायम रखे."
विश्वस्त सूत्रों के अनुसार सरकार जल्द ही भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने देने वाली वर्तमान कैबिनेट कमिटी को रद्द कर देगी. सूत्रों का ऐसा मानना है कि प्रधानमंत्री इस हाइ-पावर्ड कैबिनेट कमिटी के कार्यों से संतुष्ट नहीं हैं. प्रधानमंत्री चाहते हैं कि इस कैबिनेट कमिटी की अध्यक्षता अब वित्तमंत्री नहीं बल्कि गृहमंत्री करें. खबर यह भी है कि अध्यक्ष बदले जाने के बाद जल्द ही यह कैबिनेट कमिटी हायती, इराक, उज्बेकिस्तान, बांग्लादेश और सूडान के दौरे पर जायेगी ताकि भ्रष्टाचार के नए तरीकों पर काम किया जा सके. ऐसी खबर भी है कि इस कमिटी के कुछ सदस्य ऐसे देशों में जाने से बच रहे हैं क्योंकि ऐसे देशों के दौरे में मज़ा नहीं आता. हाल ही में प्रधानमंत्री ने ऐसे सदस्यों को लताड़ लगाई है क्योंकि प्रधानमंत्री का मानना है कि सरकार की भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने की प्राथमिकता मंत्रियों के मौज-मजे से ऊपर है.
हाल ही में संसद को दिए गए अपने बयान में प्रधानमंत्री ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा था; "भ्रष्टाचार और घोटालों का अपना टारगेट न अचीव करने की वजह से जिस तरह से हमारी सरकार की किरकिरी हुई है वह किसी भी हालत में मान्य नहीं है. हम कोशिश करेंगे कि अगले वित्तवर्ष में हम घोटालों और भ्रष्टाचार के हमारे टारगेट पूरे करें. हम स्वीकार करते हैं कि इस वित्तवर्ष के दौरान हमारे मंत्रालयों में घोटालों की संख्या कुल ३६५ रही जो पिछले वित्तवर्ष के मुकाबले केवल तीन प्रतिशत ज्यादा है. ऐसे में हमारी कोशिश यह रहेगी कि घोटालों की ग्रोथ कम से कम जी दी पी ग्रोथ से तो ज्यादा रहे. आज मैं न सिर्फ संसद को बल्कि देश की जनता को भी विश्वास दिलाना चाहूँगा कि हमारी सरकार घोटालों में वांछित वृद्धि न होने की वजह से आहत है और हम कोशिश करेंगे कि अगले वित्तवर्ष में कुछ ज्यादत घोटाले करें जिससे इस वर्ष कम हुए घोटालों की भरपाई हो जाए."
अखिल भारतीय जनता महासभा ने प्रधानमंत्री के इस वादे पर विश्वास करने से मना कर दिया है. महासभा का मानना है कि देश की सरकारें किये गए वादे कभी पूरा नहीं करती इसलिए इस बार महासभा ने सरकार को सबक सिखाने के लिए हिंसा का सहारा लिया है. कल देश के कुछ गणमान्य व्यक्तियों से हस्तक्षेप की अपील करते हुए सरकार ने कहा है कि बुद्धिजीवी, पत्रकार और महान लोग़ आगे आयें और जनता को समझाएं. कुछ बुद्धिजीवियों ने कल राजघाट पर एक सभा की और हारमोनियम, तबले और झांझ की धुन पर प्रसिद्द भजन रघुपति राघव राजाराम, पतित पावन सीताराम गाकर देश की जनता को समझाने का प्रयास किया.
वैसे जनता इन बुद्धिजीवियों की बात मानेगी इस बात की संभावना कम ही है.
Wednesday, March 23, 2011
स्टिंग ऑपरेशन की चिरकुटई
जुलाई २००८ में विश्वास मत के बाद की पोस्ट है.
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देश में आजकल दो ही बातों पर चर्चा हो रही है. एक है अमर सिंह और दूसरा है स्टिंग आपरेशन. पिछले कुछ सालों में स्टिंग आपरेशन इस तरह से फ़ैल चुका है जैसे पहले हैजा और प्लेग जैसी बीमारियाँ फैलती थीं. ऊपर से संसंद में हुए विश्वास प्रस्ताव समारोह ने स्टिंग आपरेशन को एक अलग ऊंचाई प्रदान कर दी है. आज हालत यह है कि कबाड़ चुनते-चुनते अगर किसी कबाड़ी को कोई सीडी मिल जाती है तो वह उस सीडी को धो-पोंछ कर डीवीडी प्लेयर पर चढ़ा लेता है. इस आशा के साथ कि अगर सीडी में किसी नेता का स्टिंग आपरेशन स्टोर्ड होगा तो सीडी को किसी न्यूज चैनल को बेंचकर कुछ पैसा कमाया जा सकता है.
कल सुदर्शन से बात हो रही थी. सुदर्शन ने कहा; "अरे सर, ये उमा भारती तो फंस गई. उन्होंने जिस सीडी का उदघाटन इतने ताम-झाम के साथ किया उसमें तो पोस्टर दिखने की वजह से सब गड़बड़ हो गया."
मेरे मुंह से निकला; "कोई बात नहीं. उस पोस्टर को दीवार से हटाकर फिर से शूटिंग कर लेंगे ये लोग."
मेरी बात सुनकर सुदर्शन हंसने लगा. लेकिन मुझे लगा कि ये भी अजीब बात है. कितना सरल हो गया है 'स्टिंग आपरेशन' करना. फिर मन में आया कि अगर आज से कुछ सालों बाद रि-डिस्कवरी चैनल पर अगर भारत में स्टिंग आपरेशन के इतिहास पर एक डाक्यूमेंट्री दिखाई जायेगी तो कैसे होगी? शायद कुछ ऐसी;
भारत में स्टिंग आपरेशन का इतिहास पुराना है. स्टिंग आपरेशन के पुरातन होने की पुष्टि इस बात से होती है कि भागलपुर में हुए आँख-फोडू काण्ड का भेद सबसे पहले स्टिंग आपरेशन के चलते ही खुला था. इसके आलावा इंडियन एक्सप्रेस नामक समाचार पत्र ने एक स्टिंग आपरेशन की मदद से राजस्थान में लगने वाली औरतों की एक मंडी का पर्दाफाश किया था. शुरू में स्टिंग आपरेशन में स्टिल कैमरे और टेप रिकॉर्डर का उपयोग किया जाता था लेकिन बाद में विडियो शूटिंग के प्रयोग की वजह से स्टिंग आपरेशन में एक क्रांतिकारी बदलाव देखने को मिला.
इक्कीसवीं शताब्दी के आरम्भ में तहलका ने स्टिंग आपरेशन के जरिये ढेर सारे क्रिकेट खिलाड़ियों और नेताओं के भ्रष्ट होने के सुबूत इकठ्ठा किए. हथियारों में दलाली की बात हो या फिर क्रिकेट में पैसा लेकर न खेलने का साहसिक कार्य, सबकुछ स्टिंग आपरेशन की मदद से सामने लाये गए. स्टिंग आपरेशन को नई ऊंचाई तब मिली जब तमाम टीवी न्यूज चैनल स्टिंग आपरेशन के धंधे में उतर गए. पैसे लेकर संसद में सवाल पूछने का कार्यक्रम हो या फिर शारीरिक शोषण के जरिये हिन्दी फिल्मों में हिरोइन का रोल दिलाने के वादे, सब स्टिंग आपरेशन करके जनता के सामने लाये गए.
स्टिंग आपरेशन का विकास कुछ इस तरह से हुआ कि इसके जरिये बहुत सारे लोगों को सताने की प्रथा भी चल निकली. हालत यह हो गयी कि जो समाजशास्त्री पहले स्टिंग आपरेशन को इलाज समझते थे, साल २००८ आते-आते उन्ही समाजशास्त्रियों ने स्टिंग आपरेशन को एक बीमारी मानना शुरू कर दिया. साल २००८ में तत्कालीन सरकार द्बारा विश्वास मत प्राप्ति हेतु लेन-देन के मामले को स्टिंग आपरेशन करके सामने लाने की कोशिश हुई.
स्टिंग आपरेशन के फैलते प्रभाव की वजह से बहुत सारी विदेशी कम्पनियों को भारत एक नए बाज़ार के रूप में दिखने लगा. साल २००८ में संसद में विश्वास मत प्राप्ति कार्यक्रम में स्टिंग आपरेशन के रोल ने विदेशी उद्योगपतियों को बहुत प्रभावित किया. वित्त मंत्रालय की एक रिपोर्ट के अनुसार साल २००८ के सितम्बर महीने में विदेशी पूंजी निवेश के कुल अट्ठारह प्रस्ताव आए जिनमें से आठ सीडी निर्माण, तीन स्पाई विडियो कैमरा निर्माण और चार स्टिंग आपरेशन की शिक्षा हेतु कालेज स्थापना के थे. सरकार ने विदेशी पूँजी निवेश के इन प्रस्तावों को बड़े उत्साह के साथ पास कर दिया. साल २०११ तक विदेशी तकनीक को और आगे बढाते हुए भारतीय उद्योगपतियों ने स्टिंग आपरेशन में इस्तेमाल होने वाले उपकरणों में क्रांतिकारी बदलाव किया.
साल २००९ तक लगभग सभी राजनैतिक दलों ने अपने-अपने दल में माईनोरिटी सेल, इकनॉमिक सेल, सोशल जस्टिस सेल की तर्ज पर स्टिंग आपरेशन सेल भी स्थापित किए. इन पार्टियों ने अपने इस सेल में काम करने के लिए उन नेताओं को लगाया जिन्हें स्टिंग आपरेशन में फंसने का गौरव प्राप्त था. इन राजनैतिक पार्टियों का मानना था कि स्टिंग आपरेशन में फंसा हुआ नेता ही ऐसे सेल की अध्यक्षता करने का पर्याप्त अनुभव रखता था. कुछ राजनैतिक दलों ने तो विज्ञापन के जरिये अपने स्टिंग आपरेशन सेल के लिए स्क्रिप्ट राईटर्स और कैमरा मैन की भर्ती भी की.
साल २०१० तक लगभग सारे राजनैतिक दल इस बात बार सहमत हो चुके थे कि स्टिंग आपरेशन की पढाई को देश में हाई स्कूल से अनिवार्य कर दिया जाय. नतीजा यह हुआ कि स्टिंग आपरेशन की पढाई करने वाले छात्रों को सरकार की तरफ़ से वजीफे देने का कार्यक्रम शुरू हुआ. विशेषज्ञों का मानना था कि साल २०२० तक रोजगार के सबसे ज्यादा अवसर स्टिंग अपारेशन की पढाई करने वाले छात्रों के लिए ही उपलब्ध होने वाले थे.
स्टिंग आपरेशन की सफलता ने हिन्दी फ़िल्म उद्योग के पुराने निर्देशकों और पटकथा लेखकों को रोजगार के अवसर दिए. कुछ पुराने निर्देशक जिन्हें कोई काम नहीं था, उन्होंने स्टिंग आपरेशन के निर्देशन में हाथ आजमाया और उनमें से कुछ तो काफी सफल भी हुए. इन लोगों को सबसे ज्यादा रोजगार के अवसर टीवी न्यूज चैनल ने उपलब्ध करवाए.
आज भारत में स्टिंग आपरेशन उद्योग का कारोबार करीब सत्तर हजार करोड़ रूपये तक पहुँच चुका है. भारतीयों द्बारा किए गए स्टिंग आपरेशन की ख्याति दुनियाँ भर में फैली हुई है. यही कारण है कि अमेरिका, यूरोप और दक्षिण पूर्व एशिया के कई देश स्टिंग आपरेशन की आउटसोर्सिंग के लिए भारतीय आपरेटरों पर सबसे ज्यादा विश्वास दिखाते हैं. साल २०४५ तक भारतीय स्टिंग आपरेशन उद्योग का कारोबार बढ़कर एक लाख आठ हज़ार करोड़ रूपये तक पहुँच जाने की संभावना है.
Monday, December 27, 2010
सिंगिंग रिअलिटी-शो ला रा लप्पा ला का फिनाले

मुंबई से एन टी एम एन संवाददाता चंदू चौरसिया
कल मुंबई में हुआ ला रा लप्पा ला नामक सिंगिंग रिअलिटी शो का फायनल तमाम अस्वाभाविक घटनाओं के लिए वर्षों तक याद किया जाएगा. ज़ीहाँ टीवी द्वारा आयोजित इस टैलेंट हंट के फिनाले में शुरुआत ही अच्छी नहीं रही. तब हंगामा मच गया जब महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के कार्यकर्ताओं ने यह कहते हुए बवाल कर दिया कि फिनाले के पहले तक जो हुआ सो हुआ लेकिन फिनाले में प्रतियोगियों को केवल मराठी गीत ही गाना पड़ेगा. इन कार्यकर्ताओं ने अपनी मांग को एक कदम आगे बढ़ाते हुए कहा कि कार्यक्रम को प्रजेंट करने वाले एंकर को भी केवल मराठी में ही अनाऊँसमेंट करना होगा.
तमाम बड़े और गणमान्य व्यक्तियों के हस्तक्षेप के बाद मामला सुलझा और कार्यक्रम की शुरुआत हो सकी.
कार्यक्रम शुरू होने के बाद फिर से तब बवाल शुरू हुआ जब कार्यक्रम में अथिति के रूप में आये अक्षय कुमार अपनी कार से उतरकर पैदल चलते हुए अपनी सीट तक गए. उनके ऐसा करने से निराश तमाम दर्शकों ने यह कहते हुए हंगामा शुरू कर दिया कि उन्हें ठग लिया गया. अपनी बात को स्पष्ट करते हुए इन लोगों ने बताया कि उन्हें आशा थी कि अक्षय कुमार ज़ी उड़ते हुए, कूदते हुए या फिर तार के सहारे आसमान से उतरेंगे और उनके ऐसा नहीं करने की वजह से इन दर्शकों का पैसा वसूल नहीं हुआ.
जहाँ ये दर्शक इस बात से नाराज़ थे वहीँ अक्षय कुमार फैन्स क्लब के महासचिव मिलिंद खेलकर ने यह कहकर सबको चौंका दिया कि अक्षय कुमार का पैदल चलकर अपनी सीट तक आना उनके खिलाफ साजिश है. खेलकर ज़ी ने अपनी बात को स्पष्ट करते हुए बताया कि चैनल ने जानबूझकर अक्षय को स्टेज पर उड़ते हुए नहीं आने दिया. खेलकर ज़ी की बात को उस समय और बल मिला जब अक्षय कुमार के मित्र और प्रोड्यूसर विपुल शाह ने कहा; "अक्षय को पैदल चल कर अपनी सीट तक जाने से बचना चाहिए. पैदल चलना उनकी ईमेज के लिए हानिकारक है. अगर वे ऐसे ही पैदल चलेंगे तो फिर उनके और फिल्म इंडस्ट्री के खानों के बीच कोई अंतर नहीं रह जाएगा और अक्षय के फैन्स कम हो जायेंगे."
विपुल शाह की इस बात को अक्षय कुमार ने गाँठ बांधकर रख ली और उन्होंने फैसला किया कि भविष्य में वे स्टेज पर उड़ते हुए, कूदते हुए या फिर गिरते हुए ही प्रकट होंगे और पैदल चलकर अपनी सीट तक पहुँचने की गलती फिर नहीं करेंगे.
कार्यक्रम आगे बढ़ा और प्रतियोगियों के अलावा उनके मेंटोर्स ने भी गाने गाये.
एक स्पेशल प्रजंटेशन में विख्यात गजल गायक गुलाम अली साहब ने एक ग़ज़ल सुनाई. सबकुछ ठीक चल रहा था. तभी एक और घटना हो गई. जब गुलाम अली साहब ने ग़ज़ल ख़त्म की तभी विख्यात मेंटोर और कुख्यात गायक श्री दलेर मेंहदी ने गुलाम अली साहब से कहा; "रब्ब राखां पुत्तर. चक दे फटे. जिन्दा रह पुत्तर."
उनकी इस बात पर वहाँ उपस्थित लोगों में हडकंप मच गया. सब इस बात से आश्चर्यचकित थे कि प्रतियोगियों के लिए रिजर्व इस लाइन को दलेर मेंहदी ने गुलाम अली के लिए कैसे कह दिया. बाद में तमाम भूतपूर्व गायकों ने दलेर मेंहदी से कहा कि गुलाम अली साहब से माफी मांग लें. पहले तो दलेर मेंहदी ने ऐसा करने से इन्कार कर दिया लेकिन वे बाद में मान गए और उन्होंने गुलाम अली से माफी मांग ली.
ज्ञात हो कि "रब्ब राखां पुत्तर. चक दे फटे" नामक लाइन दलेर मेहंदी के साथ वैसे ही चिपक गई है जैसे देवर्षि नारद के साथ "नारायण नारायण". यह भी ज्ञात हो कि इंटरनेशनल रिअलिटी शोज जजेज युनियन ने दलेर मेहंदी की इस लाइन को वर्ष २०१० की सर्वश्रेष्ठ लाइन घोषित किया है.
कार्यक्रम आगे बढ़ा और सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था. कुछ ही देर बाद महान गायक मीका और महान संगीतकार साजिद में इस बात को लेकर कहा-सुनी हो गई कि हर किसी को सन-ग्लास पहनने का अधिकार नहीं है. जहाँ मीका ज़ी का कहना था कि सन-ग्लास पहनने का अधिकार बप्पी लाहिड़ी ज़ी के अलावा सिर्फ उन्हें है, वहीँ साजिद का मानना था कि वे भी अब इस एक्सक्लूसिव क्लब के मेंबर बन गए हैं. बात हाथ-पाई तक पहुँचती इससे पहले ही कुछ लोगों ने मध्यस्थता करके मामले को सुलझा लिया.
कार्यक्रम के अंत में स्टेज पर उदित नारायण और सुरेश वाडकर को बुलाया गया. वे स्टेज पर आये और उन्हें विनर का नाम बताने का जिम्मा सौंपा गया. बाद में जब एंकर ने यह कहा कि "अब वह घड़ी आ गई है" तभी से उदित नारायण ज़ी ने स्टेज के चारों तरफ देखना शुरू किया. सब यह सोच रहे थे कि वे शायद किसी को खोज रहे हैं. बाद में जब एंकर ने चौथी बार कहा कि "अब वह घड़ी आ गई है" तब उदित नारायण ज़ी से रहा नहीं गया और उन्होंने एंकर को गाली देना शुरू कर दिया.
जब उनसे इसका कारण पूछा गया तो उन्होंने कहा; "चार बार यह सुनने के बाद भी कि अब वह घड़ी आ गई है, मुझे जब स्टेज पर कोई घड़ी दिखाई नहीं दी तो मुझे गुस्सा आ गया."
बाद में लोगों ने उन्हें समझाया कि एंकर जिस घड़ी की बात कर रहा था वह घड़ी कुछ और ही थी.
अंत में विनर का नाम अनाऊँस किया गया. मगर जैसे ही एंकर ने कहा; "और दुनियाँ के पहले सिंगिंग सुपर स्टार हैं जमाल खान" तभी करीब सत्रह अट्ठारह लोगों ने स्टेज पर धावा बोल दिया. उनका कहना था कि दुनियाँ के पहले सिंगिंग सुपर स्टार कुमार सानू हैं. ऐसे में किसी और को दुनियाँ का पहला सिंगिंग सुपर स्टार कैसे कहा जा सकता है? काफी खोजबीन के बाद पता चला कि ये लोग़ महान गायक कुमार सानू के फैन्स थे और यह मानने के लिए तैयार नहीं थे कि
कुमार सानू के जीते ज़ी कोई और सिंगिंग सुपर स्टार हो सकता है.
कुल मिलाकर कार्यक्रम हंगामाखेज रहा. चैनल 'जीहाँ' की तरफ से लोगों से यह वादा किया गया कि अगले वर्ष ऐसी घटनाएं न हों, चैनल इसका ख़याल रखेगा.
नोट: यह पोस्ट मैंने कल न्यूज दैट मैटर्स नॉट के लिए लिखी थी.
Monday, December 13, 2010
चंदू-राडिया संवाद
लगता है टेप्स बनानेवाली कोई कंपनी जल्द ही नीरा राडिया को अपना ब्रांड एम्बेसेडर नियुक्त कर लेगी. दरअसल नीरा ज़ी केवल टेप बनानेवाली ही नहीं बल्कि किसी टेलिकॉम कंपनी द्वारा भी चुनी जा सकती हैं. वैसे कहीं आप यह तो नहीं सोच रहे कि एक पी आर वाली ने अपने पी आर का काम मुझे तो नहीं सौंप दिया? खैर, इससे पहले कि आप ऐसा सोचें, मैं खुद ही बता देता हूँ कि ऐसी बात नहीं है. नीरा ज़ी के आठ सौ और टेप्स के बाहर आने की वजह से मैं ऐसा कह रहा था. वैसे इसका एक और कारण है.
कल अपना चंदू यानि चंदू चौरसिया मेरे पास आया. आकर कुछ देर खड़ा रहा. जब उसने कुछ नहीं कहा तो मुझे ही बात शुरू करनी पड़ी. मैंने कहा; "क्या बात है? कुछ कहना चाहते हो क्या?"
चंदू बोला; "हाँ, लेकिन हिम्मत नहीं हो रही."
मैंने कहा; "मेरे सामने कुछ कहने के लिए हिम्मत की क्या ज़रुरत? जो भी मन में है, बस कह डालो."
वो बोला; "तो सुनिए. इससे पहले कि आपको दूसरों से पता चले मैं खुद ही बता देता हूँ कि नीरा राडिया ज़ी से मेरी भी बात हुई है. ऐसा नहीं है कि केवल वीर, बरखा, इंदरजीत और प्रभु चावला के साथ ही उन्होंने बात की है. दरअसल नए टेप्स में जो बासठ नंबर टेप है और जिसके बारे में आऊटलुक ने यह कहा है कि नीरा के साथ दूसरी तरफ से कौन बात कर रहा है, यह आवाज़ कोई नहीं पहचान सका, दरअसल वह मैं ही हूँ."
मैंने कहा; "क्या बात कर रहे हो? वैसे क्या बातचीत हुई है तुम्हारी नीरा राडिया के साथ?"
वो बोला; "अब ये रहा लिंक. आप खुद ही सुन लीजिये."
मैंने क्लिक करके नीरा और चंदू की बातचीत सुनी. मैं अपने ब्लॉग पर वह बातचीत छाप रहा हूँ. आपलोग़ भी बांचिये.
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किर्र किर्र किर्र किर्र किर्र किर्र किर्र
नीरा : हाय.
चंदू : नमस्ते मैडम.
नीरा : ये हमस्ते हैडम क्यों कह रहे हो?
चंदू : नहीं-नहीं मैंने वह नहीं कहा. मैंने कहा नमस्ते मैडम.
नीरा : हाँ, अब तुम्हारी आवाज़ ठीक से आ रही है.
चंदू : वो आपका फ़ोन आया तो मैं दाल-भात खा रहा है. मुँह में खाना था इसलिए आपको हमस्ते हैडम सुनाई दिया होगा.
नीरा : ही ही ही ..वैसे मैंने बीस मिनट पहले भी फ़ोन किया था. कितनी घंटी बजी लेकिन तुमने उठाया ही नहीं.
चंदू : वो मैडम क्या है कि उस समय चूल्हे पर दाल पक रही थी. उसकी आवाज़ में टेलीफोन की घन्टी सुनाई नहीं दी होगी.
नीरा : क्या बात कर रहे हो? तुम खुद खाना बनाते हो?
चंदू : अरे मैडम मैं ठहरा हिंदी का पत्रकार. मैं वीर भाई की तरह थोड़े न हूँ कि दिल्ली के फाइव स्टार रेस्टोरेंट में घूम घूम कर खाना खाऊं और छ महीने बाद किसी सन्डे को चालीस पेज का एक सप्लिमेंटरी एडिशन निकाल कर उन रेस्टोरेंट की रैंकिंग कर दूँ. खाना का खाना और हाई क्वालिटी जर्नलिज्म अलग से.
नीरा : लेकिन वो भी तो जर्नलिज्म ही है.
चंदू : अब वो कैसा जर्नलिज्म है मैडम, उसपर मेरा मुँह मत खुलवाइये.
नीरा : खैर, मैंने तुमको यह बताने के लिए फ़ोन किया था कि कल रात ढाई बजे मेरी एम एम से बात हुई.
चंदू : क्या मैडम? ये ढाई बजे टाइम है किसी के साथ बात करने का? आपलोग सोते कब हैं?
नीरा : वो सब छोड़ो, और जो मैं कह रही हूँ उसको सुनो. एम एम तुमसे नाराज़ हैं.
चंदू : क्यों नाराज़ हैं मैडम?
नीरा : अरे नाराज़ नहीं होंगे तो क्या होंगे? ये तुमने क्या स्टोरी लिखी है? और स्टोरी का टाइटिल भी कितना गन्दा; "ये गैस किसकी है?" एम एम ने कहा कि द होल स्टोरी वाज स्टिंकिंग..."
चंदू : अब मैडम गैस की बात है स्टोरी में इसलिए उनको स्टिंकिंग लग रही होगी. वैसे वे किस बात से नाराज़ हैं?
नीरा : अरे नाराज़ होनेवाली बात ही है. तुमने लिखा कि..एक मिनट मेरे सामने ही है वो पेज. मैं पढ़कर सुनाती हूँ..हाँ, तुमने लिखा है; "बड़ा भाई इस बात से स्योर था कि गैस उसकी है लेकिन छोटा भाई अचानक दावा करने लगा है कि गैस उसकी है. अब यह गैस किसकी है, यह तो सुप्रीम कोर्ट ही बता पायेगा. लेकिन जिस गैस पर बड़े भाई का अधिकार है उसी गैस पर छोटा भई अपना अधिकार कैसे बता सकता है? अब यहाँ तो बड़ा भाई कह ही सकता है कि छोटा भाई अपनी गैस खुद खोज ले. मेरी समझ में यह नहीं आता कि छोटा भाई अपनी गैस खुद प्रोड्यूस न करके बड़े भाई की गैस के पीछे क्यों पड़ा है?..." और ये क्या है? ये क्या है? जिस तरह से तुमने स्टोरी ख़त्म की है..ये क्या लिखा है तुमने कि; "युद्ध के मैदान में सेनायें आमने-सामने हैं. अब देखनेवाली बात यह है कि युद्ध का शंख बजता है या शांति की मुरली?'' क्या है ये?
चंदू : इसमें गड़बड़ क्या है मैडम?
नीरा : एम एम इस बात से नाराज़ हैं कि तुम अपनी स्टोरी में पेट्रोलियम मिनिस्टर का नाम क्यों ले आये?
चंदू : पेट्रोलियम मिनिस्टर? मैंने तो अपनी स्टोरी में उनका नाम ही नहीं लिया?
नीरा : तो वो क्या है? वो मुरली?
चंदू : अरे मैडम वो मुरली की बात पर कन्फ्यूज मत होइए. वो तो उपमा अलंकार का प्रयोग है रिपोर्टिंग में.
नीरा : ये उपमा अलंकार क्या लफड़ा है?
चंदू : अब मैडम हम हिन्दी वालों की यही समस्या है. हम कैरीड-अवे हो कर पत्रकारिता में भी साहित्य रचने लगते हैं. दरअसल मैडम हिंदी का लेखक हो या पत्रकार वो बेसिकली फिलोस्फर होता है. न्यूज आर्टिकिल लिखते-लिखते कब उसके कलम से दर्शनशास्त्र का झरना फूट पड़े कोई कह नहीं सकता. खैर, यह सब जाने दीजिये. आप कहें तो मैं कल ही एक क्लेरिफिकेशन पब्लिश कर दूंगा कि मुरली शब्द का इस्तेमाल पेट्रोलियम मिनिस्टर के लिए नहीं है. आगे बोलिए.
नीरा : आगे क्या बोलूँ? वो मैंने तुमसे कहा था टूज़ी पर एक स्टोरी लिखने के लिए. उसमें भी तुमने ये क्या कर डाला? मैंने तुमसे टूजी पर लिखने को कहा और तुमने टाइटिल दे डाली "टु ज़ी विद लव" और उसमें दिल्ली यूनिवसिटी की उन स्टुडेंट्स का स्टेटमेंट्स छाप दिया जिन्हें राहुल गाँधी और उनके डिम्पल क्यूट लगते हैं और जो उनके साथ शादी करने का सपना देखती हैं. मैंने तुमसे क्या करने को कहा और तुमने क्या कर दिया.
चंदू : अरे ये तो भारी ब्लंडर हो गया. मैंने सोचा कि टूज़ी का मतलब आप चाहती हैं कि मैं बारी-बारी से दोनों गाँधी पर एक-एक स्टोरी कर दूँ. इसीलिए मैंने पहले राहुल गाँधी पर की और सोचा कि मैडम के उप्पर...
नीरा : तुमको पता है न कि उन लोगों का पी आर अकाउंट मैं मैनेज नहीं करती. फिर भी इतनी बड़ी बेवकूफी कर दी तुमने. और हाँ, वो मैंने कहा था कि दादरी पॉवर प्लांट पर स्टोरी लिखो कि वहाँ के किसान अपनी ज़मीन वापस चाहते हैं. ये पॉवर प्लांट नहीं आ सकता अब. और तुमने अभी तक वो स्टोरी नहीं की...
चंदू : अरे मैडम वो स्टोरी मैं कैसे करता? मैं दादरी गया तो वहाँ मैंने देखा कि वहाँ किसान मस्त हैं. उन्हें ज़मीन की कीमत जो मिली है उससे वे मस्त हैं और वही पैसा कमोडिटी मार्केट में लगा रहे हैं और लॉस जनरेट कर रहे हैं. ऊपर से कई किसान कह रहे थे कि अगर प्लांट वाले और ज़मीन ले लेते तो...
नीरा : किसने तुमसे कहा दादरी जाने के लिए? दिल्ली में रहकर स्टोरी लिखी जाती है कि दादरी जाकर? कैसे पत्रकार हो तुम? दिल्ली में रहकर स्टोरी किखने लायक नहीं हो तो जर्नलिज्म में तुम्हारा फ्यूचर कुछ नहीं है.
चंदू : छोड़िये मैडम. हमारी आपकी नहीं पट सकती. वैसे भी अब मैं प्रिंट मीडिया छोड़कर वेब मीडिया में जा रहा हूँ. मेरी एक ब्लॉगर से बात हो गई है. मैं उसको ज्वाइन कर रहा हूँ. ये दलाली करें लायक नहीं हूँ मैं.
नीरा : अरे सुनो तो....
पी पी पी की आवाज़ आ रही थी. टेलीफोन कट हो चुका था.
चंदू ने मेरी तरफ देखा और कुछ नहीं कहा. तुरंत वहाँ से उठ और चल दिया. कह कर गया है कि....
नोट: टेप नंबर सतहत्तर में भी इन्ही दोनों की बातचीत है. उसे छापने पर भी विचार किया जा रहा है:-)
Tuesday, November 30, 2010
टेप-टेप में
टेप्स सार्वजनिक हो गए. कुछ लोगों ने संविधान के हवाले से बताया कि यह किसी इंडिविजुअल की प्राइवेसी पर हमला है. दूसरी तरफ से आवाज़ आई कि इंडिविजुअल अगर देश और उसकी जनता के बारे में बात करे तो वह पब्लिक हो जाता है. टेप्स से ही हमें पता चला कि जिन्हें हम पत्रकार समझते थे वे दरअसल कुछ और ही हैं. क्या हैं, यह सब अपने-अपने हिसाब से तय कर सकते है. जो लोग़ टेप्स में कविता पाठ करते सुने गए हैं वे सफाई दे रहे हैं. कुछ नहीं भी दे रहे.
हमारा काम है कि हम अपने ब्लॉग पत्रकार को भेजकर लोगों की प्रतिक्रिया जानें. यही कारण था कि हमारे ब्लॉग पत्रकार चंदू चौरसिया ज़ी ने लोगों से उनकी प्रतिक्रिया मांगी. आप बांचिये कि लोगों ने क्या कहा;
रॉबर्ट गिब्स, प्रेस सेक्रेटरी ह्वाईट हाउस : "वी आर ऑफ द ओपिनियन दैट इट टेक्स स्पेशल टैलेंट टू सेल समथिंग ऐट थ्री परसेंट ऑफ इट्स रीयल वैल्यू एंड इंडिया हैव डन वैरी वेल ऑन दैट काउंट. हाउ-एवर, वी स्टिल बिलीव दैट इन-स्पाईट ऑफ आल इट्स टैलेंट ऐज विजिबिल इन स्कैम्स, इंडिया हैज अ लॉन्ग वे टु गो टु क्लेम अ पर्मानेंट सीट इन यूनाईटेड नेशंस सिक्यूरिटी काउंसिल. वी ऑल्सो री-टरेट दैट आल दो इंडिया कुड मैनेज टु सेल इट्स नेशनल असेट्स ऐट थ्रो-अवे प्राइसेज, स्टिल पाकिस्तान इज आर नेचुरल अलाई व्हेन इट कम्स टु फाईट टेरोरिज्म. वी आर फार्मुलेटिंग अ न्यू टेरर पालिसी एंड सी इंडिया ऐज अ प्रोमिनेंट प्लेयर....."
अरिंदम चौधरी, डायरेक्टर आई आई पी एम : "राजा शुड हैव काऊँटेड हिज चिकेन्स...सॉरी स्पेकट्रंम्स बिफोर इट्स सेल. बट नाऊ दैट इट्स विजिबिल ही डिड नॉट, आई स्टिल होप दैट ही वुड थिंक बियोंड टूज़ी. मुझे ये लगता है कि अगर राजा एक प्रुडेंट मिनिस्टर की तरह काम करते तो उन्हें टूज़ी के लिए बिड करनेवालों को बीएसएनएल का एक-एक सेल फोन देना चाहिए था. तब झमेला केवल इस बात पर होता कि उसने बिडर्स को सेलफोन क्यों दिया? तब झमेला रेवेन्यू लॉस का न होकर.....बॉस, मैंने इंडिया में पहली बार हर एडमिशन पर एक लैपटॉप देना शुरू किया. वी आर पायनियर इन दिस फील्ड..."
राम बिलास पासवान ज़ी, दलित लीडर : "ई जो टेप आया है, उसको सुनने के बाद एक बार फिर से साबित हो गया कि जे देश में दलित, पिछड़ा, ओ बी सी, आदिवासी और माइनॉरिटी कमुनिटी का कहीं भी सुनवाई नहीं है. एतना टेप जो है रिलीज हुआ लेकिन एक में भी कोई दलित का आवाज़ नहीं है. ई जो है का दर्शाता है? सरकार जो है ऊ खाली पैसावाला सब के लिए......"
अरनब गोस्वामी, मॉडर्न डे रिवोल्यूशनरी : "दोज वेरी पीपुल हू हैड थ्रीटेंड टू स्यू योर चैनल, आर रनिंग फॉर फोर हंड्रेड मीटर्स हरडेल्स...सॉरी सॉरी...इट ऐपीयर्स दैट आई सेड समथिंग इर्रिलिवेंट...यस, ह्वाट आई वांटेड टू से इज दैट आई एम वेरी डिस्अप्वाइंटेड ऐज नन ऑफ दीज टेप्स फीचर्स सुरेश कलमाडी....बट आई वुड लाइक टू अस्योर आल आर व्यूअर्स दैट योर चैनल विल लीव नो स्टोन अनटर्न्ड टिल इट गेट्स टू रूट ऑफ द कॉजेज ऐज टू ह्वाट ट्रांस्पायर्ड नॉन इनक्लूजन ऑफ कलमाडी....."
वॉरेन बफेट, इन्वेस्टर, कैश-होर्डर, फिलेनथ्रोपिस्ट एंड ऐन आलटाइम विनर : "दीज टूज़ी टेप्स ब्रिंग ऐन एंटाइरली न्यू बिजनेस ऐंड इन्वेस्टमेंट आप्च्यूनिटी इन द फील्ड ऑफ कन्वर्शेसन रिकार्डिंग क्विपमेंट्स इन इंडिया...लुकिंग ऐट द नंबर ऑफ स्कैम्स एंड लेवल ऑफ करप्शन, आई एम स्योर इंडिया विल प्रूव टू बी अ ह्यूज मार्केट फ़ॉर दीज इक्विपमेंट्स...अमेरिकन कंपनीज हैव अ ग्रेट आप्च्यूनिटी ऐंड दे शुड स्टार्ट मैन्यूफैक्चरिंग मोर एडवांस्ड इक्विपमेंट्स टू कैटर टू द फ्यूचर डिमांड्स ह्विच मे स्टार्ट पोरिंग इन वंस रिकार्डिंग्स टू प्रॉब थ्रीज़ी टेलिकॉम लाइसेंस....देन फोरज़ी..देन..."
बिनोद शर्मा, डी-फैक्टो स्पोक्सपरसन, कांग्रेस पार्टी एंड पार्ट-टाइम एडिटर हिन्दुस्तान टाइम्स : "जो भी टेप्स अभी तक सामने आये हैं, उनको सुनकर तो यही लगता है कि इन टेप्स की वजह से नरेन्द्र मोदी की ईमेज को गहरा झटका लगा है. कुल एक सौ चार टेप्स में नरेन्द्र मोदी का नाम एक बार भी सुनाई नहीं दिया. जो बीजेपी मोदी को नेशनल लीडर के तौर पर प्रोजेक्ट करना चाहती थी अब वह क्या करेगी? गुजरात दंगों का भूत मोदी का पीछा नहीं छोड़ेगा. मेरा ऐसा मानना है कि कल अगर इस बात पर नीतीश कुमार बीजेपी से अपना पीछा छुड़ा लें तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी. इन टेप्स ने मोदी को उनकी औकात बता दी है...."
शनि महाराज, पार्ट-टाइम ज्योतिषी ऐंड फुल-टाइम मनी लांडरिंग कंसल्टेंट : "जब टेप रिकार्ड किये गए तब शनि मंगल के गृह में बैठा था. और वृहस्पति के ऊपर चन्द्रमा का साया मंडरा रहा था. इसलिए लोगों का फोन टेप हो गया. मेरे पास इसका उपाय है. अगर काली सरसों के सात दाने और लालमिर्च के तीन दाने मिलाकर शनिवार के दिन उसे नमक के पानी में धोकर और उसके बाद उसको पीसकर उस लेप को सेलफोन पर लगा दिया जाय तो फिर बातचीत को कोई टेप नहीं कर सकेगा...."
बरखा दत्त, 'जनरलिस्ट' : "टेप्स से यह बात प्रूव होती है कि जर्नलिज्म बिलकुल आसान काम नहीं है. एक न्यूज के लिए एक जर्नलिस्ट को क्या-क्या नहीं करना पड़ता. यहाँ तक कि पीआर एजेंसी चलानेवाली के साथ फालतू की बकबक करनी पड़ती है. आई टेल यू चंदू, दिस इज नॉट ईजी."
श्री राकेश झुनझुनवाला, इन्वेन्टर ऑफ ट्विटर एंड ओनर ऑफ द बिलियन डॉलर रवींद्र जडेजा फैन्स क्लब : "मुझे लगता है कि अभी तक पूरे टेप्स सामने नहीं आये हैं. सरकार कुछ छिपा रही है. मैंने बहुत खोज की लेकिन मुझे वो टेप नहीं मिला जिसमें अजित अगरकर ने टी-ट्वेंटी वर्ल्डकप से पहले रवींद्र जडेजा को क्रिकेट की कोचिंग दी है. यहाँ तक कि वह टेप भी नहीं मिला जिसमें उदय चोपड़ा और हरमन बवेजा एक कान्फरेन्स लाइन पर डीनो मोरिया को एक्टिंग लेशंस दे रहे हैं. आई टेल यू, देयर आर मोर टू दीज टेप्स देन ह्वाट हैज बीन इन पब्लिक डोमेन सो फार....."
श्री भूरेलाल, डी एस पी, तेजपुर बिहार : "ई तो स्साला होना ही था."
हलकान 'विद्रोही', ग्रेटेस्ट हिंदी ब्लॉगर : "आज समय आ गया है कि देश से भ्रष्टाचार को उखाड़ कर फेंक दिया जाय. यह देश पूरी तरह से देशद्रोहियों के हाथ में चला गया है जो गरीब जनता के हिस्से की रोटी भी खा रहे हैं. आज ज़रुरत है कि हम रोज पोस्ट और कमेन्ट लिखकर इन देशद्रोहियों का असली चेहरा सबसे सामने लायें. अब समाज को एक ही चीज दिशा दे सकती है और वह हिंदी ब्लागिंग. आज मैं पूरे हिंदी ब्लॉग समाज से यह आह्वान करता हूँ कि इतनी पोस्ट लिखी जाए कि बस पोस्ट की गूँज सुनाई दे और भ्रष्टाचार इस देश को छोड़कर हमेशा के लिए चला जाय.
भारतमाता की जय!
दीपांकर गुप्ता, समाजशास्त्री : "आज समय आ गया है कि हम इन टेप्स को सोसियो-पोलिटिकल-एकॉनोमिकल ऐंगेल से देखें. जितने भी टेप्स बाहर आये हैं उनमें से एक को भी सुनकर नहीं लगता कि हमारा समाज अभी भी पूरी तरह से इन्क्लूसिव ग्रोथ वाला समाज बन सका है. इन टेप्स में 'वीकर सेक्शन ऑफ द सोसाइटी' का रिप्रजेंटेशन नहीं है. हालाँकि प्रजेंट डे गवर्नमेंट ने काफी कोशिश की है जिससे इन्क्ल्यूसिव ग्रोथ को बढ़ावा दिया है जैसे नरेगा और लोन माफी कार्यक्रम चलाकर इस सरकार ने यह इन्स्योर किया कि पैसे का डिस्ट्रीब्यूशन कहीं न कहीं एमपी और एमएलए के अलावा रुरल लेवल पर ठेकेदारों तक भी पहुंचे. इसके अलावा सरकार ने और भी बहुत कुछ किया है लेकिन वह काफी नहीं है. इन्क्ल्यूसिव ग्रोथ का जो आईडिया है उसे और आगे ले जाने की ज़रुरत है. मेरा ऐसा माना है कि......"
जगन मोहन रेड्डी, राइजिंग सन एंड वाईजिंग पोलिटिसियन : "देयर वेयर येस्पेक्कुलेसन दैट याफ्टर दीज टेप्स यार आउट, अई वुड नॉट रिजाइन. आई हैव प्रूव्ड येवेरीबडी रॉंग येंड जस्ट रिजइन्ड ."
चंदू ज़ी ने तो और लोगों के बयान इकट्ठे किये थे लेकिन टाइप करते-करते हाथ दुःख रहे हैं. आप इतना बांचिये. जैसे सरकार ने और भी टेप्स को सार्वजनिक करने का वादा किया है वैसे ही मैं भी बाकी के बयान बाद में छाप दूंगा.
अगर पब्लिक डिमांड हुई तो.

