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Friday, April 26, 2013

फ़िल्मी प्रेम-प्रसंग में दिल ..




तमाम चीजें समाज का दर्पण होती हैं। किस काल में कौन सी चीज समाज का दर्पण हो, यह उस काल के समाज पर निर्भर करता है। प्राइमरी या मिडिल स्कूल के विद्यार्थी के लिए पहले साहित्य समाज का दर्पण होता था। अब नहीं है। साहित्यकार, आलोचक और प्रकाशक की तिकड़ी की भूमिका ने रहने नहीं दिया। कालांतर में समाज को और लोगों ने दर्पण दिया। एक तरफ सिनेमा वालों ने दिया तो दूसरी तरफ राजनीति वालों ने भी अपनी औकात के अनुसार समाज को दर्पण प्रदान किया। आगे चलकर क्रिकेट वालों ने भी इस दर्पण दान में अपनी भूमिका निभाई। उनके बाद तमाम माध्यम भी पीछे नहीं रहे।

पिछले कुछ वर्षों से अब यह काम हिंदी सिनेमा के गानों ने वापस अपने हाथ में ले लिया है। वे हर एक-दो महीनों में समाज को दर्पण थमाते रहते हैं। समाज इन गानों में अपनी छवि देखकर मस्त रहता है। आज से साठ-सत्तर वर्ष बाद अगर कोई शोध करने वाला इस विषय पर शोध करेगा तो बड़ी तन्मयता के साथ हमारे काल के गानों को आगे रखकर सिद्ध कर देगा कि इस काल का समाज कैसा था।

प्रेम में दिल के महत्व जैसे विषय पर काम करने वाले शोधार्थी के पास गानों की कमी कभी नहीं रहेगी।

जैसे नब्बे के दशक के गाने; "धीरे-धीरे आप मेरे दिल के मेहमां हो गए, पहले जान, फिर जान-ए-जान, फिर जान-ए-जाना हो गए" की चीर-फाड़ करते हुए लिखेगा; "इस गीत के बोल से साबित होता है कि इस काल का नायक अपनी नायिका को एकदम से दिल का मेहमां नहीं बनने देता था। वह इस काम को धीरे-धीरे करने में विश्वास रखता था। वह नायिका को पहले जान बनाता था, फिर जान-ए-जान और अंतिम स्टेप में ही जान-ए-जाना बनने देता था। इस काल का नायक 'लउ' एट फर्स्ट साईट में विश्वास नहीं रखता था। इस गीत से यह प्रमाण भी मिलता है कि प्रेम के तमाम चरणों में नायिका के लिए जान-ए-जाना सबसे महत्वपूर्ण पदवी होती थी। कुछ समाजशास्त्रियों का ऐसा मानना है कि इस काल का नायक चूंकि ज्यादातर नौकरीशुदा होता था इसलिए वह कंपनियों के एच आर डिपार्टमेंट द्वारा प्रतिपादित तरक्की के सिद्धांतों में विश्वास रखता था। कुछ एच आर एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर इस गाने के बोल को एक नौकरीशुदा इंसान के नौकरी में लगने से लेकर उसके प्रमोशन से तुलना की जाय तो जान की तुलना अप्वाइंटमेंट, जान-ए-जान होने की तुलना नौकरी के परमानेंट होने और जान-ए-जाना होने की तुलना असिस्टेंट मैनेजर बनने से की जा सकती है।

इस गीत की अपनी चीर-फाड़ को सही ठहराने के लिए वह उसी काल के गीत; "आँखों में बसे हो तुम, तुम्हें दिल में बसा लूंगा ...." का भी सहारा ले सकता है। वह आगे लिख सकता है; "इस गीत से इसे गाने वाले नायक के भी नौकरीशुदा होने के प्रमाण मिलते हैं। इस गीत में नायक अपनी नायिका को सूचना देते हुए बता रहा है कि नायिका फिलहाल आँखों में ही बसी है और दिल में बसने के लिए उसका प्रमोशन होना ज़रूरी है। वह कहना चाहता है कि नायिका एकदम से दिल में नहीं बस सकती। कि नायक की एच आर पॉलिसी के अनुसार नायिका का आँखों में बसी है याने उसे अभी केवल अप्वाइंटमेंट लेटर मिला है और कुछ महीनों बाद जब उसका अप्रेजल होगा और तब अगर नायक संतुष्ट हुआ तभी वह नायिका को दिल में बसने देगा।"

नायक और नायिका के गुणों में अंतर बताते समय शोधार्थी यह भी साबित कर सकता है कि नायिका चूंकि नौकरीशुदा कम ही होती थी इसलिए वह नायक फट से दिल में बसा लेती थी। अपनी इस थ्योरी के समर्थन में वह "दिल में तुझे बसा के, कर लूंगी मैं बंद आँखें ..." जैसे गीत का सहारा ले सकता है। वह यह साबित कर सकता है कि नायक ज्यादातर प्रेम में घुटे हुए रहते थे लिहाजा जहाँ नायिका अपने नायक को फट से दिल में बसाकर आँखें बंद कर लेती थी, वहीँ नायक पहले नायिका को आँखों में बसाता था और पूरी तरह से देखने परखने के बाद ही दिल में बसने देता था। "पल-पल दिल के पास तुम रहती हो" नामक गाने के बोल से साबित कर सकता है कि दिल में बसने से पहले नायक अपनी नायिका को दिल के पास बसाता था। नायक का यह स्वभाव उनदिनों उसके प्रेम में सावधानी बरतने की बात को पुख्ता करता है। इससे यह साबित होता है कि नायक लोग प्रेम में सावधानी रखते थे।

प्रेम में लिप्त नायक के जीवन में दिल का क्या महत्व रहता था इसबात पर प्रकाश डालते हुए शोधार्थी लिख सकता है; "प्रेम में गिरे नायक के दिल में झरोखा भी रहता था जिसमें वह यदाकदा नायिका को बिठाता था। प्रसिद्द गीत दिल के झरोखे में तुझको बिठाकर यादों को तेरी मैं दुल्हन बनाकर रखूँगा मैं दिल के पास ....गीत से यह प्रमाण मिलता है कि प्रेम में असफल नायक जब सत्य से समझौता कर लेता था तब वह नायिका को अपने दिल से निकाल कर दिल के झरोखे में बिठा देता था और नायिका को दुल्हन न बना पाने की स्थिति में उसकी यादों को ही दुल्हन बनाकर संतुष्ट हो लेता था। संतोषगति प्राप्त नायक के पास और कोई चारा नहीं होता था इसलिए वह नायिका को सूचना देते हुए बताता था कि नायिका को उदास होने की ज़रुरत नहीं है क्योंकि वह दुल्हन न बन सकी तो क्या हुआ, उसकी यादें तो नायक की दुल्हन बन ही सकती हैं।"

प्रेम में दिल के महत्व को समझाते हुए शोधार्थी लिख सकता है कि ; "दिल का हाल सुने दिलवाला ..." नामक गीत से इसबात का प्रमाण मिलता है कि उनदिनों हर दिल का कोई न कोई हाल होता था जिसको कोई दिलवाला ही सुनता था। अगर कोई किसी के दिल का हाल नहीं सुनता तो यह साबित हो जाता था कि हाल सुनाने वाले के पास तो दिल है लेकिन उसे न सुनने वाले के पास दिल नहीं है। वह आगे लिख सकता है; "हालांकि, इसबात का रिकॉर्ड नहीं मिलता कि बिना दिलवाले जिन्दा कैसे रहते थे? किसी वैज्ञानिक ने इसबात पर रिसर्च नहीं किया कि दिल का हाल न सुनने वाले दिलहीन इंसानों के शरीर में खून की आवाजाही कैसे होती थी?"

एक प्रश्न कि ; "जीवन में दिल ज्यादा महत्वपूर्ण है या जान?" पर शोधार्थी लिख सकता है; "तमाम गीतों की चीरफाड़ करने पर यह पता चला है कि प्रेम-प्रसंग में जान दिल से ज्यादा महत्वपूर्ण होती है। फिल्म उमराव जान के गीत 'दिल चीज़ क्या है आप मेरी जान लीजिये ..' से यह बात साबित हो जाती है कि उनदिनों जान की कीमत दिल से ज्यादा होती थी। हाँ, यह मानना पड़ेगा कि हालाँकि जान दिल से कीमती होती थी लेकिन प्रेम में पागल नायिका वह भी देने के लिए तैयार रहती थी और उसके के लिए भी उसकी बहुत छोटी सी शर्त रहती थी। शर्त यह कि नायक बस एक बार उसका कहा मान ले तो उसे जान देने में कोई गुरेज़ नहीं है। इससे इस बात के प्रमाण भी मिलते हैं कि नायक लोग नायिकाओं की बड़ी मुश्किल से मानते थे। नब्बे के दशक के एक और गीत 'दिल क्या चीज़ है जानम अपनी जान तेरे नाम करता है ..' से भी यह बात साबित होती है कि प्रेम में लिप्त नायक जान के आगे दिल को कुछ नहीं समझता था और अपनी जान नायिका के नाम करने के लिए तत्पर रहता था। एक और गीत दिल, नज़र, जिगर क्या है, मैं तो तेरे लिए जान भी दे दूँ ...गीत से यह साबित होता है कि जान केवल दिल से ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं थी बल्कि नज़र और जिगर से भी ज्यादा महत्वपूर्ण होती थी और श्रेष्ठ प्रेम में जान देने को भी सबसे ऊंचा दर्ज दिया गया है।

नब्बे के दशक के ही एक और गीत 'मुझे नींद न आये मुझे चैन न आये, कोई जाए जरा ढूंढ के लाये न जाने कहाँ दिल खो गया , न जाने कहाँ दिल खो गया ..' को आगे रखकर शोधार्थी लिख सकता है; "इस गीत से नायक-नायिका के यदाकदा दिल खोने का प्रमाण मिलता है। साथ ही यह भी पता चलता है कि दिल खोने के बाद ये लोग पुलिस में रपट लिखाने की बजाय गाना गाते थे। इससे यह साबित हो जाता है कि भारतीय नायक या नायिका को जब नींद नहीं आती थी तो उन्हें फट से पता चल जाता था कि यह इनसोम्निया की समस्या नहीं है बल्कि ऐसा दिल खोने के कारण हुआ है। नीद या चैन न आने के बावजूद वे कभी डॉक्टर के पास नहीं जाते थे। उन्हें विश्वास रहता था कि दिल खो जाने की वजह से उपजी ऐसी स्थित में न तो डॉक्टर के पास जाने की जरूरत है न पुलिस के पास जाने की। इस समस्या को गाना गाकर सॉल्व किया जा सकता है क्योंकि गाने में ' कोई जाए जरा ढूंढ के लाये ' कहने से कोई न कोई दिल ढूंढ कर ला देगा और नींद न आने की समस्या सुलझ जायेगी।"

प्रेम-प्रसंग में दिल के महत्व की और जांच-पड़ताल करके शोधार्थी लिख सकता है; "शोध से हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि उनदिनों दिल दिए और लिए तो जाते ही थे, वे तोड़े भी जाते थे। एक प्रसिद्द गीत 'दिल के टुकड़े-टुकड़े करके मुस्कुराते चल दिए ...' से हम इस निष्कर्ष पर पहुँच सके। यह बात अलग है कि किसी ने इस बात पर कोई शोध नहीं किया कि दिल टूटने के बाद कैसी आवाज़ सुनाई देती थी? कई गीतों से ऐसे प्रमाण मिलते हैं कि अक्सर दिल टूटने का इलज़ाम नायिका के ऊपर मढ़ दिया जाता था लेकिन कुछ ऐसे केस भी हुए जब नायक ने खुद ही अपना दिल तोड़ लिया हो। जैसे एक गीत 'जिस दिल में बसा था प्यार तेरा उस दिल को कभी का तोड़ दिया ...' से यह पता चलता है कि कभी-कभी नायक खुद ही अपना दिल तोड़ लिया करता था। वैसे टूटने के बाद दिल के टुकड़े कैसे दिखाई देते थे इसबात पर कहीं कोई दस्तावेज़ नहीं मिलता। 'दिल ऐसा किसी ने मेरा तोड़ा बरबादी की तरफ ....' नामक गीत से यह प्रमाण मिलता है कि दिल टूट जाने के बाद आबादी की तरफ चलते रहने वाले नायक बर्बादी की तरफ मुड़ जाता था और अपना सत्यानाश कर लेता था।"

"दिल केवल टूटते ही नहीं थे, वे गाने भी गाते थे। 'हर दिल जो प्यार करेगा, वो गाना गायेगा ..' जैसे गीत से इसबात का पता चलता है कि केवल नायक प्यार नहीं करता था। किसी-किसी केस में दिल भी प्यार कर बैठता था और हर वो दिल जो प्यार कर बैठता था वह गाना भी गाता था। यह बात अलग है कि दिल के गाये गाने कैसे होते थे इस बात की कहीं चर्चा नहीं हुई है। इतिहास में कहीं इस बात का उल्लेख नहीं है कि मोहम्मद रफ़ी, लता मंगेशकर वगैरह अच्छा गाते थे या फिर दिल। वैसे कुछ फ़िल्मी इतिहास्यकारों का मानना है कि वैसे तो उन्होंने दिल को गाते हुए कभी नहीं सुना लेकिन उन्हें पूरा विश्वास है कि साबुत दिल की तो छोडें, टूटा हुआ दिल भी किसी अनु मालिक, शब्बीर कुमार, मोहम्मद अज़ीज़ या कुमार सानू से अच्छा गाता होगा। इतिहास्यकारों के इस निष्कर्ष पर पहुँचने से ऐसे गायकों के गायिकी के स्टार की बात भी सामने आती हैं। उनदिनों दिल गा सकता था या उससे आवाज़ आती थी, इसबात का प्रमाण 'दिल की आवाज़ भी सुन, मेरे फ़साने पे न जा ...' नामक गीत से मिलता है। नायक नायिका से नायिका नायक से अक्सर रिक्वेस्ट करते थे कि दोनों अपने माँ-बाप की बात सुनने की बजाय दिल की आवाज़ सुने तो प्रेम की वैतरणी पार करने में आसानी रहेगी।"

जहाँ दिल के गाने की बात साबित होती है वहीँ दिल के शायर होने की बात का भी पता चलता है। दिल आज शायर है, गम आज नगमा है ..गीत से पता चलता है कि दिल के अन्दर गाने का तो टैलेंट होता ही है, वह चाहे तो शायरी भी कर सकता है और गम को नगमों में परिवर्तित कर प्रेम में अपना योगदान दे सकता है।

कहीं-कहीं दिल के मंदिर होने की बात भी सामने आती हैं। जैसे 'दिल एक मंदिर है, प्यार की इसमें होती है पूजा, ये प्रीतम का घर है ...' गीत से ऐसा प्रतीत होता है कि नायिका का दिल के मंदिर होने में प्रगाढ़ विश्वास है। इसके पहले कि किसी के मन में यह प्रश्न उठे कि; अगर दिल मंदिर है तो उसमें कौन से भगवान् विराजमान हैं?; नायिका खुद ही गीत के आगे की पंक्तियों के माध्यम से इस बात का खुलासा कर देती है कि इस मंदिर में प्यार की पूजा होती है। दिल रुपी मंदिर अन्य मंदिरों से इस मामले में अलग है कि प्यार की पूजा में फूल, दीपक, घी, अगरबत्ती वगैरह के प्रयोग की ज़रुरत नहीं पड़ती। कुछ इतिहास्यकारों ने प्रीतम की पूजा की बात करके यह साबित करने की कोशिश की थी कि नायिका इस गीत के माध्यम से संगीतकार प्रीतम की पूजा करने की बात कर रही है लेकिन इस थ्योरी को यह प्रमाण देकर मार गिराया गया कि संगीतकार प्रीतम का जन्म उस समय नहीं हुआ था जब नायिका ने यह गीत गाय था।

दिल केवल टूटते नहीं थे। कुछ गीतों से पता चलता है कि दिल कहीं भी आ जा सकते थे। जैसे ऐ मेरे दिल कहीं और चल ...गीत से पता चलता है कि नायक जब कभी भी किसी एक जगह से बोर-सोर हो जाता था तो दिल को सजेस्ट करता था कि वह कहीं और चले। वह कहीं और चलेगा तभी नायक को भी उसके साथ नई जगह जाने का मौका मिलेगा और उसकी बोरियत दूर हो सकेगी। इस गीत में नायक दिल को उकसाते हुए उससे कहता है कि वह न सिर्फ कहीं और चले बल्कि कोई नया घर भी ढूंढ ले। कुछ इतिहास्यकारों का मानना है कि शायद नायक वन रूम किचेन में रहकर बोरियतगति को प्राप्त हो गया था और उससे निकलने का यही तरीका था कि वह दिल को उकसाए ताकि वह न सिर्फ खुद कोई नया घर ढूंढें बल्कि नायक को भी उपलब्ध करवाए। वैसे इतिहास्यकारों का एक ग्रुप यह भी मानता है कि नायक ऐसा करके दिल की मदद कर रहा था क्योंकि उसने अपने लिए गम की दुनियां का चुनाव तो कर लिया था लेकिन कालांतर में गम की उसी दुनियां से उसका दिल भर गया था। कुछ वैज्ञानिक ऐसा मानते हैं कि भरा हुआ दिल भारी होता है लिहाज भारी दिल के कहीं और जाने की बात वैज्ञानिक दृष्टिकोण से तर्कसंगत नहीं जान पड़ती।

टूटने और आने-जाने के अलावा दिल जलते भी थे। नायक द्वारा गाये गीत; 'दिल जलता है तो जलने दो ...' से यह बात सामने आती है कि नायक को इस बात से कोई गुरेज नहीं होता था कि उसका दिल जल रहा है? उसे इस बात की चिंता नहीं थी कि अगर अगर दिल जलने लगा तो हो सकता है आग उसके कुर्ते में भी लग जायेगी और कहीं उसको बीच बाज़ार सबसे सामने कुर्ता उतार फेंकना न पड़ जाए। कुछ इतिहास्यकारों ने इस गीत के बारे में अनुमान लगते हुए लिखा है कि शायद नायक के मित्र ने उसके दिल को जलते हुए देखा होगा और जब उसने बताया कि नायक का दिल जल रहा है तो बिंदास नायक ने उसको दो टूक कह दिया कि दिल जलता है तो जलने दो। ऐसे नायक को कालांतर में लोगों ने दिलजला कहकर पुकारना शुरू किया। इस गीत से प्रेरित होकर तमाम नायक खुद को दिलजले कहलाना पसंद करने लगे थे।

दिल में किसी के लिए प्यार-स्यार तो रहने की बात आम थी लेकिन आश्चर्य की बात यह कि कभी-कभी नायक के दिल में भंवरा भी रहता था। जैसे गीत 'दिल का भंवर करे पुकार, प्यार का राग सुनो, प्यार का राग सुनो रे ...' से प्रमाण मिलता है कि नायक के दिल में भंवरा रहता था और वह केवल प्यार का राग गाता था। उसे मालकौस, भीमपलासी, मल्हार वगैरह गाने में जरा भी दिलचस्पी नहीं थी। दिल में रहने वाला भंवर जब भी गाता प्यार का राग ही गाता था और नायक नायिका से कहता था कि वह प्यार का राग ही सुने और बाकी के रागों को अनसुना कर दे।

हो सकता है शोधार्थी आखिर में अपना शोधपत्र यह लिखते हुए खत्म करे कि ; "कालांतर में परिवर्तन ऐसा हुआ कि पहले के दिनों में दिल में रहने वाले नायक-नायिका को बाद में दिल में जगह नहीं मिल पाती थी। यही कारण है कि बाद के दिनों में नायिका ने इस बात से समझौता कर लिया कि नायक के दिल में जगह की कमी है। ऐसी स्थिति में उसे लगा कि चूंकि अन्दर बसना ईजी नहीं रहा इसलिए अगर नायक मुझे दिल में बसाने की जगह मेरी फोटो ही अपने सीने से लगा ले तो भी बहुत बड़ी बात होगी। ऐसे में उसने गाना शुरू किया; 'मेरे फोटो को सीने से यार चिपका ले सैयां फेविकोल से ....मैं तो कब से हूँ रेडी-तैयार पटा ले सैयां मिस्ड काल से ..." इस गीत से यह साबित होता है कि पहले नायक के दिल में बसने वाली और अपने दिल को मंदिर माननेवाली नायिका अब दिल कॉन्सस होने के बाजे ब्रांड कॉन्सस हो चुकी थी। वह अब इस बात से ही संतोष कर लेती थी कि नायक उसे दिल में बसाने की बजाय उसके फोटो को ही सीने से चिपका ले तो भी बहुत बड़ी बात होगी। हाँ, वह ब्रांड कॉन्सस ऐसी है कि किसी भी लोकल अढ़ेसिव ब्रांड से अपनी फोटो नहीं चिपकने देगी बल्कि यह साफ़ बता देना चाहती है कि अढ़ेसिव की बात पर केवल फेविकॉल ही .............................................................

Thursday, April 7, 2011

रेडियो गाता रहा...




जानकार लोग बताते हैं कि साहित्य समाज का दर्पण होता है. साहित्य रुपी इस दर्पण में समाज अपनी तस्वीर देख सकता था लेकिन सच्चाई यह है कि कभी देखा नहीं. तस्वीर में ख़ुद को देखकर तकलीफ होती होगी इसीलिए साहित्य को समाज ने देखना ही बंद कर दिया. साहित्यकार कहते रह गए कि; "हम दर्पण लाये हैं, देख लो" लेकिन समाज कहाँ सुनने वाला? उसे मालूम था कि दिनों-दिन उसका चेहरा ख़तम होता जा रहा है. ऐसे में देखना उचित नहीं रहेगा. डर जाने का चांस रहता था.

उन दिनों के दर्पण भी ऐसे थे कि झूठ बोलना नहीं जानते थे. समाज को भी मालूम था कि ये विकट ईमानदार दर्पण हैं, झूठ नहीं बोलते. असली कांच के बने थे. पीछे में सॉलिड सिल्वर कोटिंग. ऐसे में इसे देखेंगे तो तकलीफ नामक बुखार के शिकार हो जायेंगे. साहित्यकार भी ढिंढोरा पीटते रह गए. वे ख़ुद ईमानदार भी थे. समाज को लगा कि ईमानदार साहित्यकार का दर्पण मिलावटी नहीं होगा. ऐसे में इस दर्पण को घूस देकर हम इससे झूठ नहीं बुलवा सकते. ऐसे में ये दर्पण तो हमें सुंदर दिखाने से रहा. हटाओ, क्या मिलेगा देखने से? कौन अपना ख़तम होता चेहरा देखना चाहेगा? दर्पण की बिक्री बंद. साहित्य का साढ़े बारह बज गया.

वैसे साहित्य समाज का दर्पण है, यह बात पहले के जानकार बताते थे. बाद के जानकारों ने बताया कि अब भारत आगे निकल चुका है. अब सिनेमा समाज का दर्पण है. इतिहास गवाह है कि हर थ्योरी की काट भी पेश की जाती है. काट पेश न की जाए तो इतिहास का निर्माण नहीं हो सकेगा. इसी बात को ध्यान में रखकर बड़े ज्ञानियों और जानकारों ने बताया कि सिनेमा समाज का नहीं बल्कि समाज सिनेमा का दर्पण होता है. विकट कन्फ्यूजन.

जानकारों का काम ही है कन्फ्यूजन बनाए रखना.

बाद में सिनेमा के गानों को समाज का दर्पण बनाने की कवायद शुरू हुई. मनोरंजन का साधन? आकाशवाणी. बिनाका गीतमाला. रात को खाना मिले या न मिले, रेडियो लेकर तकिया के पास ज़रूर रख सकते हो. इसलिए रख लो, मनोरंजन होता रहेगा.

रेडियो चालू हुआ और इधर खटिया पर आकर जानकार जी बैठ गए. देश में भ्रष्टाचार की बात शुरू ही होती कि तीन हफ्ते से तीसरे पायदान पर बैठा गाना बज उठता; "मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे-मोती. मेरे देश की धरती."

सुनने वाला भौचक्का! सोचता; "देश की धरती इतना सोना और हीरा-मोती उगल रही है तो वो जा कहाँ रहा है?"

लेकिन किससे करे ये सवाल? अब ऐसे में कोई बुद्धिजीवी और जानकार टाइप आदमी आ जावे तो उससे पूछ लेता; " अच्छा ई बताओ, ये देश की धरती इतना सोना, हीरा वगैरह उगल रही है तो ये कहाँ जा रहा है?"

जानकार के पास कोई जवाब नहीं. कुछ देर सोचने की एक्टिंग करता होगा और बिना किसी निष्कर्ष पर पहुंचे कह देता होगा; "अरे सोना, हीरा वगैरह उगल रही है, यही क्या कम है? तुमको इस बात से क्या लेना-देना कि किसके पास जा रहा है. तुम तो यही सोचकर खुश रहो कि उगल रही है. आज जाने दो जिसके पास जा रहा है. कल तुम्हारा नंबर भी आएगा. रहीम ने ख़ुद कहा है कि; रहिमन चुप हो बैठिये देख दिनन के फेर...."

सवाल को दफना दिया? नहीं. डाऊट करने वाले इतनी जल्दी हार नहीं मानते. अगला सवाल दाग देता होगा; "अच्छा, ये गेंहूं की बड़ी किल्लत है. अमेरिका से जो गेहूं आया है, वो खाने लायक नहीं है. क्या होगा देश का?"

जानकार कुछ कहने की स्थिति में आने की कोशिश शुरू ही करता होगा कि रेडियो में दूसरे पायदान का गाना बज उठता होगा; 'मेरे देश में पवन चले पुरवाई...हो मेरे देश में.'

जानकार को सहारा मिल जाता होगा; "ले भैये गेहूं की चिंता छोड़ और इस बात से खुश हो जा कि तेरे देश में पुरवाई पवन चलती है. बाकी के देशों में पछुआ हवा धूम मचाती है. वे साले निकम्मे हैं. भ्रष्टाचारी हैं. पश्चिमी सभ्यता वाले. देख कि हम कितने भाग्यवान हैं जो हमारे देश में पुरवाई पवन चलती है. ये गेंहूं की चिंता छोड़ और इस पुरवाई पवन से काम चला. इसी को खा जा."

डाऊट करने वाले के पास एक और सवाल है. पूछना चाहता होगा कि लोगों के रहने के लिए मकान नहीं है. सरकार कुछ कर दे तो मकान मिल जाए. सोच रहा है कि बुद्धिजीवी ज़ी से ये बात पूछे कि नहीं? अभी सोच ही रहा है कि रेडियो का रंगारंग कार्यक्रम चालू हो गया. गाना सुनाई दिया; 'जहाँ डाल-डाल पर सोने की चिड़िया करती है बसेरा, वो भारत देश है मेरा...' वगैरह-वगैरह.

डाऊट करने वाला हतप्रभ. मन में सवाल पूछ रहा है कि गुरु भारत देश में चिड़िया डाल-डाल पर बसेरा करती है. और बाकी के देशों में? वहां क्या चिड़िया के रहने के लिए दस मंजिला इमारत होती है?

ये वे दिन थे जब भ्रष्टाचार अपनी जड़ें जमा रहा था. लेकिन देशवासी गाने सुनकर खुश थे. देश में पवन पुरवाई चलती थी और देश की धरती सोना वगैरह उगल रही थी. किसी को नहीं मालूम कि उगला हुआ इतना सोना वगैरह कौन दिशा में गमनरत है?

कोई अगर किसी दिशा की तरफ़ तर्जनी दिखा देता तो चार बोल उठते; "छि छि. ऐसा सोचा भी कैसे तुमने? जिस दिशा को तुमने इंगित किया है, उस दिशा में सारे ईमानदार लोगों के घर हैं. उनकी गिनती तो बड़े त्यागियों में होती है. तुम्हें शर्म नहीं आती ऐसे त्यागियों को इस तरह से बदनाम करते? देशद्रोही कहीं के."

यह नहीं देखा कि त्यागियों ने भवन देकर देश ही हथिया लिया.

उसी समय रेडियो पर बज उठता होगा; 'है प्रीत जहाँ की रीत सदा, मैं गीत वहां के गाता हूँ.........'

ऐसे ही रेडियो गाता रहा और हम ..........आज भी गा रहा है. फर्क सिर्फ इतना कि आज आई पी एल के स्कोर बताता है.

Tuesday, July 6, 2010

फिल्म रावण से परेशान इन्द्र की अप्सराएँ




मणि सर, कैमरा से एक्टिंग करवा के कितने दिन फिल्म बनायेंगे?
एक मल्टीप्लेक्स में नाइट शो देखकर देवराज इन्द्र की अप्सराएं आकाशमार्ग से जा रही हैं. देखने से लग रहा है जैसे कुछ दुखी हैं. ये जब पिछले साल आई थीं तो अर्थव्यवस्था की मंदी को लेकर चिंतित थीं. आइये सुनते हैं इसबार ये क्या कह रही हैं?

सहजन्या

देवराज को विदित है हमसब धरती पर आई थी
फिल्म देखने की उत्कंठा दस दिन से छाई थी
किन्तु उन्हें क्या पता कि कैसा धोखा खाया हमने
मुद्रा और समय का अपव्यय कर क्या पाया हमने?

अगर सुनेंगे वे क्या सोचेंगे, हमको यह भय है

चित्रलेखा

खूब हँसेंगे हमपर वे यह बात अभी से तय है

हम तो उनसे कह देंगे नारद ने हमें ठगा है
कैसे उनकी राय पर चलकर धक्का हमें लगा है
मर्त्यलोक से पिछले हफ्ते ही लौटे थे जब वे
और मिले थे देवराज के महल में हमसब से वे
हमने जब उनसे अपने मन की ये बात बताई
हमें देखनी थी इक मूवी उत्कंठा जतलाई
उन्होंने ही रावण को रेकमेंड किया था हमको
महीलोक में क्या हिट है ये ट्रेंड दिया था हमको

हम तो सोच नहीं सकते कि वे असत्य बोलेंगे

रम्भा

और मुझे यह संशय था वे भेद नहीं खोलेंगे

मूर्ख बनाया देवर्षि ने हमसब को बातों से
हँसी-हँसी में खेल गए वे मन के जज्बातों से
मैं कहती हूँ हमसब मिलकर देवर्षि से बोलें
जो नुक्सान हुआ है हमको पूरा उनसे ले लें

सहजन्या

अरी तुझे क्या सचमुच लगता देवर्षि दे देंगे?
वे ऐसे हैं बात-बात में हमसे ही ले लेंगे
जो कुछ हुआ उसे हम भूलें इतना भी रोना क्या?
थोड़ा समय और कुछ मुद्रा गई और खोना क्या?

रम्भा

इसी बहाने देवर्षि को हम सब जान चुकी हैं
इसी बहाने उनको बढ़िया से पहचान चुकी हैं

आगे से यह ध्यान रहे कि फिल्म देखनी हो जब

सहजन्या

रिव्यू पढ़ेंगी और फैसला मिलकर लेंगी हमसब

रम्भा

अरी कहाँ तू भी सहजन्ये बातें करे रिव्यू की
क्रिटिक खेलते राजनीति फिल्मों पर अपने व्यू की
सुना नहीं क्या तुमने निर्देशक बस ऐसे-वैसे
रिव्यू लिखा लेते लोगों से मन-माफिक दे पैसे

पैसे लेकर क्रिटिक खेलते जनता से यह खेला

चित्रलेखा

उनकी कारस्तानी ही तो सबसे बड़ा झमेला

अगर सुनो मेरी बातें तो मैं भी अब कुछ बोलूँ
अपनी ज्ञान-तिजोरी का ढकना थोड़ा सा खोलूँ
हमें याद है सम्मलेन, जब फिल्मकार आये थे
और साथ में अपने अनुभव की गठरी लाये थे
तुझे याद है बिमल राय ने मान दिया था हमको
कैसी फिल्में हम देखें ये ज्ञान दिया था हमको
अगर कहानी बढ़िया हो इक फिल्म तभी बनती है
नहीं अगर यह संभव तो फिर पब्लिक सिर धुनती है
मगर यहाँ यह संभव है क्या जब निर्देशक सारे
एक कहानी के पीछे फिरते हैं मारे-मारे
अभी तलक वे रामायण और रावण पर अटके हैं
उन्हें देखकर यही लगा करता है सब सटके हैं

रम्भा

सही कहा यह बात हमें भी अन्तः तक खलती है
मायानगरी उन्ही पुरानी ढर्रों पर चलती है
रावण कहीं है, कहीं राम हैं और कहीं दुर्योधन
बार-बार इनको ही देखे भारत के सारे जन
फिल्मकार को लगता है कैमरा-वर्क बस करके
और साथ में सॉंग-डांस कुछ उल्टा-पुल्टा भर के
उनके लिए गिरेगी कोई बढ़िया फिल्म गगन से
नहीं पता जनता धिक्कारे उनको अन्तःमन से
इसी फिल्म में ऐसा क्या है जिसके पैसे देकर
जनगण देखे और निकलता पीड़ा सिर में लेकर
ऊपर से वह शीलन वाला पॉपकॉर्न का ठोंगा
पचहत्तर रूपये देकर ले मूरख ही वह होगा

चित्रलेखा

सही कहा तूने रम्भे सिरदर्द बहुत होता है
हम इतनी कोमल हैं कि मन अन्दर तक रोता है
चलकर सीधे वैद्यराज से औषधि कोई लेकर
और साथ में दासी को आदेश वगैरह देकर
हम सोयेंगी रात्रि पहर तक पीड़ा तब जायेगी

रम्भा

उसके पहले देवराज की चिट्ठी आ जाएगी


ये बातें हो रही थीं कि अचानक एक जगह उन्हें एक शिविर और उसके आस-पास हलचल दिखाई देती है.

सहजन्या

मही सजी है, लोग व्यस्त हैं कैसा कोलाहल है?
सुबह से पहले जगे हुए सब लोगों में हलचल है
मंच सजा है, भजन गान भी कर्ण सुन रहे मेरे
पता नहीं यह कौन साधु कीर्तन कर रहा सबेरे?

रम्भा

साधु नहीं ये योग-गुरु हैं बैठे शिविर लगाए
श्वांस कर रहे अन्दर बाहर लोगों को भरमाये
कभी-कभी ये भजन गान कर के ही सुख पाते हैं
बड़ा नाम है इनका सब इनके पीछे आते हैं
वैसे तो हैं हरिद्वार में इनका कोई आश्रम
पर फैले साम्राज्य और करते इसलिए परिश्रम

सहजन्या

अरी तुझे तो मालूम है सब, कैसे यह सब जाना?

रम्भा

फैले इनके शिष्य मही पर ऐसा ताना-बाना

वैसे भी जब रावण सी फिल्में बनती जायेंगी
योग गुरु की धरती पर चादर तनती जायेगी
रावण देख देख कर मुद्रा का अपव्यय करके ही
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Tuesday, June 23, 2009

जाने वो कैसा चोर था, दुपट्टा चुरा लिया




जैसे ही शेव करना शुरू किया, वैसे ही टीवी पर चल रहे एक गाने के बोल सुनाई दिए; "जाने वो कैसा चोर था, दुपट्टा चुरा लिया."

कैसा तो गाना है. मन में आया कि अगर नायिका का दुपट्टा चोरी काण्ड फेमस हो जाए तो क्या होगा?

फ़र्ज़ कीजिये कि जिस नायिका का दुपट्टा चोरी हो गया वह अगर थाने में रिपोर्ट दर्ज करा दे तो अपनी इन्वेस्टीगेशन के बाद थानेदार क्या रिपोर्ट दे सकता है? शायद कुछ ऐसी;

"नायिका द्बारा दुपट्टे चोरी की रिपोर्ट दर्ज कराने के बाद हमने मामले की विस्तृत और समग्र तहकीकात की. दुपट्टा चोरी की ऐसी कोई घटना हमारे थाने के इलाके में इससे पहले कभी नहीं हुई है. यह नए किस्म का चोर है जो केवल दुपट्टा चुराता है. नायिका भी चोर के इस कर्म से हैरान है. नायिका के द्बारा इस घटना के ऊपर एक गाना भी गया गया है. गाने की पहली लाइन सुनकर ही लग रहा है कि नायिका भी इस बात से आश्चर्यचकित है कि यह कैसा चोर है जो दुपट्टा चुराता है. तहकीकात के दौरान ही यह पता चला कि नायिका ने दुपट्टे के साथ अपने सलवार और कमीज़ भी धोकर सूखने के लिए डाला था. लेकिन चोर ने सलवार और कमीज़ में कोई इंटेरेस्ट नहीं दिखाया. उसका टारगेट केवल दुपट्टा चोरी करने का था. चूंकि दुपट्टा चोरी की यह पहली घटना है इसलिए हम पास्ट रिकार्ड्स देखकर और पहले से सॉल्व किये गए किसी केस का रेफेरेंस लेकर चोर को पकड़ सकें, इसका भी कोई चांस नहीं है. लिहाजा हम सरकार से दरख्वास्त करते हैं कि यह केस सीबीआई की उस शाखा को सौंप दिया जाय जो कपड़ों की चोरी के मामले हैंडल करता है."

थानेदार रिपोर्ट तो लिख देगा. लेकिन तब तक मामला अखबार में छप चुका होगा. दुपट्टे की चोरी की ऐसी सनसनीखेज घटना को कवर करने के लिए टीवी वाले पहुँच जायेंगे. इस घटना पर टीवी वाले शायद कुछ इस तरह का कवरेज करें;

स्टूडियो में विशेष कार्यक्रम "चोरी हुआ दुपट्टा" का संचालन कर रहे एंकर, नीलाभ जी बहुत एक्साइटेड रहेंगे. आखिर यह विशेष कार्यक्रम बिलकुल नए विषय पर है. स्टूडियो में खड़े-खड़े नीलाभ जी कहेंगे;

"जी हाँ. चोरी भी किस चीज की? दुपट्टे की. दुपट्टे की चोरी की घटना शायद ही पहले हुई हो. आज हम आपको इस सनसनीखेज घटना पर विशेष दिखाने जा रहे हैं. कहीं न कहीं दुपट्टे की चोरी की यह घटना बहुत ही गंभीर है. आखिर किसने की दुपट्टे की चोरी? कौन है वह जो सोने-चांदी चोरी करने के बजाय दुपट्टा चोरी कर रहा है? कौन है वह चोर?..... यह जानने के लिए चलते हैं हमारे संवाददाता सुधीर विनोद के पास.....सुधीर आपको हमारी आवाज़ आ रही है?"

"जी हाँ. नीलाभ मुझे आपकी आवाज़ आ रही है"; सुधीर विनोद जी बोलेंगे.

"सुधीर क्या है यह पूरा मामला? दुपट्टे की इस चोरी के पीछे किसका हाथ हो सकता है? क्या कहती है वह नायिका जिसका दुपट्टा चोरी चला गया है?" नीलाभ जी पूछेंगे.

"नीलाभ दुपट्टे के चोरी चले जाने के बाद उस नायिका को इतना गहरा सदमा लगा है कि उसने पिछले दो दिन से कुछ खाया नहीं है. लिहाजा इस घटना पर बात करने के लिए वे हमारे साथ नहीं है"; सुधीर विनोद जी बोलेंगे.

इतना सुनकर नीलाभ जी आश्चर्यचकित रह जायेंगे. वे कहेंगे; "लेकिन सुधीर खबर है कि दुपट्टा चोरी की घटना के बाद नायिका ने एक गाना भी गाया कि; "जाने वो कैसा चोर था, दुपट्टा चुरा लिया." ऐसे में नायिका के सदमे वाली बात कहाँ तक सही है?"

नीलाभ की बात सुनकर सुधीर बोलेंगे; "नीलाभ इस गाने की बाबत मैंने नायिका के पड़ोसियों से सवाल दागा था. लगभग सभी का कहना था कि नायिका ने वह गाना सदमा लगने की वजह से ही गाया था. उसने गाना खुश होकर नहीं गाया था. पडोसियों का कहना है कि नायिका का पास्ट रिकार्ड्स बताता है कि जब उसे सदमा लगता है, वह गाने गाती है."

नीलाभ जी बोलेंगे; "सुधीर, क्या अभी वहां पर नायिका का कोई पड़ोसी मौजूद है?"

सुधीर जी बोलेंगे; "नीलाभ पड़ोसियों को और काम ही क्या है? टीवी कैमरा देखकर सब अपना-अपना घर छोड़कर सड़क पर आ गए हैं. आप देख सकते हैं, मेरे आजू-बाजू, पीछे-आगे पड़ोसी ही पड़ोसी मौजूद हैं. चलिए इनमें से कुछ के साथ बात करते हैं....हाँ क्या नाम है आपका?"

"पप्पू. जिनका दुपट्टा चोरी हुआ है, मेरा घर उनके घर के बायें तरफ है"; पप्पू जी बोलेंगे.

"जी ये बताइए कि आपको कब पता चला कि नायिका का दुपट्टा चोरी चला गया?"; सुधीर विनोद सवाल दागेंगे.

"देखिये मैं आपको शुरू से बताता हूँ. मैं सुबह उठा. बिना ब्रश किये मैंने नाश्ता किया. माँ ने बाज़ार से सब्जी लाने के लिए कहा तो मैंने मना कर दिया. फिर मैं टीवी पर डब्लू डब्लू ऍफ़ देखने लगा.........फिर..."; पप्पू जी

"संक्षेप में बताइए. हम आपको इतना फूटेज नहीं दे सकते"; सुधीर विनोद बोलेंगे.

"नहीं. मैं संक्षेप में ही बता रहा था. आपने मुझे बीच में क्यों रोका? वैसे भी आपलोग कभी कोई बात संक्षेप में नहीं करते तो हम कैसे करें?"; पड़ोसी पप्पू बोले.

इतना कहने के बाद पप्पू जी को लगा कि संवाददाता उनके हाथ से माइक छीन न ले. वे डर गए. फिर बोले; "ओके ओके...ठीक है मैं संक्षेप में बताता हूँ. मुझे करीब दोपहर के बारह बजे तब पता चला जब उन्होंने गाना शुरू किया कि; "जाने वो कैसा चोर था, दुपट्टा चुरा लिया"; पप्पू जी बोलेंगे.

"नीलाभ जैसा कि आप देख सकते हैं. नायिका के पड़ोसी पप्पू जी को गाने की वजह से करीब बारह बजे पता चला कि दुपट्टा चोरी चला गया है. इसका मतलब करीब दस बजे की घटना होनी चाहिए. चोर ने करीब दस बजे दुपट्टा चोरी किया होगा. ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ कि दस बजे दुपट्टा चोरी गया होगा तो नायिका को इस बात का पता करीब ग्यारह बजे चला होगा. उसके बाद दस मिनट तक वो सदमे में होगी. फिर करीब सवा ग्यारह बजे से उसने गाना लिखना शुरू किया होगा. करीब पंद्रह मिनट में गाना लिखा गया होगा. फिर एक्स्ट्रा कलाकारों और सखियों को इकत्र करने में और ऑर्केस्ट्रा के प्रबंध करने में करीब आधा घंटा लगा होगा. फिर जाकर बारह बजे से नायिका ने गाना शुरू किया होगा....हमारा तो यही मानना है...जी... नीलाभ"; सुधीर विनोद जी जवाब देंगे.

उनकी बात सुनकर नीलाभ जी बोलेंगे; "जी हाँ. सुधीर, धन्यवाद. आप इस घटना पर अपनी नज़र बनाये रखें. आप अगले तीन दिन तक वहीँ जमे रहिये. प्रोग्राम एडिटर से आर्डर है कि अभी अगले पॉँच दिन तक हमें इस घटना पर रोज एक विशेष दिखाना है. तो ये था हमारा विशेष कार्यक्रम "चोरी हुआ दुपट्टा." आगे की खबरों के लिए देखते रहिये परसों तक..."

अब बात टीवी तक पहुँच गई तो समाज के बाकी तपके भी टूट पड़ेंगे. समाजशास्त्री इस घटना की व्याख्या करते हुए लिखेंगे;

"कई सौ वर्षों से भारतीय समाज में दुपट्टा इज्ज़त का प्रतीक माना जाता रहा है. जैसे पुरुष के केस में पगड़ी को इज्ज़त का प्रतीक माना जाता है ठीक उसी तरह महिलाओं के केस में दुपट्टे को इज्ज़त का प्रतीक माना जाता रहा है. लेकिन आज तक किसी नायक ने ऐसा कोई गाना नहीं गाया जिससे पता चले कि किसी चोर ने किसी पुरुष की पगड़ी चोरी की हो. आजतक ऐसा कहीं नहीं सुना गया कि पगडी चोरी चली जाने से किसी पुरुष ने गाना गाया हो कि; 'जाने कैसा चोर था, जो पगड़ी चुरा गया'. इससे यह सिद्ध होता है कि दुपट्टा चोरी करके एक बार फिर से महिलाओं को नीचा दिखाने की कोशिश की गई है. सदियों से चली आ रही समाज पर पुरुष की पकड़ का प्रतीक है दुपट्टा चोरी की यह घटना. आज एक बार फिर से यह साबित हो गया कि महिलाओं को आदर देना भारतीय पुरुष कभी नहीं सीखेगा"

जहाँ समाजशास्त्री इस तरह का वक्तव्य देगा वहीँ इतिहासकार शायद ऐसा कुछ लिखे;

"इतिहासकारों का मानना है कि दुपट्टा चोरी की घटना आधुनिक भारतीय इतिहास में पहली बार हुई थी. हालांकि इससे पहले चोर काजल, नज़र वगैरह चुराता रहा है लेकिन ज्यादातर इतिहासकारों का मत है कि नब्बे के दशक के मध्य में समाज में चोरी की घटनाओं में जो इजाफा हुआ, उनमें से साठ से सत्तर प्रतिशत घटनाएं हलाँकि कपडों की चोरी की हुई थी. लेकिन ज्यादातर केस में धोती-कुरता और लुंगी चोरी हुई थी. इतिहासकार इस बात से एकमत हैं कि कुछ विदेशी तस्कर भारतीय संस्कृति से जुड़े शिलालेख, मूर्तियाँ, और हस्तकला की चीजें चोरी करवा कर बोर हो चुके थे लिहाजा उन्होंने कपड़ों की चोरी करवानी शुरू कर दी. इस घटना से एक बात और प्रकाश में आती है कि इस दशक में जितने भी लोग चोरी के पेशे से जुडे उनमें से ज्यादातर कपड़े की चोरी के पेशे में आये......"

मन भी कितना तेज दौड़ता है. ये सब युधिष्ठिर जी की वजह से...