फ़ुटबाल विश्वकप ख़त्म हो गया. ऐसा ही होता है. इतिहास गवाह है कि जो टूर्नामेंट शुरू होते हैं वे ख़त्म भी हो जाते हैं. ऐसा सदियों से होता आया है और अगर २०१२ में दुनियाँ ख़त्म नहीं हुई तो आशा है कि आगे भी होता रहेगा. यही शास्वत नियम है और चूंकि दुनियाँ नियमों की बड़ी पाबन्द है इसलिए नियम पालन का यह सांस्कृतिक कर्म आगे भी होता रहेगा. वैसे भी बात फ़ुटबाल विश्वकप की हो रही है, एकता कपूर के सीरियल्स की नहीं जो भारतीय अदालतों में चल रहे न जाने कितने मुकदमों की तरह कभी ख़त्म ही नहीं होते.
वैसे अगर ध्यान दें तो हम पायेंगे कि केवल फ़ुटबाल का विश्वकप ही एक मात्र विश्वकप है जिसके मामले में हम भारतीय बड़े भाग्यशाली हैं. हम भारतीयों को वरदान मिला हुआ है कि हम आखीर तक इसे देख पायेंगे और फुटबालीय संस्कृति पालन के अपने भ्रम की रक्षा करेंगे. क्रिकेट विश्वकप की तरह नहीं कि पहले ही राऊंड में बांग्लादेश से हार गए तो छाती पीटकर खुद को अलग कर लिया. अलग भी ऐसे-वैसे नहीं. दो दिन तक सब्जी बाज़ार में जो भी मिलता है उसके सामने ऐसी मुखमुद्रा रहती है जिसे देखकर दुःख भी दुखी हो जाए.
लेकिन इस विश्वकप के मामले में ऐसा कोई लोचा नहीं है. हमें यह चिंता करने की ज़रुरत नहीं रहती कि हमारी टीम विश्व कप से बाहर हो जायेगी तो हम क्या करेंगे? ऐसे कठिन समय में हमें कितना दुखी दिखना पड़ेगा? या फिर टीवी चैनल किसे विलेन करार देंगे? फ़ुटबाल के इस महाकुम्भ (एन डी टीवी इंडिया से चुराया गया विशेषण) में टीमों के मामले में हमसे धनी कोई नहीं रहता.
लगता है जैसे हमारे पास टीमों का गुच्छा है और हम रह-रह कर ज़रुरत के मुताबिक़ उस गुच्छे से एक-एक टीम तोड़ते जाते हैं और उसे अपना समर्थन दे डालते हैं. जैसे सबसे पहले हम अपना समर्थन बिना किसी शर्त के लैटिन अमेरिकी टीमों को दे देते हैं. फुटबालीय इतिहास और भौगोलिक सीमाओं की वजह से हमारा समर्थन ऑटोमैटिकली ब्राजील और अर्जेंटीना को पहुँच जाता है. हमारा शहर यानि कोलकाता तो इन दो देशों के झंडे ओढ़कर धन्य हो लेता है.
अब अगर कोई हमसे हमारे इस बिना शर्त वाले समर्थन का कारण पूछता है तो हम सबसे पहले उसे इस भाव से देखते हैं जैसे उसने दुनियाँ का सबसे बेवकूफ सवाल पूछ लिया हो. उसके बाद उसे बताते हैं; "तुझे इतना भी नहीं मालूम? अरे पगले लैटिन अमेरिकी टीमें ही असली फ़ुटबाल खेलती हैं. असली माने कलात्मक फ़ुटबाल."
दार्शनिक भाव से लैस होकर दिया गया हमारा यह स्टेटमेंट पूरी दुनियाँ के ऊपर हमारी धाक जमा देता है. लगता है जैसे हम आधी से ज्यादा दुनियाँ से कह रहे हैं कि; "बेवकूफों तुम्हें फ़ुटबाल की जरा भी समझ होती तो तुम यूरोपीय टीमों को समर्थन न दे रहे होते. हमें देखो और कुछ सीखो. फुटबालीय कला की असली समझ हमें है इसीलिए हम लैटिन अमेरिकी टीमों के कलात्मक फ़ुटबाल को समर्थन देते हैं."
वैसे कई बार मेरे मन में यह बात आई है कि अगर कोई हमसे पूछ ले कि; "प्रभु, कलात्मक फ़ुटबाल क्या होता है?" तो सोचिये तब क्या होगा? कस्सम से कह रहा हूँ अगर कोई यह प्रश्न दाग दे तो हमारी सिट्टी-पिट्टी सामूहिक तौर पे गुम हो जायेगी.
खैर, लैटिन अमेरिकी टीमों को बिना शर्त दिया गया हमारा यह समर्थन हम तब वापस खींच लेते हैं जब ये टीमें टूर्नामेंट से बाहर निकल लेती हैं. उसके बाद हम टीम खोजते हैं. चूंकि अंग्रेजों ने हमारे ऊपर राज किया है इसलिए हम इतिहास की इज्जत करते हुए उनके दुश्मन देश यानि जर्मनी को समर्थन देते हैं. चाहें तो इटली को भी दे सकते हैं. हाँ, फ्रांस को नहीं देते क्योंकि वहाँ के लोग बड़े साम्राज्यवादी टाइप होते हैं. वैसे अगर कोई अफ्रीकी टीम तब तक करतब दिखाती रहती है तो हम उन्हें समर्थन दे लेते हैं. अफ्रीकी टीमों के खिलाड़ियों का काला होना उन्हें हमारे समर्थन के लायक बनाता है.
ऐसा करके हम अपनी महान संस्कृति की रक्षा करते हुए खेल को राजनीति और नस्लवाद से दूर कर देते हैं.
टीमों को समर्थन देने की हमारी यह फिलास्फी हमें फ़ुटबाल विश्वकप से चिपका देती है. टीमें खेलती हैं. हारती हैं. जीतती हैं. कोई भी टीम जीते या हारे हम भारतीयों के पटाखे फूटेंगे ही फूटेंगे. हमारे पटाखे कभी खाली नहीं जाते. हम हार-जीत से ऊपर उठकर अपनी खेल संस्कृति की रक्षा ऐसे ही करते हैं.
स्पेन ने विश्वकप जीत लिया. हम खुश हो लिए. हालेंड जीत जाता तो भी खुश हो लेते. हमारे जर्नलिस्ट से लेकर नेता तक, सभी खुश हैं. जनता की ख़ुशी का तो ठिकाना नहीं है. उसकी ख़ुशी चारों दिशाओं में गूँज रही है. हम फ़ुटबाल के खेल को अलग नज़र से देखते हैं.
एक नमूना देखिये;
सीएनएन आईबीएन पर राजदीप सरदेसाई स्पेन की जीत के बाद पैनल डिस्कशन कर रहे हैं. बड़े मजेदार लोग आये हैं इस डिस्कशन में. राजदीप सरदेसाई अपनी खोज से इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि स्पेन की जीत का कारण उस देश की टीम का पूरी तरह से सेकुलर होना है.
वे सोहेल सेठ से पूछ रहे हैं; "सो, यू आल्सो बीलीव सोहेल सेठ दैट मेन रीजन बिहाइंड स्पेन्स सक्सेस इज द फैक्ट दैट होल टीम इज सेकुलर? आई मीन लुकिंग ऐट द टीम वन कैन से दैट स्पेन इज अ टीम ऑफ़ अमर अकबर एंथनी?"
उनका सवाल सुनकर सोहेल सेठ बोले; "लुक राजदीप, आई केयर अ डैम ह्वेदर टीम इज सेकुलर आर नॉट. फॉर मी, सक्सेस इज इम्पोर्टेंट. आई मीन ह्वाट हैव वी अचीव्ड इन अ गेम लाइक फ़ुटबाल इन लास्ट फिफ्टी ईयर्स? पालीटीसीयंस आर ऐट द हेम फॉर डिकेड्स एंड ऐज आई आलवेज से, पालीटीसीयंस आर स्काऊंड्रल्स आल ओवर द वर्ल्ड. दैट इज प्रीसाइजली द रीजन व्हाई....."
"ओके ओके. लेट मी ब्रिंग ममता दी इन द डिस्कशन. सो, ममता दी, फ़ुटबाल इज अ पैशन इन योर स्टेट ऐंड यू अस्पायर टू बिकम चीफ मिनिस्टर ऑफ़ बेंगोल. टेल मी, कैन यू डू समथिंग टू पुट थिंग्स इन आर्डर? आई मीन डू यू हैव एनी प्लान?"; राजदीप सरदेसाई ने ममता बनर्जी से पूछा.
वे बोलीं; "लेट मी टेल इयु राजदीप दैट टू प्रोमोट फूटबाल इन आभर इस्टेट, रेल मिनिस्टरी हैज आलरेडी इसुड फास्ट क्लास पासेज फार लाइफ टाइम टू होल इस्पेनिश टीम. दीस थाटी ईयार्स रूल आफ लेफ्ट फ्रोंट हैज डोन नाथिंग फार फुटबोल. आई हैभ इभेन इन्भाइटेड आल इस्पेन टीम ऐट दा ओकेझान आफ ईनागारेशान आफ झोलाखाली रेल्भे इस्टेशान ईन साउथ टूवेंटीफोर परगोना. उई आर आल्सो प्रोपोजिंग नेम आफ देयार कैप्टान ऑन द कैटरिंग बोर्ड ऑफ दी रेल्भे."
"ओके ओके. आई टेक योर वर्ड्स. बट लेट मी आस्क लालू जी. लालू जी, ऐज अ रेलवे मिनिस्टर ममता दी इज गोइंग टू डू सो मच फॉर फ़ुटबाल. यू वेयर आल्सो रेलवे मिनिस्टर. डिड यू एवर थिंक ऑफ डूइंग समथिंग फॉर फ़ुटबाल?"; राजदीप सरदेसाई इस बार लालू जी से मुखातिब थे.
"नै नै..फस्ट आई टेल यू...अरे लिसेन टू मी..देखिये..इंडिया इज ए नेशन ऑफ भिलेज. इन भिलेज कबड्डी इज द मेन खेला..... ई फ़ुटबाल बाहर का खेला है. आ ममता दी को गाँव का खबर है कुछ? अपना 'संस्कृत' में कबड्डी है. ऊंची कूद है. आज जरूरत है ई सब खेला का जो है, प्रमोशन हो. फ़ुटबाल में पैसा बर्बाद होगा खाली और कुछ नहीं"; लालू जी ने अपना स्टैंड ले लिया.
उनकी बात सुनकर राजदीप सरदेसाई बोले; "लेकिन लालू जी, आप एक बात बताइए. बिहार में इलेक्शन नज़दीक है. आप स्पेन के खिलाड़ी से कैपेनिंग करवाएंगे?"
वे बोले; "अभी जो है, आप ने बताया कि स्पेन का पूरा टीम सेकुलर है. त हम ज़रूर लायेंगे उनको चुनाव प्रचार के लिए. देश में सेकुलरवाद फैले, आज का ज़रुरत है. नीतीश के खिलाफ हम सेकुलर मोर्चा खोल दिए हैं. ज़रूर लायेंगे स्पेन का खिलाड़ी. काहे नै लायेंगे?"
"तो लालू जी, कौन से खिलाड़ी को लाना चाहते हैं आप?"; राजदीप ने फिर सवाल किया.
"ओइसे त बहुत खिलाड़ी है बाकी हम उसको...ऊ का नाम है उसका...एक मिनट..हाँ, ऊ डेभिड भिल्ला को लायेंगे चुनाव प्रचार के लिए"; लालू जी ने अपनी पसंद राजदीप को बता दी.
वे बोले; "हा हा हा..लालू जी उनका नाम डेभिड भिल्ला नहीं डेविड विया है. डेविड विया."
यह बात सुनकर लालू जी चकित. बोले; "का बात करते हैं? ई कैसा नाम है? अरे दू ठू एल है भाई और उसको ई लोग भिया बोलता है? ई कैसा अंग्रेजी है इस्पेन का?"
उधर एक पैनल डिस्कशन टाइम्स नाऊ पर ख़त्म होने वाला है. जाते-जाते अरनब गोस्वामी फुटबाल फेडरेशन के पटेल साहब पर चढ़ गए हैं; "बट बट बट... मिस्टर पटेल...मिस्टर पटेल..प्रोमिज अस टूनाइट ऑन दिस चैनल टू आवर व्यूअर्स दैट इफ नॉट इन टू थाऊजेंड फोर्टीन ऐटलीस्ट इन टू थाऊजेंड एटीन इंडिया इज गोइंग टू विन द फीफा वर्ल्ड कप. प्रोमिज अस..."
उधर पटेल साहब अकबकाये से कह रहे हैं; "लुक अरनब...अरनब..फर्स्ट लिसेन टू मी...यस यस...दैट इज प्रिसैजली ह्वाट आई वाज टेलिंग ऊ... सी, फोर इयर्स बैक वी वेयर ऐट वन हंड्रेड फोर्टीन इन फीफा रैंकिंग...नाऊ वी आर ऐट वन थर्टीफोर..इट्स नॉट दैट वी आर नाट इम्प्रूविंग...वी आर कांसटेंटली इम्प्रूविंग...बट यू विल हैव टू गिव अस सम मोर टाइम टू...."
एक डिस्कशन सबसे तेज चैनल पर चल रहा है. यह डिस्कशन नहीं सीधी बात है जो प्रभु चावला बाबा रामदेव के साथ कर रहे हैं. चकित न होवें. बाबा रामदेव फ़ुटबाल तो क्या स्नूकर पर भी बोल सकते है. तो सीधी बात में चावला जी उनसे कह रहे हैं; "हे हे हे..आप तो अब चुनाव भी लड़ने वाले हैं. ये बताइए कि देश की फ़ुटबाल टीम विश्वकप जीते उसके लिए आप क्या सुझाव देंगे?"
बाबा रामदेव बोले; " हे.. हे..कलयुग में फ़ुटबाल विश्वकप जीतने का एकमात्र उपाय योग ही है...ओ कुछ नहीं करना है बस सांस लेना और छोड़ना है....सुबह पाँच बजे उठिए..गहरी लम्बी सांस लीजिये...एक बार योग की आदत पड़ जायेगी तो सबकुछ हो जाएगा....हम तो जीवन देते हैं... साथ में योग के सहारे अब फ़ुटबाल विश्वकप भी दे सकते हैं...कुछ नहीं करना है बस सांस लेना और छोड़ना है..."
एनडीटीवी इंडिया पर रवीश कुमार स्पेन की विश्वकप विजय पर कह रहे हैं; "...और शायद स्पेन में दलित समाज को पहले ही सामाजिक बदलाव का उत्प्रेरक मान लिया गया था. स्पेन की पूरी टीम में अगर एक भी दलित खिलाड़ी नहीं है तो उसका कारण यह नहीं कि वहाँ दलितों को उनकी जगह नहीं दी जाती बल्कि उसका कारण यह है कि सैकड़ों साल पहले ही स्पेन के उच्च समाज ने दलित समाज को अपने अन्दर समाहित कर लिया....."
एक कार्यक्रम इंडिया टीवी पर भी चल रहा है. एंकर अपने संवाददाता से पूछ रहा है;"उमेश क्या कह रहे हैं माद्रिद के लोग? क्या वे भी ऐसा मानते हैं कि डेविड विला को पाताल भैरवी से आशीर्वाद मिला है कि वे दुनियाँ के सबसे बड़े फुटबालर बनेगे?......जी हाँ, आज हम पहली बार बता रहे हैं कि कैसे स्पेन के खिलाड़ी डेविड विला ने हिमालय की गुफाओं में पूरे एक साल तक तपस्या करके पाताल भैरवी का आशीर्वाद प्राप्त किया..आज हम मिला रहे हैं आपको उस पाताल भैरवी से जिसने स्पेन के फुटबालर डेविड विला को सबसे बड़ा फुटबालर होने का आशीर्वाद दिया है...जी हाँ हिमालय की गुफाओं में वास करने वाली पाताल भैरवी..जी हाँ, आपको यह जानकार आश्चर्य होगा...."
इंडिया टीवी वालों को अभी भी लगता है कि उनके प्रोग्राम देखने वालों को आश्चर्य भी होता है.
खैर, जो भी हो, यह सब के बावजूद हमें भरोसा है कि भारत एक दिन फ़ुटबाल विश्वकप में....
Tuesday, July 13, 2010
फ़ुटबाल विश्वकप...विजेता स्पेन...टीवी पैनल डिस्कशन
Wednesday, June 23, 2010
सांस्कृतिक फ़ुटबाल.
फ़ुटबाल वर्ल्ड कप चल रहा है. चल क्या उछल रहा है. मजे लिए जा रहे हैं. पिछले कई दिनों से जानबूझ कर मैं ऐसी जगह नहीं जाता जहाँ दो-चार लोग बैठे हों. डर लगा रहता है कि कहीं कोई फ़ुटबाल के बारे में न पूछ ले. कारण यह है कि हम रविन्द्र जडेजा की बैटिंग ज्यादा इंज्वाय करते हैं. वही जडेजा जिन्होंने पिछली कई पारियों में शून्य पर आउट होकर शून्य को अमर कर दिया है. वैसे भी उस वर्ल्ड कप में कैसे मन लगेगा जहाँ अपने देश की टीम गई ही नहीं. ऐसे में अगर हम अपने शहर वालों की तरह फ़ुटबाल के मजे लेना चाहें तो हमें अर्जेंटीना को समर्थन देना पड़ेगा क्योंकि चे का जन्म उस धरती पर हुआ था और मैराडोना भी वही के हैं, या फिर ब्राजील को, क्योंकि वहाँ के सबसे महान खिलाड़ी पेले कोलकाता में खेल चुके हैं.
हमारे शहर के लोगों के हिसाब से वर्ल्डकप में दो ही टीमें खेलती हैं. अर्जेंटीना और ब्राजील.
ज्यादातर दफ्तर पूरे दिन अलसाई आँखों से भरे हुए हैं. अंग्रेजी न्यूज चैनलों के स्टूडियो में एक्सपर्ट लोग लगे हुए हैं. किसी न किसी टीम की जर्सी पहने हुए ये एक्सपर्ट रोज सुबह टीवी चैनल के स्टूडियो में कैरमबोर्ड जैसी तख्ती पर काठ के छोटे-छोटे खिलाड़ियों को इधर से उधर घुमाकर बताते हैं कि फलाना टीम आज इधर से अटैक करेगी. सामने वाली टीम के डिफेंडर्स बायें से उस अटैक का जवाब देंगे और जो टीम अटैक करेगी वह उस जवाब का तोड़ फलाना तरीके से निकालेगी और मैच जीत जायेगी. फलाना प्लेयर सबसे इम्पार्टेंट है. आज अगर वह खेल गया तो फिर उसकी टीम लास्ट सिक्सटीन में पहुँच जायेगी. एक्सपर्ट की ऐसी बातें मुझे युवराज सिंह की याद दिला देती हैं. लगता है जैसे एक्सपर्ट कह रहा है कि युवराज सिंह बहुत टैलेंटेड खिलाड़ी हैं और अगर वे आज चल गए तो भारत मैच जीत जाएगा.
टैलेंटेड खिलाड़ी की बात पर पता नहीं क्यों मुझे हमेशा ही लगता है कि क्रिकेट और फ़ुटबाल में कोई बहुत ज्यादा अंतर नहीं है.
खैर, बात कर रहा था एक्सपर्ट टाइप लोगों की. मैंने अभी तक देखा है कि अंग्रेजी न्यूज चैनल के स्टूडियो में ये एक्सपर्ट लोग जो भी बोलते हैं, ज्यादातर वैसा होता नहीं है. और जब वैसा नहीं होता है तो मुझे लगता है कि इनलोगों को न्यूज चैनल ने पैसा-वैसा देकर बुलाया होगा. क्या ज़रुरत है पैसे देने की? इनकी जगह मौसम विभाग वालों को बुला लेते. वे भी इतने ही एफिसियेंट हैं. फ़ुटबाल वर्ल्डकप के मैचों के बारे में इन एक्सपर्ट लोगों के एक्सपर्ट कमेन्ट जितने नकारा साबित हो रहे हैं उतने ही नाकारा उन मौसम विभाग वालों के भी साबित होते. ऊपर से मौसम विभाग वाले फ़ुटबाल के बारे में बोलने के लिए तड से तैयार हो जाते. पैसे कम लेते सो अलग.
मेरी तरह ही मेरा एक मित्र अंग्रेजी न्यूज चैनल के स्टूडियो में हो रहे फ़ुटबाल कार्यक्रमों को देखकर त्रस्त लगा. अब चूंकि हम भारतीयों का काम सांत्वना लेन-देन से चल जाता है इसलिए मैंने उससे कहा; "अरे यार गनीमत है कि अपने अंग्रेजी न्यूज चैनल फ़ुटबाल वर्ल्डकप के बारे में आधे घंटे का प्रोग्राम तो दिखा रहे हैं, अपने हिंदी न्यूज चैनलों को सलमान खान और ज़रीन खान के तथाकथित प्रेम सम्बन्ध से ही फुर्सत नहीं है."
वैसे मैं बता दूँ कि मित्र को सांत्वना देने के लिए कही गई बात केवल उस क्षण के लिए जायज थी. मेरा हमेशा से ऐसा मानना रहा है कि अपने हिंदी न्यूज चैनल फ़ुटबाल के बारे में कुछ नहीं दिखा सकते. कोई प्रोग्राम नहीं बना सकते. कारण मेरा वह पक्का विश्वास है जिसके तहत इंडिया टीवी और आजतक जैसे चैनलों के लिए ई पी एल (इंग्लिश प्रीमियर लीग) यूरोप का सबसे बढ़िया बाइक ब्रांड है और ला-लीगा (स्पेन का फ़ुटबाल लीग) सबसे बढ़िया आईसक्रीम ब्रांड. कोई हिंदी न्यूज चैनल फ़ुटबाल वर्ल्ड कप के बारे में बात भी करेगा तो उसे फ़ुटबाल वर्ल्ड कप न कहकर फ़ुटबाल का महाकुम्भ पुकारेगा और उस वर्ल्डकप का भारतीयकरण कर डालेगा जिसमें हमारी टीम के खेलने के चांस शायद अगले पचास सालों में न के बराबर हैं.
लेकिन मेरी बात मेरे शहर के लोगों की बात नहीं है. मेरे शहर के लोग फ़ुटबाल के पीछे पागल हैं. आज भी मोहन बागन और ईस्टबंगाल का मैच न सिर्फ देखने जाते हैं बल्कि मारपीट भी करते हैं. कहते हैं फ़ुटबाल में मारपीट बहुत ज़रूरी है. अगर मारपीट न हो तो फ़ुटबाल मैच दो कौड़ी का. हमारे शहर के लोग कोलकाता को ही फ़ुटबाल का 'मेक्का' कहते हैं. वर्ल्ड चैम्पियन इटली हो या ब्राजील, फ्रांस या अर्जेंटीना, लेकिन हमारा ऐसा मानना है कि फ़ुटबाल का जन्म कोलकाता ही में हुआ है और दुनियाँ का सबसे बढ़िया फ़ुटबाल या तो मोहनबागान वाले खेलते हैं या फिर ईस्टबंगाल वाले.ये बात अलग है कि अगर आप इन क्लबों के ग्राऊँड्स में लगी बेंचों पर बैठ जायेंगे तो बेंच नीचे टूट पड़ेगी.
हमारे यहाँ हर वर्ल्डकप के मौके पर दीवारों पर जो कलाकारी होती है उसे देखकर लगता है जैसे मेसी, काका, रूनी और ड्रोग्बा को पकड़कर किसी ने दीवार पर कैद कर दिया है. सभी अपने-अपने पाँव उठाये हुए. जैसे कह रहे हों; "फ़ुटबाल, माय फूट."
हमारे शहर के लोकल चैनलों पर बोलनेवाला फ़ुटबाल एक्सपर्ट खेल और उसकी स्ट्रेटेजी की बारीकियों को छोड़कर बाकी सारे चीजों के बारे में बोलता है. असल में हमारे शहर का फ़ुटबाल एक्सपर्ट आत्मा से दर्शनशास्त्री और व्यवहार से बुद्धिजीवी होता है. अभी दो दिन पहले की बात है लोकल टीवी चैनल पर चल रहे एक प्रोग्राम में एक एक्सपर्ट मैराडोना के बारे में बात करते हुए हर वह बात बोला जिसका फ़ुटबाल से सम्बन्ध न के बराबर है. जैसे मैराडोना जब नैपोली के लिए खेलते थे तो उन्होंने फला तारीख को वहाँ के मैनेजर से क्या कहा? कैसे उन्हें नैपोली के समाज और वहाँ के बेरोजगार युवकों के बारे में चिंता थी? और यह कि मैराडोना इसलिए महान हैं कि उन्होंने जार्ज बुश को गरिया दिया था और पेले आजतक बुश को गरिया नहीं पाए.
अलग तरीके का फ़ुटबाल प्रेम है हमारे शहर का. आप आइये. पायेंगे कि मिठाई की दूकान पर मिठाइयाँ कहीं फ़ुटबाल के आकार की हैं तो कहीं वर्ल्डकप के आकार की. लगता है जैसे हम यह साबित करना चाह रहे हों कि; "अरे ओछे हैं वे लोग जो वर्ल्डकप जीतना चाहते हैं. हम तो वर्ल्ड कप खाकर संतुष्ट हो लेंगे."
नई-नई मिठाइयाँ बन रही हैं और किसी का नाम मेसी रख दिया गया है तो किसी का काका. लोग मेसी और काका को घर लिए जा रहे हैं. फ्रीज में रख रहे हैं और मैच देखते हुए उन्हें खा ले रहे हैं. खाने के साथ-साथ फ़ुटबाल प्रेम दिखाकर हाथ झाड़ लिया.
हमारी फुटबाली कला का असली नमूना मिठाइयों और चित्रकलाओं में दिखाई दे रहा है. विश्व फ़ुटबाल के लिए यह हमारा सांस्कृतिक योगदान है. ऐसे में कह सकते हैं कि फ़ुटबाल संस्कृति में जितनी भी संस्कृति है, सब हमारी ही देन है.
हमारे मोहल्ले के एंट्रेंस पर दो बड़े-बड़े कटआउट लगाये गए हैं. एक तरफ काका और दूसरी तरफ मेसी. फोटो में दोनों टांग उठाकर तैयार हैं. जब गाड़ी उन कटआउट के सामने से गुजरती है तो डर लगा रहता है कि कहीं ये लोग अपनी टांग न चला दें. इतने बड़े कटआउट कि अगर करूणानिधि देख लें तो अपने पुत्र स्टालिन को तुरंत बुलाकर दो तमाचे रसीद कर देंगे. यह कहते हुए कि; "अन्ना नगर में जो चालीस कटआउट कल लगवाए वे इतने बड़े क्यों नहीं बनवाये?"
हमारे शहर के बप्पी लाहिड़ी जी ने एक बार फिर से फ़ुटबाल वर्ल्डकप के मौके पर अपना 'म्यूजीक' विडियो बनाया है. बनाया तो बनाया उसे रिलीज भी करवा दिया है. गाने के बोल हैं; "बोले बोले बोले बोले..फुटबोल फुटबोल फुटबोल..फुटबोल ईज आवर लाइफ..." साथ ही बप्पी दा ने वह फ़ुटबाल भी खरीद लिया है जिसपर दुनियाँ के तमाम बड़े खिलाड़ियों का आटोग्राफ है. टीवी पर देखकर लगा कि बप्पी दा को थैंक्स बोल डालू. यह कहते हुए कि; "आपसे ही फ़ुटबाल है."
असली भारतीय फ़ुटबाल दीवारों, मिठाइयों और 'म्यूजीक' विडियो में कैद होकर विश्व फ़ुटबाल को हमारे योगदान की गाथा सुना रहा है. प्रियरंजन दाशमुंशी ने जब से होश संभाला, भारतीय फ़ुटबाल की देख-रेख की. अब वे नहीं हैं. अब पता नहीं कौन देख-रेख कर रहा है. हाँ, मुझे हमेशा यह भय सताए रहता है कि सत्तासी वर्षीय के करूणानिधि कल से इंडियन फ़ुटबाल फेडरेशन को संभालने न लग जाएँ.
अब चूंकि हम सांत्वना के लेन-देन से खुश हो लेते हैं तो मैं आपको एक सांत्वना देता हूँ और कहता हूँ; "फ़ुटबाल वह नहीं जो वर्ल्डकप में खेला जा रहा है. असली फ़ुटबाल वह है जो हम खेलते हैं. सांस्कृतिक फ़ुटबाल. और यही विश्व फ़ुटबाल को हमारी देन है."

