बहुत दिनों बाद कल रतिराम जी की दूकान पर जाना हुआ. बहुत दिनों बाद इसलिए क्योंकि करीब ढाई साल हो गए, हमने पान खाना छोड़ दिया है. जाने का प्रयोजन यह कि पान के शौक़ीन हमारे मित्र तारकेश्वर मिसिर 'ढेर' दिन बाद मिले. पता नहीं कब और क्यों शुरू हुआ लेकिन पिछले करीब पंद्रह सालों से तारकेश्वर हमें और हम उन्हें बाबा कहकर संबोधित करते रहे हैं. खैर, बाबा से मेल-मिलाप हुआ. दोनों ने मिलकर देश की हालत पर चिंता व्यक्त की. कई दिनों से हम अकेले ही चिंता व्यक्त कर रहे थे. तारकेश्वर मिले तो मन में आया कि ढेर दिन बाद मिले हैं आज तो देश की हालत और खराब होते ज़माने पर चिंता व्यक्त करके मज़ा ही आ जाएगा. दोस्तों के साथ मिलकर चिंता व्यक्त करने का मज़ा और ही है. और फिर अभी तो छब्बीस जनवरी का मौसम चल रहा है. अब देश के बारे में चिंता व्यक्त नहीं करेंगे तो इतिहास हमें माफ़ नहीं करेगा.
एक बार चिंता व्यक्त कर देते हैं तो करीब दस दिन तक लगता है कि देश के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभती जा रही है.
खैर, बात शुरू हुई; "क्या लगता है? यूपी में क्या होगा?" और ख़त्म हुई इस बात पर कि; "बताइए ई लोग़ हरी कुंज़रू को जयपुर फेस्टिवल से जाने के लिए बोल दिया?" और ये कि; "आमिर खान टीवी पर बताते नहीं थकते कि अतिथि देवो भव"
चिंता वगैरह व्यक्त करके बोर हो लिए तो तारकेश्वर बोले; "अच्छा बाबा, रतिराम जी का हाल कैसा है?"
मैंने कहा; "ठीक ही होंगे. बहुत दिन से उनके दूकान पर नहीं गए. जायें भी कैसे, अब तो पान खाना ही छोड़ दिए."
तारकेश्वर बोले; "चलिए आज हुयें चलते हैं. हुयें चाय-पान हो जाएगा और रतिराम से मुलकात भी हो जाएगा."
दोनों गए. देखा रतिराम जी हमेशा की तरह व्यस्त थे. देखकर बोले; "अरे, आज सूरज पच्छु से कैसे उग गया? दुन्नो मिसिर महराज एक्के साथ? का हाल है?"
मैंने कहा; "ऐसा मत कहिये. आपके दूकान पर इतना दिन बाद नहीं आये कि सूरज का उदाहरण दें. क्या हाल है? एतना कपड़ा काहे लादे हैं?"
वे बोले; "कहिये मत. आ ई कलकत्ता का मौसम भी आपके सेंसेक्स के माफिक हो गया है. पिछला पचीस दिन में चार पर गर्मी आयी और चार बार जाड़ा. आ कभी-कभी त ऊ हाल हो जाता है. ऊ का कहते हैं आपलोग?"
मैंने कहा; "क्या कहते हैं हमलोग?"
वे बोले; "अरे ओही भाई जो आपलोगों का बिजनेस में है न. अरे ओही पर तो सारा दिन जगत बोस ज्ञान देते हैं."
मैंने कहा; "जगत बोस, माने वो टीवी पर जो आते हैं? वो स्टॉक अनालिस्ट?"
रतिराम राम जी सिर खुजलाते हुए याद करने की कोशिश करते हुए बोले; "अरे भाई ओही जो ऊ टीविया पर बताता है. आ केतना बार त एहीं पान खाते-खाते बोला है. हाँ, ऊ कहता है न इंट्रा-डे फ्लक्चुएशन. माने एक दिन में बाज़ार बहुत भोलेटाइल रहता है त उप्पर-नीचे करता है न, ओइसे ही ई मौसम भी हो गया है."
मैंने कहा; "हाँ, सही कहा आपने. बिलकुल वोलेटाइल मौसम हो गया है. अच्छा चाय पिलाइए."
उन्होंने चाय दूकान पर बैठे 'कारीगर' से दो चाय बनाने के लिए कहा.
मैंने कहा; "और बताइए, धंधा कैसा चल रहा है?"
वे बोले; "आ हमें कौन सा अपना पान अमेरिका एस्पोर्ट करना है? हमरा ग्राहक सब त एही है. ओइसे भी देश का कंडीशन जेतना भोलेटाइल रहेगा हमरा धंधा ओतना बढ़ेगा. जानते ही हैं बिना चाय-पान का न त कौनो डिस्कशन ठीक से होता है आ न ही कौनो चिंता पूरा तरह से व्यक्त हो पाता है."
मैंने बात आगे बढ़ाते हुए पूछा; "और आपका बेटा कैसा है?"
मेरा सवाल सुनकर लगा जैसे उन्हें कुछ अच्छा नहीं लगा. बोले; "जाने दीजिये. उसका बारे में नहीं पूछिए ओही अच्छा है."
मैंने कहा; "क्या हुआ? कुछ गड़बड़ कर दिया क्या?"
वे बोले; "गड़बड़? आ छोटा-मोटा गड़बड़? आप त जानते ही हैं कि पढ़ाई-लिखाई का बारह त पहिले ही बजा ही हुआ था. हम सोचे कि पढ़ेगा-लिखेगा नहीं त घर का बिजनेस में लग जाएगा लेकिन उसका बास्ते भी तैयार नहीं है."
मैंने कहा; "लेकिन वो तो दसवीं में तो पढ़ ही रहा है."
वे बोले; "अब मत बोलावाइये. पढ़ त का रहा है हमरा कलेजा पर मूंग दल रहा है."
मैंने कहा; "बताइए भी तो क्या हुआ?"
वे बोले; "ई मलंचा सनीमा के पास में में ऊ ए गो डांस इस्कूल खुला था न."
मैने कहा; "अच्छा, वो गणेश आचार्य का. वो मुंबई वाले?"
वे बोले; "अरे हा, ओही. छौड़ा दू साल उहाँ डांस सीखा. तीन-चार बार ट्राई किया रियल्टी शो में. कहीं नहीं हुआ. अब उसका उप्पर ऊ का कहते हैं रोडी बनने का भूत सवार हुआ है. अब लोफरवा सब के साथ मोटरसाइकिल दौडाने का प्रेक्टिस करता है. कहता है रोडी बनेगा. केतना समझाये कि बारह क्लास तक भी पढ़ लेगा त बिहारे में नीतीश बाबू का नया वाला जो प्लान है उसमें टीचरे बन जाएगा बाकी सुने तब न. आ कहता है कि बाबू, एक बार सलिक्शन हो गया त सीधा करोड़ों में खेलूंगा. अब इसको कौन समझाये कि ससुर तुम्हरे जईसा लाखों ट्राई मार रहा होगा. केतना रोडी बनेगा उसमें से? "
मैंने कहा; "एक ही दिन में सब नाम कमा लेना चाहता है जवान लोग़."
मेरी बात सुनकर हल्के से मुस्कुरा दिए. बोले; "आ देखिये ई जो इंस्टेंट फेम का चक्कर है ऊ खाली जवान सब के माथा में नहीं घुसा है. का जवान, का लड़िका और का बूढ़ा, सब का हाल एक्के है. रश्दी जी को ही ले लीजिये. मनई जयपुर आया नहीं बाकी इंस्टेंट फेम कईसे मिला, देखिये? जो ससुर नाम भी नहीं सुना था ऊ भी पेपर में उनका जीवनी बांच रहा है."
मैंने कहा; "हाँ, सही कह रहे हैं.
वे बोले; "अब आप ही बताइए कि प्रचार का अईसा सुबिधा कहाँ मिलेगा? जौन लेखक का किताब सब भूल गए थे, ओही लेखक का न सिर्फ ओही किताब लेकिन बाकी सब किताब का भी बिक्री बढ़ गया होगा. आ आज का पेपर में निकला है कि पिछला पाँच दिन से इन्टरनेट पर अभी खाली रश्दी ही छाये हुए हैं. पूरा दुनियाँ ओनही के बारे में बात कर रहा है. बाकी उसका भी गलती नहीं है. जब उसको फिरी में एतना प्रचार मिल रहा है त उ भी थोड़ा कुछ इधर-उधर बोल के मामला आगे बढ़ा दे रहा है."
मैंने कहा; "ऐसा ही तो हो रहा है."
मेरी बात सुनकर बोले; "बाकी एक बात बताइए. ई अईसा फेस्टिबल सब भी हमको त पता ही नहीं चलता कि काहे होता है? हम ई बात इसलिए कह रहे हैं कि बड़ी पोलिटिक्स होता है इसमें. देखे हैं न कलकत्ता बुक फेयर. हम त सालों से दूकान लगा रहे हैं. केतना बार देखे हैं कि आयोजक लोग़ सब बड़ी बदमाशी करता है. आ आपको ए गो सच्चा घटना बताते हैं. कविता पाठ होने वाला था. एक आयोजक आया और एक्के साथ आठ पान ले गया. आ बिसबास नहीं कीजियेगा कि ओही सब कबी लोगों को खिला दिया पनवा सब, जिसका कबिता नहीं सुनना चाहता था लोग़. आ उहाँ थूकने का जगह नहीं. कबी सब का मुँह बंद. ऊ लोग़ कबिता ही नहीं सुना पाया. अईसा पोलिटिक्स भी देखे हैं हम."
मैंने कहा; "देखिये पोलिटिक्स तो हर जगह होती है."
वे बोले; "ऊ तो मानते हैं बाकी साहित्य वाला सब का पोलिटिक्स बड़ा अजूबा होता है. एक से एक सीन दिखाई देता है. हम त अनुभव किये हैं. केतना बार देखे हैं कि कोई लेखक अपना ही उपन्यास का दू पेज पढ़ के बईठ गया आ पता नहीं कहाँ खो गया. देख के लगता है जईसे अपना ही किताब पढ़ के शाक लग गया है औ एही सोच के चिंता कर रहा है कि ई का लिख दिए हम. केतना को त देखकर लगता है जईसे ई नहीं आया होता त फेस्टीबले नहीं होता. कोई-कोई त कागज़ पर सवाल लिख के लाता है. ई अलग बात है कि उसका नंबर भी नहीं आता है कि लेखकवा से सवाल पूछ सके."
मैंने कहा; "भीड़ भी तो बहुत रहती है."
वे बोले; "बस एक्के बात समझ में नहीं आता. ई एतना भीड़ होता है अईसा जगह बाकी साहित्त कोई पढ़ता नहीं है. केतना पब्लिक सब त एही बास्ते जाता है कि उसका चेहरा टीवी में दिखाई देगा. आ ई जयपुर फेस्टीबल को ही ले लीजिये. केतना त दिल्ली से गया है खाली इस बास्ते कि उहाँ जाएगा त फेसबुक पर फोटो छाप सकेगा. इस्टेटस लिख सकेगा."
मैंने कहा; "सब के केस में ऐसा नहीं है. ज्यादातर साहित्य प्रेमी ही जाते हैं."
वे बोले; "आ आप ई कह रहे हैं? आप? का आप नहीं जानते कि का सही है? अरे केतना सब को खाली देखा है कि मिनट-मिनट पर गुलज़ार साहेब का फोटो सटाए जा रहा है फेसबुक पर ताकि उसको सब साहित्त प्रेमी समझें."
मैंने कहा; "आप को कैसे पता? क्या आप भी फेसबुक पर हैं?"
वे बोले; "काहे, हमको फेसबुक पर जाने का मनाही है का? हम त बहुत दिन से फेसबुक पर हैं. आ हमको मालूम है आप भी वहाँ हैं. केतना बार आपका इस्टेटस में चिरकुट शेर सब पढ़े हैं हम. ओही सब घटिया शेर जो आप टांकते हैं वहाँ. हम सब पढ़े हैं."
मैंने कहा; "तो आप फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजे काहे नहीं?"
वे बोले; "हम आपको इमबरास नहीं करना चाहते थे. हम सोचे कि हम आपको फ्रेंड रिक्वेस्ट भेज देंगे त आप शरमा जायेंगे. ई सोच के कि आपका चिरकुट स्टेटस सब हम भी पढ़ते हैं."
मैंने कहा;"नहीं ऐसी बात नहीं है. शरमाना ही होता तो लगाते क्यों?"
वे बोले; "बस एही इस्पिरिट रहना चाहिए. ई न रहेगा त इस्टेटस नहीं डाल सकेंगे. चलिए हम भेज देंगे फ्रेंड रिक्वेस्ट. बाकी हमरा ए गो पेज है, रतीराम का पान के नाम से. उसको जरा लाइक कर दीजियेगा."
मैंने कहा; "आज ही कर देंगे. और आप फ्रेंड रिक्वेस्ट फेजिये. हम जल्दी से अपना फ्रेंड लिस्ट बढ़ाना चाहते हैं."
हम और तारकेश्वर चाय-पान करके चले आये. साथ में रतिराम जी का लिखा एक लेख ले आये हैं. जल्द ही ब्लॉग पर छापेंगे.
Monday, January 23, 2012
"रतीराम का पान" ज़रा लाइक कर दीजियेगा.
Friday, January 1, 2010
रतिराम भिसेज यू हैपी न्यू इयर
ई नया बरस का आता है पान-छ दिन के लिए पूरा सिस्टमे बिगाड़ देता है. ऊपर से केवल नया बरस ही नहीं आता, पुराना चल भी जाता है. ई तीन-चार दिन में अईसा-अईसा सीन सब मिलता है देखने को कि बस पूछिए ही मत. पूरा साल मुंह में पान दबाकर रखने वाला पब्लिक सब चार दिन पहिले से पाने खाना बंद कर देता है. कहता है डिस्को में जाना है आ अईसे में दांत-वोंत साफ़ रहना चाहिए. लीजिये पूछिए ई चिरकुट सब से कि पूरा साले तो पान खाता है बाकी चार दिन के लिए अँगरेज़ बनकर का साबित करना चाहता है?
पचास-बावन का उमर वाला भी का कपड़ा चेंज हो जाता है. जींस पहिनता है औउर जीन का जैकिट डालकर चलता है. गर्मी का दिन में धूपी चश्मा भले ही न पहिने बाकी किर्समस का दिने से सबेरे आठे बजे से ही धूपी चश्मा पहिनता है. आ चाहे बिकट कोहरा छाया हो. ऊ सब भूल जाएगा. हम कहते हैं ई कौन हिसाब है कपड़ा पहिनने का? देखी-देखा पाप औउर देखी-देखा पुन्नि? तुम्हरा उम्र में औउर तुम्हरा बेटा का उम्र में कौनौ फरक है कि नाही?
पिछला चार दिन से बेटा डेली पार्क इसट्रीट जा रहा है. रात के नौ बजे रोजे चल देता है. अपना माई से बोलकर जाता है कि साथी सब के साथ जा रहा है डिस्को में. दू बरस हो गया इसको एक ही किलास में अटके हुए. इतना डेडीकेशन पढाई में देखाता त आज दसवीं का इंतिहान का तैयारी कर रहा होता. डाऊट होता है कि कौनौ रेस्टूरेंट कम बार में कैबरे देखने जाता है. अजीब हालत हो गया है. ई महिना में न जाने कौन-कौन से देश से नर्तकी सब भारत में आता है. किसी रेस्टूरेंट में मिश्र से त किसी रेस्टूरेंट में उज्बेकिस्तान से. हम कहते हैं ई लोग अपना देश छोड़कर भारत में नाचेगा नहीं त का नया साल नहीं आएगा? त भारत का पुराना साल में रह जाएगा और बाकी देश में नया साल में पहुँच जाएगा?
अजीब हालत हो गया है. बारह बजा नहीं कि जो धूम-धड़ाका शुरू हुआ. बम्ब-पटाका छोड़ रहा है सब. ऊ भी इतना बड़ा तादात में कि पूछिए ही मत. दिवाली में बम्ब-पटाका बंद है हमरे शहर में. बाकी ई नया साल के लिए बंद नहीं है. हम पूछते हैं काहे जी? काहे नहीं नया साल के उपलक्ष में जो कुछ आतिशबाजी करता है पब्लिक सब, उसको काहे नहीं अरेस्ट करता है पुलिसवा सब? अलग-अलग प्रावधान है का कानून में भी? ई का जबाब कौन देगा? हम कहते है पटाका नहीं फोड़ोगे तो त का नया साल नहीं आएगा? अभी दस दिन त हुआ जब कोपेनहैगेन में बिकट हडकंप मचाया था पब्लिक सब कि बाताबरण खराब हो रहा है. दस दिन में ही भूल गया सब? स्थिति चेंज हो गया का?
इहाँ चाह-पान का बिक्री बंद हो गया है. किसी चीज का बिक्री हो रहा है त ऊ है दवा का और दारू का. अईसा नज़ारा देखने को मिल रहा है दारू का दूकान पर सब कि पुछिए ही मत. आ लम्बा-लम्बा लाइन. बाप रे बाप. देखकर लगता है कि अईसा का हो गया है? कोई देखेगा त सोचेगा कि केरासिन का दूकान पर गरीब सब दू-दू लीटर केरासिन के लिए लाइन लगाया होगा. कोई बोतल पैंटे में खोंसते हुए नज़र आता है त कोई झोला में रखते हुए. हम पूछते हैं ईसा का नया साल है त कौनौ किताब में लिखा है कि दारू पीना ज़रूरी है? बाकी सुनेगा कौन?
एही पब्लिक सब दारू पीएगा औउर पिकनिक पे जाएगा. एक्सीडेंट का हालत ई है अगला चार दिन में हर दूसरा घंटा में एक एक्सीडेंट होगा. दारू पीकर गाड़ी चलाएगा सब और पिकनिक मनायेगा. देखकर लगता है जैसे कौन कहता है कि पब्लिक सब मंहगाई से परेशान है? मंहगाई से परेशानी होती त पब्लिक का ई हालत थोड़े न होता. बिकट कन्फ्यूजन होता है पब्लिक सब को देखकर. पिछला चार दिन में पब्लिक को देखकर सिद्धू जी महराज का पब्लिक का बारे में कहीं पर कहा गया बात ध्यान हो आया. पब्लिक का बारे में महाराज कहते हैं;
"ओये सुन ले गुरु, ये पब्लिक भी क़माल है. लोग सुबह उठकर अखबार देखते हैं और जिस दिन कहीं कोई ब्लास्ट न हो, कोई डिजास्टर न हो, उस दिन पेपर पटककर झट से कह देते हैं, क्या यार आज पेपर विच कोई मज़ा नहीं आया. इसकी दिमाग की बत्ती का तो मती पूछो, न जाने कब इसकी बुद्धि सटक जाती है और बड़े से बड़े पोलिटिकल पहलवानों को भी पार्लियामेंट के बाहर पटक आती है. क्यों करता है देश की तरक्की की बातें, इससे ये पब्लिक कट जाती है. अरे यार ये पब्लिक भी कोई पब्लिक है गुरु, जो दस किलो फ्री चावल से पट जाती है."
खैर, अब पब्लिक है. सुनते है लोकतंत्र वाली पब्लिक है. अईसे में जो करेगी और कहेगी, ठीके कहेगी और करेगी. आप सब लोगन को नए बरस की हार्दिक शुभकामनाएं. मस्त रहिये. पान खाते रहिये और रंग जमाते रहिये.
नोट:
मिसिर बाबा कह रहे थे कि संजय बेंगानी जी को हमरे लेखन से लगाव टाइप हो गया है. पता नहीं मिसिर बाबा सच बोल रहे थे या फिर हमको उकसा रहे होंगे ताकि एकाक गो लेख ले सकें. ब्लॉगर हैं. अईसे में ई मनई कुछ भी कर सकता है. बाकी फिर सोचते हैं कि जो लिखे हैं, ऊ भी कौन काम आएगा? गल्ला का ड्रावर में पड़े-पड़े फट जाएगा आ इससे बढ़िया तो ईहे है कि मिसिर बाबा को दे दें. ब्लॉग पर छाप लेंगे
Monday, September 21, 2009
आये हैं तो कुछ रंग डालिए
रतिराम जी की दूकान पर गया कल. बहुत भीड़ थी. पूजा के मौसम में भीड़ जायज भी है. एक दम अंतिम लाइन में कुछ देर खड़े रहे. लगा पान पाने के लिए बहुत टाइम लगेया, सो चले आये. दो घंटे बाद फिर गए. मैंने कहा पान लगाइए.
वे बोले; "पिछला बार आये थे, रुके, फिर चले काहे गए? आप चले गए त लगा जईसे चीन वाले सैनिक सब जैसी सोच काहे नहीं रखते हैं?"
मैंने कहा; "नहीं, वो बात नहीं है. लेकिन आप चीन के सैनिकों से मेरी तुलना कर रहे हैं?"
वे बोले; "त औउर का करें? हमको लगा आप चीनी सैनिकों की तरह आये, पता नहीं का देखा औउर वापस चले गए. औउर कुछ नहीं त एगो पान खाते और इहाँ का जमीने रंग देते."
उनकी बात सुनकर हंसी आ गई. वे बोले; "हंसिये मत. ऊ लोग भी त एही किया न. आया था लोग और कुछ नहीं त पत्थरे रंग कर चला गया."
मैंने कहा; "हम तो पान खाने आये थे. यहाँ जब पान नहीं मिला तो कुछ रंगने का सवाल ही नहीं था."
वे बोले; "आ नहीं. अईसा नहीं होना चाहिए. जब आये हैं त कुछ कर के जाइए. देखिये चीन का सैनिकवा सब आया. औउर कुछ नहीं त पत्थरे रंग दिया. लालरंग से. इसको कहते हैं रंगबाज सैनिक."
मैंने कहा; "हाँ वो तो है. लेकिन इतनी भीड़ देखकर..."
वे बोले; "सीखिए कुछ ऊ लोग से. आपका तरह ऊ लोग भी भीड़ देखता त बिना रंगे ही चला जाता. सोचिये, ऊ लोग सोचता कि अभी त पाकिस्तानी सब भीड़ लगा कर रक्खा है. कहीं-कहीं बंगलादेशी भी है. अईसे में चलो वापस. जब ई लोग चल जाएगा, त फिर आयेंगे और रंग डालेंगे. लेकिन नाही. ऊ लोग आया, पत्थर सब को रंगा तब गया."
मैंने कहा; "हाँ वो तो है. ऐसा पहली बार देखने को मिला कि दूसरे देश के लोग पत्थर रंगने के लिए आये."
वे बोले; "आप भी न. अईसा का पहला बार हुआ है. औउर जो लोग को ऊ लोग पहले ही रंग दिया है, ऊका हिसाब नहीं रखते आप?"
मैंने कहा; "आप के कहने का मतलब?"
वे बोले; "मतलब का आपको नहीं बुझाता है? अपना देश का न जाने केतना सब के ऊपर चीन का रंग पाहिले से ही चढ़ा हुआ है. ऊ लोग पूरा सराबोर है चीन के रंग में. का सत्ता वाला औउर का भत्ता वाला. नीलोत्पल बसु को नहीं देखे का टीवी पर? देखते तो पता चलता कि लाल रंग से केतना नहाये हुए हैं."
मैंने कहा; "हाँ एक दिन देखा था मैंने उनको."
वे बोले; "सोचिये कैसा चिरकुट है. कह रहा था कि कौनो सीरियस बात नहीं है."
मैंने कहा; "हाँ. लेकिन यही बात तो सरकार के विदेश मंत्री भी कह रहे हैं."
वे बोले; "ऊ काहे नहीं कहेंगे? जो मनई सब फाइभ इस्टार का पर्शीडेनशियल सूट में ठहरेगा ऊ को त सब हरियाली ही दिखेगा न. ऊ तो डेढ़ लाख रोज का भाड़ा दे रहा है. अईसे में उसको मन में शिकायत का भाव नहीं न आएगा."
मैंने कहा; "आपकी इस बात में दम है."
वे बोले; "खाली इस बात में? आपको नहीं लगता कि हमरा हर बात में दम ही रहता है?"
मैंने कहा; "मैं मानता हूँ कि आपकी हर बात में दम है. लेकिन सरकार कह रही है कि ज्यादा चिंता करने की ज़रुरत नहीं है."
वे बोले; " सरकार वाला बड़ा आदमी है सब. उन लोगों को चिंता काहे होगा?"
मैंने कहा; "सरकार का कहना है कि सब मीडिया का क्रिएट किया हुआ है."
वे बोले; "बस अब एक ही बात बाकी है. ऊ भी बोल ही देना चाहिए."
मैंने पूछा; "कौन सी बात?"
वे बोले; "एही कि चीन का सैनिक सब को मीडिया बोलाता है ताकी न्यूज बनाया जा सके."
मैं उनकी बात सुनकर मुस्कुरा दिया. मैंने कहा; "चलिए अब जो होगा सो देखा जाएगा. पान खिलाइए."
वे बोले; "अभिये खाइए."
पान खाकर चला आया. चीनी से परेशानी नाप रहा हूँ अब. क्या करूं? त्यौहार का मौसम है न.
Wednesday, April 22, 2009
हमरे बाबू ही देश का सबसे बढ़िया प्रधानमंत्री साबित होंगे
चुनाव के मौसम में लगता है रतीराम जी का लेख ही छापना पड़ेगा. इतना सारा लेख छापने के बाद लग रहा है कि चुनाव तक अपने ब्लॉग पर रतीराम जी का ही डंका बजने दें. तो लीजिये उनका लिखा हुआ एक अउर लेख बांचिये. आज मामला प्रधानमंत्रित्व का है.
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चुनाव का मौसम सबको पागल कर देता है.
आज बेटा बोला; "बाबू, आपसे एगो काम था."
हम सोचे इसका अइसा कौन काम जो हम कर सकते हैं. सोचते-सोचते पूछ लिए; "ससुर, तोहरा भी कोई काम है जो हम कर सकते हैं? आज सूरज पच्छू से उग गया है का?"
बात सुनकर हंसने लगा. बोला; "आपका ही इंटेरेस्ट का काम है."
हम बोले; "तुम हमरा इंटेरेस्ट का बारे में कब से सोचने लगा? आ, सोचता ही होता त कक्षा सात में दू साल से फेल नहीं होता."
ऊ बोला; "हमको शंका का निगाह से हमेशा ही देखते हैं आप. काहे नहीं विशबास रखते कि हम भी कुछ कर सकते हैं. ऊ भी आपका खातिर. आपका इंटेरेस्ट का बास्ते."
हारकर आखिर पूछना पड़ा कि काम का है?
ऊ बोला; "बाबू, ऊ राम बरन उकील का रिश्तेदरवा है न...अरे ओही जो जो सीसीटीवी न्यूज़ चैनल में काम करता है."
हम बोले; "ऊ महेशवा?"
बेटा बोला; "हाँ हाँ..ओही."
हम बोले; "ऊ से तोहरा का काम पड़ गया?"
बेटा बोला; " बाबू उसको कहिये न कि एक बार हमरा इंटरव्यू ले ले."
हम बोले; "तुम्हरा इंटरव्यू! तुम का बोलेगा रे?"
बेटा बोला; " हम देश को बताएँगे कि हमरे बाबू ही देश के लिए सबसे बढ़िया प्रधानमंत्री साबित हो सकते हैं."
एक बार सुनकर लगा कि पागल त नहीं हो गया. ओइसे भी कलकत्ता में चार-पांच दिन से एतना गरमी पड़ रहा है कि पब्लिक सब का पागल होने का चांस बढ़ गया है. बिजली ऊपर से रोजे गायब रहती है.
फिर भी हम बोले; "लेकिन ई बात तोरे दिमाग में काहे आया रे?"
बेटा बोला; "काहे नहीं आएगा? राहुल का सिस्टर प्रियंका कहती है कि उसका ब्रदर प्रधानमंत्री बनने लायक है. पवार का डाटर कहती हैं कि ओनका डैड में प्रधानमंत्री बनने का सारा गुन है. अब त मनमोहन सिंह जी का मिसेज आ डाटर भी कह रहा है कि सिंह साहब ही देश के सबसे बढ़िया प्रधानमंत्री साबित होंगे.....हम सोचे हमहू कह दें कि हमरे बाबू ही देश के सबसे अच्छे प्रधानमंत्री साबित होंगे."
सुनकर लगा कि दू तमाचा गिफ्ट कर दें. पढाई-लिखाई में मन नहीं लग रहा है बाकी पालिटिक्स में ज़रूर लगता है. फिर भी गुस्सा संभाल लिए.
हम बोले; "लेकिन हम त लोकसभा के लिए खड़े भी नहीं हुए हैं. तेरा इंटरव्यू देखकर पब्लिक सब हंसेगा कि नहीं?"
ऊ बोला; "त मनमोहन सिंह जी भी लोकसभा के लिए कब खड़े हो गए? अउर फिर, आपको का लगता है, ई राहुल का सिस्टर अउर सिंह जी का डाटर सब का बात सुनकर पब्लिक रो रहा है? ओनका बात सुनकर भी पब्लिक हँसिये रहा है. हमरा बात सुनकर भी हँसेगा."
बुझाया नहीं कि बोलें का? आपको कुछ बुझाया हो त आपे कुछ कहिये.
Monday, April 20, 2009
हमरा ताकत लेकर नेतवा सब ताकतवर हो जायेगा.
फ़िल्मी दुनियाँ वाले वोटरों को बता रहे हैं कि वोट बहुत ताकतवर होता है, इसलिए वोट दीजिये. इस बात पर रतीराम जी का कहना है कि; "ससुर, जब भोट में ताकत होता ही है त हम अपना भोट नेतवा सब को काहे दें? हमरा ताकत लेकर नेतवा सब ताकतवर हो जायेगा."
बात चली तो बोले; "निकाल दिए हैं मन का भड़ास कागज़ पर. चाहिए त ले जाइये. छाप दीजियेगा."
हम उनका लेख लेकर आये हैं. छाप रहे हैं. आप बांचिये.
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ई फिलिम वाला सब आत्मविश्वास से लबालब भरा रहता है. तरह-तरह का आत्मविश्वास का मारा हुआ. किसी का चिरकुटई से भरा फिलिम हिट होकर इतिहास क्रिएट कर देता है त उसका आत्मविश्वास औरउ बढ़ जाता है. ऊ सोचता है कि ऊ जो भी बोलेगा, जनता सुनेगी. कुछ भी उगलेगा त जनता उहे मानेगी.
कोई कोई हीरोइन त टीवी कैमरा पर इहे बोल कर पांच मिनट तक हंसती है कि; "आय ऍम अ बिग फूडी..."
हम कहते हैं कि तुम्हरे पास पइसा है. तुम फूडी बनो आ चाहे जो. ईमे हंसने का है कुछ? लेकिन नाही. उनका अपना आत्मविश्वास पर बहुत कांफिडेंस है. ऊ त इहे बोलकर हँसेगी. जानती है न कि टीवी देखने वाला न जाने केतना लोग ई बात को अपना डायरी में नोट करने के बास्ते मारा जा रहा है.
एगो आमिर खान हैं. कहते हैं; "भोट दो. भोट बड़ा ताकतवर होता है."
भइया हमें त मालूम ही नहीं था. आप बताये त हमें पता चला कि भोट बहुत ताकतवर होता है. आखिर ताकतवर नहीं होता त ई नेतवा सब हमारा ताकत के पीछे काहे पड़ता. सोचता होगा कि भोटरवा सब का ताकत हथिया लो. खुद ताकतवर बन जाओ.
आमिर खान त ई सब बात बता ही रहे थे. अब करन जौहर भी आठ-दस लोगन का लेकर कह रहे हैं कि भोट दो. भोट दो.
बता रहा है लोग कि; "भ्रष्टाचार, आतंकवाद, जुलुम बगैरह एही वास्ते फैला कि हम भोट नहीं देते."
लो सुन ल्यो बात. पिछला साठ साल से हम अउर का दे रहे है. साल-दू साल में भोट देते हैं अउर हर साल टैक्स. भोट अउर टैक्स देने के अलावा बाकी हम कुछ देने लायक नहीं है. बेटा-बेटी को सलेट-पेंसिल दें चाहे नहीं, बाकी नेतवा सब को भोट अउर सरकार के टैक्स ज़रूर देते हैं."
अउर फिर भोट देकर आतंकवाद रुक जायेगा? भ्रष्टाचार रुक जायेगा? ससुर तुम्हरी समझ का घास चरने गई है? ई नेतवा सब भोट पाकर ही त मस्त है. तुम कहते हो अउर भोट दो. कोई इनसे काहे नहीं पूछता कि भोट देने से आतंकवाद कईसे ख़तम हो जायेगा? भ्रष्टाचार कईसे ख़तम हो जायेगा?
जिनको ई सब ख़तम करना है ऊ लोग भोट लेकर ही त वहां पहुंचा है जहाँ जाकर ई सब चीज को कंट्रोल किया जाता है. काहे नहीं कंट्रोल करता सब?
अउर तुम आ गए हो ई बताने कि भोट दो.
अरे तुम अगर इतना ही जागरूक करना चाहते हो जनता सब को त पाहिले अपना ही नगरी का उन चिरकुटों को काहे नहीं जागरूक करते जो पॉँच-दस लाख लेकर किसी का भी चुनाव प्रचार करने चला जाता है. मंच पर खडा होकर ठुमका लगाता है. गाना गाता है.
ससुर एक तरफ तुम लोग बता रहे हो कि भोट में ताकत होता है. दूसरा तरफ तुम्हारा ही फिलिम नगरी का न जाने केतना चिरकुट सब पइसा लेकर चुनाव प्रचार करता है. एक तरफ त तुम जनता को ताकतवर बता रहा है दूसरा तरफ तुम्हारा ही भाई बंधू लोग एही जनता को बेवकूफ समझता है. इतना बेवकूफ समझता है कि नाच-गाना करके उनका भोट न जाने कईसा-कईसा कंडीडेटवा सब को दिलाने पर आमादा है.
किसको ठीक माने? तुमको आ फिर उनलोगों को जो ठुमका लगाते हुए पईसा कमा रहा है? पहिले हमरे सवाल का जबाब दो, फिर हमको भोट देने को कहो.
Sunday, April 12, 2009
अब त अपना खुद का एगो ब्लॉग बनाना पड़ेगा....
पिछली पोस्ट जिसमें मैंने रतीराम जी का लेख प्रकाशित किया था, को पढ़ने के बाद कुछ ब्लॉगर साथियों ने डिमांड राखी कि रतीराम जी के और लेख पढ़वाए जाएँ. आज जाकर उनकी दूकान से लेख ले आये. चुनावी भाषणों में नेता जी लोगों की भाषा पर उन्होंने कुछ लिखा है.
आप बांचिये.
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नया कारोबारी साल शुरू हो गया. तमाम झमेला है. ख़तम होने का बखत भी झमेला. शुरू होने का बखत भी झमेला. हम कहते हैं कि ज़रुरत का है पुराना ख़तम करके नया शुरू करने का? कारपोरेशन वाला सब ट्रेड लाइसेंस री-न्यू करने के लिए माथा पर सवार है. अब हम अपना बिजनेस देखें कि कारपोरेशन जाकर ई काउंटर से ऊ काउंटर दौडें. कभी क्लर्के नहीं आता है त कभी कैशियर. एगो ट्रेड लाइसेंस रि-न्यू करने के लिए चार दिन जाना पड़ेगा.
पान लगाना और ग्राहक को खिलाना, लगता है एही काम करते-करते जिनगी बीत जायेगा. ग्राहक भी अईसे-अईसे कि बलिहारी जाऊं. लोग बोलता है सब कि रतीराम बहुत चूना लगाता है. कोई नहीं देखता कि खाता चलाने वाला ग्राहक सब जब-तब चूना लगाकर निकल लेता है.
एगो निंदक जी हैं, चार महीना हो गया हिसाब नहीं करते. ससुर पान का बीड़ा मुंह में दबाकर देश को सुधारने का बीड़ा जब-तब उठाये रहते हैं. इनके लगता है कि इनका भाषन देने से देश सुधर जायेगा. हम कहते हैं; "अरे पहिले खुद तो सुधरो. देश अपने आपे सुधर जायेगा."
बाकी इनका अन्दर आजतक सुधार का कौनो गुन्जाईस रत्ती भर नहीं लौका. जब-तब भाषन देता रहता है. कहता है देश का राजनीति से करप्शन हटा कर छोड़ेगा. खुद एतना करप्ट है कि मोहल्ला में कौनो दूकानदार बचा नहीं है जिसका उधार नहीं है इसका ऊपर. बड़ा-बड़ा बात करने का हो त देखिये फिर. थोडियो बहाना मिला नहीं इसको कि मोहल्ला बंद. चक्का जाम. दूकान बंद.
अऊर कुछ नहीं त चाट्ठो गुंडा लेकर सड़के जाम कर देता है. खुद को समाजसेवी बताता है ससुर. हम पूछते हैं, ई का है? अईसे ही देश सुधरेगा?
कल कह रहा था; "वरुनवा बड़ा खराब काम कर दिया. नौजवान नेता होकर इस तरह का भाषण नहीं देना चाहिए था उसको."
अब इनके कौन समझाए कि; "तुम कभी अपना भाषा के बारे में सोचा है? किस-किस तरह का भाषा उगलता रहता है, कभी विचार किया है इसके बारे में? जिसको-तिसको गाली-फक्कड़ देता रहता है और वरुनवा का विनाजी बतियाता है."
ओइसे देखा जाय तो वरुनवा भी कम नहीं निकला. हम पूछते हैं का ज़रुरत था अईसन भाषन देने का? अभी त राजनीति में इंटर किये हो तुम. पहिले कुछ सीखो. पुराना लोग को देखो. सीनियर लोग का भाषण सुनो. प्राइवेट में त ओइसे ही न जाने का का करते होगे? कम से कम पब्लिक में खड़ा होकर अईसा बात मत बोलो. देश का नेता बनो. न खाली हिन्दू-मुस्लिम का नेता बनोगे? सत्ता में नहीं हो तब त ई हाल है, सत्ता में बैठ जाओगे त न जाने का कर दोगे?
हम पूछते हैं; " रेलगाड़ी चलवाने का अईसा आदत पड़ गया है कि जो तो चलवा देंगे? और फिर रोलर ही त चलवा सकते हैं. और का कर सकते हैं? देश में मूंग त जाने कब से ख़तम होई गवा है. पहिले के लोग छाती पर मूंग दलते थे. अब खाने-पीने का चीज का ई हाल है कि मूंग त का, मटर भी नहीं मिलता. "
सोचे होंगे कुछ दलवा नहीं सकते त कुछ चलवा ही दें.
देखकर लगता है कि लालू जी भी का से का हो गए हैं? हम कहते हैं; कौनो जिम्मेदारी है कि नहीं? रोलर चलवा देंगे? अईसन सोच ही रखते हैं त काहे कानून का दोहाई देते हैं? आप ही फैसला कर लेंगे? आप ही रोलर चलवा देंगे? न्यायपालिका को पालिका बाज़ार से जादा नहीं समझते का? नेता हैं त जो चाहेंगे बोल देंगे?
बाकी देखा जाय त एही हो रहा है. नेता लोग न जाने का-का बोलकर निकल जा रहा है सब. एगो भाईको जी हैं. ओनका भारत के तमिल लोगों का ओतना चिंता नहीं है जेतना परभाकरण जी का चिंता है. ऊ भी कह रहे थे कि अगर परभाकरण जी को कुछ हुआ त तमिलनाडु में खून का नदी बह जायेगा.
हम कहते हैं; का भईया? कावेरी नदी का पानी तमिलनाडु तक कम ही पहुँचता है त इसका का एही समाधान है कि तमिलनाडु में खून का नदी बहा दो?
आज तुम अईसा बोल रहे हो. कल को कोई आसाम से खड़ा हो जायेगा. बोलेगा उल्फा के नेता सब को कुछ हुआ त असाम में खून का नदी बह जायेगा. ओइसे ही ब्रह्मपुत्र हर साले न जाने का-का बहा ले जाती है. खून का नदी बहना शुरू हो जायेगी त पूरा असमे बह जायेगा.
ई नेतवा सब को देश का पईसा बहाकर संतोख नहीं मिलता जो खून-वून का नदी बहाने के लिए धमकाता रहता है. चुनाव में एतना-एतना खर्चा कर देता है लोग. पता नहीं कहाँ से पईसवा आता है? सुने हैं इनकम टैक्स डिपार्टमेंट आम मनई का हर चीज का जानकारी रखता है. अब त ई बात टीवी पर बताकर जब-तब डराते भी रहता है. समझ में नहीं आता कि आम आदमी का हर जानकारी है तुम्हरे पास. और ख़ास आदमी का जानकारी नहीं है?
कहीं अईसा त नहीं कि आम आदमी का इनकम छोटा है बोलकर जानकारी रखने में सुबिस्ता है. खास आदमी का इनकम बड़ा है त जानकारी रखना कठिन हो जाता है.
और सारा जानकारी का खाली इनकम टैक्सवे को है? ऊ चुनाव आयोग के पास भी जानकारी-ओनकारी है कि नहीं? ठाकरे जी का ही बात ले लो. अरे ओही आमची मुम्बई वाले. उत्तर भारतीय सब को खदेड़ने वाले. हम पूछते हैं उनका बात का जानकारी काहे नहीं रखते हो?
बहुत लबेदर आदमी है. बताईये प्रधानमंत्री को इतना खराब बात कह दिया.
समाचार चैनलवा वाला सब देखा रहा है. बाकी जब ठाकरे का बोला हुआ शब्दवा आता है त एक ठो न जाने पी से बजा देता है. हम पूछते हैं काहे भाई? का ज़रुरत है अईसा करने का? जब एक मनई बोल ही दिया है त तुम्हरे पी बजाने से भाषन बदल जायेगा का? भोटरवा सब को सुनने दो कि उनका नेतवा सब कैसा-कैसा बात करता है?
याद आता है त बड़ा खराब लगता है आज का नेता सब का बात सुनकर. पहिले बाबूजी कहा करते थे कि शास्त्री जी केतना नीक भाषन देते थे. बाजपेई जी केतना बढ़िया बोलते थे. इंदिरा जी बढ़िया बोलती थीं. इतना बड़ा-बड़ा लीडर सब था. अऊर ई टुटपुजिया सब को देखो. ससुर हम त जानते हैं कि कुछ करने के लायक नहीं हो. अईसे में बातचीत त ढंग का करो. लेकिन नहीं. उहे बात है कि एक त करेला आ दुसरे नीम चढा.
का कहें? केतना कहें? ई त ओइसे ही है कि हरि अनंत, हरि कथा अनंता....
अई हो मईया. एतना लिखा गया? हम भी का-का करते रहते हैं. रात के नींद नहीं आ रहा त इहे लिख दिए. बाकी ई सब करने का फायदा का? आजकल त मिसिर बाबा भी हमरा लेख नहीं मांगते अपना ब्लॉग पर छापने के लिए. खाली सिंगुर पर लिखा एक पोस्ट छापकर चुप हो गए. लगता है इन्सीक्योर फील करता होगा मनई. पानवाला कहीं लेखक न बन जाए, एही बास्ते आजकल लेख नहीं मांगता.
अब त अपना खुद का एगो ब्लॉग बनाना पड़ेगा.
Saturday, April 11, 2009
औउर बहुत सा सीन दिखाई दे सकता है....का का लिखें?
बहुत दिन बाद कल रतीराम जी की दूकान पर गया था. पान खाने. आफिस जिस दिन बंद रहता है, उस दिन पान खाने के अलावा काम ही क्या है? छुट्टी वाले दिन पान खाने में सुभीता रहता है. फ़ोन-वोन ज्यादा नहीं आते लिहाजा पान का मज़ा पूरा मिलता है. एक बार मुंह में पान घुसा नहीं कि मौज ही मौज. फ़ोन नहीं आता तो पीक थूकने की जल्दी भी नहीं रहती.
खैर, रतीराम जी से बातचीत शुरू हुई. मैंने पूछा; "कैसा चल रहा है धंधा?"
वे बोले; "ई भी कोई पूछने का बात है? पान का धंधा ससुर अमेरिका के ऊपर थोड़े न निर्भर करता है. हमें कौन सा पान लगाकर एक्सपोर्ट करना है? हमरा कस्टमर तो ईहै रहता है."
मैंने कहा; "मतलब धंधा मस्त चल रहा है."
वे बोले; "इलेक्शन का मौसम में पब्लिक का स्टेटस बढ़ गया है. ई मौसम में लोकतंत्र उसी के हाथ में रहता है. बाकी सब त पब्लिक का नौकर चाकर हो जाता है लोग. अब पब्लिक मस्त है त हमरा धंधा भी मस्त है. ओईसे नेता लोग आजकल भाषण जादा दे रहा है त ऊ लोग पान कम खा रहा है. लेकिन नेता लोग का रस-विहीन भाषण पब्लिक झेल नहीं पा रही है त उसका कन्जम्पशन बढ़ गया है. ऐसे में बैलेंस बना हुआ है. बैलेंस बना का हुआ है, धंधा बढ़ गया है. पब्लिक जादा खा रही है त भाल्यूम का गेम काम कर रहा है."
मैंने कहा; "ये बढ़िया बात है. वाल्यूम गेम ही बिजनेस का असली आईडिया है."
वे बोले; "ठीक बूझे. ओइसे आप बताईये? सुना ब्लागिंग से रूठ गए थे?"
मैंने कहा; "नहीं ऐसी बात नहीं थी. असल में कुछ लिखने का मन नहीं कर रहा था. लेकिन ऐसा होता है."
वे बोले; " अरे त हमको बता दिए होते. हमी कुछ लिख देते. याद नहीं है? सिंगुर वाला हमरा पोस्ट केतना हिट हुआ था?"
मैंने कहा; "याद है रतीराम जी. लेकिन सच कहें तो हमें आपकी लिखी उस पोस्ट की वजह से आप से जलन होने लगी थी. इसीलिए मैंने आपकी लिखी हुई पोस्ट फिर पब्लिश नहीं की."
वे बोले; "बताईये, एक पानवाला का लेखन से एतना जलन है आपको त ब्लॉग-लेखकों से न जाने केतना जलते होंगे?"
मैंने कहा; "देखिये जलना तो बहुत आदमी का बेसिक कैरेक्टर होता है. वैसे आप कहते है तो दीजिये कुछ, मैं छाप दूंगा."
उन्होंने फट से पैसा रखने वाला ड्रार से तीन-चार पन्ने निकाले. बोले; "कौन सब्जेक्ट पर लेख दें आपको? कम से कम तीन सब्जेक्ट पर हाल ही में लिखे हैं. ई देखिये, ई वाला नेता लोगों का भाषा पर लिखे है.... ई वाला क्रिकेट पर लिखे है...औउर ई वाला देखिये, ई वाला जूता-काण्ड पर लिखे है. "
मैंने कहा; "कोई भी दे दीजिये. आप ने लिखा है तो बढ़िया ही लिखा होगा."
वे बोले; "त फिर जूता-काण्ड पर लेख ले जाइये."
मित्रों, उन्होंने हाल ही में हुए जूता-काण्ड पर मुझे लेख थमा दिया. मैं पब्लिश कर रहा हूँ. आप भी पढिये.
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आदमी का तकदीर ऊपर-नीचे होता रहता है. अईसा न जाने कौन बखत से होता आया है. लेकिन जूता का तकदीर? ई नहीं पता था कि जूता का तकदीर उसका ब्रांड पर निर्भर करता है. न जाने केतना बार बेटा को जूता फ़ेंक कर मारे होंगे. लेकिन मजाल है कि उसका अन्दर कोई चेंज आया हो. पिछला साल सातवीं में फेल हुआ था तब जूता फेंक कर मारे थे. लेकिन कोई असर नहीं हुआ. इस साल भी फेल हो गया. केतना चाहते है कि पढ़-लिख कर कुछ करे लेकिन इसका मन शायद बाप का फेमली बिजनेस को आगे बढ़ाने का ही है.
एक हमरा जूता है जिसको चलाने से कौनो असर नहीं होता. वहीँ पर पत्रकार लोग जूता चला देता है त तुंरत असर देखाई देता है. कल सोच रहे थे कि अईसा काहे है कि हमरा जूता असर नहीं देखाता और पत्रकार का जूता का असर ई होता है कि गुंडागर्दी पर उतारू नेता लोग भी गाँधी जी बन जाता है? तुंरत पत्रकार को माफ़ कर देता है.
बात चला त बेटा बोला; "बाबू, ई ब्रांड का असर है. आप जूता खरीदते हैं सुरेश चचा से. आर्डर देते है त सामान ओमान लाकर ऊ आपका जूता बनाते हैं. लोकल जूता फेंक कर मारने से कोई रिजल्ट नहीं आएगा. जरनैल सिंह जी ने जो जूता फेंक कर मारा था, ऊ रीबोक का जूता था. विदेशी ब्रांड. ऐसे में सरकार और नेता के ऊपर असर काहे नहीं होगा? नेता सब का ऊपर विदेशी चीज का असर ही होता है."
इच्छा त हुआ कि कह दें कि; "तुम भी त देसिये है. हमरा जूता भी देसी. तुम्हरे ऊपर काहे असर नहीं होता? ससुर इस साल पास हो जाते त आठ में चले जाते."
लेकिन चुप रहे. पता नहीं का उसके मुंह से निकल आये?
लेकिन ई बात मन में आता है कि जिस तरह से जूता-उता फेंकने का असर देखाई देता है, आनेवाला चार-पांच साल में त बहुत कुछ बदल जायेगा. बैठे-बैठे सोचे त लगा कि का नहीं हो सकता? सोचिये कैसा-कैसा सीन देखाई देगा.
पत्रकार ने कौनो अखबार में नौकरी का अर्जी दिया है. पत्रकार का बायो-डाटा को इंटरव्यू लेने वाला लोग उलट-पलट कर तीन-चार बार देख लिया है. इंटरव्यू ख़तम हो चुका है. पत्रकार हर सवाल का जवाब सही दिया है. उसका बायो-डाटा में क्वालिफिकेशन भी पूरा है. लेकिन उसको नौकरी नहीं मिला.
पत्रकार बेचारा परशान. इंटरव्यू लेने वालों से पूछेगा; " सर, हम त सब सवाल का जवाब सही दिए रहे. हमें नौकरी काहे नहीं मिल रहा है?"
इंटरव्यू लेने वाला बोलेगा; "एक बात में तुम पीछे रह गए. तुमको जूता फेंकने का एक्सपेरिएंस नहीं न है. एही खातिर नौकरी तुमको नहीं मिला. ऊ जिसको मिल रहा है उसका पास सात मंत्री और दू एमपी के ऊपर जूता फेंके का एक्सपेरिएंस है."
पत्रकार मुंह लटका लेगा. सोचने लगेगा कि; 'एक बार कोई अखबार बिना पईसा का ही रख ले. तीन-चार प्रेस कांफ्रेंस में जूता फेंककर एक्सपेरिएंस त ले सकेंगे. बाद में एक्सपेरिएंस का वजह से ही नौकरी मिलेगा.'
चिदंबरम साहेब होम मिनिस्टर हैं. उनके ऊपर सीबीआई का बजह से हुए सवाल-जवाब से जूता फेंका गया. हो सकता है दू साल उनका पार्टी उनको फाइनांस मिनिस्टर बनाना चाहे. सोचिये कैसा सीन हो सकता है.
प्रधानमंत्री बोलेंगे; "आप फाइनांस मिनिस्टर बन जाइये."
चिदंबरम साहेब बोलेंगे; "नहीं सर. हम नहीं बनेंगे."
प्रधानमंत्री पूछेंगे; "का हुआ? का दिक्कत है?"
चिदंबरम साहेब बोलेंगे; " पिछ्ला बार सीबीआई का बजह से हमरे ऊपर जूता फेंका गया था. हो सकता है फाइनांस मिनिस्टर बनने से आरबीआई का बजह से जूता फेंका जाए."
प्रधानमंत्री पूछेंगे; "ऊ काहे? ऐसा काहे सोचते हैं आप?"
चिदंबरम साहेब बोलेंगे; "हमको डर है कि ऊ फाइनांस कंपनी जो पब्लिक का पैसा री-पेमेंट नहीं कर पा रही थी त साल २००८ में सरकार में रहते हुए हम आरबीआई से लीपा-पोती करवा कर मोहलत दिला दिए थे. हमको लगता है ई फाइनांस कंपनी वाला अब की बार भी टाइम पर पब्लिक का पैसा पेमेंट नहीं कर पायेगा सब. फिर से आरबीआई से टाइम दिलाने का प्रेशर देगा. प्रेशर और पैसा या फिर पैसा का प्रेशर के चलते टाइम दिला देंगे. कोई पत्रकार पूछेगा कि ई फाइनांस कंपनी वालों को आपने टाइम काहे दिलवाया? उनका खिलाफ एक्शन काहे नहीं लिया? हम बोलेंगे कि आरबीआई भी सीबीआई का तरह ही इंडीपेंडेंट बॉडी है. इस बारे में हम कुछ नहीं किये हैं. जो किया है आर बी आई किया है. सोचिये कि अगर ऊ पत्रकार का अगर इस कंपनी में कोई डिपोजिट होगा त का हो सकता है. फिर से जूता चलने का चांस रहेगा."
प्रधानमंत्री बोलेंगे; "चिंता नहीं न करो. उस समय त इलेक्शन का बखत था त माफी-माफी खेल लिए थे. अभी त इलेक्शन होने में तीन साल का देरी है. ऐसे में पत्रकार को माफ़ नहीं करेंगे, पूरा साफ़ कर देंगे. तुम तो बस बन जाओ."
अईसा सीन भी हो सकता है.
हीरो, हीरोइन, क्रिकेटर, फुटबालर वगैरह को जूता का विज्ञापने नहीं मिलेगा. जूता बनानेवाला बड़ा-बड़ा कंपनी सब पत्रकार लोगों से जूता का विज्ञापन करवाएगा. एक-एक पत्रकार एक्स्पेरिंस का हिसाब से मॉडलिंग का फीस लेगा. पांच बार जूता फेंकने वाला पत्रकार का फीस बीस लाख होगा. जो पत्रकार का पास जूता फेंकने का एक्सपेरिएंस सात से दस बार तक होगा उसका फीस चालीस लाख होगा. सोचिये का सीन होगा?
टीवी वाला एंकर सब अपना-अपना चैनल का मालिक सब से बोलेगा; " हम स्टूडियो में एंकरिंग नहीं करेंगे. हमें फील्ड में काम दीजिये. हम प्रेस कांफ्रेंस में जाना चाहते हैं. जो लोग पहले से फील्ड में काम करके जूता-उता फेंक कर पैसा कम चुके हैं ऊन लोगन को अब स्टूडियो में बैठाईये. पैसा कमाने का हक़ त हमरा भी बनता है कि नहीं?"
अईसा भी होगा. मज़ाक नहीं कर रहे हैं.
ऊ दिखाई देगा अपने इष्टदेव सांकृत्यायन जी के ब्लॉग पर. अरे अपने इष्टदेव,... अरे ओही इयत्ता वाले. देखेंगे का? दू साल बाद ओनके ब्लॉग पर पब्लिक सब लाइन लगाये कमेन्ट पर कमेन्ट दिए जा रहा है. सब एक ही बात का शिकायत कर रहा है लोग. सब एही बात को लेकर हलकान हुए जा रहा है कि अथातो जूता जिज्ञासा का कड़ी नम्बर ५२३ काहे नहीं छपा?
का सोच रहे हैं? कड़ी नम्बर ५२३ कईसे? ता ऊ अईसे कि तब तक भारत में इतना जूता फेंका जायेगा कि इष्टदेव को ई अथातो जूता जिज्ञासा तब तक जारी रखना पड़ेगा.
औउर बहुत सा सीन दिखाई दे सकता है....का का लिखें?
Saturday, October 25, 2008
ई बाज़ार का अऊर का होगा?.....
बाज़ार गिर गया. गिरना ही था. कितने दिन खड़ा रहता? इमारतें गिरती हैं, पेड़ गिरते हैं, ब्रिज गिरते हैं, नेता गिरते हैं. और तो और इंसान भी मौका देखकर गिर लेते हैं. देखा-देखी बाज़ार भी गिर लिया. आख़िर सबकुछ गिर रहा था. अब ऐसे में अगर बाज़ार न गिरता तो उसकी बड़ी किरकिरी होती.
वैसे भी, बाकी सबलोग गिरते-गिरते बाज़ार को हेयदृष्टि से निहारते होंगे. कहते होंगे; "एक हम हैं जो गिरते जा रहे हैं और एक तुम हो जो खड़े हुए हो. ज़रा भी शरम नहीं बची है तुम्हारे अन्दर? इतनी भी औकात नहीं कि गिर जाओ."
बाज़ार को इन इमारतों, ब्रिजों और इंसानों की हेयदृष्टि बर्दाश्त नहीं हुई होगी और गिर लिया. वैसे ये शोध का विषय हो सकता है कि बाज़ार की वजह से सबकुछ गिरा या बाकी सबकुछ की वजह से बाज़ार. वही, पहले मुर्गी आई या पहले अंडा?
बाज़ार गिरा तो बाज़ार में रखी बाकी चीजें भी गिर गईं. वो सारी चीजें जो अभी तक खड़ी हुई थीं. अर्थ-व्यवस्था गिर गई, रुपया गिर गया, क्रूड गिर गया. बैंक गिर गए. अमेरिका तक गिर गया. क्या-क्या गिनाऊँ, लिस्ट बड़ी लम्बी है.
अब बाज़ार गिरा तो चर्चा भी होगी. हर चर्चा का आधार गिरावट ही है. बिना चर्चा के किसी गिरावट का महत्व नहीं. वो चाहे संकृति हो या बाज़ार. जाहिर सी बात है कि बाज़ार की गिरावट पर भी चर्चा होगी. और ये चर्चा दो जगह सबसे ज्यादा हो रही है. एक टीवी पर और दूसरी चाय-पान की दूकान पर.
कल रतीराम चौरसिया की दूकान पर पान खाने गया. पान लगाने के लिए कहा. रतीराम जी पान लगाते-लगाते बोले; "बाज़ार त बहुते गिर गया."
मैंने कहा; "पूछिए मत. बहुत गिर गया है."
मेरी बात सुनकर बोले; "वैसे आप का क्या हाल है? आप भी त बाज़ार वाले ही हैं. आप भी गिरे का?"
मैंने कहा; "हाँ. अब बाज़ार में रहकर हम कैसे बचे रह सकते थे. हमें भी गिरा हुआ ही समझिये."
क्या करता शायरों वाली 'साफगोई' होती तो कहकर निकल लेता कि; "बाज़ार से गुजरा हूँ, खरीदार नहीं हूँ." लेकिन इतनी 'साफगोई' अब दुर्लभ है. इस डिप्लोमेसी के ज़माने में साफगोई प्रीमियम में मिलती है. वैसे भी रतीराम जी को हमारे बारे में पता नहीं होता तो ये भी कहकर निकल लेते कि; "ये शेयर-वेयर के बारे में तो हमें कुछ पता नहीं है जी. हम तो ऐसी चीजों से दूर ही रहते हैं."
ठीक राम दयाल की तरह जिनका ट्रेडिंग अकाउंट हमारे यहाँ ही चलता है लेकिन मैंने सुना कि किसी से कह रहे थे; "अरे बाप रे. हम और शेयर! न न, हम ये सब चीजों से दूर ही रहते हैं. अरे, शेयर का है? जुआ."
खैर, रतीराम जी मेरी बात सुनकर मुस्कुरा दिए. बोले; "सही बात है. बजार में रहेंगे त बचना तो मुश्किल ही है. बाकी एक बात कहेंगे."
मैंने पूछा; "कौन सी बात?"
वे बोले; "न जाने केतना बाज़ार वाला सब आता है हमारे इहाँ पान खाने. ई लोग का बात का वजह से हमारे अन्दर त बड़ा हीन भावना उपज जाता है."
उनकी बात सुनकर मुझे बड़ा अजीब लगा. मैंने पूछा; "क्यों, आपके अन्दर हीन भावना क्यों है?"
बोले; "असल में का है कि हमरे दूकान पर पान खाते-खाते जब आप जईसा लोग बताता है कि उनका लाखों डूब गया त हमको बड़ा हीन भावना होता है."
मैंने कहा; "पैसा उनका डूबा, लेकिन हीन भावना से आप ग्रसित हैं. ये बात कुछ समझ में नहीं आ रही है."
मेरी बात सुनकर मुझे ऐसे देखा जैसे कह रहे हो; 'आप भी पूरा बकलोले हैं.' फिर मुस्कुराते हुए बोले; "असल में उनका 'लास' का फिगर सब सुनकर हमको लगता है कि एक ई लोग हैं जो 'लास' करके देश का अर्थ-व्यवस्था में अपना योगदान कर रहा है और एक हम हैं कि कोई योगदान नहीं दे पा रहे हैं."
उनकी बात सुनकर लगा जैसे चौरसिया जी प्लान बनाकर खिचाई करने पर उतारू हैं. उनके महीन मजाक करने की आदत से मैं वाकिफ था. इसीलिए मैंने कुछ नहीं कहा.
लेकिन बात ऐसे कैसे ख़त्म हो जाती. समस्या ये थी कि वहीँ पर जगत बोस खड़े थे. बोस बाबू टेक्नीकल अनालिस्ट है. रतीराम जी की बात सुनकर बोले; "अरे चौरसिया जी, देश की अर्थ-व्यवस्था में तो आप योगदान कर ही रहे हैं आप. पान बेंच रहे हैं. इससे तो जीडीपी बढ़ ही रहा है. जीडीपी समझते हैं कि नहीं?.... ग्रास डोमेस्टिक प्रोडक्ट्स. माने ये कि आप जितना काम कर रहे हैं, उससे जो पैसा निकल रहा है, वो देश के इनकम में जुट रहा है. जीडीपी को हिन्दी में सकल घरेलू उत्पाद कहते हैं. आप समझ लीजिये...."
उसकी बात सुनते-सुनते अचानक रतीराम जी धीरे से बोल पड़े; "समझ गए हम."
उनकी बात सुनकर बोस बाबू बोले; "क्या समझ गए? अभी तो मैंने आपको पूरा बताया कहाँ?"
रतीराम जी मुस्कुराते हुए बोले; "समझ गए कि बाज़ार का अवस्था अईसा काहे है."
मुझे पान थमाते हुए बोले; "ई बाज़ार का अऊर का होगा?"
Thursday, September 25, 2008
सिंगुर ...माने उर में सींग
सूचना:
आज मेरे ब्लॉग के गेस्ट राईटर हैं रतीराम चौरसिया 'पानवाले'. देश, काल, समाज पर दृष्टि रखे रहते हैं. पान के साथ-साथ चूना भले लगायें, लेकिन हर मुद्दे पर अपने विचार व्यक्त करने से नहीं चूकते. आज सिंगुर पर अपने विचार व्यक्त कर रहे हैं.
आप पढिये.
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उर में सींग घुस गया. उर का टुकड़ा-टुकड़ा हो गया. ऊ भी एक-दो नहीं, न जाने केतना. एतना कि कोई हिया गिरा आ कोई हुआं. सिंगुर में मनई आते-जाते रस्ता पर बचाकर चल रहा है सब. न जाने किसका उर का टुकड़ा किसका तलुआ तरे आ जाए.
पुराना मुख्यमंत्री का उर छोटा हो चुका था. मुख्यमंत्री बदला गया. पचीस साल में आक्सीजन का कमी से नया मुख्यमंत्री के उर का कंडीशन भी कोई बहुत अच्छा नहीं था. आकार छोटा हो गया था. उनका पार्टी वाला बोला सब कि उर बढ़ा लो. पचीस साल से हम लोगन का उर इतना छोटा हो गया है कि साँस रुकने का चांस है.
मुख्यमंत्री प्राणायाम वगैरह करके उर थोड़ा बड़ा किए. चार-पाँच साल में उका उर का आकार बढ़ा. आकार बढ़ गया तो लगा कि साँस का तकलीफ अब नहीं होगा. फिर भी डॉक्टर का दरकार तो होइबे करेगा. ऊ टाटा जी से बोले; "हमरा उर तो बड़ा हो गया है. तुम भी अपना उर बड़ा कर ल्यो त दोनों का उर एक साथ काम करे अऊर दुन्नो मिल के 'सिंग-उर' में कुछ करें."
टाटा तो जनमजात उर वाले. ऊ बोले; "हमरा उर त १९१० से बड़ा ही है. बड़ा आक्सीजन है हमरा उर में. बोलो त कुछ तुम लोगन का दे दें."
मुख्यमंत्री बोले; "ई भी पूछने का बात है? नेकी और पूछ-पूछ के?"
टाटा जी आक्सीजन लेकर आए. मुख्यमंत्री के लगा कि अब चिंता है नाही. अब आक्सीजन का कमी होगा नाही. अब त दस साल में इन लोगन के एतना आक्सीजन मिलेगा कि अगला पचास साल तक जियेंगे. पूरा बंगाले का उर आक्सीजन से भर जायेगा. उका पार्टीवाला सब भी उर फुलाए घूमने लगा.
किंतु 'बोंधुगोन' जे मनई सब पहले फेफड़ा से काम चलाता था, ऊका अब खाली उर से चलने से रहा. पाहिले ई लोग फेफड़ा फाड़कर चिल्लाता था. ई चिल्लाने वाला धरम अब ममता जी को ट्रान्सफर कर दिया त मुसीबत होइबे करेगा.
ई सी पी एम पार्टी वाला भूल गया सब कि बिधानचंद हों आ चाहे सिद्धार्थ शंकर, ई लोग केहू को छोड़ा था नाही. अब ई लोग भले ही भगवान पर विशबास न करे, बाकी होता एही है कि सबकुछ एहिं पर भोग के जाना पड़ता है. एही धरा पर.
जो ई लोग पहिले करता था सब, अब ऊ काम ममता जी उर आ फेफड़ा, दुन्नो लगाकर कर रही हैं. अऊर वोईसे भी, ममता जी त हैं बर्तमान में जीने वाली. पब्लिक सब भले ही कहे कि इलेक्शन में उनका हालत ख़राब हो जायेगा, लेकिन इलेक्शन त भाभिश्यत में होगा.
अभी त ममता जी सिंगुर का उर में सींग घुसा दिए हैं. अऊर ई सींग घुसाने से सब गड़बड़ा गया है. जो टरक सब खड़ा था छोटकी गाड़ी ले जाने के लिए ओही टरक सब में फैक्टरी का फोडन सब भर के निकल रहा है. कहाँ जायेगा उहो मालूम नहीं है.
ई एक सिंगुर न जाने केतना के उर में सींग घुसा दिया. का मुख्यमंत्री, का टाटा अऊर का सी पी एम पार्टी, सबका उर का टुकड़ा बिखरा पड़ा है सिंगुर में. आ जे लोग भारी-भारी कीमत देकर ज़मीन सब खरीद लिया था, ऊ लोगन का त सबकुछ बिखरा पड़ा देखा हम.
का कहें ई सब देख के त मन में एक ही बात आता है....कभी-कभी उर के हटा के दिमाग से काम लेना चाहिए.
Tuesday, June 10, 2008
रतीराम को आप भी विश कीजिये...नया धंधा शुरू कर रहे हैं.
कल रतीराम जी की पान दुकान पर गया था. निंदक जी मिल गए. इधर-उधर की बात हुई. बात करते-करते बोले; "सुने कि नहीं? ई रतीरमवा बिजनेस डाईभर्सीफाई कर रहा है."
मैंने कहा; "हाँ सुना था मैंने. वो आईपीएल की टीम का आक्शन हो रहा था तो गए थे टीम खरीदने.
मेरी बात सुनकर बिदक गए. बोले; "का महराज आप भी न. खाली ब्लागिंग में लगे रहते हैं. बाकी दुनियाँ में का हो रहा है, कौनौ ख़बर नहीं रखते."
मैंने कहा; "मतलब? और कुछ नया हो गया क्या?"
बोले; "अरे ऊ किरकेट टीम का मामला पुराना है. अब तो ई और भी केतना बिजनेस खोलने का बात करने लगा है."
मैं जानने के लिए उत्सुक हो गया. मैंने कहा; "अच्छा. क्या बिजनेस करना चाहते हैं रतीराम जी?"
निंदक जी ने इशारे से कुछ दिखाया. बोले; "ई देखिये. केतना-केतना प्रोजेक्ट रिपोर्ट मंगाकर रक्खा है ई. उधर देखिये का-का बिजनेस का रिपोर्ट है."
मैंने देखा तो मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा. रतीराम जी जहाँ बैठकर पान लगाते हैं, वहीं पर तीन-चार प्रोजेक्ट रिपोर्ट रखी हुई थी. मैंने उलट-पलट कर देखा. एक प्रोजेक्ट रिपोर्ट हिन्दी टीवी न्यूज़ चैनल की थी. एक और रिपोर्ट क्रिकेट लीग शुरू करने के बारे में थी. एक और रिपोर्ट मनोरंजक टीवी सीरियल बनाने को लेकर थी और चौथी रिपोर्ट टीवी रियलटी शो की थी. रियलटी शो के भी दो प्रकार थे. एक रियलटी शो गाने के बारे में थी और दूसरी डांस प्रोग्राम की थी. मैं इनके बारे में जानने के लिए उत्सुक हो गया. मैंने सोचा रतीराम जी से ही बात कर लूँ.
मैंने रतीराम जी से पूछा; "क्या बात है रतीराम जी? नया प्रोजेक्ट के बारे में सोच रहे हैं क्या?"
मेरी बात सुनकर हंस दिए. बोले; "हाँ. असल में हम कोशिश त पहले भी किए रहे, बाकी फेल हो गए. देखिये टीम तो मिला नहीं हमको त सोचे कि नया हिसाब बैठाएं कुछ.फिर हम प्रोजेक्ट कंसलटेंट से बात किए त ऊ बोला कि तीन-चार धंधा है जो बहुत हिट चल रहा है. अब एही तीन-चार में से कौनौ एक धंधा कर लो."
मैंने पूछा; "वैसे कौन से धंधे के बारे में बताया कंसलटेंट ने?"
बोले; "ओही सब धंधा है. एक ठो तो न्यूज़ चैनल का है. दूसरा गाना और डांस का रियलटी शो का है. तीसरा टीवी सीरियल का है अऊर एगो है किरकेट लीग शुरू करने का."
मैंने कहा; "तो इन चार में से आपको कौन सा ठीक लगा?"
बोले; "हमको त ई नाच गाना का रियलटी शो बहुत निक लगा. कंसलटेंटवा कह रहा था कि ऊ लोग एगो एस्टिमेट निकाला है जिसके हिसाब से साल २०२० तक पूरा भारत में करीब दस करोड़ लोग गाना गाने वाला और आठ करोड़ लोग नाचानेवाला बन जायेगा. और अभी साल २००८ तक टारगेट में से खाली अस्सी हज़ार लोग नाचने वाला और एक लाख आठ हज़ार लोग ही गाने वाला बन पायेगा. त इसके हिसाब से गैप बहुत बड़ा रहेगा. अऊर ऊ गैप भरने के लिए देश में केवल साल २०१३ तक करीब पैंसठ हज़ार नया रियलटी शो बनेगा."
उनकी बात और एस्टिमेट सुनकर मैं दंग था. मैंने कहा; "माने पूरा होमवर्क कर लिए हैं."
मेरी बात सुनकर बोले; "अरे का कहें? होमवर्क त हम किरकेट टीम खरीदने के बखत भी किए रहे. लेकिन धोखा हो गया. टीम मिला नहीं हमको. एही वास्ते सोच रहे हैं कि इस बार कुच्हौ छूट नहीं जाए. मजे का बात ई है कि ई धंधा में ज्यादा खर्चा भी नहीं है. अऊर साइड का कमाई ऊपर से है. हमरे कहने का मतलब एसएमएस का भोटिंग से ही रुपिया का अम्बार लग जाता है. देख के लगता है कि कौन ससुर कहता है कि देश में गरीबी बढ़ गया है."
मैंने कहा; "और न्यूज़ चैनल का हिसाब नहीं जमा?"
बोले; "ऊ धंधा भी ख़राब नहीं है. अब देखिये न्यूज़ चैनल त नाम का है. असल में त है ससुर पूरा का पूरा मनोरंजक चैनल ही. आ सबसे बड़ा हिसाब त एही है कि चौबीस में से बारह घंटा त ससुर बाकी चैनल पर चलने वाला प्रोग्राम का ही फीड देखाना है. उसके बाद समय बचा त रखी सावंत और खली हैं ही. और फिर क्राईम, सनसनी, भूत-प्रेत से दो-तीन घंटा कटा देंगे. अरे मिसरा बाबू का कहें. थोड़ा पैसा का दिग्दारी हो रहा है नहीं तो हम तो दुन्नो धंधा खोल लेते."
मैंने कहा; "आईडिया बुरा नहीं है. वैसे आपको क्या फाइनेंस की समस्या हो रही है?"
बोले; "हाँ ऊ तो है. ओईसे एक दलाल से बात किए हैं. बोला है कि बैंक से लोन दिला देगा. बात चल रहा है. फिर सोचे कि गाँव में जो भाई-भतीजा रहता है सब, ऊ लोगों को वहीं से कृषि लोन का जुगाड़ बैठाकर ऊ पईसवा भी एही धंधा में लगा देंगे."
मैंने कहा; "लेकिन इसमें तो समस्या आ जायेगी. कृषि लोन को इस धंधे में लागने नहीं देगा बैंक."
मेरी बात सुनकर हंसने लगे. बोले; "आप भी न. बड़े भोले हैं. आपको का लगता है? ई जो सरकार साठ हजार करोड़ माफ़ किया है अभी, ऊ सब पैसा कृषि में लगा था?"
मैंने कहा; "जरूर ऐसा ही होगा." मेरी बात सुनकर उनके चेहरे पर ऐसे भाव आए, जैसे कह रहे हो 'कैसा बकलोल मनई है.'
मेरी बात सुनकर बोले; "ओईसे आपको एक सॉलिड धंधा बतायें, मिसरा बाबू?"
मैंने कहा; "हाँ-हाँ कोई आईडिया हो तो जरूर बतायें."
बोले; "आप न एगो काम कीजिये. आप तीन-चार ठो संस्था खोल लीजिये जिसमें रियलटी शो में जजबाजी के लिए शिक्षा दीजिये. आख़िर इतना शो चलेगा त जज ससुर भी त होने चाहिए. ऊ सब कहाँ से आएगा?"
उनकी बात सुनकर मैं दंग रह गया. देश में आईडिया की कमी नहीं है. उपजाऊ आईडिया देने वालों को जितना अपने आईडिया पर विश्वास नहीं है, उससे ज्यादा विश्वास देशवासियों की बेवकूफी पर है. मैं रतीराम जी को उनके नए धंधे ठीक-ठाक चलने के लिए विश किया और अपना पान मुंह में दबाये खिसक लिया.
आप के पास भी धंधे का कोई आईडिया हो तो एक पूल बनाईये. हो सकता है भविष्य में काम आए.
Friday, February 22, 2008
अच्छा ई बताईये, सेल टैक्स और भैट-वैट मिलाकर धोनी का फाईनल दाम का रहा
कल रतीराम की पान दुकान पर गया था. मैंने जाते ही कहा; "एक पान दीजिये." मैंने उनसे पान लगाने को कहा लेकिन देख रहा हूँ कि वे अखबार पढने में व्यस्त हैं. पूरी तन्मयता के साथ लीन. मैंने फिर से कहा; "रतीराम भइया, एक ठो पान दीजिये."
मेरी तरफ़ देखे बिना ही बोले; "तनी रुकिए, लगा रहे हैं." ये कहकर अखबार पढ़ने में फिर से लग गए.
मैंने कहा; "अरे ऐसा क्या छप गया है जो पढ़ने में इतना व्यस्त हैं."
बोले; "अरे ओही, खिलाड़ी सब केतने-केतने में बिका, वोही देख रहे हैं." तब मेरी समझ में आया कि क्या पढ़ रहे हैं.
मैंने कहा; "अब पढ़ने से क्या मिलेगा. टीम तो आप खरीद नहीं सके."
बोले; "हाँ लेकिन हम देखना चाहता हूँ कि ई लोग का केतना दाम लगा."
मैंने कहा; "बहुत पैसा मिला है सबको. देखिये न धोनी ही छ करोड़ में बिके. तेंदुलकर चार करोड़ में. ऐसा पहली बार हुआ कि खिलाड़ी भी बिक गए."
मेरी बात सुनकर मुस्कुरा दिए. बोले; "अरे आप भी बड़े भोले हैं. ई लोग का पहला बार बिक रहा है. का पहले नहीं बिका है. काहे, भूल गए अजहरुद्दीन को, जडेजा को."
उनकी बात सुनकर मैं चुप हो गया. क्या करता, कोई जवाब भी तो नहीं था. फिर सोचते हुए मैंने कहा; "बहुत ख़बर रखते हैं क्रिकेट की."
अब तक वे अखबार छोड़ चुके थे. उन्होंने मेरी तरफ़ देखते हुए कहा; "अरे ई जो लोग टीम खरीदा है न, उनसे तो ज्यादा ही जानकारी रखते हैं. आपको का लगता है, मुकेश अम्बानी अपना काम करते-करते क्रिकेट देखते होंगे का? ऊ दारू वाले, का नाम है उनका, हाँ माल्या जी, ऊ देखते होंगे का. हम तो काम करते-करते कमेंट्री सुनते हैं. पूरा-पूरा जानकारी रखते हैं क्रिकेट का."
मैंने कहा; "ये बात तो है. ऐसे में एक टीम आपको जरूर मिलनी चाहिए थी."
बोले; "जाने दीजिये, अब का मिलेगा उसपर बात कर के. ओईसे एक बात बताईये, छ करोड़ में तो धोनी बिक गए लेकिन सेल टैक्स, भैट-वैट मिलकर केतना दाम पडा होगा, इनका?"
उनकी बात सुनकर मुझे हंसी आ गई. मैंने कहा; "अरे महाराज आप भी गजबे बात करते हैं. ये लोग आदमी हैं, कोई सामान नहीं कि इनके ऊपर भी सेल्स टैक्स लगे."
मेरी बात से कन्विंस नहीं हुए. बोले; "आदमी हैं तो फिर आलू-गोभी का माफिक काहे बिक रहा है ई सब?"
मैंने कहा; "आलू-गोभी की माफिक नहीं बोलिए हीरा-जवाहरात की तरह. बोली लगाकर खरीदे गए हैं."
मेरी बात सुनकर मुस्कुरा दिए. बोले; "बोली लगाकर बिके हैं, इतना त हमहू जानते हैं. सुनने से कैसा लगता है न. ऊ जो फिलिम में देखाता है कि कौनो सेठ का सबकुछ बरबाद हो गया और ऊ कर्जा में डूब जाता है तब उसका घर-दुआर जैसे हथौड़ा मार के बिकता है. ओईसे ही तो?"
मैंने कहा; "एक दम ठीक पहचाने. वैसे ही बिके हैं सब."
बोले; "एक बात बाकी गजबे होई गवा."
मैंने पूछा; "क्या?"
बोले; "विदेशी तेल, साबुन, शेम्पू वगैरह तो ठीक लगता है. ऊ का वास्ते हमरे देश का लोग सब बहुत पैसा पेमेंट कर देता है लेकिन विदेशी खेलाड़ी सब तो बहुत सस्ता में खरीद लिया सब. खिलाडी लोगों का वास्ते ज्यादा पईसा नहीं दिया कोई भी. सुने कि पार्थिव पटेल भी पोंटिंग से जादा दाम में बिक गए."
मैंने कहा; "ऐसा होता है. किस खिलाड़ी का कितना महत्व है, वो तो टीम वाले ही बता सकते हैं. वो लोग जिन्होंने टीम खरीदे है."
मेरी बात सुनकर उन्होंने मेरी तरफ़ कुछ ऐसे देखा जैसे मुझे बेवकूफ साबित करने पर तुले हैं. फिर बोले; "हम पाहिले ही बोले रहे न, आप बहुते भोले हैं. अरे ई सब चाल है टीम का मालिक लोगों का. नहीं तो आप ही कहिये, पार्थिव पटेल का इतना दाम. लगा जईसे बँगला पान खरीद रहा है लोग ऊ भी बनारसी पान का दाम देकर."
उनकी बात सुनकर मुझे लगा एक पान खाने आए थे और इतनी देर लग गई. बात खिलाड़ियों की बिक्री से होते हुए कहाँ-कहाँ से आखिर पान तक आ रुकी. मुझे लगा रतीराम जी से बात करते रहेंगे तो पता नहीं और कहाँ-कहाँ से होकर गुजरना पड़े. उनकी पार्थिव पटेल और बँगला पान वाली बात पर मैंने झट से कहाँ; "एक दम ठीक बोले हैं. इसी बात पर एक ठो बनारसी पान लगा दीजिये."
सुनकर हंस दिए. बोले; "ये लीजिये, अभिये लगा देते हैं."
चलते-चलते
सुनने में आया है कि अर्थशास्त्रियों के एक दल ने भारत सरकार के वित्त मंत्रालय और भारतीय रिज़र्व बैंक को एक ज्ञापन दिया है. इस ज्ञापन में इन्फ्लेशन के लिए बनाए गए होलसेल प्राईस इंडेक्स में बाकी चीजों के साथ-साथ क्रिकेट खिलाड़ियों को भी शामिल करने का आग्रह किया गया है. जब कुछ जानकारों ने क्रिकेट खिलाड़ियों के शामिल करने का विरोध यह कहकर किया कि; आख़िर आम जनता तो क्रिकेट खिलाड़ी खरीदती नहीं. ऐसे में उन्हें होलसेल प्राईस इंडेक्स में शामिल करने का औचित्य क्या है तो अर्थशास्त्रियों का जवाब था; "जिन लोगों ने टीम और खिलाडी खरीदे हैं, उन्हें इन्कम तो आम जनता की जेब से ही आनी है. ऐसे में पूरा भार जनता के ऊपर ही तो पड़ेगा."
आप का इस ज्ञापन के बारे में क्या विचार है?
Friday, January 25, 2008
बॉलर ने रतीराम का पान खाया और बैट्समैन बोल्ड हो गया
रतीराम चौरसिया, अरे वही चौरसिया पानवाले, कल बीसीसीआई दफ्तर के बाहर दिखाई दे गए. कभी इधर जाते, कभी उधर. जो सामने मिल जाता, उसी को पकड़ लेते. कुछ बात करते और फिर चेहरा लटक जाता. मुझसे टकरा गए. मैंने पूछा; "आप और यहाँ? कैसे आना हुआ?"
बोले; "टीम खरीदने आए रहे. पर ई लोग कह रहा है सब बिक गवा."
मैंने कहा; "आप भी टीम खरीद रहे हैं. लेकिन अब तक तो सारी टीमें बिक गईं. अब तो कुछ नहीं बचा."
बोले; "हाँ. एही बात का तो रोना है. हमरे आने से पहिले ही ई लोग सब बेंच-बांच कर खतम कर दिया."
मैंने कहा; "अब तो कुछ कर भी नहीं सकते. लेकिन आप क्रिकेट के धंधे में कब से कूद गए? पान का धंधा छोड़ दिए क्या?"
बोले; "अरे भइया पान का धंधा बढ़िया चल रहा है एही वास्ते क्रिकेट के धंधे में आए हैं. सभी खरीद रहा था. हम सोचे, हम भी खरीद लें. अरे जब एअरलाइन वाला से लेकर कपड़ा वाला और दारू वाला से लेकर फिलिम वाला खरीद रहा है, तो हम भी तो टिराई मार ही सकते हैं. पान बेंचते हैं तो का हुआ, करते तो धंधा ही हैं."
मैंने सोचा ठीक ही तो कह रहे हैं. सब अपना-अपना बिजनेस छोड़कर क्रिकेट के बिजनेस में जा रहे हैं तो रतीराम जी ने कौन सा पाप किया है. वे भी जा सकते हैं. मैंने कहा;" लेकिन जिन लोगों ने टीम खरीदी हैं, कह रहे थे कि उनकी वजह से क्रिकेट का भला होगा. आप भी भला करेंगे क्या इस क्रिकेट का?"
रतीराम ने मुस्कुराते हुए कहा; "कौन भला करेगा क्रिकेट का? ई लोग जो टीम खरीदा है? इन लोगों को क्रिकेट का बारे में का पता है? जो जो लोग खरीदा है, उसमें कौन क्रिकेट खिलाड़ी था, बोलिए तो."
मैंने सोचा सही ही तो कह रहे हैं. लेकिन मन में ये बात भी आई कि जिन लोगों ने टीमें खरीदी हैं, वे लोग तो यही कह रहे थे कि क्रिकेट का भला करेंगे. यही सोचते हुए मैंने रतीराम से पूछा; "तो आपको क्या लगता है. जिन लोगों ने टीमें खरीदी हैं, उनका अपना कोई स्वार्थ है?"
बोले; "और नहीं तो का. आपको का लगता है, हमें कोई टीम मिल जाती तो का हम क्रिकेट का भला करते?"
मैंने पूछा; "तो आप क्या करते?"
बोले; "प्रचार करवाते. जो ई लोग भी करवाएगा. अन्तर एही है कि ई लोग दारू, फिलिम, कपड़ा और गैस का प्रचार करवाता, हम पान का करवाते."
उनकी बात सुनकर हंसी आ गई. मैंने कहा;" क्या बात कर रहे हैं. पान का प्रचार करवाते. ये भला क्यों?
आपको नहीं लगता कि क्रिकेट के खेल में पान का प्रचार कुछ भद्दा मजाक नहीं लगेगा?"
रतीराम जी ने मेरी बात सुनकर मेरे ऊपर ऐसी दृष्टि डाली जैसे दुनियाँ में मुझसे बड़ा 'खतम' आदमी और कोई नहीं. मुझे देखते हुए बोले; "आप रेडियो नहीं न सुनते हैं. आ सुनते तो अईसा नहीं कहते."
मैंने कहा; "आप ठीक कह रहे हैं. मैं रेडियो नहीं सुनता. वैसे इस रेडियो में ऐसा क्या है?"
बोले; "रेडियो में क्रिकेट का कमेंटरी आता है. जब भी चौका लगता है, रेडियो से आवाज आता है 'और ये बीएसएनएल चौका'. सुनकर बड़ा हंसी आता है. एक बार सुनकर लगता है जैसे ई बीएसएनएल ने ही ई चौका लगवाया है. ई कंपनी नहीं होती त चौका नहीं लगता."
मैंने सोचा अगर ऐसा है तो ठीक ही तो कह रहे हैं. यही सोचते हुए मैंने उनसे पूछा; "अगर आपको टीम मिल जाती तो क्या आप अपनी पान दुकान का प्रचार करवाते खिलाडियों से?"
बोले; "काहे नहीं. जरूर करवाते. जब पैसा लगाकर टीम खरीदेंगे तो प्रचार भी करवाएंगे. और ओइसे भी जो लोग टीम सब को लिया है, वो भी तो एही कराएगा सब. काल को देखियेगा, ई खिलाड़ी सब दारू से लेकर कपड़ा तक बेंचते हुए दिखेगा. फिलिम का प्रचार करेगा, सो अलग."
मैंने पूछा; "लेकिन अब तो आपको टीम मिलेगी नहीं. सब तो बड़ा-बड़ा लोग खरीद लिया. कलकत्ते से लेकर मुम्बई और बंगलूरु तक की टीमें बिक चुकी हैं."
बोले; "असल में सुने रहे कि आजकल छोटा-छोटा शहर और कस्बा से खिलाड़ी आ रहा है सब. मुम्बई और दिल्ली वगैरह से कम खिलाड़ी आता है. एही वास्ते हम बीसीसीआई को सुझाव दिए हैं कि पटना, इलाहाबाद, कानपुर, रायबरेली अ चाहे भटिंडा का भी टीम बनाये जिससे हम जैसे छोटे धंधेबाजों को क्रिकेट का धंधा करने का मौका मिले."
इतना कह कर वे बीसीसीआई के एक पदाधिकारी की पीछे-पीछे चले गए.
उनकी बात सुनकर हम आनेवाले समय में ऐसे विज्ञापन के लिए तैयार हो चुके हैं जिसमें दिखाया जायेगा कि बॉलर को विकेट नहीं मिल रहा है. हारकर वह रतीराम की दुकान का बनारसी पान खाकर बोलिंग करता है और सामने वाले बैट्समैन को बोल्ड कर देता है.



