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Tuesday, October 2, 2007

सुप्रीम कोर्ट के सौजन्य से बे पैसे का मनोरंजन!





कल सुप्रीम कोर्ट ने गच्च1 कर दिया. कोर्ट की सख्त नाराजगी की खबर के आध घण्टे में ही करुणानिधि जी भूख हड़ताल स्थल से तहमद (मुण्डु) बांधते सटक लिये. उनकी सरकार ने कहा कि वह कोई बन्द नहीं करा रही थी. कुछ उस अन्दाज में जब चुन्नू रसोई से मिठाई चुरा कर खाता पकड़ लिया जाये तो तुरन्त मुंह पोंछ कर कहे कि - कहां, हम तो रसोई में सिर्फ पानी के लिये ग्लास लेने आये थे. या फिर कन्हैया कह रहे हों - मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो. जयललिता मोसे बैर करतु है; बरबस मुंह लपटायो!

सुना है, जमाने बाद करुणानिधि जी ने उत्तर भारत वालों को लपेटने के लिये कल हिन्दी में कविता भी सुनाई -

हिंदुस्तान है देश हमारा

जान से अपनी हमको प्यारा,

हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई

आपस में हैं भाई भाई, भाई

होगा भाई हमारा ऐसा

होगा चलन हमारा।

बन्धुओं, यह कर मुक्त मनोरंजन अभी और चलेगा. शिव कुमार मिश्र जी, जरा अपने सटायर को और पैना करें. आपको और मौके मिलने वाले हैं! :-)


1. गच्च भरतलाल ब्राण्ड हिन्दी का शब्द है. इसका अर्थ है - आल्हादित, प्रसन्न, मुदित.

Sunday, September 30, 2007

स्वराज मुखर्जी के भ्रम के सेतु





मुझे आलोक पुराणिक जी से बड़ी इर्ष्या होती है। इर्ष्या भी केवल इसलिए कि उन्हें न जाने कितनी बार बीए के उन छात्रों का परीक्षा में लिखा हुआ निबंध मिल जाता है, जिन्होंने हिन्दी के पेपर में टाप किया है। फिर मैं ये सोचकर ख़ुद को समझा लेता हूँ कि पुराणिक जी तो ख़ुद शिक्षक हैं, और शिक्षक को परीक्षार्थी का लिखा निबंध आसानी से उपलब्ध हो ही सकता है.

लेकिन ऐसा कुछ मेरे साथ भी हुआ.पिछले दिनों कलकत्ते में बहुत बरसात हुई और कई घरों में पानी घुस गया। मुझे सड़क पर जमे पानी पर तैरती एक चिट्ठी के दर्शन हुए, जो किसी स्वराज मुख़र्जी नामक नौजवान ने भारत सरकार को लिखी थी. अब इस नौजवान ने परीक्षा में निबंध लिखा होता, तो मैं पता लगाने की कोशिश करता कि उसने परीक्षा में टाप किया या नहीं. लेकिन बात चिठ्ठी की थी सो मैंने ऐसी कोई कोशिश नहीं की. प्रस्तुत है उस चिट्ठी का हिन्दी अनुवाद.

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आदरणीय भारत सरकार,

मैं यहाँ पर कुशल पूर्वक हूँ और आपकी कुशलता की कामना प्रकाश करात जी से करता हूँ। अखबारों की रपट देखकर आपकी कुशलता के बारे में संदेह बना हुआ है. वैसे सच कहूं तो मेरी कुशलता में भी पिछले दिनों भ्रम की मिलावट हो गई है. कह सकते हैं कि इस मिलावट की वजह से मेरी कुशलता भी आधी रह गई है. इंसान भ्रमित होगा तो भ्रम को दूर करने का प्रयास भी करेगा. इसी प्रयास का परिणाम है ये चिट्ठी, जो मैं आपको लिख रहा हूँ.

सरकार, मेरे मन में भ्रम की उत्पत्ति के कारण बहुत से हैं। पहला कारण है आपका 'राम-सेतु तोड़ अभियान'. भाग्यविधाता, मन में भ्रम इस बात को लेकर है कि आपने अपने इस प्रोजेक्ट का नाम 'सेतु-समुद्रम' क्यों रखा. मुझे समझ में नहीं आया कि आप समुद्र पर सेतु बनाना चाहते हैं, या पहले से बने हुए सेतु को नष्ट करना चाहते हैं. अगर सेतु बनाना चाहते हैं, तो उसकी उपयोगिता मुझे समझ में नहीं आई, क्योंकि पानी में चलने वाले जहाज सेतु के ऊपर से होकर गुजरते हैं, इस बात पर मुझे संदेह है. अगर आप सेतु तोड़ना चाहते हैं, तो इसका मतलब आप स्वीकार कर रहे हैं कि वहाँ पर एक सेतु पहले से था. कौन सी बात सच है, मैं फैसला नहीं कर पा रहा हूँ. अगर मेरे इस भ्रम को दूर कर सकें, तो बड़ी कृपा होगी.आपने हलफनामा देकर कहा कि राम नहीं थे, इसलिए राम-सेतु के होने का सवाल ही नहीं है। सरकार, ये क्या किया आपने? पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय श्री राजीव गाँधी ने अयोध्या के जिस सबसे प्रसिद्ध ताले को खुलवाया था, वो क्या किसी के घर का ताला था? उन्हें राम पर विश्वास नहीं था? आपने सुप्रीम कोर्ट में दिए गए हलफनामे को वापस ले लिया. लेकिन भ्रम अभी भी बना हुआ है कि आपने क्या मान लिया कि राम थे. आप तीन महीने के बाद एक और हलफनामा दाखिल करेंगे. ये तीन महीने का समय क्यों माँगा आपने? क्या सीबीआई की जांच बैठायेंगे? और सीबीआई भी क्या जांच करेगी. राम के बारे में उसे दस्तावेज कहाँ से मिलेंगे? बीस साल हो गए, बोफोर्स मामले की जांच करते. जहाँ दस्तावेज मौजूद हैं, वहाँ तो सीबीआई कुछ कर नहीं पाई, यहाँ, इस मामले में क्या कर सकेगी? कहीँ तीन महीने का समय इस लिए तो नहीं माँगा, क्योंकि आपके पास हलफनामा टाईप करने वाले नहीं हैं?

आपने बताया है कि इस सेतु के रहने से पैसे, तेल और समय का बड़ा नुकसान वगैरह होता है। किसके पैसे का नुकसान होता है? आपके राज्य में पैसे के नुकसान का सबसे बड़ा कारण क्या ये सेतु ही रह गया है? मेरी समझ में आता है कि अगर 'जहाजी कम्पनीयों' का नुकसान हो रहा है तो वे कहीँ न कहीँ से वसूल कर ही लेंगे. हाँ, अगर सरकार का नुकसान हो रहा है तो आपको क्या फिक्र. लगा दीजिये कोई टैक्स और वसूल कर लीजिये अपना नुकसान. वैसे भी खाने-पीने से लेकर उठने-बैठने तक पर टैक्स वसूल कर लेते हैं आप. फिर क्या चिंता. एक टैक्स और सही. टैक्स का नाम कुछ भी रख दीजिये, जैसे 'राम-सेतु टैक्स'. वैसे ऐसा नाम रखने पर वोट बैंक खिसक जाने का ख़तरा है. इसलिये आप एक कमेटी बैठा दीजिये जो नाम खोजकर आपको बता देगी.

अखबारों की खबरों से लगता है कि देश की अर्थव्यवस्था सही पटरी पर चले, इसके लिए इस सेतु का टूटना जरूरी है। देश का विकास और किसी बात पर निर्भर नहीं करता क्या? मेरी एक छोटी सी बात सुनिये और आप ख़ुद ही सोचिये. मैं रहता हूँ कलकत्ते में. यहाँ रांची से सब्जियाँ आती हैं. तीन दिन लगते हैं ट्रक को रांची से कलकत्ते पहुँचाने में. ख़ुद ही सोचिये, जो दूरी बारह घंटे में तय की जा सकती है, उसके लिए तीन दिन. इसकी वजह से सब्जियों के दाम आसमान पर रहते हैं. इसके लिए कुछ कीजिये जहाँपनाह. आम जनता को भी राहत मिलेगी.स्थल मार्ग के चलते भी पैसा और समय नष्ट होता है, और आप हैं कि जल-मार्ग के पीछे पड़े हुए हैं. सडकों की हालत पर गौर कीजिये. मैंने सुना था कि जो मिन्ट-मिन्ट पर गौर करे, वही 'गौरमिन्ट' है. लेकिन आप गौर करते भी हैं, तो सालों के बाद. मैं ये नहीं कहता कि आप कोशिश नहीं करते, लेकिन कोशिश कर रहे हैं, सारी उर्जा इस बात को दिखाने पर खर्च करते रहते हैं.

कई बातों में तो आप सालों के बाद भी गौर नहीं करते। शिक्षा की हालत सुधारने के लिए आप 'एडुकेशन सेस' वसूल कर लेते हैं. लेकिन शिक्षा की अवस्था में बदलाव दिखाई नहीं दे रहा. कुछ कीजिये हुजूर. आतंकवादियों के हमले से मरने वालों की संख्या के मामले में अब केवल इराक हमसे आगे है. ज़रा इसके बारे में भी सोचिये. न्याय-व्यवस्था को ठीक कराने का कोई उपाय देखिये. पूरे देश के किसानों की स्थिति ख़राब है. ये अलग बात है कि पिछले दो-तीन सालों में अखबार बाजी से लगता है कि देश के विदर्भ नामक इलाके में ही किसान रहते हैं, बाकी के इलाके में उद्योगपति रहते हैं. उनकी समस्या भी आप अनोखे ढंग से सुलझाते हैं.आप के प्रधानमंत्री कुछ नेताओं और कुछ टीवी पत्रकारों को लेकर वहाँ पहुँच जाते हैं और शाम तक किसानों की समस्या हल कर के चले आते हैं. सरकार, इस तरह से आप क़रीब चार बार विदर्भ के किसानों की समस्या सुलझा चुके है. लेकिन आश्चर्य की बात है कि समस्या फिर से खडी हो जाती है. वैसे तो छोटा मुँह और बड़ी बात होगी, लेकिन मैं कहूँगा कि एक बार दिल्ली में रहकर ही समस्या का समाधान खोजिए, हो सकता है समाधान हो जाए.

सरकार, सुना है पिछले दो सालों में केवल सार्वजनिक वितरण प्रणाली से ३१ हजार करोड़ रुपये खुरचन में निकल गये. अब इसमें रक्षा-शिक्षा, रेल-खेल, हेल्थ-वेल्थ, ट्रांसपोर्ट-एयरपोर्ट वगैरह को जोड़ लें तो खुरचन की मात्रा लाखों करोड़ में पंहुच जायेगी. तो सरकार इस खुरचन को जाने से रोकने के लिये कोई जुगत लगायें क्यों कि इसे भी आर्थिक नुक्सान के नाम से जाना जाता है.

आज देश के शेयर बाजार ने आपको दुनिया में मशहूर कर दिया है। सभी आपकी नीतियों की प्रशंसा करते नहीं थकते. लेकिन सुना है इसी बाजार में आतंकवादियों का पैसा भी लगा हुआ है. गृहमंत्री को शेरवानी बदलने और बाल सवारने से फुर्सत निकालने के लिए कहिये. कुछ कीजिये नहीं तो जिस शेयर बाजार की वजह से आपकी साख इतनी ऊपर है, उसी में कुछ गड़बड़ होने से समस्या खडी हो जायेगी. इलेक्शन सामने है, कुछ भी गड़बड़ हुआ नहीं कि गाडी पटरी से उतरी. इफ्तार पार्टियों से फुर्सत मिले तो इन बातों की ओर भी ध्यान दीजिये.

बाकी क्या लिखूं, आप तो ख़ुद समझदार है। समस्या केवल इतनी है कि समझदारी का काम नहीं करते.

आपका शुभाकांक्षी

स्वराज मुख़र्जी

Monday, September 24, 2007

राम के छिद्रान्वेषक कौन लोग हैं?





राम-सेतु को तोड़ने को लेकर बड़ा बवाल मचा हुआ है. इसे तोड़ने के पक्ष वाले अपने वक्तव्यों में ऐसा तर्क देते हैं, जो आम आदमी के मनोरंजन के साथ-साथ गुस्से का भी जरिया बनता जा रहा है. पहले केन्द्र सरकार ने कहा कि राम थे ही नहीं. और जब राम ही नहीं थे तो राम-सेतु कैसा. फिर सरकार को याद आया कि नहीं-नहीं राम थे. ये कहते हुए सरकार ने दो अफसरों की छुट्टी कर दी. इन अफसरों ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दे डाला था कि राम नाम के कोई भगवान नहीं थे. मंत्री अम्बिका सोनी जी ने बताया कि उन्हें मालूम ही नहीं था कि ये अफसर कोई ऐसा हलफनामा दाखिल कराने वाले थे. अगर उन्हें पता चलता तो वे इन अफसरों को बतातीं कि राम थे, क्योंकि "हमारी नेता सोनिया जी और हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी हर साल रामलीला देखते हैं".

अभी अम्बिका जी की परेशानी ख़त्म नहीं हुई थी कि करूणानिधि जी मैदान में आ गए. उन्होंने भी पहले कहा कि राम नहीं थे. कह ही सकते हैं. जो आदमी अपने बेटे का नाम स्टालिन रख सकता है, वो कुछ भी कह सकता है. उनके इस वक्तव्य पर बवाल पूरी तरह से शुरू भी नहीं हुआ था कि उन्होंने एक और वक्तव्य दे डाला. बोले; "राम तो थे, लेकिन उन्हें भगवान् क्यों मानना. वो तो 'पियक्कड़' थे." लीजिये, कभी कहते हैं राम थे ही नहीं, फिर कहते हैं, कि थे तो लेकिन 'पियक्कड़' थे. अपनी इस बात के पक्ष में उन्होंने कहा कि "बाल्मीकि ने लिखा है कि राम पियक्कड़ थे." अब बाल्मीकि ने ऐसा लिखा है कि नहीं, ये तो मुझे नहीं मालूम. इसके बारे में शायद वाल्मीकि रामायण के विशेषज्ञ ही कुछ प्रकाश डाल सकें.

लेकिन चलो मान ही लें कि ऋषि बाल्मीकि ने ऐसा लिखा था. अब पता नहीं उन्होंने ऐसा क्यों लिखा. हो सकता है राम से नाराज थे उस समय. लेखक जब-तब किसी से भी नाराज हो सकता है. हो सकता है बाल्मीकि इसलिए नाराज हो गए होंगे कि राम इतने बड़े राजा थे. उनके पास इतना पैसा था, लेकिन उन्होंने बाल्मीकि को अपने कोष से कुछ दान न दिया हो. या फिर उन्होंने नगर में एक प्लाट माँगा हो, और राम ने मना कर दिया हो. या शायद इसलिए नाराज होंगे कि सीता जी और उनके बेटे उनके आश्रम में रहते थे. उनका बड़ा खर्चा वगैरह होता होगा. सुनते हैं बाल्मीकि जी पहले जब रत्नाकर के नाम से जाने जाते थे, तो डकैती करते थे. हो सकता है अयोध्या में उनके ख़िलाफ़ कोई मुकदमा चल रहा हो, जिसे लेकर उन्हें सजा होने का चांस हो. कारण जो भी हो, करूणानिधि जी को इस बात का ख़्याल रखना चाहिए था कि बाल्मीकि ने राम के बारे में और क्या-क्या लिखा है. क्या उन्होंने राम को आदर्श पुरूष नहीं माना? क्या उन्होंने राम को आदर्श पुत्र नहीं माना? क्या उन्होंने राम को धर्म की पुनर्स्थापना करने वाला नहीं माना? क्या उन्होंने राम को भगवान् का अवतार नहीं माना? अगर इसका जवाब राम के पक्ष में है, तो फिर ये कहाँ तक उचित है कि हम कहीँ उनके ख़िलाफ़ लिखी गयी एक लाईन को लेकर उनका अस्तित्त्व ही ख़त्म कर दें.

राम को 'पियक्कड़' बताकर करूणानिधि का मन नहीं भरा था, सो उन्होंने राम के बारे में और भी सवाल कर दिए. उन्होंने पूछा; "कौन से इंजीनियरिंग कालेज से राम ने सिविल इंजीनियरिंग का कोर्स किया था?" लीजिये करिये बात इनसे. किसी ने कहीँ नहीं कहा कि राम ने दिन-रात मेहनत करके ये सेतु बनाया था. सब ये बात जानते हैं कि ये काम नल-नील ने किया था. नल-नील ही राम के इंजीनियर थे. उन्हें उस समय उत्प्लावन बल के सिद्धांत की जानकारी थी. उन्होंने ये काम किया था. और राम को इंजीनियरिंग करने की जरूरत भी नहीं थी. वे तो भगवान् थे. जिनका बनाया हुआ सारा ब्रह्माण्ड है, उन्हें पढने-लिखने की क्या जरूरत? लेकिन चूंकि उन्हें आदर्श मनुष्य के रूप में रहकर दुनिया को दिखाना था, सो उन्होंने न केवल पढाई-लिखाई की, बल्कि नल-नील से सेतु बनाने का आग्रह किया.

अब मेरा सवाल करूणानिधि जी से है. सुना है आप लिखते-विखते हैं. फिल्मों की कहानियाँ लिखते हैं. आप राजनीति में आ गए. शासन कर रहे हैं. कई साल हो गए आपको शासन करते. सरकार, आपने कौन से कालेज से राजनीतिशास्त्र की डिग्री ली थी. आप इतने बड़े राज्य पर शासन करते हैं, आपकी क्या योग्यता है? और जहाँ तक लिखने की बात है तो बहुत सारे पत्रकार आपके बारे में भी बहुत कुछ लिखते रहते हैं. अब अगर सारी बातों को सच मान लें तो आपको तो ३०-३५ सालों की सजा हो जायेगी. पत्रकारों ने यहाँ तक लिखा है कि आपके वीरप्पन जी से सम्बन्ध थे और वे आपकी आर्थिक मदद करते थे. इसे सच मान लें? राजीव गाँधी की हत्या की जांच करने वाले जैन साहब ने अपनी रिपोर्ट में लिखा था कि आपकी पार्टी और आपकी जांच होनी चाहिए. राजीव गाँधी की हत्या में आप लोगों का हाथ हो सकता है. क्या करें, इसे सच मान लें? आप जिस राज्य से हैं, वहाँ नेताओं की बड़ी-बड़ी मूर्तियाँ बनाकर जगह-जगह गाड़ दिया जाता हैं. आज से सौ साल बाद अगर कोई सरकार आपकी मूर्तियों को ये कहकर तोड़े कि ऐसा लिखा गया है कि आपके सम्बन्ध वीरप्पन से थे, तो आपके परपोतों को कैसा लगेगा? आपके बारे यहाँ तक सुना गया है कि इस सेतु के टूटने पर आपको लाभ होगा क्योंकि आपकी शिपिंग कम्पनी वगैरह है. इसे सही मान लिया जाय?

एक और महानुभाव को देखा टीवी पर बहस करते हुए. नाम है राजेन्द्र यादव. ये भी लेखक हैं. करूणानिधि और इनमें समानता ये है कि दोनों काला चश्मा लगाते हैं. यादव साहब टीवी पर डिस्कशन पैनल में क्यों थे, मुझे नहीं पता. यादव साहब भी कन्फ्युजियाये हुए थे. पहले बोले राम थे ही नहीं. फिर बोले राम थे, लेकिन उन्होंने सामंतवाद को बढ़ावा दिया. लीजिये, अब इनके बारे में क्या कहें. लेकिन मुझे एक बात समझ में नहीं आई, कि यादव साहब किस कैपेसिटी में थे वहाँ. पर्यावरणविद वो हैं नहीं और न ही अर्थशास्त्री. साईंस-दान भी नहीं हैं. फिर याद आया कि अरे इन्होने ही तो हनुमान जी को विश्व का प्रथम आतंकवादी कहा था. शायद इसीलिये ये साहब वहाँ बैठे थे. ये दोनों महानुभाव लेखक होने के साथ-साथ काला चश्मा भी पहनते हैं. अपने सिवा बाकी लोगों को किस दृष्टि से देखते होंगे, समझा जा सकता है.

इसी पैनल डिस्कशन में अरुण गोविल भी थे. वे वहाँ इस लिए थे क्योंकि उन्होंने राम का रोल लिया था, रामायण में. मुझे याद आया, कि इलाहाबाद में एक चुनाव के दौरान ये साहब राम का रूप धारे कांग्रेस पार्टी का चुनाव प्रचार करते हुए देखे गए थे. वही कांग्रेस पार्टी जिसने कहा है कि राम थे ही नहीं. अरुण गोविल कह रहे थे कि ये आस्था का मुद्दा है और आस्था का सम्मान करना चाहिए. यादव जी अपनी बात पर अड़े हुए थे कि विज्ञान के युग में आस्था के लिए जगह नहीं है. यादव जी की सोच के हिसाब से देखें तो विश्व के जितने भी वैज्ञानिक हैं, वो सारे नास्तिक हैं. उनके मन में धर्म को लेकर कोई आस्था नहीं है. मेरे मन में एक बात है जो मैं बताता चलूँ. मेरा मानना है कि अगर आस्था के युग में विज्ञान के लिए जगह हो सकती है, तो फिर विज्ञान के युग में आस्था के लिए जगह क्यों नहीं हो सकती.

हमारी समस्या ये है कि हमारे देश में इस तरह के मुद्दों पर बात करते हुए ऐसे लोगों को देखा जा सकता है जिसे मुद्दों के बारे में दूर-दूर तक जानकारी नहीं है.


Sunday, September 23, 2007

समस्या आहत मन की है - सेतु की नहीं





सेतु मुद्दा नहीं लगता मुझे. वह पर्यावरण वादी और अर्थशास्त्री/बिजनेस की समझ वाले सलटें. मुझे समस्या अपने आहत मन की लगती है. अगर जरूरी हो तो सेतु हटाया जा सकता है. स्वयम राम ने शिव का पिनाक ध्वस्त किया था स्वयम्वर में. पर ध्वस्त करने के पहले गुरु का ही मन ही मन स्मरण कर उनका अनुमोदन लिया था. यह आवाहन/अनुमोदन श्रद्धा के स्तर पर होता है - लिखित सैंक्शन जैसा नहीं होता. मुझे विश्वास है, राम भी - जो खुद अपने समय से आगे चले, हमें इतिहास/मिथक से मात्र चिपके रहने को विवश नहीं करेंगे.

परषुराम जी से संवाद में राम कहते भी हैं "छुअतहि टूट पिनाक पुराना" - अर्थात पुराना और अप्रासंगिक तो मात्र निमित्त ढ़ूंढ़ता है अवसान को. अत: सेतु अगर अप्रासंगिक होगा तो जायेगा ही.

ramdarbar
मुझे विश्वास है, राम भी - जो खुद अपने समय से आगे चले, हमें इतिहास/मिथक से मात्र चिपके रहने को विवश नहीं करेंगे.

पर वह है, जब हम राम को आदर्श मानें तब न! हम तो यह देख रहे हैं कि उन्हें नकारा जा रहा है. उनकी उपेक्षा की जा रही है. अपमान किया जा रहा है. और यह सब किया जा रहा है कि धर्म निरपेक्षता के लेबल का पट्टा अपने खेमे में सिक्योर रखा जा सके.

आज शिवकुमार मिश्र ने यह मुद्दा बालकिशनजी के माध्यम से उठाया है. मुझे लगता है कि इस मुद्दे पर वे आगे भी बोलेंगे. मैं उनकी ड्राफ्ट पोस्ट का अवलोकन कर रहा हूं; जो स्पष्ट नहीं है कि पब्लिश होगी या उनकी कई पोस्टों की तरह काफी समय तक लटकती रहेगी और अन्तत: विषय अप्रासंगिक हो जायेगा. खैर, वे लिखें - सेतु के पक्ष में या विपक्ष में; मुझे तो सेतु मुद्दा लगता ही नहीं. मुझे तो अपनी आहत भावना दीख रही है. यही भावना और लोगों की होगी और उसे राजनैतिक लोग/दल चुनाव में भुनाने का प्रपंच रचेंगे. प्रारम्भ हो ही गया है खेल.

पता नहीं राम क्या करने जा रहे हैं. पर जो भी वे करेंगे, उसमें उनका अपना ही विधान होगा. मेरे मन की दशा में भी उनका अपना ही विधान है.

हे राम; मेरे विचलित मन में सही और गलत की समझ बनाये रखें. वह भीड़ या उद्वेग का शिकार न बने - यह कृपा करें.


राम सेतु पर लेखन का बालकिशन जी का सुझाव!






भले लोग वाकई भले होते हैं. मित्र, बाल किशन मिल गए. आश्चर्य न करें. मित्र भी भले होते हैं. वो तो शायर लोग दोस्तों के बारे में 'भड़काऊ' शेर लिखकर आम लोगों के मन में दोस्तों के प्रति कुछ शंका पैदा करते रहते हैं. लेकिन मेरा अनुभव ये है कि दोस्त उतने ख़राब नहीं होते, जितना शायर लोग बताते हैं. राजेश रेड्डी साहब ने लिखा है;
रोशन हूँ इतनी तेज हवाओं के बावजूद
जिंदा हूँ दोस्तों की दुआओं के बावजूद
पता नहीं उनके साथ क्या हुआ कि उन्होंने ऐसा लिखा. वे अकेले नहीं हैं. कितने सारे शायरों के शेर पढ़कर लगता है कि उनके दोस्तों ने उनके 'पीठ में खंजर' घोंप दिया था. लेकिन मैं शायर तो हूँ नहीं इसलिए किसी दोस्त से ख़तरा नहीं महसूस करता. वैसे समाजशास्त्र का विद्यार्थी इस बात पर शोध कर सकता है कि शायरों को उनके दोस्तों ने धोखा क्यों दिया. कारण जो भी निकले, एक बात जो मेरे मन में आती है, वो आपको बताता चलूँ. मेरे ख़्याल से ये शायर लोग जब भी नई गजलें लिखते होंगे तो दोस्तों को सुनाने में जुट जाते होंगे. दोस्त को बर्दाश्त नहीं होता होगा, तो वो छुरा चला देता होगा. गजल सुनाने से दोस्त अगर छुरा चला सकता है तो दुश्मन तो तोप चला देगा. लेकिन एक बात के बारे में आजतक सोच नहीं पाया, कि ये दोस्त लोग पीठ में ही छुरा क्यों उतारते थे. शायद शायर लोग उनकी तरफ़ पीठ करके गजलें सुनाते थे.

भटक गया मैं. हमारे ज्ञान भइया होते तो तुरंत टोक देते कि विषयान्तर हो रहा है. चलिए शायर, शेर, छुरा और दोस्ती से हटकर दोस्त की बातें करते हैं. हाँ, तो बाल किशन मिल गए. बाल किशन के बारे में मैंने पहले भी लिखा था कि किस तरह से उन्होंने मुझे अच्छा ब्लागिया बनने के उपाय बताये थे. छूटते ही बोले; " बीस पोस्ट लिखने के लिए कहा था इसका मतलब जैसे-तैसे, जो-तो लिखोगे क्या?"

मैंने पूछा; "यार ऐसा क्यों बोल रहे हो? कोई पोस्ट तुम्हें नागवार गुज़री क्या?"

बोले; "गुजरेगी नहीं! भविष्य की आड़ लेकर भूतकाल की बातें लिखते हो. कभी-कभी वर्तमान के बारे में भी सोचो. देश को आज ब्लागवीरों की जरूरत है. दो-तिहाई ब्लॉग-सेना देश के लिए अपना समय और की-बोर्ड निछावर कर दे रही है और तुम हो कि अगड़म-बगडम जो मन में आ रहा है लिखे जा रहे हो."

आश्चर्यचकित होते हुए मैंने पूछा; "ब्लागवीरों की सेना! ऐसी कोई सेना है क्या?"

बोले; "ब्लॉग लिखते-लिखते चार महीना हो गया. लेकिन नतीजा वही. कुल धान बाईस पसेरी. अरे एक तरफ़ तो इतने जागरूक ब्लॉगर हैं, और एक तरफ़ तुम. आज देश को ब्लॉगर-सेना की जरूरत है.कम से कम एक पोस्ट तो वर्तमान के बारे में सोचकर लिखो."

मैंने कहा; "जरूरत है, मानता हूँ. लेकिन लड़ाई कहाँ लड़नी है, जब तक ये नहीं पता चले तो लैपटाप हाथ में लेकर कौन से सीमा पर जाएँ?"

बोले; "सीमा तय करने की आदत नहीं गयी तुम्हारी. अच्छा ब्लागिया कभी सीमा के बारे में नहीं सोचता. उच्चकोटि का ब्लागिया वो है जो असीम चिंतन करे."

मैंने कहा;"अरे यार पहेलियाँ बुझाते रहोगे या साफ-साफ बताओगे भी कि बात क्या है. किस मुद्दे पर लिखने को कह रहे हो?"

बोले; "राम और रामसेतु. पिछले बीस दिनों में क़रीब नब्बे पोस्ट आ चुकी हैं. रोज इस आशा के साथ तुम्हारे ब्लॉग पर आता हूँ कि आज शायद लिखा हो. तुम्हारे विचार क्या हैं. तुम क्या सोचते हो. लेकिन एक पोस्ट तो क्या एक लाईन भी नहीं दिखाई दी तुम्हारी".

(यह रामसेतु है)
मैंने पूछा; "हाँ ये बात तो है. मैंने तो इस विषय पर सोचा ही नहीं. लेकिन तुम्हें क्या लगता है, किसकी बात जोरदार लगती है तुम्हें? उनकी जो राम-सेतु तोड़ने के पक्ष में हैं, या उनकी जो नहीं चाहते कि राम-सेतु टूटे?"

बोले; "राम-सेतु तोड़ने और न तोड़ने की बात किसी ने की ही नहीं. सब तो राम की बात कर रहे हैं. मसलन राम थे कि नहीं. राम के नाम पर राजनीति हो रही या नहीं है. हिन्दुओं को भड़काने का काम हो रहा है. राजनैतिक पार्टियां रोटी सेंक रही हैं. उबलने के लिए चावल भी चूल्हे पर रख दिया है, आदि-आदि."

मैंने पूछा; "तो तुमको क्या लगा? ब्लॉग-सैनिकों का प्रदर्शन कैसा रहा?"

बोले; "कुछ समझ में ही नहीं आया. ब्लॉग-सैनिक अपनी-अपनी तलवारें हवा में भांज रहे हैं. कौन क्या कहना चाहता है पता ही नहीं चला. पोस्ट पढ़कर लगा जैसे ब्लॉग पोस्ट नहीं छायावाद का निबंध है." आगे बोले;" नसीरुद्दीन साहब को ही ले लो. राम-सेतु के नाम पर क्या-क्या लिख गए. उन्होंने तो मामला व्यक्तिगत, राज्यगत, गांवगत तक बना डाला. कह रहे थे सीता जी उनके गाँव की थीं. राम उनके गाँव के दामाद थे, लेकिन उन्होंने सीता जी को बड़ा दुःख दिया. बहुत नाराज दिख रहे थे राम से. कह रहे थे , राम ने अच्छा नहीं किया, सीता को दुःख देकर.यहाँ तक कहा कि राम समर्थ थे, अपना हक भरत से लड़कर ले सकते थे.लेकिन जान-बूझ कर सीता को इतना दुःख दिया."

मैंने कहा; "तो जब इतने सारे लोग इतना कुछ लिखकर भी 'कुछ नहीं लिख सके' तो फिर मैं क्या लिखूंगा. और अगर लिख भी दिया तो मेरे विचार इतने बड़े झगड़े में कौन सुनेगा?"

बोले; "फिर भी देखो. हो सके तो कुछ लिखो. हो सकता है ब्लॉग समाज के लोगों के लेखन से ही समस्या का समाधान मिल जाए."

मैंने सोचा लेखन से समस्या खडी हुई है. पहले सरकार ने सेतु तोड़ने के लिए प्लान लिखा होगा. फिर वित्त-मंत्री ने बजट लिखा होगा. उसके बाद कैबिनेट ने अपना फैसला लिखा होगा. फिर आर्कियोलोजिकल सर्वे के अफसरों ने हलफनामा लिखा होगा. आगे चलकर अम्बिका सोनी जी अपना इस्तीफ़ा भी लिख सकती हैं.

तुम्ही ने दर्द दिया और तुम्ही दवा देना वाले दर्शन पर चलकर हो सकता है लेखन से ही समस्या ख़त्म भी हो जाए.