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Friday, June 30, 2017

कुरुक्षेत्र में श्रीकृष्ण और अर्जुन





कुरुक्षेत्र में दोनों ओर की सेनाओं के बीच अर्जुन का रथ खड़ा था। उनके सारथी श्रीकृष्ण उन्हें उपदेश दे रहे थे। महापुरुष, योद्धा, अश्व, गज, गदा, धनुष, कृपाण इत्यादि युद्ध आरंभ होने की प्रतीक्षा में बोर हो रहे थे।प्रतीक्षा करते-करते अर्जुन के गांडीव को भी झपकी आ गई थी।

उधर केशव बोले जा रहे थे; ....हे पार्थ, प्रश्न अपने-पराये का नहीं अपितु प्रश्न धर्म और अधर्म का है। तुम किनके लिए चिंतित हो? वे जो हमेशा अधर्म की राह पर चलते रहे? ....और हे पार्थ, यह कदापि न सोचो कि तुम उन्हें मारोगे। ...स्मरण रहे कि आत्मा न जन्म लेती है और न ही मरती है। आत्मा अजर-अमर है...जो हो रहा है वह अच्छा हो रहा है, जो हो चुका है वह भी अच्छा था और जो होगा वह भी अच्छा ही होगा। ....हे पार्थ, अपने मन पर विजय प्राप्त करो। ...कर्म करो पार्थ और फल की चिंता न करो। ...जीवन वर्तमान में है। ...परिवर्तन इस संसार का नियम है कौन्तेय, परिवर्तन और मृत्यु ही सत्य है...हे पार्थ भय और चिंता से मुक्ति पाने का एक मात्र साधन है धर्ममार्ग पर चलना। ...इसलिए हे पार्थ, आगे बढ़ो और धर्म का पालन करो। ...

बोलते-बोलते केशव रुक गए। उन्हें लगा कि वे पर्याप्त बोल चुके हैं और अर्जुन अब युद्ध आरंभ कर देंगे।

अर्जुन की ओर से कोई प्रतिक्रिया न होने पर केशव ने पूछा; पार्थ, क्या अब भी तुम दुविधाओं से घिरे हो? क्या तुम्हारे मन में अब भी कोई प्रश्न है?

अर्जुन ने सिर हिलाते हुए कहा; हे केशव मेरे मन में अब भी एक प्रश्न है।

केशव ने पूछा; कौन सा प्रश्न?

अर्जुन बोले; हे केशव प्रश्न यह है कि, आज अगर महात्मा गांधी होते तो वे क्या कहते?

केशव माथे पर हाथ रखकर बैठ गए।

Saturday, July 26, 2014

एकलव्य री-विजिटेड




पाठशाला में सारी तैयारी हो चुकी थी. गुरु द्रोणाचार्य अपने चेलों की नेट-प्रैक्टिस के लिए चिड़िया को पेड़ पर टंगवा चुके थे. उन्हें पता था कि केवल अर्जुन को ही चिड़िया की आँख दिखाई देगी और उनके बाकी चेले निशाना लगाने के बावजूद पेड़ से लेकर मैदान तक सबकुछ देखेंगे. फिर भी उन्होंने खानापूर्ति के लिए युधिष्ठिर से पूछा; "युधिष्ठिर, तुमने चिड़िया पर निशाना लगा लिया हो तो बताओ कि तुम्हें क्या-क्या दिखाई दे रहा है?"

युधिष्ठिर बोले; "हे गुरुदेव, मुझे डाल से लटकाई गई चिड़िया दिखाई दे रही है. जिस डोरी से उसे लटकाया गया है, वह डोरी दिखाई दे रही है. पेड़ दिखाई दे रहा है. पेड़ की डालें दिखाई दे रही हैं. पत्ते दिखाई दे रहे हैं. आप दिखाई दे रहे हैं. और हे गुरुदेव, मुझे संसार में चारों तरफ फैला अधर्म दिखाई दे रहा है. अधर्म से पीड़ित धर्म दिखाई दे रहा है. मुझे दुशासन के कान में कुछ कहता दुर्योधन दिखाई...."

गुरु द्रोणाचार्य बोले; "ए बेटा, तुमसे नहीं होगा. तुम एक तरफ खड़े हो जाओ."

उसके बाद उन्होंने भीमसेन को निशाना लगाने के लिए कहा. जब भीम ने निशाना लगा लिया तब उन्होंने उनसे पूछा; "वत्स भीमसेन, तुम्हें क्या-क्या दिखाई दे रहा है?"

भीमसेन बोले; "गुरुदेव मुझे वह सबकुछ दिखाई तो दे ही रहा है जो भ्राताश्री युधिष्ठिर को दिखाई दे रहा था, उसके अलावा मुझे नेट प्रैक्टिस के बाद खाए जानेवाले जलपान दिखाई दे रहे हैं. मुझे बगीचे में आम के पेड़ के नीचे रखे टेबल पर रखा खीर का पात्र और लड्डुओं से भरा परात दिखाई दे रहा है. साथ ही मुझे उस बदमाश दुर्योधन का माथा दिखाई दे रहा है और हे गुरुदेव, इच्छा तो हो रही है कि पहले मैं इस दुर्योधन का माथा फोड़ आऊँ, निशाना वगैरह बाद में लगाउँगा"

भीमसेन की बात सुनकर गुरु द्रोण बोले; "तुम भी अपना धनुष-वाण लेकर हट जाओ और युधिष्ठिर के पास खड़े हो जाओ. तुम्हें मेरी आज्ञा है कि दुर्योधन के पास मत जाना"

भीमसेन जाकर युधिष्ठिर के पास खड़े हो गए.

इसी तरह गुरु द्रोण ने सभी चेलों से एक ही प्रश्न कर और उनके जवाब सुनकर भगा दिया. उन्होंने अंत में अर्जुन को बुलाया. अर्जुन ने धनुष पर वाण रखकर निशाना लगाया. गुरु द्रोण ने उनसे पूछा; "अर्जुन, तुम बताओ कि तुम्हें क्या-क्या दिखाई दे रहा है?"

अर्जुन बोले; "हे गुरुदेव, आपको यह नहीं पूछना चाहिए कि मुझे क्या-क्या दिखाई दे रहा है? आप मात्र यह पूछें कि मुझे क्या दिखाई दे रहा है"

द्रोण बोले; "ऑब्जेक्शन सस्टेंड. अच्छा मैं फिर से प्रश्न करता हूँ; तुम्हें क्या दिखाई दे रहा है?"

अर्जुन बोले; "हे गुरुदेव, मुझे उस चिड़िया की आँख दिखाई दे रही है और आँख के अलावा कुछ दिखाई नहीं दे रहा"

यह सुनकर गुरु द्रोण की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा. उन्होंने अर्जुन को गले से लगा लिया. इस दृश्य को देखकर आकाश में बैठे इंद्र के प्रभारी देवताओं के मन में आया कि तुरंत पुष्पवर्षा कर दी जाय लेकिन वे ऐसा न कर पाये. जल्दी-जल्दी में वे पुष्प लाना भूल गए थे.

खैर, गुरुवर देशबंधु … क्षमा करें, गुरुवर द्रोण ने अर्जुन को गले से लगाया. उन्हें शाबाशी प्रदान की और बोले; "हे पांडुनंदन अर्जुन, मैं आज तुम्हें वचन देता हूँ कि इस संसार में तुमसे बड़ा धनुर्धर कोई नहीं होगा"

उसदिन के लिए नेट प्रैक्टिस खत्म हुई और सारे राजकुमार जलपान पर टूट पड़े.

कुछ दिन बीते. एकदिन सारे राजकुमार पाठशाला में पड़े-पड़े बोर हो रहे थे तो उन्होंने सोचा कि क्यों न जंगल में घूम लिया जाय. घूमने का फैसला कर वे निकल पड़े. अब राजकुमार हैं तो उनके कुत्ते भी होंगे ही. हस्तिनापुर महाराज भरत के जमाने से आगे बढ़ चुका था इसलिए बाघों की जगह अब कुत्तों ने ले ली थी.

तो सारे राजकुमार एक कुत्ता लेकर जंगल भ्रमण पर निकल गए. अपने धर्म का पालन करते हुए कुत्ता राजकुमारों के पीछे-पीछे चल रहा था. कुछ दूर जाने के बाद राजकुमारों पीछे मुड़कर देखा तो कुत्ता उनके साथ नहीं था. अब वे जंगल भ्रमण भूल कुत्ते की खोज में निकल गए. खैर, थोड़ी देर बाद कुत्ता मिला. कुत्ते अक्सर मिल ही जाते हैं.

लेकिन राजकुमारों के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा जब उन्होंने देखा कि कुत्ते के मुँह में सात वाण ठूंस दिए गए हैं और इस तरह ठूंसे गए हैं कि कुत्ते के मुंह में खून भी नहीं लगा था. बाकी राजकुमारों के लिए तो बात आई-गई हो गई लेकिन अर्जुन चिंतित थे. उन्हें तुरंत गुरु द्रोण का वचन याद आया. कुत्ते को लिए वे गुरु द्रोण के पास पहुंचे और छूटते ही प्रणाम कर बोले; "हे गुरुवर, आपने तो वचन दिया था कि मुझसे बड़ा धनुर्धर पूरे संसार में नहीं होगा फिर यह कौन है जिसने वाण चलाकर कुत्ते के मुंह बंद कर दिया? इसका अर्थ यह है कि कोई न कोई है जो मुझसे बड़ा धनुर्धर है"

गुरु द्रोण भी आश्चर्यचकित थे. इतने बड़े धनुर्धर की जानकारी मिलने के बावजूद वे खुश होने की जगह दुखी थे. उन्हें लगा कि उनका वचन तो असत्य साबित हो जाएगा. वे अर्जुन और बाकी राजकुमारों को लिए उस धनुर्धर की खोज में निकल गए जिसके अंदर धनुर्धरी की ऐसा प्रतिभा थी. कुछ दूर चलने के पश्चात उन्हें एक स्थान पर वाण चलकर प्रैक्टिस करता हुआ एक योद्धा मिला. कुत्ते ने भी योद्धा को पहचान लिया और वहीँ रुक गया. सब जान चुके थे कि यही वह धनुर्धर है जिसने कुत्ते की यह दशा की थी.

गुरु द्रोण को देखकर वह धनुर्धर रुक गया. उसने गुरु द्रोण को प्रणाम किया. कुछ ही क्षणों में उन्होंने उसे पहचान लिया. वह एकलव्य था. उसने गुरु द्रोण को सारी बात बताई कि कैसे पाठशाला से वापस किये जाने के बाद उसने गुरु द्रोण की मूर्ति बनाई और उसे ही प्रणाम करके धनुर्विद्या सीखने लगा. उधर वह सारी बात बता रहा था और इधर गुरुवर मन ही मन सोच रहे थे कि वे कैसे अपने वचन की लाज रखें.

अंत में उन्होंने दुविधा और शर्म का त्याग कर एकलव्य से गुरुदक्षिणा में अँगूठा मांग डाला. उनके अपने वचन के आगे एकलव्य की प्रतिभा के लिए कोई स्थान नहीं था.

गुरुदक्षिणा में अंगूठा काटकर देने की उनकी मांग सुनकर एकलव्य जरा भी विचलित नहीं हुआ. उसने कहा; "हे गुरुश्रेष्ठ, मैं गुरुदक्षिणा में आपको अपना अँगूठा देने में जरा भी पीछे नहीं हटूँगा. परंतु हे गुरुदेव, आपसे धनुर्विद्या सीखने चक्कर में मैंने महीनों से स्नान नहीं किया है. अब मैं कोई राजकुमार तो हूँ नहीं, जो विद्या ग्रहण करते समय भी ठाट से रहता. ऐसे में हे गुरुदेव, आपको गुरुदक्षिणा में अंगूठा देने से पहले मैं शुद्ध होना चाहता हूँ. मैं कल स्नान करूँगा और उसके बाद आपको अँगूठा काटकर दे दूँगा. आप मुझे कल सुबह तक का समय दें"

गुरु द्रोण खुश हो गए. वे तो खुश थे ही, धनुर्धर अर्जुन यह सोचकर उनसे भी ज्यादा खुश थे कि संसार के सबसे बड़े धनुर्धर के उनके पद पर अब कोई संकट नहीं था. दोनों वापस पाठशाला आ गए.

दूसरे दिन गुरु द्रोण नींद से जाग, नित्यक्रिया कर एकलव्य की प्रतीक्षा करने लगे. सारे राजकुमार उनके साथ थे. पाण्डु राजकुमार यह सोचकर फूले नहीं समा रहे थे कि गुरुवर द्वारा एकलव्य से अँगूठा लेने के कारण अर्जुन महान बने रहेंगे. वे एकलव्य की प्रतीक्षा कर रहे थे तभी हस्तिनापुर विश्वविद्यालय के उपकुलपति का चारण एक नोटिस लिए उपस्थित हुआ. उसने गुरु द्रोण के हाथ में नोटिस थमा दिया. उन्होंने नोटिस खोला.

यह उपकुलपति की तरफ से एक कारण बताओ नोटिस था जिसमें लिखा था; "एकलव्य नामक छात्र से मिली शिकायत के अनुसार यह प्रकाश में आया है कि आप गुरुदक्षिणा में शिष्यों से उनका अँगूठा कटवा लेते हैं. अगर यह सच है तो आप यह बतायें कि क्यों न उपकुलपति द्वारा आपके पाठशाला को दी गई मान्यता को रद्द कर दिया जाय और आपके ऊपर मानवाधिकार को नष्ट करने का मुकदमा क्यों न चलाया जाय?"

अभी वे यह नोटिस पढ़ ही रहे थे कि अनुसूचित जनजाति आयोग के कार्यालय से एक नोटिस......

परेशान गुरुवर के माथे पर पसीने की बूँदें पड़ने लगी. वे पोछना शुरू ही करने वाले थे कि अचानक नींद से उठकर बैठ गए. देखा तो सामने उनका पुत्र अस्वथामा खड़ा था. उसने गुरु द्रोण पर दृष्टि डाली मानो कोई प्रश्न कर रहा हो.

गुरु द्रोण बोले; "अपराध बोध अब जीवनपर्यन्त साथ नहीं छोड़ेगा पुत्र"

Friday, May 23, 2014

महाभारत के बाद




लड़ाई ख़त्म चुकी थी. कौरव हार चुके थे. पितामह भी धर्मराज युधिष्ठिर को समझा-बुझा कर शासन करने के लिए राजी कर चुके थे. धर्मराज के पास भी राज करने के सिवा और कुछ भी करने के लिए बचा नहीं था. उन्होंने फैसला किया कि खुद को व्यस्त रखने के लिए राज करना जरूरी है. भगवान श्रीकृष्ण भी भविष्य के हस्तिनापुर की नीव कैसी हो, इसपर चिंतन कर रहे थे. अर्जुन गांडीव को धो-पोंछ कर रखने की तैयारी कर रहे थे. बात भी सही थी. जब कोई शत्रु बचा ही नहीं तो फिर गांडीव धो-पोंछ कर रखना ही श्रेयस्कर था. सहदेव भविष्यवाणियां करने में व्यस्त थे. भीम सुबह के नाश्ते के बाद दोपहर के भोजन का मेन्यू और शाम के नाश्ते के बाद रात के भोजन का मेन्यू फाइनल करने में व्यस्त रहने लगे थे. द्रौपदी ने अपने केश बाँधने की तैयारी कर ली थी. हेयर स्टाइलिस्ट उन्हें तरह-तरह के हेयर स्टाइल वाले ब्रॉश्चर दिखाने में व्यस्त थी. माता कुंती अपने व्यस्त पुत्रों को देखकर प्रसन्न होने में व्यस्त थीं.

हस्तिनापुर में तमाम पदों पर बैठनेवाले के नामों की चर्चा चल रही थी. लोग अनुमान लगाने में व्यस्त थे. कौन सा विभाग किसे मिलेगा? कौन हस्तिनापुर में व्यापार मंत्री बनेगा? कौन सेनापति बनेगा? कौन रक्षामंत्री बनेगा? मीडिया व्यस्त. सोशल मीडिया व्यस्त. अखबार व्यस्त. संपादक व्यस्त. महान टीवी चैनलों के महान ऐंकर व्यस्त. चिरकुट चैनलों के चिरकुट ऐंकर व्यस्त. खबरिया टीवी चैनल धर्मराज युधिष्ठिर पर डाक्यूमेंट्री ठेल रहे थे. जिन टीवी चैनलों ने द्रौपदी के चीरहरण के लिए वर्षों तक धर्मराज युधिष्ठिर के द्यूतक्रीड़ा को दोषी माना था, उन्होंने भी उनके बारे में पॉजिटिव बातें ही दिखाने की शपथ ले रखी थी. इन डॉक्यूमेंट्री में लगभग सभी चैनलों ने यह तय कर लिया था कि किसी भी हालत में धर्मराज के जीवन से जुड़े द्यूतक्रीड़ा एपिसोड को नहीं दिखाना है. उन्हें शंका थी कि कहीं लोग यह कहकर हंसी उड़ाना न शुरू कर दें कि; अरे धर्मराज तो जुआ खेलते थे.

तमाम बातों को लेकर लोग चर्चा में व्यस्त थे. जो चर्चा में व्यस्त नहीं थे वे धर्मराज की जय-जयकार में व्यस्त थे. जो जयकार में व्यस्त नहीं थे वे अपना काम करने में व्यस्त थे. जिनके पास कोई काम नहीं था वे धर्मराज को सुझाव देने में व्यस्त थे. जिधर नज़र पड़ती उधर ही व्यस्त लोगों का मजमा दिखाई देता. कुल मिलाकर हस्तिनापुर विकट व्यस्तकाल से गुजर रहा था.

सब तरफ पांडवों के समर्थक ही दिखाई दे रहे थे. कौरवों के समर्थक या तो चुपके से छुट्टियां बिताने अवंती चले गए थे या कन्वर्ट होकर पांडवों के समर्थक पद की शपथ ले चुके थे. पत्रकार चिंतामणि गोस्वामी यह सोचकर व्यस्त थे कि कैसे धर्मराज युधिष्ठिर से एक साक्षात्कार निकाल लिया जाय? अपनी इस इच्छा को फलीभूत होते हुए देखने हेतु वे एकबार नकुल के सारथी से 'सोर्स' भी लगवा चुके थे. उसने पत्रकारश्री को वचन दिया था कि वह नकुल से कहकर उनका यह काम करवा देगा.

इधर धर्मराज युधिष्ठिर पदों पर बैठनेवाले की संभावित सूची को लेकर व्यस्त थे. उन्हें पता था कि कौरवों के वर्षों पुराने कुशासन के कारण हस्तिनापुर एक लाबीस्ट-प्रधान राज्य बन चुका था. एक दिन धर्मराज हस्तिनापुर में भरे जाने वाले पदों के संभावित उम्मीदवारों की सूची देख रहे थे. उन्हें पता था कि किसको कहाँ लगाना है? किसको कौन सा पद देना है. इंद्रप्रस्थ में अपने सुशासन के चलते उन्हें सब पता था कि क्या-क्या करना है. इधर दाहिने हाथ में लेखनी और बाएं हाथ में सूची लिए धर्मराज ने अपना काम शुरू ही किया था कि सेवक संदेश लेकर आया और बोला; "हे महाराज, हे पांडुनंदन धर्मराज युधिष्ठिर, आपसे मिलने प्रजा के कुछ लोग आये हैं"

धर्मराज को लगा कि प्रजा के लोग क्यों आये हैं? अचानक क्या हो गया? उन्होंने अभीतक किसी जनता दरबार लगाने का अनाउंसमेंट भी नहीं करवाया था. खैर, कुछ सोचने के बाद उन्होंने कहा; "ठीक है उन्हें अंदर भेज दो"

सेवक को कुछ याद आया और उसने धर्मराज को जानकारी देते हुए कहा; "परन्तु महाराज, करीब डेढ़ हज़ार लोग आये हैं. सबको अंदर ले तो आऊँ परन्तु वे खड़े कहाँ होंगे?"

धर्मराज ने कुछ सोचकर कहा; "इतने आये हैं? परन्तु क्यों? और सारे क्यों मिलना चाहते हैं?"

सेवक बोला; "ये तो पता नहीं महाराज लेकिन कहा तो यही"

धर्मराज बोले; "तो फिर उनसे कहो कि केवल १०-१५ लोग ही अंदर आएं"

सेवक ने जाकर भीड़ को सूचना दी. बोला; "महाराज को मैंने जानकारी दी. उन्होंने आप में से केवल १०-१५ लोगों को उनसे मिलने की आज्ञा दी है."

अभी उनसे इतना कहा ही था कि भीड़ में से एक युवक चिल्लाया; "मैंने आपसे कहा था कि उन्हें मेरा नाम बताएं. आपने क्या बताया नहीं कि मैं चहचह डॉट कॉम पर उनका फालोवर हूँ? और मुखसर्ग डॉट कॉम पर भी उनका समर्थक हूँ?"

सेवक बोला; "अब यह सब मुझे नहीं पता. उन्होंने तो यही कहा कि १०-१५ लोगों से ज्यादा लोग नहीं जा सकते. आपस में फैसला कर लें कि कौन कौन जाएगा"

उसका इतना कहना था कि बातों का सैलाब आ गया. एकसाथ हज़ारों लोगों ने बोलना शुरू कर दिया. कौन क्या कह रहा था, किसी की समझ में नहीं आ रहा था. कुछ वैसा ही नज़ारा था जैसा पेड़ पर बैठे पक्षियों के झुंड ने नीचे किसी सर्प को देख लिया हो. कोई तर्क दे रहा था तो कोई कुतर्क. सब एकसाथ कुछ न कुछ दे रहे थे. चारों तरफ से तर्क, वितर्क, कुतर्क के वाणों की वर्षा हो रही थी. किसी को पता भी नहीं चल रहा था कि वह क्या कह रहा है? क्या सुन रहा है? क्या कहना चाहता है? क्या सुनना चाहता है?

यह कार्यक्रम देर तक चलने की संभावना को देखते हुए अचानक सेवक चिल्लाया; "अगर इसी क्षण आपसब चुप नहीं हुए तो आपसब को राजमहल के अहाते से बाहर कर दिया जाएगा"

भय बिनु होइ न प्रीति के सिद्धान्त को एकबार फिर से सही पाया गया. सब चुप हो गए. कुछ देर बाद भीड़ ने दस लोगों को जाने दिया. थोड़ी देर में ही दसों धर्मराज युधिष्ठिर के सामने थे. उन्हें देखते ही धर्मराज ने पूछा; "हे, महानुभावों, अपना परिचय दें एवं यहाँ आने का प्रयोजन बताएं."

उनकी बात सुनते ही उनमें से एक अति उत्साहित होकर बोला; "महाराज, पहचाना मुझे? मैं रमाकांत. आपको चहचह डॉट कॉम पर फॉलो करता हूँ"

उसकी बात सुनकर धर्मराज बोले; "रमाकांत! मैंने यह नाम पहले नहीं सुना. अपना पूरा परिचय दें."

वो बोला; "अरे धर्मराज, मैं चहचह डॉट कॉम पर आपका फालोवर. अरे वो @धर्मराजभक्त याद है आपको? वो मेरा ही हैंडल है. अरे वही जिसकी डीपी में त्रिशूल लगा हुआ है. मैं आपकी हर चहचह आर सी करता था. मैंने ही पहली बार #फाइवविलेजेजफॉरपांडव हैसटैग चहचह डॉट कॉम पर ट्रेंड करवाया था. याद है आपको? दुर्योधन का वह फोटोशॉप किया पिक्चर जिसमें आप उसकी छाती पर पाँव रख तलवार घुसाने ही वाले थे, उसे मैंने ही अपनी कारीगरी से बनाया था."

धर्मराज बोले; "मुझे सब याद है लेकिन आपने वहां डी पी में त्रिशूल लगाया है और यहाँ अपना नाम रमाकांत बता रहे हैं तो मैं कैसे पहचानूँगा?"

अभी ये दोनों बात ही कर रहे थे कि एक और समर्थक बोल पड़ा; "और महाराज मुझे पहचाना आपने? मैं वही हूँ जिसने चहचह डॉट कॉम पर अपनी चहचह में दुशासन को गाली दिया था. पाँच सौ आर सी मिला था उसे."

अचानक एक और सामने आया. बोला; "और मैंने जयद्रथ को पूरा सात महीने तक ट्रॉल किया था"

सबने अपना-अपना परिचय दिया। सुनकर धर्मराज बोले; "मुझसे क्या चाहते हैं महानुभावों?"

एक बोला; "महाराज, देखिये आप भी मानेंगे कि कुरुक्षेत्र में युद्ध के दौरान ही नहीं, उससे पहले से ही हमने आपके लिए काम किया. हस्तिनापुर की प्रजा के बीच पूरा समर्थन और माहौल हमने तैयार किया. आप जरूर मानेंगे कि युद्ध में आपकी विजय हमारे कारण ही हुई."

धर्मराज बोले; "हे महानुभावों, मैं मानता हूँ कि आपने हम पांडवों का समर्थन किया परन्तु इसका बार-बार बखान करके मुझे शर्मिंदा न करें. आप भी मानेंगे कि युद्ध जीतने के लिए हमारे साथ तमाम योद्धा लड़े. उन्होंने कुरुक्षेत्र के मैदान में लड़ाई की. तो क्या उनको इसका क्रेडिट नहीं मिलना चाहिए? वैसे आप चाहते क्या हैं?"

समर्थकों में से एक बोला; "हम यह चाहते हैं कि आप हस्तिनापुर में तमाम पदों पर नियुक्ति हमारे अनुसार करें. हम जिसे कहें उसे सेनापति बनायें. जिसे कहें उसे रक्षामंत्री बनाएं. हम जिसे कहें उसे ………

धर्मराज ने उसे बीच में ही टोकते हुए कहा; "हे समर्थकश्री, समर्थन करना एक बात है और राजकाज के कामों में दखल देना सर्वथा दूसरी. युद्ध समाप्त हो चुका है. अब राज-काज करने का समय आ गया है. अब मुझे काम करना है. अब पदों पर नियुक्ति का काम मुझे करने दें क्योंकि अगर राजकाज ठीक से नहीं चला तो बेइज्जती मेरी होगी, आपकी नहीं. सत्य तो यह है कि केशव भी पदों पर नियुक्ति के मुद्दे पर मुझे कुछ नहीं कह रहे. आपको समझना चाहिए कि ............."

अचानक सब चुप हो गए. कुछ ही मिनटों में समर्थकगण वहां से छंटने. जाते-जाते एक बोल गया; "चलो यहाँ से. सब ऐसे ही होते हैं. जब जरूरत थी तो समर्थन ले लिया और आज कह रहे हैं..........राजकाज चलाने दो, इन्हें भी देख लेंगे जैसे कौरवों को देखा"

Tuesday, January 22, 2013

इसपार और उसपार..




हनुमान जी माता सीता से अशोक वाटिका में मिल चुके थे। तत्पश्चात लंका को अग्नि के हवाले कर रावण जी को कृतार्थ भी कर चुके थे। वापस आये और उन्होंने भगवान् राम को सारी बात बताई। साथ ही यह बताया कि घर के भेदी विभीषण जी अब भगवान् श्रीराम के शरण में आ अपना जीवन सफल बनाने के लिए तैयार हैं। कि अब विलम्ब न करके भगवान् श्रीराम को लंका पर चढ़ाई करके रावण जी की ऐसी-तैसी कर देनी चाहिए ताकि माँ सीता को वापस लाने का कार्य संपन्न हो। हनुमान जी की इसबात पर श्रीराम और लखनलाल जी प्रसन्न हैं। भगवान् श्रीराम के मन में हनुमान जी को कुछ उपहार देने की इच्छा जागृत होती है परन्तु उनके पास कुछ न रहने के कारण वे ऐसा नहीं कर पाते।

महाराज सुग्रीव की बानरसेना खुश है। इस बात से कि जल्द ही उन्हें अपने करतब दिखाने का अवसर मिलेगा। पूरी सेना के अन्दर एड्रेनेलिन इस समय फुल-फ्लो में है। योद्धाओं ने कसरत का समय बढ़ा दिया है। सेनानायक जामवंत जी अपने अनुभव और मैनेजेरियल स्किल्स और तेज़ कर रहे हैं। बालि पुत्र अंगद ने अब कुछ ज्यादा वजनी गदा के साथ अभ्यास शुरू कर दिया है। सेना की टुकड़ियों को तैयार किया जा रहा है। हर टुकड़ी के लिए नायक का चुनाव हो रहा है। युद्ध के नये-नये तरीके आजमाने के लिए व्यूह रचना का अभ्यास किया जा रहा है। किष्किन्धा के अलावा और भी पहाड़ों और जंगलों से बानर योद्धा अपने भगवान के लिए अपने प्राण लिए चले आ रहे हैं।

भगवान श्रीराम के संयुक्त मुख्य अभियंता श्री नल और श्री नील बड़े आराम से हैं। उन्हें पता है कि इसबार उन्हें किसी सेतु को बनाने की आवश्यकता नहीं है। महाराज सुग्रीव के गुप्तचर आकर यह बता चुके हैं कि भ्राता-द्वय द्वारा त्रेता युग में बनाया गया सेतु अभी भी है। उसी सेतु पर से होकर भगवान श्रीराम की सेना श्रीलंका पहुँच जायेगी। उधर भगवान श्रीराम भी इसबात से आश्वस्त हैं कि इसबार समुद्र महाराज की न तो पूजा-अर्चना करने की आवश्यकता है और न ही पूजन करने के उपरांत भी न सुनने के बाद धनुषबाण लेकर हड़काने की। त्रेता युग की डांट समुद्र देवता अभीतक भूल नहीं पाए हैं और इसीलिए उन्होंने रामसेतु को बहुत ज्यादा नुकशान न पहुंचाते हुए लगभग ज्यों का त्यों रखा हुआ है।

महाराज सुग्रीव, सेनानायक जामवंत, भगवान श्रीराम, बजरंगबली, अंगद, वगैरह पूरी बानरसेना के साथ समुद्र के किनारे आ पहुंचे। देखा तो सेतु तो दिखाई दे रहा है परन्तु सेतु के ऊपर समुद्र का जल भी बह रहा है। भगवान श्रीराम को लगा कि जितना जल है वह तो बजरंगबली अपनी अंजुली में उठा लेंगे और उनके लिए मार्ग बन जाएगा। जैसे ही उन्होंने बजरंगबली ने सेतु के ऊपर बह रहे समुद्र के जल को अपनी अंजुली में उठाना चाहा वैसे ही एक सिक्यूरिटी गार्ड ने आकर कहा; "हे पवनसुत, आपसे अनुरोध है कि आप इस सेतु से कोई छेड़-छाड़ न करें।"

हनुमान जी ने सैनिक की बात सुनी और बोले; "हे सैनिकश्रेष्ठ, सेतु के साथ छेड़-छाड़ करने की हमारी कोई मंशा नहीं है। जिस सेतु को हमने बनाया उससे हम छेड़-छाड़ क्यों करेंगे? परन्तु हे सैनिकश्रेष्ठ, हमारे प्रभु श्रीराम और बानरसेना को उसपार जाना ही है। अतः हमें जाने दिया जाय। ऐसा नहीं हुआ तो आप तो मुझे जानते ही है। मैं अपने प्रभु के लिए कुछ भी कर सकता हूँ।"

उनकी बात सुनकर गार्ड भयाक्रांत हो गया। घबड़ाकर बोला; "हे बजरंगबली, किंचित आपको यह नहीं पता कि इस सेतु को तोड़ने का आदेश निकल चुका है और मामला सब-जुडिश नहीं हुआ होता तो यह सेतु अबतक टूट चुका होता। कुल मिलाकर यह कहना है कि यह सेतु ही अब सब-जुडीशियल हो चुका है। वैसे भगवन, महाराज सुग्रीव की सेना श्रीलंका जाकर क्या करनेवाली है?"

हनुमान जी बोले; "हमारी सेना उसपार जाना चाहती है ताकि रावण का सत्यानाश कर सके।"

उनकी बात सुनकर सैनिक बोला; "हे भगवन, छोटा मुंह और बड़ी बात होगी परन्तु क्या आपको नहीं लगता कि अब रावण केवल उसपार नहीं रहता?"

उसकी बात सुनकर हनुमान जी कुछ सोचने लगे। भगवान् श्रीराम और उनके अनुज लखनलाल से दबे स्वर में कुछ बात करने लगे। भगवान शायद यह सोचने लगे कि पहले किस रावण का वध करना ............................

Monday, September 3, 2012

देवी अहल्या, भगवान राम और स्टोन माफिया




श्री राम और उनके अनुज श्री लक्ष्मण को लिए महर्षि विश्वामित्र जनकपुर चले जा रहे थे. उन्हें पता था कि जनकपुर जानेवाले मार्ग में ही ऋषि गौतम का आश्रम पड़ेगा. श्री राम को याद था कि महर्षि विश्वामित्र के कहने पर उन्हें पत्थर रूपी अहल्या का कल्याण करना है. मनुष्य के रूप में ही सही, जब भगवान पृथ्वी पर आये हैं तो कल्याण करेंगे ही. पृथ्वीवासी चाहकर भी उनके कल्याणकारी कर्मों से नहीं बच सकते. श्री राम, अनुज लक्ष्मण और महर्षि विश्वामित्र मन ही दृश्य बुनते जा रहे थे. कि कैसे तीनों ऋषि गौतम के आश्रम के पास से गुजरेगें. कि उन्हें वहाँ जाकर पता चलेगा कि ऋषि गौतम तप करने हिमालय चले गए हैं. कि उन्हें एक शिला दिखाई देगी और महर्षि विश्वामित्र के कहने पर श्री राम उस शिला को छूएंगे और देवी अहल्या अपने असली रूप में प्रकट हो जायेंगी. फिर वे भगवान राम और महर्षि विश्वामित्र को प्रणाम करेंगी. कि देवतागण ऊपर से सबकुछ देखते हुए प्रसन्न होंगे. कि केवल प्रसन्न होने से उनका मन नहीं भरेगा और वे ऊपर से पुष्पवर्षा करके अपने कर्त्तव्य का निर्वाह कर डालेंगे.

मन ही मन सारे दृश्य सोचते हुए वे चलते-चलते ऋषि गौतम के आश्रम पहुँच गए. भगवान राम को पता था कि एक व्यवस्था के अनुसार सरकार ने शिला रूपी अहल्या को वैश्विक धरोहर घोषित करते हुए उस शिला के आस-पास की ज़मीन का अधिग्रहण कर लिया था और शिला के पास एक सूचना पट्टी लगा दी कि राज्य का कोई भी नागरिक इस शिला के आस-आस न फटके और किसी भी तरह से इस शिला को अपवित्र न करे. सरकार इस बात से निश्चिन्त थी कि सूचना पट्टी लगाने से नागरिक उस शिला के आस-पास नहीं आयेंगे और उसकी रक्षा करना अपना धर्म समझेंगे. शिला की रक्षा के लिए वहाँ अर्ध-सैनिक बल के जवानों को ड्यूटी पर भी लगा दिया गया था.

इतनी मेहनत करके सरकार ने अपने कर्त्तव्य का पालन कर डाला था.

इधर जब भगवान राम, उनके अनुज लक्ष्मण और महर्षि जब वहाँ पहुंचे तो उनके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा. वे देखते क्या हैं कि सरकारी सूचना पट्टी तो थी और शिला के चारों तरफ सरकारी अहाता भी था लेकिन शिला गायब थी. सरकारी सूचना पट्टी पर भी राज्य के नागरिकों ने खड़िया मिट्टी से तमाम संदेश लिख डाले थे. कहीं किसी नौजवान ने अपनी प्रेमिका के लिए संदेश लिख डाला था तो किसी ने उसपर पान खाकर थूक भी दिया था. इतनी कलाकारी के बाद सरकारी संदेश का दिखना असंभव था.

यह सब देखकर महर्षि बहुत क्रोधित हुए. उन्होंने पास ही खड़े एक नागरिक से पूछा; "हे वत्स, यहाँ रखी गई शिला किधर लुप्त हो गई? क्या किसी ने उसे उठाकर कहीं और रख दिया?"

नागरिक बोला; "हे महर्षि, यहाँ रखी गई शिला तो इस इलाके के स्टोन माफिया ने तुड़वाकर बेंच डाली. हे महर्षि, इस इलाके में पत्थर खदानों के खनन का ठेका यहाँ के ही निवासी जग प्रसिद्द ठेकेदार गया सिंह को मिला है. न्यायपूर्ण खनन के साथ-साथ अन्यायपूर्ण खनन करने के लिए वे प्रसिद्द हैं."

नागरिक की बात सुनकर लक्ष्मण जी को बहुत क्रोध आया. वे क्रोध में ठेकेदार गया सिंह की खोज में निकल गए जिससे उसे दण्डित कर सकें. उधर भगवान राम सोचने लगे कि न ऋषि गौतम देवी अहल्या को श्राप देते, न यह होता. एक देवता ने देवी अहल्या का अपमान किया. एक ऋषि ने उसे श्राप दिया. एक और पुरुष ने उसे शिला भी न रहने दिया.

वे पुरुषों के कर्मों पर विचार कर ही रहे थे कि महर्षि विश्वामित्र बोले; "हे राम, अपनी दिव्य-शक्ति से पता लगाओ कि उस शिला के खंड कहाँ-कहाँ हैं. हम वहीँ चलकर देवी अहल्या का उद्धार करेंगे.

Saturday, August 11, 2012

भरत और बाघ...कालिया मर्दन




भरत और बाघ


ऋषि दुर्वाशा के शाप का यह असर हुआ कि महराज दुष्यंत ने शकुंतला को पहचानने की जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया. नदी में अंगूठी गिरने के कारण देवी शकुंतला की स्थिति और दयनीय हो गई थी. वे एकबार फिर से महराज को याद नहीं दिला सकीं कि कैसे दोनों ने ऋषि कन्व के आश्रम में गन्धर्व विवाह किया था. कुल मिलाकर जब मामला हाथ से निकल गया सा प्रतीत हुआ तो देवी शकुंतला को वापस लौटना पड़ा. वे पहले की तरह ही ऋषि के आश्रम में रहने लगी. उनका पुत्र भरत अब बड़ा होने लगा था.

अब उसकी उम्र खेल-कूद की हो गई थी इसलिए उसने खेल-कूद शुरू कर दिया था.

उधर एक दिन रोज-रोज के राजकीय झमेलों से त्रस्त महराज दुष्यंत फिर से आखेट के लिए अपनी सेना लेकर निकले. उनको उन्ही जंगलों से गुजरना था जिसमें देवी शकुंतला अपने पुत्र के साथ रहती थीं. उन्हें पता था कि इसी जंगल में उनका मिलन अपने पुत्र भरत से होगा. वे जब जंगल में पहुंचे तो उन्होंने ने देखा कि बालक भरत तो है लेकिन इस बार वह बाघों के साथ नहीं खेल रहा. इसबार वह गिलहरियों के साथ खेल रहा था और उन गिलहरियों के दांत गिन रहा था.

महराज को बहुत क्रोध आया. उन्होंने वहीँ से पुकारा; "शकुंतले..शकुंतले."

महाराज की पुकार सुन देवी शकुंतला ने उन्हें पहचान लिया. वे प्रसन्न होकर दौड़ती हुई आईं. उन्हें देखते ही दुष्यंत ने प्रश्न किया; "यह क्या शकुंतले? हमारा पुत्र भरत, जिसे बाघों के साथ खेलना चाहिए था, जिसे बाघों के दांत गिनने चाहिए थे वह गिलहरियों के साथ खेल रहा है और उनके दांत गिन रहा है? ऐसा अनर्थ क्योंकर भला?"

देवी शकुंतला ने धैर्य के साथ कहा; "हे आर्यपुत्र, वैसे तो आप राजा हैं परन्तु आपको अपने ही राज्य के बारे में कुछ नहीं पता. तो हे आर्यपुत्र आप जानना ही चाहते हैं कि ऐसा अनर्थ क्यों हुआ तो सुनिए. जब हमारा पुत्र एक वर्ष का हुआ उसी समय आपके राज्य में बाघों की संख्या घटकर एक हज़ार चार सौ ग्यारह रह गई थी. उनमें से केवल दो बाघ इस जंगल में रहते थे. जबतक वे थे, तबतक तो पुत्र भरत उनके साथ खेलता था. उन्ही के दांत गिनता था. परन्तु जबतक वह चार वर्ष का हुआ, ये दो बाघ भी शिकारियों ने मार दिए. ऐसे में अब यह गिलहरियों के दांत नहीं गिनेगा तो क्या पक्षियों के दांत गिनेगा?"

महराज दुष्यंत अपने राज्य में हुए बाघों के इस संहार के बारे में कुछ नहीं कह सके. वे अपने सेनापति के साथ यह विमर्श करने लगे कि ऐसा क्या किया जाय कि उनके राज्य में फिर से बाघ दिखाई देने लगें.

कालिया मर्दन


कालिया मर्दन का समय आ गया था. श्रीकृष्ण कई दिनों से सोच रहे थे कि उन्हें एक दिन कालिया मर्दन करके "यदा यदा ही धर्मस्य....." को फिर से सिद्ध करना है. उन्होंने मैया यशोदा से गेंद बनवाई और एक दिन अपने सखाओं के साथ यमुना किनारे चल दिए. उन्हें पता था कि सखाओं के साथ गेंद खेलनी है और किसी बहाने उसे यमुना में डालना है जिससे उन्हें यमुना में घुसकर कालिया मर्दन का अवसर मिले. वे गेंद खेलने लगे. कुछ देर बाद उन्होंने गेंद को यमुना में फेंक डाला. सारे उपक्रम करके वे यमुना में घुस गए.

उन्होंने डुबकी तो लगाईं परन्तु इसबार उन्हें कालिया नाग कहीं दिखाई न दिया. बहुत प्रयास के बाद भी जब उन्हें वह नहीं मिला तो उन्हें यह चिंता होने लगी कि कहीं कालिया किसी और नाग का शिकार तो नहीं हो गया? उन्होंने यमुना की तलहटी से ही आवाज़ लगाईं; "कालिया... कालिया..."

उनकी पुकार की प्रतिध्वनि पाताललोक तक जाने लगी. प्रतिध्वनि श्रीकृष्ण के मित्रों तक भी पहुंची जिन्हें एकसाथ कई बार सुनाई दिया; "कालिया..कालिया...कालिया...कालिया..या.. या "

श्रीकृष्ण के मित्र भी चिंतित हो उठे. उन्हें इस बात का भय नहीं था कि कालिया श्रीकृष्ण पर आक्रमण कर देगा. उन्हें पता था कि उनका कान्हा कालिया को काबू कर लेगा और कुछ देर बाद ही उसके फन पर खड़ा हो मुरली बजाते हुए प्रकट होगा. बाद में कालिया नाग कान्हा से अपने जीवन की भीख मांगेगा और कान्हा उसे जीवनदान देकर वहाँ से विदा करेंगे. परन्तु ऐसा नहीं हुआ.

उधर कालिया नाग की खोज में श्रीकृष्ण नागलोक तक पहुँच गए. वहाँ उन्हें कालिया मिला. उसने श्रीकृष्ण को प्रणाम किया. श्रीकृष्ण ने उससे पूछा; "यह क्या कालिया? आजकल तुम यमुना में नहीं रहते? यमुना छोड़कर नागलोक में आ बसे हो? मैंने तो सोचा था कि आज मैं तुम्हारा मर्दन कर अपने उस धर्म का पालन करूँगा जिसके लिए मैंने अवतार लिया है."

श्रीकृष्ण की बात सुनकर कालिया दुखी मन से बोला; "हे कान्हा, आप तो अन्तर्यामी हैं. आप ही बताइए कि मैं एक तुच्छ नाग, यमुना में कैसे रहूं? उस यमुना में जिसमें अब जल नहीं बल्कि हरियाणा, दिल्ली और आगरा की गन्दगी भरी हुई है? हे कान्हा, आप तो यमुना में कूद गए क्योंकि आप भगवान हैं लेकिन मैं कैसे रहता जब वहाँ रहने से मुझे मेरी मृत्यु साफ़ दिखाई दे रही थी? अब तो यमुना में भरे रसायनों और विष के कारण मेरा अपना विष भी जाता रहा. जब मुझे प्रतीत हुआ कि अब वहाँ रहना मेरी मृत्यु का कारण बन सकता है तो मैंने यहाँ नागलोक में शरण ले ली."

श्रीकृष्ण की समझ में नहीं आ रहा था कि वे कालिया से क्या कहें? कुछ ही देर में मित्रों के साथ अपने घर की ओर चले जा रहे थे.

Thursday, August 9, 2012

समुद्र-मंथन री-विजिटेड




समुद्र मंथन हो रहा था. देवताओं और असुरों के बीच वासुकी की खींचा-तानी चल रही थी. मंदिराचल पर्वत समुद्र में ऊपर-नीचे हो रहा था. लाखों दर्शक देख रहे थे. न्यूज चैनल वाले रात-दिन रिपोर्टिंग करने में लगे थे. हर चैनल के संवाददाता मौजूद थे. इन संवाददाताओं को न तो दिन का चैन था और न ही रात का आराम. इधर ये घटना-स्थल से रिपोर्ट कर रहे थे तो उधर ऐंकर लोग़ अपने-अपने टीवी स्टूडियो में बैठे सयाने और बुद्धिजीवियों के साथ समुद्र-मंथन की एनालिसिस किये जा रहे थे. ज्यादातर सयाने इस बात से नाराज़ थे कि असुरों के साथ धोखा हो रहा है. कि उन्हें वासुकी के फन की तरफ वाला हिस्सा पकड़ने के लिए क्यों दिया गया?

एक-एक करके रत्न वगैरह निकाले जा रहे थे. कुछ न्यूज चैनलों ने गंभीरता के साथ सर्वे भी शुरू कर दिया था. कुछ ने जनता को इस बात के लिए ललकारना शुरू कर दिया था कि जनता एस एम एस भेजकर बताये कि आगला रत्न क्या निकलेगा? किसको मिलेगा? अंत में किसकी जीत होगी? वासुकी के फन से निकलने वाले विष से कितने असुर मरेंगे वगैरह वगैरह.

बढ़िया रत्नों को भगवान विष्णु के पास पहुंचाया जा रहा था. जब उनके पास शंख पहुंचाया गया तो उन्होंने उसे बजाकर देखा कि उसकी आवाज़ कहाँ तक पहुँच रही है. चन्द्र निकला तो उसे भगवान शिव के पास पहुँचाया गया और उन्होंने चन्द्र को अपने माथे पर रखकर पार्वती जी से पूछा कि वे देखने में कैसे लग रहे हैं? उनके माथे पर चन्द्र फब रहा है या नहीं? उधर ऐरावत पाकर इन्द्र फूले नहीं समा रहे थे.

जब हलाहल निकला तो टीवी न्यूज चैनल के संवाददाताओं ने अपनी आवाज़ की डेसिबल बढ़ाते हुए रिपोर्टिंग शुरू कर दी. सारे संवाददाता एक ही सवाल कर रहे थे कि अब हालाहल को कैसे संभाला जाय? कौन है वह जो इस हालाहल से इस विश्व की रक्षा करेगा? भगवान शिव ने जैसे ही हालाहल को लेकर अपने मुँह से लगाना चाहा एक न्यूज चैनल के कैमरामैन ने उनसे रिक्वेस्ट कर डाला कि; "हे भगवन, बस एक मिनट के लिए हालाहल से भरे पात्र को अपने मुँह के पास रोक देते तो फुटेज बढ़िया आता."

नंदी जी इस संवाददाता की बात सुन रहे थे. उन्होंने नाराज़ होकर उसे एक सींग दे मारा. संवाददाता वहीँ बेहोश हो गया. इसके बाद पूरी कवरेज का मुद्दा ही बदल गया. अब मुद्दा समुद्र-मंथन के कवरेज से निकल कर मीडिया के साथ होने वाली तथाकथित बदसलूकी पर आ गया. खैर, भगवान शिव ने हालाहल को मुँह से लगाया और पी गए. पार्वती जी ने उन्हें याद दिलाया कि वे कृपा करें और हालाहल को गले से नीचे न उतरने दें. भोले शंकर ने उन्हें अनुगृहीत किया तब वे जाकर शांत हुईं.

अबतक बाकी सबकुछ निकल चुका था. अब बारी थी अमृत के निकलने की. सभी इस बात की सम्भावना से खुश हो रहे थे कि बस थोड़ी ही देर में धनवंतरि जी हाथ में अमृत का घड़ा लिए निकलेंगे. जैसे-जैसे समय नज़दीक आता जा रहा था कि संवाददाताओं और कैमरा थामे लोग़ उत्साहित हुए जा रहे थे. एक टीवी स्टूडियो के ज्योतिषाचार्य ने यह भविष्यवाणी कर रखी थी कि कितने बजकर कितने मिनट पर आयुर्वेदाचार्य धनवंतरि अमृत कलश थामे निकलेंगे. सबकी साँसे रुकी हुई थी. क्या इस बार भी देवतागण कोई चाल चलकर अमृत हथिया सकेंगे? कहीं इस बार ऐसा तो नहीं होगा कि असुरों के राजा कोई चाल चल देंगे? क्या भगवान विष्णु इसबार भी अमृत देवताओं को दे सकेंगे? पूरा विश्व टीवी के सामने से नज़रें हटा नहीं पा रहा था.

मंथन होते-होते अचानक देवता और असुर देखते क्या हैं कि समुद्र से भगवान धनवंतारि की जगह मुकेश खन्ना निकले. उनके हाथ में डायबा-अमृत का एक पैकेट था. उन्हें देखते ही देवताओं और असुरों के चेहरे मुरझा गए. देवताओं ने मुकेश खन्ना से पूछा; "हे मनुष्य तुम कौन हो? और यहाँ क्या कर रहे हो? हमसब को तो भगवान धनवंतरि के अमृत-कलश के साथ निकलने की अपेक्षा थी परन्तु यह क्या?"

मुकेश खन्ना ने कहा; "देवताओं को मुकेश खन्ना का प्रणाम स्वीकार हो. हे देवों, अब तीनो लोक में अमृत के नाम पर डायबा-अमृत ही मिलता है. टीवी पर बिकने वाली सभी अयुर्वेदिक औषधियों की तरह यह भी दुर्लभ जड़ी-बूटियों से बना है."

उसके बाद वे देवराज इन्द्र से मुखातिब हुए और बोले; "हे देवराज, डायबा अमृत को बनानेवाले आयुर्वेदाचार्य भी भगवान धनवंतरि से ज़रा भी कम नहीं हैं. और हे देवराज, ये असुर तो इधर-उधर खुराफात करके हाथ-पाँव चलाते रहते हैं परन्तु हे देव, आप तो अपने महल से निकलते भी नहीं, केवल आराम करते रहते हैं. ऐसे में आपको..............."

मुकेश खन्ना डायबा-अमृत के गुण बताते जा रहे थे और देवता और असुर मुँह लटकाए सुने जा रहे थे.

Wednesday, July 25, 2012

श्री राम और पांडवों का वनवास - दो नव-कथाएँ




भगवान श्री राम का वनवास.

वनवास के दौरान श्री राम अनुज लक्ष्मण और सीता जी के साथ गंगा किनारे खड़े हैं. वे आज ही गंगापार करके आगे बढ़ जाना चाहते हैं. घाट पर केवट जी की नाव पानी में लंगर के सहारे खड़ी हुई है. नाव के मालिक केवट जी भी खड़े हैं. सीता जी के माथे पर चिंता की लकीरें हैं. लक्ष्मण जी कुछ नाराज़ टाइप लग रहे हैं. श्री राम ने समर्पण वाली मुद्रा इख्तियार कर ली है. कुल मिलाकर बड़ी टेंशन वाली स्थिति बन गई है.

हुआ ऐसा कि गंगा पार कर लेने की इच्छा लिए जब श्री राम, श्री लक्ष्मण और सीता जी घाट पर पहुंची तब नाव बंधी थी लेकिन केवट जी वहाँ नहीं थे. घाट तक पहुँचने से पहले तीनों ने मन ही मन कितना कुछ सोच रखा था. तीनों को इस बात का विश्वास था कि वहाँ पहुँचते ही केवट जी न केवल उनका स्वागत करेंगे बल्कि पूरे परिवार के साथ उपस्थित रहेंगे. रास्ते की थकान दूर करने के लिए वे तीनों के पाँव धोयेंगे और घर से आया बढ़िया शरबत पिलायेंगे. परन्तु घाट पर पहुँचने के बाद तीनो को उस समय बहुत आश्चर्य हुआ जब उन्होंने देखा कि नाव अकेली खड़ी है और केवट जी गायब है. पास ही कुछ बच्चे क्रिकेट खेल रहे थे. श्री राम ने उनमें से एक को यह कहकर भेजा कि वह केवट जी को उनके घर से बुला लाये.

केवट जी आये. उन्होंने श्री राम का अभिवादन किया. रामचन्द्र जी ने उन्हें बताया कि वे लक्ष्मण और सीता जी के साथ उसी समय पार जाना चाहते हैं. यह कहकर जैसे ही उन्होंने नाव की तरफ कदम बढ़ाया केवट जी ने उन्हें रोक दिया. भगवान राम को लगा कि शायद केवट जी इस बात से डर गए हैं कि नाव पर पाँव रखते ही नाव कहीं पत्थर की न हो जाए. उन्होंने केवट जी से कहा; "डरो मत भाई. कुछ नहीं होगा. मेरे छूने से यह नाव पत्थर की नहीं होगी. क्या तुम पिछली बात भूल गए जब तुमने हम तीनों को पार उतारा था? क्या पिछली बार तुम्हारी नाव पत्थर की हुई थी?"

यह सुनकर केवट जी बोले; "प्रभु यह तो हमें पता है. पिछली बार हम अवश्य डर गए थे लेकिन इस बार डरने का कोई कारण नहीं है. मेरे पुत्र ने विकिपीडिया पढ़कर हमें बता दिया है कि पिछली बार मेरे अन्दर फालतू का डर समा गया था."

भगवान राम बोले; "फिर तुम मुझे नाव पर पाँव रखने से क्यों रोक रहे हो अनुज?"

उनकी बात सुनकर केवट जी ने सिर लटका कर कहा; "प्रभु, हम आपको पार तो उतार देते लेकिन समस्या यह है कि अब हम नाव खेने का काम नहीं करते. गंगा में खड़ी यह नाव जो आप देख रहे हैं यह तो हमने इसलिए खड़ी कर रखी है ताकि कोई इसे खरीद ले. आपने शायद इसपर लगा फॉर सेल का बोर्ड नहीं देखा."

भगवान राम ने पूछा; "नाव खेने का काम नहीं करते? तो फिर तुम नाविकों की रोजी-रोटी कैसे चलती है?"

केवट जी ने भगवान राम की तरफ देखते हुए कहा; "शायद प्रभु को मनरेगा के बारे में नहीं पता. हे भगवन, जब बिना मेहनत किये हमें मजदूरी मिल जाय तो फिर कोई बेवकूफ ही होगा जो मेहनत करके नाव चलाए और लोगों को पार उतारे."

यह कहकर केवट जी चलते बने. भगवान राम ने लक्ष्मण जी से बात की और तीनों ने तय किया कि वे पैदल चलकर लॉर्ड कर्जन पुल से गंगा पार कर लेंगे ताकि शिवकुटी पहुँचा जा सके.

पांडवों का वनवास

वन में चलते-चलते पांडव थक चुके थे. थकते भी न कैसे? पेड़ों के कट जाने से वन में ऑकसीजन की कमी हो गई थी. इस वन में फैले पल्यूशन को लेकर अदालत की ग्रीनबेंच कई मुक़दमे देख रही थी. सभी भाइयों को प्यास लग चुकी थी. कहीं आस-पास पानी दिखाई नहीं दे रहा था. कारण यह भी था कि मनरेगा से तालाबों का जो ब्यूटिफिकेशन हुआ था उसकी वजह से बरसात का पानी तालाब तक पहुचने से मना कर देता था. इलाके के कुँए भी सूख चुके थे. यह बात और थी कि वन के रास्ते में भी उन्हें जग-प्रसिद्द विदेशी कोला धोखा कोला की कई होर्डिंग्स दिखाई दी थीं. पूरे राष्ट्र का यही हाल था. पीने का स्वच्छ पानी कहीं मिले या न मिले, धोखा कोला हर जगह मिलता था. गाँवों और जंगलों में भी धोखा कोला की दूकाने खुल गईं थीं. देखकर लगता था जैसे लोग़ स्नान वगैरह के लिए भी कोला का ही उपयोग करते थे.

जब उन्हें लगा कि और आगे जाना मुश्किल है, तब सारे भाई एक जगह बैठ गए. प्यास इतनी कि कुछ बोल भी नहीं पा रहे थे. मन में आया कि किसी दूकान से धोखा कोला खरीद कर ही पी लें लेकिन माताश्री का डर था कि शायद वे नाराज़ न हो जायें. बैठे-बैठे वे कुछ सोच रहे थे तभी नकुल युधिष्ठिर से बोले; "भ्राताश्री, सोचने से तो प्यास और बढ़ती जा रही है. हम जैसे-जैसे सोचते जा रहे हैं, शरीर से पसीना और भी बह रहा है. मैं जाकर किसी तालाब पर अपनी प्यास बुझाता हूँ और आपसब के लिए भी पानी ले आता हूँ."

इतना कहकर नकुल वहाँ से चल दिए. करीब एक किलोमीटर पैदल चलकर वे एक तालाब के किनारे पहुंचे. तालाब देखकर उन्हें बड़ी ख़ुशी हुई. अभी उन्होंने तालाब से पानी लेने के लिए अंजुली आगे की ही थी कि पब्लिक एड्रेस सिस्टम पर अनाउन्समेंट हुआ; "सावधान नकुल, तुम्हें इस तालाब से पानी पीने का अधिकार नहीं है."

अपने पिछले अनुभव से नकुल को पता था कि तालाब यक्ष का है सो यक्ष प्रश्न करेगा ही. वे पूरी तैयारी के साथ आये थे. यक्ष द्वारा पिछली बार किये गए प्रश्नों का उत्तर तो उन्होंने रट ही लिया था, साथ ही उपकार गाइड पढ़कर और ढेर सारे प्रश्नों का उत्तर रटकर पूरी तैयारी कर ली थी. आवाज़ सुनते ही उनका मन एक साथ सारे प्रश्न और उनके उत्तरों पर कुछ ही क्षणों में घूम-फिर कर वापस आ गया. नकुल जी भी इस बात से अस्योर्ड हुए कि मन सबसे तेज भागता है. इतना तेज कि कुछ ही क्षणों में हजारों प्रश्न और उनके उत्तरों पर घूम-फिर ले.

उन्होंने अपना हाथ तालाब के पानी के पास से खींचते हुए कहा; "प्रणाम यक्ष. मुझे पता था कि तालाब से जल लेने से पहले आप मुझसे प्रश्न करेंगे. पूछिए प्रश्न. मैं इसबार पूरी तैयारी के साथ आया हूँ."

नकुल की बात सुनकर पब्लिक एड्रेस सिस्टम से फिर आवाज़ आई; "हे युधिष्ठिर के अनुज नकुल, शायद आपको पता नहीं कि अब यह तालाब यक्ष का नहीं रहा. हमारी कंपनी धोखा कोला ने अब यह तालाब यक्ष से खरीद लिया है. कहने का तात्पर्य यह है कि अब इस तालाब के पानी का कार्पोरेटाईजेशन हो चुका है. वैसे तो इस तालाब के पानी का उपयोग अब केवल कोला बनाने के लिए होता है लेकिन फिर भी चूंकि आप थके और प्यासे हैं और साथ ही आप धर्मराज युधिष्ठिर के अनुज भी हैं, इसलिए हम आपको इसका पानी दे सकते हैं. शर्त केवल एक ही है कि आपको एक लीटर पानी के लिए पंद्रह स्वर्ण मुद्राएं देनी पड़ेंगी."

नकुल के टेंट में इस समय स्वर्ण मुद्राएं कहाँ से आती? उन्हें लगा कि अगर मुद्रा न रहने के कारण उन्हें पानी न मिला तो वे प्यासे मार जायेंगे. उन्होंने कंपनी के कर्मचारी की बात को अनसुना करके तालाब से पानी लेने के लिए हाथ बढ़ाया ही था कि पीछे से दो सिक्यूरिटी गार्ड्स ने उन्हें पकड़ लिया. दोनों ने मिलकर नकुल जी के हाथ में हथकड़ी पहना दी और उन्हें लेकर वहीँ बने धोखा कोला कंपनी के तालाब रक्षा केंद्र में चले गए.

इधर जब बहुत देर तक नकुल नहीं लौटे तब बारी-बारी से सहदेव, भीम और अर्जुन भी तालाब के किनारे गए और जबरदस्ती पानी लेने के आरोप में अरेस्ट कर लिए गए. सबसे अंत में धर्मराज युधिष्ठिर ने माताश्री को प्रणाम किया और अपने चारों भाइयों की खोज में निकले.

वे जब तालाब के किनारे पहुंचे तो उनके अन्दर उनका कांफिडेंस कुलांचें मार रहा था. आखिर प्रश्नों का उत्तर जानने के लिए उन्हें तो उपकार गाइड भी रटने की ज़रुरत नहीं थी. अपना कांफिडेंस लिए वे तालाब के किनारे पहुंचे और बोले; "यक्ष जी को पांडु नंदन युधिष्ठिर का प्रणाम पहुंचे. मैं आपके सारे प्रश्नों का उत्तर देने को तैयार हूँ परन्तु मुझे अपने मृत भाई कहीं दिखाई नहीं दे रहे. आप उन्हें हमारे सामने प्रस्तुत करें और अपने प्रश्नों के उत्तर लेकर उन्हें फिर से जीवन देने की फॉरमेलिटी पूरी करें ताकि मैं जल पी सकूँ, उन्हें भी पिला सकूँ और माताश्री के लिए भी ले जा सकूँ."

धर्मराज युधिष्ठिर की बात सुनकर एक सिक्यूरिटी गार्ड ने उन्हें सारी बातें बताई कि कैसे उनके सभी भाई अरेस्ट हो चुके हैं और यह कि बिना मुद्रा दिए उस तालाब से पानी लेना कानूनन जुर्म है. धर्मराज वहाँ से चल दिए. किसी वकील की तलाश में ताकि भाइयों की बेल करवाई जा सके.

Saturday, October 22, 2011

युग-युग में रा-वन




त्रेता युग

जामवंत जी ने हनुमान जी को याद दिलाया कि वे उड़ सकते हैं. बड़े-बुजुर्ग हमेशा से परोपकारी रहे हैं. उन्हें तो बस परोपकार करने का मौका चाहिए. वे कभी पीछे नहीं हटेंगे. दरअसल एक उम्र पर पहुंचकर उन्हें इसके अलावा कुछ और करना न तो आता है और न ही भाता है. जामवंत जी भी इसके अपवाद नहीं थे. हनुमान जी ने जामवंत जी को थैंक्स कहा और श्रीलंका की उड़ान भर ली. बैकग्राऊंड से रवींद्र जैन अपनी सुरीली आवाज़ में गाये जा रहे हैं; "राममन्त्र के पंख लगाकर हनुमत भरे उड़ान...हनुमत भरे उड़ान."

उधर हनुमान जी अपने दोनों पाँव ठीक वैसे ही ऊपर-नीचे करते उड़े जा रहे हैं जैसे पलंग पर पेट के बल लेटा डेढ़ साल का बच्चा अपने पाँव ऊपर-नीचे करता है. देखकर कोई भी बता सकता है कि वे इस समय ज्यादा ऊपर नहीं उड़ रहे हैं क्योंकि मौसम सुहाना है. बादल ऊंचाई पर हैं. रास्ता साफ़ है. दूर-दूर तक सबकुछ दिखाई दे रहा है. लिहाज़ा सामने से आते किसी राक्षस या वायुयान से टकराने की सम्भावना नगण्य है. सूर्य भगवान का पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम स्ट्रॉंग है इसलिए वे अपनी रोशनी पूरे संसार को बांटे जा रहे हैं. हिंद महासागर नीचे अविरल बहता जा रहा है.

हनुमान जी एकाग्र-चित्त उड़े जा रहे है. ठीक वैसे ही जैसे राहुल द्रविड़ पिच पर एकाग्र-चित्त होकर ऑफ स्टंप से बाहर जानेवाली गेंदों को बिना किसी छेड़-छाड़ के छोड़ दिया करते हैं. देखकर ही लग रहा है कि उन्हें उड़ने में बहुत मज़ा आ रहा है. वे किसी बच्चे की सी मुखमुद्रा लिए आनंदित दिखाई दे रहे हैं. अचानक देखते क्या हैं कि समुद्र में से सामने एक विशालकाय महिला उभरी. उसने बड़ा वीभत्स मेक-अप किया है. बड़े-बड़े बाल, माथे पर बहुत बड़ी बिंदी, मुँह के दोनों कोनों पर बड़े-बड़े तिरछे दांत और बड़ी गाढ़ी होठ-लाली से लैस यह महिला हनुमान जी के रास्ते में मुँह बाए खड़ी हो गई. उसे देख हनुमान जी ने खुद को उसके मुँह के आगे हवा में ही पार्क कर लिया. वह महिला जोर-जोर से हा हा हा करके हँसी. उसकी हँसी उसके मेक-अप से मेल खा रही है.

हनुमान जी ने उसे प्रश्नवाचक मुद्रा में देखा. उस महिला को लगा कि अब समय आ गया है कि वह अपना परिचय दे. उसने कहा; "मैं सुरसा हूँ. हा हा हा हा हा."

उसकी हँसी सुनकर कोई भी कह सकता है कि शायद उसे सुरसा होने पर बड़ा गर्व है. वैसे यह भी कह सकता है कि जैसे हनुमान जी उड़ना एन्जॉय करते हैं वैसे ही सुरसा हँसना एन्जॉय करती है. उसकी हँसी सुनकर हनुमान जी ने कहा; "वह तो ठीक है लेकिन आप इतना हँस क्यों रही हैं?"

सुरसा बोली; "हँसी ही मेरी पहचान है. मैं जब तक नहीं हँसती लोग़ मुझे राक्षसी समझते ही नहीं. अब तुम्ही सोचो कि अगर मैं हँसना बंद कर दूँ तो कौन मुझे सीरियसली लेगा?"

उसकी बात शायद हनुमान जी की समझ में आ गई इसीलिए उन्होंने उसकी हँसी की बाबत और कोई सवाल नहीं किया. आगे बोले; "लेकिन मुझसे क्या चाहती हो?"

वो बोली; "आज देवताओं ने तुम्हें मेरा आहार बनाकर भेजा है. आशा है मेरी बात तुम्हारी समझ में आ गई होगी. नहीं आई हो तो फिर मैं काव्य में सुनाऊं कि; आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा..."

उसकी बात सुनकर हनुमान जी डर गए. उन्होंने सोचा जल्दी से हाँ कर दें नहीं तो कहीं ऐसा न हो कि यह अपनी बात काव्य में सुनाना शुरू करे तो साथ में आगे-पीछे की दस-पंद्रह चौपाई और सुना दे. आखिर उन्हें भी पता है कि कविता सुनाने वाला अगर सुनाने के मोड में आ जाए तो फिर सामनेवाले के ऊपर विपत्ति का पहाड़ टूट पड़ता है.

वे झट से बोले; "नहीं-नहीं मैं समझ गया. लेकिन हे माता अभी तो मैं भगवान श्री राम के कार्य हेतु श्रीलंका जा रहा हूँ. इसलिए आप मुझे छोड़ दें. मुझे बहुत बड़ा कार्य करना है. माता सीता की खोज करनी है. हे माता आप समझ गईं या काव्य में बताऊँ कि; "राम काजु करि फिरि मैं आवौं...."

हनुमान जी की बात सुनकर अब डरने की बारी सुरसा जी की थी. वे बोलीं; "समझ गई मैं. तुम्हारी बात पूरी तरह से मेरी समझ में आ गई."

अभी वे बात कर ही रहे थे कि आस-पास बकरी की सी आवाज़ सुनाई दी. हनुमान जी और सुरसा दोनों को बड़ा आश्चर्य हुआ कि समुद्र के ऊपर इस समय बकरी कहाँ से आ सकती है? वे इस आवाज़ के बारे में अभी सोच ही रहे थे कि उन्होंने देखा कि उनके सामने सूट-बूट पहने, छोटी सी चोटी बांधे एक मनुष्य खड़ा हुआ है.

उसने हनुमान जी को प्रणाम किया और बोला; "हे बजरंगबली, आप तो श्रीलंका जा रहे हैं. मैं यह बताने आया था कि मेरी फिल्म रा-वन कोलम्बो के सैवोय थियेटर में रिलीज होनेवाली है. आप से रिक्वेस्ट है कि आप वह फिल्म ज़रूर देखें."

इस मनुष्य को देखकर शायद हनुमान जी पहचान गए. बोले; "अरे तुम तो वही हो न जो परसों किष्किन्धा के आस-पास के इलाके में अपनी फिल्म का प्रचार करने वाये थे? महाराज सुग्रीव की सेना के कई बानर उसदिन अपना कर्त्तव्य भुलाकर तुम्हारा नाच-गाना देखने चले गए थे?"

उनकी बात सुनकर वह मनुष्य बोला; "हाँ, भगवन मैं वही हूँ. दरअसल मैं अपनी मूवी का प्रचार करने आपके इलाके में गया था. मेरा आपसे अनुरोध है कि आप मेरी मूवी ज़रूर देखें."

इस बार हनुमान जी बिदक गए. बोले; "तुमने पिछले वर्षा ऋतु से ही परेशान करके रख दिया है. जहाँ दृष्टि जाती है बस तुम्ही दिखाई देते हो. चित्रकूट हो या किष्किन्धा, अयोध्या हो या जनकपुर सब जगह तुम्ही दिखाई दे रहे हो. पागल कर दिया है तुमने सबको."

"लेकिन प्रभु, मेरी बात तो सुनिए. इस मूवी में रजनीकांत भी हैं. मैंने विदेशी गायक से इसमें गाना गवाया है. आप ज़रूर देखिएगा यह मूवी. आपको अच्छा लगेगा"; वह मनुष्य गिडगिडाने लगा.

उसकी बातें हनुमान जी को विरक्त कर रही थीं. बहुत नाराज़ होते हुए बोले; "हे माता, इस मनुष्य ने पूरी पृथ्वी पर हाहाकार मचा कर रखा है. मैं इसकी मूवी देखूँ उससे अच्छा तो यह होगा कि आप मुझे अपना आहार बना लें. माता सीता की खोज अंगद कर लेंगे."

कट टू द्वापर युग.

महाभारत की लड़ाई चल रही है.

महाराज धृतराष्ट्र के सारथी संजय उन्हें युद्ध के मैदान से आँखों देखा हाल बता रहे हैं. अचानक देखते क्या हैं कि उनकी स्क्रीन पर महाभारत की लड़ाई दिखनी बंद हो गई. सामने सूट-बूट में लैस एक मनुष्य नृत्य करते हुए गाने लागा; छम्मक छल्लो...चम्मक छल्लो..."

संजय की समझ में नहीं आ रहा कि यह कौन है? अभी वे कुछ सोच पाते कि आवाज़ आई; "महाराज धृतराष्ट्र की जय हो. महराज आज दिन भर युद्ध की रनिंग कमेंट्री सुनकर जब आप थक जायें तो आज रात्रिकालीन शो में मेरी मूवी रा-वन देखना न भूलें. बहुत बढ़िया मूवी है. बहुत पैसा खर्च करके मैंने यह मूवी बनाई है. आप आनंद से सरा-बोर हो जायेंगे."

उसकी आवाज़ सुनकर धृतराष्ट्र को लगा कि यह कौन है जो उनका मज़ाक उड़ा रहा है. आखिर जो व्यक्ति अँधा हो वह मूवी कैसे देखेगा? वे नाराज़ होते हुए बोले; "संजय यह कौन धृष्ट है जो मेरी हँसी उड़ा रहा है?"

संजय बोले; "महाराज यह एक चलचित्र अभिनेता है जो अपनी मूवी का विज्ञापन करते नहीं थक रहा. इसने पूरी पृथ्वी पर सबको परेशान करके रख दिया है. यह चाहता है कि आप इसकी मूवी देखें."

महाराज धृतराष्ट्र को बहुत गुस्सा आया. बोले; "क्या इसे यह नहीं मालूम कि मैं देख नहीं सकता?"

संजय अभी कुछ बोलते कि वह अभिनेता बोला; "महाराज आप केवल बैठे रहिये. संजय जी पूरी मूवी का वर्णन आपके सामने रखते जायेंगे. आप उसे फील करते रहिएगा. और हाँ, छम्मक छल्लो को अच्छी तरह से फील करियेगा. अब मैं जा रहा हूँ. मुझे पांडवों के शिविर में भी अपनी मूवी का विज्ञापन करना है."

इतना कहकर संजय की स्क्रीन से वह गायब हो गया. महाराज रात्रिकालीन शो का इंतजार करने लगे.

Friday, February 4, 2011

बीरबल का ईनाम




बीरबल आज फिर से बहुत प्रसन्न थे. वैसे प्रसन्न रहना उनके लिए कोई नई बात नहीं थी. उन्हें जो भी देखता, यही सोचता कि ये इंसान प्रसन्न रहने के लिए ही इस धरा पर आया है. एक बार फिर से उन्होंने अपनी बुद्धि का लोहा मनवा लिया था. बादशाह के साथ सारे दरबारी खुश नज़र आ रहे थे.

बीरबल बाबू से जलने वाले दरबारी खुश दीखने की एक्टिंग कर रहे थे. उनसे जलने वाले दरबारियों के पास और कोई चारा नहीं था. इनलोगों ने मन ही मन सोच लिया था कि जलने-भुनने का काम 'ऐज यूजुवल' दरबार से बाहर निकलने के बाद कर लेंगे. बीरबल बाबू जितनी बार अपनी तीक्ष्ण बुद्धि का प्रदर्शन करते, उनसे जलने वाले दरबारियों का खून कम हो जाता.

वैसे आज इन दरबारियों का खून कुछ ज्यादा ही जलने वाला था.उसका कारण यह था कि बादशाह जी ने बीरबल को ईनाम में दो सौ किलो चावल और पचास किलो मसूर की दाल और एक क्विंटल प्याज दिया था. इतना कीमती ईनाम पाकर बीरबल की प्रसन्नता दूनी हो गई थी.

उनसे जलने वाले दरबारी ये सोचते हुए दुखी थे कि 'एक बीरबल है जिसे आज ईनाम में चावल, दाल और प्याज मिली और एक हम हैं, जिन्हें मुद्राओं से संतोष करना पड़ता है. पता नहीं हमारे दिन ऐसे कब आयेंगे जब हमें भी ईनाम में यह सबकुछ मिलेगा.

ऐसा पहली बार हुआ था कि बीरबल को ईनाम में चावल, दाल और प्याज की प्राप्ति हुई थी. कारण ये था कि बादशाह अकबर आज कुछ ज्यादा ही खुश हो लिए थे. बादशाहों को खुश होने के अलवा और काम ही क्या था? उनके पास दो ही तो काम थे. या तो बैठे-बैठे बोर हो लें या फिर खुश हो लें. कई बार बोरियत से बचने की कोशिश करते तो खुशी अपने आप डेरा दाल देती.

कई लोगों का तो ये भी मानना था कि 'बादशाह दरबार में हंसने का उपक्रम ख़ुद ही करते हैं.'

आज बीरबल बाबू की बुद्धि का लोहा मानते हुए उन्होंने बीरबल से कहा;"बीरबल, आज हम तुम्हारी बुद्धि पर ज़रूरत से ज्यादा खुश हैं. यही कारण है कि आज हम तुम्हें कोई कीमती चीज देना चाहता हैं. वैसे भी तुम्हें ईनाम में मुद्राएं देते-देते हम बोर हो चुके हैं."

बादशाह जी की बात सुनकर बीरबल धन्य हो गए. बोले; "ये तो आलमपनाह की नाचीज पर दया है, वरना कीमती चीज पाने की हमारी क्या औकात?"

बादशाह को जोश दिलाने और अपने लिए ईनाम की राशि दूनी करवाने का इससे अच्छा साधन और क्या हो सकता है कि दरबारी अपनी औकात को पाताल तक पहुँचा दे? वैसे भी, कितना भी बुद्धिमान दरबारी हो, अगर बादशाह के सामने अपनी औकात को जीरो न बताये तो उसको दरबारत्व का ज्ञान लेने वापस पाठशाला चले जाना चाहिए.

बीरबल का तीर सही निशाने पर लगा. उनकी औकात वाली बात पर बादशाह अकबर का जोश कुलांचे मारने लगा. वे बोले; "नहीं-नहीं, ऐसा मत कहो बीरबल. तुम सचमुच कीमती चीज डिजर्व करते हो. बस, ये बताओ कि तुम्हें क्या चाहिए?"

बादशाह की बात सुनकर बीरबल बोले; "जहाँपनाह, जैसे आप मुद्राएं देकर बोर हो लिए हैं, उसी तरह मैं लेकर बोर हो गया हूँ. आप जो मुद्राएं ईनाम में देते हैं, उसे लेकर जब घर पहुँचता हूँ तो और पत्नी को बताता हूँ कि आज ईनाम में मुद्राएं मिलीं, तो पत्नी ताने मारती है. कहती है मुझ जैसे निकम्मे को इनाम में और क्या मिलेगा?"

"तो क्या तुम्हारी पत्नी खुश नहीं होती?"; बादशाह ने बीरबल से पूछा.

बादशाह की बात सुनकर बीरबल ने कहा; "कैसे खुश होगी, आलमपनाह? मुद्रा पाकर आज के ज़माने में कौन गृहणी खुश रहेगी?"

ये कहते हुए बीरबल मन ही मन मुस्कुरा रहे थे. सोच रहे थे 'मुद्रा की जगह स्वर्ण आभूषण रहता तो ये ताने मारने का कार्यक्रम होता ही नहीं.'

बीरबल की बात सुनकर बादशाह जी को बड़ा आश्चर्य हुआ. कोई मुद्राएं पाकर खुश न हो, ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था. वे बोले; "तो क्या तुम्हारी पत्नी की निगाह में मुद्राओं की कोई कीमत नहीं है?"

बादशाह की बात सुनकर बीरबल बाबू को समझ नहीं आया कि वे क्या कहें? लेकिन बहुत साहस बटोर कर बोले; "आपके राज की मुद्रा की घटती कीमत का अंदाजा आपको नहीं है आलमपनाह. वैसे आपके के राज में चलने वाली मुद्रा की कीमत कितनी गिरी है, इसका अंदाजा आपको कैसे लगेगा?"

"क्या मतलब है तुम्हारा?"; बादशाह ने अचम्भे से पूछा.

"आपको शायद मालूम नहीं जहाँपनाह कि आपके राज में चलने वाली मुद्रा से खरीदारी करने पर आजकल झोले में कुछ नहीं आता. वैसे भी आपको इस बात की जानकारी कौन देगा? आपके पास जितना समय है, वो तो हँसने या फिर हँसने की कोशिश करने में चला जाता है. ऊपर से या तो आप महल से निकलते ही नहीं, या फिर निकलते हैं तो कूटनीति की प्रैक्टिस करने परदेस चले जाते हैं"; बीरबल बाबू ने बादशाह के करीबी होने का फायदा उठाते हुए सच कह डाला.

बीरबल बाबू की बात सुनकर बादशाह जी कुछ सोचने लगे. सोचते हुए बोले; "तो कोई बात नहीं. मैं तुम्हें ईनाम में एक कार दे देता हूँ."

बादशाह की बात सुनकर बीरबल ने मन ही मन अपना माथा ठोक लिया. बोले; "कार तो दे देंगे जहाँपनाह, लेकिन पेट्रोल की कीमत का जो हाल है, मैं कार लेकर करूंगा क्या? देना ही है तो कोई सच में कीमती चीज दीजिये."

"तो तुम्ही बताओ, तुम्हें क्या चाहिए?"; बादशाह ने बीरबल से पूछा.

"आप देना ही चाहते हैं तो मुझे चावल और दाल दे दें. और अगर उसके साथ में प्याज मिल जाती तो मेरा यह जनम सफल हो जाता. आजकल यही सबसे कीमती चीज है"; बीरबल ने कीमती सामान का नाम बता दिया.

बादशाह ने मंत्री को आदेश दिया कि बीरबल को ईनाम में चावल, दाल और प्याज दे दिया जाय. बीरबल बाबू को जब यह सबकुछ मिल गया तो बादशाह ने पूछा; "बीरबल तुमने चावल, और प्याज क्यों माँगा?"

बीरबल बोले; "आलमपनाह, जिस तरह से आपके राज्य में कृषि की जमीन लगातार कम होती जा रही है, मेरी बुद्धि कहती है कि आनेवाले दिनों में चावल, दाल और गेंहूं ही सबसे कीमती रहेंगे. वैसे भी किसान आत्महत्या करते जा रहे हैं. जमीन की कमी के साथ-साथ किसानों की कमी हो जायेगी तो खेती-बाड़ी का काम क्या आपके नौ रत्न करेंगे? इसीलिए मैं अभी से खाने-पीने की चीजें इकठ्ठा करने में लगा हूँ."

बादशाह जी बीरबल की बुद्धि पर एक बार फ़िर से फ़िदा हो गए. खुश होते हुए बोले; "मैं एक बार फिर तुम्हारी बुद्धि पर फ़िदा हो गया हूँ. बोलो, तुम्हें और क्या चाहिए?"

बादशाह को अधिकार है कि वह जब चाहे, जिस चीज पर चाहे फ़िदा हो सकता है.

उनकी बात सुनकर बीरबल बोले; " आपसे एक वचन चाहिए. जो दरबारी मुझसे जलते हैं, आज से आप उन्हें ईनाम में मिड-कैप कंपनियों के शेयर दिया करेंगे."

बादशाह जी ने बीरबल को वचन दे दिया. ईनाम लिए बीरबल घर की तरफ़ रवाना हो गए.

Tuesday, March 9, 2010

और रत्नाकर का ह्रदय परिवर्तन हो गया.




कई दिनों से रत्नाकर बहुत टेंशनग्रस्त थे. एक साल से ज्यादा का समय बीत गया था लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद अभी तक उनके ह्रदय परिवर्तन का काम पेंडिंग था. ह्रदय परिवर्तन की आस में वे अब तक कुल बहत्तर डकैती, चालीस मर्डर और अस्सी राहजनी की वारदात परफार्म कर चुके थे परन्तु इतना सबकुछ करने के बावजूद अभी तक वह घडी नहीं आई थी जब उन्हें लगता कि ह्रदय परिवर्तन के दिन सामने ही हैं.

कलियुग में जन्म लेकर उन्होंने अपने त्रेता युग वाले अवतार के बारे में खूब सुन रखा था. तमाम कथाओं में वर्णित त्रेता युग में हुए अपने ह्रदय परिवर्तन की घटना से वे वाकिफ थे. अब इसे विधि का विधान कहें या संयोग की कमी जिसकी वजह से कलियुग में अब तक उनका ह्रदय परिवर्तन नहीं हुआ था. शायद इसकी वजह से वे अपने ऊपर बहुत प्रेशर फील कर रहे थे. इस प्रेशर का ही असर था कि उन्होंने राहजनी वगैरह की घटनाओं में पिछले पंद्रह दिनों में करीब बीस परसेंट की बढ़ोतरी कर ली थी.

अभी पिछले हफ्ते की ही बात है. रात नौ बजे अपने आफिस से लौट रहे एक सॉफ्टवेयर इंजिनियर को अकेला पाकर रत्नाकर ने उसकी पीठ पर चाकू टिका दिया. बोले; "जो कुछ भी हो, मेरे हवाले कर दो. अगर नहीं दिया तो चाकू घुसा दूंगा."

सॉफ्टवेयर इंजिनियर बहुत सॉफ्ट निकला. बड़े आराम से उसने अपना पर्स, घड़ी, और सिगरेट का पैकेट रत्नाकर जी के हवाले करते हुए बोला; "जो कुछ है, बस यही है. ले लो. मैं कल अपने लिए नया पर्स और नई घड़ी ले लूंगा. सिगरेट न रहने की वजह से रात में परेशानी तो होगी लेकिन काम चला लूंगा."

सॉफ्टवेयर इंजिनियर के चले जाने के बाद रत्नाकर ने अपना माथा ठोक लिया. कहाँ वे सोच रहे थे कि शायद आज वह घड़ी आ गई है जब ये आदमी उन्हें धिक्कारेगा. पूछेगा कि; "यह पाप जो तुम कर रहे हो, उसके लिए केवल तुम्हीं जिम्मेदार रहोगे या तुम्हारे घर वाले भी? तुम पाप अकेले भोगोगे या साथ में तुम्हारे घर वाले भी इस पाप के भागीदार होंगे?"

लेकिन जब ऐसा कुछ नहीं हुआ तो मुंह लटकाए घर चले गए. एक बार मन में आया कि अपना दुःख अपनी अम्मा से कह दें. उन्हें बता दें कि; "अम्मा आज भी बड़ी आशा थी कि जिसे लूटूँगा वह मुझे धिक्कारेगा लेकिन आज भी ऐसा नहीं हुआ."

उनके मन में आया कि अगर वे ऐसा कह देंगे तो अम्मा उन्हें कलेजे से लगा कर कहेगी; "मेरे बेटे, मेरे लाल, तू चिंता मत कर. केवल अपना कर्म करता जा, कोई न कोई एक दिन ज़रूर मिलेगा जो तुझे धिक्कारेगा और उस दिन तेरा ह्रदय परिवर्तन होकर रहेगा."

यही सोचते-सोचते उन्हें नींद आ गई. सुबह जब सोकर उठे तो एक बार फिर नए दिन की शुरुआत के साथ नया संकल्प लिया. संकल्प लिया कि; आज फिर से रात में किसी को लूट लेना है. शायद आज कोई मिल जाए जो मुझे धिक्कारेगा. उसकी धिक्कार सुनकर मैं अम्मा के पास जाऊंगा. अम्मा मेरी बात सुनकर पाप का भागीदार होने से मना कर देगी. उसके ऐसा करने से मेरा ह्रदय परिवर्तन होने का चांस रहेगा.

दिन भर रत्नाकर बाबू रात में राहजनी करने के बारे में सोचते रहे.

शाम को चाकू-छुरे से लैस घर से निकल गए. चलते-चलते सोचा आज बाज़ार की तरफ जाने वाले रास्ते पर किसी को लूट लेना है. करीब साढ़े नौ बजे सामने झाड़ियों की ओट से उन्होंने देखा कि कोई मोटा आदमी चला आ रहा है. जैसे ही वह आदमी झाड़ियों के पास आया, रत्नाकर झाड़ी के पीछे से कूद कर निकले और छुरा उस आदमी के पीठ पर टिकाते हुए अपना डायलाग दे मारा. बोले; "जो कुछ भी हो, मेरे हवाले कर दो. अगर नहीं दिया तो चाकू घुसा दूंगा."

उनका इतना कहना था कि वह आदमी बोला; "अरे रत्नाकर तुम हो?"

आवाज़ सुनकर उन्हें पता चल चुका था कि ये तो सेठ जीवन लाल हैं. नगर के प्रसिद्द सोना-चाँदी व्यापारी.

रत्नाकर से सेठ जीवन लाल की पुरानी जान-पहचान थी. असल में सेठ जी के यहाँ ही रत्नाकर बाबू लूटा हुआ माल वगैरह बेंचा करते थे. सेठ जी आधे दाम में गहने वगैरह खरीद लिया करते थे. जिन चीजों में वे डील नहीं करते थे, उसे भी सेवेंटी परसेंट डिस्काउंट में खरीद लेते थे.

रत्नाकर को जैसे ही लगा कि सेठ जी ने उसे पहचान लिया, बेचारा दुखी हो गया. सोचने लगा कि ये सेठ तो खुद मुझसे चोरी का माल खरीदता है. ये मुझे क्या धिक्कारेगा? अभी वह सोच ही रहा था कि सेठ जी बोले; "हा हा हा अरे भैया मुझे ही मार दोगे तो डकैती का माल कहाँ बेचोगे?"

इतना कहकर सेठ जी वहां से चल दिए.

हताश रत्नाकर दोनों हाथों से सिर पकड़कर वहीँ बैठ गया. एक बार के लिए उसे लगा कि कलियुग में शायद उसका ह्रदय परिवर्तन नहीं होनेवाला. इतनी कोशिश कर ली लेकिन एक भी आदमी ऐसा नहीं मिला जो उसे धिक्कारे. जो उससे पूछे कि जो पाप वो कर रहा है उसका भागीदार उसके परिवार वाले भी होंगे या नहीं? सोचते-सोचते अचानक वह उठ खड़ा हुआ. उसने निश्चय किया कि वो एक बार फिर से ट्राई करेगा. आखिर कोई न कोई तो मिलेगा ही जो उसे धिक्कारेगा.

कहते हैं दृढ़ निश्चय से दुविधा की बेड़ियाँ कट जाती हैं. जिसने भी यह कहा है, उसे शायद मालूम नहीं कि कभी-कभी दृढ़ निश्चय से हताशा की बेड़ियाँ भी कटती हैं. रत्नाकर खड़ा हुआ और फिर से किसी पथिक का इंतज़ार करने लगा. करीब साढ़े दस बजे उसे अँधेरे में एक पथिक आता हुआ दिखाई दिया. बड़ी आशा से भरे रत्नाकर ने पास आते ही उसपर छुरा तान दिया. छुरा लगाकर जैसे ही वह अपना डायलाग बोलने वाला था, उसे पता चला कि ये तो मास्टर मोतीराम थे.

उसे पक्का विश्वास हो गया कि ये मास्टर जरूर उसे धिक्कारेगा. अपनी सोच पर विश्वास किये और आस लगाये वह कुछ कहने ही वाला था कि मास्टर मोतीराम बोल पड़े; "जो तुम कर रहे हो, वह पाप है. एक बात बताओ, ये जो तुम करते हो, इससे घर वालों का भी खर्चा चलाते हो क्या? और अगर ऐसा है तो फिर पाप की सजा केवल तुम्हें मिलेगी या घर वाले भी इस पाप के भागीदार होंगे?"

मास्टर जी की बात सुनकर रत्नाकर की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा. मास्टर मोतीराम को छोड़कर वो दौड़ता हुआ सीधा अपने घर पहुंचा. घर के बाहर से ही अपनी अम्मा को आवाज़ देता घर में घुसा.

उसकी आवाज़ सुनकर जैसे ही अम्मा जी उसके पास आईं उसने सवाल दाग दिया. बोला; "अम्मा एक बात बताओ. ये लूट-पाट करके मैं जो घर में ले आता हूँ और उसकी वजह से जो पाप मेरे ऊपर चढ़ता है, उसके भागीदार तुमलोग भी होवोगे या सारा का सारा पाप मैं खुद ही झेलूँगा?"

उसकी बात सुनकर अम्मा बोलीं; "कैसी बात करता है पगले? आफकोर्स इस लूट-पाट से उपजे पाप के भागीदार हमलोग भी होंगे. जब सजा मिलेगी तो हम भी तुम्हारे साथ जेल जायेंगे. अरे बेटा, तू ये क्यों सोचता है कि हम तुम्हारा साथ नहीं देंगे? तैरेंगे तो एक साथ और डूबेंगे तो एक साथ. तुझे पता नहीं लेकिन यही माडर्न सिद्धांत है."

अम्मा जी की बात सुनकर रत्नाकर के होश उड़ गए.

सोचने लगा कि बाहर वालों की वजह से ह्रदय परिवर्तन का काम ठप पड़ा था लेकिन अब घर वालों की वजह से भी नहीं हो सकेगा? आज इतने महीनों की तपस्या के बाद किसी ने धिक्कारा भी तो भी कुछ नहीं हुआ. ये अम्मा जी ने सबकुछ चौपट कर दिया.

उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि अब क्या करे? उसे ह्रदय परिवर्तन की कोई सूरत नज़र नहीं आ रही थी. इतना दुखी हो गया कि रात का भोजन भी नहीं किया. बिस्तर पर लेट तो गया लेकिन आँखों में नींद का नाम-ओ-निशान न था.

सुबह मुंह लटका कर उठा. हाथ-मुंह धोकर चाय पीते-पीते अखबार देखने लगा. अचानक उसकी नज़र एक पुलिस अफसर से सम्बंधित खबर पर पड़ी. दरअसल पुलिस अफसर के ऊपर आरोप था कि उसने एक स्कूली छात्रा के साथ छेड़-छाड़ की जिसकी वजह से उस छात्रा ने आत्महत्या कर ली. कई वर्षों बाद कुछ लोगों के प्रयास की वजह से मामला वापस कोर्ट में खुला था. लेकिन आज जो खबर छपी थी उसके हिसाब से पुलिस अफसर ने खुद ही कोर्ट से दरखास्त की थी कि उसका नार्को टेस्ट किया जाय.

रत्नाकर इस खबर को पढ़कर हतप्रभ था. उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि जहाँ लोग नार्को टेस्ट होने नहीं देना चाहते वहां यह पुलिस अफसर खुद ही नार्को टेस्ट के लिए अर्जी दे रहा है. इस खबर ने रत्नाकर को संबल दिया. उसे लगा कि अगर इस पुलिस अफसर का ह्रदय परिवर्तन हो सकता है तो एक न एक दिन ज़रूर ऐसा कुछ होगा जिससे रत्नाकर को अपने ह्रदय परिवर्तन का चांस मिलेगा.

यही सोचते हुए उसने फिर संकल्प लिया कि आज रात फिर वो किसी को लूट लेगा.

रात को फिर से छुरे से लैस घर से निकला. एक जगह उसे कोई आता दिखाई दिया. जैसे ही वो आदमी पास पहुंचा रत्नाकर ने अपना छुरा उस आदमी की कमर पर रख दिया. जैसे ही उस आदमी को एहसास हुआ कि किसी ने उसे चाकू की नोंक पर ले लिया है वैसे ही वो बोल पड़ा; " इतना हट्टा-कट्टा होकर राहजनी करता है? हाँ? अरे देश के लिए कुछ करो. दलितों के लिए कुछ करो. गरीब के लिए कुछ करो. देखता नै है कैसे हमारा आदवासी भाई सब, अल्पसंख्यक भाई सब पिछड़ा रह गया. उनके लिए तुम जैसा हट्टा-कट्टा कुछ नै करेगा त कौन करेगा? तुम्हरा देश के परति कुछ कर्त्तव्य है कि नहीं? आ सुनो, ये काम सब छोड़ो और देश सेवा करो."

रत्नाकर को लगा जैसे उस आदमी की बातें सीधा उसके दिल में घुस गईं. उसके दिल में कुछ-कुछ होने लगा. उसे लगने लगा कि उसके ह्रदय परिवर्तन का समय आ गया है.

अचानक रत्नाकर उस आदमी के चरणों पर गिर गया. बोला; "मुझे विश्वास था एक दिन मेरा ह्रदय परिवर्तन ज़रूर होगा. आपने मुझे दर्शन देकर वैसे ही तार दिया जैसे श्राप-ग्रस्त पत्थर बनी अहिल्या को छूकर श्रीराम ने तार दिया था. हे दयानिधान, आप मुझे रास्ता दिखायें. मुझे अपनी शरण में लें और बताएं कि मुझे क्या करना है? मैं आपके साथ मिलकर इस देश की सेवा करना चाहता हूँ.अपने आदिवासी, दलित और पिछड़े वर्ग के भाइयों की सेवा....आपके मार्गदर्शन में मैं समाज के दबे-कुचले वर्ग की...."

रात के सन्नाटे में रत्नाकर देश-सेवक के साथ उसके घर की तरफ चला जा रहा था. उसका ह्रदय परिवर्तन हो चुका था.

Tuesday, November 4, 2008

खेती-बाड़ी का काम कौन करेगा? आपके रत्न?




बीरबल आज फिर से बहुत प्रसन्न थे. वैसे प्रसन्न रहना उनके लिए कोई नई बात नहीं थी. उन्हें जो भी देखता, यही सोचता कि ये इंसान प्रसन्न रहने के लिए ही इस धरा पर आया है. एक बार फिर से उन्होंने अपनी बुद्धि का लोहा मनवा लिया था. बादशाह के साथ सारे दरबारी खुश नज़र आ रहे थे.

बीरबल बाबू से जलने वाले दरबारी खुश दीखने की एक्टिंग कर रहे थे. उनसे जलने वाले दरबारियों के पास और कोई चारा नहीं था. इनलोगों ने मन ही मन सोच लिया था कि जलने-भुनने का काम 'ऐज यूजुवल' दरबार से बाहर निकलने के बाद कर लेंगे. बीरबल बाबू जितनी बार अपनी तीक्ष्ण बुद्धि का प्रदर्शन करते, उनसे जलने वाले दरबारियों का खून कम हो जाता.

वैसे आज इन दरबारियों का खून कुछ ज्यादा ही जलने वाला था. उसका कारण यह था कि बादशाह जी ने बीरबल को इनाम में दो सौ किलो चावल और पचास किलो मसूर की दाल दे दी थी. इतना कीमती इनाम पाकर बीरबल की प्रसन्नता दूनी हो गई थी.

उनसे जलने वाले दरबारी ये सोचते हुए दुखी थे कि 'एक बीरबल है जिसे आज इनाम में चावल और दाल मिला और एक हम हैं, जिन्हें स्वर्णमुद्राओं से संतोष करना पड़ता है. पता नहीं हमारे दिन ऐसे कब आयेंगे जब हमें भी इनाम में चावल मिलेगा.

ऐसा पहली बार हुआ था कि बीरबल को इनाम में चावल और दाल की प्राप्ति हुई थी. कारण ये था कि बादशाह अकबर आज कुछ ज्यादा ही खुश हो लिए थे. बादशाहों को खुश होने के अलवा और काम ही क्या था? उनके पास दो ही तो काम थे. या तो बैठे-बैठे बोर हो लें या फिर खुश हो लें. कई बार बोरियत से बचने की कोशिश करते तो खुशी अपने आप डेरा दाल देती.

कई लोगों का तो ये भी मानना था कि 'बादशाह दरबार में हंसने का उपक्रम ख़ुद ही करते हैं.'

आज बीरबल बाबू की बुद्धि का लोहा मानते हुए उन्होंने बीरबल से कहा;"बीरबल, आज हम तुम्हारी बुद्धि पर ज़रूरत से ज्यादा खुश हैं. यही कारण है कि आज हम तुम्हें कोई कीमती चीज देना चाहता हैं. वैसे भी तुम्हें इनाम में स्वर्ण मुद्राएं देते-देते हम बोर हो चुके हैं."

बादशाह जी की बात सुनकर बीरबल धन्य हो गए. बोले; "ये तो आलमपनाह की नाचीज पर दया है, वर्ना कीमती चीज पाने की हमारी क्या औकात?"

बादशाह को जोश दिलाने और अपने लिए इनाम की राशि दूनी करवाने का इससे अच्छा साधन और क्या हो सकता है कि दरबारी अपनी औकात को पाताल तक पहुँचा दे. वैसे भी, कितना भी बुद्धिमान दरबारी हो, अगर बादशाह के सामने अपनी औकात को जीरो न बताये तो उसको दरबारत्व का ज्ञान लेने वापस पाठशाला चले जाना चाहिए.

बीरबल का तीर सही निशाने पर लगा. उनकी औकात वाली बात पर बादशाह अकबर का जोश कुलांचे मारने लगा. वे बोले; "नहीं-नहीं, ऐसा मत कहो बीरबल. तुम सचमुच कीमती चीज डिजर्व करते हो. बस, ये बताओ कि तुम्हें क्या चाहिए?"

बादशाह की बात सुनकर बीरबल बोले; "जहाँपनाह, जैसे आप स्वर्णमुद्राएं देकर बोर हो लिए हैं, उसी तरह मैं लेकर बोर हो गया हूँ. आप जो स्वर्णमुद्राएं इनाम में देते हैं, उसे लेकर जब घर पहुँचता हूँ तो और पत्नी को बताता हूँ कि आज इनाम में स्वर्णमुद्राएं मिलीं, तो पत्नी ताने मारती है. कहती है मुझ जैसे निकम्मे को इनाम में और क्या मिलेगा?"

"तो क्या स्वर्णमुद्राएं देखकर तुम्हारी पत्नी खुश नहीं होती?"; बादशाह ने बीरबल से पूछा.

बादशाह की बात सुनकर बीरबल ने कहा; "कैसे खुश होगी, आलमपनाह? स्वर्णमुद्रा पाकर आज के ज़माने में कौन गृहणी खुश रहेगी?"

ये कहते हुए बीरबल मन ही मन मुस्कुरा रहे थे. सोच रहे थे 'स्वर्णमुद्रा की जगह स्वर्ण आभूषण रहता तो ये ताने मारने का कार्यक्रम होता ही नहीं.'

बीरबल की बात सुनकर बादशाह जी को बड़ा आश्चर्य हुआ. कोई स्वर्णमुद्राएं पाकर खुश न हो, ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था. वे बोले; "तो क्या तुम्हारी पत्नी की निगाह में स्वर्णमुद्राओं की कोई कीमत नहीं है?"

बादशाह की बात सुनकर बीरबल बाबू को समझ नहीं आया कि वे क्या कहें? लेकिन बहुत साहस बटोर कर बोले;
"स्वर्णमुद्राओं की घटती कीमत का अंदाजा आपको नहीं है आलमपनाह. वैसे आपके के राज में चलने वाली मुद्रा की कीमत कितनी गिरी है, इसका अंदाजा आपको कैसे लगेगा?"

"क्या मतलब है तुम्हारा?"; बादशाह ने अचम्भे से पूछा.

"आपको शायद मालूम नहीं जहाँपनाह कि आपके राज में चलने वाली स्वर्णमुद्रा से खरीदारी करने पर आजकल झोले में कुछ नहीं आता. वैसे भी आपको इस बात की जानकारी कौन देगा? आपके पास जितना समय है, वो तो हँसने या फिर हँसने की कोशिश करने में चला जाता है. ऊपर से या तो आप महल से निकलते ही नहीं, या फिर निकलते हैं तो कूटनीति की प्रैक्टिस करने परदेस चले जाते हैं"; बीरबल बाबू ने बादशाह के करीबी होने का फायदा उठाते हुए सच कह डाला.

बीरबल बाबू की बात सुनकर बादशाह जी कुछ सोचने लगे. सोचते हुए बोले; "तो कोई बात नहीं. मैं तुम्हें इनाम में एक कार दे देता हूँ."

बादशाह की बात सुनकर बीरबल ने मन ही मन अपना माथा ठोक लिया. बोले; "कार तो दे देंगे जहाँपनाह, लेकिन पेट्रोल की कीमत का जो हाल है, मैं कार लेकर करूंगा क्या? देना ही है तो कोई सच में कीमती चीज दीजिये."

"तो तुम्ही बताओ, तुम्हें क्या चाहिए?"; बादशाह ने बीरबल से पूछा.

"आप देना ही चाहते हैं तो मुझे चावल और दाल दे दें. आजकल यही सबसे कीमती चीज है"; बीरबल ने कीमती सामान का नाम बता दिया.

बादशाह ने मंत्री को आदेश दिया कि बीरबल को इनाम में चावल और दाल दे दिया जाय. बीरबल बाबू को जब चावल और दाल मिल गया तो बादशाह ने पूछा; "बीरबल तुमने चावल और दाल क्यों माँगा?"

बीरबल बोले; "आलमपनाह, जिस तरह से आपके राज्य में कृषि की जमीन लगातार कम होती जा रही है, मेरी बुद्धि कहती है कि आनेवाले दिनों में चावल, दाल और गेंहूं ही सबसे कीमती रहेंगे. वैसे भी किसान आत्महत्या करते जा रहे हैं. जमीन की कमी के साथ-साथ किसानों की कमी हो जायेगी तो खेती-बाड़ी का काम क्या आपके नौ रत्न करेंगे? इसीलिए मैं अभी से खाने-पीने की चीजें इकठ्ठा करने में लगा हूँ."

बादशाह जी बीरबल की बुद्धि पर एक बार फ़िर से फ़िदा हो गए. खुश होते हुए बोले; "मैं एक बार फिर तुम्हारी बुद्धि पर फ़िदा हो गया हूँ. बोलो, तुम्हें और क्या चाहिए?"

बादशाह को अधिकार है कि वह जब चाहे, जिस चीज पर चाहे फ़िदा हो सकता है.

उनकी बात सुनकर बीरबल बोले; " आपसे एक वचन चाहिए. जो दरबारी मुझसे जलते हैं, आज से आप उन्हें इनाम में कंपनियों के शेयर दिया करेंगे."

बादशाह जी ने बीरबल को वचन दे दिया. चावल और दाल लिए बीरबल घर की तरफ़ रवाना हो गए.

Monday, October 20, 2008

विश्वामित्र की तपस्या फिर से भंग हो गई.....




रात (या सुबह?) के तीन बजे थे. इन्द्र अपने कमरे में कंप्यूटर टेबल के सामने लगी कुर्सी पर बैठे कुछ सोच रहे थे. सोचते-सोचते कुर्सी पर पालथी मार कर बैठ गए. कुछ देर कमरे की सीलिंग को निहारा. सीलिंग निहार कर बोर हो लिए तो टेबल पर रखी थैली उठा ली. थैली में से पान मसाला निकाल हथेली पर रखा. कुछ क्षण बाद हथेली को नाक के पास ले गए. कुछ सोचते हुए बोले; "लगता है नकली है."

तीन बजे कमरे में उनकी बात सुनने वाला कौन होगा? कोई नहीं. इसलिए तुंरत ही मन मारते हुए चेहरे पर कोम्प्रोमाईज मुद्रा लाते हुए सोचा कि हाय-तौबा मचाकर भी कुछ नहीं मिलने वाला.

संकठा प्रसाद के ऊपर बहुत गुस्सा आया. मन में सोचने लगे; "सबेरा होने दो, संकठा प्रसाद की ठुकाई कर दूँगा. कितनी बार इसे मना किया है कि सेठ ब्रदर्स की दूकान से मसाला न लाया करे लेकिन ये जगरचोर वहीँ से ले आता है. सौ मीटर और आगे जाने में पता नहीं इसका क्या बिगड़ता है?"

मन मारकर ज़र्दे का पाउच खोला. पता नहीं क्यों आज ज़र्दा का डबल डोज़ हथेली पर उलट लिया. पान मसाला के साथ ज़र्दा रगड़ते हुए मिश्रण तैयार करने में जुट गए.

मिश्रण तैयार करते हुए बार-बार टेबल पर रखे लैपटॉप को निहारते जा रहे थे. लैपटॉप पर उनका ब्लॉग खुला था. अपनी पिछली पोस्ट पर आए कमेन्ट को अब तक सात बार देख चुके थे. भगवान विष्णु के साथ-साथ वृहस्पति और शुक्राचार्य के कमेन्ट भी थे. साथ में कुछ और बड़े, मझोले और टुटपुजिया देवताओं के अथाह बड़ाई वाले कमेन्ट भी थे.

जहाँ भगवान विष्णु ने अपने कमेन्ट में लिखा था; "बेहतरीन" वहीँ शुक्राचार्य ने देवराज का मजाक उड़ाते हुए लिख दिया था; "सही जा रहे हो. आजकल उर्वशी से पोस्ट लिखवाने लगे हो या फिर कथक देखते-देखते सोमरस के प्रभाव में ये पोस्ट लिखी है? यही हाल रहा तो मुझे अपने चेलों को युद्धविद्या सिखाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी."

शुक्राचार्य का कमेन्ट पढ़ते हुए सोच रहे थे; "पता नहीं ख़ुद को क्या समझता है? हर पोस्ट पर कुछ न कुछ तीखी टिप्पणी कर के ही जाता है. एक तरफ़ वृहस्पति जैसे विद्वान हैं जो मेरी हर पोस्ट की बड़ाई करते हैं और दूसरी तरफ़ ये कानिया है जो हर पोस्ट पर गाली देता है. इसका कुछ न कुछ इलाज करना पड़ेगा."

ये बातें सोचते हुए वे पान मसाला और ज़र्दे का मिश्रण तैयार कर ही रहे थे कि नारद प्रकट हुए. असल में अपनी वीणा से लैश नारद एक गीत गुनगुनाते चले जा रहे थे. सुबह-सुबह पृथ्वीलोक जा रहे थे लेकिन तीन बजे देवराज के कमरे में लाईट जलती देख इधर मुड लिए. इन्द्र को मिश्रण तैयार करता देख बोले; "नारायण नारायण. ये क्या देख रहा हूँ प्रभो? आप खैनी का सेवन कब से करने लगे?"

उनका सवाल देवराज को पसंद नहीं आया. बोले; "देखिये देवर्षि, इस समय मेरा मूड बहुत ख़राब है. अगर आप मज़ाक करने का प्लान बनाकर आए हैं तो चले जाइये. आपको मालूम है, मैं खैनी नहीं बल्कि पान मसाला और ज़र्दे का मिश्रण खाता हूँ."

इन्द्र का जवाब सुनकर नारद को पता चल गया कि मामला कुछ गड़बड़ है. यही सोचते हुए बोले; " लेकिन प्रभो, आप पान मसाला और ज़र्दा भी क्यों खाते हैं? ये अच्छी चीजें नहीं हैं."

इतना कहकर वे रुक गए. फिर उन्हें अचानक याद आया कि उन्होंने नारायण नारायण तो कहा ही नहीं. यही सोचते हुए उन्होंने ख़ुद को करेक्ट करते हुए "नारायण नारायण" कह डाला.

नारद के मुंह से नारायण नारायण सुनकर इन्द्र को बड़ा अजीब लगा. वे सोचने लगे कि इन्होने अलग से नारायण नारायण क्यों कहा?

एक बार तो सोचा कि नारद से पूछ लें लेकिन दूसरे ही क्षण उन्होंने अपना ये विचार त्याग दिया और बोले; "मुझे भी मालूम है ये अच्छी चीजें नहीं हैं. लेकिन मैं क्या करूं? पिछले पन्द्रह दिन से टेंशन डिजाल्व करने वाली गोली काम ही नहीं कर रही है. इसलिए डॉक्टर ने कहा कि पान मसाला और ज़र्दे का मिश्रण ट्राई करूं. कह रहे थे, अब यही दो चीजें खालिश हैं. दवाई तो नकली बिक रही हैं";

इन्द्र ने अपनी समस्या के बारे में बताते हुए कहा.

उनकी बात सुनकर नारद भी सोच में पड़ गए. उन्हें एकदम से समझ में नहीं आया कि इन्द्र के टेंशन का कारण क्या है. उन्हें लगा कि अनुमान लगाकर कौन दिमाग खर्च करे? इन्ही से पूछ लो. यही सोचते हुए उन्होंने पूछ लिया; " लेकिन आप टेंशनग्रस्त क्यों हैं प्रभो? क्या मेनका आजकल डांस स्टेप भूल जाती है?"

"नहीं देवर्षि, ऐसी बात नहीं है. वैसे भी मेनका अगर डांस स्टेप भूल भी जायेगी तो क्या हो जायेगा? आडिशन करके नई डांसर्स भर्ती कर लेंगे"; इन्द्र ने सफाई देते हुए कहा.

"तो फिर आप क्या ब्लॉग पर शुक्राचार्य के कमेन्ट से दुखी हैं?"; नारद ने अनुमान लगाते हुए पूछा.

अब तक इन्द्र का मुंह पान मसाला और ज़र्दे के मिश्रण से पूरी तरह से भर गया था. वे और बात करने में असमर्थ थे. इसलिए टेबल के नीचे से डस्टबिन उठाकर उसमें थूकते हुए बोले; "नहीं देवर्षि, शुक्राचार्य से तो कभी भी निबट लूँगा. असल में मेरी टेंशन की वजह एक बार फिर से विश्वामित्र हैं. आपके कहने से मैंने ब्लॉग बनाकर पिछली बार उनकी तपस्या भंग की थी. लेकिन पता नहीं क्यों वे पिछले बीस दिन से ब्लॉग पर पोस्ट ही नहीं डाल रहा है. न ही मेरी पोस्ट पर कमेन्ट कर रहा है."

नारद उनकी बात सुनकर मंद-मंद मुस्कुराने लगे. बड़े सरकास्टिक लहजे में बोले; "नारायण नारायण. ये आप क्या कह रहे हैं प्रभो? आप ही तो कहते थे कि अब विश्वामित्र के ब्लॉग पर जाने का मन नहीं करता. और आज आपको ये चिंता सता रही है कि वे पोस्ट नहीं लिख रहे हैं? ये क्या बात हुई, देवाधिदेव?"

"वो तो मैं ऐसे ही कहता था, देवर्षि. असल में मैं रोज ही उसके ब्लॉग पर जाकर देखता था कि उसने क्या लिखा. अगर नहीं देखता तो फिर से गाली देते हुए पोस्ट कैसे लिखता? और फिर, जब वो मेरी पोस्ट पर गाली देते हुए कमेन्ट लिखता था तो मैं आश्वस्त रहता था कि ये तपस्या नहीं कर रहा है"; इन्द्र ने पूरी बात का खुलासा करते हुए कहा.

इतना कहते हुए वे फिर से पान मसाला हाथ पर रखने लगे. हथेली पर ज़र्दा रखते हुए बोले; "मुझे तो लग रहा है कि विश्वामित्र एक बार फिर से तपस्या करने में जुट गया है. मैं हर घंटे अपना ब्लॉग खोलकर देख लेता हूँ कि उसका कोई कमेन्ट आया कि नहीं? लेकिन पिछले बीस दिन से वो कहीं दिखाई ही नहीं दे रहा है. अब तो आप ही कोई रास्ता दिखायें देवर्षि. अगर ये विश्वामित्र फिर से तपस्या करने बैठ गया तो बड़ी मुश्किल हो जायेगी."

इन्द्र की व्यथा-कथा सुनकर नारद को दया आ गयी. सोचने लगे कि इनकी मदद कैसे करें? ये इस तरह से टेंशनग्रस्त हो गए तो सोमरस कौन पीयेगा? स्वर्गलोक में डांस का प्रोग्राम ही बंद हो जायेगा. देवता तो त्राहि-त्राहि करने लगेंगे. देवता अगर देवताई न कर सके तो और ही कर्म पर उतर आयेंगे.

यही सब सोचते हुए नारद ने ब्रेन-स्टार्मिंग सेशन शुरू कर दिया.

सोचते-सोचते सुबह हो गयी. मुर्गा भी बोल उठा. मुर्गा बोला ही था कि मुर्गे की बांग सुनकर कौआ भी बोल उठा. साथ में कुत्तों ने भी भौकना शुरू कर दिया. इतनी सारी आवाजें सुनकर नारद को ब्रेनवेव आ गयी. अचानक बोल उठे; "नारायण नारायण."

उनके मुंह से नारायण नारायण सुनकर इन्द्र की आँखें चमक उठी. उन्हें आभास हो गया कि देवर्षि के दिमाग में कोई समाधान आया ज़रूर है. वे नारद की तरफ़ याचक भाव से देख रहे थे. जैसे कह रहे हों; " जल्दी अपने आईडिये के बारे में बताएं देवर्षि.ट्राई मेक इट फास्ट, प्लीज."

नारद मुस्कुराते हुए बोले; " नारायण नारायण. समाधान मिल गया प्रभो. अब आपको चिंतित होने की ज़रूरत नहीं है."

उनकी बात सुनकर इन्द्र पान मसाला से अपना मुंह खाली करते हुए इन्द्र ने कहा; "जल्दी बताईये देवर्षि. आपके हिसाब से क्या किया जा सकता है?"

नारद बोले; "हे देवराज, आज ही आप एक कम्यूनिटी ब्लॉग बनाईये. इस कम्यूनिटी ब्लॉग के मेम्बेर्स के नाम पर आप विश्वामित्र, शुक्राचार्य और तमाम राक्षसों का नाम दे दीजिये. इस ब्लॉग पर ख़ुद ही देवताओं को गाली देते हुए तीन-चार पोस्ट लिखिए. और कल ही अपने असली ब्लॉग पर इस ब्लॉग के ख़िलाफ़ पोस्ट लिखते हुए हल्ला मचा दीजिये कि विश्वामित्र तो राक्षसों के साथ मिल गए हैं. आप देखियेगा, दूसरे ही दिन विश्वामित्र सफाई देने के लिए अपने ब्लॉग पर न केवल पोस्ट लिखेंगे बल्कि आपके पोस्ट पर कमेन्ट भी लिखेंगे."

ऐसा ही हुआ. इन्द्र ने एक कम्यूनिटी ब्लॉग बनाया. ब्लॉग के मेंबर के रूप में विश्वामित्र के साथ-साथ शुक्राचार्य और राहु-केतु के नाम से पोस्ट भी लिख डाली जिनमें देवताओं को गाली दी गई थी.

इस कम्यूनिटी ब्लॉग को देखकर विश्वामित्र को अपनी सफाई देने के लिए अपने ब्लॉग पर पोस्ट लिखनी पडी. अब वे सफाई देने में जुट गए थे. उनकी तपस्या एक बार फिर से भंग हो चुकी थी.


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२०० वीं पोस्ट
वो क्या है जी, कि ये मेरे ब्लॉग पर पब्लिश होने वाली २०० वीं पोस्ट है. मुझे किसी भी हाल में ऐसी-वैसी, जैसी-तैसी एक पोस्ट लिखकर ये २०० वीं पोस्ट की ख़बर देकर बधाई लेनी थी. इसीलिए इस तरह की अगड़म-बगड़म पोस्ट लिख डाली.

मुझे पता है कि आपलोग ऐसी पोस्ट पढ़कर हलकान च परेशान होंगे. और सुबह-सुबह मन में गाली देंगे. लेकिन मैं क्या कर सकता हूँ? मुझपर जल्दी से जल्दी २०० वीं पोस्ट लिखने की धुन सवार थी.

इसलिए मन में गाली भले ही दें, टिपण्णी में बधाई देते जाईयेगा.

Thursday, August 28, 2008

हलवा-प्रेमी राजा




उसने राजा के ऊपर कभी एहसान किया था. राजे-महाराजे होते ही ऐसे थे कि उनके ऊपर कोई न कोई एहसान कर गुजरता था. राजाओं की बेचारगी के किस्सों से इतिहास भरा है. सूर्यवंशी दशरथ जी भी कभी इतनी बेचारगी के दौर से गुजरे कि कैकेयी जी जैसों के एहसान तले दबे. नतीजा हम सभी जानते हैं.

मजे की बात ये कि एहसान से दबे राजा-महाराजा वादा कर डालते थे; "हम तुम्हें एक वचन देते हैं. अभी तो अपनी तिजोरी में रख लो. जब इच्छा हो, भंजा लेना." दशरथ जी से प्रभावित इस राजा ने भी इस आदमी को वचन की हुंडी थमा दिया था. एक दिन इस आदमी ने अपनी तिजोरी में रखे राजा के वचन को निकाला. उसे धोया-पोंछा और उसे लेकर राजा जी के पास पहुँचा. बोला; "वो आपने मुझे जो वचन दिया था, आज मैं उसे भजाने आया हूँ."

राजा जी के पास कोई चारा नहीं था. एक बार तो उन्होंने सोचा कि वचन की इस हुंडी को एक कटु-वचन कहकर बाऊंस करवा दें. लेकिन इस बात की चिंता थी कि अगर ऐसा हुआ तो ये आदमी उन्हें बदनाम कर सकता था. हल्ला मच देगा कि राजा जी के वचन की हुंडी तो बाऊंस हो गयी. एक प्रेस कांफ्रेंस ही तो करना था. राजा की इज्जत धूल में मिल जाती. टीवी न्यूज चैनल वाले चटखारे लेकर राजा की ऐसी-तैसी करने में देर नहीं लगाते.

इन्ही सब बातों को ध्यान में रखकर राजा जी बोले; "अच्छा मांगो. क्या चाहिए तुम्हें?"

वो बोला; "मैं कुछ दिनों के लिए राजा बनना चाहता हूँ. देखना चाहता हूँ कि क्या-क्या मज़ा लूटा जा सकता है."

राजा जी बोले; "ठीक है. तुम बन जाओ राजा." ये कहते हुए राजा जी ने उसे सिंहासन पर बैठा दिया.

इस आदमी ने कंधे पर लटक रही अपनी झोली को महामंत्री के हवाले किया और राजा के सिंहासन पर पसर गया. महामंत्री को हिदायत दी कि उसकी झोली को बहुत संभालकर रखा जाय. आख़िर अब वो एक राजा की झोली थी. बड़ी कीमती.

जिस दिन राज सिंहासन पर पसरा, उसी दिन से मज़ा लूटना शुरू कर दिया. दरबारियों को बुलावा भेजा. जब सारे दरबारी हाज़िर हुए तो उसने आदेश दिया; "सबके लिए सोने की कटोरी में हलवा पेश किया जाय."

हंसी-मज़ाक करते सबने हलवा खाया. दरबारियों को भी खूब मज़ा मिल रहा था. राजा और उसके दरबारियों की शाम हलवामयी होने लगी.

सुबह-शाम हलवे में डूबा ये राजा मस्त था. एक दिन मंत्री ने आकर कहा; "महाराज, पड़ोस के राजा ने हमारे राज्य पर चढ़ाई कर दी है." राजाओं को और काम ही क्या था? शिकार करने से बोर हुए तो पड़ोस के राज्य पर चढ़ाई कर दो.

मंत्री की बात सुनकर राजा बोला; "चढ़ाई कर दी? अच्छा कोई बात नहीं. दरबारियों को बुलाओ."

सारे दरबारी आ पहुंचे. सबके आने के बाद राजा ने फ़िर वही फरमाइस की; "सबके लिए हलवा ले आओ." हलवा खाकर सारे दरबारी खुश. दरबार खारिज.

दूसरे दिन मंत्री फिर दौड़ते हुए आया. बोला; "महाराज पड़ोस के राज्य का राजा तो हमारे नगर में प्रवेश कर चुका है."

राजा ने फिर दरबारियों को बुलाया. फिर वही हलवे की फरमाइस. फिर वही हलवा भक्षण कार्यक्रम और फिर से दरबार खारिज. ऐसे ही एक दिन और बीता.

तीसरे दिन मंत्री फिर दौड़ता हुआ आया. बोला; "महाराज, पड़ोस का राजा तो आपके महल में प्रवेश कर चुका है."

मंत्री की बात सुनकर उसने बिना किसी चिंता के कहा; "महल में प्रवेश कर चुका है? अच्छा, एक काम करो. मेरी झोली ले आओ. वही झोली जो मैंने तुम्हें रखने के लिए दी थी."

झोली को हाज़िर किया गया. उसने अपनी झोली कंधे पर टांगी और वहां से चलने लगा. मंत्री ने कहा; "महाराज कहाँ जा रहे हैं? इस समय सिंहासन छोड़कर जाना उचित नहीं. "

वो बोला; "भइया, मैं तो हलवा खाने आया था. मैंने पेट भरकर अपनी साध पूरी कर ली. अब तुम जानो और तुम्हारे राजा. मैं तो चला." ये कहते हुए वो आदमी निकल लिया.

इस हलवा-प्रेमी राजा का 'लेटेस्ट एडिशन' इस समय हमारे ऊपर शासन तो नहीं कर रहा?

Wednesday, July 30, 2008

गुरु संदीपनि का सिलिंडर संकट




गुरु संदीपनि परेशान थे. दोनों हाथ पीछे बांधे सर झुकाए टहल रहे थे. देखने से प्रतीत हो रहा था जैसे किसी का बड़ी बेसब्री से इंतजार कर रहे थे. गुरुआईन गाल पर हाथ धरे कुटिया की ज़मीन निहार रही थीं. बीती रात घर में खाना नहीं पक सका था. हुआ ऐसा कि जैसे ही गुरुआईन ने दाल का अदहन चूल्हे पर रखा, बर्नर से दो-तीन बार जोर की आंच निकली और चूल्हा बुझ गया. गुरुआईन को याद आया कि दो दिन से खाना बनाने के बर्तन काले होने शुरू हो गए थे. उन्हें डर लगने लगा कि कहीं गैस सिलिंडर खाली तो नहीं हो गया. अनिष्ट की आशंका मन में लिए उन्होंने एक बार फिर से चूल्हे के बर्नर पर लाईटर दाग दिया. लेकिन आग नहीं लगी. आख़िरी प्रयास के रूप में उन्होंने आखिरी अस्त्र चलाते हुए दो-तीन बार सिलिंडर को हिलाया-डुलाया लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ.

अब तक गुरुआईन स्योर हो गईं कि गैस सिलिंडर खाली हो चुका था. बीस दिन हो गए थे गैस की बुकिंग किए हुए लेकिन सिलिंडर की डिलीवरी अभी तक नहीं हुई थी. चूल्हे के साथ लगे सिलिंडर के खाली होने का भय गुरुआईन को दो-तीन दिनों से सता रहा था. लिहाजा कल दोपहर को गैस एजेन्सी फ़ोन कर नए सिलिंडर की डिलीवरी के बारे में इंक्वाईरी कर चुकी थीं. उधर से किसी ने ये बताते हुए फ़ोन काट दिया कि सप्लाई की प्रॉब्लम है. आज सुबह से गुरु जी को चाय तक नसीब नहीं हुई थी. रात को लाई और गट्टा खाकर दोनों सो गए थे. सबेरे उठते ही दोनों ने ख़ुद को भूख से पीड़ित पाया. वैसे दो मुट्ठी भिगोया चना और एक भेली गुड खाकर पानी पीने से पेट को थोडी थाह मिली थी.

दोपहर का खाना कैसे बनेगा इस बात के बारे में सोचकर गुरुदेव को पसीना आ जाता. उन्होंने मिटटी के उस चूल्हे की बड़ी खोज-बीन की, जिसपर उनके घर में पहले खाना पकता था. खोजते-खोजते थक गए लेकिन वो चूल्हा कहीं नहीं मिला. तब गुरुआईन ने बड़े धीमे स्वर में यह राज खोला कि वो चूल्हा तो उन्होंने काम करनेवाली बाई को दानकर अपना अगला जनम सुधारने का बंदोबस्त कर लिया था. हुआ ऐसा कि बड़ी मिन्नतों और दो सौ रूपये घूस देने के बाद जब गैस कनेक्शन मिल गया तो गुरुआईन ने मिटटी का चूल्हा और कोयले से जलने वाली एक सिगड़ी काम करने वाली बाई को दे दिया था. यह राज खुलने पर गुरु जी ने एक बार तो दांत पीसे लेकिन फिर यह सोच कर कि वैद्य जी ने उन्हें गुस्सा करने से मना किया था, चुप हो गए. एक बार तो गुस्से में यह भी कह गए कि इससे अच्छे तो वही दिन थे जब सुदामा और कृष्ण वगैरह को जंगल भेज देते थे सूखी लकडियाँ लाने के लिए. दोनों भले ही बरसात में फंस जाते लेकिन लकड़ी लेकर ही लौटते थे.

एक बार तो उन्होंने ने सोचा कि जब तक सिलिंडर नहीं आ जाता पिज्जा वगैरह मंगाकर खा लेंगे. उन्होंने विज्ञापन में पढ़ रक्खा था कि आजकल पिज्जा के साथ कोल्ड ड्रिंक फ्री में मिलता है. लेकिन फिर उन्हें वैद्य जी की बात याद आ गई. वैद्य जी ने उन्हें जंक फ़ूड खाने से मना कर रखा था.

गुरुदेव बार-बार कुटिया की किवाड़ तक जाते और बाहर देख कर लौट आते. सुदामा के आने की बाट जोह रहे थे. मार्निंग वाक के दौरान उनकी मुलाकात सुदामा के फादर से हुई थी. गुरु जी ने उनसे कहा था कि; "साढ़े आठ बजे तक सुदामा को घर पर भेज दीजियेगा. बहुत ज़रूरी काम है." लेकिन यह क्या? अब तक नौ बज चुके थे लेकिन सुदामा का अत-पता नहीं था. गुरुदेव परेशान दिखने लगे. उन्हें उनका प्लान चौपट होता दिखाई दे रहा था.

असल में गुरुदेव ने प्लान बना रक्खा था कि साढ़े आठ बजे तक अगर गैस एजेन्सी में सुदामा लाइन लगा दे तो आज सिलिंडर मिलने का चांस रहेगा. गुरु जी को मालूम था कि आजकल गैस सिलिंडर की कमी के चलते गैस एजेन्सी के सामने बहुत बड़ी लाइन लगती थी. इसीलिए उन्होंने सोच रक्खा था कि एक बार सुदामा लाइन लगा देगा तो ग्यारह बजे तक कृष्ण को भेजकर सुदामा को थोड़ी राहत दे देंगे. सुदामा गरीब था इसलिए गुरुदेव ने उसे पहले हाजिरी का हुकुम दिया था. वैसे भी अब तक कृष्ण बाबू कालिया मर्दन वगैरह करके करीब एक चौथाई 'भगवानत्व' का सबूत दे चुके थे. लिहाजा व्यावहारिकता का तकाजा यही था कि उन्हें इतना रिबेट तो मिलना ही था.

सुदामा की प्रतीक्षा करते-करते करीब पौने दस बज गए. खैर, थोड़ी देर में प्रतीक्षा की आखिरी घड़ी गई और गुरुदेव ने देखा कि जींस की जेब में हाथ डाले सुदामा सीटी बजाते आ पंहुचा. सुदामा को देखते ही गुरुदेव भड़क उठे. बोले; "ये कोई टाइम है आने का? तुम्हारे फादर को मैंने कहा था न कि तुम्हें साढ़े आठ बजे तक भेज दें. उन्होंने बताया नहीं तुमको?"

गुरुदेव की बात का सुदामा के ऊपर कोई ख़ास असर नहीं दिखाई दिया. उसने कंधे उचकाते हुए कहा; "पापा ने बताया था कि आपने साढ़े आठ बजे तक बुलाया है. लेकिन वो क्या है गुरुदेव कि मैं डब्लू डब्लू ऍफ़ स्मैकडाऊन देखने लगा. इसीलिए देर हो गई. वैसे पापा कह रहे थे कि आपका कोई ज़रूरी काम है."

सुदामा की बात सुनकर गुरुदेव ने मन ही मन ज़माने को कोसा. फिर गुस्से पर काबू करते हुए बोले; "अच्छा ठीक है. जो हुआ सो हुआ. एक काम करो. तुम गैस एजेन्सी चले जाओ. मेरी बुकिंग की हुई है. बीस दिन पहले. अभी तक सिलिंडर की डिलीवरी नहीं हुई. तुम जाकर लाइन लगा दो. गुरु माँ का मोबाइल ले जाओ. तुम लाइन में रहना. मैं बारह बजे तक कृष्ण को भेज दूँगा तुम्हारी मदद के लिए. कोई समस्या होने पर मिस्ड कॉल देना."

गुरुदेव की बात सुनकर सुदामा ने कहा; "गुरुदेव वो गैस एजेन्सी जाने से कोई फायदा नहीं होगा. आपका सिलिंडर नहीं मिलेगा."

"क्यों? क्यों नहीं मिलेगा?"; गुरुदेव ने जानना चाहा.

"छोडिये न गुरुदेव, मैं कह रहा हूँ नहीं मिलेगा तो नहीं मिलेगा"; सुदामा ने अपनी बात पर जोर देते हुए कहा.

"अरे वही तो मैं पूछ रहा हूँ. तुम कैसे कह सकते हो कि नहीं मिलेगा. मेरी बुकिंग की हुई है"; गुरुदेव ने थोड़ी कड़ाई के साथ जानना चाहा.

"अच्छा ठीक है. आप कहते हैं तो मैं बताता हूँ. देखिये, हुआ ऐसा गुरुदेव कि हमारे पड़ोस की भवानी चाची का सिलिंडर खाली हो गया था. उनके घर खाना बनाने की बड़ी दिक्कत हो रही थी. भवानी चाची ने मुझसे कह रखा था कि अगर कहीं से सिलिंडर ब्लैक में मिल जाए तो मैं उन्हें दिला दूँ. परसों आप का सिलिंडर डिलीवरी करने के लिए गैस एजेन्सी का आदमी आपके घर की तरफ़ आ रहा था. मैंने वही सिलिंडर ब्लैक में खरीद लिया कर भवानी चाची को दे दिया. मुझे पचीस रूपये कमीशन में भी मिले"; सुदामा एक साँस में पूरी बात बता गया.

सुदामा की बात सुनकर गुरुदेव को बहुत गुस्सा आया. उन्होंने गुस्से में आँखें लाल किए सुदामा से कहा; "तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई ऐसा करने की? सुदामा, मैं तुम्हें गुरुकुल से रस्टीकेट कर दूँगा."

गुरुदेव की मुख मुद्रा देखकर सुदामा खिस्स से हंस दिया. उसने कहा; "जाने दीजिये न गुरुदेव गुस्सा थूक दीजिये. जो हुआ सो हुआ."

"ऐसे कैसे जाने दूँगा? मैं तुम्हें छोडूंगा नहीं. मैं तुम्हें रस्टीकेट कर के गुरुकुल से निकाल दूँगा"; गुरुदेव का गुस्सा अभी तक शांत नहीं हुआ था.

सुदामा ने उनका गुस्सा देखा तो वो भी ताव में आ गया. बोला; "देखिये गुरुदेव, आप ऐसा नहीं कर सकते."

"क्यों नहीं कर सकता? क्यों? मैं गुरु हूँ तुम्हारा"; गुरुदेव को लगा कि उन्हें अपनी हैसियत एक बार फिर से सुदामा को बताने की ज़रूरत है.

सुदामा उनकी बात सुनकर मुस्कुरा दिया. बोला; "देखिये गुरुदेव, अगर आप ऐसा करेंगे तो मैं आपकी लिखित शिकायत उप कुलपति से कर दूँगा. और उसी लेटर की एक कॉपी लेबर कमिश्नर को भेज दूँगा. आपके ऊपर आरोप लगा दूँगा कि आप मुझे जंगल भेजते थे सूखी लकडियाँ इकठ्ठा करने के लिए. आपके ऊपर बाल मजदूरी का आरोप लगाकर सस्पेंड करवा दूँगा. याद रखिये मेरे पास गवाह के तौर पर कृष्ण भी है."

सुदामा की बात सुनकर गुरुदेव सहम गए. उन्हें विश्वास हो गया कि ज़माना उन दिनों से बहुत आगे निकल आया है जब सुदामा और कृष्ण जंगल में जाकर लकडियां बीन लाते थे. बिना इस बात की परवाह किए कि उन्हें बरसात में फंसकर भूख से बिलखना भी पड़ता था. गुरुदेव के कदम चुप-चाप गैस एजेन्सी की तरफ़ बढ़ गए. उन्हें वहां लाइन लगानी थी ताकि शाम को घर में खाना बन सके.

Saturday, December 29, 2007

ब्लॉग महिमा




इन्द्र परेशान बैठे थे. माथे पर 'तिरशूल' के जैसे तीन-तीन बल पड़े हुए थे. बहुत कोशिश करने के बाद भी विश्वामित्र की तपस्या इस बार भंग नहीं हो रही थी. मेनका लगातार बहत्तर घंटे डांस करके अब तक गिनीज बुक में नाम भी दर्ज करवा चुकी थी लेकिन विश्वामित्र टस से मस नहीं हुए. मेनका के हार जाने के बाद उर्वशी ने भी ट्राई मारा लेकिन विश्वामित्र तपस्या में ठीक वैसे ही जमे रहे जैसे राहुल द्रविड़ बिना रन बनाए पिच पर जमे रहते हैं. उधर मेनका और उर्वशी से खार खाई रम्भा खुश थी.

इन्द्र को समझ नहीं आ रहा था कि अब क्या किया जाय. दरबारियों और चापलूसों की मीटिंग बुलाई गई. मीटिंग बहुत देर तक चली. बीच में लंच ब्रेक भी हुआ. आधे से ज्यादा दरबारी केवल सोचने की एक्टिंग करते रहे जिससे लगे कि वे सचमुच इन्द्र के लिए बहुत चिंतित हैं. काफी बात-चीत के बाद एक बात पर सहमति हुई कि इन्द्र को उनके मजबूत पहलू को ध्यान में रखकर ही काम करना चाहिए. दरबारियों ने सुझाव दिया कि चूंकि इन्द्र का मजबूत पहलू डांस है सो एक बार फिर से डांस का सहारा लेना ही उचित होगा. डांस परफार्मेंस के लिए इस बार रम्भा को चुना गया. मेनका और उर्वशी इस चुनाव से जल-भुन गई. लेकिन कुछ किया नहीं जा सकता था. रम्भा ने तरह तरह के शास्त्रीय और पश्चिमी डांस किए लेकिन विश्वामित्र जमे रहे. उन्होंने रम्भा की तरफ़ देखा भी नहीं. हीन भावना में डूबी रम्भा ने एक लास्ट ट्राई मारा. मशहूर डांसर पाखी सावंत का रूप धारण किया और तीन दिनों तक फिल्मी गानों पर डांस करती रही लेकिन नतीजा वही, धाक के तीन पात. रम्भा को वापस लौटना पडा. रो-रो कर उसका बुरा हाल था. उसे अपनी असफलता का उतना दुख नहीं था जितना इस बात का था कि उर्वशी और मेनका अब उठते-बैठते उसे ताने देंगी.

प्लान फेल होने से इन्द्र दुखी रहने लग गए. सप्ताह में तीन चार दिन तो दारू चलती ही थी, अब सुबह-शाम धुत रहने लगे. लेकिन उनके प्रमुख सलाहकार को अभी तक नशे की लत नहीं लगी थी. काफी सोच-विचार के बाद वो एक दिन चंद्र देवता के पास गया. वहाँ पहुँच कर उसने पूरी कहानी सुनाई और साथ में चंद्र देवता से सहायता की मांग की. चंद्र देवता की गिनती वैसे ही इन्द्र के पुराने साथियों में होती थी. सभी जानते थे कि चन्द्र देवता इन्द्र के कहने पर एक बार मुर्गा तक बन चुके थे. वे इन्द्र के लिए एक बार फिर से पाप करने पर राजी हो गए.

चंद्र देवता रात की ड्यूटी करते-करते परेशान रहते थे, सो वे बाकी का समय सोने में बिताते थे. लेकिन इन्द्र की सहायता की जिम्मेदारी जो कन्धों पर पड़ी तो नीद और चैन जाते रहे. दिन में भी बैठ कर सोचते रहते थे कि 'इस विश्वामित्र का क्या किया जाय. इन्द्र के सलाहकार को वचन दे चुका हूँ. इन्द्र को भी दारू से छुटकारा दिलाना है नहीं तो आने वाले दिनों में पार्टियों का आयोजन ही बंद हो जायेगा.' एक दिन बेहद गंभीर मुद्रा में चिंतन करते चंद्र देवता को 'नारद' ने देख लिया. देखते ही नारद ने अपना विश्व प्रसिद्ध डायलाग दे मारा; "नारायण नारायण, किस सोच में डूबे हैं देव?"

"अरे ऋषिवर, बड़ी गंभीर समस्या है. वही इन्द्र और विश्वामित्र वाला मामला है. इसी सोच में डूबा हूँ कि इन्द्र की मदद कैसे की जाए. वैसे, ऋषिवर आप से तो देवलोक, पृथ्वीलोक, ये लोक, वो लोक सब जगह घूमते रहते हैं. आप ही कोई रास्ता सुझायें. इस विश्वामित्र की क्या कोई कमजोरी नहीं है?"; चंद्र देवता ने लगभग गिडगिडाते हुए पूछा.

"नारायण नारायण. ऐसा कौन है जिसकी कोई कमजोरी नहीं है. वैसे आप तो रात भर जागते हैं, लेकिन आप भी नहीं देख सके, जो मैंने देखा"; नारद ने चंद्र देवता से पूछा.

"हो सकता है, आपने जो देखा वो मुझे इतनी दूर से न दिखाई दिया हो. वैसे भी आजकल जागते-जागते आँख लग जाती है. लेकिन ऋषिवर आपने क्या देखा जो मुझे दिखाई नहीं दिया?"; चंद्र देवता ने पूछा.
"मैंने जो देखा वो बताकर इन्द्र की समस्या का समाधान कर मैं ख़ुद क्रेडिट ले सकता हूँ. लेकिन फिर भी आपको एक चांस देता हूँ. आज रात को ध्यान से देखियेगा, ये विश्वामित्र एक से तीन के बीच में क्या करते हैं"; नारद ने चंद्र देवता को बताया.

रात को ड्यूटी देते-देते चंद्र देवता विश्वामित्र की कुटिया के पास आकर ध्यान से देखने लगे. उन्हें जो दिखाई दिया उसे देखकर दंग रह गए. उन्होंने देखा कि विश्वामित्र अपने ब्लॉग पर पोस्ट लिख रहे हैं. पोस्ट पब्लिश करके वे और ब्लॉग पर कमेंट देने में मशगूल हो गए. चंद्र देवता को समझ में आ गया कि नारद का इशारा क्या था.

दूसरे ही दिन इन्द्र के सलाहकार ने इन्द्र का एक ब्लॉग बनाया. ब्लॉग पर पहले ही दिन विश्वामित्र की निंदा करते हुए इन्द्र ने एक पोस्ट लिखी. साथ में विश्वामित्र के ब्लॉग पोस्ट पर उन्हें गाली देते हुए कमेंट भी लिखा. कमेंट और पोस्ट का ये सिलसिला शुरू हुआ तो विश्वामित्र का सारा समय अब पोस्ट लिखने, इन्द्र के गाली भरे कमेंट का जवाब देने और इन्द्र के ब्लॉग पर गाली देते हुए कमेंट लिखने में जाता रहा. उनके पास तपस्या के लिए समय ही नहीं बचा.

विश्वामित्र की तपस्या भंग हो चुकी थी. इन्द्र खुश रहने लगे.