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Wednesday, July 25, 2012

श्री राम और पांडवों का वनवास - दो नव-कथाएँ




भगवान श्री राम का वनवास.

वनवास के दौरान श्री राम अनुज लक्ष्मण और सीता जी के साथ गंगा किनारे खड़े हैं. वे आज ही गंगापार करके आगे बढ़ जाना चाहते हैं. घाट पर केवट जी की नाव पानी में लंगर के सहारे खड़ी हुई है. नाव के मालिक केवट जी भी खड़े हैं. सीता जी के माथे पर चिंता की लकीरें हैं. लक्ष्मण जी कुछ नाराज़ टाइप लग रहे हैं. श्री राम ने समर्पण वाली मुद्रा इख्तियार कर ली है. कुल मिलाकर बड़ी टेंशन वाली स्थिति बन गई है.

हुआ ऐसा कि गंगा पार कर लेने की इच्छा लिए जब श्री राम, श्री लक्ष्मण और सीता जी घाट पर पहुंची तब नाव बंधी थी लेकिन केवट जी वहाँ नहीं थे. घाट तक पहुँचने से पहले तीनों ने मन ही मन कितना कुछ सोच रखा था. तीनों को इस बात का विश्वास था कि वहाँ पहुँचते ही केवट जी न केवल उनका स्वागत करेंगे बल्कि पूरे परिवार के साथ उपस्थित रहेंगे. रास्ते की थकान दूर करने के लिए वे तीनों के पाँव धोयेंगे और घर से आया बढ़िया शरबत पिलायेंगे. परन्तु घाट पर पहुँचने के बाद तीनो को उस समय बहुत आश्चर्य हुआ जब उन्होंने देखा कि नाव अकेली खड़ी है और केवट जी गायब है. पास ही कुछ बच्चे क्रिकेट खेल रहे थे. श्री राम ने उनमें से एक को यह कहकर भेजा कि वह केवट जी को उनके घर से बुला लाये.

केवट जी आये. उन्होंने श्री राम का अभिवादन किया. रामचन्द्र जी ने उन्हें बताया कि वे लक्ष्मण और सीता जी के साथ उसी समय पार जाना चाहते हैं. यह कहकर जैसे ही उन्होंने नाव की तरफ कदम बढ़ाया केवट जी ने उन्हें रोक दिया. भगवान राम को लगा कि शायद केवट जी इस बात से डर गए हैं कि नाव पर पाँव रखते ही नाव कहीं पत्थर की न हो जाए. उन्होंने केवट जी से कहा; "डरो मत भाई. कुछ नहीं होगा. मेरे छूने से यह नाव पत्थर की नहीं होगी. क्या तुम पिछली बात भूल गए जब तुमने हम तीनों को पार उतारा था? क्या पिछली बार तुम्हारी नाव पत्थर की हुई थी?"

यह सुनकर केवट जी बोले; "प्रभु यह तो हमें पता है. पिछली बार हम अवश्य डर गए थे लेकिन इस बार डरने का कोई कारण नहीं है. मेरे पुत्र ने विकिपीडिया पढ़कर हमें बता दिया है कि पिछली बार मेरे अन्दर फालतू का डर समा गया था."

भगवान राम बोले; "फिर तुम मुझे नाव पर पाँव रखने से क्यों रोक रहे हो अनुज?"

उनकी बात सुनकर केवट जी ने सिर लटका कर कहा; "प्रभु, हम आपको पार तो उतार देते लेकिन समस्या यह है कि अब हम नाव खेने का काम नहीं करते. गंगा में खड़ी यह नाव जो आप देख रहे हैं यह तो हमने इसलिए खड़ी कर रखी है ताकि कोई इसे खरीद ले. आपने शायद इसपर लगा फॉर सेल का बोर्ड नहीं देखा."

भगवान राम ने पूछा; "नाव खेने का काम नहीं करते? तो फिर तुम नाविकों की रोजी-रोटी कैसे चलती है?"

केवट जी ने भगवान राम की तरफ देखते हुए कहा; "शायद प्रभु को मनरेगा के बारे में नहीं पता. हे भगवन, जब बिना मेहनत किये हमें मजदूरी मिल जाय तो फिर कोई बेवकूफ ही होगा जो मेहनत करके नाव चलाए और लोगों को पार उतारे."

यह कहकर केवट जी चलते बने. भगवान राम ने लक्ष्मण जी से बात की और तीनों ने तय किया कि वे पैदल चलकर लॉर्ड कर्जन पुल से गंगा पार कर लेंगे ताकि शिवकुटी पहुँचा जा सके.

पांडवों का वनवास

वन में चलते-चलते पांडव थक चुके थे. थकते भी न कैसे? पेड़ों के कट जाने से वन में ऑकसीजन की कमी हो गई थी. इस वन में फैले पल्यूशन को लेकर अदालत की ग्रीनबेंच कई मुक़दमे देख रही थी. सभी भाइयों को प्यास लग चुकी थी. कहीं आस-पास पानी दिखाई नहीं दे रहा था. कारण यह भी था कि मनरेगा से तालाबों का जो ब्यूटिफिकेशन हुआ था उसकी वजह से बरसात का पानी तालाब तक पहुचने से मना कर देता था. इलाके के कुँए भी सूख चुके थे. यह बात और थी कि वन के रास्ते में भी उन्हें जग-प्रसिद्द विदेशी कोला धोखा कोला की कई होर्डिंग्स दिखाई दी थीं. पूरे राष्ट्र का यही हाल था. पीने का स्वच्छ पानी कहीं मिले या न मिले, धोखा कोला हर जगह मिलता था. गाँवों और जंगलों में भी धोखा कोला की दूकाने खुल गईं थीं. देखकर लगता था जैसे लोग़ स्नान वगैरह के लिए भी कोला का ही उपयोग करते थे.

जब उन्हें लगा कि और आगे जाना मुश्किल है, तब सारे भाई एक जगह बैठ गए. प्यास इतनी कि कुछ बोल भी नहीं पा रहे थे. मन में आया कि किसी दूकान से धोखा कोला खरीद कर ही पी लें लेकिन माताश्री का डर था कि शायद वे नाराज़ न हो जायें. बैठे-बैठे वे कुछ सोच रहे थे तभी नकुल युधिष्ठिर से बोले; "भ्राताश्री, सोचने से तो प्यास और बढ़ती जा रही है. हम जैसे-जैसे सोचते जा रहे हैं, शरीर से पसीना और भी बह रहा है. मैं जाकर किसी तालाब पर अपनी प्यास बुझाता हूँ और आपसब के लिए भी पानी ले आता हूँ."

इतना कहकर नकुल वहाँ से चल दिए. करीब एक किलोमीटर पैदल चलकर वे एक तालाब के किनारे पहुंचे. तालाब देखकर उन्हें बड़ी ख़ुशी हुई. अभी उन्होंने तालाब से पानी लेने के लिए अंजुली आगे की ही थी कि पब्लिक एड्रेस सिस्टम पर अनाउन्समेंट हुआ; "सावधान नकुल, तुम्हें इस तालाब से पानी पीने का अधिकार नहीं है."

अपने पिछले अनुभव से नकुल को पता था कि तालाब यक्ष का है सो यक्ष प्रश्न करेगा ही. वे पूरी तैयारी के साथ आये थे. यक्ष द्वारा पिछली बार किये गए प्रश्नों का उत्तर तो उन्होंने रट ही लिया था, साथ ही उपकार गाइड पढ़कर और ढेर सारे प्रश्नों का उत्तर रटकर पूरी तैयारी कर ली थी. आवाज़ सुनते ही उनका मन एक साथ सारे प्रश्न और उनके उत्तरों पर कुछ ही क्षणों में घूम-फिर कर वापस आ गया. नकुल जी भी इस बात से अस्योर्ड हुए कि मन सबसे तेज भागता है. इतना तेज कि कुछ ही क्षणों में हजारों प्रश्न और उनके उत्तरों पर घूम-फिर ले.

उन्होंने अपना हाथ तालाब के पानी के पास से खींचते हुए कहा; "प्रणाम यक्ष. मुझे पता था कि तालाब से जल लेने से पहले आप मुझसे प्रश्न करेंगे. पूछिए प्रश्न. मैं इसबार पूरी तैयारी के साथ आया हूँ."

नकुल की बात सुनकर पब्लिक एड्रेस सिस्टम से फिर आवाज़ आई; "हे युधिष्ठिर के अनुज नकुल, शायद आपको पता नहीं कि अब यह तालाब यक्ष का नहीं रहा. हमारी कंपनी धोखा कोला ने अब यह तालाब यक्ष से खरीद लिया है. कहने का तात्पर्य यह है कि अब इस तालाब के पानी का कार्पोरेटाईजेशन हो चुका है. वैसे तो इस तालाब के पानी का उपयोग अब केवल कोला बनाने के लिए होता है लेकिन फिर भी चूंकि आप थके और प्यासे हैं और साथ ही आप धर्मराज युधिष्ठिर के अनुज भी हैं, इसलिए हम आपको इसका पानी दे सकते हैं. शर्त केवल एक ही है कि आपको एक लीटर पानी के लिए पंद्रह स्वर्ण मुद्राएं देनी पड़ेंगी."

नकुल के टेंट में इस समय स्वर्ण मुद्राएं कहाँ से आती? उन्हें लगा कि अगर मुद्रा न रहने के कारण उन्हें पानी न मिला तो वे प्यासे मार जायेंगे. उन्होंने कंपनी के कर्मचारी की बात को अनसुना करके तालाब से पानी लेने के लिए हाथ बढ़ाया ही था कि पीछे से दो सिक्यूरिटी गार्ड्स ने उन्हें पकड़ लिया. दोनों ने मिलकर नकुल जी के हाथ में हथकड़ी पहना दी और उन्हें लेकर वहीँ बने धोखा कोला कंपनी के तालाब रक्षा केंद्र में चले गए.

इधर जब बहुत देर तक नकुल नहीं लौटे तब बारी-बारी से सहदेव, भीम और अर्जुन भी तालाब के किनारे गए और जबरदस्ती पानी लेने के आरोप में अरेस्ट कर लिए गए. सबसे अंत में धर्मराज युधिष्ठिर ने माताश्री को प्रणाम किया और अपने चारों भाइयों की खोज में निकले.

वे जब तालाब के किनारे पहुंचे तो उनके अन्दर उनका कांफिडेंस कुलांचें मार रहा था. आखिर प्रश्नों का उत्तर जानने के लिए उन्हें तो उपकार गाइड भी रटने की ज़रुरत नहीं थी. अपना कांफिडेंस लिए वे तालाब के किनारे पहुंचे और बोले; "यक्ष जी को पांडु नंदन युधिष्ठिर का प्रणाम पहुंचे. मैं आपके सारे प्रश्नों का उत्तर देने को तैयार हूँ परन्तु मुझे अपने मृत भाई कहीं दिखाई नहीं दे रहे. आप उन्हें हमारे सामने प्रस्तुत करें और अपने प्रश्नों के उत्तर लेकर उन्हें फिर से जीवन देने की फॉरमेलिटी पूरी करें ताकि मैं जल पी सकूँ, उन्हें भी पिला सकूँ और माताश्री के लिए भी ले जा सकूँ."

धर्मराज युधिष्ठिर की बात सुनकर एक सिक्यूरिटी गार्ड ने उन्हें सारी बातें बताई कि कैसे उनके सभी भाई अरेस्ट हो चुके हैं और यह कि बिना मुद्रा दिए उस तालाब से पानी लेना कानूनन जुर्म है. धर्मराज वहाँ से चल दिए. किसी वकील की तलाश में ताकि भाइयों की बेल करवाई जा सके.

Wednesday, March 2, 2011

हम मार्च मना रहे हैं




मार्च आ ही गया. आता कैसे नहीं? इतने लोग़ मार्च का इंतज़ार करते हैं कि उसे आना ही पड़ता है. खुशहाली न आये तो क्या मार्च भी नहीं आएगा? पूरे साल में हमारे लिए इससे ज्यादा महत्वपूर्ण कोई और महीना भी तो नहीं. बहुत कम लोग़ होते हैं जिनके लिए साल के सारे महीने एक जैसे होते हैं. जैसे विजय माल्या ज़ी. उनके द्वारा छपवाया जाने वाला कैलेण्डर साल के हर महीने को उनके लिए महत्वपूर्ण बना देता है. बाकी लोगों के लिए सबसे महत्वपूर्ण मार्च ही है.

बड़ा इंतजार करते हैं लोग़ तब जाकर मार्च आता है. वैसे यही लोग़ जहाँ एक तरफ इंतजार करते हैं वहीँ दूसरी तरफ इस बात से भी हलकान हुए रहते हैं कि मार्च आने से प्रेशर बढ़ गया है. मार्च में ऐसे लोगों को देखकर लगता है जैसे इन्होने पूरे साल काम ही नहीं किया. वैसे कुछ लोगों को मार्च का फायदा भी रहता है. ये ऐसे लोग होते हैं जो मार्च के सहारे आफिस के अलावा बाकी और कोई काम नहीं करते. इनके लिए मार्च का महीना संजीवनी की तरह होता है.

ऐसे लोगों को अगर रिश्तेदार बुला लें तो ये जवाब देते हैं; "अभी नहीं. मार्च तक तो बात ही मत कीजिये. आफिस में बहुत प्रेशर है. मार्च ख़तम हो जाए तो आते हैं आपके घर." कोई रिश्तेदार इनके घर पर आना चाहे तो वहाँ भी वही बात; "हैं हैं..आप आयेंगे भी तो संध्या और बच्चे तो मिलेंगे घर में हम नहीं मिल पायेंगे. इसलिए बस यही मार्च जाने दीजिये उसके बाद आईयेगा."

ऐसे कहेंगे जैसे मार्च ने आकर घर में डेरा डाल रखा है और इनके घर आनेवाले रिश्तेदार के बैठने तक की जगह नहीं है.

पत्नी कहेगी; "सुनो, माँ आना चाहती थी" तो जवाब मिलेगा; "क्या करती हो? अरे समझाओ अपनी माँ को. यही मार्च जाने दो उसके बाद आने के लिए बोलो."

ये लोग़ एक तारीख से ही कहना शुरू कर देते हैं; "नहीं-नहीं, अभी मार्च तक तो कोई बात ही मत करो. जो कुछ भी है, मार्च के बाद देखेंगे. अभी मार्च तक बहुत प्रेशर है."

मंहगाई का प्रेशर, बच्चों की पढ़ाई का प्रेशर, दोस्तों द्वारा खिंचाई का प्रेशर वगैरह उतने विकट नहीं होते जितना मार्च का प्रेशर होता है.

ऐसा नहीं है कि पहले वर्ष के महीने परेशान नहीं करते थे. पहले भी करते थे. लेकिन तब हमपर ग्लोबलाईजेशन का असर नहीं था. लिहाजा तब हिन्दी महीने परेशान करते थे. सिनेमा के गाने याद कीजिये, पता चलेगा कि हीरो-हीरोइन हिन्दी महीने में परेशान रहते थे. इनलोगों को पहले सावन बहुत परेशान करता था. लगभग हर फ़िल्म में एक गाना होता था जिसमें सावन का जिक्र होता था.

दरअसल तब का ज़माना ग्लोबलाईजेशन वाला नहीं था. लिहाजा हीरोइन हिन्दी महीने में परेशान रहती थी और उसी के सहारे बढ़िया संगीतमय गाने बहुत मीठी आवाज़ में गाती थी. बरसात के मौसम में हीरोइन पानी में भीगते हुए सावन के सहारे कोई गीत गाती या फिर बसंत ऋतु में फागुन के सहारे. लेकिन आज के हीरो-हीरोइन चूंकि हिंदी महीनों को भाव नहीं देते इसलिए अब दोनों ज्यादातर मार्च महीने में परेशान रहते हैं.

याद कीजिये सावन में हीरोइन का वह गीत; "तेरी दो टकिया की नौकरी और मेरा लाखों का सावन जाए."

अब इस तरह का गाना सुनाई देता है कहीं? ना. अब हीरो की सैलरी बढ़ गई है. अब उसको लाखों रुपये सैलरी मिलती है. अब हाल यह है कि नौकरी लाखों की हो गई है और सावन दो टके का भी नहीं रहा. आज बड़ी से बड़ी हीरोइन के बस की बात नहीं कि वह गाना गा दे कि; "तेरी दो टकिया की नौकरी मेरा लाखों का सावन जाय ".

एक बार ट्राई करके देख ले. एक बार भी ऐसा गाना गा दे तो हीरो ज्वालामुखी की तरह फट पडेगा; "क्या दो टकिया? दो टकिया की नौकरी होती तो खाने के लाले पड़ जाते. आटा का भाव देखा है? खाने के तेल और दाल का भाव पता है कुछ? प्याज तीस रूपये किलो बिक रही है. वैसे भी तुमको कैसे पता रहेगा? शापिंग मॉल में जींस और टी शर्ट खरीदने से फुरसत मिले तब तो आटा और दाल का भाव पता चले. और सुनो, दो टकिया की नौकरी होती तो ये मलेशिया और पट्टाया की छुट्टियाँ कहाँ से आती?"

अब इस तरह की बातों से डर कर कौन हीरोइन ऐसा गाना गाएगी? उल्टा अब ख़ुद हीरोइन कहती फिरती है; "ह्वाट अ टेरीबल मंथ, दिस सावन इज..वन कांट इवेन ड्रेस प्रोपेर्ली...वही कचरा वही बरसात..बाहर निकलना भी मुश्किल रहता है."

अब तो हालत ये है कि हीरो आफिस से रात को एक बजे घर पहुंचता है तो हीरोइन पड़ोसन को सुनाती है; "क्या बतायें. कल तो ये रात के एक बजे घर आए. मार्च चल रहा है न."

सुनकर लगता है जैसे मार्च महीने में पूरे तीस दिन बॉस का आफिस में काम ही नहीं है और मार्च ही बॉस बन बैठा है. हाथ पकड़कर उसने हीरो को यह कहते हुए बैठा रखा है कि ; "खबरदार एक बजे से पहले कुर्सी से उठे तो."

हीरो की भी चांदी है. आफिस में बैठे-बैठे काम करे या ट्वीट करे, किसे पता? लेकिन चाहे जो भी करे उसे मार्च का अन-कंडीशनल सपोर्ट है. सुबह के तीन बजे भी घर पहुंचेगा तो मार्च है रक्षा करने के लिए. कार्पोरेट वर्ल्ड में सारे पाप और पुण्य यही मार्च करवाता है.

मार्च महीने में घर से निकल जायें तो यही लगता है कि पूरा भारत मार्च मना रहा है. रिक्शेवाला जल्दी में रहता है. बसवाला जल्दी में रहता है. टैक्सीवाला तक जल्दी में रहता है. सभी तेज चलाते हैं. सभी भागे जाते हैं. हिम्मत नहीं होती कि उनसे कह दें कि भाई साहब आहिस्ता चलिए, हमें घर तक पहुंचना है. मन में बात आये तो भी यह डर रहता है कि ये लोग़ पलटकर यह न कह दें; "आपको मालूम नहीं, मार्च महीना चल रहा है. सबकुछ तेजी से होना चाहिए. आप आफिस में काम नहीं करते क्या?"

रास्ते में लोगों की बातें सुनिए. आते-जाते कोई न कोई यह कहते हुए सुनाई देगा ही कि; "बड़ी प्रॉब्लम है. उधर चुन्नू की परीक्षा चल रही है लेकिन मार्च के कारण उसको भी टाइम नहीं दे पा रहे हैं.' या फिर; "अब बस बीस दिन का खेला है उसके बाद अप्रैल से थोड़ा आराम मिलेगा."

लोग़ आफिस में टारगेट बना रहे हैं. टारगेट अचीव कर रहे हैं. जो टारगेट अचीव नहीं कर रहे हैं वे मीटिंग कर रहे हैं. मीटिंग करके यह तय कर रहे हैं कि कल फिर से मीटिंग करेंगे. जो मीटिंग नहीं कर पा रहे हैं वे काम कर ले रहे हैं. जो काम भी नहीं कर पा रहे हैं वे सोच रहे हैं. जो सोच नहीं रहे हैं वे सोचने की एक्टिंग कर रहे हैं. हर कोई व्यस्त है. हर कोई पस्त है. हर कोई मार्च मना रहा है और मार्च भी बेचारा है कि मन रहा है.

लोग़ टैक्स प्लानिंग कर रहे हैं. जो टैक्स प्लानिंग नहीं कर रहे हैं वे उसे करने के बारे में विचार कर रहे हैं. जो विचार नहीं कर रहे हैं वे प्रचार कर रहे हैं. बिल बनाये जा रहे हैं. बिल कैंसल किये जा रहे हैं. एडवांस टैक्स कैलकुलेट किये जा रहे हैं. फिर कैलकुलेशन ध्वस्त किये जा रहे हैं. फिर से कैलकुलेट किये जा रहे हैं. सरकारी विभाग के अफसर अपने विभाग के बजट को खर्च करने के लिए हलकान हुए जा रहे हैं. टेंडर फ़ाइनल किये जा रहे हैं. टेंडर कैंसल किये जा रहे हैं.

उधर इनकम टैक्स के रिटर्न बन रहे हैं तो इधर फ़ाइल हो रहे हैं. रिटर्न बनाने बैठ रहे हैं तो पता चल रहा है कि बैंक स्टेटमेंट गायब हैं. चिट्ठी लिखी जा रही हैं. चिट्ठी पढ़ी जा रही है. आते-जाते सड़कों पर टाइपराइटर चलाने वाले खट-पिट किये जा रहे हैं. कहीं बैलेंस शीट बन रही हैं तो कहीं रिटर्न बन रहा है.

अद्भुत गति से काम हो रहा है. इतना काम अगर साल के हर महीने में हो हम सारी दुनियाँ की प्रोडकटिविटी की बैंड बजाकर रख दें. चीन वाले रेस छोड़कर भाग जायें और अमेरिका वाले वाकओवर दे दें. लेकिन ऐसा नहीं हो सकता क्योंकि मार्च के बाद अप्रैल आ जाता है और हमें निकम्मा बना जाता है.

हमारे देश में निकम्मेपन के लिए साल के ग्यारह महीने जिम्मेदार हैं. यह एक मौलिक रिसर्च है जिसके लिए अगर मुझे नोबल मिल भी जाएगा तो मैं लेने से मना नहीं करूँगा.

वैसे मार्च आया है तो जाएगा भी. परमानेंटली रहने के लिए कौन आया है इस धरती पर? उसके चले जाने के बाद कुछ लोग़ निराश भी हो जायेंगे. जो लोग निराश होंगे वे इसलिए निराश होंगे कि मार्च का नाम लेकर देर रात तक घर से बाहर नहीं रह सकेंगे. लेकिन उन्हें ज्यादा परेशान होने की जरूरत नहीं. समय देखते देखते कट जाता है. मार्च अगले मार्च में फिर आएगा.

Monday, December 13, 2010

चंदू-राडिया संवाद




लगता है टेप्स बनानेवाली कोई कंपनी जल्द ही नीरा राडिया को अपना ब्रांड एम्बेसेडर नियुक्त कर लेगी. दरअसल नीरा ज़ी केवल टेप बनानेवाली ही नहीं बल्कि किसी टेलिकॉम कंपनी द्वारा भी चुनी जा सकती हैं. वैसे कहीं आप यह तो नहीं सोच रहे कि एक पी आर वाली ने अपने पी आर का काम मुझे तो नहीं सौंप दिया? खैर, इससे पहले कि आप ऐसा सोचें, मैं खुद ही बता देता हूँ कि ऐसी बात नहीं है. नीरा ज़ी के आठ सौ और टेप्स के बाहर आने की वजह से मैं ऐसा कह रहा था. वैसे इसका एक और कारण है.

कल अपना चंदू यानि चंदू चौरसिया मेरे पास आया. आकर कुछ देर खड़ा रहा. जब उसने कुछ नहीं कहा तो मुझे ही बात शुरू करनी पड़ी. मैंने कहा; "क्या बात है? कुछ कहना चाहते हो क्या?"

चंदू बोला; "हाँ, लेकिन हिम्मत नहीं हो रही."

मैंने कहा; "मेरे सामने कुछ कहने के लिए हिम्मत की क्या ज़रुरत? जो भी मन में है, बस कह डालो."

वो बोला; "तो सुनिए. इससे पहले कि आपको दूसरों से पता चले मैं खुद ही बता देता हूँ कि नीरा राडिया ज़ी से मेरी भी बात हुई है. ऐसा नहीं है कि केवल वीर, बरखा, इंदरजीत और प्रभु चावला के साथ ही उन्होंने बात की है. दरअसल नए टेप्स में जो बासठ नंबर टेप है और जिसके बारे में आऊटलुक ने यह कहा है कि नीरा के साथ दूसरी तरफ से कौन बात कर रहा है, यह आवाज़ कोई नहीं पहचान सका, दरअसल वह मैं ही हूँ."

मैंने कहा; "क्या बात कर रहे हो? वैसे क्या बातचीत हुई है तुम्हारी नीरा राडिया के साथ?"

वो बोला; "अब ये रहा लिंक. आप खुद ही सुन लीजिये."

मैंने क्लिक करके नीरा और चंदू की बातचीत सुनी. मैं अपने ब्लॉग पर वह बातचीत छाप रहा हूँ. आपलोग़ भी बांचिये.

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किर्र किर्र किर्र किर्र किर्र किर्र किर्र

नीरा : हाय.

चंदू : नमस्ते मैडम.

नीरा : ये हमस्ते हैडम क्यों कह रहे हो?

चंदू : नहीं-नहीं मैंने वह नहीं कहा. मैंने कहा नमस्ते मैडम.

नीरा : हाँ, अब तुम्हारी आवाज़ ठीक से आ रही है.

चंदू : वो आपका फ़ोन आया तो मैं दाल-भात खा रहा है. मुँह में खाना था इसलिए आपको हमस्ते हैडम सुनाई दिया होगा.

नीरा : ही ही ही ..वैसे मैंने बीस मिनट पहले भी फ़ोन किया था. कितनी घंटी बजी लेकिन तुमने उठाया ही नहीं.

चंदू : वो मैडम क्या है कि उस समय चूल्हे पर दाल पक रही थी. उसकी आवाज़ में टेलीफोन की घन्टी सुनाई नहीं दी होगी.

नीरा : क्या बात कर रहे हो? तुम खुद खाना बनाते हो?

चंदू : अरे मैडम मैं ठहरा हिंदी का पत्रकार. मैं वीर भाई की तरह थोड़े न हूँ कि दिल्ली के फाइव स्टार रेस्टोरेंट में घूम घूम कर खाना खाऊं और छ महीने बाद किसी सन्डे को चालीस पेज का एक सप्लिमेंटरी एडिशन निकाल कर उन रेस्टोरेंट की रैंकिंग कर दूँ. खाना का खाना और हाई क्वालिटी जर्नलिज्म अलग से.

नीरा : लेकिन वो भी तो जर्नलिज्म ही है.

चंदू : अब वो कैसा जर्नलिज्म है मैडम, उसपर मेरा मुँह मत खुलवाइये.

नीरा : खैर, मैंने तुमको यह बताने के लिए फ़ोन किया था कि कल रात ढाई बजे मेरी एम एम से बात हुई.

चंदू : क्या मैडम? ये ढाई बजे टाइम है किसी के साथ बात करने का? आपलोग सोते कब हैं?

नीरा : वो सब छोड़ो, और जो मैं कह रही हूँ उसको सुनो. एम एम तुमसे नाराज़ हैं.

चंदू : क्यों नाराज़ हैं मैडम?

नीरा : अरे नाराज़ नहीं होंगे तो क्या होंगे? ये तुमने क्या स्टोरी लिखी है? और स्टोरी का टाइटिल भी कितना गन्दा; "ये गैस किसकी है?" एम एम ने कहा कि द होल स्टोरी वाज स्टिंकिंग..."

चंदू : अब मैडम गैस की बात है स्टोरी में इसलिए उनको स्टिंकिंग लग रही होगी. वैसे वे किस बात से नाराज़ हैं?

नीरा : अरे नाराज़ होनेवाली बात ही है. तुमने लिखा कि..एक मिनट मेरे सामने ही है वो पेज. मैं पढ़कर सुनाती हूँ..हाँ, तुमने लिखा है; "बड़ा भाई इस बात से स्योर था कि गैस उसकी है लेकिन छोटा भाई अचानक दावा करने लगा है कि गैस उसकी है. अब यह गैस किसकी है, यह तो सुप्रीम कोर्ट ही बता पायेगा. लेकिन जिस गैस पर बड़े भाई का अधिकार है उसी गैस पर छोटा भई अपना अधिकार कैसे बता सकता है? अब यहाँ तो बड़ा भाई कह ही सकता है कि छोटा भाई अपनी गैस खुद खोज ले. मेरी समझ में यह नहीं आता कि छोटा भाई अपनी गैस खुद प्रोड्यूस न करके बड़े भाई की गैस के पीछे क्यों पड़ा है?..." और ये क्या है? ये क्या है? जिस तरह से तुमने स्टोरी ख़त्म की है..ये क्या लिखा है तुमने कि; "युद्ध के मैदान में सेनायें आमने-सामने हैं. अब देखनेवाली बात यह है कि युद्ध का शंख बजता है या शांति की मुरली?'' क्या है ये?

चंदू : इसमें गड़बड़ क्या है मैडम?

नीरा : एम एम इस बात से नाराज़ हैं कि तुम अपनी स्टोरी में पेट्रोलियम मिनिस्टर का नाम क्यों ले आये?

चंदू : पेट्रोलियम मिनिस्टर? मैंने तो अपनी स्टोरी में उनका नाम ही नहीं लिया?

नीरा : तो वो क्या है? वो मुरली?

चंदू : अरे मैडम वो मुरली की बात पर कन्फ्यूज मत होइए. वो तो उपमा अलंकार का प्रयोग है रिपोर्टिंग में.

नीरा : ये उपमा अलंकार क्या लफड़ा है?

चंदू : अब मैडम हम हिन्दी वालों की यही समस्या है. हम कैरीड-अवे हो कर पत्रकारिता में भी साहित्य रचने लगते हैं. दरअसल मैडम हिंदी का लेखक हो या पत्रकार वो बेसिकली फिलोस्फर होता है. न्यूज आर्टिकिल लिखते-लिखते कब उसके कलम से दर्शनशास्त्र का झरना फूट पड़े कोई कह नहीं सकता. खैर, यह सब जाने दीजिये. आप कहें तो मैं कल ही एक क्लेरिफिकेशन पब्लिश कर दूंगा कि मुरली शब्द का इस्तेमाल पेट्रोलियम मिनिस्टर के लिए नहीं है. आगे बोलिए.

नीरा : आगे क्या बोलूँ? वो मैंने तुमसे कहा था टूज़ी पर एक स्टोरी लिखने के लिए. उसमें भी तुमने ये क्या कर डाला? मैंने तुमसे टूजी पर लिखने को कहा और तुमने टाइटिल दे डाली "टु ज़ी विद लव" और उसमें दिल्ली यूनिवसिटी की उन स्टुडेंट्स का स्टेटमेंट्स छाप दिया जिन्हें राहुल गाँधी और उनके डिम्पल क्यूट लगते हैं और जो उनके साथ शादी करने का सपना देखती हैं. मैंने तुमसे क्या करने को कहा और तुमने क्या कर दिया.

चंदू : अरे ये तो भारी ब्लंडर हो गया. मैंने सोचा कि टूज़ी का मतलब आप चाहती हैं कि मैं बारी-बारी से दोनों गाँधी पर एक-एक स्टोरी कर दूँ. इसीलिए मैंने पहले राहुल गाँधी पर की और सोचा कि मैडम के उप्पर...

नीरा : तुमको पता है न कि उन लोगों का पी आर अकाउंट मैं मैनेज नहीं करती. फिर भी इतनी बड़ी बेवकूफी कर दी तुमने. और हाँ, वो मैंने कहा था कि दादरी पॉवर प्लांट पर स्टोरी लिखो कि वहाँ के किसान अपनी ज़मीन वापस चाहते हैं. ये पॉवर प्लांट नहीं आ सकता अब. और तुमने अभी तक वो स्टोरी नहीं की...

चंदू : अरे मैडम वो स्टोरी मैं कैसे करता? मैं दादरी गया तो वहाँ मैंने देखा कि वहाँ किसान मस्त हैं. उन्हें ज़मीन की कीमत जो मिली है उससे वे मस्त हैं और वही पैसा कमोडिटी मार्केट में लगा रहे हैं और लॉस जनरेट कर रहे हैं. ऊपर से कई किसान कह रहे थे कि अगर प्लांट वाले और ज़मीन ले लेते तो...

नीरा : किसने तुमसे कहा दादरी जाने के लिए? दिल्ली में रहकर स्टोरी लिखी जाती है कि दादरी जाकर? कैसे पत्रकार हो तुम? दिल्ली में रहकर स्टोरी किखने लायक नहीं हो तो जर्नलिज्म में तुम्हारा फ्यूचर कुछ नहीं है.

चंदू : छोड़िये मैडम. हमारी आपकी नहीं पट सकती. वैसे भी अब मैं प्रिंट मीडिया छोड़कर वेब मीडिया में जा रहा हूँ. मेरी एक ब्लॉगर से बात हो गई है. मैं उसको ज्वाइन कर रहा हूँ. ये दलाली करें लायक नहीं हूँ मैं.

नीरा : अरे सुनो तो....

पी पी पी की आवाज़ आ रही थी. टेलीफोन कट हो चुका था.

चंदू ने मेरी तरफ देखा और कुछ नहीं कहा. तुरंत वहाँ से उठ और चल दिया. कह कर गया है कि....



नोट: टेप नंबर सतहत्तर में भी इन्ही दोनों की बातचीत है. उसे छापने पर भी विचार किया जा रहा है:-)

Friday, October 15, 2010

रीयल इन्टरनल ऑडिट रिपोर्ट




ब्लागिंग के सबसे महत्वपूर्ण अलिखित सिद्धांत के अनुसार ब्लॉगर एक अति सजग प्राणी होता है. लेकिन यह सजगता इसलिए नहीं कि तन कर बैठे हैं कि अपने पास सांप, बिच्छू, मच्छर वगैरह को नहीं फटकने देंगे. वह तो इसलिए रहती है कि हमेशा सजग रहने से कहीं से भी पोस्ट बन सकती है.

एक ब्लॉगर को और क्या चाहिए? एक नई पोस्ट.

पिछले ५-६ दिनों से एक अस्पताल में हूँ. आते-जाते, उठते-बैठते यही सोचते रहते है कि कहाँ से एक अदद पोस्ट निकल सकती है? और रहना भी चाहिए. एक ब्लॉगर के लिए एक नई पोस्ट नारायण के सामान है. किस वेश में नारायण मिल जाएँ, कौन जानता है?

कभी-कभी मन में यह भी आता है कि; "यार आदमी हो या ब्लॉगर?"

हाँ तो मैं हॉस्पिटल की बात कर रहा था. हॉस्पिटल के सबसे बड़े डॉक्टर और मालिक के आफिस में बैठा था. टेबिल पर उनके नाम आये तमाम निमंत्रण पत्र, क्रेडिट कार्ड स्टेटमेंट, पत्रिका में छपी उनकी तस्वीरें, इधर-उधर बिखरे पड़े थे. ध्यान चला ही जाता है. पहले ऐसा केवल ऑडिट करने की पुरानी आदत की वजह से था लेकिन अब ब्लागिंग की वजह से है. खैर, ध्यान गया तो देखा कि इन सब चीजों के अलावा वहीँ पर एक मोटा चिट्ठा रखा था. उत्सुकता वस खोल लिया.
पिछले सप्ताह की हॉस्पिटल की इन्टरनल ऑडिट रिपोर्ट थी. पहली बार मन में आया कि इसे पढ़ना पाप है. इसलिए नहीं पढ़ा. डॉक्टर साहब से मुलाकात करने के लिए जैसे-जैसे इंतज़ार बढ़ता जाता वैसे-वैसे गुस्सा आता. अंत में सोचा कि कुछ न कुछ तो पढ़ना होगा नहीं तो इतनी देर तक यहाँ बैठेंगे कैसे? समय कैसे कटेगा? काफी उधेड़-बुन के बाद मन में विचार आया कि जब पढ़ना ही है तो उनके क्रेडिट कार्ड स्टेटमेंट को नहीं पढ़कर यह इन्टरनल ऑडिट रिपोर्ट ही पढ़ डालूँ.

उलट-पलट कर सरसरी निगाह डाली. पता चला कि यह तो ब्लॉग पोस्ट का मैटेरियल है. जितना पढ़ा था उसका अनुवाद छाप रहा हूँ. आपलोग भी पढ़िए.



रीयल इन्टरनल ऑडिट रिपोर्ट फॉर द पीरियड फ्रॉम फोर्थ ऑफ अक्टूबर टू टेंथ ऑफ अक्टूबर.

गिवेन अंडर द सील ऑफ मिस्टर अशोक दीवान, हेड, इन्टरनल ऑडिट डिपार्टमेंट


कार्डियेक डिपार्टमेंट

तमाम डिपार्टमेंटल रेकॉर्ड्स की जांच करने के बाद हम रिपोर्ट करते हैं कि डॉक्टर कौल ने बाहर से आये एक मरीज को ईको की सही रीडिंग बता दी. सात अक्टूबर को जिस मरीज के ग्रैडिएंट की रीडिंग डॉक्टर माखन लाल ने एक सौ सात और तिरासी बताई थी उसी मरीज की रीडिंग को दूसरे ही दिन डॉक्टर कौल ने केवल चौरासी और पैतालीस बताई. पहली बार ईको करते हुए डॉक्टर माखन लाल ने एक सौ सात की रीडिंग बताकर उस मरीज को डराकर ऑपरेशन के लिए राजी कर लिया था लेकिन जब डॉक्टर कौल ने उसे अपनी रीडिंग बताई तो मरीज यह कहकर हॉस्पिटल छोड़ गया कि उसे अभी ऑपरेशन की ज़रुरत नहीं है. डॉक्टर कौल की इस हरकत से हॉस्पिटल को पूरे साढ़े तीन लाख रूपये का नुक्सान हो गया.

कुछ मरीज बड़े घाघ होते हैं. यह मरीज भी घाघ टाइप ही था. काफी रिसर्च करने के बाद हम इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि गूगल ने सुई से लेकर हार्ट प्रोंबलम्स तक पर विकिपीडिया का निर्माण कर डाला है. ऐसे में कुछ मरीजों को हर चीज की जानकारी रहती है. वह वीकीपीडिया घोंटकर और यू-ट्यूब पर हर तरह की सर्जरी के विडियो देखकर ही हॉस्पिटल में प्रवेश करता है.

ऐसे में हर डिपार्टमेंट के डॉक्टरों के बीच को-आर्डिनेशन की बहुत ज़रुरत है.

ऑडिट रिपोर्ट्स ऑन असिस्टेंट्स डाक्टर्स टू डॉक्टर रेहान

पिछले सप्ताह लिए गए सी सी टीवी फूटेज देखकर हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि डॉक्टर बोस अपनी एक्टिंग क्षमता को और निखारने पर ध्यान नहीं दे रहे हैं. तमाम मरीजों के साथ उनकी बातचीत की सी सी टीवी फूटेज को देखने के बाद हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि उन्हें अपनी एक्टिंग क्षमता को जल्द से जल्द निखारने पर ध्यान देना चाहिए. मरीजों की ईको रिपोर्ट, ब्लड रिपोर्ट, एक्स-रे वगैरह देखते हुए वे केवल तीन-चार तरह की मुख-मुद्राएं (बोले तो फेसियल एक्सप्रेशन) बनाकर ही मरीज को डराते हैं. रिपोर्ट देखते समय उनके माथे पर केवल दो बल पड़ते हैं. वे केवल एक तरह से ही मुँह बिचकाते हैं. ऐसा करने से मरीज के पूरी तरह से डरने के चांसेज कम रहते हैं. हम मैनेजमेंट को सलाह देते हैं कि डॉक्टर बोस को जल्द से जल्द रोशन तनेजा के एक्टिंग स्कूल में भेजा जाय ताकि वे मरीजों को डराने के और फेसियल एक्श्प्रेसन सीख पाएं.

अगर इसपर ध्यान नहीं दिया गया तो आनेवाले दिनों में मरीजों को सर्जरी के लिए राजी करने के लिए तमाम मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा.

बिलिंग डिपार्टमेंट

पिछले सप्ताह बिलिंग डिपार्टमेंट में मरीजों और उनके घरवालों की तरफ से कुल आठ शिकायतें मिलीं. आठ में सात शिकायतें एक्स्ट्रा बिलिंग को लेकर की गईं थीं. यह एक नॉर्मल रूटीन है. इन शिकायतों को ज्यादा महत्व देने की ज़रुरत नहीं है. हाँ जिस शिकायत को महत्व देने की ज़रुरत है वह इस बारे में है कि ऑपरेशन थियेटर में एक मरीज को छोटे से ऑपरेशन जिसमें केवल पंद्रह मिनट लगते हैं उसके लिए कुल एक सौ चौदह इंजेक्शन का बिल बना दिया गया. कान के इस ऑपरेशन के लिए एक सौ चौदह इंजेक्शन कुछ ज्यादा ही है. बिलिंग करते समय इस बात का ध्यान दिया जाना चाहिए ऐसा कुछ न लिखा जाय जिससे मरीज के घर वाले बिलिंग डिपार्टमेंट में गाली-गलौज शुरू कर दें.

इस तरह की तू-तू मैं-मैं वहाँ उपस्थित प्रोस्पेक्टिव कस्टमर के ऊपर गलत असर डालती हैं.

फिनांस डिपार्टमेंट

पिछले सप्ताह फिनांस डिपार्टमेंट ने बाहर से आये एक मरीज से मानवता के नाते चेक से पेमेंट लेने के लिए हामी भर दी. हालाँकि चेक 'ऐट पार' था और उसी दिन हॉस्पिटल के अकाउंट में क्रेडिट भी हो गया लेकिन मानवता के नाते मरीजों को इस तरह की छूट देना ठीक नहीं है. मरीजों की आदत खराब होते देर नहीं लगेगी. तमाम रेकॉर्ड्स देखने के बाद हम रिपोर्ट करते हैं कि इस चेक से पेमेंट एक्सेप्ट करने से पहले मरीज से केवल एक लेटर लिखवाया गया. अगर तीन-चार बार उसे इधर से उधर दौड़ाया गया होता तो हारकर कहीं न कहीं से कैश का इंतजाम करके कैश ही जमा करता.

हमारी सलाह है कि आगे से इस तरह की हरकतों को बढ़ावा नहीं दिया जाना चाहिए.

कैफेटेरिया एंड फ़ूड स्टेशन

हमारी सलाह पर ही हॉस्पिटल के अन्दर हाल ही में तीसरा कैफेटेरिया खुला जिसमें थाई और चायनीज फ़ूड मिलता है. हमरे डिपार्टमेंट का शुरू से ही मानना है कि हॉस्पिटल बिजनेस का असली फॉरवर्ड इंटीग्रेशन फ़ूड स्टेशन और कैफेटेरिया ही हो सकता है. ऐसे में हाल ही में अरब देशों से आनेवाले मरीजों की बढ़ती संख्या को देखते हुए हम रेकमेंड करते हैं कि हॉस्पिटल मैनेजमेंट यमनी, सउदी और ईरानी फ़ूड के लिए एक अलग फ़ूड स्टेशन खोले. वैसे तो नए फ़ूड स्टेशन के लिए ढाई एकड़ ज़मीन की जरूरत है लेकिन सरकार बावन एकड़ ज़मीन देने के लिए तैयार है. हमें सरकार द्वारा दी जाने वाली ज़मीन ले लेनी चाहिए. आगे यह ज़मीन और किसी काम आ सकती है.

कार पार्किंग

पिछले सप्ताह का काम देखने वाली एजेंसी ने पार्किंग से होनेवाले इनकम पर कमीशन बढ़ाने के लिए एक बार फिर से मैनेजमेंट को पत्र लिखा है. हमारी सलाह है कि मैनेजमेंट अब कार पार्किंग का बिजनेस आउटसोर्स न करके खुद ही करे. ऐसा करने से कंपनी को करीब बासठ करोड़ का एडीशनल रेवेन्यू मिलेगा.

न्यू एवेन्यू ऑफ रेवेन्यू

शुरुआत में हॉस्पिटल मैनेजमेंट ने बाहर से आनेवाले मरीजों के रिश्तेदारों को ठहराने के लिए गेस्ट हाउस सर्विस चला रखा था. बाद में उसे यह कहकर बंद कर दिया गया कि उस बिजनेस को हॉस्पिटल के बिजनेस के साथ कन्वर्ज करने में मुश्किलें आ रही थीं. पिछले सप्ताह हॉस्पिटल के इन्क्वाइरी काउंटर पर गेस्ट हाउस के लिए कुल तेरह सौ बासठ इन्क्वाइरी आई. वैसे तो हम पहले भी कह चुके हैं लेकिन एक बार फिर से सलाह देते हैं कि मैनेजमेंट गेस्ट हाउस बिजनेस को फिर से शुरू करने के बारे में विचार करे. ऐसा करने से करीब बत्तीस करोड़ .....

पढ़ ही रहा था कि अन्दर से किसी ने पुकारा; 'हंजी, कलकत्ते से जो आये हैं....."

इतना सुनकर रिपोर्ट को छोड़ देना पड़ा. दो मिनट बाद ही डॉक्टर रुपी भगवान के सामने थे.....

Friday, January 16, 2009

पूरा माहौल ही 'बेल आऊटीय' हो जायेगा...




कभी नाव गाड़ी पर और कभी गाड़ी नाव पर. गाड़ी नाव का ये खेल सदियों से होता आया है. सदियों पहले लोगों ने नाव बनाई होगी तो यही सोचकर कि ये गाड़ी को पार उतारेगी. और गाड़ी बनाई होगी तो भी यही सोचकर कि ये नाव को पानी में उतारेगी.

अभी जुलाई की बात है. सरकार को कौन बेलआउट करेगा और कौन आउट करेगा इसको लेकर क्या-क्या नहीं किया गया. कयास, प्रयास से लेकर उपवास तक. सरकार आउट नहीं हुई क्योंकि उसने अपने लिए नया बोर्ड गढ़ लिया था. अमर सिंह मैनेजिंग डायरेक्टर और मुलायम सिंह डायरेक्टर. बोर्ड के तीसरे मेंबर थे कैश.

अब ऐसा सॉलिड कम्बीनेशन और कहाँ मिलेगा? लिहाजा सरकार आउट नहीं हुई. तीन तिलंगे, मतलब अमर सिंह, मुलायम सिंह और कैश ने मिलकर सरकार को बचा लिया.

नहीं-नहीं कैश का मतलब मजनू नहीं. वो तो ख़ुद नहीं बच सके, सरकार को क्या बचायेंगे?

सरकार को बेलआउट मिल गया तो सरकार इस पोजीशन में आ गई कि दूसरों को बेल आउट कर सके. हवाई जहाज चलाने वाले फंस गए? बेल आउट कर दो. रीयल एस्टेट वाले फंस गए? बेल आउट कर दो. एक्सपोर्टर जी फंस गए? चिंता काहे का? हम हैं ना बेल आउट आउट करने के लिए.

आउट होने के कगार पर पहुँचने से पहले किसानों को बेल आउट किया ही जा चुका था.

सत्यम को उसके प्रोमोटर ने फंसा दिया तो क्या हुआ? उसे भी बेल आउट कर दो. वो तो नए बोर्ड में ढंग के लोग हैं, बोलकर सरकार का बेल आउट करने का प्रोग्राम बरबाद हो गया.

सत्यम को बेल आउट करने की घोषणा करके सरकार कितनी खुश हुई होगी. लेकिन सत्यम के नए बोर्ड ने बेल आउट लेने से मनाकर दिया. लगा जैसे सरकार निराश हो गई. ये सोचते हुए कि; "कैसे लोग हैं? यहाँ हम बेल आउट करने के लिए तैयार बैठे थे. ये लोग इतना निराश कर देंगे, नहीं पता था."

तिरपन हज़ार कर्मचारियों और उनके परिवार का 'आशीर्वाद' पक्का करने की कोशिश नाकाम कर दिया.

बेल आउट का ये मौसम खिचेंगा. काहे न खिंचे? चुनावी सालों में इन और आउट का खेल तो पहले होता था. एक ही खेल कितने दिन चलेगा? सरकार के साथ-साथ वोटर भी बोर हो जाता है. आख़िर कुछ तो नया हो. ऐसे में इन और आउट से आगे बढ़कर बेल आउट खोज लिया गया.

कभी-कभी लगता है जैसे सरकार और उसके मंत्री बेल आउट करने के लिए अकबकाये से कंपनी और सेक्टर खोज रहे हैं. रोज सरकार के मंत्री घर से निकल कर सड़क पर आ जाते हैं और लोगों को रोक-रोक कर पूछते हैं; "बेल आउट चाहिए?"

सामने वाला अगर ना कह देता होगा तो निराश हो जाते होंगे. फिर खोज पर निकल जाते होंगे.

सरकार की ये हालत देखकर लग रहा है जैसे चुनाव तक मंत्रियों के परफॉर्मेंस का पैमाना बेल आउट ही होगा. कौन सा मंत्री बेल आउट के लिए कितने केस लाया?

देखेंगे कि वित्त मंत्रालय के अफसर होम लोन से लेकर पर्सनल लोन लेने वालों को बेल आउट करते हुए दिखेंगे. हो सकता है कोई अफसर रतीराम जी तक को बेल आउट करने के लिए रोज उनके दूकान के चक्कर लगता हुआ दिखे. अगर रतीराम जी को बेल आउट की ज़रूरत नहीं है तो उनके ऊपर प्रेशर तक दे सकता है. आपको बेल आउट लेना ही पड़ेगा. कैसे नहीं लेंगे? अगर नहीं लिया तो हम आपको देख लेंगे.

अफसर रतीराम जी को बेल आउट करने पर पूरी तरह से उतारू हो जायेगा.

चुनावी भाषण में बेल आउट का ही जिक्र होगा. प्रधानमंत्री कहेंगे; "हमने जनवरी महीने में कुल चार लाख किराना स्टोर्स को बेल आउट पैकेज दिया. आपको ये जानकर खुशी होगी कि हमारे मंत्रियों ने बेल आउट के लिए दिन-रात एक कर दिया. आजतक किसी सरकार ने इस तरह से बेल आउट कार्यक्रम नहीं चलाया."

पूरा माहौल ही 'बेल आऊटीय' हो जायेगा. जनता कहलाने वाले लोग एक-दूसरे से पूछेंगे; "तुम्हें बेल आउट मिला कि नहीं?"

दूसरा बोलेगा; "हमने तो तीन बेल आउट एन्जॉय किया. तुम्हें कितना मिला?"

मंदी के इस दौर में कहीं तो तेजी दिखेगी. कुछ तो बढ़ेगा. घोटाला करने वाले उद्योगपति बेल मांगेंगे और सरकार बेल आउट करने के लिए सेक्टर और कंपनियों को खोजेगी.

Saturday, January 10, 2009

उद्योगपति फनिल डुबवानी की डायरी - तारीख ०७.०१.२००९




आज आई टी कंपनी चलाने का नाटक करने वाला और रीयल में रीयल इस्टेट कंपनी चलाने वाला एक उद्योगपति कन्फेशनल मोड में आ गया. उसके इस मोड में आने का नतीजा ये हुआ कि लोगों का विश्वास उसकी कंपनी से उठ गया. लोगों के विश्वास उठने का नतीजा ये हुआ कि उसकी कंपनी के शेयर के दाम ज़मीन पर आ गए. शेयर के दाम ज़मीन पर आने का नतीजा ये हुआ कि कोई उन शेयरों को ज़मीन से भी उठाने के लिए तैयार नहीं है.

कौन झुके मिट्टी उठाने के लिए?

नया खिलाड़ी था, इसलिए पकड़ा गया. मैं कहता हूँ पाप करो तो उसे पचाने की हैसियत रखो. अगर पाप को दबा नहीं सकते तो उद्योगपति कहलाने में शर्म आनी चाहिए. वैसे फिर सोचता हूँ कि ये भी ठीक है कि बेचारा ऐसी हैसियत कहाँ से लाता? बेचारे के पिताजी किसान थे. हमारे पिता की तरह थोड़े न थे जो हमें सबकुछ सिखा कर स्वर्ग सिधारे.

हमारे पिताजी ने तो यहाँ तक सिखाया कि 'पब्लिक डोमेन' में लड़ाई कैसे करनी है. इसके पिताजी कैसे सिखाते? सारा जीवन तो किसानी में काट दिया.

एक ही घोटाला करने पर पकड़ लिए जाते हैं ये लोग. क्या उद्योग चलाएंगे ऐसे लोग? ऐसे लोगों को उद्योगपति कहलाने में शर्म आनी चाहिए.

मैं तो कहता हूँ कि उद्योग चलाने की काबिलियत का इम्तिहान होना चाहिए. इम्तिहान लेने वाले जबतक इस बात से स्योर नहीं हो जाते कि उद्योगपति पाँच हज़ार करोड़ के कम से कम पाँच घोटाले करके निकल सकता है, उसे शेयर मार्केट से पैसा उगाहने का लाईसेंस मिलना ही नहीं चाहिए.

हमें देखो. आजतक केवल शेयर मार्केट में ही घोटाला नहीं किया. डुप्लीकेट शेयर सर्टिफिकेट की ट्रेडिंग करवा दी लेकिन मजाल किसी की जो पकड़ ले? रक्षा मंत्रालय के क्लासीफाईड डाक्यूमेंट हमारे आफिस से मिले लेकिन मजाल किसी की है जो हमें फंसा दे. अभी हाल ही में दो घंटे के लिए मीडिया में न्यूज़ दिखाई दी कि मैंने कंपनी के काम के लिए जो लोन लिया था, उसे हीरा व्यापारियों के थ्रू मार्केट में लगवाया ताकि मेरी कंपनी के शेयर के दाम बढ़ सकें. लेकिन मजाल किसी की जो मुझे फंसा दे.

वहीँ ये दो कौडी का उद्योगपति केवल पाँच हज़ार करोड़ रुपया खाकर फंस गया. लानत है. और फ़िर फंसता कैसे नहीं? मैं कहता हूँ कि कंपनी तुम्हारी है तो कंपनी के शेयर भी तुम्हारे पास रखो. कम से कम चालीस परसेंट तो रखो. पागल आदमी था. आठ परसेंट रखकर उसे भी प्लेज करने चला गया. आठ परसेंट शेयर रखकर सेंट परसेंट कैश लोगे तो कैसे चलेगा?

ऐसे पागलों की वजह से ही लोग भारतीय उद्योगपतियों को लोग शक की निगाह से देखने लगे हैं. ऐसी छोटी-छोटी घटनाओं से बाहर के लोग ये सोचते हैं कि भारतीय उद्योगपति घोटाले करके उसे पचाने की हैसियत खोते जा रहे हैं. लेकिन सच में ऐसा नहीं है. जबतक हमारे जैसे पुराने और अनुभवी उद्योगपति हैं, पाचन शक्ति का विकास होता रहेगा.

असल में मामले में इसलिए पकड़ा गया क्योंकि आधे से ज्यादा शेयर कैपिटल दस-पन्द्रह लोगों में ही था. हमें देखो, पिछले साल हमने शेयर मार्केट से पैसा उगाहा. लाखों लोगों से तीन-तीन हज़ार लेकर कितने हज़ार करोड़ रुपया ले लिया. किसी को महसूस तक नहीं हुआ. किसे होगा? तीन-तीन हज़ार इन्वेस्ट करने वाले तीन हज़ार के लिए आँसू थोड़े न बहायेंगे. आंसू तो वे लोग बहायेंगे जिनका हजारों करोड़ लगा हुआ है. बस बेचारा इसी में मारा गया.

मुझे तो लगता है कि इसका मीडिया ट्रायल करके ही दफनाने की कवायद शुरू हो गयी है. वैसे सच कहूं तो आज की तारीख में मीडिया ही सबकुछ है. वही पुलिस, वही वकील, वही जज और वही सरकार. अच्छा किया जो मैंने मीडिया में पैसा लगाया.

सोच रहा हूँ इसकी कंपनी के सारे शेयर खरीद लूँ. बाद में साबित कर दूँगा कि आई टी कंपनी का कैश निकालकर ही इसने रीयल इस्टेट कंपनी खड़ी की है. अगर सरकार के लोगों से हिसाब बैठ गया तो रीयल इस्टेट कंपनी अपनी हो जायेगी. और फिर सरकार के लोगों से हिसाब कैसे नहीं बैठेगा? सारी ज़िन्दगी हिसाब बैठाने में ही खर्च कर दी. ऐसे में भी हिसाब नहीं बैठेगा तो लोग मुझपर लानत भेजेंगे.

आईडिया अच्छा है. अभी तो मेरे मित्र पार्टी के लिए लोकसभा उम्मीदवार घोषित कर रहे हैं. उन्हें समय मिले तो तो हिसाब बैठाने का काम शुरू करता हूँ.

नोट:

डायरी का ये पेज मैंने खास तौर पर इसलिए लिखा है ताकि मेरा बेटा आज से बीस साल बाद जब इस पेज को देखे तो उसे अपने पिता पर गर्व हो. साथ में उसे अपने पिता की हैसियत का अंदाजा भी लगे.

Thursday, September 18, 2008

हम असली क्रांतिकारी हैं.....असली




कितना बड़ा होना चाहते हैं आप? लीमैन ब्रदर्स जितना? मोर्गन स्टैनली जितना, या फिर एआईजी जितना? डेवू जितनी बड़ी कंपनी या फिर जीई जितनी बड़ी? अमेरिका और सोवियत संघ जितना बड़ा होना चाहते हैं?

- ठीक है, बड़े होना चाहते हैं, हो जाएँ. लेकिन आपके इस बड़प्पन की कीमत? वो कौन देगा?

- हमारे बड़े होने की कीमत दूसरे अदा करेंगे मित्र. दूसरों के पैसे से बड़ा बनना एक कला है. हम तो दूसरों के पैसे से बड़े बने हैं तो ज़ाहिर सी बात है, दूसरे ही देंगे. दूसरे ही डूबेंगे. हमने ही तो आपके उर्दू शायर से ये लिखवाया था; "हम तो डूबेंगे सनम, तुमको भी ले डूबेंगे."

- लेकिन ये डूबने की नौबत अचानक काहे मित्र?

- क्या करें मित्र? हम भारी जो हो गए हैं. भारी चीजें कहाँ तैर पाती हैं ज्यादा देर तक? टाइटैनिक भी तो तैरने के लिए बना था लेकिन वही भारीपन आड़े आ गया उसके भी. डूबा गया बेचारा.

- तो बड़ा बनते समय भारी हो जाने की बात मन में नहीं आई?

- तुच्छ सवाल न करें मित्र. आप छोटे हैं तो आपको बड़े होने के आनंद का पता कैसे चलेगा? कितना गहन आनंद मिलता है बड़े होने में, वो आप जैसे तुच्छ की समझ में नहीं आएगा.

- लेकिन फैलते समय सीमा भी तय कर लेते?

- असीम होने में जो आनंद है वो सीमा तय करने से कहाँ मिलेगा मित्र? वैसे भी आपकी समझ में नहीं आएगा. आएगा भी कैसे? आपके भारतवर्ष का जीडीपी जितना है, उतना तो हमने लोन ले रखा है.

- और लोन को अपनी कमाई मान लिया होगा?

- कमाई नहीं माना था मित्र. लेकिन अब लग रहा है कि कमाई ही तो थी. वैसे भी आप केवल हमें ऐसी बात क्यों सुना रहे हैं? आपके यहाँ जो किसान आत्महत्या कर रहे हैं, उन्होंने भी यही किया था जो हमने किया?

- आप इतने बड़े होकर ख़ुद की तुलना हमारे किसानों से कर रहे हैं? ये उचित नहीं है मित्र.

- क्यों? क्यों उचित नहीं लग रहा है आपको? आपके किसान भी तो लोन लेकर ही बड़े बनने चले थे. वे मर रहे हैं, वैसे ही हम भी मर रहे हैं. अरे मित्र कर्ज लेकर घी पीयेंगे तो पेंचिस होनी ही है. और ज्यादा पेंचिस से मौत हो ही जाती है.

- आप केवल ख़ुद ही मरिये न मित्र. कौन मना करेगा आपको मरने से? लेकिन ये अपने साथ दूसरों को लिए जा रहे हैं, ये कहाँ तक जायज है?

- अब भारी-भरकम चीज अगल-बगल से गुजरेगी तो आस-पास की चीजों को समेटते जायेगी. वैसे भी हमने अपने गुर सारी दुनियाँ को सिखा दिया है. आपके देश की कंपनियों को ही देख लें. वो भी तो बड़ी हो रही हैं.

- सही कहा मित्र. सिखा तो दिया ही है. लोन लेकर हमारी कम्पनियाँ भी तो बड़े होने की दौड़ में शामिल हैं.

- वही बात मित्र. हम तो डूबेंगे सनम वाली बात.

- लेकिन सनम मानते हैं आप बाकियों को?

- सनम तो बनाना ही पड़ेगा मित्र. नहीं तो सनम की जान कैसे लेंगे?

- वैसे मित्र, एक बात बताएं. आपलोग पूरी दुनियाँ को कहते हैं कि आपके रेगुलेशन सबसे अच्छे, आपका रिस्क मैनेजमेंट सबसे अच्छा, आपकी अकाऊंटिंग पॉलिसी सबसे अच्छी, आप सबसे अच्छे. फिर ऐसे में ये अनर्थ क्योंकर भला?

- वो तो ईमेज बनाने की बात है मित्र. ईमेज ही तो सबकुछ है.

- वैसे एक बात कहूँ मित्र?

- कौन सी बात? ठीक है कहिये.

- आपलोगों को कितने ही लोग साम्राज्यवादी मानते थे. लेकिन ऐसा पहली बार देखा है कि साम्राज्यवादियों ने उनकी देश की सरकार को समाजवादी बनने पर मजबूर कर दिया.

- आपकी बात समझे नहीं. सन्दर्भ क्या है?

- सन्दर्भ वही है मित्र, जो आपकी सरकार ने किया. मेरा मतलब सरकार ने एआईजी को ले लिया, वो भी पैसा देकर. आपलोगों से ऐसी बात की कल्पना किसी ने नहीं की होगी.

- अब देखिये मित्र, कल्पना तो इस बात की भी किसी ने नहीं की होगी कि डेढ़ सौ साल पुराने बैंक डूब जायेंगे. हम तो हमेशा अकल्पनीय ही करने की फिराक में रहते हैं.

- तो जो कुछ भी हुआ उसके बारे में और क्या कहना चाहेंगे मित्र?

- अब कहने के लिए बचा ही क्या है मित्र? लेकिन आप जिद करते हैं तो हम भी कह देते हैं. तो सुनिए मित्र;

"समाजवादी अगर समाजवाद ले आए तो उसे क्रान्ति नहीं कहते. असली क्रान्ति तो तब होती है जब साम्राज्यवादी समाजवाद ले आए. हम असली क्रांतिकारी हैं मित्र.....हम असली क्रांतिकारी हैं."

Friday, March 7, 2008

चेयरमैन फैक्ट्री विजिट पर हैं




"अरे, ये तो फिर आ धमके" एक असिस्टेंट जनरल मैनेजर उदास होते हुए बोला.

"हाँ सर, अभी बीस दिन ही तो हुए थे, जब बाबू पिछली बार आए थे. फिर अचानक कैसे पधारे. कुछ प्राब्लम है क्या?" उनके पीए ने पूछा.

"अरे प्राब्लम-वाब्लम कुछ नहीं है. काम धंधा कोई है नहीं. घर वालों ने परेशान होने से मना कर दिया होगा तो इम्प्लाई लोगों को परेशान करने आ पहुंचे", असिस्टेंट जनरल मैनेजर ने कहा.

बात इतनी सी थी कि चेयरमैन एक ही महीने में दुबारा आ धमके थे. आस्सी साल उमर हो गई है. इनकी परेशानी ये है कि इन्हें कोई परेशानी नहीं है. सफारी पहनकर चंदन लगाकर जब-तब फैक्ट्री विजिट पर पहुँच जाते हैं. जब तक हेड आफिस में रहते हैं तो भी इन्हें कोई काम नहीं रहता. लेकिन सबको दिखाते हैं कि बहुत काम करते हैं. रात के आठ-आठ बजे तक आफिस में बैठे रहते हैं ताकि कोई कर्मचारी अपने घर ठीक समय पर नहीं जा सके. अब चेयरमैन आफिस में बैठा रहेगा तो कर्मचारी आफिस से निकलकर घर जायेगा भी कैसे.

आज फैक्ट्री विजिट पर आ धमके हैं. आते ही पाण्डेय जी को तलब किया. पाण्डेय जी सबेरे से ही साहब के साथ हैं. साहब इधर-उधर और न जाने किधर-किधर की बातों से पाण्डेय जी को बोर कर रहे हैं. पाण्डेय जी भी क्या करें कुछ नहीं कर सकते. साहब की बातें सुनकर अन्दर ही अन्दर खिसिया रहे हैं. साहब आए तो हैं फैक्ट्री विजिट पर लेकिन जायजा ले रहे हैं मन्दिर के खर्चे का.

"अच्छा पाण्डेय जी, मन्दिर में जो पूजा होती है उसमे एक दिन में कितना लड्डू लगता है?" चेयरमैन साहब ने पूछा.

"सर, तीन किलो लगता है एक दिन की पूजा पर", पाण्डेय जी ने बताया.

"लेकिन पिछले साल तो दो किलो में हो जाता था न. फिर ये तीन किलो?" चेयरमैन साहब लड्डू की मात्रा को लेकर चिंतित लग रहे हैं.

"सर, वो क्या है कि लोगों को जब पता चला कि पूजा में प्रसाद के लिए लड्डू का इस्तेमाल होता है तो ज्यादा लोग आने लगे"; पाण्डेय जी ने लड्डू के ज्यादा खपत होने का कारण बतात हुए कहा.

"लेकिन ये तो ठीक बात नहीं है. शेयरहोल्डर्स को एजीएम में जवाब तो मुझे देना पड़ता है न. ऊपर से ज्यादा लोग आते हैं पूजा में तो आफिस के काम का नुकसान भी होता होगा. एक काम कीजिये, कल से पूजा के प्रसाद में बताशा मंगाईये. इसके दो फायदे होंगे. एक तो खर्चा कम होगा और दूसरा लोग भी कम आयेंगे"; बाबू ने हिदायत दे डाली.

पाण्डेय जी ने उनकी बात सुनकर मन ही मन अपना माथा पीट लिया. ये सोचते हुए कि 'देखो कैसा इंसान है. जब परचेज का नकली बिल बनवाकर कम्पनी से कैश निकालता है तो शेयरहोल्डर्स की चिंता नहीं सताती इसे लेकिन प्रसाद में दो की जगह तीन किलो लड्डू आ जाए तो शेयरहोल्डर्स का बहाना करता है.'

अभी पाण्डेय जी सोच ही रहे थे कि बाबू ने कहा; " क्या सोच रहे हैं पाण्डेय जी? देखिये बूँद-बूँद से ही सागर बनता है. मुझे ही देखिये, इस उमर में भी बारह घंटे काम करता हूँ. आज मूंगफली भी खाता हूँ तो ख़ुद ही अपने हाथ से तोड़कर. आज भी रात के आठ बजे तक आफिस में बैठता हूँ. बोलिए, है कि नहीं?"

पाण्डेय जी क्या करते. हाँ करना ही पडा. भले ही मन में सोच रहे थे कि 'आफिस में बैठकर तुम करते ही क्या हो? माडर्न मैनेजमेंट की एक भी टेक्निक मालूम है तुम्हें? आफिस में बैठे-बैठे केवल कर्मचारियों को सताते हो तुम. मेरी ही हालत देखो न. इंजीनीयरिंग की पढाई की. बाद में एमबीए भी किया. दोनों कालेज में किसी गुरु ने यह नहीं पढ़ाया कि चेयरमैन जब फैक्ट्री विजिट पर आकर मन्दिर में होने वाले पूजा और प्रसाद के बारे में पूछेंगे तो उन्हें कैसे जवाब दिया जाय. मैं एक इंजिनियर. तुम्हारी कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट हूँ लेकिन दिन बुरे चल रहे हैं तो पूजा के खर्च पर बात करनी पड़ रही है.'

यह सोचते-सोचते पाण्डेय जी को अचानक ध्यान आया कि लंच का टाइम हो गया है. उन्होंने कहा; "सर लंच का समय हो गया है. चलिए लंच कर लीजिये."

पाण्डेय जी की बात सुनकर 'बाबू' बोले; "अरे, आपको तो बताना भूल ही गया. आजकल मैं लंच में केवल चना और गुड खाता हूँ. हमारे गुरुदेव ने खाना खाने से मना किया है."

उनकी बात सुनकर पाण्डेय जी का कलेजा मुंह को आ गया. सोचकर परेशान हो गए कि ऐसे वक्त में चना और गुड कहाँ से लायें? थोड़ी देर का समय लेकर फौरन गेस्ट हाऊस की तरफ़ दौड़े. पूछने पर पता चला कि चना मिलना तो बहुत मुश्किल है और गुड मिलना उससे भी कठिन. लेकिन पाण्डेय जी भी ठहरे मैनेजर. उन्हें मालूम था कि फैक्ट्री से थोड़ी दूर ही देसी शराब की दुकान है जहाँ फैक्ट्री के वर्कर्स थकान मिटाते हैं. वहाँ पर प्यून को भेजकर चना मंगवाया गया. लेकिन गुड का इंतजाम नहीं हो सका. चार प्यून दौडाये गए बाज़ार में गुड खोजने के लिए. करीब एक घंटे के बाद गुड भी मिल ही गया.

चेयरमैन साहब चना और गुड प्लेट में सजाये बैठे हैं. बात करते-करते एक चना मुंह रख लेते हैं.

पाण्डेय जी सोच रहे हैं; 'भगवान दया करो और इस आदमी को आज ही यहाँ से रवाना करो.'

आख़िर छोटे-मोटे पद का कोई कर्मचारी होता तो उसे पाण्डेय जी ख़ुद ही रवाना कर देते लेकिन ये तो ठहरे चेयरमैन. और चेयरमैन से बड़े केवल भगवान होते हैं.

पुनश्च:

सालों पहले एक कंपनी की ऑडिट करने फैक्ट्री में गया था. उसी समय चेयरमैन आए हुए थे. उस समय तो ब्लॉग लिखता नहीं था कि ये पोस्ट लिख मारता. लेकिन कल मैंने किसी को फ़ोन किया तो वे बड़े बिजी थे लिहाजा बात नहीं कर सके. केवल इतना बताया कि चेयरमैन फैक्ट्री विजिट पर आए हैं सो बाद में बात करूंगा.

Friday, February 29, 2008

कल की बातें और आज की बात




कल की बातें.

एनालिस्ट परेशान है. तीन घंटे हो गए, शूट को मैच करते हुए टाई नहीं मिल रही. कल बजट है न.

टीवी कैमरामैन वित्तमंत्री के अलग-अलग विडियो इकठ्ठा करने में लगा है. कल बजट है न.

वित्तमंत्री थिरु वेल्लूर की कविता संग्रह से कविता छांटने में लगे हैं. कल बजट है न.

भारत कहाँ तक फैला है और इंडिया कहाँ तक, इसकी खोज हो रही है. कल बजट है न.

स्टॉक ब्रोकर को पलंग पर लेटे हुए चार घंटे हो गए लेकिन नींद नहीं आ रही है. कल बजट है न.

प्रधानमंत्री वित्तमंत्री की प्रशंसा करते हुए भाषण लिख रहे हैं. कल बजट है न.

रूलिंग पार्टी के एमपी मेज थपथपाने की प्रैक्टिस कर रहे हैं. कल बजट है न.

मिसेज शर्मा आज ही फ्रिज खरीद लाईं. कल बजट है न.

विपक्षी पार्टी के एमपी चिल्ला कर संसद की कार्यवाई रोकने की प्रैक्टिस कर रहे हैं. कल बजट है न.

उद्योगपति वित्तमंत्री को नंबर देने की प्रैक्टिस कर रहे हैं. कल बजट है न.

लोकसभा के स्पीकर 'लाऊडस्पीकर' होने की प्रैक्टिस कर रहे हैं. कल बजट है न.

आज की बात

बजट आया और चला गया. निराश न हों, एक साल बाद फिर से आएगा.

Saturday, December 1, 2007

साहब, एक छापा मार दो न, प्लीज!






कहते हैं शेयर बाज़ार मानव-मन की दो भावनाओं से चलता है. एक है लालच और दूसरा है डर. किसी निवेशक के मन में अगर इन दो भावों की उपस्थिति उचित अनुपात में है तो वह बाज़ार से पैसा कमा सकता है. लेकिन अगर अनुपात ग़लत हुए तो पैसे खोने का चांस बढ़ जाता है. उदाहरण के तौर पर रिलायंस पेट्रोलियम के शेयर के दाम में पिछले महीने आई उछाल को देखिये.

'आम निवेशकों' के मन में ये बात भर दी गई कि इस कम्पनी के शेयर का दाम बढ़कर चार सौ रुपये तक हो जायेगा. ये ख़बर पूरे बाज़ार में तब फैलाई गई, जब इस कम्पनी के शेयर के दाम करीब २७५ रुपये तक पहुँच गए. बहुत सारे 'आम निवेशकों' ने इस शेयर में ये सोचकर पैसा लगाया कि चार सौ जाने पर बेंच कर मुनाफा कमा लेंगे. लालच बढ़ गया और डर कम हो गया था. कम्पनी के शेयर का दाम २९० रुपये तक जाकर वहाँ से लुढ़क गया. जब दाम २१० रुपये हो गया, तब रिलायंस के अम्बानी जी ने बताया कि उन्होंने अपनी इस कम्पनी के शेयर बाज़ार में बेंच दिए हैं. नतीजा ये हुआ कि शेयर का दाम २०० रुपये से भी कम हो गया.


सारा कुछ होने के बाद बाज़ार को रेगुलेट कराने वाली सेबी ने कहा कि वो इस कम्पनी के शेयर के दाम में होने वाले उछाल के बारे में जांच करेगी. सेबी की तरफ़ से किसी भी ऐसी जांच का नतीजा ये होता कि इस कम्पनी के शेयर के दाम घाट जाते, जैसा कि पहले बहुत सारी और कंपनियों के केस में देखा जा चुका था. लेकिन यहाँ हुआ ठीक उल्टा. रिलायंस पेट्रोलियम के शेयर के दाम बढ़ गए. जिन लोगों ने ये सोचकर शेयर बेंच दिए होंगे कि दाम घट जायेगा, उन्हें और नुकसान हुआ.


इस घटना से मेरे मन जो बात आई, वो मैं आपको बताता चलूँ :-

मुम्बई में डांस बार बंद कर दिए गए हैं. फिर भी आए दिन सुनने में आता है कि वहाँ फला बार में छापा पडा और लड़कियां बरामद हुईं. और ये कि वहाँ बार में डांस अब भी चलता था. मुझे लगता है कि इस तरह के छापे मारने के लिए बार के मालिक ख़ुद ही पुलिस से कहते होंगे. शायद पुलिस के पास जाकर कहते होंगे कि; "साहब कितने दिन हो गए, आपने छापा नहीं मारा. लोग मेरे बार को शक की निगाह से देखते हैं. आपस में खुसर-फुसर करते हैं कि यहाँ डांस अभी भी चलता है. आप एक बार छापा मार देते तो मैं निश्चिंत होकर धंधा करता."

बस, पुलिस छापा मारने निकल पड़ती होगी. छापा मार कार्यक्रम ख़त्म होने से बार के मालिक को कम से कम छः महीने आराम से डांस बार चलने का 'लाईसेन्स' मिल जाता होगा.

चलते-चलते:
कुछ दिन पहले मैंने सचिन तेंदुलकर के शतक न बनाने को लेकर देश भर के लोगों की चिंता पर एक पोस्ट लिखी थी. उसमें कुछ ज्योतिषियों द्वारा सुझाए गए टोटकों का भी जिक्र था. आप में से बहुत से लोगों ने उसपर टिपण्णी की थी. लेकिन बहुत दिनों बाद कल हरी ओम नामक सज्जन ने टिपण्णी की और मुझे बताया कि मेरी पोस्ट बहुत सेक्सी थी.


मैंने सोचा कि पहले मर्द औरत को सेक्सी कहते थे. हमने प्रगति कि और औरतों ने भी मर्दों को सेक्सी कहना शुरू किया. कालांतर में चीजों को भी सेक्सी कहा जाने लगा. इस उपमा से कारें, सड़कें, कपडे-लत्ते तक को सुशोभित होने का मौका मिला. अब लेख भी सेक्सी कहलाये जाने लगे हैं. मान गए फ्रायड को. तगड़े इंसान थे. नहीं?


Thursday, November 22, 2007

ब्रोकर, एनॉलिस्ट, आलोक पुरणिक और मैं







आलोक पुराणिक जी ने आज अपनी पोस्ट में मेरे पेशे के बारे में राज की बात बताई है -
जो समझ जाते हैं, वो नोट कमाते हैं। जो नोट नहीं कमा पाते हैं, वो शेयर बाजार एक्सपर्ट हो जाते हैं, और टीवी वगैरह पर बताने लगते हैं कि अईसे कमाओ या वैसे कमाओ।
यह पोस्ट पढ़ कर मैने वहां दन्न से तुकबन्दी में एक लम्बी टिप्पणी ठेल दी है। मुझे मालुम है कि तुकबन्दी अपनी तरंग जाहिर करने की सटीक विधा है। उस तरंग को आप इस पोस्ट में भी ग्रहण करें/झेलें:

एक ब्रोकर और एक एनालिस्ट

एक ब्रोकर और एक एनालिस्ट
साथ गए रेस कोर्स
एनालिस्ट था बुझा-बुझा
ब्रोकर में था गजब का फोर्स

रेस कोर्स पंहुचते ही
दस नम्बर के घोडे पर
ब्रोकर ने लगा दिया पैसा
एनालिस्ट से पूँछ बैठा;
तुम नहीं लगाओगे
एनालिस्ट बोला
हम तो पहले स्टडी करेंगे कि;
घोडे का पास्ट रेकॉर्ड्स है कैसा

ब्रोकर झल्लाया
एनालिस्ट को सुनाया
तुम बहुत कैलकुलेट करते हो
उसी के बेस पर
एनालिस्ट होने का दम भरते हो

रेस हुई
रिजल्ट आया
ब्रोकर का घोडा जीत गया
ब्रोकर ने बहुत पैसा कमाया

एनालिस्ट हैरान
ब्रोकर को देखकर परेशान
ब्रोकर से पूछ बैठा
अच्छा ये बताओ
इतने सारे घोडे थे
कुछ तो शक्तिमान दिखते थे
कुछ शक्ति में थोड़े थे
लेकिन ऐसा क्यों कि;
तुमने दस नम्बर के घोडे पर ही
पैसा लगाया
ये आईडिया कहाँ से आया

ब्रोकर बोला
मेरे दो बेटे हैं
एक छ साल का और
दूसरा तीन साल का
मैंने दोनों की उम्र को मिलाया
जो भी फिगर आया
उसी नंबर के घोडे पर
पैसा लगाया
तुम ख़ुद ही देख सकते हो
मैंने कितना माल कमाया

एनालिस्ट ब्रोकर की बुद्धि पर
पूरी तरह से रीझ गया
लेकिन मन ही मन
थोड़ा सा खीझ गया
बोला;
कैसी ख़राब गणित है तुम्हारी
छ और तीन तो नौ होते हैं
ये किस तरह से प्लस करते हो
ब्रोकर बोला
मैंने पहले ही कहा था
तुम कैलकुलेट बहुत करते हो