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Friday, February 13, 2009

हम खोपोली घूम आए....खंडाला, लोनावाला में डूबता सूरज






नाश्ता करते-करते बातचीत भी हुई. खाने या नाश्ते के टेबल पर बात करना एक निहायत ही बेसिक मानवीय गुण है. ड्राईंग रूम के सोफे पर बैठे हम टीवी देखते हैं. कहीं और भी साथ में बैठे रहें तो बातचीत नहीं करते लेकिन डायनिंग टेबल पर बैठे नहीं कि उसे कांफ्रेंस टेबल में बदल डालते हैं.

नीरज भइया ने हमसे पूछा कि वहां तक पहुँचने में कोई असुविधा तो नहीं हुई?

उनका यह प्रश्न सुनकर मुझे फ़िल्म शोले की याद आ गई. ठाकुर बलदेव सिंह जी ने जय और वीरू बाबू से यही सवाल किया था. हमें लगा कि ठाकुर साहब ने तो यह सवाल इसलिए किया था कि उन्होंने जय और वीरू जी को लेने किसी को स्टेशन नहीं भेजा था. लेकिन नीरज भइया ने अशफाक भाई को भेजा था. फ़िर ऐसा सवाल क्यों?

तभी मुझे अचानक लगा कि नीरज भइया ने यह सवाल मेजबान-धर्म का पालन करते हुए पूछा है. हमने मेहमान-धर्म का पालन न करते हुए उन्हें बताया कि कोई असुविधा नहीं हुई. आख़िर मेहमान धर्म का पालन क्यों करूं? मैं कोई मेहमान थोड़े न था.

मेहमान होता तो और कुछ नहीं तो यही कह देता कि; "एक असुविधा हुई. आपके ड्राईवर गाड़ी इतनी अच्छी चलाते हैं कि कोई तकलीफ ही नहीं होती."

आप पूछेंगे कि तकलीफ नहीं हुई तो इसमें कहाँ की असुविधा? तो मेहमान के रोल को निभाते हुए मेरा जवाब यह हो सकता है कि; "हमें तकलीफ में रहने की आदत पड़ी हुई है. ऐसे में तकलीफ नहीं होती तो हम बेचैन हो जाते हैं."

इसे कहते हैं प्रायोजित तकलीफ की सृष्टि.

शाम को नीरज भइया ने बताया कि खंडाला और लोनावाला जैसी मशहूर जगह खोपोली के पास ही है. कोई आठ- दस किलोमीटर दूर. उनके द्बारा दी गई इस सूचना ने हमारे लिए प्लीजेंट सरप्राइज की उत्पत्ति की. आख़िर हमें पता थोड़े न था कि हम इतनी प्रसिद्द जगहों के करीब हैं.

आपके मन में अगर सवाल हिचकोलें मार रहा हो कि खंडाला कौन तो हम यही कहेंगे कि; " अरे वही खंडाला जिसने अमीर खान की 'फेमसता' में चार चाँद लगा दिए थे. गायक बना दिया था....." ओह, ये वाकया नहीं मालूम? कोई बात नहीं. हम फिर से बताते हैं. अरे वही खंडाला जिस जगह पर फिल्मी सेठों के बंगले वगैरह हुआ करते हैं.

आशा है अब समझ गए होंगे. अगर अब भी नहीं समझे तो हमें थोड़ा समय दीजिये कि हम कोई और निशानी लेकर आयें....अच्छा, अच्छा..समझ गए? चलिए बढ़िया बात है.

वैसे खंडाला और लोनावाला के नज़दीक होने की इस सूचना के साथ-साथ उन्होंने हमें सनसेट देखने के लिए उकसाया. हम तुंरत उकस गए.

ये सनराइज और सनसेट का मामला भी अजीब है. जब तक अपने घर और शहर में रहते हैं, सनराइज, सनसेट से नाता वैसे ही टूटा रहता है जैसे पकिस्तान से डेमोक्रेसी का.

कितनों का नाता तो सन से ही टूटा रहता है. सनसनाकर सबेरे उठते ही आफिस जाने के लिए ऐसे लुढ़कते हैं कि कोई सन याद नहीं रहता. न ऊ वाला और न ई वाला.

लेकिन अपने शहर से बाहर हुए और दूसरे शहर में पहुंचे नहीं कि सनराइज की बात राइज हो जाती है. साथ में सनसेट की बात भी सेट-इन कर जाती है.

मेजबान से पूछना शुरू कर देते हैं; "अच्छा ये बताईये, आपके यहाँ सनराइज कब होता है?....अच्छा. सात बजे? और सनसेट?..अच्छा, अच्छा वो साढ़े छ बजे! हे हे हे... हमारे शहर में तो सन पहले ही राइज हो जाता है. इस मामले में हम लकी हैं. अरे भाई पूरब में जो रहते हैं."

सुनकर लगता है जैसे इनका शहर नहीं होता तो सन महाराज राइज ही न कर पाते. मेजबान अपना माथा ठोंक लेता है. ये सोचते हुए कि 'सन ने राइज और सेट किया. ऐसे में ये लकी कैसे हुए?'

खैर, सनसेट देखने के लिए हम लोनावाला की तरफ़ दौड़े. रास्ते में चक्कियों की दुकानें खूब दिखाई दीं. चक्की माने आटा वाली चक्की नहीं. चक्की माने एक मिठाई जो वहां की स्पेसिअलिटी है. एक ही नाम से कई दूकानें दिखीं.

एक ही नाम की कई दूकानों को देखकर मुझे कलकत्ते के प्रसिद्द सोना-चाँदी व्यापारी लख्खी बाबू की याद आ गई. जो लोग कलकत्ते में रहते हैं वे जानते हैं कि चौरंगी से भवानीपुर के बीच लक्खी बाबू के असली दूकान के नाम से कोई सौ दुकानें हैं. पता ही नहीं चलता कि असली कौन सी है.

देखकर लगता है कि अलीबाबा ने चोरों को कन्फ्यूज करने के लिए घरों पर निशान लगाने का आईडिया इन्ही दूकानों को देखकर उठाया था. दूकानों के नाम ऐसे कि पढ़ने वाला सोचता रह जाए कि दूकान असली है, सोना असली है या लक्खी बाबू असली हैं. दूकानों का नाम ही इसी तरह से लिखा होता है. कहीं लिखा रहता है; "लक्खी बाबू की असली सोना-चाँदी की दूकान"...कहीं लिखा रहता है; "असली लक्खी बाबू की सोना-चाँदी की दूकान"...कहीं लिखा रहता....

खैर आते है लोनावाला में.हम लोनावाला पहुंचे तो हमने महसूस किया कि सनसेट में अभी काफी समय बाकी है. नीरज भइया ने हमें बताया कि सहारा ग्रुप द्बारा तैयार किया गया प्रसिद्द 'नगर' ऐम्बी वैली भी नज़दीक ही है. हम ऐम्बी वैली देखने गए. सुना है वहां अजीत अगरकर और पार्थिव पटेल के भी फ्लैट हैं.

वहां पहुंचकर पता चला कि चूंकि हमने मुंबई आफिस से कोई पास नहीं लिया है इसलिए हमें अन्दर जाने की मनाही है. अब मनाही है तो है. क्या करते? लौट आए.

वैसे नीरज भइया से ऐम्बी वैली के बारे में सुनकर हमें लगा जैसे वहां के पहाड़, झीलें, जंगल और वहां का सबकुछ सरकार ने बड़े सस्ते में ही उद्योगपतियों को थमा दिया होगा. अगर भारत नदी, पहाड़, जंगलों वगैरह से मिलकर बना है तो निश्चित तौर पर भारत की बिक्री जारी है.

खैर, वापस लोनावाला के एक सनसेट पॉइंट पर आए. देखकर सोचने लगे कि सूरज अगर पहाड़ों के पीछे ही डूबता है तो पहाड़ तो उत्तर प्रदेश और झारखण्ड में भी हैं. फिर वहां कोई लोनावाला या खंडाला जैसी जगह क्यों नहीं बन सकी. क्या वहां के पहाड़ ऐसे हैं कि सूरज उनके पीछे डूबने के लिए राजी नहीं होता?

सनसेट पॉइंट पर लोगों का उत्साह देखकर निश्चिंत हो लिए कि लोनावाला के पहाड़ों के पीछे डूबने में सूरज को भी कोई गुरेज नहीं है. यही कारण था कि इतने सारे लोग जुटे थे. युवाओं की टोली थी. परिवार थे. साधु थे. सैलानी थे. बाहर से आए इनलोगों को संभालने के लिए वहां के दूकानदार थे.

पकौडियां तली जा रही थी. भुट्टे भुने जा रहे थे. चाय बन रही थी. चेहरे खिले हुए थे. मुंह के दांत बिजी थे. कैमरों से आवाज़ आ रही थी. पोज बनाये जा रहे थे. पोज ठीक किए जा रहे थे. मोबाइल फ़ोन का उपयोग बात करने के लिए बंद था. उनसे फोटो खीचे जा रहे थे. बीच-बीच में दाएं-बायें होने की हिदायत देती आवाजें सुनाई दे रही थीं.

एक परिवार के चार-पाँच लोग आए. परिवार के मालिक से दिखने वाले सज्जन उस जगह के वेटरन लगे. क्योंकि आते ही दूकानदारों से उनसे दुआ-सलाम किया. उनका पूरा परिवार सनसेट देखने के लिए सूरज की तरफ़ आँख लगाकर खड़ा हो गया और वे साहब कुर्सी पर सूरज की तरफ़ पीठ करके पकौडियां खाने लगे. उन्हें देखकर लगा कि आए तो परिवार की इच्छा से हैं. लेकिन सूरज को डूबते हुए देखने से उन्हें खासा कष्ट होता होगा इसलिए सूरज की तरफ़ पीठ करके पकौडियां खा रहे हैं.

नीरज भइया ने बताया कि वहां का भुट्टा बढ़िया होता है. हमने भुना भुट्टा खाने की कोशिश की. लेकिन भुट्टे में भरी मिठास ने हमें निराश कर दिया. हम तुंरत चाय पीने पर उतारू हो गए.

तीन-चार लोगों की एक टोली थी. उसमें से जिनके हाथ में कैमरा था वे अपने साथी को हिदायत दे रहे थे; "दोनों उँगलियों इस तरह से रखो कि सूरज दोनों के बीच दिखाई दे." उनका दावा था कि वे ऐसी तस्वीर खींचेंगे जिसे देखकर लगेगा कि उनके साथी ने सूरज को अपने दो उँगलियों में जकड़ रखा है.

उन्हें ऐसा करता देख मुझे पता नहीं क्यों हनुमान चालीसा की "लिल्योहि ताहि मधुर फल जानू..." वाली लाइन याद आ गई.

हमने भी सूरज को डूबते देखा. तसवीरें ली. कैमरे के साथ कलाकारी दिखाने की हमारी जितनी औकात थी, हमनें सब दिखा दी. आस-पास के लोगों के ऊपर हँसे. ये सोचते हुए कि वो बचकाना हरकतें कर रहा है. युवाओं की एक टोली हमारे पास ही थी. उनमें से अचानक दो हंसने लगे. हमें लगा कि वे भी हमें बचकाना हरकतें करने वाले समझते होंगे.

सूरज डूब गया तो लगा कि जैसे अब करने के लिए कुछ बचा ही नहीं. हम वापस चले आए.




नीरज भइया के साथ हम...

Tuesday, February 10, 2009

हम खोपोली घूम आए




पिछले दिनों हम खोपोली घूम आए. दूसरे शहर में जाने का यही फायदा होता है कि आदमी घूम लेता है. अपने शहर में रहने से बात-बात पर केवल दिमाग घूमता है. शहर-शहर का फरक है जी. खैर, घर में बताकर निकले कि मुंबई जा रहे हैं और पहुँच गए खोपोली.

आप अगर हिन्दी ब्लॉगर हैं तो ये सवाल तो नहिये पूछेंगे कि; "कौन खोपोली?"

और अगर हिन्दी ब्लॉगर होने के बावजूद आपने अपने मन के प्राईवेट सागर में इस सवाल का मंथन शुरू कर दिया हैं तो हम बता दें कि वही खोपोली जिसे हमारे नीरज भइया ने फेमस कर दिया है. जहाँ हमारे नीरज भइया रहते हैं. नीरज भइया के बारे में तो पता होगा ही.

नहीं?

क्या बात करते हैं? अरे नीरज भइया वही जिनके ब्लॉग पर विजय जी ने मिष्टी के ऊपर एक पूरी कविता लिख डाली. हाँ. अब समझे न. मिष्टी का नाम आते ही समझ गए. कभी-कभी लगता है जैसे नीरज भइया से ज्यादा तो आप मिष्टी के बारे में जानते हैं.

खोपोली जाने के अलावा और कोई चारा नहीं था. आख़िर क्यों नहीं जाते? पिछले दो वर्षों से खोपोली जाने के न जाने कितने प्लान बनाए और बिगाड़े. कई बार तो बनने से पहले पता चल जाता था कि ये प्लान तो पक्का बिगड़ेगा. हमारी इस बनाने-बिगाड़ने की प्रवृत्ति के ऊपर कई बार तो नीरज भइया सार्वजनिक कमेन्ट कर चुके हैं.
लेकिन उनके एकदम लेटेस्ट कमेन्ट ने हमें खोपोली जाने के लिए उकसा दिया.

और ब्लॉगर अगर एक बार उकस जाए तो फिर उसे कौन शांत कर सकता है? इसलिए उकसे हुए हम खोपोली जा पहुंचे.

मुंबई एअरपोर्ट से बाहर निकलकर हमने इधर-उधर निगाह डाली. जैसे पक्का कर लेना चाहते थे कि ये मुंबई ही है या फिर हवाई जहाज मुंबई के नाम पर कहीं और उतार गया? एअरपोर्ट के आस-पास ही पोस्टरों पर कई मुम्बईया नेताओं के दर्शन हो गए. मुंबई में नेताओं का बड़ा बोलबाला दिखा. वहां के लोग गोविंदा तक को नेता मानते हैं. ठीक वैसे ही जैसे लखनऊ के लोग संजय दत्त को नेता मानने के लिए कमर कसे हैं.

एक पोस्टर पर राज ठाकरे दिखे. उनके दर्शन करके मैं निश्चिंत हो लिया कि ये मुंबई ही है.

दूसरे शहरों में जाकर आदमी जो सबसे पहला काम करता है वो मैंने भी किया. मुंबई एअरपोर्ट को देखकर सबसे पहले हमने अपने शहर के एअरपोर्ट की खिचाई की. कैसा तो साफ़-सुथरा एअरपोर्ट है जी मुंबई का. और एक हमारे कलकत्ते का एअरपोर्ट. साफ़ तो है नहीं उल्टा पूरी तरह से सुथर गया है.

खैर, एअरपोर्ट पर हमें लेने के लिए नीरज भइया की गाड़ी खड़ी थी. गाड़ी के ड्राईवर भी वहीँ थे. अशफ़ाक नाम है उनका. बड़े शालीन बंदे. उन्होंने हमें पहचान लिया. हमने उनको. जान-पहचान पक्की हुई तो हम उनके साथ चल दिए. अशफाक भाई ने हमसे कुछ नहीं पूछा. हम बताने के लिए इंतजार करते ही रहे. कितने तो जवाब तैयार कर रखे थे हमने और अशफाक भाई ने कुछ पूछा ही नहीं. इन क्षणों में आदमी की दुर्गति हो जाती है.

खैर, मुंबई एअरपोर्ट से निकलकर शहर के सुपुर्द हुए तो हमें अपने शहर की खिचाई करने का मौका मिला. एक मुंबई है जहाँ सडकों पर जगह साइनबोर्ड पर तीर चलाकर बताया जाता है कि आप कौन सी जगह के लिए गमनरत हैं और एक हमारा शहर कलकत्ता, जिसमें ऐसी कोई साइनबोर्डीय व्यवस्था नहीं है.

हमने अपने मन में तय कर लिया कि मुंबई कलकत्ते से अच्छा शहर है.

खोपोली जाते हुए मुंबई-पुणे एक्सप्रेस हाई-वे के ऊपर चलने का अवसर प्राप्त हुआ. बढ़िया हाई-वे पर चलना तमाम नए काम करवाता है. जैसे गाड़ी की स्पीड देखकर हम राज्य सरकार की कार्य क्षमता को सराह सकते हैं. हमने सराहा भी.

साथ में अशफाक भाई की भी मन ही मन सराहना की. कार चलाने की उनकी क्षमता देखकर हम मन ही मन सोचते रहे कि अशफाक भाई खोपोली में क्या कर रहे हैं? इन्हें तो कहीं फार्मूला वन का ड्राईवर होना चाहिए था. बाद में खोपोली पंहुचकर पता चला कि नीरज भइया की कंपनी में काम करने वाले सभी ड्राईवर फार्मूला वन के ही ड्राईवर लगते हैं. नीरज भइया ने हमें बताया कि इस बात की पुष्टि विदेश से आए कंपनी के ग्राहक भी कर चुके हैं.

खैर, मुंबई-पुणे हाई-वे ने हमसे भी एक काम करवाया. हमने किया भी. उस हाई-वे पर चलकर हमें अपने प्रदेश की सरकार को गरियाने का सुअवसर प्राप्त हुआ. हमने अवसर का फायदा उठाया. ऐसा नहीं है कि सरकार वगैरह को गरियाने में हम पीछे रहते हैं. ना जी ना. उसे तो हम बहुत मन से गरियाते हैं. तल्लीन होकर. लेकिन अपने शहर में रहते हुए हम वहां की सडकों को देखकर अपने प्रदेश की सरकार को उतना नहीं गरिया पाते जितना किसी और प्रदेश की सड़क को देखकर गरियाते हैं.

ये ठीक वैसा ही है जैसे ढेरों भारतीय अपने देश में रहते हुए अमेरिका के ऊपर दूरदृष्टि डालकर वहां व्याप्त तमाम सुविधाओं को देखकर अपने देश को गरियाते हैं. इसी धरम का पालन करके एक्सप्रेस हाई-वे देखते हुए हमने भी अपने प्रदेश की सरकार को पेट भरकर गरियाया. इसे आप हमारी धर्मान्धता मान सकते हैं.

चूंकि सबेर-सबेरे उठकर मुंबई चले गए थे इसलिए भूख बहुत लगी थी. फ्लाईट में १२० रूपये का एक सैंडविच खाने के बावजूद भूख डटी रही. वो तो अच्छा हुआ कि हमें मुंबई-पुणे हाई-वे मिल गया नहीं तो ये भूख नहीं जाती. न न न. ऐसा न समझिये कि हम एक्सप्रेस हाई-वे का टुकडा खा गए और पेट भर गया. वो तो हाई-वे देखकर हमने अपने प्रदेश की गौरमेंट को इत्ता गरियाया कि पेट भर गया. उसके बाद भूख नहीं लगी.

गरियाने जैसा महान कार्य मंहगाई के इस मौसम में पेट भरने का बड़ा नायाब तरीका साबित हो सकता है. अब ये विद्वानों पर निर्भर करता है कि वे हमारे दिए गए लीड पर शोध शुरू करते हैं या फिर हमारे इस नैसेंट सिद्धांत को लीद मानकर रिजेक्ट कर देते हैं.

इस तरह से गरियाकर हम भरा पेट लेकर खोपोली जा पहुंचे. नीरज भइया के घर. अब चूंकि उनका घर मुंबई-पुणे एक्सप्रेस हाई-वे से एक किलोमीटर दूर है इसलिए हाई-वे छोड़कर उनके घर पहुँचने तक में हम फिर से भूख का शिकार हो गए. उन्हें शायद इस बात का अंदेशा था इसीलिए उन्होंने तुंरत नाश्ता बनवाया. हमने भी भूख-धर्म का निर्वाह करते हुए नाश्ते का संहार कर डाला.

...जारी रहेगा.

Friday, February 6, 2009

कांग्रेस (आय)




मुंबई गया था. वहां पोस्टर पर नेतागीरी खूब देखने को मिली. जगह-जगह पोस्टर देखकर लगा कि मुंबई शहर अब हादसों का शहर नहीं रहा. पोस्टरों का शहर हो लिया. आप कहीं खड़े हों और अपनी नज़र उठाकर ये देखने की कोशिश करें कि इस जगह का पता क्या है तो देखने के लिए आपको पता नहीं मिलेगा. हाँ, पोस्टर ज़रूर मिल जायेगा.

पोस्टर पर प्रधानमंत्री के फोटो के पास आपको लोकल गली-कूचा मंत्री के चेहरे के दर्शन हो जायेंगे. पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष के बगल आपको गणपति पूजा कमिटी के कोषाध्यक्ष दिखाई देंगे. मजे की बात यह कि वहां अंग्रेजी के शब्दों का हिन्दी-करण अनोखे ढंग से होता है.

एक पोस्टर पर निगाह गई. तमाम कांग्रेसियों के थोबड़े चिपके थे.राष्ट्रीय, 'अंतर्राष्ट्रीय', प्रदेशीय, क्षेत्रीय, गलीय, वगैरह.

पोस्टर पर कांग्रेस (आई) की जगह लिखा था, कांग्रेस (आय).

पढ़कर लगा कि पोस्टर लिखने वाले सचमुच बड़े अनुभवी होते हैं.