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Wednesday, October 12, 2016

हुआ सर्जिकल...







हुआ सर्जिकल
मिला हमें बल
भौंके नेता
उन्हें नहीं कल
सैनिक मरता
रक्षा करता
पर लीडर जो
पॉकेट भरता
जब भी बोले
शबद न तोले
राष्ट्र-वायु में
बस विष घोले
मुँह की बोली
गन की गोली
जिसने दाग़ी
उसकी हो ली
उधर है पप्पू
इधर है लप्पू
रेत का दरिया
चलता चप्पू
कथन नाव है
इक चुनाव है
उठता क़ुरता
दिखा ताव है
हरिशचंद्र है
बुद्धि मंद है
इक मीरजाफ़र
इक जयचंद है
टीवी चैनल
बड़का पैनल
बातें बहती
खुला ज्ञान-नल
इनका दावा
उनका लावा
एक दारा तो
एक रंधावा
अजब चाल है
बस बवाल है
सच्चाई की
खिंचे खाल है
रक्त-दलाली
उसने पा ली
मुझे चांस कब?
कॉफ़र ख़ाली
फ़िल्म धुरी है
ओम पुरी है
उधर फ़वाद तो
इधर उरी है
पाक़ी ऐक्टर
नारी या नर
साथी सच के
अल्ला से डर
हे नर जोहर
अति तो न कर
यह भारत ही
है तेरा घर
बीइंग ह्यूमन
खोल गया मन
किधर खड़ा है
देखें जन-जन
बी सी सी आइ
बिग ऐपल पाइ
मेरा हिस्सा;
मुझको दे भाइ
तुम हो फेकर
मैं हूँ चेकर
मैं जज भी हूँ
मैं ही क्रिकेटर
पुस्तक बल है
भारी छल है
डूबी औरत
गहरा जल है
सारे हैं नत
सबकुछ शरियत
जेंडर वाइस
मर्द हैं एकमत
धर्म बड़ा है
शेख अड़ा है
जो लोटा है
कहे; घड़ा है
यही जाप सब
घुले ताप सब
मिटे धरा के
आज पाप सब
इस नौ राता
दुर्गा माता
जोड़ें सबका
बुद्धि से नाता


Saturday, September 10, 2016

ट्विटर चरित्र




सेलेब, नेता,
औ अभिनेता,
बाक़ी जनता
सबकी क्षमता
ट्वीट बजायें
अपनी गायें
पानी आग
सब में राग
अजब प्रोफ़ाइल
मीटर माइल
टू-इन-वन है
भारी फन है
नर मादा है
कम ज़्यादा है
ट्रेंडवीर हैं
पर अधीर है
पालक-बालक
पार्टी चालक
हैशटैग है
कैशबैग है
म्यूट ब्लॉक है
अजब क्लॉक है
आउटरेजित
हरदम ब्लेज़ित
बहस रेल की
और खेल की
आपटार्ड की
राशनकार्ड की
यहाँ बिहारी
वहाँ पहाड़ी
इधर का रिक्शा
उधर की गाड़ी
फ़ोटोशॉपर
ज़रा नहीं डर
लिंकित मन है
क्विंटल टन है
पानी-दाना
हाँ हाँ ना ना
इल्लॉजिक है
पर ब्लू-टिक है
सेक्युलर कम्यूनल
मिले नहीं कल
बहते हैं नल
गहरा दलदल
भारी डेटा
बेटी-बेटा
सीएम पीएम
मेसेज डीएम
कर एक्स्पोज़े
उत्तर खोजे
राष्ट्रवाद है
पर विवाद है
सभी सख़्त हैं
टार्ड भक्त है
बेटा-माँ हैं
संजय झा है
सच सवाल है
मगर ट्रोल है
लेम जोक है
अजब ब्लोक है
आरटी दे दो
मेन्शन ले लो
उड़ता तीर
ले ले वीर
मारो स्लाई
लो रिप्लाई
बायो पढ़ लो
छवियाँ गढ़ लो
पिक-एनलार्ज
करता चार्ज
फ़्रेंड ज़ोन
फ़ॉरएवर अलोन
सॉलिड कंधा
रजनीगंधा
नेता फ़ैन
लड़ाए नैन
खाने की पिक
देती है किक
भाषा क्लिश्टम
ईको-सिस्टम
पढ़ा-लिखा है
ज्ञान-शिखा है
बड़ा है पंडित
महिमामंडित
फालोवर से
नारी-नर से
सबको भय हो
उनकी जय हो।



यूपी में चुनाव लीला




नारे घटिया,
अच्छी खटिया,
टूटी कुर्सी,
मातमपुर्सी,
सपा, भाजपा,
कांग्रेस, बसपा
राहुल भ्राता
सोनिया माता,
चचा मुलायम,
माया क़ायम,
क़ाबिल शीला
नेता ढीला,
गंवई ढाबा,
राहुल बाबा
बस पदयात्रा,
टूटी मात्रा,
चक्कू छूरी
सब्ज़ी पूरी
बड़ा समर्थन
लाएगा धन
मथुरा, क़ाबा
सूफ़ी, बाबा
'अमर' हैं आज़म
भारी है ग़म
बने धुरी हैं
रामपुरी हैं
क्षत्रिय, ब्राह्मण
खुला हुआ रण
यादव, क़ुर्मी
भारी गर्मी
केवट, मौर्या
एक दिनचर्या
रामगोपाला
या शिवपाला
कहे भतीजा
यही नतीजा
धोती सूखी
कुर्ता भीजा
कहे लोपकी
लेकर झपकी
आँख दिखाओ
सब फल पाओ
सेब, मुसम्मी,
खीरा, केला,
जेबा ख़ाली
नहीं अधेला
नेता की जय
वोटर में भय
अमित शाह की
एक चाह की
टूटें सब दल
मिले तभी कल
प्रतिक्रिया हो
अनुप्रिया हो
दिखे न एका
दुखी मनेका
हुआ चहेटा
घायल बेटा
चाय ईरानी
पीये नानी
प्रेश्या-रण में
सबकुछ पण में
नाव एक हो
सोच नेक हो
यूपी भर की
तरकश शर की
जय कृपान की
राष्ट्रगान की

Sunday, March 20, 2016

बहुत किया अपमान......




बहुत किया अपमान तुम्हारी ऐसी-तैसी।
करो चंद एहसान तुम्हारी ऐसी-तैसी

फोड़ रहे हैं बम आतंकी
आज कच्छ, कल बाराबंकी
गाते शांति-गान, तुम्हारी ऐसी-तैसी
बहुत किया अपमान तुम्हारी ऐसी-तैसी।

स्वामी की बातें ना खोखली,
लिए फिरे हैं मूसल-ओखली,
कांगरेस दें ध्यान, तुम्हारी ऐसी-तैसी
बहुत किया अपमान तुम्हारी ऐसी-तैसी।

मोदी जी भी अडे हुए है,
रस्ता रोके खड़े हुए हैं,
पप्पू ले पहचान, तुम्हारी ऐसी-तैसी
बहुत किया अपमान तुम्हारी ऐसी-तैसी।

लालू पुत्र कहे सुन बापू,
बनवा दें पटना को टापू?,
दिखें नहीं इंसान, तुम्हारी ऐसी-तैसी
बहुत किया अपमान तुम्हारी ऐसी-तैसी।

राम गुहा से बोले मोदी,
सूफी था इब्राहिम लोदी,
खूब किया था दान, तुम्हारी ऐसी-तैसी
बहुत किया अपमान तुम्हारी ऐसी-तैसी।

राजदीप से बोली बरखा,
चले न्यूज का उल्टा चरखा,
बेचों बस ईमान, तुम्हारी ऐसी-तैसी
बहुत किया अपमान तुम्हारी ऐसी-तैसी।

येचुरी बोले सुनो कन्हैया,
हमसब की बस एक ही मैया,
सुन लो देकर कान, तुम्हारी ऐसी-तैसी
बहुत किया अपमान तुम्हारी ऐसी-तैसी।

कहें मुलायम; चओ सैफई,
हएं तुमौ जो साधन देई,
नाचेगा सलमान, तुम्हारी
ऐसी-तैसी
बहुत किया अपमान तुम्हारी ऐसी-तैसी।

लिबरल सेक्युलर बिके हुए हैं,
नेहरू युग से टिके हुए हैं,
देश रहा पहचान, तुम्हारी ऐसी-तैसी
बहुत किया अपमान तुम्हारी ऐसी-तैसी।

मदर थी कल, अब संत हो गई,
जैसे आदि-अनंत हो गई,
हुई बड़ी दूकान, तुम्हारी ऐसी-तैसी
बहुत किया अपमान तुम्हारी ऐसी-तैसी।

हरिश्चंद्र का बापू कजरी,
खाये खीर बताये बजरी,
दिल्ली का नुकशान, तुम्हारी ऐसी-तैसी
बहुत किया अपमान तुम्हारी ऐसी-तैसी।

अरनबवा खाली चिल्लाता,
रोज रात को ढोल बजाता,
खुद को कहे महान, तुम्हारी ऐसी-तैसी
बहुत किया अपमान तुम्हारी ऐसी-तैसी।

प्रेष्याओं का हमला भारी,
रातें हैं अब लंबी कारी,
खबर हुआ अनुमान तुम्हारी ऐसी-तैसी
बहुत किया अपमान तुम्हारी ऐसी-तैसी।

मन की बातें मोदी करते,
भासन से तकलीफें हरते,
भासन ही पहचान, तुम्हारी ऐसी-तैसी
बहुत किया अपमान तुम्हारी ऐसी-तैसी।

जे एन यू से क्रांति बही है,
प्रेष्या बोलें यही सही है,
नक्सलियों का ज्ञान, तुम्हारी ऐसी-तैसी
बहुत किया अपमान तुम्हारी ऐसी-तैसी।

देशी भोजन नहीं सोहाये,
सारा भारत पिज़्ज़ा खाये,
इटालियन पकवान, तुम्हारी ऐसी-तैसी
बहुत किया अपमान तुम्हारी ऐसी-तैसी।

बिजनेसमैन हुए सब बाबा,
लेकर सिर पर फिरते झाबा,
बेंच रहे लोहबान, तुम्हारी ऐसी-तैसी
बहुत किया अपमान तुम्हारी ऐसी-तैसी।

चुप हैं अब इशरत के पप्पा,
थक गए करके लारा-लप्पा,
भारत भरे लगान, तुम्हारी ऐसी-तैसी
बहुत किया अपमान तुम्हारी ऐसी-तैसी।

मोर्टगेज करके कैलेंडर,
माल्या भागा अरबों लेकर,
बैंक भये परेशान, तुम्हारी ऐसी-तैसी
बहुत किया अपमान तुम्हारी ऐसी-तैसी।

भारतमाता की जय काहे?
पूछे वह अधिकार जो चाहे,
नफ़रत का सामान, तुम्हारी ऐसी-तैसी
बहुत किया अपमान तुम्हारी ऐसी-तैसी।

जिसने बाँटा था बिहार को,
साथ उसी के हैं निहार लो,
सबकुछ है आसान, तुम्हारी ऐसी-तैसी
बहुत किया अपमान तुम्हारी ऐसी-तैसी।

राज्यसभा क्यों नहीं चल रही?
वर्किंग काहे रोज टल रही
पूछ रहे नादान, तुम्हारी ऐसी-तैसी
बहुत किया अपमान तुम्हारी ऐसी-तैसी।

खेलें सब वाटरलेस होली,
निज कल्चर की उठा के डोली,
सेक्युलर यह फरमान, तुम्हारी ऐसी-तैसी
बहुत किया अपमान तुम्हारी ऐसी-तैसी।

ट्विटर, फेसबुक रखे बिंझाये,
और नए क्या साधन लायें,
बस इसपर संधान, तुम्हारी ऐसी-तैसी
बहुत किया अपमान तुम्हारी ऐसी-तैसी।

देशों को भी ट्वाय कर दिया,
मिडिल-ईस्ट डिस्ट्रॉय कर दिया,
अमेरिकन अनुदान, तुम्हारी ऐसी-तैसी
बहुत किया अपमान तुम्हारी ऐसी-तैसी।

लास्ट वर्ड्स हैं पत्रकार के,
कुछ भी कह दें बिन अधार के,
बने फिरें भगवान, तुम्हारी ऐसी-तैसी
बहुत किया अपमान तुम्हारी ऐसी-तैसी।

भारत स्वच्छ बनेगा कैसे,
जबतक बरधे, पंडवा, भैंसे,
खाकर थूकें पान, तुम्हारी ऐसी-तैसी
बहुत किया अपमान तुम्हारी ऐसी-तैसी।

भ्रष्टाचारी नदी बहाया,
स्वच्छ हुआ जो कोयला खाया,
कर जमुना-स्नान तुम्हारी ऐसी-तैसी
बहुत किया अपमान तुम्हारी ऐसी-तैसी।

देशबंधु की त्रिया प्रियंका,
गुरुवर पीटें डेली डंका,
हैं ब्राह्मण अभिमान तुम्हारी ऐसी-तैसी
बहुत किया अपमान तुम्हारी ऐसी-तैसी।


करो चंद एहसान तुम्हारी ऐसी-तैसी,
बहुत किया अपमान तुम्हारी ऐसी-तैसी।

Sunday, March 6, 2016

भारत का कैसा हो बसंत




सुभद्रा कुमारी चौहान से अग्रिम क्षमायाचना के साथ.

सौ ग्राम तुकबंदी युक्त पैरोडी;

आ रही है दिल्ली से पुकार,
प्रेष्यागण पूछें बार-बार,
दे दे कर अक्षर पर हलंत
भारत का कैसा हो बसंत?

जे एन यू से आएगी क्रांति,
भारत भर फैले यही भ्रांति,
हम बेंचे किस्से मनगढ़ंत,
भारत का ऐसा हो बसंत।

फैलाओं उत्पादित डिबेट,
बढ़ता ही जाए मेरा रेट,
गिरते ही जाएँ हम अनंत,
भारत का ऐसा हो बसंत,

सबकुछ कण्ट्रोल करे मीडिया,
वापस आ जाए फिर रडिया,
फिर से फंस जाएँ साधु-संत,
भारत का ऐसा हो बसंत,

इन-टॉलेरेंस मिलकर बेंचे,
सब मोदी की धोती खेंचे,
दुर्गति का दिक्खे नहीं अंत
भारत का ऐसा हो बसंत।

टीवी स्क्रीन कन्हैया का,
बस इटली वाली मैया का,
सब पाप हो उनके छू-उडंत,
भारत का ऐसा हो बसंत।

मिलकर सब खेलें यही दांव,
पाए असत्य सैकड़ों पाँव,
धंसते जाएँ विषयुक्त दंत
भारत का ऐसा हो बसंत।

Wednesday, January 13, 2016

ऑड-इवेन प्लान कवियों की कलम से




दिल्ली का इवेन-ऑड प्लान पिछले कई दिनों से चर्चा का विषय बना हुआ है। टीवी पर तर्क-वितर्क चल रहा है लेकिन अगर इवेन-ऑड प्रसंग पर तमाम कवि कविता लिखते तो क्या निकल कर आता? शायद कुछ ऐसा;

कुमार विश्वास

कोई सक्सेस समझता है, कोई फेल्योर कहता है,
मगर टीवी की बहसों में हमारा शोर चलता है,
कहा भक्तों ने क्या इसबात में क्या आनी-जानी है,
इधर अरविन्द दीवाना, उधर दिल्ली दिवानी है।

रहीम

रहिमन इवेन-ऑड की महिमा करो बखान,
जबरन ओहि सक्सेस कहो, चलती रहे दुकान।

कबीर

कबिरा इवेन-ऑड की ऐसी चली बयार,
सब आपस में लडि मरें भली करें करतार।

बच्चन

कार्यालय जाने की खातिर,
घर से चलता मतवाला,
असमंजस है कौन सवारी
चढ़ जाए भोला-भाला,
कोई कहता मेट्रो धर लो,
कोई कहता बस धर लो,
मैं कहता हूँ ऑफिस त्यागो,
पहुँचो सीधे मधुशाला।

गुलज़ार

धुएं की चादर की सिलवटों में
लिपटी दिल्ली,
सुरमई धूप सेंक रही है आज,
आज दिखी नहीं,
मोटरों की परछाइयां,
जिनसे गुफ्तगू करती थी
ये सडकें,
जो देखा करती थीं
इन सड़कों की स्याह पलकों को,
किसी ने कह दिया उनको
कि इवेन-ऑड जारी है।

मैथिलीशरण गुप्त

इवेन-ऑड कहानी
विषमय वायु हुई नगरी की,
खग-मृग पर छाई मुरधानी,
इवेन-ऑड कहानी

जन हैं हठी चढ़े सब वाहन,
दिल्ली नगरी रही न पावन,
अश्रु बहाते लोचन मेरे
जन करते नादानी
इवेन-ऑड कहानी,

हुआ विवाद सदय-निर्दय का,
अधियारा छाया है भय का,
उषा-किरण से निकलें विषधर,
व्यथित हुआ यह पानी
इवेन-ऑड कहानी।

काका हाथरसी

गैरज में कारें खड़ी, जाना है अस्पताल,
धुंआ घुसता नाक में आँख हो रही लाल,
आँख हो रही लाल, पास ना इवेन गाडी,
सरकारी माया से कक्का हुए कबाड़ी,
कह काका कविराय कोई तो मुझे बचाए,
अपनी इवेन कार चला हमको पहुंचाए।

दिनकर

हो मुद्रा गर तो आधा दो,
उसमें भी हो गर बाधा तो,
फिर दे दो हमको ऑड कार,
मेरे गैरेज में इवेन चार,

था वचन कि बसें चलाओगे
अपना कर्तव्य निभाओगे,
पर भीड़ देख होता प्रतीत,
इससे अच्छा था वह अतीत,

जब मनुज पाँव पर चलता था,
आचरण उसे न खलता था,
अब भूमि नहीं जो रखे पाँव,
आहत करता शासकी दांव,

जाने कैसे दिन आयेंगे,
इस मनुज हेतु क्या लायेंगे,
यह इवेन-ऑड कब टूटेगा,
यह महावज्र कब फूटेगा,

हो सावधान रायतामैन,
कर कुछ सबको आये जो चैन,
अन्यथा नागरिक लिए रोष,
मढ़ देगा तेरे शीश दोष।


Wednesday, March 4, 2015

ये कौन पत्रकार है?




ये मुख पे शांति भाव औ;
आवाज़ में ये भारीपन
कि जिसकी बात-बात में
दिखाई दे रहा पतन
असत्य ले जुबान पर
असत्य ले जुबान पर
जो जीये झूठी शान पर
कि भ्रष्ट को बचाने का ये;
जिसके काँधे भार है ?
ये कौन पत्रकार है?
ये कौन पत्रकार है?


है शस्त्र शत्रुदेश का
जो राष्ट्र के विरुद्ध है
जो त्रस्त अपने लोभ से
विचार से अशुद्ध है
आकंठ डूब गर्त में
आकंठ डूब गर्त में
ऋणी है भ्रष्ट शर्त में
कि जिसके शब्दवाण सह के;
सत्य तार-तार है
ये कौन पत्रकार है?
ये कौन पत्रकार है?


जो तर्क में गरीब पर;
कलम चलाये जा रहा
न देखता है राष्ट्रहित
जो झूठ की है खा रहा
जिसे न गर्व देश पर
जिसे न गर्व देश पर
जो हँस रहा है क्लेष पर
चढ़ा है जिसकी लेखनी से
झूठ का बजार है
ये कौन पत्रकार है?
ये कौन पत्रकार है?


दलाल सत्ता का है जो
गले मिले जो पाप के
असत्य का व्यापारी जो
कहे जो सत्य नाप के
जो अपना धर्म भूलकर
जो अपना धर्म भूलकर
रहे जो कर्म भूलकर
कि जिसके आचरण को देख;
देश शर्मसार है
ये कौन पत्रकार है,
ये कौन पत्रकार है

Monday, January 13, 2014

हस्तिनापुर




बहुत दिनों बाद करीब सौ ग्राम तुकबंदी/पैरोडी इकठ्ठा हुई है. अभी तो इतना ही बांचिये। आगे इकट्ठी होगी तो प्रस्तुत करूँगा:-)



जय हो जग में जमे जहाँ, औ भ्रष्टाचार अचल हो,
जहाँ रात-दिन नागरिकों संग लूट-पाट हो, छल हो,
जहाँ राष्ट्रहित चिंतक, साधक अपराधी कहलायें,
शासक जहाँ भ्रष्ट हो फिर भी नीतिवचन दोहराए

जहाँ प्रताड़ित हो खुद को धिक्कार रहा जन-जन हो,
जहाँ शुल्क और कर से कुचला शासित का तन मन हो,
जहाँ नीति हो शासन करना जन-जन को वंचित कर,
जहाँ राज करता हो शासक बेशर्मी संचित कर,

जहाँ प्रिंस सम्मान ढूंढता नाम-गोत्र बतलाकर,
खोज रहा पहचान-मान जो दलितों के घर खाकर,
स्वामि-भक्त आमात्य जहाँ चुप्पी साधे जीता हो,
जहाँ नागरिक रोज-रोज अपमान-घूँट पीता हो,

जहाँ ज्ञानसागर गिरवी हो राजमहल में सोता,
कपट खोट से कुंठित होकर निपुण व्यक्ति भी रोता,
जहाँ मिलें अधिकार उन्हें जो हैं कुपात्र और ओछे,
जहाँ सब जगह चमचे मिलते धारण किये अगौंछे,

जहाँ खुशामद जो करता हो, वही श्रेष्ठ ज्ञानी हो,
जहाँ लहू बहता हो जैसे नदियों का पानी हो,
जहाँ दिखाई न देती हो निर्भयता की आग,
जहाँ सुरक्षित नहीं किसी दिश नागरिकों की लाज,

जहाँ समूचा राष्ट्र पड़ा हो अलग दूर कोने में
जहाँ राष्ट्र का आम नागरिक लगा रहे रोने में,
जहाँ नागरिक वंचित हो आधारभूत साधन से,
और जहाँ हो कार्य सिद्ध बस संबंधों से, धन से,

युग की अवहेलना जहाँ हो शासक दल के कर से,
जहाँ कभी आमात्य न निकलें अपने-अपने घर से,
जहाँ दास बन जीवनयापन सर्जक भी करता हो,
जहाँ बुद्धि का स्वामी शासक का पानी भरता हो,

जहाँ करारोपण करने में सत्ता रहती व्यस्त
जहाँ रहे मृतप्राय राष्ट्र और रहे नागरिक पस्त,
जहाँ नशा सत्ता का करवाता रहता अन्याय,
जहाँ अनैतिक शासक करता रहता अर्जित आय,

जहाँ शासकों के मित्रों का बढ़ा चले व्यापार,
जहाँ दुखी होकर सुपात्र बस कहता हो धिक्कार,
वंशवाद की राजनीति हो जहाँ, राष्ट्र मरता हो,
जहाँ प्रजा का नायक भी शासक दल से डरता हो,

जहाँ भीष्म चुप्पी साधे इस युग में भी रहते हों,
जहाँ विदुर बस दुर्योधन की हाँ में हाँ भरते हों,
जहाँ द्रोण और कृपाचार्य फिर हों कौरव के साथ,
जहाँ कर्ण ने कलियुग में भी बाँध लिए हों हाथ,

जहाँ सुरक्षित नहीं दीखती कहीं राष्ट्र सीमायें,
जहाँ पड़ोसी धमकी भी दे अंदर भी घुस आयें,
तुष्टीकरण जहाँ हो आतंकी का, अपराधी का,
जहाँ राज साधन देता हो राष्ट्र की बरबादी का,

जहाँ रहे शासक सह मंत्री निज घमंड में चूर,
जहाँ महल होते जाते है प्रजा जनों से दूर,
जहाँ फूलते कुसुम मात्र अमात्यों के उपवन में,
जहाँ उमड़ता क्रोध ग्लानि बस नागरिकों के मन में,

वहाँ नहीं रख सकता शासक प्रजा-जनों को बांधे,
वहाँ नीयति अपने रस्ते चल अपना आशय साधे,
बुझनी ही हैं वहाँ मनों में धधक रही जो ज्वाला,
वहाँ प्रजा देगी शासक को एक दिन देश निकाला.


Friday, January 3, 2014

आम आदमी, खाँस आदमी




तोला भर तुकबंदी



आम आदमी, खाँस आदमी
मार रहा है बास आदमी
नई-नई टोपी पहनाकर
टाँक रहा इतिहास आदमी

बंगला-मोटर नहीं चाहिए
छोटा सा घर कहीं चाहिए
बड़े बड़े वादे करके भी
घूम रहा बिंदास आदमी

वादे-प्यादे हैं प्रचार में
पर शहज़ादे हैं विचार में
क्लेम करे मिर्चा अचार का
खाये खाली सॉस आदमी

बिजली सस्ती पानी सस्ता
काँधे धारे मोटा बस्ता
भ्रष्टाचार मिटाने वाला
उसी का अंतिम आस आदमी

कहता साथ चलेंगे सबके
जिससे काज फलेंगे सबके
लेकिन आखिर भूले सबको
और करे उपहास आदमी

लोकतंत्र का ढोंग रचाकर
अपनी प्रतिमा खूब सजाकर
फिर लोगों की आशाओं का
करता सत्यानाश आदमी



Tuesday, August 7, 2012

ट्वीटर का आह्वान!




यह सवा सौ ग्राम की तुकबंदी ट्वीट-योद्धा का आह्वान कर रही है. आप बांचिये और अगर ट्विटर पर हैं तो इस आह्वान को सुनते हुए लग जाइए:-)

.....................................................

पूरब में सूरज उगा, जग उठा दिन अब,
अलसाई आँखें मलकर खोलोगे कब?
ट्वीटाधिराज बिस्तर से अब उठ जाओ,
स्मार्टफ़ोन पर को झट से हाथ लगाओ
पढ़ लो पहले जो टी एल है बतलाती,
मत ध्यान करो गर कोयल भी हो गाती
मन करे अगर तो गुडमोर्निंग कह डालो,
बदले में गुड़-डे वाली कुछ विश पा लो
चिंता कर डालो देशभक्त बन जाओ,
झट अपने दल का खूब समर्थन पाओ
अन्ना को गाली, रामदेव को रगड़ो,
गर मिलें सपोर्टर उनसे फट से झगड़ो
सोनिया माइनो, मनमोहन को गाली,
आरटी भी ले लो और साथ में ताली
दो यूं कुतर्क राहुल महान हो जायें,
सड़ियल ट्वीटें भी स्वीट-तान हो जाए
जिसको भी चाहो पेड-न्यूज बतलाओ,
अपने लोगों से खुब आशीष कमाओ
स्वामी जवाब दें फट आर टी कर डालो,
दूसरों की टाइम-लाइन को भर डालो
खबरों की लेकर लिंक उन्हें झट ठेलो,
फालोवर्स की तारीफ फटाफट ले लो
फैसला सुनाओ धर्म तुम्हारा बढ़िया,
कोई जो करे अपोज उसे कह घटिया
अपने रस्ते पर बस चलते ही जाओ,
जो करें विरोध उन्हें चिरकुट बतलाओ
कुछ पत्रकार को बतलाना तुम हालो,
पर कभी न करना उनको तुम अनफालो
फिर उसकी कोई घटिया ट्वीट पकड़कर,
और ट्रोल करो फिर उसको रोज रगड़कर
बतलाओ सबको मीडिया बिका हुआ है,
इनपर ही भ्रष्टाचारी टिका हुआ है
पर लिंक उसी मीडिया वाली तुम लेना,
उसको चाहे जितनी गाली तुम देना
कुछ कर डालो कि ट्वीट-क्रान्ति आ जाए,
और ट्वीट तुम्हारे लाखों आर टी पाए
हर मुद्दे को पकड़ो टांगों से, खींचो,
और बीच-बीच में ट्वीट-मुट्ठियाँ भींचो
ललकारो अपने दुश्मन को दो गाली,
कोई भी ट्वीटिंग-बुलेट न जाए खाली
छेड़ो तुम दलित-विमर्श जो आये मन में,
फिर दौड़ो जैसे कोई चीता वन में
स्त्री-विमर्श मोहताज रहे ट्वीटों की,
जो गाली दें ऐसे लम्पट, ढीठों की
आसाम की चाहे हों यूपी की बातें,
चाहे नेता की हों घातें-प्रतिघातें
हों यूपी वाली सिस्टर जी के हाथी,
या जो थे कलतक नेताजी के साथी
हों ज़रदारी या फिर बाराक ओबामा,
चाहे हों देसी सिब्बल, दिग्गी मामा
झट ट्वीट-एक्शन सबपर ही कर डालो,
जिससे सब पढ़ें जो करते तुमको फालो
लेकर शस्त्रों को ट्वीटक्षेत्र में जाओ,
भारत-गौरव अब राष्ट्रप्रेम दिखलाओ

ट्विटर एंथेम ट्वीटपथ ट्वीटपथ ट्वीट पथ पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक कर सकते हैं. ट्विटर पर और ब्लॉग पोस्ट यहाँ, यहाँ और यहाँ क्लिक करके बांच सकते हैं.


Tuesday, May 29, 2012

एक ट्विटर टाइम-लाइन




जिस तरह से आजकल सारे संवाद ट्विटर पर हो जाते हैं उसे देखते हुए आज सुबह सोच रहा था कि अगर ममता दी ट्विटर पर होतीं तो कल शाम को उनकी ट्विटर टाइम-लाइन कैसी दीखती? शायद कुछ इस तरह की:

टाइम लाइन पढ़ें के लिए Scribd क्लिक कीजिये.



Tuesday, February 21, 2012

दिल्ली काण्ड...




यह केवल एक पैरोडियात्मक और जुगाडू पोस्ट है. इसे किसी भी तरह से गोस्वामी तुलसीदास का अपमान न समझा जाय. इसलिए लिख रहा हूँ कि प्रशंसक कई बार नाराज़ हो जाते हैं.

यह दिल्ली-कांड का प्रथम भाग है. अगर पाठकों को अच्छा लगा तो फिर आगे का वर्णन दिया जाएगा.फिलहाल इसे बांचिये...

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एक भोर सब सहित समाजा, दस जनपथ परधान बिराजा.

सकल कुटिल मंत्री, नरनाहू, राहुल जसि सुनु अतिहि उछाहू.

राहुल रहहि कृपा अभिलाषे, चमचे करहिं प्रीति रुख लाखे.

एहि जुबराज बने अब राजा, दस जनपथ पे बाजहि बाजा.

पणियप्पन के वचन सुहाए, सुनि के सिबल हृदय अति भाये.

अब अभिलाषु एक मन मोरे, राहुल पूजि अनुग्रह तोरे.

कहइ प्रधान सुनिअ जननायक, राहुल हैं सब बिधि सब लायक.

दिग्गी सह परिवार ओ माई, करहिं छोह सब रौरिहि नाई.

सुनि परधानाहि बचन सुहाए, दंगल दोदि मूल मन भाये

जौं चमचौ मत लागहि नीका, करहु हरिष हिय राहुल-टीका.

हरषि जमाइ कहेउ मृदु बानी, नापेहु कूपहि केतना पानी.

सब पूजहि स्कैमहि देवा, बिनु पूजा न करहि कलेवा.

जेह बिधि होइ कुटुंब कल्याना, तंत्र, मन्त्र सब बिधि कर नाना.

बाजा बाजेहि बिबिधि बिधाना, सुनि सब चमचे गावहि गाना.

हरषित हृदय लिए महतारी, बिटिया संग जमाइ पुकारी.

सब बिधि होइ प्रसन्न सब नेता, देखि सबइ जुबराज प्रणेता.

रहि रहि होइ प्रसन्न सब भांती, सेवक मिलिहि बनावहिं पांती.

चमचे सब पूजत जुबराजा, उनको कहाँ अउर कछु काजा.

दरस लिए बेनी सलमाना, श्रीप्रकाश दिग्गी सह नाना.

हाथ जोडि दिग्गी तब बोले, मुख पे शबद शबद सब तोले.

कोहु नृप होहि हमहि का हानी, सूखा पड़इ कि बरसइ पानी.

जानत सभै सुभाऊ हमारा, राहुल ही हैं मोर करतारा.

वे प्रसन्न जबतक हे माई, जीयत करबि ताहि सेवकाई.

आग्रह मोर बस एक बिशेषा, यूपी ठहरौ कुटुंब प्रदेशा.

बाईस बरस भये करतारा, यूपी में नहिं राज हमारा.

उधर मुलायम माया नाचे, पुनि पुनि आपन नीयम बांचे.

मातु दीन्हि जदि मोहि अधिकारा, जाऊं यूपी लइ लस्कारा.

हायर करेहु साथ 'लिंटासा', जौ से बढौ विजय को आशा.

राजपाट यूपी में लाऊँ, राहुल जस जिनगी भरि गाऊं.

मोर मने उपजहु एहि चित्रा, मैं कलियुग को विश्वामित्रा.

दिग्गी बचन हृदय अति तारी, मगन हुई सुनि के महतारी.

हामी भरेहु साथ परधाना, ताहि संग चमचे सब नाना.

आज्ञा आज तोहि मैं दीन्हा, सकल उपाय विजय को कीन्हा.


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Monday, January 2, 2012

बीती विभावरी जाग री .... (री-मिक्स्ड)




आदरणीय श्री जयशंकर प्रसाद के प्रसंशकों से क्षमा याचना सहित.


बीती विभावरी जाग री
सास जी घर में झाड़ू देती
पेड़ पे बोले काग री
बीती विभावरी जाग री

बजता जाता टीवी, ऍफ़ एम्
सुन जिन्हें साधु भी जाते रम
स्मृति में ला कर्त्तव्य सभी
औ वह विराट बैक-लॉग री
बीती विभावरी जाग री

बिस्तर पर तू, अधखुले नेत्र
अब निकल छोड़कर कर शयन क्षेत्र
माना अबतक रवि नहीं दिखें
पर रीजन है यह फ़ॉग री
बीती विभावरी जाग री

आ पहुँचा है अब नया साल
दिक्खेंगे सारे नव-बवाल
क्या हमें मिलेगा लोकपाल
यह पूछ रही सब नागरी
बीती विभावरी जाग री

जो बीता गया अब उसे भूल
बातों का 'उनके' यही मूल
हर भारतवासी को देंगे
ऑनेस्टी भरके गागरी
बीती विभावरी जाग री

उठकर कर ले मॉर्निंग वॉक
कर लिया हेल्थ पर बहुत टॉक
कंट्रोल रहेगा रक्त-चाप
दे दुनियाँ को नव-राग री
बीती विभावरी जाग री

Saturday, October 1, 2011

अमन की बात करे जब, करे तकरार के साथ....




कट्टा कानपुरी की तथाकथित ग़ज़ल बांचिये. पूरे डेढ़ सौ ग्राम शुद्ध तुकबंदी है.



अमन की बात करे जब, करे तकरार के साथ,
मिला करे है गले भी, मगर तलवार के साथ.

बताये मार्क्स, माओ, लेनिन को अपना रहबर
दौड़ता रहता है वो भी, इसी बाज़ार के साथ.

वक़्त के साथ पैमाना भी खाली,महफ़िल भी
लिपटकर रोयेगा फिर वो किसी दीवार के साथ

मिटाकर चंद गरीबों को हुकूमत समझे
मुल्क अब दौड़ेगा तेजी से इस संसार के साथ

न समझा है, न समझेगा वो खामोशी की ताक़त
पड़ोसी फिर मिलेगा झूठी इक ललकार के साथ

हमें उम्मीद थी जिससे कि, उठाएगा सवाल
दिखाई रोज देता है वही सरकार के साथ

समझते हैं सभी 'कट्टा' को सितमगर लेकिन
खड़ा मिलेगा हमेशा किसी हकदार के साथ

Saturday, September 24, 2011

कल को तेरा भी घर जेलखाना हुआ तो? ...




कट्टा कानपुरी की ताज़ी ग़ज़ल पढी जाय.

अगर आप को लगे कि इस मीटर की ग़ज़ल आपने पहले कहीं पढ़ी है तो यह समझें कि वो महज एक संयोग है और संयोग से बढ़कर और कुछ नहीं. कट्टा कानपुरी केवल ओरिजिनल गज़लें लिखते हैं. वैसे कानपुर से लखनऊ ज्यादा दूर नहीं है:-)


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जो उसका है वो तेरा भी अफसाना हुआ तो,
कल को तेरा भी घर जेलखाना हुआ तो?

तू आज तो बचने की जुगत खूब करो हो,
मज़मून नोट वाला कातिलाना हुआ तो?

तुझको भी ठेल देगा वो इक सेल देखकर,
पकड़ेगा जो तुझे वो दीवाना हुआ तो?

जेलों की जियारत का सफ़र कल को करोगे,
जेलों के रास्ते में गर मयखाना हुआ तो?

तेरे तो आस-पास वैसे हैं सभी हलकट,
उनमें भी अगर कोई शरीफाना हुआ तो?

देगी तेरा वो साथ कहे दोस्तों की फौज
लेकिन कोई गर उनमें भी बेगाना हुआ तो?

सालों से खाते आया है तू मालपुआ-खीर
खाने को मिले कल जो रामदाना हुआ तो?

'कट्टा' को आज समझे है तू दुश्मन-ए-जानी,
लेकिन उसी से कल को याराना हुआ तो?

Friday, September 9, 2011

जसौदा कहाँ कहौं मैं बात.....




आपसे अनुरोध है कि इस ब्लॉग पोस्ट को श्री कृष्ण के खिलाफ लिखा हुआ न मानें. इसे केवल एक पैरोडी के रूप में लिया जाय और कुछ नहीं.



जसौदा कहाँ कहौं मैं बात
तुम्हरे सुत को करतब अब तो
कहौं कहे नहीं जात
जंह-जंह मौका मिले हौं ओकू
इधर-उधर घुसि जात
सखा सबै अब तंह संग मिलि के
चाटि-चाटि सब खात
करौं रपट जौं सीएजी तौं
मारत ओकूं लात
जसौदा कहाँ कहौं मैं बात

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नचावत सबै जसौदा-लाल
पग-पग, नग-नग तंग करत हों
चलत कुसंगति चाल
संग सखा सब कोरस टेरत
नानाविध दै ताल
माया कौ कटि फैंटा बांध्यो
दियो मुलायम माल
ममता संग मिलि सबहि नचावत
करि स्कैम बवाल
गोकुल वासी दुखी सभी जन
कब बदलेगा काल
नचावत सबै जसौदा लाल


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मैया मोरी मैंने ही माखन चुरायो
पंद्रह परसेंट तो मैंने खायो, बाकी तोको खिलायो
मैया मोरी मैंने ही माखन चुरायो

ग्वाल-बाल सब हमरौ संगी, ताको हेल्प भी पायो
मैं नहिं बालक जानौ सब बिधि, विदेश से डिग्री लायो
मैया मोरी मैंने ही माखन चुरायो

जोर भयो ज्यों छूट दियो तौं, हिम्मत भीतर आयो
सबौं मिनिस्ट्री सखा लगाकर, भारी माल कमायो
मैया मोरी मैंने ही माखन चुरायो

तू जननी मन की नहि भोली, पूत को सिर पे बिठायो
सब माखन तू ही खा लेवे, छींको मैं तुड़वायो
मैया मोरी मैंने ही माखन चुरायो

सीएजी तो पकड़े मोकूं, तू तो बचि-बचि जायो
जब-जब भी अकुलाइ उठूं मैं, सुषमा मन हरसायो
मैया मोरी मैंने ही माखन चुरायो

Thursday, June 30, 2011

चमन का हाल कुछ है बागबाँ कुछ और कहता है




मासूम गज़ियाबादी साहब की यह ग़ज़ल पढ़िए. यह ग़ज़ल उन्होंने कल शाम को नहीं लिखी.


निगेहबाँ कुछ, निजामे-गुलसिताँ कुछ और कहता है
परिंदा कुछ, शज़र कुछ, आशियाँ कुछ और कहता है

है दावा राहबर का शर्तिया मंज़िल पै पहुँचूँगा
मगर हमदम गुबारे-कारवाँ कुछ और कहता है

तेरी बस्ती में सब महफूज़ हैं, मैं मान तो लेता
मगर दर-दर पै आतिश का निशाँ कुछ और कहता है

तेरी जुल्फें भी सुलझाना ज़रूरी हैं मेरे हमदम
तकाज़ा भूख का लेकिन यहाँ कुछ और कहता है

सबा से ताज़गी, गुंचों से रौनक, गुल से बू गायब
चमन का हाल कुछ है बागबाँ कुछ और कहता है

मैं मस्जिद की बता या मैकदे की बात सच मानूँ
ऐ वाइज़, तू यहाँ कुछ और वहाँ कुछ और कहता है

मेरा हमदम बड़ा 'मासूम' है जो देखता कुछ है
सुनाता है तो नादाँ दास्ताँ कुछ और कहता है

Sunday, June 12, 2011

कुछ ट्विटरीय 'धोये'




तुकबंदी की यही विशेषता है कि कोई नहीं जनता कब इकट्ठी हो जायें. तो आज कोई पचास ग्राम तुकबंदी इकट्ठी हुई और कुछ ट्विटरीय 'धोये' बन गए. आप बांच सकते हैं क्योंकि ये 'धोये' ट्वीट जितने ही उबाऊ हैं. उनसे ज्यादा नहीं है.


भारत है अब बन गया नेशन बहस-प्रधान,
तर्कों की फसलें उगें सबका उसपर ध्यान|

@झुनझुनवाला ने किया ट्विटर का आविष्कार
क्या सोचा हो जाएगा इतना बड़ा बाज़ार

बहस इहाँ अब बन चुका जीवन का आधार,
पूरा भोजन सा लगे कल तक था जो अचार|

ट्वीपल पल-पल लिख रहा जीवन का आख्यान,
रोज-रोज की बहस में, डूबा हिन्दुस्तान|

जो भी मन में बात हो, ट्वीट लिखें आसान,
जिसको पढि सब समझ लें दिखें नहीं हलकान|

पत्रकार ट्विटिया रहे, बस सरकारी राग
मिनट-मिनट पर डाल घी भड़काते हैं आग|

पत्रकार से कह रहा, ट्वीपल इक नादान
टुकड़ों पर तुम पल रहे, नहीं कोई भगवान|

रामदेव अनशन करें, भक्त रहें ट्विटियात
बाकी अपनी ट्वीट से, क्षण-क्षण दें आघात|

सही-गलत के शोर में सत ही बलि चढ़ जाय
गुट का गुटका डारि मुख ट्वीपल रहे चबाय|

चंहु दिश केवल दिख रहा वैचारिक मतभेद
गाली-फक्कड़ भी दिए, प्रकट करें नहि खेद|

इंटेलेक्चुअल दुखी है देखि येमेन में आग
दिल्ली में क्या घट रहा उससे फिरता भाग|

सरकारी भोपूं लगें पंकज, बरखा दत्त
उधर पल्लवी घोष भी, रहे सदा मदमत्त|

मीडिया वाले ज्ञान दें साथ रहे धिक्कार
तर्कों से जब चुक रहे, करते वेर्बल वार|

सबसे बढ़िया वही जो शेर रहें ट्विटियात
शायर अपने लिख गए केवल बढ़िया बात

ह्यूमर वाली ट्वीट को आरक्षण मिल जाय
वही दिखें बस पॉपुलर ट्वीपल 'आर-टियाय'|


आप लोग़ भी कमेन्ट में अपने-अपने 'धोये' जोड़ दीजिये.

Tuesday, June 7, 2011

'प्रजा' सो रही नींद में, बरसत लाठी-बेंत....




आधे घंटे पहले कोई सवा सौ ग्राम तुकबंदी इकट्ठी हो गई. इकट्ठी हुई तो कुछ 'धोये' निकाल आये. अगर झेल सकते हैं तो झेलिये.


करता है आदर कभी, कभी बताये चोर
कभी कहे कौवा उन्हें, यूं सरकारी जोर

सब जिसको बाबा कहें, उनको कहता गून
सब समझें चीनी जिसे, वो बतलाये नून

इक बाबा तो मौन है, और एक चिल्लात
इक सोये जब रात में, दूजा मारे लात

'प्रजा'सो रही नींद में, बरसत लाठी-बेंत
लोकतंत्र मुर्दा यहाँ, उसका यह संकेत

दिल्ली लंका सदृश अब, रावण करे निवास
सब पे कब्ज़ा कर लिया, धरती और अकाश

जिनको समझे थे सभी, जनता की आवाज़
चारण बन सरकार के, लुटा रहे हैं लाज

सच्चरित्र कहते उसे, जो है राष्ट्र प्रधान
चूहा बन बिल में घुसा, प्रजा रहे हलकान

कठपुतली सारे यहाँ, रानी करती राज
दरबारी बनकर वही, रोज गिराते गाज

कहते सब राजा जिसे, दिखे वही शैतान
जिह्वा पर कंट्रोल नहि, भूंके कुकुर समान

गृहमंत्री शकुनी सदृश, चलता रहता चाल
मोड़े मुख कर्त्तव्य से, दोपहर,सांझ,सकाळ

चरण कमल धोकर सदा चरणामृत पी लेव
रानी के चारण सभी, होठों को सी लेव

धूर्त, क्रूर मंत्री सभी, लागें कंश समान
जनता का करते वही, रोज-रोज अपमान

दुर्योधन चुप ही रहे, यह कलिकाली चाल
कलियुग का जयद्रथ यहाँ, खूब बनाये माल

मन का मोहन मौन है, जलता जाए राष्ट्र
करे आचरण ज्यों किये, द्वापर में धृतराष्ट्र

जिनको समझें द्रोण हम, वह भी करें प्रपंच
गलत-सलत बोलें सदा, जब मिल जाए मंच

उधर दुशाला रच रही, एक बड़ा षड्यंत्र
समय देखि के वार हो,उसका है यह मन्त्र

प्रथम यज्ञ में डारि जल, दुर्योधन मदहोश
चारण भी हैं कर रहे, उसका ही जयघोष

किन्तु समय कब पलट ले,यह जाने ना कोय
कभी-कभी सम्राट भी जनता सम्मुख रोय

Saturday, April 23, 2011

बैटिंग की बातें चलें फट कवित्त दे ठेल....







कल रात को सोचा कि इस सप्ताह को दोहा सप्ताह के रूप में मना लिया जाय. इससे पहले सीडियात्मक दोहे लिखे थे. अब प्रस्तुत है सिद्धुआत्मक दोहे.

जैसा कि आपसब जानते हैं, मैं सिद्धू ज़ी महाराज का बहुत बड़ा फैन हूँ. उन्हें सुनकर मन प्रफुल्लित हो जाता है. मेरा ऐसा विश्वास है कि वे जन्म से ही दार्शनिक थे. बचपन की कुसंगति के कारण क्रिकेटर बन गए.

एक फैन होने के नाते मेरा यह धर्म है कि मैं उनके ऊपर कुछ लिखूं. इसलिए ये अभी कुछ धोये सॉरी दोहे लिखकर टांग दे रहा हूँ. अगर सौ-दो सौ ग्राम तुकबंदी और इकठ्ठा हुई तो और टांग दूंगा. फिलहाल तो यही है. झेलिये.



एक रंग का पहनकर पगड़ी, 'टाई-नेक',
बात-बात पर मारते हमें कहावत फेंक

सुन सवाल वे क्रिकेट का दर्शन दे चिपकाय
उक्ति-सूक्ति बस ठेलकर पग-पग पर पगलाय

बैटिंग की बातें चलें फट कवित्त दे ठेल
अंट-संट बकते रहें खेलें अपना खेल

प्लेयर नेट प्रैक्टिस करें वो किताब रट लेय
जंह-जंह पर मौका मिले, सबको चौंका देय

कहत-कहत दो हाथ की अंगुली देय उठाय
बोल-बोल कर ओय गुरु निज थ्योरी समझाय

अगर रटे पुस्तक सदा जड़मति लगे सुजान
इस महान सिद्धांत का वे ही हैं पहचान

लाफ्टर शो औ खेल में नहीं करें वे भेद
जैसे समझे चुटकुले वैसे बल्ला-गेंद

जब बोलें तो सभी को चुप होना पड़ जाय
टोनी ग्रेग हों या सनी सबसे वे लड़ जाय

एमपी हैं, जज थे कभी और कभी एक्सपर्ट
जब चाहे, जिसमें जंचे, हो जायें कन्वर्ट

अफवाहें यह कह रही नासा की है मांग
करना चाहे स्टडी उनका बड़ा दिमाग

हो कवित्त या शायरी, चाहे गायें गान
हर कोई है सुन रहा उनको यही गुमान

असली गुरु-बानी कहाँ सबको यह संदेह
जो वे बोलें वही है, या जो नानकदेव

बनकर अब एक्सपर्ट वे फैलाते आतंक
प्रेमी जो हैं खेल के समझें उन्हें कलंक

न्यायालय अब कुछ करे सबकी यही गुहार
उससे ही बच सके है यह क्रिकेट-संसार

आई सी सी को चाहिए कर दे उनको बैन
यह डिमांड उससे करें दुनियाँ भर में फैन