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Saturday, January 8, 2011

प्लेयर + वैट + सेल्स टैक्स + टर्नओवर टैक्स + एडुकेशन सेस = ?




यह पोस्ट आई पी एल फर्स्ट के ऑक्शन पर लिखी थी. आज फिर से ऑक्शन हो रहा है तो सोचा कि फिर से छाप दूँ. पहले नहीं बांचा हो तो बांचिये:-)
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कल रतीराम की पान दुकान पर गया था. जाते ही मैंने कहा; "एक पान दीजिये."

मैंने उनसे पान लगाने को कहा लेकिन देख रहा हूँ कि वे अखबार पढने में व्यस्त हैं. पूरी तन्मयता के साथ लीन. मैंने फिर से कहा; "रतीराम भइया, एक ठो पान दीजिये."

मेरी तरफ़ देखे बिना ही बोले; "तनी रुकिए, लगा रहे हैं." ये कहकर अखबार पढ़ने में फिर से लग गए.

मैंने कहा; "अरे ऐसा क्या छप गया है जो पढ़ने में इतना व्यस्त हैं."

बोले; "अरे ओही, खिलाड़ी सब केतने-केतने में बिका, वोही देख रहे हैं." तब मेरी समझ में आया कि क्या पढ़ रहे हैं.

मैंने कहा; "अब पढ़ने से क्या मिलेगा. टीम तो आप खरीद नहीं सके."

बोले; "हाँ लेकिन हम देखना चाहता हूँ कि ई लोग का केतना दाम लगा."

मैंने कहा; "बहुत पैसा मिला है सबको. देखिये न धोनी ही छ करोड़ में बिके. तेंदुलकर चार करोड़ में. ऐसा पहली बार हुआ कि खिलाड़ी भी बिक गए."

मेरी बात सुनकर मुस्कुरा दिए. बोले; "अरे आप भी बड़े भोले हैं. ई लोग का पहला बार बिक रहा है. का पहले नहीं बिका है. काहे, भूल गए अजहरुद्दीन को, जडेजा को."

उनकी बात सुनकर मैं चुप हो गया. क्या करता, कोई जवाब भी तो नहीं था. फिर सोचते हुए मैंने कहा; "बहुत ख़बर रखते हैं क्रिकेट की."

अब तक वे अखबार छोड़ चुके थे. उन्होंने मेरी तरफ़ देखते हुए कहा; "अरे ई जो लोग टीम खरीदा है न, उनसे तो ज्यादा ही जानकारी रखते हैं. आपको का लगता है, मुकेश अम्बानी अपना काम करते-करते क्रिकेट देखते होंगे का? ऊ दारू वाले, का नाम है उनका, हाँ माल्या जी, ऊ देखते होंगे का. हम तो काम करते-करते कमेंट्री सुनते हैं. पूरा-पूरा जानकारी रखते हैं क्रिकेट का."

मैंने कहा; "ये बात तो है. ऐसे में एक टीम आपको जरूर मिलनी चाहिए थी."

बोले; "जाने दीजिये, अब का मिलेगा उसपर बात कर के. ओईसे एक बात बताईये, छ करोड़ में तो धोनी बिक गए लेकिन सेल टैक्स, भैट-वैट मिलकर केतना दाम पडा होगा, इनका?"

उनकी बात सुनकर मुझे हंसी आ गई. मैंने कहा; "अरे महाराज आप भी गजबे बात करते हैं. ये लोग आदमी हैं, कोई सामान नहीं कि इनके ऊपर भी सेल्स टैक्स लगे."

मेरी बात से कन्विंस नहीं हुए. बोले; "आदमी हैं तो फिर आलू-गोभी का माफिक काहे बिक रहा है ई सब?"

मैंने कहा; "आलू-गोभी की माफिक नहीं बोलिए हीरा-जवाहरात की तरह. बोली लगाकर खरीदे गए हैं."

मेरी बात सुनकर मुस्कुरा दिए. बोले; "बोली लगाकर बिके हैं, इतना त हमहू जानते हैं. सुनने से कैसा लगता है न. ऊ जो फिलिम में देखाता है कि कौनो सेठ का सबकुछ बरबाद हो गया और ऊ कर्जा में डूब जाता है तब उसका घर-दुआर जैसे हथौड़ा मार के बिकता है. ओईसे ही तो?"

मैंने कहा; "एक दम ठीक पहचाने. वैसे ही बिके हैं सब."

बोले; "एक बात बाकी गजबे होई गवा."

मैंने पूछा; "क्या?"

बोले; "विदेशी तेल, साबुन, शेम्पू वगैरह तो ठीक लगता है. ऊ का वास्ते हमरे देश का लोग सब बहुत पैसा पेमेंट कर देता है लेकिन विदेशी खेलाड़ी सब तो बहुत सस्ता में खरीद लिया सब. खिलाडी लोगों का वास्ते ज्यादा पईसा नहीं दिया कोई भी. सुने कि पार्थिव पटेल भी पोंटिंग से जादा दाम में बिक गए."

मैंने कहा; "ऐसा होता है. किस खिलाड़ी का कितना महत्व है, वो तो टीम वाले ही बता सकते हैं. वो लोग जिन्होंने टीम खरीदे है."

मेरी बात सुनकर उन्होंने मेरी तरफ़ कुछ ऐसे देखा जैसे मुझे बेवकूफ साबित करने पर तुले हैं. फिर बोले; "हम पाहिले ही बोले रहे न, आप बहुते भोले हैं. अरे ई सब चाल है टीम का मालिक लोगों का. नहीं तो आप ही कहिये, पार्थिव पटेल का इतना दाम. लगा जईसे बँगला पान खरीद रहा है लोग ऊ भी बनारसी पान का दाम देकर."

उनकी बात सुनकर मुझे लगा एक पान खाने आए थे और इतनी देर लग गई. बात खिलाड़ियों की बिक्री से होते हुए कहाँ-कहाँ से आखिर पान तक आ रुकी. मुझे लगा रतीराम जी से बात करते रहेंगे तो पता नहीं और कहाँ-कहाँ से होकर गुजरना पड़े. उनकी पार्थिव पटेल और बँगला पान वाली बात पर मैंने झट से कहाँ; "एक दम ठीक बोले हैं. इसी बात पर एक ठो बनारसी पान लगा दीजिये."

सुनकर हंस दिए. बोले; "ये लीजिये, अभिये लगा देते हैं."

चलते-चलते

सुनने में आया है कि अर्थशास्त्रियों के एक दल ने भारत सरकार के वित्त मंत्रालय और भारतीय रिज़र्व बैंक को एक ज्ञापन दिया है. इस ज्ञापन में इन्फ्लेशन के लिए बनाए गए होलसेल प्राईस इंडेक्स में बाकी चीजों के साथ-साथ क्रिकेट खिलाड़ियों को भी शामिल करने का आग्रह किया गया है. जब कुछ जानकारों ने क्रिकेट खिलाड़ियों के शामिल करने का विरोध यह कहकर किया कि; आख़िर आम जनता तो क्रिकेट खिलाड़ी खरीदती नहीं. ऐसे में उन्हें होलसेल प्राईस इंडेक्स में शामिल करने का औचित्य क्या है तो अर्थशास्त्रियों का जवाब था; "जिन लोगों ने टीम और खिलाडी खरीदे हैं, उन्हें इन्कम तो आम जनता की जेब से ही आनी है. ऐसे में पूरा भार जनता के ऊपर ही तो पड़ेगा."

आप का इस ज्ञापन के बारे में क्या विचार है?

Tuesday, April 27, 2010

हमरा त फ़ोन भी टैप नहीं होता....




बहुत दिन बाद कल रतिराम जी की दूकान पर जाना हुआ. करीब डेढ़ महीने के बाद. पिछले महीने आफिस से किसी को भेजकर पान मंगवा लेते थे. मैंने सोचा मार्च महीने में जाऊँगा तो रतिराम जी मन ही मन बहुत कुछ सोच लेंगे. मन में खुद से बात भी कर सकते हैं कि; "कैसा बैठा-ठाला मनई है कि इसको मार्च का महीना में भी कोई काम नहीं है. जब पूरा देश मार्च मना रहा है और देश का जीडीपी बढ़ा रहा है ता ई मनई आफिस से चलकर पान खाने आया है."

यही सब सोचकर नहीं गया मैं.

खैर, कल गया तो मुझे देखकर बोले; "अरे आइये-आइये. केतना दिन बाद लौके हैं. अब तो तबियत पहिले से ठीक-ठाक लग रहा है. बाकी चलने में अभी भी दिक्कत है. का कहता है डाक्टर?"

मैंने कहा; "डॉक्टर कहते हैं ठीक हो जाएगा."

मेरी बात सुनकर बोले; "ठीक हो जाएगा, ई बात त आठ महिना से कह रहे हैं. कोई नया बात नहीं बोले?"

मैंने कहा; "अब फिजियोथैरेपिस्ट आते हैं घर पर. पहले से काफी ठीक है. सच कहें तो अब डॉक्टर के पास जाना छोड़ दिया है मैंने."

मेरी बात सुनकर बोले; "अखीर में करना पड़ा ना वोही काम? आपके त हम नवंबरे में कहे थे कि ऊ डॉक्टर फंसा लिया है आपको. आ फायदा-ओयदा कुछ नहीं होगा. केतना का धक्का लगाया?"

मैंने कहा; "नहीं ऐसी बात नहीं है. मैंने तो इसलिए जाना छोड़ दिया कि उनका काम हो गया था. कोई इलाज नहीं समझ पाए होंगे. ऐसा होता है."

मेरी बात सुनकर उन्होंने एक तीखी सी मुस्कान छोड़ दी. देखकर लगा जैसे कह रहे हों 'हमको का समझाइएगा आप? बहुत दुनियां देखे हैं हम.' फिर मेरी तरफ देखकर बोले; " आप भी ना. कबूल थोड़े ना करेंगे हम ऊ समय जो कहे रहे, वोही सच था. ई डाक्टर सब को आप भी जानते हैं बाकी बोलेंगे नहीं. ई देखिये, इनको देखिये...देखिये-देखिये..देसाई साहेब हैं ई. ऊ का नाम है संस्था का? हां कौंसिल ...मेडिकल कौंसिल का सर्वेसर्वा. का करते हुए पकड़े गए? देखिये पेपर..खुदे देखिये."

मैंने कहा; "हर प्रोफेशन में कोई ना कोई खराब निकलता ही है. इसका मतलब सब खराब हैं, यह थोड़ी ना है."

मेरी बात सुनकर मुस्कुरा दिए. बोले; "आप महाराज...आप कूटनीतिज्ञ काहे नहीं हुए? आप होते त बहुत देश से अपना देश का सम्बन्ध ठीक हो जाता."

मैंने कहा; "क्या रतिराम जी? आप मेरी टांग खींच रहे हैं? खैर छोडिये ई सब. अपनी कहिये? का नया हो रहा है?"

बोले; "हाँ, आप त बहुत दिन से आये नहीं ना. आप बता नहीं पाए. एगो सीजनल बिजिनेस कर लिए इस साल."

मैंने सोचा ये सीजनल बिजनेस क्या करेंगे? गर्मी बढ़ गई है. ऐसे में शायद लस्सी की दूकान खोल लिया होगा इन्होने. यही सोचते हुए मैंने पूछा; " लस्सी और कोल्ड-ड्रिंक्स की दूकान कर लिए क्या?"

मेरी बात सुनकर हंस दिए. बोले; "अरे नहीं. कोल्ड-ड्रिंक्स त हम एही पान के दुकाने पर रखते हैं. असल में एक काम मिला था प्रिंटिंग का. वोही कर लिए."

उनकी बात सुनकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ. प्रिंटिंग के बिजनेस को कोई सीजनल बिजनेस क्यों कहेंगा भला? फिर मैंने सोचा कि शादी का मौसम है. ऐसे में रतिराम जी ने शायद विवाह के कार्ड छापने का काम शुरू कर दिया होगा. मैंने कहा; "समझ गया. विवाह का कार्ड छापने का धंधा शुरू कर दिया क्या आपने?"

वे बोले; "अरे नहीं-नहीं. असल में हमको प्रिंटिंग का एगो कांट्रेक्ट आई पी एल के चलते मिल गया था."

उनकी बात सुनकर लगा कि रतिराम जी ने निश्चित तौर पर कोई लम्बा हिसाब बैठा लिया है. मैंने कहा; "क्या बात है? कोलकाता नाईट राइडर्स के मैचेज के टिकेट प्रिंट करने का ठेका आपको ही मिला था क्या? इस बात पर तो पार्टी बनती है. कैसे बैठाए ये हिसाब?"

मेरी बात सुनकर बोले; "आप भी केतना दूर चले जाते हैं? अरे ऊ बात नहीं है. ई सब छापने के लिए हमीं हैं का? सौरव गांगुली के ससुर जी का छपाई का एतना बड़ा बिजनेस है आ आप हमरा नाम ले रहे हैं. असल में बात ई है कि हमको तीन-चार कंपनी से चौका-छक्का छापने का कांट्रेक्ट मिल गया था."

उनकी बात सुनकर मुझे हंसी आ गई. चौका-छक्का छापने का कांट्रेक्ट? ये कैसा कांट्रेक्ट है? यही सोचते हुए मैंने उनसे पूछा;" क्या बात करते हैं आप भी? चौका-छक्का भी कोई छापने की चीज है? आप क्या कहना चाहते हैं?"

मेरी बात सुनकर बोले; "हमको मालूम था कि आपको नहीं बुझाएगा. बताइए आप किरकेट के दीवाने बताते हैं खुद को अउर एही नहीं बुझाया आपको. अरे चौका-छक्का छापने का मतलब होता है ऊ सब पम्फलेट जो दर्शक सब हाथ में लेकर बैठा रहता है अउर चौका या फिर छक्का लगते ही हाथ उठा-उठाकर देखाता है. ओही सब छापने का कांट्रेक्ट मिल गया था. कमीशन पर छपवा दिए."

मैंने कहा; "क्या बात करते हैं आप भी महाराज? इस काम को आप सीजनल बिजनेस बता रहे हैं."

वे बोले; "त अउर का बताएं? ई सीजनल बिजनेस नहीं है? आप का समझते हैं? अब आई पी एल का खाली क्रिकेट टोनामेंट है? नहीं, अब ई उद्योग है. उद्योग तो उद्योग अब आई पी एल खुद एक सीजन है. जैसे जाड़ा, गर्मी, बरसात का सीजन होता है, ओइसे ही आई पी एल का भी सीजन होता है."

उनकी बात सुनकर लगा कि सही बात तो कह रहे हैं. मैंने पूछा; "तो आपको ये कांट्रेक्ट मिला कैसे?"

बोले; "अरे ऊ लेकरोड वाले राय बाबू हैं ना. अरे वोही जिनसे आपको मिलाये थे एकबार. उनका अब लम्बा हिसाब बैठ गया है आई पी एल में. मालूम नहीं आपको?"

मैंने कहा; "नहीं तो मुझे नहीं मालूम था.'

वे बोले; "अरे नहीं. अब ओंक हिसाब लम्बा हो गया है. अभी दू दिन पहिले ही त उनसे भी पूछताछ किया है इनकम टैक्स वाला सब. कल आये थे दूकान पर. बहुत खुश थे. कह रहे थे इनकम-टैक्स वाला सब एक बार पूछताछ कर लिया त अब नाम हो गया है."

मैंने कहा; "तब तो आपसे भी इनकम-टैक्स वाले पूछताछ कर सकते हैं. आखिर आप भी तो आई पी एल टीम खरीदने का कोशिश किये थे."

मेरी बात सुनकर बोले; "अरे कहाँ हमरा भाग्य ऐसा है? हम त भगवान् से बोले कि हे भगवान् हमरे दूकान पर भी अगर इनकम-टैक्स आई पी एल का कनेक्शन में रेड मार देता त केतना बढ़िया होता. बाकी कहाँ भाग्य में इनकम-टैक्स का रेड लिखा है. एक बार के लिए सोचे कि हमरे दूकान से ही मोदी जी के लिए तीन दिन पान गया था. ओही का रिलेशन में इनकम-टैक्स वाले कुछ पूछ लेते. बाकी हुआ नहीं ऐसा."

मैंने कहा; " मोदी जी माने ललित मोदी? वे पान भी खाते हैं?"

मेरी बात सुनकर हंस दिए. बोले; "अरे मिसिर बाबा, ई बड़े लोग का खाने के लिए अगर चार चीज ऐसा जाता जो ऊ लोग खाता है त साथ में बारह चीज ऐसा जाएगा जो ऊ लोग नहीं खाता है. पान भी ओही में से एक होगा."

मैंने कहा; "सही कह रहे हैं. वैसे मोदी जी अब बेचारे फंसे हुए हैं.'

मेरी बात सुनकर रतिराम जी बोले; "का बात करते हैं आप भी? फंसे-ओंसे कुछ नहीं हैं. सब ठीक हो जाएगा. समय थोड़ा खराब चल रहा है. बाकी किसी का कुछ होगा नाही."

मैंने उनसे पान लेते हुए कहा; "अच्छा चलता हूँ. और कुछ नया होगा तो बताइयेगा."

वे बोले; "अरे कहाँ हो रहा है नया कुछ? एक रात त सपना आया कि सरकार हमरा भी फ़ोन टैप कर लिया है. ऊ पत्रिका ..का कहते हैं उसको? हाँ, आऊटलुक में हमरा नाम भी छपा है फोटू के साथ. सपना में एतना ख़ुशी हुए कि कहिये मत. बाद में नींद खुला त बहुत दुःख हुआ. का करें, हम तो इतने गए-गुजरे हैं कि हमरा त फ़ोन भी टैप नहीं होता. एक बार इनकम-टैक्स का छापा या चाहे फ़ोन टैप हो जाता त जीवन सफल हो जाता..."

पान मुंह में दबाये मैं उनकी दूकान से चल.................

Friday, April 23, 2010

मोक्ष वाया क्रिकेट




शायद किन्ही गहन आध्यात्मिक क्षणों में उन्होंने अपने गुरु से पूछा होगा; "गुरुदेव, पेट्रोकेमिकल और कपड़ा बेंचकर बहुत पैसा कमाया परन्तु चित्त को शांति नहीं मिलती. कोई उपाय सुझाएँ कि चित्त को शांति मिले. अगर ऐसा नहीं हुआ तो मोक्ष प्राप्ति के मार्ग में बाधा उत्पन्न होगी. हिन्दू धर्म में कहा गया है कि..."

गुरुदेव ने उनकी बात काटते हुए तुरंत बताया होगा; "यजमान, चित्त को शांति मिले, इसके लिए आप क्रिकेट टीम क्यों नहीं खरीद लेते?"

अपनी बात को सही साबित करने के लिए गुरुदेव ने यहाँ तक कह दिया होगा कि; " हे यजमान, स्वयं वासुदेव श्रीकृष्ण ने क्रिकेट की महिमा का बखान करते हुए गीता में कहा है कि 'हे पार्थ, कलियुग में मोक्षप्राप्ति का एक ही मार्ग होगा और वह होगा किसी न किसी रूप में क्रिकेट नामक खेल से जुड़ना. कलियुग में जो भी इस खेल से जुड़ जाएगा उसे मोक्ष की प्राप्ति होगी. जो भी नहीं जुड़ सकेगा उसे मोक्ष की प्राप्ति तो दूर मोक्ष मार्ग पर जाकर मिलने वाली कच्ची पगडंडी के दर्शन भी नहीं होंगे."

उन्होंने क्रिकेट टीम खरीद ली. अब मैच के दौरान सूट-बूट से निकलकर टी-शर्ट और जींस में समाये हुए अपनी टीम की सफलता पर ताली बजाते हैं. हवा में पंच मारते हैं. अपने खरीदे गए गए खिलाड़ी द्वारा छक्का जड़ देने पर नाच-नाच कर तालियाँ बजाते हैं. शायद इन्ही क्षणों में मोक्ष के कीटाणु उनके शरीर से टकराते होंगे और उन्हें असीम आनंद देते होंगे. वे स्टेडियम में हजारों लोगों के सामने हेहर बने कूद रहे हैं. ऐसे लोगों के सामने जिन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की होगी कि हमेशा सूट-बूट में घुसा यह आदमी इस तरह से नाचेगा और करोड़ों लोग देख रहे होंगे.

लेकिन कहते हैं न कि मोक्ष की लालसा जो न कराये.

ये हाल केवल उनका नहीं है. ये तो ठहरे पेट्रोकेमिकल और कपड़ा बेचने वाले. सीमेंट और लोहा बेचने वाले और हवाई-जहाज उड़ाने वाले और शराब बेचने वाले का गुरु भी मोक्ष प्राप्ति का साधन क्रिकेट को ही बताता होगा. इस मामले में सारे गुरु एक जैसे होते होंगे वो चाहे अध्यात्मिक गुरु हों या मैनेजमेंट गुरु. कुछ बेंचकर, चाहे पैसा कमाया हो या पैसा गंवाया हो, मोक्ष प्राप्ति का साधन एक ही है, क्रिकेट.

जो पहले नहीं जुड़ सके और मोक्ष के मार्ग पर दो साल से पिछड़ गए वे अब जुड़ रहे हैं. पहुँच गए किसी गुरु के पास. बोले; "गुरुदेव, जिस जनता से हमारी कंपनी ने पैसा डिपोजिट लिया था वो बहुत तंग कर रही है. कहती है पैसा वापस दो. अब कहाँ से दें पैसा? वो तो खा चुके हैं. तिकड़म कर सरकार से किसी तरह तीन साल का समय लिया है लेकिन उसमें से दो साल ख़तम. मालूम है जनता का पैसा वापस नहीं कर पायेंगे. अगले साल फिर झमेला शुरू होगा. क्या करें गुरुदेव? चित्त शांत नहीं रहता. आप कोई मार्ग सुझाएँ. अब आपका ही 'सहारा' है."

गुरुदेव ने कहा होगा; "मात्र एक ही मार्ग है वत्स. क्रिकेट. चित्त शांत करने के लिए क्रिकेट टीम खरीद लो. मोक्ष प्राप्ति का यही साधन है."

वे पहुँच गए और सत्रह सौ करोड़ रुपया देकर क्रिकेट टीम खरीद ली. गरीब जनता का डिपोजिट वापस करने के लिए पैसे नहीं हैं लेकिन क्रिकेट टीम खरीद ली और मोक्ष का रास्ता साफ़ कर लिया.

हर मर्ज की दवा क्रिकेट है. न जाने किसको-किसको बचाता रहता है. जैसे सत्तर के दशक में डॉक्टर साहब लोग हर मर्ज़ का इलाज पेनिसिलिन से करते थे वैसे ही आज के जमाने में हर चीज का इलाज क्रिकेट से किया जा रहा है.

मंत्री जी के भी गुरु होंगे. उन्होंने भी बताया होगा कि; "वत्स मंत्री हो, टीम तो खरीद नहीं सकते. क्यों न किसी टीम के मेंटर बन जाओ. मंत्री और मेंटर में बड़ा जबरदस्त ताल-मेल है. मुझे तो लगता है कि मेंटर शब्द मंत्री शब्द से ही निकला होगा."

मंत्री जी बन गए मेंटर. बनने से पहले तमाम अध्ययन किया. एक्सल शीट्स को रातभर जागकर वैसे ही रट्टा मारा जैसे आठवीं का विद्यार्थी ज्यामिति का प्रमेय याद करता है; "त्रिभुज क ख ग में कोण क ख ग.....त्रिभुज क ख ग में कोण क ख ग.."

बाद में पता चला कि मोक्ष मार्ग पर बाधा आ गई. गाड़ी आगे नहीं जा पा रही थी और वे आगे बढ़ने पर अड़े हुए थे. ऐसे में एक्सीडेंट हो गया. अब अस्पताल में हैं और घाव सहला रहे हैं.

सरकार के मर्जों की दवा भी क्रिकेट है. सरकार के भी कोई गुरु होंगे. सरकार एक दिन उनके पास पहुँच गए होंगे; "अब क्या किया जाय गुरुदेव? महिला आरक्षण बिल लोकसभा में पेश करने का समय आ रहा है. अपने और पराये सभी नाराज हैं. फिनांस बिल पास करवाना है. संसद में मंहगाई पर बहस और वाक्आउट होने का चांस है. पिछले आठ महीने से कहते आ रहे हैं कि मंहगाई कम होगी, दस दिन बाद कम हो जायेगी लेकिन ऐसा नहीं हो रहा. बहुत झमेला है. क्या किया जाय?"

गुरुदेव ने कहा होगा; "वत्स क्रिकेट किस दिन काम आएगा?"

सरकार जी बोले होंगे; "क्या बात कर रहे हैं गुरुदेव? अब सरकार क्रिकेट टीम खरीदेगी ?"

गुरुदेव ने कहा होगा; "टीम खरीदने के लिए कौन कह रहा है वत्स? क्रिकेट से जुड़ना है. जो काम आपको २००८ में करना चाहिए था वह अब कर डालिए. सी बी आई, इनकम टैक्स, रा, इन्फोर्समेंट डायरेक्टरेट...ये सब किस दिन काम आयेंगे? इन्हें क्रिकेट से जोड़िये और चैन की नींद सोइए. चाहे तो ऍफ़ बी आई, सी आई ए वगैरह को भी उधार ले लीजिये और ललित मोदी को दलित मोदी बना दीजिये. इन्वेस्टिगेशन में नेताओं के खिलाफ सुबूत इकठ्ठा कीजिये और समय-समय पर उनके हाथ मरोड़ते रहिये."

अब सरकार अपने मोक्ष का रास्ता साफ़ करने में लगी हुई है.

पूरे देश को क्रिकेट चला रहा है या पूरा देश क्रिकेट को चला रहा है, समझ में नहीं आ रहा. एक कमीशन बैठाया जा सकता है.

जय क्रिकेट.