शाम का समय. रतीराम जी की चाय-पान दुकान. पंद्रह मिनटी बरसात ख़त्म हुए आधा घंटा बीत चुके हैं. हवा भी मूड बनाकर बही जा रही है. मूडी हवा के साथ जैसे ही उधर से चाय की महक चली, उससे मिलने के लिए इधर से किमाम की महक लपकी. पता नहीं दोनों कौन से पॉइंट पर मिलीं? यह भी पता नहीं कि मिलने के बाद दोनों ने कौन से दुःख-सुख की बात की? चाय से भरे मिट्टी के मुँहलगे कुल्हड़ भी आस-पास के वातावरण को मिट्टी की खुशबू सप्लाई किये जा रहे हैं. कुछ बिजी और ईजी लोग़ हैं. थोड़े हलकान और ढेर परेशान लोग़ भी.
एक बेंच पर बैठे दो लोग़ पूडल नामक शब्द की व्याख्या कर रहे थे. निंदक जी किसी के साथ अंडरअचीवर नामक शब्द डिस्कश कर रहे हैं. कमलेश 'बैरागी' जी मुझे देखते ही अपना हाथ पाकिट की तरफ ले गए. शायद जेब में पड़े पन्ने पर टीपी नई कविता निकाल रहे थे लेकिन मैं रतीराम जी की तरफ बढ़ा तो उन्होंने ने भी अपना हाथ जेब से खींच लिया. मैंने नमस्ते किया तो दाहिना हाथ उठकर उन्होंने आशीर्वाद टाइप कुछ दिया.
इधर जैसे ही जगत बोस रतीराम जी की दुकान से चले रतीराम जी के होठों पर बुदबुदाहट उभर आई. मैं पास ही खड़ा था तो सुनाई भी दी. रतिराम जी की बुदबुदाहट से जो शब्द फूटा वह था; बकलोल. मुझे हँसी आ गई. मैंने पूछा; "क्या हो गया?"
वे बोले; "अरे पूछिए मत. कुछ लोग़ का पान हमको ही बड़ी मंहगा पड़ता है."
मैंने कहा; "क्या हुआ क्या? क्या दो बार सोपारी मांग लिए क्या जगत दा?"
रतीराम जी पान को कत्था समर्पित करते हुए बोले; "अब का कहें आपसे? केहू-केहू को बुझाता ही नहीं कि कहाँ चुप होना है. ई बस ओही प्रानी हैं."
मैंने कहा; "वैसे हुआ क्या?"
वे बोले; "अब आप से का कहें? जब आये तो हम इनका बेटा का तारीफ कर दिए. बस ओही भूल हो गया हमसे. हम तारीफ का किये, ई शुरू हो गए. पूरा इतिहास बांच दिए हियें. पहिला कच्छा में केतना नंबर मिला था. दूसरा में केतना मिला. कौन-कौन मास्टर कब-क़ब का बोला लड़िका के बारे में. आ शुरू हुए तो शेस होने का नाम ही नहीं. हम कहते हैं की ससुर एगो बात शुरू हुआ त कहीं ख़तम भी होना चाहिए की नहीं? बाकी इनको कहाँ खियाल है ई सब चीज का? आ पूरा आधा घंटा चाट के गए हैं."
मैंने कहा; "होता है ऐसा. लोग़ बेटे से प्यार करते हैं तो उसकी प्रशंसा सुनने पर उपलब्धि गिना ही सकते हैं."
रतीराम जी ने हमको ऐसे देखा जैसे मन ही मन कह रहे हों; आप कौन से कोई जगत बोस से कम हैं? फिर आगे बोले; "देखिये, ई खाली बेटा का उपलब्ध गिनाने का बात नहीं है. ई असल में उस बात से खुद को जोड़ने का बात है जहाँ आदमी का तारीफ़ हो. आ ई केवल जगत बाबू का समस्सा है? सबका एही प्राब्लम है. ऊ आपके हलकान भाई कम हैं का?"
मैंने कहा; "क्या बात कर रहे हैं? हलकान भाई भी आये थे क्या इधर?"
वे बोले; "आये थे? पिछला तीन दिन से सबेरे एहिये अड्डा लगा रहे हैं निंदकवा के साथ. आ काल शाम को निंदकवे बोला हमको, त पता चला. हलकान बाबू पंद्रह दिन से अउरी बात को लेकर दुखी हैं."
मैंने कहा; "उनको किस बात का दुःख है? आजकल ब्लॉग पोस्ट पर कमेन्ट कम मिल रहे हैं क्या?"
रतीराम जी मुस्कुराए. फिर बोले; "हा हा..ऊनको आ कमेन्ट का कमी? उसका कमी त उनको कभियो नहीं होगा. देखे नहीं अभी पिछला कहानी जंगल का रात पर पैसठ कमेन्ट मिला? बाकी उनका प्राब्लम दूसरा है."
इतना कहकर वे निंदक जी को आवाज़ लगाते हुए चिल्लाए; "ऐ निंदक..निंदक."
उनकी आवाज़ शायद निंदक जी को सुनाई नहीं दी या उन्होंने जानबूझकर रिसपोंड नहीं किया. उन्होंने एक बार फिर से आवाज़ लगाई; "ऐ निंदक जी..अरे तनी हेइजे सुनिए भाई."
उधर निंदक जी अपने डिस्कशन में मशगूल. रतीराम जी बोले; "आ ई निंदकवा को देखिये. ई हफ्ता भर से किसी न किसी के साथ में अंडरअचीभर वाला बात का चर्चा किये जा रहा है. मनमोहन सिंह के ओतना धक्का नहीं लगा होगा जेतना इसको लगा है. उप्पर से कहता है कि कौनो इश्पंसर मिल जाता त टाइम पत्रिका के खिलाफ प्रदर्शन कर देता."
इतना कहकर उन्होंने फिर आवाज़ लगाई; " हे निंदक...अरे सुनो भाई. कभी हमरो सुनो तनी.
अब की बार निंदक जी ने उनकी सुन ली. उठकर आये. रतीराम जी से बोले; "काहे ला एतना परशान कर रहे हैं? चेन से बतियाने भी नहीं देते हैं."
रतीराम जी बोले; "का उखाड़ ले रहे हो बतिया के? हफ्ता भर से ओही एगो मुद्दा लेकर सबसे बतियाये जा रहे हो. आ बतियाने का एतना ही है त काहे नहीं धर लेते कौनौ न्यूज चैनल. हम तो कहेंगे कि ऊ अरनब्वा का चैनल पर चल जाओ.बाकी उहाँ, अंग्रेजी में बौकना पड़ेगा सब." इतना कहकर रतीराम ने मुस्कुराते हुए आँख दबा दी.
रतीराम जी की बात को समझते हुए निंदक जी बोले; "माटी से जुड़े मनई हैं महराज. आ ई जनम में तो अंग्रेजी भाषा नहिये बोलेंगे. बाकी अगला जनम का बाद में देखा जाएगा. आ बकैती छोड़िये औ ई बताइए कि बोलाए काहे हमको?"
रतीराम जी ने मेरी तरफ इशारा करते हुए कहा; "हम कहाँ बोलाए? बोलाए हैं आपके बड़के फैन मिसिर बाबा. इनको जरा बताइए कि हलकान भई को कौन बात का दुःख है? ऊ जो कल आप बताये रहे न हमके."
निंदक जी मेरी तरफ देखते हुए रतीराम जी से बोले; "आप भी कौनो बात पचा भी नहीं सकते हैं. मिश्रा जी के भी बता दिए?"
उनकी बात सुनकर रतीराम जी बोले; "अरे त मिसिर बाबा के त ही बताये हैं. कौन सा आपका बताया रहस्स बराक ओबामा के बता आये?"
निंदक जी को लगा कि अब वे बात को टाल नहीं सकते. लिहाजा बोले; "अरे अब क्या कहें मिश्रा जी आपसे? आपके हलकान भाई को इस बात का दुःख है कि पंद्रह दिन से कोई उनका तारीफ़ नहीं किया है."
मैंने कहा; "हलकान भाई को तो तारीफ मिलती ही रहती है. फेसबुक से लेकर ब्लॉग तक हर पोस्ट में इतना कमेन्ट मिलता है."
निंदक जी बोले; "अरे ऊ त भर्चुअल वल्ड का तारीफ है महराज. हम रीयल वल्ड वाला तारीफ़ का बात कर रहे हैं."
मैंने कहा; "रीयल वर्ल्ड में भी तारीफ मिलती ही रहती है उनको."
वे बोले; "एही त प्रॉब्लम है...चलिए अब आपके सामने भेद खोल ही देते हैं. त सुनिए. हलकान भई का माडस अप्रेंडी और तरह का है. ऊ किसी न किसी ब्लॉगर से हर दो तीन दिन पर कहते रहते हैं कि ऊ ब्लॉगर बहुत अच्छा लिखता है. आ ऐसा इस लिए कहते हैं ताकि ऊ पलट कर कह दे कि आप भी बहुत अच्छा लिखते हैं. बाकी हुआ क्या कि जब से सावन शुरू हुआ है तब से कोई ब्लॉगर इनको मिला ही नहीं जिससे यह कह सके. कारण ये है कि कोई न कोई ब्लॉगर हमेशा भोलेबाबा को जल चढाने जा रहा है. ऊपर से दू दिन पहले झा जी फ़ोन पर मिले तो ई कह दिए कि आप बहुत अच्छा लिखते हैं मगर झमेला ये हुआ कि झा जी उधर से नहीं कहे कि आप भी बहुत अच्छा लिखते हैं. बस तभी से हलकान भाई दुखी हैं."
मैंने कहा; "अरे तो हमको फ़ोन कर लेते. हम तो उनको वैसे ही बताते रहते हैं कि वे बहुत अच्छा लिखते हैं."
निंदक जी बोले; "अब ई तो नहीं पता कि आपको काहे नहीं फ़ोन किये. बाकी इसीलिए दुखी हैं ऊ."
तबतक रतीराम जी बोले; "देखिये तारीफ सुनना सभी चाहता है लोग़, बाकी ज़बरजस्ती नहीं न कर सकता है. ऊ दत्तो दा भी ओइसे ही हैं. एक दिन मार्निंग वाक में अपना कुत्ता लेकर आये. कुत्ता त का पूरा शेर टाइप लगता है ऊ. आ उसी समय एगो औरी हैं मुखर्जी बाबू, ऊ भी अपना कुत्ता लेकर आ गए. दत्तो बाबू ने मुख़र्जी बाबू का कुत्ता का खूब सराहना किया बाकी मुख़र्जी बाबू ने उनका कुत्ता का तारीफ नहीं किया तो दत्तो बाबू भी नाराज़ हो गए. त कहने का मतलब ई कि पब्लिक सब नाराज़ होकर आजकाल तारीफ लेना चाहता है."
रतीराम जी की बात ख़तम होती उससे पहले ही निंदक जी बोल उठे; "आ खाली दत्तो बाबू ही काहे? भूल गए कविराज का काण्ड?"
रतीराम जी बोले; "भूलेंगे कईसे? उनका त हमेशा से एही हाल है. ऊ आपके फ़ुरसतिया जी की सूक्ति है न कि "कबी का तारीफ कर दो त ऊ फट से दीन हीन हो जाता है", ऊ सूक्ति पूरा फिट बैठता है उनपर. पहिले तो हर नया कविता सुनायेंगे औउर कोई तारीफ नहीं किया त उसका साथ दू दिन बात नहीं करेंगे. बाकी जो तारीफ कर दिया त फट से उसका सामने हाथ जोड़ कर खड़े हो जायेंगे, ई कहते हुए कि बास आपका कृपा है. देख के लगता है कि जईसे सामने वाला ही इनको कागज़-कालम खरीद के दिया है आ नहीं तो ई कविता नहीं लिख पाते."
निंदक जी बोले; "हा हा हा..सही कह रहे हैं. ऊनका हाल देखकर उस समय एही लगता है."
रतीराम जी ने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा; "अब ऊ जमाना नहीं रहा कि शम्मी कपूर जैसा हीरो भी शरमीला जी को सुन्दर बताने का बास्ते तारीफ ख़ुदा का करें जो उनको बनाया था.हम कहते हैं तारीफ त अईसे भी होता है बाकी सामने वाला माने तब."
तब तक मेरा पान बन गया था. रतीराम जी हमको देते हुए बोले; "आ लीजिये खाइए. ई तो हरि अनंत हरि कथा अनंता टाइप बात है. पूरा शास्त्र ही लिखा जा सकता है. बस वेद व्यास जईसा कोई चाहिए."
Monday, July 23, 2012
तारीफ़ करूं क्या उसकी....
Monday, April 25, 2011
जनलोकपाल बिल की ड्राफ्टिंग कमिटी में हलकान भाई
"ड्राफ्टिंग कमिटी में ब्लॉगर समाज के प्रतिनिधि को जगह दिए जाने की आपकी मांग क्या उचित है?"; एक पत्रकार ने सवाल किया.
हलकान भाई ने सवाल को धीरज-मुद्रा में सुना. कुछ सोचा और बोले; "क्यों नहीं? हमारी मांग को अनुचित कैसे ठहराया जा सकता है? आज ब्लॉगर समाज का इस देश की सिविल सोसाइटी में महत्वपूर्ण योगदान है. अगर अनुसूचित जाति और जन-जाति के प्रतिनिधियों को शामिल करने की मांग की जा सकती है तो फिर ब्लॉगर समाज ऐसा क्यों नहीं कर सकता?"
उनकी बात सुनकर एक और पत्रकार ने सवाल दागा; "आपको लगता है कि ब्लॉगर समाज में योग्य व्यक्ति हैं जिन्हें इस कमिटी में शामिल किया जा सकता है?"
"क्यों नहीं? एक से बढ़कर एक योग्य ब्लॉगर हैं जो इस ड्राफ्टिंग कमिटी के मेम्बर होने लायक हैं. कितने लोग़ हैं जो बड़े ब्लॉगर एशोसियेशन के हेड हैं. कई लोग़ हैं जो ब्लॉगर पुरस्कार वितरण संस्था के मालिक हैं. कई ब्लॉग इतिहासकार हैं. पत्रकार, लेखक, वकील हैं. हजारों की संख्या में कवि हैं. इतिहास बताता है कि जब-जब देश पर संकट आया है तब-तब कवि ने देश को जगाया है. और फिर ये लोग़ तो हैं ही, मैं खुद भी हूँ. मैंने अपने ब्लॉग पर भ्रष्टाचार के ऊपर कई बार हमला किया है. करीब अट्ठारह-उन्नीस ब्लॉग पोस्ट लिखकर भ्रष्टाचारियों पर करारा 'पोस्टिक' प्रहार किया है. आपको यह जानकार ख़ुशी होगी कि मेरा नाम हिंदी ब्लागिंग की इतिहास नामक पुस्तक में पेज ४ पर है. इंडीब्लॉगर ने मुझे इकहत्तर की रैंकिंग दी है. मेरी एक कविता वाली पोस्ट पर सतहत्तर कमेन्ट मिले थे. आपको नहीं लगता कि मेरे ये अचीवमेंट मुझे इस लायक बनाते हैं कि मैं इस कमिटी में शामिल हो सकूँ?"; हलकान भाई ने पत्रकार से उल्टा सवाल कर डाला.
उनका सवाल सुनकर पत्रकार सकपका गया. कुछ कहने के लिए अपने मन में शब्दों को गूंथकर कोई वाक्य बना ही रहा था कि किसी और पत्रकार ने पूछा लिया; "लेकिन यह भी सुनने में आ रहा है कि आपको पीलीभीत हिंदी ब्लॉगर महासभा का समर्थन नहीं मिला है?"
"ऐसी बात नहीं है. मतभेद कहाँ नहीं होते? ब्लॉगर समाज में मतभेद उसमें मज़बूत लोकतंत्र का एक बड़ा उदहारण है. वैसे आपको बता दूँ कि झारखण्ड ब्लॉगर एशोसियेशन, धनबाद आंचलिक ब्लॉगर एशोसियेशन, छत्तीसगढ़ हिंदी ब्लॉगर महासभा, पानीपत ब्लॉगर एशोसियेशन, दिल्ली हिंदी ब्लॉगर एशोसियेशन, गाजियाबाद ब्लागिंग कम्यूनिटी, अखिल भारतीय सॉफ्टवेयर डेवलपर्स ब्लॉगर एशोसियेशन, आल इंडिया न्यू जनरेशन इंडस्ट्री ब्लॉगर एशोसियेशन, बैंक एम्प्लोयीज ब्लॉगर एशोसियेशन और ऐसे ही भारत भर से करीब अठहत्तर ब्लॉगर एशोसियेशन का समर्थन हासिल है मुझे. जहाँ तक पीलीभीत ब्लॉगर महासभा के समर्थन ना मिलने की बात है तो उसके बार में यही कहूँगा कि यह सरकार के कुछ मंत्रियों द्वारा फैलाई गई अफवाह है और इसमें कोई तथ्य नहीं है. दरअसल मैं यह बता देना उचित समझता हूँ कि सरकार चाहती है कि ब्लॉगर समाज की डिमांड को दफन कर दिया जाय"; हलकान भाई से स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा.
हलकान भाई हिंदी ब्लाग समाज के प्रतिनिधि के रूप में एक प्रेस कांफ्रेंस कर रहे थे और पत्रकार उनसे सवाल पूछ रहे थे.
जनलोकपाल बिल की ड्राफ्टिंग कमिटी को और व्यापक बनाने के लिए देश भर के तमाम तथाकथित समाज से आवाजें उठनी लगी थीं. सूचित जाति, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जन-जाति, ब्राह्मण महासभा, अखिल भारतीय क्षत्रिय अन्तराष्ट्रीय महासभा, भोजपुर इंटरनॅशनल सिटिज़न्स फोरम, इस्टर्न यूपी बाहुबली एशोसियेशन, तमिल क्लैशिकल इंटरनेशनल कांफ्रेंस, रेड्डी ब्रदर्स माइंस एम्प्लोयीज एशोसियेशन, आल इंडिया पब्लिक रिलेशंस ऑपरेटर्स फोरम, राडिया ट्रस्ट, टीवी न्यूज ऐंकर्स एशोसियेशन और ऐसे ही ना जाने कितने संगठनों ने अपने प्रतिनिधियों की भर्ती के लिए आन्दोलन शुरू कर दिया था. जाट महासभा ने एयरपोर्ट के रन-वे पर चक्का जाम कर दिया था और गुर्जर महासभा ने रेल लाइंस अपने नाम कर ली थी.
कई देसी-विदेशी पत्रकार यह कल्कुलेशन करने में बिजी थे कि अगर इस तरह का व्यापक आन्दोलन किया जा रहा है तो भारत में भ्रष्टाचार कैसे पनपा? लोग़ दंग थे. सबको इस बात का आश्चर्य था कि इतने ईमानदारों के बावजूद देश में भ्रष्टाचार फैला तो कैसे फैला? पी एचडी के लिए रजिस्ट्रेशन करवाने के इच्छुक कुछ छात्र इसी विषय पर पी एचडी करने के लिए कमर कस रहे थे. इन तमाम सभा, जनसभा और महासभा को देखकर हलकान भाई ने ब्लॉगर समाज का प्रतिनिधित्व अपने हाथ में ले लिया था और इस बात पर अड़े थे कि उन्हें ड्राफ्टिंग कमिटी में भर्ती मिलनी ही चाहिए.
सरकार इन तमाम समाज और महासभाओं के प्रतिनिधि को ड्राफ्टिंग कमिटी में जगह ना देने पर कमर कसी बैठी थी. कारण यह नहीं था कि इन संस्थाओं के प्रतिनिधियों के बैठने के लिए कुर्सी की कमी थी. असली कारण यह था सरकार का काम करने का तरीका. अगर इन संस्थाओं के प्रतिनिधियों को जगह दे दी जाती तो फिर सरकार को उतनी ही संख्या में मंत्री भिडाने पड़ते और यहाँ सरकार के लिए मुश्किल खड़ी हो जाती. हज़ारों मंत्रियों की खोज आखिर बहुत बड़ी समस्या थी.
सरकार के ज़ीओएम की एक मीटिंग हुई. मीटिंग का एजेंडा यह था कि इतने प्रतिनिधियों को कैसे टरकाया जाय? मीटिंग में कानून मंत्रालय के सेक्रेटरी को भी बुलाया गया था. कानून मंत्रालय में यह सेक्रेटरी ताजा-ताजा अर्बन डेवेलपमेंट मिनिस्ट्री से ट्रान्सफर हुआ था. सरकार के माथे से पसीना पोंछते हुए उसने तुरंत अपना आईडिया दे डाला. बोला; "सर, बड़ा मुँह और बड़ी बात होगी. इन संस्थाओं को टरकाने का एक तरीका यह है कि ड्राफ्टिंग कमिटी में जगह केवल एक संस्था को दी जाय और उसके लिए हमें लॉटरी का सहारा लेना चाहिए. मैंने अर्बन डेवेलपमेंट मिनिस्ट्री में रहते हुए सरकारी फ़्लैट अलाटमेंट में यह सीखा है. क्या बोलते हैं?"
उसकी बात सुनकर कानून मंत्री ने उसका माथा चूम लिया. बोले; "हर बात की तरह ही इस बात पर भी हमें तुमपर गर्व है."
दूसरे दिन सरकार ने लॉटरी कर डाली. लॉटरी में ब्लॉगर समाज के प्रतिनिधि को ड्राफ्टिंग कमिटी में जगह मिल गई. हलकान भाई बहुत खुश थे. इतिहास का निर्माण हो रहा था. उधर हिंदी ब्लागिंग का इतिहास लिखा जा रहा था और इधर उसी समाज का एक ब्लॉगर देश से भ्रष्टाचार मिटाने के लिए अपने हथियार चमका रहा था. हलकान भाई अब अक्सर भारतीय संविधान, लोकपाल, लोकतंत्र, जनतंत्र, अम्बेदकर, भ्रष्टाचार, टू ज़ी स्कैम, प्रधानमंत्री के कर्त्तव्य, राष्ट्रपति के अधिकार, स्पेन की राजनीति में लोकपाल जैसे विषयों के बारे में बात करते पाए जाते. वे अपना ज्ञान भी बढ़ाते जा रहे थे.
ड्राफ्टिंग कमिटी की पहली मीटिंग में करीब दस दिन बाकी थे. सबकुछ प्लान के मुताबिक़ चल रहा था कि कांग्रेस के एक महामंत्री ने हलकान भाई के ऊपर एक प्रेस कांफ्रेंस में आरोप लगा दिया. बोले- ब्लॉगर हलकान 'विद्रोही' को भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठाने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है. जब पत्रकारों ने इस बात पर उनसे रौशनी डालने के लिए कहा तो उन्होंने कहा - हमारे पास प्रूफ है कि हलकान 'विद्रोही' ने अपने ब्लॉग पर कमेन्ट करने के लिए फर्जी आईडी बनाई. उनके ब्लॉग पर कुल अट्ठाईस हज़ार चार सौ चौंसठ कमेन्ट हैं जिनमें से कुल तीन हज़ार पाँच सौ सोलह कमेन्ट हलकान 'विद्रोही' ने खुद बनाई गई फर्जी आई डी से किये हैं. उन्होंने श्री अमर सिंह के हिंदी ब्लॉग पर उनकी बुराई भी की है. पिछले साल ही एक ब्लॉगर एशोसियेशन के महामंत्री ने उनके ऊपर ब्लॉगर सम्मलेन के दौरान इकठ्ठा किये चंदे की रकम में हेर-फेर का आरोप लगाया था. उनके ऊपर एक एशोसियेशन के चुनाव के दौरान.....
अमनेस्टी इंटरनेशनल और ऐसी ना जाने कितनी संस्थाएं हलकान 'विद्रोही' समर्थन में आगे आ रही थीं.
दूसरे दिन ही टीवी चैनलों के पत्रकारों ने हलकान 'विद्रोही' के खिलाफ एक पुराना केस निकाला जब स्कूल की एक पिकनिक में उन्होंने दो समोसे और दो जलेबियाँ ज्यादा खा ली थीं. अब उनके ऊपर आरोपों की झड़ी लगने लगी थी. वे प्रेस कांफ्रेंस करके सफाई देते फिर रहे थे. देश के कई ब्लॉगर एशोसियेशन से उन्हें हताश ना होने की सलाह मिल रही थी. वे एक प्रेस कन्फ्रेसं कर रहे थे. मैं उन्हें टीवी पर देख रहा था. टीवी देखते-देखते मैंने घर से आवाज़ लगाई हलकान तुम संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं. इतना कहकर मैंने हाथ उठाया ही था कि चाय की बढ़िया खुशबू मेरे नाक में घुसी. अचानक नींद खुल गई.
पता चल चुका था कि मैं सपना देख रहा था.
Tuesday, October 26, 2010
हिंदी ब्लॉग जगत के लिए मेरा सबसे बड़ा योगदान

विजयादशमी के अवसर पर कोलकाता में नहीं था. कुछ कारणों से गुडगाँव में था. न तो किसी से मुलाकात हो सकी और न ही इस शुभ अवसर पर किसी को बधाई दे सका. वापस आया तो पता चला कि दशमी के दिन हलकान भाई घर पर आये थे. मुझे न पाकर काफी दुखी हुए.
मैंने सोचा कि देर से ही सही उनसे मिल लूँ. यही कारण था कि रविवार को उनसे मिलने गया. मैंने सोचा कि उन्हें दशमी की बधाई दे डालूँ और साथ ही ब्लागिंग पर कुछ चर्चा वगैरह करके एक पोस्ट लिख मारूं और हिंदी ब्लागिंग के प्रति अपने कर्त्तव्य का निर्वाह कर डालूँ.
शाम को उनके घर पर पहुँचा. घर के भीतर कुछ शोर सुनाई दे रहा था. एक बार के लिए समझ में नहीं आया कि क्या कारण हो सकता है?
डोर-बेल बजाया. थोड़ी ही देर में हलकान भाई आये. देखकर लगा कुछ क्रोधित थे. हिम्मत नहीं हुई कि उन्हें तुरंत विजयादशमी की शुभकामनाएं दे डालूँ. फिर मन में आया कि कहीं पूछ न लें कि; "तुम मेरे घर किस लिए आये हो?"
मैंने उनसे धीरे से कहा; "विजयादशमी की शुभकामनाएं, हलकान भाई."
मेरी तरफ देखते हुए बोले; "काहे की शुभकामनाएं? विजयादशमी शुभ कहाँ रही इसबार?"
मैंने कहा; "ऐसा क्यों कह रहे हैं हलकान भाई? विजयादशमी तो हमेशा शुभ ही होती है."
वे बोले; "क्या शुभ होगी? इन जाहिलों के साथ रहकर विजयादशमी मेरे लिए कैसे शुभ होगी?"
मैंने कहा; "कुछ समस्या हो गई क्या हलकान भाई?"
वे बोले; "अरे, अब क्या कहूँ तुमसे? ऐसा जाहिल परिवार मिला है कि समस्या हुई नहीं है, समस्या मेरे घर में बिछौना बिछाकर बैठ गई है."
मैंने कहा; "ऐसा क्यों कह रहे हैं हलकान भाई? लगता है कुछ गंभीर बात हो गई घर वालों से?"
वे बोले; "अब तुमसे क्या बताएं? जब घरवालों का यह हाल है तो बाहर वालों के बारे में क्या कहें?"
मैंने कहा; "पहेलियाँ न बुझायें हलकान भाई. बताएं तो सही कि हुआ क्या?"
अभी मैंने अपनी बात कही ही थी कि भाभी ज़ी आ गईं. बोली; "हमसे सुनो. हम बता रहे हैं. सब मामला ऊ कबिता की बजह से हुआ है."
मैंने कहा; "कौन कविता?"
वे बोलीं; "अरे कौन कबिता क्या? ओही कबिता जो ई अपने ब्लॉग पर लिखते हैं."
मैंने कहा; "क्या हुआ हलकान भई? ऐसा तो नहीं हुआ कि आपने कविता लिखी थी और किसी की गलती से वह डिलीट हो गई?"
हलकान भाई को शायद लगा कि उन्हें पूरी बात बता देनी चाहिए. वे बोले; "अब क्या कहें तुमसे? पिछले सप्ताह मैंने एक कविता अपने ब्लॉग पर पब्लिश की थी. अपने ब्लॉगर भाई-बंधु ने उसे बहुत बढ़िया कविता बताया और उसकी सराहना की. सराहना के कुल छत्तीस कमेन्ट मिले थे. सबकुछ ठीक चल रहा था तबतक मेरी माता ज़ी ने अपना कमेन्ट देकर उस कविता को घटिया बता दिया. मैं कहता हूँ, जब बाकी लोग़ उसे बढ़िया बता रहे हैं तो क्या ज़रुरत थी इनको घटिया बताने की? इनकी देखा-देखी तीन-चार लोग़ और उस कविता को घटिया बता गए. अब तुम्ही बताओ इन जाहिलों के ऊपर गुस्सा नहीं आएगा? ऊपर से माताजी की देखा-देखी हमारे भाई साहब ने भी कमेन्ट कर डाला कि माँ का कहना सही है. कविता घटिया है. ये मेरे परिवार वाले हैं कि मेरे दुश्मन हैं?"
उनकी बात सुनकर भाभी ज़ी ने कहा; "अरे त एही बास्ते कोई अपनी माँ से झगड़ता है? कोई अपना भाई से झगड़ता है? हम कहते हैं ऐसा कबिता लिखना ही काहे जो घर में झगड़ा करवा दे?"
भाभी ज़ी की बात सुनकर हलकान भाई बोले; "आपको कुछ पता नहीं है चीजों के बारे में. आप कुछ मत बोलिए. चुप रहिये. ब्लागिंग में एक एड्भर्स कमेन्ट का मतलब बुझाता है आपको?"
उनकी बात सुनकर भाभी ज़ी बोलीं; "का होगा? पहाड़ टूट जाएगा? कौन सा कैरियर ख़राब हो जाएगा आपका? ब्लागिंग ही पेट भरता है का आपका?"
उनकी बात सुनकर हलकान भाई बोले; "आपसे त बात करना ही अपराध है. आप जाइए चाह बनाइये."
भाभी ज़ी वहाँ से चली गईं.
मैंने कहा; "जाने दीजिये हलकान भाई. जो हो गया सो हो गया. ऐसा हो ही जाता है कभी-कभी."
वे बोले; "अब क्या कहें तुमसे? आजतक कभी भी हमको कविता पर एक भी एड्भर्स कमेन्ट नहीं मिला था लेकिन ई घर वालों की वजह से पहली बार दाग लग गया. ऊपर से नंबर ऑफ कमेन्ट गिरकर सत्तासी से सीधा बयालीस. इसके पहले वाली पोस्ट पर मुझे सत्तासी कमेन्ट मिले थे. और इस पोस्ट पर केवल बयालीस. क्या बताऊँ शिव तुमको? इच्छा तो हो रही है कि ब्लागिंग ही छोड़ दूँ."
मैंने कहा; "ऐसी बात न कहें हलकान भाई. एक छोटी सी बात के लिए ब्लागिंग छोड़ने की क्या ज़रुरत है? आप यह देखिये न कि बच्चन, निराला और दिनकर ज़ी की तरह आपकी सभी कवितायें बहुत बढ़िया हैं. बस इतनी सी बात है कि उन महान कवियों की तरह ही आपकी भी कुछ कवितायें केवल बढ़िया है. कवियों को उनकी बहुत बढ़िया कविताओं के लिए याद किया जाता है. बढ़िया कविताओं के लिए नहीं. आप ब्लागिंग छोड़ने का अपना ख्याल दिल से निकाल दें. ऐसी उंच-नीच हो ही जाती है."
मेरी बात सुनकर बोले; "अब क्या कहें तुमसे? हम तो पोस्ट भी लिख लिए थे कि अब और ब्लागिंग नहीं करेंगे. बाकी तुम कहते हो तो ठीक है. वो पोस्ट पब्लिश करने के लिए शिड्यूल में डाल दिया था...."
मैंने कहा; "आप उस पोस्ट को डिलीट कर दीजिये हलकान भाई. आपसे बहुत उम्मीद है ब्लॉग जगत को. हिंदी ब्लागिंग को ऊपर पहुँचाने में आपकी भूमिका अविस्मरणीय है. आज हिंदी ब्लागिंग जहाँ पर है अगर वहाँ पर आप छोड़ देंगे तो उसे जिस जम्प की ज़रुरत है वह उसे नहीं मिलेगी........"
मैंने बहुत मनाया तो वे मान गए. दोनों ने चाय पी. मैं उनसे विदा लेकर अपने घर आ गया.
हलकान भाई ने ब्लागिंग छोड़ने का अपना फैसला वापस ले लिया. मेरे कहने से उन्होंने ऐसा किया. आशा है हिंदी ब्लॉग जगत मेरे इस प्रयास को स्वर्णाक्षरों में लिखेगा. हिंदी ब्लॉग जगत के लिए मेरा यह सबसे बड़ा योगदान है.
आप बताइए, मेरा यह योगदान याद रखेंगे तो?
Wednesday, August 4, 2010
वर्ष के सर्वश्रेष्ठ सम्मान वितरक - हलकान 'विद्रोही' .
सुबह-सुबह उनके दर्शन हो गए तो सवा सौ ग्राम शुद्ध तुकबंदी वाला वह गाना याद आ गया कि; 'राह में उनसे मुलाकात हो गई, जिससे डरते थे वही बात हो गई....ल ला ला ला ल ला ला ला ला..'
'
जी हाँ, आज सुबह-सुबह हलकान भाई से मुलाकात हो गई. इधर-उधर की बातें हुईं. उन्होंने बिभूति नारायण राय के बयान की निंदा की. उसके बाद मंहगाई पर चिंतित हुए. बात आगे बड़ी तो सुरेश कलमाडी की आलोचना करते हुए इस बात पर चिंता व्यक्त की कि सरकार हम नागरिकों का पैसा पानी की तरह बहा रही है. पैसे के पानी की तरह बहने की बात शुरू हुई तो याद आया कि मानसून की कमी और बाढ़ पर भी बात कर सकते हैं. फिर उसपर भी बात हुई. उसके बाद उन्होंने सरकार की नीतियों पर क्षोभ प्रकट करते हुए आशंका जताई कि आनेवाला समय मिडिल क्लास और लोवर मिडिल क्लास के लिए बहुत कष्टदायक होगा.
बात करते-करते जब मुझे यह लगने लगा कि अब लगभग सभी मुद्दे ख़त्म हो चुके हैं तभी उन्होंने अपनी वसीयत की बात शुरू कर दी. उन्होंने अपने ब्लॉग पर उनकी वसीयत टाइप करने के लिए मुझे धन्यवाद् जैसा कुछ देते हुए कहा; "दूसरे के लिए इतना कुछ करने का जज्बा मैंने बहुत कम ब्लॉगर में देखा है. मेरी वसीयत अपने ब्लॉग पर पब्लिश करने के लिए मैं पोस्ट लिख कर तुम्हें सम्मानित करना चाहता हूँ."
बस उनकी बात सुनकर मैं डर गया. मुझे लगा कि; 'जिस बात से हमेशा डरते रहे, कहीं ऐसा न हो वह हो ही जाए. ऐसा न हो कि हलकान भाई सचमुच मुझे सम्मानित कर दें. वैसे भी मुझे हमेशा डर लगा रहता है कि ब्लॉग पुरस्कार देने वाले किसी दिन पकड़कर सम्मानित कर देंगे तब क्या करूँगा? देखेंगे न लेते बनेगा और न ही ना करते.'
खैर, मैंने उनसे कहा; "हलकान भाई, जाने दीजिये न. क्या सम्मानित करना है? आपने उस पोस्ट पर कमेन्ट कर दिया, यही मेरे लिए बहुत बड़ी बात है."
वे बोले; "केवल कमेन्ट से ब्लॉगर का सम्मान पूरा नहीं होता. ब्लॉगर का असली सम्मान तब होता है जब उसके योगदान के लिए उसे पोस्ट लिखकर सम्मानित किया जाय."
मैंने कहा; "जाने दीजिये न हलकान भाई. मैंने आपकी वसीयत ही तो अपने ब्लॉग पर छापी थी. वह तो मुझे वैसे भी छापना ही था."
वे बोले; "अरे ऐसे कैसे जाने दें? नहीं जाने दूंगा.मैं तुम्हें सम्मानित करके रहूँगा."
फिर कुछ सोचने के बाद बोले; "लेकिन कौन सी कैटेगरी में सम्मानित करूं तुम्हें?"
मैंने कहा; "मैं समझा नहीं."
मेरी बात सुनने के बाद सोचते रहे. अचानक बुदबुदाए; "अच्छा, वर्ष का सर्वश्रेष्ठ टंकक सम्मान कैसा रहेगा?"
मैंने कहा; "टंकक? टंकक का मतलब क्या होता है, हलकान भाई? मैं समझा नहीं?"
वे बोले; "अरे टंकक का मतलब टंकण करने वाला. मतलब टाइप करने वाला. तुमने मेरी वसीयत अपने ब्लॉग पर जो छापी उसके लिए तुमने टाइप तो किया ही न."
कुछ समझ में नहीं आ रहा था. मैं सोचने लगा कि सम्मान मिलेगा और वो भी टंकक का! बड़ी दुविधा में फँसा था. क्या कहूँ हलकान भाई से? उन्हें सीधा-सीधा मना कर दूँ?
उनकी बात सुनकर मन में आया कि; 'मतलब मेरे साथ ज्ञान भइया भी गए?'
वैसे मुझे बड़ा अजीब लग रहा था. अजीब कैटेगरी है; वर्ष का सर्वश्रेष्ठ टंकक. फिर मन में उत्सुकता जागी कि हलकान भाई से पूछें कि वे भइया को कौन सी कैटेगरी में सम्मानित कर रहे हैं? मैंने उनसे पूछा; "वैसे हलकान भाई, आप ज्ञान भइया को कौन सी कैटेगरी में सम्मानित कर रहे हैं?"
वे बोले; " अभी तक तय नहीं हुआ है. असल में कैटेगरी तय करने वाली हमारी समिति में ज्ञान जी के सम्मान की कैटेगरी को लेकर मतभेद हो गया है. लेकिन चिंता करने की बात नहीं है. हम जल्द ही इस मतभेद को सुलझा लेंगे."
मैंने कहा; "मतलब अभी तक तय नहीं हुआ है? वैसे क्या-क्या कैटेगरी हो सकती है उनके लिए?"
वे बोले; "देखो तीन कैटेगरी में मामला उलझा हुआ है. हमारी समिति के दो मेंबर चाहते हैं कि ज्ञान जी को वर्ष का सर्वश्रेष्ट मार्निंग ब्लॉगर सम्मान दिया जाय. दो मेंबर चाहते हैं कि उन्हें वर्ष का सर्वश्रेष्ठ गंगा प्रचारक ब्लॉगर सम्मान दिया जाय. वही समिति के एक मेंबर इस बात पर टिके हुए हैं कि ज्ञान जी को वर्ष का सर्वश्रेष्ठ संचारक ब्लॉगर सम्मान दिया जाय."
मैंने कहा; "संचारक? यह कौन सी कैटेगरी हुई?"
वे बोले; "संचारक ब्लॉगर का मतलब तो मुझे भी नहीं मालूम है लेकिन अगर हमारी समिति के मेंबर ने ऐसी कोई कैटेगरी बनाई है तो उसका कुछ न कुछ मतलब ज़रूर होगा."
मैंने कहा; "तो आपने बाकायदा समिति बना रखी है जो कैटेगरी का आविष्कार करती है? जिससे ब्लॉगर भाइयों और बहनों को पकड़ कर सम्मानित किया जा सके?"
वे बोले; "अरे इतना बड़ा महोत्सव है. बिना तैयारी के कैसे शुरू कर देता? बाकायदा समिति है. फाइव मेंबर कमीटी . मेजोरिटी का डिसीजन फाइनल होता है. हाँ, कभी-कभी किसी कैटेगरी पर झमेला हो जाता है जैसे ज्ञान जी वाली कैटेगरी पर. ऐसी परिस्थिति में मेरा निर्णय फाइनल और मान्य होता है."
मैंने कहा; "तो हलकान भाई, इसका मतलब आप और भी लोगों को सम्मानित करेंगे? वैसे और कौन-कौन सी कैटेगरी है?"
वे बोले; "बहुत लम्बी लिस्ट है कैटेगरी की. सुनाना शुरू करूँगा तो पूरा एक दिन लगेगा. अभी तक सत्तर कैटेगरी का अनाऊँसमेंट हो चुका है. लेकिन अभी भी करीब एक सौ पैसठ कैटेगरी बाकी हैं. कुछ प्रमुख कैटेगरी हैं जैसे सर्वश्रेष्ठ आंचलिक जूनियर ब्लॉगर, सर्वश्रेष्ठ आंचलिक सीनियर ब्लॉगर, सर्वश्रेष्ठ आंचलिक प्रचारक, सर्वश्रेष्ठ आंचलिक प्रताड़क, सर्वश्रेष्ठ कानूनी ब्लॉगर, सर्वश्रेष्ठ फ़िल्मी ब्लॉगर, सर्वश्रेष्ठ भोजपुरी फ़िल्मी ब्लॉगर, सर्वश्रेष्ठ......"
मैंने कहा; "बस-बस...हलकान भाई मैं समझ गया. आप महान काम कर रहे हैं."
वे बोले; "ब्लागिंग का मतलब केवल पोस्ट और टिप्पणी लिखना नहीं होता है. ब्लागिंग का मतलब सम्मान भी होता है. ब्लागिंग का मतलब अपमान भी होता है. ब्लागिंग का मतलब गुमनाम भी होता है. ब्लागिंग का मतलब...."
मैंने कहा; "समझ गया हलकान भाई. पूरी तरह से समझ गया."
वे बोले; "तो तुम्हारा वर्ष के सर्वश्रेष्ठ टंकक के रूप में सम्मान पक्का..."
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| पुरस्कार |
क्या कहता? कुछ नहीं बोला. हाँ यह सोचते हुए उनसे विदा हुआ कि जब तक पोस्ट लिख रहा हूँ तबतक ठीक है, जिस दिन पोस्ट नहीं लिख पाऊँगा उसी दिन से सम्मान देने का धंधा शुरू करूँगा और सबसे पहले हलकान भाई को वर्ष के सर्वश्रेष्ठ सम्मान वितरक के ख़िताब से सम्मानित करूँगा.
Friday, July 2, 2010
ब्लॉगर हलकान 'विद्रोही' की नई ब्लॉग-वसीयत
अप्रैल २००८ में अपने हलकान भाई, यानि ब्लॉगर हलकान 'विद्रोही' ने अपनी ब्लॉग-वसीयत लिखी थी. मैंने उसे अपने ब्लॉग पर पब्लिश भी किया था. चूंकि ऐसा पहली बार हुआ था कि किसी हिंदी ब्लॉगर ने अपनी ब्लॉग-वसीयत लिखवाई थी, इसलिए उस वसीयत में केवल ग्यारह प्वाइंट थे. हलकान भाई ने वसीयत के बारे में लिखा था;
पिछले हफ्ते हलकान भाई ने अपनी ब्लॉग वसीयत में बदलाव किया. उन्होंने मुझे नई वसीयत दिखाते हुए कहा; "ले जाओ, अपने ब्लॉग पर छाप देना. तुम्हें अपना लिखा हुआ कुछ छापने की आदत तो है नहीं. कभी डायरी, कभी चिट्ठी छापते रहते हो. ले जाओ एक बार फिर से मेरी वसीयत छाप दो."
मैंने कहा; "जाने दीजिये हलकान भाई. आप इसे पाने ब्लॉग पर ही छाप दीजियेगा."
वे बोले; "नए ट्रेंड के अनुसार एक ही पोस्ट जितने ज्यादा ब्लॉग पर छपे उतना ज्यादा नाम होता है. इसलिए ले जाओ और इसे अपने ब्लॉग पर छाप दो. मैं भी बाद में अपने ब्लॉग पर छाप दूंगा. वसीयत तो मेरी ही है. और ब्लॉग भी मेरा है."
तो मैं हलकान भाई की नई वसीयत छाप रहा हूँ. आप बांचिये.
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मैं ब्लॉगर हलकान 'विद्रोही' , ब्रह्माण्ड का सबसे धाँसू हिन्दी ब्लॉगर, अपने पूरे होश-ओ-हवाश में ये ब्लॉग-वसीयत लिख रहा हूँ. कल तक मैं समझता था कि वसीयत केवल घर-बार, जमीन-जायदाद, बैंक लॉकर, सोना-चाँदी वगैरह के भविष्य में होने वाले बँटवारे के लिए लिखी जाती है. लेकिन जब से एक साईट ने मेरे ब्लॉग की कीमत दस लाख डॉलर से ज्यादा आंकी है, तबसे ये ब्लॉग ही मेरी सबसे अमूल्य निधि बन बैठा है. रूपये-पैसे, सोना-चाँदी वगैरह की कीमत मेरे लिए दो कौड़ी की भी नहीं रही. इसलिए ये ब्लॉग-वसीयत लिखना मेरे लिए मजबूरी हो चुकी है.
मेरी वसीयत की मुख्य बातें निम्नलिखित हैं.
०१. जिस दिन मेरा आखिरी क्षण आये और डॉक्टर मुझे मृत घोषित कर दें तो भी डॉक्टरों की बात पर विश्वास न किया जाय. मैं सचमुच मरा हूँ कि नहीं ये जानने के लिए मेरे कान में कहा जाय; "हलकान उठो, तुम्हारी पोस्ट पर नया कमेंट आया है." ये सुनने के बाद भी अगर मैं उठकर न बैठूं तो मुझे मृत मान लिया जाय.
०२. मेरे चले जाने के बाद मेरे ब्लॉग के संचालन का काम मेरे तीनों पुत्रों के हाथों में दे दिया जाय. मेरे ब्लॉग का नाम भी बारूद से बदलकर 'बारूद का ढेर' कर दिया जाय. जब मैं अकेले लिखता था तबतक तो बारूद नाम समझ में आता है लेकिन जब वही ब्लॉग मेरी जगह मेरे तीन पुत्र संचालित करेंगे तो 'बारूद का ढेर' नाम खूब
फबेगा.
०३. मेरे मरने के बाद मेरे ब्लॉग को सामूहिक ब्लॉग में कन्वर्ट कर दिया जाय. जब तक मैं लिखूंगा तब तक सप्ताह में तीन से ज्यादा पोस्ट नहीं लिख पाऊंगा. इस बात की वजह से मुझे उन ब्लागरों से हमेशा ईर्ष्या होती रही है जो दिन में पाँच-पाँच पोस्ट ठेलते रहते हैं. मेरी दिली तमन्ना है कि मेरे पुत्र एक दिन में कम से कम बीस पोस्ट ठेलें ताकि हर फीड एग्रीगेटर के पेज पर मेरा ब्लॉग ही छाया रहे. मेरी आत्मा को शान्ति देने का इससे अच्छा तरीका और कुछ नहीं हो सकता.
०४. मेरी मृत्यु के बाद मेरे पुत्र सिर्फ़ उन्ही ब्लॉग पर कमेंट करें जिनके ब्लॉग पर मैं कमेंट करता रहा हूँ. मुझे श्रद्धांजलि देते हुए हुए जितनी भी पोस्ट लिखी जाय, उनपर बहुत सारी फर्जी आईडी बनाकर ढेर सारा कमेंट अवश्य करें. मेरा मंझला पुत्र, जो मुहल्ले के तमाम घरों की दीवारों पर चोरी-छिपे गालियाँ लिखता है, उसे मैं बेनामी कमेंट करने और बाकी के ब्लागरों के लिए गालियाँ लिखने का महत्वपूर्ण काम सौंपता हूँ.
०५. इतने दिनों तक ब्लॉग लिखने के बावजूद मैं आजतक बिना छंद और तुकबंदी की एक भी कविता नहीं लिख सका. ये बात मेरे मन में हीन भावना पैदा करती रही है. मेरा छोटा पुत्र जो रह-रहकर आसमान की तरफ़ देखने लगता है और जिसके अन्दर बुद्धिजीवी बनने के सभी लक्षण मौजूद हैं, मैं उसे बिना छंदों और बिना तुकबंदी वाली कविता लिखने का काम सौंपता हूँ. अगर मेरा छोटा पुत्र इस काम को न कर सके तो उसे चिंता करने की जरूरत नहीं. वह जयशंकर प्रसाद, राम दरश मिश्र और पाब्लो नेरुदा की कविताओं को अपनी कविता बताकर तब तक छापता रहे जब तक पकड़ा न जाए.
०६. मैंने ब्लॉग लिखकर समाजवाद लाने की एक कवायद शुरू की थी. इतने दिनों के बाद मैं अपने अनुभव से कह सकता हूँ कि समाजवाद के आने का चांस बहुत कम है. लेकिन चूंकि मैं इस दर्शन में विश्वास रखता हूँ कि इंसान को हिम्मत नहीं हारनी चाहिए इसलिए मैं चाहता हूँ कि मेरी इस अधूरी कोशिश को मेरे तीनों पुत्र आगे बढायें. हिम्मत न हारना ही असली समाजवादी की निशानी है.
०७. मैंने अपनी 'बकलमख़ुद' लिखकर तैयार कर ली है. हालांकि अजित वडनेरकर जी ने मुझे लिखने के लिए कभी नहीं कहा लेकिन मैंने इस आशा से लिख लिया था कि वे एक न एक दिन जरूर कहेंगे. अगर मेरे जीते जी वे नहीं कहते हैं तो फिर मेरे पुत्रों को मैं जिम्मेदारी सौंपता हूँ कि वे मेरे बकलमख़ुद को मेरे ही ब्लॉग पर छाप लें.
०८. मैंने अभी तक के अपने ब्लागिंग कैरियर में बाकी के ब्लागरों के लेखन को कूड़ा बताया है. मैं चाहता हूँ कि मेरे जाने के बाद मेरे पुत्र मेरे इस काम को आगे बढायें और वे हर दूसरे दिन किसी न किसी ब्लॉगर के लेखन को कूड़ा बताएं. मैं यह भी चाहता हूँ कि मेरे तीनों पुत्र महीने में कम से कम एक बार हिन्दी ब्लागिंग में विद्यमान अपरिपक्वता के बारे में लिखकर बहस जरूर करवाएं. ऐसी पोस्ट पर टिप्पणियों की संख्या में कमीं नहीं आती.
०९. मैंने कई बार ऐसी पोस्ट लिखी जिसमें तमाम महान लोगों को दो कौड़ी का बताया. कई बार तो मैं गाँधी जी को भी बेकार घोषित कर चुका हूँ. मैं चाहता हूँ कि मेरे पुत्र मेरे इस काम को भी आगे बढायें. महीने में कम से कम एक पोस्ट ऐसी लिखें जिसमें किसी महापुरुष को बेकार बतायें. ऐसी पोस्ट लिखने से खूब नाम होता है.
१०. मेरे ब्लॉग पर लगाए गए विज्ञापन की कमाई को मेरे पुत्र आपस में बाँट लें. मुझे आशा ही नहीं पूरा विश्वास है कि इस मामले में कोई झगडा नहीं होगा क्योंकि कमाई की रकम १०० डॉलर पार नहीं कर सकेगी.
११. बहुत कोशिश करने के बाद भी मैं अपने ब्लॉग पर आजतक एक भी विमर्श नहीं चला सका. विश्व साहित्य हो या जाति की समस्या, नारी मुक्ति आन्दोलन हो या फिर विश्व अर्थव्यवस्था, साम्यवाद हो या फिर साम्राज्यवाद, ऐसे किसी भी विषय मैं एक भी बहस आयोजित न कर पाने की अक्षमता मुझे बहुत खलती है. मैं चाहता हूँ कि मेरे बाद मेरे पुत्र मेरे इस ब्लॉग पर महीने में कम से कम एक बहस जरूर आयोजित करें. ऐसी बहस चलाने से मेरी इस हीन भावना से मेरी आत्मा को मुक्ति मिलेगी.
१२. जब तक मैं ब्लॉग लिख रहा हूँ मैंने अपनी तमाम पोस्ट में मेरे अन्दर की कन्फ्यूजियाहट ही दर्शाई है. तीन साल तक ब्लागिंग करने के बावजूद मैं खुद कभी इस कन्फ्यूजन से निकल नहीं पाया कि ब्लागिंग मेरे लिए उपयोगी है या नहीं? मैं चाहता हूँ कि मेरे बाद मेरे तीनों पुत्र भी इसी कन्फ्यूजन का शिकार रहें. ऐसा करने से दूसरों के मन में उनकी छवि एक आत्मनिरीक्षण करने वाले ब्लॉगर की बनी रहेगी.
१३. पिछले तीन महीने से मैं ब्लागिंग पर एक शोध कर रहा हूँ. इस शोध से मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि ब्लॉग एग्रीगेटर सिवाय फर्जीवाड़ा के और कुछ नहीं. मैंने अपनी खोज से यह सिद्ध कर दिया है कि पुराने हिंदी ब्लॉगर असल में ब्लॉगर नहीं बल्कि मठाधीश हैं और एग्रीगेटर के फर्जीवाड़े की वजह से उन्हें ब्लॉगर माना जाता है. मैं जब तक जिंदा हूँ, इस मुद्दे पर मैं रोज पोस्ट ठेलता रहूँगा. मेरे मरने के बाद मेरे तीनों पुत्र मेरे शोध को न सिर्फ आगे बढ़ाएं बल्कि हर दृष्टिकोण से पैदा होनेवाले फर्जीवाड़े पर लिखें.
१४. मेरे ब्लॉग बारूद के अलवा मेरे नौ और ब्लॉग हैं जिन्हें मैं फर्जी आई डी से चलाता हूँ. मैं चाहता हूँ कि मेरे मरने के बाद मेरे बाकी के ब्लॉग भी मेरे पुत्र चलायें. मेरे बाकी के ब्लॉग हैं;
मैं चन्दन तुम पानी
देख फकीरा रोया
डाकिया डाक लाया
क्रांति संभव है
ब्लॉग-आत्मा
यहाँ से भारत को देखो
बादल पर लिख दिया तेरा नाम
जिगर मा बड़ी आग है
जिंदगानी फिर कहाँ
१५. मैं जब से ब्लॉग लिख रहा हूँ तब से ही मैंने अपने ब्लॉग को हर एग्रीगेटर से जोड़ रखा है. हर एग्रीगेटर से जुड़े रहने के बावजूद मैं उन्हें गाली ही देता आया हूँ. मैं चाहता हूँ कि मेरे बाद मेरे पुत्र अपने ब्लॉग को नए-पुराने और भविष्य में आनेवाले अग्रीगेटर से जोडें और मेरी परंपरा को निभाते हुए उन्हें गाली देते रहें.
१६. तमाम ब्लागरों को कमेन्ट करके गाली देने की मेरी क्षमता की वजह से मुझे आजतक एक निहायत ही ईमानदार और खरी-खरी कहने वाला ब्लॉगर माना जाता रहा है. मैं चाहता हूँ कि मेरे बाद मेरे पुत्र मेरे इस काम को आगे बढायें जिससे लोग उन्हें भी ईमानदार मानें.
१७. तमाम कोशिश करने के बाद भी मैं एक भी अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर मिलन अटेंड नहीं कर पाया. मेरी बड़ी इच्छा है कि मैं एक बार अमेरिका में ब्लॉगर मिलन का आयोजन करूं. अगर मेरे जीते जी मैं यह कार्य न कर सकूं तो मेरे पुत्र यह कार्य अवश्य करें और एक ब्लॉगर मिलन वाशिंगटन में आयोजित करें. ऐसा करने से मेरी आत्मा को शांति मिलेगी.
१८. अपने तीन साल के ब्लागिंग जीवन में अब तक मैं अट्टारह बार ब्लागिंग छोड़ने की धमकी दे चुका हूँ और चार बार ब्लॉग बंद कर चुका हूँ. इसका फायदा यह होता है कि टिप्पणियां खूब मिलती हैं और लोगों की टिप्पणी से साबित होता है कि मैं महत्वपूर्ण ब्लॉगर हूँ. मेरे बाद मेरे पुत्र महीने में कम से कम एक बार ब्लागिंग छोड़ने की बात को लेकर पोस्ट अवश्य लिखें. इससे धमकी की प्रैक्टिस होती रहती है.
१९. अपने तीन साल के ब्लागिंग जीवन में करीब हर चौथे दिन मैंने ब्लॉग जगत के तथाकथित खराब माहौल के बारे में पोस्ट लिख कर माहौल खराब करने की कोशिश की. यह बहुत दुर्लभ और महान कला है जिसपर प्रैक्टिस की सहायता से ही मास्टरी की जा सकती है. मैं चाहता हूँ कि मेरे बाद मेरे पुत्र माहौल खराब करने की प्रैक्टिस करते रहे. इससे बहुत नाम होता है.
२०. मेरी सबसे बड़ी ब्लॉग-तमन्ना यह है कि एक दिन मेरे ब्लॉग की चर्चा टाइम मैगेजीन में हो. अगर मेरे जीते जी यह संभव नहीं होता तो मैं चाहूँगा कि मेरे पुत्र मेरे बाद भी कोशिश करें जिससे मेरे ब्लॉग के बारे में कभी न कभी टाइम मैगेजीन में अवश्य छपे.
२१. ब्लॉग लेखन के दौरान मैंने हमेशा ही महिलाओं के उठने-बैठने से लेकर उनके खान-पान और पोशाक के बारे में बहुत ज्ञान दिया है. उन्हें हमेशा रास्ता दिखाया है कि उन्हें समाज में कैसे रहना है और कैसे चलना है. मेरे बाद मेरे पुत्र भी यह काम करते रहें. ऐसा करने से उनकी गिनती भारतीय संस्कृति के सबसे बड़े रक्षकों में होगी जो ईमेज-स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होती है.
साल २०१० में बनने वाली वसीयत में बस इतना ही. अगर भविष्य में मैंने अपनी वसीयत में कोई बदलाव किया तो सार्वजनिक तौर पर उसकी सूचना अपने साथी ब्लागरों को अवश्य दूंगा.
ब्लाग वसीयत लिखी हलकान 'विद्रोही' दिनांक २४-०६-२०१०,
Friday, May 28, 2010
राष्ट्रीय ब्लॉगर दल?
"हें हें ..तो मानते हैं न कि कोई न कोई योजना है?"; प्रभु चावला जी ने हलकान भाई से अपने चिर-परिचित अंदाज़ में पूछा.
हलकान भाई ने शायद सीधी बात का अक्षय कुमार एपिसोड देख रखा था. उन्होंने अक्षय कुमार 'ईस्टाइल' में दांत चियारते हुए कहा; " हे हे ..नहीं-नहीं, ऐसी कोई बात नहीं. हमारी पार्टी ने अभी तक कुछ फैसला नहीं किया है. जब चुनाव परिणाम आयेंगे तो फिर देखा जाएगा. हमारा मानना है कि राजनीति में विचारों का विरोध होता है, लोगों का नहीं. "
अपने हलकान भाई यानी ब्लॉगर हलकान 'विद्रोही' राष्ट्रीय ब्लॉगर दल के महासचिव की कैपेसिटी में सीधी बात नामक कार्यक्रम में प्रभु चावला जी से 'सीधी बात' कर रहे थे. सोलहवीं लोकसभा के चुनाव सम्पन्न होने और नतीजे आने के बीच एक रविवार पड़ गया था. चावला जी ने हलकान भाई को उस रविवार में फिट कर दिया था.
चुनावों में हमसब के दल राष्ट्रीय ब्लॉगर दल यानि 'राब्लाद' का बहुत जोर प्रचार करने की वजह से हलकान भाई को समय नहीं मिला था. वे कुछ थके हुए भी थे लेकिन प्रभु चावला जी द्वारा कई दिनों की कोशिश के बाद वे कार्यक्रम में जाने के लिए तैयार हो गए थे.
"धनबाद ब्लॉगर एशोसियेशन का विलय झारखण्ड ब्लॉगर एशोसियेशन में जब पिछले साल हुआ, उसी से आभास हो गया था कहीं न कहीं यह राजनीतिक महत्वाकांक्षा अब केवल राज्य स्तर की नहीं रही. अब यह राष्ट्रीय हो गई है."; प्रभु चावला जी ने फिर से चार-पांच अदाओं में अपना सिर हिलाते-घुमाते हुए कहा.
अब हलकान भाई को लगा कि अक्षय कुमार 'ईस्टाइल' में बात को टाला नहीं जा सकता. वे अचानक राग दरबारी के लंगड़ की तरह आध्यात्म मोड में आते हुए बोले; "हमारी लड़ाई तो सत्त की लड़ाई है चावला जी. आप पत्रकार हैं न. आप नहीं समझेंगे. आपलोग कहीं न कहीं कहीं नामक जुमला बोलकर पता नहीं क्या-क्या कह जाते हैं. वैसे भी महत्वाकांक्षा कोई बुरी बात नहीं है. "
"हें हें..लेकिन बातें तो हो रही हैं न. आठ महीने पहले रायपुर में जो सम्मलेन हुआ, खबर है कि उसी में यह निर्णय ले लिया गया था कि हाई कमान के फैसले को न मानते हुए प्रदेश ब्लॉगर एशोसियेशन वहां की सभी लोकसभा सीटों पर उम्मीदवार खड़ा करेगा"; प्रभु चावला जी ने अपने किसी विश्वस्त सूत्रों के हवाले से प्राप्त जानकारी को साझा किया.
"देखिये सम्मलेन के निर्णय पहले ब्लॉग पर लिख दिए जाते थे. फोटो-सोटो छप जाया करती थी तो पता चलता था कि क्या हुआ है. जितने लोग सम्मलेन में जाते थे, उतनी पोस्ट आती थी. अब तो सम्मेलनों के निर्णय गुप्त रखे जाते हैं. ऐसे में आपको कहाँ से जानकारी मिली?"; हलकान भाई ने बड़े सर्द लहजे में कहा. इतना कहकर वे हँसने लगे.
उनकी हँसी से प्रभावित प्रभु चावला बोले; "हें हें...कुछ न कुछ तो बात होगी..बिना आग धुंआ नहीं उठता. अच्छा चलिए एक बात बताइए. अगर कांग्रेस को इन चुनावों में कुछ कम सीटें मिलीं तो आपकी पार्टी उसे समर्थन देगी?"
चावला जी की बात सुनकर हलकान भाई ने उनसे उल्टा सवाल किया; "आप यही सवाल कांग्रेस पार्टी से पूछिए. मेरा मतलब अगर आर. बी. डी. को कुछ कम सीटें मिलीं तो कांग्रेस समर्थन करेगी क्या?"
उनका सवाल सुनकर प्रभु चावला सकपका गए. खैर, फिर से दो-तीन बार अपना सिर इधर-उधर करते बोले; "कोलीशन पोलिटिक्स में तो आपको समर्थन देना ही पड़ेगा."
"क्यों देना पड़ेगा? अगर हम सबसे बड़े दल बनकर उभरे जो कि हम उभरेंगे तो फिर तो कांग्रेस समर्थन करेगी हमारी पार्टी को"; इतना कहते हुए हलकान भाई सीरियसता की एक और सीढ़ी चढ़ गए.
उनका आत्मविश्वास देखकर प्रभु चावला की टाई ढीली हो गई. हें हें करते हुए बोले; "अच्छा, आपको क्या लगता है? आपकी पार्टी देश को चला पाएगी? जिस राजनीति की ज़रुरत है कोलीशन को चलाने में आपलोगों को वह राजनीति आती है?"
"बहुत अच्छे ढंग से. बहुत अच्छे ढंग से चलाएगी देश को हमारी पार्टी. चावला साहब हमें राजनीति में नौसिखुआ मत समझिये...... आज की तारीख में पूरे देश में सत्य, अहिंसा, इंसानियत, मुरौव्वत, वगैरह-वगैरह अगर किसी समाज में है तो वह है ब्लॉग समाज. हम एक दिन इस देश में सरकार बनायेंगे यह बात हमें पांच साल पहले से ही पता थी"; हलकान भाई ने जानकारी दी.
"आपकी पार्टी के पास कोई प्लान है देश को चलाने का? मेरा मतलब आपने कोई खाका खींचा है कि आप देश को कैसे चलाएंगे? क्या बदलाव लायेंगे?"; प्रभु चावला जी ने सीधा सवाल पूछा.
"देश को चलाने के लिए हमने पहले से ही प्लान बना रखा है. हमारा प्लान पुराना है........ हम बिना प्लान के कुछ नहीं करते. हमारा प्लान है कि हम पहले समाज को बदलेंगे. फिर देश को बदल डालेंगे. फिर हम विश्व को बदलेंगे. उसके बाद अगर वैज्ञानिकों का, वैसे हमारे ब्लॉग जगत में भी बहुत वैज्ञानिक हैं, फिर भी अगर वैज्ञानिकों का साथ मिला तो हम ब्रह्माण्ड को बदल डालेंगे. आज देखने की बात है कि क्यों हमें लोगों का इतना बड़ा समर्थन मिल रहा है? आज की तारीख
में..."; हलकान भाई बहुत जोश में बोलते जा रहे थे.
मैं टीवी देखते-देखते उन्हें चीयर-अप कर रहा था; "कम्मान, हलकान भाई, कम्मान... आज प्रभु चावला को पहली बार कोई मिला है. आज उनको पता चलेगा कि असली पोलिटिशियन क्या होता है...अब हमारी सरकार बनने से कोई नहीं रोक सकता..."
अचानक लगा जैसे कोई बार-बार पीठ पर थपकी दे रहा है. आँखें खुल गईं. देखा तो पत्नी सामने खड़ी थीं. बोलीं; "सरकार बन गई हो तो अब चाय पी ली जाय?'
मैंने कहा; "क्या हुआ?"
वे बोलीं; "क्या हुआ वो तो तुम बताओगे."
अब कैसे बताता कि सपने में क्या देखा. बता देता तो भद्द पिट जाती.
सुबह से सोच रहा हूँ. इस तरह का सपना? कहीं ये सम्मेलनों, एसोशियेशनों का असर तो नहीं है?
Thursday, April 8, 2010
दो पड़ोसियों के बीच एक महापड़ोसी
हलकान भाई के घर जाना पड़ा. जाते भी न कैसे? आज आफिस के लिए तैयार हो रहा था तभी उनका फ़ोन मिला. उन्होंने बताया कि अर्जेंट है इसलिए आज ही उनसे मिलूं. जब मैंने कहा कि शाम को आता हूँ तो भड़क गए. बोले; " कहते तो बड़े भाई हो और बड़े भाई के लिए जरा सा समय नहीं निकाल सकते? क्या सारा संबोधन दिखावे का है?"
मैंने कहा; "नहीं हलकान भाई. ऐसी बात बिलकुल नहीं है. आप कहें तो आज आफिस ही न जाऊं."
मैंने सोचा कहेंगे "नहीं-नहीं मेरे लिए अपना काम हर्ज़ मत करो" लेकिन मेरी सोच मुंह के बल गिर पड़ी जब फ़ोन पर उधर से आवाज़ आई; " मत जाओ. आज मैं तुम्हें पुकार रहा हूँ. मैं तो क्या समझो देश तुम्हें पुकार रहा है. ऐसे में एक दिन आफिस नहीं भी जाओगे तो क्या हो जाएगा? वैसे भी आफिस में जाकर करते क्या हो? केवल ब्लॉग पर टिप्पणियां देते हो जिससे तुम्हें भी मिलें."
यह बात तो हलकान भाई ने सही कही.
खैर, सुबह नाश्ता करके उनके घर पहुँच गए. दूर से देखा तो अपने बरामदे में ही बैठे थे. माथे पर चिंता की रेखाओं से लैस. मुखमुद्रा ऐसी जिसे देखकर कोई डरते हुए पूछ ले कि हलकान भाई, कहीं कोई चल बसा क्या? एक बार मन में आया शायद छत्तीसगढ़ में हुए नक्सली हमले में मरे सीआरपीऍफ़ के जवानों के बारे में सोचकर दुखी हैं. यह सोचकर मैं खुद को तैयार करने लगा कि इस मुद्दे पर क्या-क्या कहना है? किसे गाली देना है? किसे जिम्मेदार ठहराना है?
अभी मैं यह सोच ही रहा था कि खुद को उनके बरामदे में पाया. मैं उनके सामने खड़ा था. मैंने औपचारिकता के नाते पूछा; "क्या हुआ हलकान भाई? आपने अचानक बुलाया. सबकुछ ठीक है तो?"
मेरी बात सुनकर भी वे कुछ नहीं बोले. चुप-चाप बैठे रहे. देखकर लग रहा था कि किसी बात पर कोई बहुत बड़ा सदमा लगा है इन्हें. मैं इंतज़ार करने लगा कि अब कुछ बोलेंगे. या फिर सोच रहे हैं कि क्या बोलना है?
मैंने दोबारा पूछा; "क्या हुआ हलकान भाई? सब खैरियत है तो?"
"सब खैरियत है तो?" में ज़रूर एक विशेष फ़ोर्स होता होगा. ऐसा फ़ोर्स जो "सबकुछ ठीक है तो?" में नहीं है. यह फ़ोर्स शायद इसलिए है कि उर्दू के शब्द वजनदार होते हैं.
शायद इसीलिए अब वे मुझसे मुखातिब थे. मेरी तरफ देखते हुए उन्होंने कहा; "सब खैरियत रहता तो फिर तुम्हें बुलाता ही क्या?"
उनकी बात दर्द में डुबकी लगाती सी प्रतीत हुई. मैंने कहा; " बात तो आपकी सच है. वैसे समस्या क्या है?"
वे बोले; " पड़ोसियों की वजह से परेशान हूँ."
मैंने सोचा कहीं पड़ोसियों ने मिलकर इन्हें सताया तो नहीं? या कहीं इस बात पर तो पड़ोसी नाराज़ नहीं हो गए कि ये कभी-कभी रात को 'हरमुनिया' बजाकर भजन और ग़ज़ल गाते हैं? एक और बुराई है इनके अन्दर. कभी-कभी पड़ोसियों को, जिन्हें ब्लागिंग के बारे में कोई इंटरेस्ट नहीं है, उन्हें ब्लागिंग के किस्से सुनाते हैं. अपनी पोस्ट के बारे में जबरदस्ती बताते हैं. हो सकता है किसी पड़ोसी को ये बात ठीक नहीं लगी होगी और बोर होकर उसने इन्हें गाली-फक्कड़ दे दिया हो?
अभी मैं सोच ही रहा था कि क्या हुआ होगा तभी वे बोल पड़े; " असल में पड़ोसियों की वर्तमान स्थिति बहुत बुरी है. दोनों एक-दूसरे के खून के प्यासे हो गए हैं. कभी भी खून-खराबा हो सकता है. लाशें गिर सकती हैं. इसी को लेकर मैं बहुत चिंतित हूँ."
मैंने कहा; "लेकिन ऐसी स्थिति क्यों आ गई? किस बात पर ठन गई है दोनों में?"
वे बोले; " पता नहीं किस बात पर ठनी है लेकिन स्थिति बहुत भयावह है. कभी भी क़त्ल हो सकता है."
मैंने पूछा; "लेकिन आपको ऐसा क्यों लग रहा है? कोई तो घटना हुई होगी जिसकी वजह से आपको ऐसा लग रहा है."
वे बोले; " घटना तो वैसे कोई नहीं हुई लेकिन मैंने कल ही साहिल को बाज़ार से एक लाठी खरीदते हुए देखा. अब तुम ही बताओ कोई लाठी क्यों खरीदेगा? किसी को मारने के लिए ही न?"
मैंने कहा; "क्या बात करते हैं हलकान भाई आप भी? आप केवल साहिल के लाठी खरीदने से इस निष्कर्ष पर पहुँच गए कि वो किसी को मारना चाहता है? अरे लाठी किसी और काम के लिए खरीद सकता है. हो सकता है उसने कुत्तों को डराने के लिए लाठी खरीदी हो."
मेरी बात सुनकर वे बोले; " मैंने बहुत दुनियाँ देखी है शिव. ये बाल धूप में सफ़ेद ऐसे ही नहीं हो गए हैं. बिना किसी को मारने का प्लान बनाए कोई लाठी नहीं खरीदेगा. और फिर बात केवल साहिल के लाठी खरीदने तक सीमित होती तो कोई बात नहीं थी. मैंने बसंत को भी साहिल के बारे में कुछ कहते हुए सुना है. हो न हो दोनों एक-दूसरे के खून के प्यासे हो गए हैं. मैंने बसंत को कल समझाने की कोशिश की तो मेरे ऊपर ही भड़क गया. मैं उसे समझा रहा था कि साहिल भी तुम्हारा ही भाई है लेकिन वो था कि...."
अभी हलकान भाई की बात पूरी नहीं हुई तभी भाभी जी आ गईं. बोलीं; "और पूरा बात काहे नहीं बताते हैं? चुप काहे हैं?"
भाभी जी की बात सुनकर मुझे लगा कि और कुछ हुआ है जिसे हलकान भाई बताना नहीं चाहते. मैंने उनसे पूछा; " और क्या हुआ भाभी जी? आप ही बताइए."
वे बोलीं; "अरे ई जबरजस्ती दोनों का पीछे पड़े हैं. कल बसंत को पकड़ कर कहने लगे कि हम तुम्हारे बड़े भाई के जैसे हैं. साहिल भी तुम्हारा ही भाई है. इनका बात सुनके बसंत भड़क गया. बोला हमको भाई-साई नहीं चाहिए. हमरे बड़े भाई समस्तीपुर में हैं न. त ई बोले कि तुमको साहिल से मिल-जुल कर रहना चाहिए. बस एही बात पर ऊ गाली-फक्कड़ दे दिया. आ तभिये से मूड खराब करके बैठे हैं.."
भाभी जी की बात सुनकर हलकान भाई चुप हो गए. अचानक बोल बैठे; " कौन बोला तुमको ई सब बताने के लिए? देश-दुनिया का तुमको केतना ज्ञान है? अरे पड़ोसी होने के नाते हमारा धरम बनता है कि दोनों को रास्ता देखायें."
उनकी बात सुनकर भाभी जी बोलीं; " त आप का सोचते हैं? ऊ लोग नहीं जानता है कि कौन रस्ते चलना है? आप ही रास्ता देखायेंगे तभी ऊ लोग चलेगा? आये बड़े रास्ता देखाने वाले."
दोनों की बात सुनकर मुझे लगा कि अगर ऐसा कुछ हो भी गया है तो मुझे हलकान भाई ने क्यों बुलाया? मैं इस मामले में क्या कर सकता हूँ? मैंने उनसे पूछा; " लेकिन हलकान भाई, आपने मुझे क्यों बुलाया? मैं क्या कर सकता हूँ?"
वे बोले; "तुमको इसलिए बुलाया कि तुम उन दोनों को समझाओ. हो सकता है वे तुम्हारी बात समझ जाएँ."
मैंने कहा; " हलकान भाई आप उनके पड़ोसी हैं. वे आपकी बात नहीं समझते तो मेरी क्या समझेंगे? वैसे भी जाने दीजिये. आपका क्या जाता है?"
मेरी बात सुनकर भाभी जी बोल पड़ीं; " अरे ई बात समझेंगे तब तो? इन्हें तो बड़ा बनने का नशा चढ़ा है. जिसको-तिसको पकड़कर उसे छोटा और खुद को बड़ा बताते रहते हैं. एनके दुनियाँ का भला करने का नशा चढ़ा है. फालतू में आपको भी परेशान किये आज."
उनकी बात सुनकर मुझे पता चल गया कि यह दो पड़ोसियों के बीच महापड़ोसी बनने की कवायद के पीछे हुआ है. हलकान भाई असल में भाईगीरी करना चाहते हैं. सारी समस्या इसी की वजह से हुई है.
अचानक मुझे कहीं लिखी हुई पंक्तियाँ याद आ गईं. लिखा था; 'भला करने वाले बिकट भले लोग होते हैं. उन्हें अगर भला करने का मौका न मिले तो हिंसा पर उतर आते हैं.'
मैं हलकान भाई के घर से वापस लौट आया. रास्ते में सोच रहा था कहीं किसी दिन ऐसा न हो कि हलकान भाई को अगर भलाई करने का मौका न मिले तो वे भी हिंसा पर न उतर आयें.
Monday, January 4, 2010
ब्लॉगर हलकान 'विद्रोही' का राष्ट्रकवि 'दिनकर' के नाम पत्र
अब तक यह जग-जाहिर हो गया है कि मेरी ब्लागिंग में मौलिक कुछ भी नहीं. जो कुछ भी मौलिकता है वह दूसरों की है. इंटरव्यू, डायरी, न्यूजपेपर की रपट वगैरह-वगैरह, मैं कहीं से उड़ाकर, कहीं से चोरी कर लाता हूँ और छाप देता हूँ. आप लोगों में से कुछ लोगों को भी आदत पड़ गई है यही सबकुछ पढ़ने की. तो ठीक है. तो आपकी आदत को सम्मान देते हुए मैं एक चिट्ठी छाप रहा हूँ. हलकान 'विद्रोही' जी ने यह चिट्ठी राष्ट्रकवि 'दिनकर' के नाम लिखी थी. शायद उन्होंने कभी सोचा नहीं होगा कि चिट्ठी को वे अपने ब्लॉग पर छापेंगे उससे पहले मेरे हाथ लग जायेगी. अब लग गई तो लग गई. मैं छाप दे रहा हूँ. आप बांचिये.
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आदरणीय स्वर्गीय राष्ट्रकवि दिनकर जी,
आप आज जीवित रहते तो चरण स्पर्श लिख देता. नहीं हैं तो वह कैसे लिखूँ? चलिए, आप जहाँ भी हों, मेरा मतलब चाहे जहाँ, वहीँ से मेरा चरण स्पर्श स्वीकार कर लें. ना मत कहियेगा, मैं सबका चरण स्पर्श नहीं करता. इस तरह से देखेंगे तो मैं आपके ऊपर एक तरह का एहसान कर रहा हूँ. हे राष्ट्रकवि, आपके मन में विचार उठ रहे होंगे कि मैं कौन? जाहिर है, कभी आप मुझसे मिले नहीं तो पहचानेगे कैसे? तो आपकी दुविधा दूर करते हुए मैं अपना परिचय खुद दे देता हूँ. मैं हलकान 'विद्रोही', मशहूर हिंदी चिट्ठाकार.
अब अगर आप सोच रहे होंगे कि यह चिट्ठी मैं आपको क्यों लिख रहा हूँ तो मैं वह भी बता देता हूँ. हे राष्ट्रकवि, यह चिट्ठी मैं इसलिए लिख रहा हूँ ताकि आपके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रेषित कर सकूँ. हे राष्ट्रकवि, मैं आपके प्रति बहुत कृतज्ञ हूँ. मेरे ऊपर आपका एहसान दिन प्रति दिन बढ़ता ही जा रहा है. एहसान के मामले में आपने काव्य रचकर किसी के ऊपर उतना एहसान नहीं किया जितना मेरे ऊपर केवल दो पंक्तियाँ लिख कर कर दिया.
हे राष्ट्रकवि, आपके तमाम खंड-काव्य, दंड-काव्य वगैरह पढ़कर भी लोग उतना खुश नहीं हुए होंगे जितना मैं आपकी लिखी दो पंक्तियाँ पढ़कर हूँ. अब आप सोच रहे होंगे कि मैं कौन सी दो पंक्तियों की बात कर रहा हूँ? तो सुनिए. हे राष्ट्रकवि, मैं निम्नलिखित दो पंक्तियों की बात कर रहा हूँ;
समर शेष है नहीं पाप का भागी केवल व्याध
जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनका भी अपराध
हे कवि शिरोमणि, वैसे तो आपने तमाम पद्य, गद्य, खंड-काव्य वगैरह लिखे हैं लेकिन मुझे लगता है कि ये दो पंक्तियाँ लिखने के बाद आपको और कुछ लिखने की ज़रुरत ही नहीं थी. क्या ज़रुरत थी रश्मिरथी या उर्वशी लिखने की? अब कुरुक्षेत्र आपने पहले लिख दिया था तो मैं उसका नाम नहीं ले रहा. परन्तु इतना ज़रूर कहूँगा उपरोक्त दो पंक्तियाँ लिखने के बाद अगर आप और कुछ नहीं भी लिखते तो चलता. आप ज़रूर सोच रहे होंगे कि मैं यह सब क्यों लिख रहा हूँ तो हे कवि शिरोमणि, सुनिए;
आपकी लिखी इन दो पंक्तियों की नींव पर ही मेरी ब्लागरी का मकान खड़ा हुआ है. हे राष्ट्रकवि, मैं ब्लॉगर कुछ अलग तरह का हूँ. आये दिन मैं अपने ब्लॉग पर बहस वगैरह करवाता रहता हूँ. मुझे याद है मैंने पहली बार अपने ब्लॉग पर बहस करवाई थी जिसका विषय था; ""ज्यादा मिठास किस में है? चीनी या गुड़ में?"
हे कवि शिरोमणि, मुझे आशा है कि आपको यह सुनकर आश्चर्य नहीं होगा कि महिला ब्लॉगर ने चीनी को मीठी बताया और पुरुष ब्लागरों ने गुड़ को. कुछ ब्लॉगर जो इस बहस को बेमानी और टुच्ची बहस मानकर चल रहे थे, उन्होंने तटस्थ रहने का संकल्प लिया. मुझे इन ब्लॉगर की बात ज़रा भी अच्छी नहीं लगी क्योंकि मैं चाहता था कि जैसे मैं गुड़ को ज्यादा मीठा मानकर चलता हूँ उसी तरह से ये 'तटस्थ' ब्लॉगर भी गुड़ को ही मीठा बताएं. मैं अपनी बात कैसे कहूँ यही सोच रहा था कि मेरे एक मित्र चिट्ठाकार ने आपकी इन दो पंक्तियों की और ध्यान दिलाया. मैंने ये दो पंक्तियाँ पढ़ी और उसे कमेन्ट में अपनी पोस्ट पर डाल दिया. तब से मैं आपकी इन दो पंक्तियों का भक्त बन गया हूँ.
हे कवि शिरोमणि, इन पंक्तियों का मुझपर यह असर हुआ कि मैंने सुबह-शाम इन पंक्तियों का इक्यावन बार पाठ शुरू किया. करीब दो महीने तक पाठ करने के बाद मुझे ये पंक्तियाँ याद हो गईं. आज हाल यह है कि मैं जहाँ-तहां इन पंक्तियों को टांक देता हूँ. मेरे कम्प्यूटर के की-बोर्ड से निकली इन पंक्तियों को पढ़कर मुझे लोग बुद्धिजीवी ब्लॉगर मानने लगे हैं. कह सकते हैं कि मेरी ब्लागरी आपकी इन दो पंक्तियों से निखरती चली गई.
हे कवि शिरोमणि, एक दिन मैंने एक प्रयोग किया. मैंने अपने घर के तराजू के एक पलड़े पर आपकी सारी कृतियाँ जैसे कुरुक्षेत्र, रश्मिरथी, परशुराम की प्रतीक्षा, उर्वशी, संस्कृत के चार अध्याय वगैरह-वगैरह रखा और दूसरे पर आपके द्वारा लिखी गई ये दो पंक्तियाँ. मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा जब मैंने देखा कि दो पंक्तियों वाला पलड़ा नीचे बैठ गया. उस दिन मुझे पता चला कि कितना वजन है आपकी इन दो पंक्तियों में. ऐसे में आपके द्वारा लिखा गया बाकी साहित्य मेरे किस काम का?
हे कवि शिरोमणि, पहले मैं पोस्ट लिखकर टिप्पणी में ये दो पंक्तियाँ लिखता था. कालांतर में यह बदलाव आया कि अब मैं हर पोस्ट के नीचे ये दो पंक्तियाँ पहले से ही टांक देता हूँ. इस मामले में कबीर से प्रभावित रहता हूँ यानि काल करे सो आजकर....से. आज हाल यह है कि अब ब्लॉगर लोग कानाफूसी करते हुए कहते हैं कि मेरी पोस्टों में यही दो पंक्तियाँ पढने लायक हैं और बाकी सब बकवास. उसके लिए मैं यही कहता हूँ कि हे प्रभु, इन्हें क्षमा करना क्योंकि ये नहीं जानते कि.......
हे राष्ट्रकवि, मैंने हिसाब करके देखा है कि पिछले दो महीने तेरह दिन से हिंदी ब्लागरी के तमाम लोग और मेरे कुछ मित्र मुझे बुद्धिजीवी ब्लॉगर मानने लगे हैं. ब्लागिंग के बाय-प्रोडक्ट के रूप में मैंने अपने लिए कुछ लक्ष्य बनाकर रखा है जिसमें प्रमुख है कि मैं एक दिन अखिल भारतीय हिंदी चिट्ठाकार महासभा का अध्यक्ष बन जाऊं. हे कविवर, जिस दिन मैं अध्यक्ष बन गया उसी दिन मैं भारत सरकार से यह मांग करूंगा कि आपकी इन दो पंक्तियों के लिए सरकार आपको भारत रत्न से नवाजे. साहित्य अकादमी और ज्ञानपीठ पुरस्कार आपको पहले भी मिले होंगे लेकिन केवल इन पंक्तियों के लिए एक बार फिर से मरणोपरांत आपको साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजा जाए. और जिस दिन ऐसा हो गया, मैं समझ लूंगा कि मेरे ऊपर आपका एहसान उतर गया.
हे कवि शिरोमणि, कई बार मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि आप भविष्यद्रष्टा थे और आपको पता था कि एक दिन हिंदी ब्लागिंग और हिंदी ब्लॉगर इस देश में धूम मचाएंगे. समाज को दिशा देने का काम हिंदी ब्लागरी में होने वाली बहस ही करेगी. शायद इसीलिए आपने ये दो पंक्तियाँ लिखी ताकि हिंदी ब्लागिंग में होने वाली बहस चलती रहे. हे राष्ट्रकवि, मैं किन शब्दों में आपको धन्यवाद कहूँ?
और मैं क्या लिखूँ? वैसे तो लिखने के लिए और आभार प्रकट करने के लिए और भी बहुत कुछ है, लेकिन अब मेरे पास समय नहीं है और कुछ लिखने का. मुझे आज ही अपने ब्लॉग पर बहस चलाना है. विषय है; "आम मीठा होता है या इमली?" इसलिए मैं अपना पत्र यहीं समाप्त करता हूँ और आपको एक बार फिर से इन पंक्तियों को लिखने के लिए धन्यवाद प्रेषित करता हूँ.
आपका
ब्लॉगर हलकान 'विद्रोही'
Saturday, January 2, 2010
दुआ करें कि हलकान भाई के ब्लॉग पर जल्द ही कोई लाइबेरिया से पधारे.
कल हलकान भाई के घर जाना हुआ. सोचा नए साल के शुभ अवसर पर मिल आऊँ. आजकल वैसे भी नए साल, फ्रेंडशिप डे वगैरह जितने शुभ होते हैं उतना होली-दिवाली वगैरह नहीं होते. हलकान भाई के घर पहुंचे तो देखा कि अपनी ब्लागिंग टेबल पर बैठे थे. बायें हाथ में दो पन्नों वाला एक कागज़ और दायें हाथ में मॉउस. दुआ-सलाम के बाद बातचीत शुरू हुई. मैंने पूछा; "हलकान भाई कैसे हैं?"
वे बोले; "एक मिनट जरा वेट करो यार. मैं एक ज़रूरी काम कर रहा हूँ."
मैंने ध्यान से देखा तो वे अपने ब्लॉग पर लगे उस विजेट को माउस से खोद रहे थे जिसपर तमाम देशों के नाम लिखे रहते हैं और नाम के आगे कुछ संख्या लिखी रहती है. विजेट दर्शाता है कि कौन से देश से कितनी बार पाठक ब्लॉग पर आये. हलकान भाई विजेट पर चलती-फिरती जानकारी देखते और दूसरे ही पल अपने हाथ के कागज़ को. सात-आठ बार देखने के बाद बोले; "अजीब बात है. वहाँ से कोई भी नहीं आया?"
मैंने पूछा; "क्या हुआ हलकान भाई? कहीं से कोई आनेवाला था क्या? कौन आनेवाला था?"
मेरी बात सुनकर उन्होंने कहा; "अरे यार क्या बताऊँ? ये जो विजेट है, इसमें हर देश का नाम दिखाई दे रहा है जिससे पता चलता है कि हर देश में मेरे ब्लॉग के पाठक हैं. लेकिन एक देश का नाम नहीं दिखाई दे रहा."
मैंने पूछा; "कौन सा देश? कहीं आप चिली की बात तो नहीं कर रहे? कहीं ऐसा तो नहीं कि चिली से कोई आया ही नहीं?"
वे बोले; " अरे नहीं यार. चिली में तो मेरे कई पाठक हैं. तुम खुद ही देख लो. चिली के आगे इक्कीस लिखा हुआ है. हमेशा आते-जाते रहते हैं. मैं चिली की बात नहीं कर रहा हूँ."
मैंने पूछा; "फिर शायद अफगानिस्तान से कोई नहीं आया होगा. वहाँ आजकल लड़ाई चल रही है न."
वे बोले; "अरे नहीं यार वहाँ से भी लोग आते हैं. ईराक से भी लोग आते हैं मेरा ब्लॉग पढने. यहाँ तक कि पाकिस्तान से लोग आते हैं और उस इलाके से आते हैं जहाँ आजकल पाकिस्तानी सेना और तालिबान में लड़ाई चल रही है. असल में यह और ही देश है."
मैंने कहा; "कौन सा देश है, बताएँगे तो."
वे बोले; "तुमने नाम भी नहीं सुना होगा."
मैंने कहा; "ठीक है, हो सकता है नहीं सुना होगा. लेकिन आप बताइए तो."
वे बोले; "असल में मैं लाइबेरिया की बात कर रहा हूँ."
मैंने कहा; "लाइबेरिया का नाम तो मैंने सुना है. अभी हाल में ही सुना था न जब मधु कोड़ा जी के ऊपर कार्यवाई शुरू हुई. उन्होंने लाइबेरिया की खानों में इन्वेस्टमेंट किया है. मैंने सुना है न. हलकान भाई आपको मेरे सामान्य ज्ञान पर इतना भी भरोसा नहीं?"
वे बोले; "सुना तो मैंने भी तभी था. लेकिन समस्या वह नहीं है. समस्या यह है कि लाइबेरिया में क्या मेरे ब्लॉग के बारे में किसी को पता नहीं है?"
मैंने कहा; "क्या बात करते हैं हलकान भाई? हमलोगों को खुद लाइबेरिया के बारे में अभी जानकारी हुई है वो भी कर्टसी मधु कोड़ा और आप चाहते हैं कि हमें जानकारी हो गई इसलिए वहाँ से तुरंत पाठक आपके ब्लॉग पर पंहुच जाएँ?"
वे बोले; "कौन नहीं चाहता है? वैसे भी हिंदी ब्लागिंग को लेकर तुम उतने सीरियस नहीं हो, जितना मैं हूँ. ऐसे में तुम तो कहोगे ही न. लेकिन मेरी बात और है. मैं चाहता हूँ हिंदी ब्लागिंग केवल भारत, फिजी, वेस्टइंडीज या उन देशों तक सीमित न रहे जहाँ भारतीय रहते हैं. हिंदी ब्लागिंग हर उस देश में पहुंचे जहाँ मनुष्य रहता है."
मैंने कहा; "कोई बात नहीं है हलकान भाई. आ ही जायेंगे कभी न कभी. लाइबेरिया से भी पाठक आ ही जायेंगे. जब हमारे इन्वेस्टर वहाँ पहुँच गए हैं तो इन्वेस्टमेंट को मैनेज करने वाले भारतीय भी तो पहुंचेंगे ही. एक बार वे पहुँच गए तो फिर आपके ब्लॉग पर वहाँ से भी पाठक आ ही जायेंगे."
वे बोले; "भगवान करे ऐसा ही हो. तुम देख लेना एक दिन हिंदी ब्लागिंग को मैं एलडोराडो तक पहुँचा दूंगा. चाँद तक पहुँचा दूंगा. मंगल तक पहुँचा दूंगा......"
आप भी मेरे साथ दुआ करें कि हलकान भाई के ब्लॉग पर जल्द ही कोई लाइबेरिया से पधारे.
Wednesday, September 30, 2009
ब्लॉगर हलकान 'विद्रोही' की डायरी से कुछ....
रिश्ते बन ही जाते हैं. बहाना कोई भी हो सकता है. हलकान भाई याद हैं आपको? अरे वही, हलकान 'विद्रोही', अपने स्टार ब्लॉगर. वही जिनकी वसीयत छाप दी थी मैंने. उसके बाद उनकी डायरी भी. ब्लागिंग की वजह से ढेर सारे लोगों से जान-पहचान हुई. हलकान भाई उनमें प्रमुख हैं.
विजयादशमी के दिन उनसे मिलने गया था. हमेशा की तरह ब्लागिंग के बारे में सोचते हुए बिजी थे. मुद्दा वही. हिंदी ब्लागिंग को कैसे बढ़ाया जाय? खैर, विजयादशमी की बधाई लेन-देन के लिए उन्होंने समय निकाला. बधाई दी. बधाई ली.
बधाई लेन-देन के बाद फिर उसी बात पर चिंतन. ब्लागिंग के बारे में क्या-क्या किया जा सकता है? ठीक वैसे ही जैसे कई साहित्यकार इस बात पर चिंतित रहते हैं कि आज से बासठ साल बाद हिंदी की दशा क्या होगी?
बात शुरू हुई तो बोले; "तुम भी टिक गए ब्लागिंग में. वो भी दो साल."
मैंने कहा; "हाँ. सोचा तो कभी मैंने भी नहीं था लेकिन सच तो यही है कि टिक गया. सब आपका आर्शीवाद है."
वे बोले; " आर्शीवाद काहे का? असल कारण कुछ और है. तुम्हें अपना तो कुछ मौलिक लिखना है नहीं. दूसरों की लिखी डायरी छाप देते हो. उसी से काम चला रहे हो. पता नहीं डायरी के पन्ने भी खुद टाइप करते हो या उसके लिए भी टाइपिस्ट रखा है."
मैंने कहा; "ऐसा मत कहिये हलकान भाई, मैं खुद ही टाइप करता हूँ. मेरे लिए ब्लागिंग उतनी महत्वपूर्ण नहीं है कि मैं तनख्वाह देकर केवल ब्लागिंग के लिए टाइपिस्ट रख लूँ."
वे बोले; "इसी बात का तो रोना है. हिंदी ब्लागिंग के ज्यादातर ब्लागर के लिए ब्लागिंग महत्वपूर्ण नहीं है. जिस तरह का समर्पण चाहिए वह दिखाई नहीं देता. तुम्हारे अन्दर भी वह भावना नहीं है कि हिंदी ब्लागिंग फूले-फले. समर्पण चाहिए ब्लागिंग के लिए. दूसरों की डायरी छाप कर कितने दिन चलाओगे?"
मैंने कहा; "हाँ, वह तो है. आप ठीक ही कह रहे हैं."
वे बोले; "मुझे ही देखो. हमेशा यह प्रयास रहता है कि हिंदी ब्लागिंग को कैसे समृद्ध किया जाय? कह सकते हो कि मैं ब्लागिंग ही खाता हूँ, ब्लागिंग ही पीता हूँ और ब्लागिंग ही सोता हूँ."
मैंने कहा; "सही कह रहे हैं. अपने ब्लॉग बारूद पर आपने जितना कुछ लिखा है, वह हिंदी ब्लागिंग के लिए संजीवनी है. जब तक आपका ब्लॉग है तब तक समझिये हिंदी ब्लागिंग का स्वर्णकाल चलता रहेगा."
वे बोले; "हा हा.....असल में बारूद तो कुछ नहीं. बारूद ब्लॉग तो हिंदी ब्लागिंग के लिए मेरे योगदान का दस प्रतिशत भी नहीं है. असल योगदान तो मेरे वे ब्लॉग हैं जो मैं अपने नाम से नहीं लिखता."
सुनकर मुझे बड़ा अजीब लगा. मतलब यह कि हलकान भाई किसी और नाम से लिखते हैं?
मैं प्रश्नचिन्ह लिए उनसे कुछ कहने ही वाला था कि उन्होंने मेरे सामने एक डायरी खिसका दी. बोले; "अपने हो. यह पढ़ लो, सब समझ में आ जाएगा."
डायरी पढना शुरू किया. जैसे-जैसे पढता गया, दंग होता गया. मेरी हालत देखकर वे बोले; " आज समय आ गया है कि मेरे योगदान को लोग जानें. पढ़ लो. नोट कर लो. छाप देना अपने ब्लॉग पर. इसी बहाने तुम्हारी एक पोस्ट हो जायेगी. वैसे भी तुम्हें क्या चाहिए? एक डायरी के कुछ पन्ने."
उनके कहने के अनुसार मैं उनकी डायरी की कुछ प्रविष्टियाँ छाप रहा हूँ. चिंता न करें, उन्होंने परमीशन दे दी है. आप पढें और हिंदी ब्लागिंग के लिए उनके योगदान को सराहें.
६ नवम्बर, २००८
अजीब बात है. कोई भी आईडिया मन में आता है. सोचता हूँ कि उस आईडिया को लेकर ब्लॉग बनाऊंगा और यहाँ पता चलता है कि उसी आईडिया को लेकर मुझसे पहले ही किसी ने ब्लॉग बना लिया. पहले सोचा कि ब्लॉगरगण की जीवनी के कुछ हिस्से उनसे लिखवाकर अपने ब्लॉग पर छापूंगा. लेकिन अजित जी को पता नहीं कैसे मेरे आईडिया के बारे में पहले ही पता चल गया. वे मेरा आईडिया ले उड़े. फिर सोचा कि हिंदी ब्लागरों के जन्मदिन पर बधाई देते हुए एक ब्लॉग बना लूँ लेकिन वह आईडिया पाबला जी ले उड़े. फिर सोचा कि सांपों के बारे में जानकारी के लिए एक ब्लॉग बना लूँ लेकिन लवली जी को मेरे आईडिया का पता चल गया और उन्होंने...............पता नहीं ऐसा मेरे साथ ही क्यों होता है?
२ मार्च २००९
आज एक ब्लॉग कंसल्टेंट अप्वाइंट किया. ध्येय एक ही है. हिंदी ब्लागिंग को समृद्ध करना है. उसे आगे ले जाना है. कंसल्टेंट अच्छा है. आईडियावान कंसल्टेंट. जब मैंने उसे यह बताया कि कैसे लोगों को मेरे आईडिया के बारे में पता चल जाता है और वे ब्लॉग बना लेते हैं तो उसने कहा कि यह टेलीपैथी की वजह से होता है. इसलिए मुझे टेलीपैथी पर एक ब्लॉग शुरू कर देना चाहिए. मैंने आज ही त्रिशंकु नाम से एक आई डी बनाई और टेलीपैथी पर एक ब्लॉग शुरू कर दिया......
७ अप्रैल, २००९
कंसल्टेंट के कहने पर आज मैंने एक नया ब्लॉग बनाया जो सरकारी रोडवेज के कंडक्टरों के लिए समर्पित है. मैं इस ब्लॉग पर केवल रोडवेज के कंडक्टरों और उनकी नौकरी और समस्याओं के बारे में लिखूँगा....
१६ अप्रैल, २००९
पिछले सोमवार मैंने एक नया ब्लॉग बनाया. नाम है, "मैं चन्दन तुम पानी". मैं इस ब्लॉग पर हिंदी ब्लागरों की खिचाई करूंगा. पहली पोस्ट में मैंने एक ब्लॉगर की पोस्ट का जिक्र करते हुए पांच लाइन की एक पोस्ट लिखी. उस ब्लॉगर ने 'छात्र' की जगह 'क्षात्र' लिखा था. पांच लाइन की पोस्ट पर मुझे ब्लॉगवाणी पर कुल सत्रह पसंद मिली. टिप्पणियां कुल बाईस. असली ब्लागिंग तो यही है कि पांच लाइन लिखो और बाईस टिप्पणियां मिलें. चिरकुट हैं वे जो बड़ी-बड़ी पोस्ट लिखते हैं और उन्हें कुल तीन पसंद मिलती है.
२३ अप्रैल, २००९
आज मेरे ब्लॉग "मैं चन्दन तुम पानी" पर एक ब्लॉगर ने फर्जी आई डी से मेरे खिलाफ कमेन्ट किया. तकनीकि में अपनी कुशलता के कारण मुझे पता चल गया कि यह ब्लॉगर कौन था लेकिन मैं उसका नाम कैसे लेता? मैं अगर उसका नाम ले लेता तो वह भी मुझे लताड़ के चला जाता कि मैं खुद फर्जी आई डी क्रीयेट करके ब्लॉग लिखता हूँ. ऐसे ही कुछ समय होते हैं जब फर्जी नाम बहुत खलता है.....
१६ मई, २००९
झूठे हैं सब. मिश्रा को फ़ोन करके कहा कि मेरी पोस्ट पर एक पसंद क्लिक कर दो. उसने कहा कि उसने कर दिया और पसंद तेरह से चौदह हो गई. बाद में पता चला किसी और ने वह पसंद दी थी. हद है. एक पसंद भी नहीं दे सकते....
२८ मई, २००९
आज एक ब्लॉग बनाया. 'हिंदी ब्लागरों के चरम दिन' के नाम से. मैंने सोचा है कि इस ब्लॉग पर मैं पोस्ट लिख करा बताऊंगा कि किस हिंदी ब्लॉगर को किस दिन सबसे ज्यादा टिप्पणी और पसंद मिली.
३ जून, २००९
बहुत मज़ा आ रहा है. मेरे हर ब्लॉग के कम से कम एवरेज ९० फालोवर हो गए हैं. सब जलने लगे हैं मेरे ब्लॉग की प्रगति से. मुश्किल एक ही है. किसी को नहीं मालूम कि ये ब्लॉग किसका है. ऐसे में नाम न होने की कसक तो रहेगी लेकिन कुछ किया नहीं जा सकता.
११ जून, २००९
आज मैंने अपनी एक सूक्ति, "ब्लागिंग ही जीवन है" को ढाई बाई तीन फुट के बोर्ड पर लिख कर अपने कम्यूटर के सामने वाली दीवार पर टांग दिया है. यह बोर्ड मुझे ब्लागिंग के लिए मोटिवेट करता रहेगा. लेकिन वही बात है न. एक पत्नी है जिसे मेरी प्रगति फूटी आँखों नहीं सुहाती. बोर्ड देखकर नाराज़ हो गई. कहती है कि घर के लिए सोफे का कवर खरीदने के लिए आना-कानी करता हूँ और बोर्ड पर कुल उन्नीस सौ पचास रूपये खर्च कर आया. अब इसपर कोई क्या कहे? उसे क्या पता कि "ब्लागिंग ही जीवन है" नामक सूक्ति हिंदी ब्लागिंग को आगे बढाने में किस तरह का रोल.....
१२ जुलाई, २००९
कंसल्टेंट के कहने पर आज मैंने एक नया ब्लॉग बनाया है जिसमें मैं उन ब्लॉग का जिक्र करते हुए पोस्ट लिखूँगा जिनके बारे में विदेशी अखबारों और पत्रिकाओं में छपेगा. वो दिन दूर नहीं जब मेरे इस ब्लॉग का जिक्र टाइम मैगजीन में होगा. यह पूरी तरह से एक नया आईडिया है. वैसे तो मैंने सोचा था कि भारतीय अखबारों में हिंदी ब्लॉग के जिक्र को लेकर मैं एक ब्लॉग बनाऊंगा लेकिन पता नहीं पाबला जी को कैसे मेरे आईडिया के बारे में........
२८ अगस्त, २००९
आज कंसल्टेंट ने एग्रीगेटर बनाने का आईडिया दिया. एग्रीगेटर का आईडिया मेरे दिमाग में.........
मैं अभी पढ़ ही रहा था कि उन्होंने मुझसे डायरी लेते हुए कहा; "जितना पढ़ लिए हो, उतना काफी है एक पोस्ट लिखने के लिए. लेकिन पोस्ट लिखना ज़रूर. अब समय आ गया है कि लोग मेरे योगदान के बारे में जानें और हिंदी ब्लागिंग पर किये गए मेरे एहसान को तौलने के लिए तराजू खरीदना शुरू करें.
मैं उनसे मिलकर चला आया. यह सोचते हुए कि आगे की डायरी पढ़ते तो क्या-क्या और पता चलता? कहीं यह तो नहीं लिखा रहता कि;
आज मैं बहुत खुश हूँ. आज से ठीक दस साल पहले मैंने ब्लॉगर बनाया था. कोई नहीं जानता कि एवन विलियम्स के नाम से मैंने ही ब्लॉगर का निर्माण किया था.........
Thursday, May 29, 2008
ब्लॉगर हलकान 'विद्रोही' की डायरी से कुछ.......
कल हलकान भाई से मिलने उनके घर गया था. अरे वही हलकान भाई जिनकी ब्लॉग वसीयत मैंने छाप दी थी. जिस दिन वसीयत छापी उस दिन बहुत नाराज हुए. बोले; "मुझसे बिना पूछे छाप कर अच्छा नहीं किया तुमने." मैंने माफ़ी मांग ली. लेकिन दूसरे दिन शाम को फ़ोन किया. बोले; "यार तुमने वसीयत छाप कर मेरे लिए जो किया है, उसके लिए मैं तुम्हारा आभारी रहूँगा."
मैंने पूछा; "हलकान भाई ऐसा क्यों कह रहे हैं? आप तो बहुत नाराज थे मुझसे."
बोले; "यार वसीयत छपने की वजह से मुझे दो दिन के अन्दर मेरे ब्लॉग पर बहुत हिट्स मिलीं." मुझे समझ में आ गया कि आभार प्रकट करने के पीछे कारण क्या था. खैर, मैं कल शाम हलकान भाई के घर गया था. मामला इतना सा था कि मुझे एक डॉक्टर का अप्वाईंटमेंट चाहिए था. उनसे बात हो रही थी. अचानक बोले; "अरे वे डॉक्टर तो मेरे बहुत अच्छे मित्र हैं."
मैंने पूछा; "आप जानते हैं उन्हें? कब से जानते हैं?"
बोले; " असल में हुआ क्या कि मैंने एक पोस्ट लिखी थी; "क्या डॉक्टर को भगवान माना जाना चाहिए?" मेरी पोस्ट पर उन्होंने कमेंट किया. मैंने उनके कमेंट से उनका ईमेल आईडी लिया और उन्हें मेल भेजा. हम दोनों में 'मेल-मिलाप' शुरू हुआ और अब हमारे सम्बन्ध बहुत अच्छे हैं. अब तो मैं इंजिनियर, टीचर, नेता और जनता के ऊपर भी पोस्ट लिख दूँ तो उनका कमेंट जरूर मिलेगा."
मैंने कहा; "हलकान भाई, मुझे उनका अप्वाईंटमेंट दिला देते तो अच्छा था." हलकान भाई ने कहा कि मैं उनके घर जाऊं तो वे जरूर दिला देंगे. यही बात थी कि मैं कल उनके घर गया. उन्होंने मुझे शाम को सात बजे बुला तो लिया लेकिन ख़ुद घर नहीं पहुंचे. मैंने फ़ोन किया तो बोले; "यार आधा घंटा बैठो, मैं आ रहा हूँ. असल में आज आफिस में दिन भर ब्लॉग पर कमेंट करने का समय नहीं मिला, इसलिए थोडी देर पहले ही ब्लॉगवाणी खोला है. बस तुम बैठो, मैं आ रहा हूँ."
क्या करता. बैठे-बैठे इंतजार कर रहा था. इधर-उधर देखते हुए किताबें उलटने लगा. टेबल पर पड़ी कुछ किताबों के पास ही हलकान भाई की दो डायरी रखी थी. मजे की बात ये कि एक डायरी पर लिखा हुआ 'ब्लॉगर हलकान 'विद्रोही' की डायरी' और दूसरी पर लिखा हुआ था, 'हलकान 'विद्रोही' की डायरी. मैं बड़ा उत्सुक हो गया. समझ में नहीं आ रहा था कि ब्लॉगर हलकान की डायरी दूसरी डायरी से अलग क्यों है. उलट-पुलट कर देखा तो बात समझ में आई. इस डायरी में हलकान भाई ने ब्लागिंग से संबंधित सारी बातें लिखी थीं. आप पढ़ना चाहेंगे कि क्या-क्या लिखा था? आप में से कुछ मुझे गली देते हुए कह सकते हैं कि किसी की डायरी नहीं छापनी चाहिए. लेकिन क्या करूं? दुर्योधन की डायरी छाप-छाप कर आदत पड़ गई है. वैसे भी ब्लागिंग में कम्पीटीशन इतना है कि लोग दूसरे ब्लॉगर के साथ हुई चैट तक छाप देते हैं. ठीक है आप डायरी के अंश पढिये. गाली भी देंगे तो समस्या नहीं है....
२० मई, २००८ की सुबह
आज एक साहित्यकार-ब्लॉगर ने एक पोस्ट छापी है. उसमें उन्होंने उन साहित्यकारों से आत्मसाक्षात्कार करने जैसी कुछ बातें लिखी हैं. उनका कहना है कि साहित्यकार के ब्लॉग कम पढे जाते हैं. वे जब-तब जो इच्छा हुई, छाप देते हैं. मुझे लगता है कि उनकी इस पोस्ट पर टिप्पणियां जिस गति से आ रही हैं, कुछ न कुछ विवाद जरूर खड़ा होगा. पिछली बार जब जनवरी महीने में ब्लॉग जगत में विवाद हुआ था तो मैं पीछे रह गया था. केवल बारह अनामी टिपण्णी कर पाया था. बहुत पछतावा हुआ था. इस बार मौका हाथ से नहीं जाने दूँगा. इस बार ढेर सारी टिप्पणियां देनी हैं. खूब मजा आएगा.
२० मई, २००८ की शाम
आज मैंने कुल आठ फर्जी आई डी बनाई. बड़ा झमेला है फर्जी आई डी बनाने में. कुछ भी नाम डालो, तो पता चलता है कि आई डी पहले से किसी के पास है. ये गूगल वालों को कोई तरीका निकलना चाहिए. आज मैंने जो आई डी बनाई है, इस प्रकार हैं. बर्बरीक, अश्वत्थामा, कालिदास, इन्द्रेश्वर, सीधी बात, तुझे मिर्ची लगी तो मैं क्या करूं, रंगबाज साहित्यकार और चालबाज ब्लॉगर. मैंने आज दो अनामी कमेंट किए जिसमें ब्लॉगर को दो कौड़ी का बताया. दो कमेंट फर्जी आई डी से किए जिसमें साहित्यकार को दो कौड़ी का बताया. एक कमेंट मैंने अपने निजी आई डी से किया जिसमें झगड़े को तुरंत सुलझाने की सलाह दी.
२१ मई, २००८ की सुबह
आज सुबह-सुबह पत्नी से झगड़ा हो गया. कहती है मैं रात को नींद में बड़बडाता हूँ, 'बस एक कमेंट और.' मुझे मालूम है ये मुझसे जलती है. ब्लॉग जगत में लगातार बढ़ती मेरी ख्याति इससे देखी नहीं जाती. इसिलए मेरे लिए ये सब कहती है. आज मैंने एक साहित्यकार द्वारा लिखी गई पोस्ट पर चार कमेंट किया. दो में उनका समर्थन किया और दो में विरोध. सारे कमेंट अलग-अलग फर्जी आई डी से किया. जब से झमेला शुरू हुआ है, बहुत मजा आ रहा है.
२३ मई, २००८ की शाम
आज कल भाषा पर विमर्श छिड़ा हुआ है. कुछ लोगों का कहना हैं कि उर्दू ख़त्म हो जायेगी. और ये भी कि उर्दू के ख़िलाफ़ बड़ी साजिश हुई है. साथ में पंजाबी और हिन्दी के साथ भी बहुत बड़ी राजनीति हुई है. इस भाषा विमर्श के चलते खूब जूतमपैजार मचने की उत्तम संभावना है. मैंने तो तीन टिपण्णी लेख के समर्थन में की है और दो टिपण्णी लेखक को बुरा-भला कहते हुए की है.
भाषा पर छिड़ा विमर्श देखकर मैंने भी अपने ब्लॉग 'बारूद' पर एक विमर्श छेड़ने की मंशा बना ली है. मैंने आठ विषयों को चुनकर एक कागज़ पर लिखा और अपने बेटे को अक्कड़-बक्कड़ बम्बे बो कहते हुए आँख बंदकर किसी एक विषय पर उंगली रखने को कहा. बेटे ने जिस विषय पर उंगली रखी वो था; 'तिब्बत की स्वतन्त्रता भारत की जिम्मेदारी नहीं.' कल ही इस विषय पर एक विमर्श शुरू करता हूँ.
२४ मई, २००८ की शाम
आज ख़बर आई कि एक विश्व प्रसिद्ध हिन्दी ब्लॉग के महान माडरेटर को रेप केस में अरेस्ट कर लिया गया. मजे की बात ये कि इस बात को एकदम नए ब्लॉगर ने जग-जाहिर किया. अब तो मुझे लगता है कि मेरे फर्जी आई डी सचमुच काम में आ जायेंगे. मैंने इतनी सारी फर्जी आई डी बनाकर अच्छा ही किया. मुझे अपनी दूरदर्शिता पर बहुत गर्व हो रहा है.
कल एक ब्लॉगर ने साहित्यकार और ब्लॉगर के बीच झगडे को शांत करने के लिए एक पोस्ट लिखा. मुझे समझ में नहीं आता कि ये झगडा शांत कराने वाले लोग क्यों होते हैं. मुझे तो ऐसे लोग फूटी आँख नहीं सोहाते. मैं पूछता हूँ क्या जरूरत है झगड़ा शांत कराने की. ऐसे लोगों को हमारी खुशी का जरा भी ख़याल नहीं है.
२७ मई की सुबह
बहुत मजा आ रहा है. ये रेप केस में गजब-गजब बातें पढने को मिल रही हैं. दस-दस साल पुराने किस्से खुल रहे हैं. कौन कहाँ क्या-क्या किया है, सब सामने आ रहा है. बड़ा मजा आ रहा है. हमको नहीं मालूम था कि ब्लागिंग में किसी दिन ये मजा आएगा. हम तो कहेंगे कि....
अभी पढ़ रहा था कि हलकान भाई आ गए. आते ही मेरे हाथ में डायरी देखकर बिल्कुल नहीं चौंके. बोले; "पढ़ लो, पढ़ लो. तुमसे कुछ छुपा हुआ है क्या? सब तो जानते हो." मुझे लगा छुपना चाहेगा तो भी छुप नहीं सकेगा. ब्लॉग है तो ब्लॉगर हैं. और ब्लॉगर हैं तो ब्लागिंग में अराजकता की सहज संभावनायें हैं
Thursday, April 24, 2008
ब्लॉगर हलकान 'विद्रोही' की ब्लॉग-वसीयत
दो दिन पहले अनिल रघुराज जी ने एक पोस्ट लिखी. शीर्षक था, 'मेरे बाद मेरे इस ब्लॉग का क्या होगा?'. बड़ा मौलिक सवाल है. इससे पहले किसी ब्लॉगर ने ऐसा सवाल नहीं दागा था. अनिल जी ने इस सवाल के जवाब में ढेर सारे संभावित परिणामों की सूची नहीं दी. एक-दो संभावनाओं की बात कही. जैसे उनके बाद उनका ब्लॉग 'किसी रेगिस्तान में छूटे हुए समान की तरह धीरे-धीरे रेत के टीले में धंस कर रह जायेगा.'
अनिल जी के इस सवाल से बहुत से ब्लॉगर बंधु दुखी हुए. कुछ ने उन्हें मोह-माया से निकलने की बात कही. कुछ ने बताया कि सृष्टि का नियम यही है कि मृत्यु तय है. लेकिन ब्रह्माण्ड के सबसे धाँसू ब्लॉगर हलकान 'विद्रोही' जो 'बारूद' नाम का हिन्दी ब्लॉग लिखते हैं, उन्होंने केवल पोस्ट पढ़ी. तुरंत फैसला नहीं कर पाये कि टिपण्णी में क्या लिखें? 'ब्लॉग दार्शनिक' होते तो उदय प्रताप सिंह जी के दो छंद टिपण्णी के रूप में चिपका देते. छंद हैं;
होनी निज हाथ में लिए है एक कालचक्र
........................जिसके समक्ष झुक सूर्य-चन्द्रमा गए
कांपते थे जिनके प्रताप से दिगंत वे;
........................नगण्य से अतीत के अथाह में समा गए
शूर-वीरता में जो अजेय कीर्तिमान रहे
........................अंगद सा पाँव इतिहास में जमा गए
चुटकी बजी जो काल कि तो वहीं तत्काल
........................जिंदगी की बागडोर मृत्यु को थमा गए
या फिर;
तिनके से काल के प्रवाह में विलीन हुए
........................शैल से अखंड अभिमानी वे कहाँ गए
छोटे-मोटे जीवधारियों की कौन बात करे
........................सिद्ध और प्रसिद्ध संत-ज्ञानी वे कहाँ गए
शक्तिमान सोम से और व्योम से अशोधनीय
........................बादलों सी चढ़ती जवानी वे कहाँ गए
और सोच लो जरा 'उदय' की कौन सी विसात जब;
........................आग थे जो होकर पानी-पानी वे कहाँ गए
अगर ब्लॉग-दार्शनिकता की दूसरी मंजिल पर खड़े रहते तो शायद इस शेर को कमेंट के रूप में चिपका देते;
मौत तो लफ्ज़ बेमानी है
जिसको मारा हयात ने मारा
लेकिन हमारे ब्लॉगर हलकान 'विद्रोही' जी व्यावहारिक इंसान हैं. लिहाजा उन्होंने सोचना शुरू किया कि उनके जाने के बाद उनके ब्लॉग का क्या होगा? बहुत सोचने के बाद उन्होंने ब्लॉग-वसीयत लिखने की ठान ली. और हाथो-हाथ ये वसीयत लिख डाली. आप वसीयत पढ़ें;
मैं ब्लॉगर हलकान 'विद्रोही' , इस ब्रह्माण्ड का सबसे धाँसू हिन्दी ब्लॉगर, अपने पूरे होश-ओ-हवाश में ये ब्लॉग-वसीयत लिख रहा हूँ. कल तक मैं समझता था कि वसीयत केवल घर-बार, जमीन-जायदाद, बैंक लॉकर, सोना-चाँदी वगैरह के भविष्य में होने वाले बँटवारे के लिए लिखी जाती है. लेकिन जब से एक साईट ने मेरे ब्लॉग की कीमत दस लाख डॉलर आंकी है, तबसे ये ब्लॉग ही मेरी सबसे अमूल्य निधि बन बैठा है. रूपये-पैसे, सोना-चाँदी वगैरह की कीमत मेरे लिए दो कौड़ी की भी नहीं रही. इसलिए ये ब्लॉग-वसीयत लिखना मेरे लिए मजबूरी हो चुकी है.
मेरी वसीयत की मुख्य बातें निम्नलिखित हैं.
०१. जिस दिन मेरा आखिरी क्षण आ जाये और डॉक्टर मुझे मृत घोषित कर दें तो भी डॉक्टरों की बात पर विश्वास न किया जाय. मैं सचमुच मरा हूँ कि नहीं ये जानने के लिए मेरे कान में कहा जाय; "हलकान उठो, तुम्हारी पोस्ट पर नया कमेंट आया है." ये सुनने के बाद भी अगर मैं उठकर न बैठूं तो मुझे मृत मान लिया जाय.
०२. मेरे चले जाने के बाद मेरे ब्लॉग के संचालन का काम मेरे तीनों पुत्रों के हाथों में दे दिया जाय. मेरे ब्लॉग का नाम भी बारूद से बदलकर 'बारूद का ढेर' कर दिया जाय. जब मैं अकेले लिखता था तबतक तो बारूद नाम समझ में आता है लेकिन जब वही ब्लॉग मेरी जगह मेरे तीन पुत्र संचालित करेंगे तो 'बारूद का ढेर' नाम खूब फबेगा.
०३. मेरे मरने के बाद मेरे ब्लॉग को सामूहिक ब्लॉग में कन्वर्ट कर दिया जाय. जब तक मैं लिखूंगा तब तक सप्ताह में तीन से ज्यादा पोस्ट नहीं लिख पाऊंगा. इस बात की वजह से मुझे उन ब्लागरों से हमेशा ईर्ष्या होती रही जो दिन में पाँच-पाँच पोस्ट ठेलते रहते हैं. मेरी दिली तमन्ना है कि मेरे पुत्र एक दिन में कम से कम बीस पोस्ट ठेलें ताकि ब्लॉगवाणी पर पूरे पेज में मेरा ब्लॉग छाया रहे. मेरी आत्मा को शान्ति देने का इससे अच्छा तरीका और कुछ नहीं हो सकता.
०४. मेरी मृत्यु के बाद मेरे पुत्र सिर्फ़ उन्ही ब्लॉगर के ब्लॉग पर कमेंट करें जिनके ब्लॉग पर मैं कमेंट करता रहा हूँ. मुझे श्रद्धांजलि देते हुए हुए जितनी भी पोस्ट लिखी जाय, उनपर बहुत सारी फर्जी आईडी बनाकर ढेर सारा कमेंट अवश्य करें. मेरा मंझला पुत्र, जो अभी मुहल्ले के तमाम घरों की दीवारों पर चोरी-छिपे गालियाँ लिखता है, उसे मैं बेनामी कमेंट करने और बाकी के ब्लागरों के लिए गालियाँ लिखने का महत्वपूर्ण काम सौंपता हूँ.
०५. इतने दिनों तक ब्लॉग लिखने के बावजूद मैं आजतक बिना छंद और तुकबंदी की एक भी कविता नहीं लिख सका. ये बात मेरे मन में हीन भावना पैदा करती रही है. मेरा छोटा पुत्र जो रह-रहकर आसमान की तरफ़ देखने लगता है और जिसके अन्दर बुद्धिजीवी बनने के सभी लक्षण मौजूद हैं, मैं उसे बिना छंदों और बिना तुकबंदी वाली कविता लिखने का काम सौंपता हूँ. अगर मेरा छोटा पुत्र इस काम को न कर सके तो उसे चिंता करने की जरूरत नहीं. वह जयशंकर प्रसाद, राम दरश मिश्र और पाब्लो नेरुदा की कविताओं को अपनी कविता बताकर तब तक छापता रहे जब तक पकड़ा न जाए.
०६. मैंने ब्लॉग लिखकर समाजवाद लाने की एक कवायद शुरू की थी. इतने दिनों के बाद मैं अपने अनुभव से कह सकता हूँ कि समाजवाद के आने का चांस बहुत कम है. लेकिन इंसान को हिम्मत नहीं हारनी चाहिए. मैं चाहता हूँ कि मेरी इस अधूरी कोशिश को मेरे तीनों पुत्र आगे बढायें. हिम्मत न हारना ही असली समाजवादी की निशानी है.
०७. मैंने अपनी बकलमख़ुद लिखकर तैयार कर ली है. हालांकि अजित वडनेरकर जी ने मुझे लिखने के लिए कभी नहीं कहा लेकिन मैंने इस आशा से लिख लिया था कि वे एक न एक दिन जरूर कहेंगे. अगर मेरे जीते जी वे नहीं कहते हैं तो फिर मेरे पुत्रों को मैं जिम्मेदारी सौंपता हूँ कि वे मेरे बकलमख़ुद को मेरे ही ब्लॉग पर छाप लें.
०८. मैंने अभी तक के अपने ब्लागिंग कैरियर में बाकी के ब्लागरों के लेखन को कूड़ा बताया है. मैं चाहता हूँ कि मेरे जाने के बाद मेरे पुत्र मेरे इस काम को आगे बढायें. मैं यह भी चाहता हूँ कि मेरे तीनों पुत्र महीने में कम से कम एक बार हिन्दी ब्लागिंग में विद्यमान अपरिपक्वता के बारे में बहस जरूर करें. ऐसी पोस्ट पर टिप्पणियों की संख्या में कमीं नहीं आती.
०९. मैंने कई बार ऐसी पोस्ट लिखी जिसमें तमाम महान लोगों को दो कौड़ी का बताया. कई बार तो मैं गाँधी जी को भी बेकार घोषित कर चुका हूँ. मैं चाहता हूँ कि मेरे पुत्र मेरे इस काम को भी आगे बढायें. महीने में कम से कम एक पोस्ट ऐसी लिखें जिसमें किसी महापुरुष को बेकार बतायें. ऐसी पोस्ट लिखने से खूब नाम होता है.
१०. मेरे ब्लॉग पर लगाए गए विज्ञापन की कमाई को मेरे पुत्र आपस में बाँट लें. मुझे आशा ही नहीं पूरा विश्वास है कि इस मामले में कोई झगडा नहीं होगा क्योंकि कमाई की रकम १०० डॉलर पार नहीं कर सकेगी.
११. बहुत कोशिश करने के बाद भी मैं अपने ब्लॉग पर आजतक एक भी विमर्श नहीं चला सका. विश्व साहित्य हो या जाति की समस्या, नारी मुक्ति आन्दोलन हो या फिर विश्व अर्थव्यवस्था, साम्यवाद हो या फिर साम्राज्यवाद, ऐसे किसी भी विषय मैं एक भी बहस आयोजित न कर पाने की अक्षमता मुझे बहुत खलती है. मैं चाहता हूँ कि मेरे बाद मेरे पुत्र मेरे इस ब्लॉग पर महीने में कम से कम एक बहस जरूर आयोजित करें. ऐसी बहस चलाने से मेरी इस हीन भावना से मेरी आत्मा को मुक्ति मिलेगी.
मैंने अभी तक ग्यारह बातें ही लिखी हैं. इसका कारण यह है कि ग्यारह की संख्या शुभ मानी जाती है. मैं अपनी इस वसीयत में आगे और भी 'कामना' जोड़ सकता हूँ. मैंने फैसला किया है कि इस काम के लिए मैं किसी ब्लॉगर-वकील से बात करूंगा.
पुनश्च:
हलकान जी की ब्लॉग-वसीयत पब्लिश की जाय या नहीं, इस बात को लेकर मैं दुविधा में था. लेकिन फिर मैंने सोचा कि अगर बिड़ला जी और अम्बानी जी की धन-दौलत वाली वसीयत अदालतों में पढी जा सकती है तो विद्रोही जी की ब्लॉग-वसीयत ब्लॉगर बन्धुवों के बीच रखना कोई ख़राब बात नहीं होगी.




