डॉक्टर विनायक सेन की सजा पर टीवी पैनल डिस्कशन किये जा रहे हैं. इनपर कुछ मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को बोलते हुए देखकर मुझे नरोत्तम कालसखा ज़ी याद आ गए. उनका इंटरव्यू फिर से प्रकाशित कर देता हूँ. आपने अगर पहले नहीं बांचा है तो बांचिये.
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नरोत्तम कालसखा बहुत बड़े मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं. बड़े से मेरा मतलब काफी लम्बे हैं. कह सकते हैं ये मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के शिरोमणि हैं. वैसे तो ये और भी काम करते हैं लेकिन इनका जो सबसे प्रिय काम है वो है इन्टरव्यू देना और पैनल डिस्कशन में भागीदार बनना. इन्टरव्यू देने में तो इन्होने हाल ही में विश्व रिकॉर्ड बनाया हैं.
प्रस्तुत है उनका एक इन्टरव्यू.
पत्रकार: नमस्कार कालसखा जी. धन्यवाद जो आपने अपना बहुमूल्य समय इन्टरव्यू के लिए निकाला.
नरोत्तम जी: धन्यवाद किस बात का? हमें इन्टरव्यू देने के अलावा काम ही क्या है? हमें तो इन्टरव्यू देना ही है. आपको पता है कि नहीं, मैंने हाल ही में इन्टरव्यू देने का विश्व रिकॉर्ड बनाया है?
पत्रकार: हाँ हाँ. वो तो पता है मुझे. इसीलिए मैंने सोचा कि जब तक मैं आपका इन्टरव्यू नहीं लूँगा मेरा पत्रकार जीवन धन्य नहीं होगा.
नरोत्तम जी: ठीक है. ठीक है. आप इन्टरव्यू शुरू करें. मुझे इन्टरव्यू ख़त्म करके अपने कॉलेज में एक भाषण देने जाना है.
पत्रकार: ज़रूर-ज़रूर. तो चलिए, पहला सवाल इसी से शुरू करते हैं कि कौन से कॉलेज में थे आप?
नरोत्तम जी: मैं सेंट स्टीफेंस में था.
पत्रकार: वाह! वाह! ये तो बढ़िया बात है. दिल्ली में सेंट स्टीफेंस वाले छाये हुए हैं. वैसे एक बात बताइए. आप सेंट स्टीफेंस के हैं उसके बावजूद आप न तो सरकार में हैं और न ही पत्रकार. ऐसा क्यों?
नरोत्तम जी: हा हा...गुड क्वेश्चन. ऐसा तो मेरी सबसे अलग सोच के कारण हुआ. मैंने सोचा कि सेंट स्टीफेंस वाले सभी सरकार में जाते हैं या फिर पत्रकार बन जाते हैं. मुझे अगर सबसे अलग दिखना है तो मैं मानवाधिकार में चला जाता हूँ. वैसे भी मानवाधिकार वाला सबके ऊपर भारी पड़ता है. सरकार के ऊपर भी और पत्रकार के ऊपर भी. वैसे आप भी तो पत्रकार हैं. आप भी क्या सेंट स्टीफेंस के....
पत्रकार: नहीं साहब नहीं. मैं तो माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय की पैदाइस हूँ.
नरोत्तम जी: वही तो. मैं भूल ही गया कि आप हिंदी के पत्रकार हैं. ऐसे में सेंट स्टीफेंस के...
पत्रकार: हा हा हा..सही कहा आपने. वैसे ये बताइए कि आपसे लोगों को यह शिकायत क्यों रहती है कि आप केवल आतंकवादियों, नक्सलियों या फिर अपराधियों का पक्ष लेते हैं? जब किसी निरीह आम आदमी की हत्या होती है, आप उस समय कुछ नहीं कहते. कहीं दिखाई नहीं देते?
नरोत्तम जी: देखिये भारत में सत्तर प्रतिशत से ज्यादा लोगों की प्रति दिन आय नौ रुपया अड़तालीस पैसा से ज्यादा नहीं है. साढ़े सत्ताईस करोड़ लोग प्रतिदिन केवल एक वक्त का खाना खा पाते हैं. आजादी से लेकर अब तक कुल सात करोड़ चौसठ लाख तेरह हज़ार पॉँच सौ सत्ताईस लोग सरकारी जुर्म का शिकार हुए हैं. आंकड़े बताते हैं कि.....
बोलते-बोलते अचानक नरोत्तम जी जोर-जोर से बोलने लगे. बोले; "पहले मेरी बात सुनिए आप. मुझे बोलने दीजिये पहले. मेरी बात नहीं सुननी तो मुझे बुलाया ही क्यों?"
पत्रकार भौचक्का. उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि नरोत्तम जी को अचानक यह क्या हो गया? घबराते हुए वह बोला; "सर, आप ही तो बोल रहे हैं. मैंने तो आपको बोलने से बीच में रोका नहीं."
अचानक नरोत्तम जी को याद आया कि वे पैनल डिस्कशन में नहीं बल्कि इंटरव्यू के लिए बैठे हैं. लजाने की एक्टिंग करते हुए बोले; "माफ़ कीजियेगा, मैं भूल गया कि मैं पैनल डिस्कशन में नहीं बल्कि इंटरव्यू के लिए बैठा हूँ."
पत्रकार: चलिए कोई बात नहीं. लेकिन आपने मेरे सवाल का जवाब नहीं दिया. मेरा सवाल यह था कि लोगों को शिकायत रहती हैं कि....
नरोत्तम जी: मैं आपके सवाल का ही जवाब दे रहा था.डब्लू एच ओ की एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले चार साल आठ महीने और सात दिन में कुल सात लाख पचहत्तर हज़ार चार सौ नौ लोग सरकारी आतंकवाद का शिकार हुए हैं. नए आंकड़ों के अनुसार....
पत्रकार: डब्लू एच वो? आपके कहने का मतलब वर्ल्ड हैल्थ आरगेनाइजेशन?
नरोत्तम जी: नहीं-नहीं. डब्लू एच ओ से मेरा मतलब था वुडमंड ह्युमनराइट्स आरगेनाइजेशन. आपको इसके बारे में नहीं पता? यह अमेरिका का सबसे बड़ा ह्यूमन राइट्स आरगेनाइजेशन है.
पत्रकार: लेकिन आपको लगता है कि अमेरिका का कोई आरगेनाइजेशन भारत में होने वाली घटनाओं पर इतनी बारीक नज़र रख पायेगा? खैर, जाने दीजिये. आप ने अभी भी मेरे मूल सवाल का जवाब नहीं दिया.
नरोत्तम जी: मैं वही तो कर रहा था..... मैं ये कह रहा था कि सरकारी आतंकवाद को रोकने के लिए हम प्रतिबद्ध है. हमारा जीवन इसी रोक-थाम के लिए समर्पित है.
पत्रकार: लेकिन आप उनको क्या कहेंगे जो पुलिस वालों को मारते हैं? जो आम आदमी को आतंकित करके रखते हैं? क्या वे आतंकवादी नहीं हैं?
नरोत्तम जी: देखिये, आतंकवाद को परिभाषित करना पड़ेगा. आतंकवाद क्या है? ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी के अनुसार टेरोरिज्म इज अ कंडीशन व्हिच...
पत्रकार: सर, आप क्या आतंकवाद की परिभाषा अब डिक्शनरी से देना चाहते हैं?
नरोत्तम जी: हमारे पास सारे तथ्य पूरे प्रूफ़ के साथ रहते हैं. आप अगर सुनना नहीं चाहते हैं तो फिर हमें बुलाया क्यों?
पत्रकार: अच्छा कोई बात नहीं. आप यह बताइए कि सरकार के कदम के खिलाफ ही क्यों बोलते हैं आप?
नरोत्तम जी: सरकार के कदम इसी लायक होते हैं. साठ साल हो गए देश को आजाद हुए. लेकिन सरकार ने केवल निरीह लोगों के ऊपर अत्याचार किया है. विकास के कार्य को हाथ नहीं लगाया. विकास के सरकारी आंकड़े फर्जी हैं. शिक्षा का कोई विकास नहीं हुआ. उद्योगों के विकास के आंकड़े पूरी तरह से फर्जी हैं...आज नक्सल आन्दोलन को निरीह और पूअरेस्ट ऑफ़ द पूअर का समर्थन क्यों मिल रहा है?
पत्रकार: लेकिन नक्सल आन्दोलन को क्या केवल निरीह लोगों का ही समर्थन मिल रहा है? वैसे एक बात बताइए, इन निरीहों के पास ऐसे अत्याधुनिक हथियार कहाँ से आते हैं?
नरोत्तम जी: सब बकवास है. सब सरकारी प्रोपेगैंडा है. नक्सल आन्दोलन में शरीक लोग आदिवासी हैं. इनके पास हथियारों के नाम केवल धनुष-वाण और किसी-किसी के पास कटार है. इससे ज्यादा कुछ नहीं. आधुनिक हथियारों की बात झूठी है. सरकार की फैलाई हुई.
पत्रकार: आपके हिसाब से अत्याधुनिक हथियारों की बात सरकार ने एक प्रोपेगैंडा के तहत फैलाया है?
नरोत्तम जी: बिलकुल. आप अपना दिमाग लगायें और सोचें कि जिन गरीबों के पास खाने को रोटी नहीं है वे ऑटोमेटिक राइफल कहाँ से खरीदेंगे? कोई बैंक लोन देता है क्या इसके लिए?
पत्रकार: चलिए मान लेता हूँ कि ये हथियार नहीं हैं उनके पास. लेकिन कई बार देखा गया है कि ये लोग पुलिस वालों को बेरहमी से कत्ल कर देते हैं. कल रांची में नक्सलियों द्बारा एक इंसपेक्टर की हत्या कर दी गई. आप क्या इसे आतंकवाद नहीं मानते?
नरोत्तम जी: आपके पास क्या सुबूत है कि उस इंसपेक्टर की हत्या नक्सलियों ने की है? सब सरकार का फैलाया गया प्रोपेगैंडा है. देखिये आज से पंद्रह साल पहले तक अट्ठाईस हज़ार चार सौ पैंतीस लोगों से कुल सात हज़ार नौ सौ तेरह एकड़ जमीन छीन ली गई थी जिसपर कुल तिरालीस हज़ार आठ सौ पंद्रह क्विंटल अनाज पैदा होता था. इसमें से बारह हज़ार तीन सौ उन्नीस क्विंटल अनाज खाने के काम आता था और बाकी.....एक अनुमान के हिसाब से सरकार ने कुल उनतालीस हज़ार छ सौ सत्ताईस एकड़ जमीन तेरह उद्योगपतियों के हवाले किया जिसकी वजह से चौबीस हज़ार लोग अपनी ज़मीन से हाथ धो बैठे...हाल ही में प्रकाशित हुए नए आंकडों के अनुसार....
नरोत्तम जी बोलते जा रहे थे. कोई सुनने वाला नहीं था. पत्रकार बेहोश हो चुका था.
(हाल ही में खबर आई है कि पत्रकारों के एक दल ने राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, सूचना और प्रसारण तथा गृहमंत्री को एक ज्ञापन दिया है जिसमें मांग की गई है कि पत्रकारिता विश्वविद्यालय से निकले नए-नए स्नातकों को ऐसे लोगों का इंटरव्यू लेने के लिए बाध्य न किया जाय. ऐसा करना नए पत्रकारों के मानवधिकारों का हनन है.)
Monday, January 3, 2011
एक अधूरा इंटरव्यू
Friday, May 7, 2010
फिर से अधूरा इंटरव्यू
कल दोपहर करीब एक बजे नरोत्तम जी का फ़ोन मिला. क्या कहा? कौन नारोत्तम जी? अरे अपने नारोत्तन कालसखा जी, अरे वही मानवाधिकार वाले. हमेशा की तरह हलकाए से लग रहे थे. आवाज़ सुनकर लगा जैसे कोई आदमी मैराथन दौड़ते हुए हांफ रहा हो और बात भी करना चाहता हो.
मैंने पूछा; "क्या बात है? बड़े परेशान लग रहे हैं?"
वे बोले; "तुम पहले फटाफट मेरा एक इंटरव्यू ले लो."
उनकी बात सुनकर मुझे बड़ा अजीब लगा. मुझे पता है कि नरोत्तम जी ने इंटरव्यू देने में वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया है लेकिन इंटरव्यू लेने के लिए मुझसे कह रहे हैं?
मैंने पूछा; "क्या बात है? सब ठीक-ठाक है तो?"
वे बोले; "पहले मैं तुरंत एक इंटरव्यू देना चाहता हूँ."
मैंने पूछा; "अचानक इंटरव्यू का ख़याल क्यों आ गया? वो भी आप चाहते हैं कि मैं आपका इंटरव्यू लूँ?"
मेरी बात सुनकर भड़क गए. बोले; " आफिस में बैठकर करते क्या हो? इन्टरनेट कनेक्शन भी नहीं है क्या आफिस में?"
मैंने कहा; "ऐसी बात नहीं, कनेक्शन तो है. वैसे आप इंटरव्यू क्यों देना चाहते हैं?"
मेरी बात सुनकर और झल्ला गए. बोले; "कुछ भी पता नहीं है. अरे अजमल को फांसी की सजा हो गई."
मैंने कहा; "अजमल को फांसी की सजा हो गई! कौन अजमल?"
मेरी बात सुनकर बोले; "ओह जीजज..इस आदमी को यह भी नहीं पता कि मैं कौन से अजमल की बात कर रहा हूँ. अरे मैं अजमल कसाब की बात कर रहा हूँ."
उनकी बात सुनकर मुझे याद आया कि कसाब का पूरा नाम अजमल कसाब है. उनकी बात सुनकर एक बार के लिए लगा जैसे उन्हें कसाब कहने में शायद बुरा लगता हो क्योंकि सुना है कसाब का मतलब कसाई होता है. शायद इसीलिए वे उसे उसके फर्स्ट नेम से पुकारते हैं.
यही सोचते हुए मैंने उनसे कहा; "लेकिन कालसखा साहब आप मुझे इंटरव्यू क्यों देना चाहते हैं? आपकी तो वैसे ही आज टीवी न्यूज़ चैनलों पर बड़ी डिमांड रहेगी."
मेरी बात सुनकर बोले; "अरे टीवी पर तो इंटरव्यू रात को लिए जायेंगे. पैनल डिस्कशन भी सारे रात को होंगे. ऐसे तुम क्या चाहते हो कि मैं शाम तक इंतज़ार करूं? मेरा मन कर रहा है कि अभी तुरंत इंटरव्यू दे डालूँ. मैं अपनी अभिव्यक्ति की कुलबुलाहट को संभाल नहीं पा रहा हूँ. अभी फिलहाल टीवी पर आम लोगों के इंटरव्यू आ रहे हैं इसलिए मैंने सोचा कि तुम्हारे ब्लॉग पर ही इंटरव्यू दे डालूँ."
मैंने कहा; "ना बाबा न. बुरा मत मानियेगा लेकिन मैं आपका इंटरव्यू नहीं ले सकता."
वे बोले; "क्यों नहीं ले सकते? क्या प्रॉब्लम क्या है तुम्हें?"
मैंने कहा; "पिछली बार मेरा 'ब्लॉग-पत्रकार' आपका इंटरव्यू लेते हुए बेहोश हो गया था. इस बार तो वो भी नहीं है."
वे बोले; "क्यों नहीं है? कहाँ गया वो? उसने क्या कोई और ब्लॉग ज्वाइन कर लिया?"
मैंने कहा; "नहीं-नहीं ऐसी बात नहीं है. असल में उसने राजनीति ज्वाइन कर ली."
वे बोले; "मुझे उसके अन्दर छिपा हुआ राजनीतिज्ञ उसी दिन दिख गया था जिस दिन वो मेरा इंटरव्यू लेते हुए बेहोश हुआ था. वैसे कौन सी पार्टी ज्वाइन की उसने?"
मैंने उन्हें बताया कि कैसे मेरा ब्लॉग-पत्रकार देवगौड़ा जी का इंटरव्यू लेने बंगलुरू गया था और वहीँ उसने उनकी पार्टी ज्वाइन कर ली. मेरी बात सुनकर बोले; "वो सब छोड़ो ब्लॉग-पत्रकार और मिल जायेंगे लेकिन पहले मेरा इंटरव्यू लो. तुम खुद ले लो."
क्या करता? आपलोग तो जानते ही हैं कि मेरा ब्लॉग कभी किसी की डायरी के पेज से तो कभी किसी के इंटरव्यू से चलता है. भविष्य में अगर नई पोस्ट के लिए विषय न मिला तो कलसखा जी के इंटरव्यू से एक पोस्ट बन जायेगी, यही सोचते हुए मैंने उनका इंटरव्यू लिया. पेश है इंटरव्यू. आप बांचिये.
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शिव: नमस्कार कालसखा जी.
नरोत्तम जी : नमस्कार वगैरह ठीक है जल्दी से मुद्दे पर आइये और सवाल पूछिए.
शिव: जी जरूर. आप ये बताइए कि आज स्पेशल कोर्ट ने कसाब को फांसी की सजा सुना दी. ऐसे में आपको कैसा लग रहा है?
नरोत्तम जी: आपका सवाल सुनकर मुझे ख़ुशी हुई. मुझे लगा जैसे कोई टीवी चैनल का पत्रकार मुझसे सवाल कर रहा है. वैसे जहाँ तक अजमल को फाँसी की सज़ा सुनाये जाने की बात है, तो मेरा कहना यही है कि मैं पर्सनली कैपिटल पनिसमेंट के खिलाफ हूँ. किसी को फाँसी की सजा बेसिक ह्यूमन राइट्स वायलेशन है.
शिव: मतलब यह कि फाँसी की सजा के मुद्दे पर आप आधुनिक फैशन के हिसाब से चलते हैं?
नरोत्तम जी: देखिये यह फैशन की बात नहीं है. मैं आपसे एक सवाल करता हूँ. जो जज किसी को जीवन दे नहीं सकता उसे जीवन लेने का अधिकार है क्या?
शिव: यह बात तो उस अपराधी पर भी लागू होती है जिसने किसी का जीवन ले लिया हो.
नरोत्तम जी: नहीं. यही तो बुनियादी फर्क है. वह तो अपराधी है. उसका काम अपराध करना है लेकिन दूसरी तरफ तो जज है. उसका काम अपराध करना तो नहीं है न.
शिव: आपके कहने का मतलब जज अगर किसी को फाँसी की सज़ा सुनाता है तो वह भी अपराध करना हो गया?
नरोत्तम जी: नहीं आप मेरी बात समझ नहीं रहे. मेरे कहने का मतलब है जज का काम है कानून का फैसला सुनाना. किसी को सज़ा देकर उसका जीवन लेना नहीं है.
शिव: लेकिन भारतीय कानून तो कहता है कि रेयरेस्ट ऑफ़ रेयर केसेज में फाँसी की सजा होनी चाहिए.
नरोत्तम जी: नहीं इसे केवल भारतीय कानून के हिसाब से देखा जाना ठीक नहीं होगा. आज लगभग पूरे यूरोप में कैपिटल पनिसमेंट अबोलिस हो रहा है. ऐसे में हमें चाहिए कि हम अपने कानून पर फिर से विचार करें. आज देश में एक बदलाव लाने की ज़रुरत है. जीवन अपने आप में बहुमूल्य होता है.
शिव: लेकिन एक आतंकवादी का जीवन ही बहुमूल्य है? जिन लोगों को उसने मारा उनका जीवन क्या...
नरोत्तम जी: देखिये कोई भी इंसान पैदा होते ही आतंकवादी नहीं बन जाता. आतंकवाद क्या है पहले इसे डिफाइन करना पड़ेगा. उसकी तह में जाना पड़ेगा. युवक आतंकवादी क्यों बनते हैं? आज पूरे विश्व में इस तरह का माहौल तैयार हो गया है कि शोषित युवा को आतंकवादी करार दिया जा रहा है. वह युवा जिसका शोषण सरकारें कर रही हैं. सरकार का आतंकवाद सबसे पहले है और सबसे बड़ा भी. इन युवकों का आतंकवाद तो सरकार के आतंकवाद का जवाब है. क्या है आतंकवाद? ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी के अनुसार टेरोरिज्म इज अ काम्प्लेक्स टर्म व्हिच सिग्निफाई....
शिव: क्या सर? आप एक अपराधी को मिली सजा को गलत साबित करने के लिए आप टेरोरिज्म की परिभाषा डिक्शनरी से दे रहे हैं. अगर आतंकवादियों को उचित सजा नहीं मिले तो..
नरोत्तम जी (बीच में काटते हुए): आप एक बात बताइए. किसी को फाँसी की सजा देने से आतंकवाद रुक जाएगा क्या?
शिव: माना कि नहीं रुकेगा लेकिन क्या ऐसे में अपराध की सजा देना बंद कर दिया जाए?
नरोत्तम जी: नहीं, मैं वो नहीं कह रहा हूँ. फाँसी की जगह और कोई सजा दीजिये. उस तथाकथित आतंकवादी को सुधारने की कोशिश कीजिये.
शिव: आपको लगता है कि कसाब को सुधारा जा सकता है?
नरोत्तम जी: क्यों नहीं? अगर गौतम बुद्ध की वजह से अंगुलिमाल जैसा अपराधी सुधर सकता है तो अजमल तो उससे बहुत छोटा अपराधी है. हमें ज़रुरत है उसे सपोर्ट करने की. उसे ऐसा वातावरण देने की जिसमें उसका जीवन अच्छा हो. अपराध को अपने बीच से हटाइए, अपराधी को नहीं. पिछले तीस सालों में यूरोप और अमेरिका में कैपिटल पनिसमेंट के खिलाफ अभियान चलाये जा रहे हैं. क्यों चलाये जा रहे हैं? क्योंकि किसी को फाँसी की सजा देना बदले की भावना से दिया गया फैसला होता है. ऐसे में मानव जाति की भलाई इसी में है कि लोग समझें.....
अभी वे बोल ही रहे थे कि उनके फोन की घंटी बजी. हेलो कहते ही बोले; "ओह अरनब...आई वाज वेटिंग फॉर योर कॉल...आई एम कमिंग...बी देयर विदिन टेन मिनट्स...हू आर द आदर पैनेलिस्ट? हू? मनीष तिवारी? ग्रेट!.... हू...तरुण बिजय?..जस्ट द राइट पीपुल...कोलिन फ्रॉम आर साइड?..बस आ रहा हूँ."
इतना कह कर मुझे छोड़ कर चले गए. इतना गुस्सा आया कि क्या कहूँ? अभी भी लोग ब्लॉग वालों को न जाने क्या समझते हैं? टीवी वालों के सामने कुछ समझते ही नहीं. मन तो हुआ कि इसी बात के प्रोटेस्ट में एक महीना कोई पोस्ट ही न लिखूं. फिर सोचा कि नरोत्तम जी का इंटरव्यू अपने ब्लॉग पर छापूँ ही नहीं. फिर सोचा कि चलो छाप देता हूँ नहीं तो भविष्य में इंटरव्यू न दे तो....

