Show me an example
Showing posts with label ब्लागरी में मौज. Show all posts
Showing posts with label ब्लागरी में मौज. Show all posts

Tuesday, December 7, 2010

मनोहर भैया का समाजवाद




मनोहर भैया सोच में बैठे थे. मैंने पूछा; "क्या हुआ भैया? इतने चिंतित क्यों हैं?"

बोले; "लगता है बाबूजी का सपना सपना ही रह जायेगा शिव. क्या करूं, कुछ समझ में नहीं आ रहा है."

उनकी बात सुनकर मैं भी सोचने लग गया.

पहले मनोहर भैया के बारे में बता दूँ. भैया का पूरा नाम राम मनोहर है. उनका यह नाम उनके बाबूजी ने रखा था. बाबूजी राम मनोहर लोहिया के अनन्य भक्त थे. अशोक मेहता, लोहिया जी और जयप्रकाश बाबू के बाद ख़ुद को भारत का सबसे बड़ा समाजवादी मानते थे. ये बात और है कि उनकी तरह की सोच रखने वाले हजारों, लाखों लोग थे. इन समाजवादियों में मुलायम सिंह जी भी थे.

बाबूजी जब तक रहे, समाजवाद लाने में जीवन गुजार दिया. लेकिन समाजवाद भी अपनी जिद पर अड़ा रहा. बहुत कोशिश की गई लेकिन आने की बात तो दूर, अपनी जगह से हिला भी नहीं कि भारत तक पहुँच सके.

नेहरू का विरोध, कांग्रेस का विरोध, सत्ता का विरोध, स्थापित मान्यताओं का विरोध, कोई विरोध छूटा नहीं. कविता का सहारा लिया गया. मंच बनाए गए. निराला हों या धूमिल, नागार्जुन हों या त्रिलोचन, सबकी कविताओं का सामूहिक पाठ चला. सेमिनार आयोजित किए गए. खद्दर के कुर्तों से ढंके नेता दिखते, लेकिन समाजवाद अपनी जिद पर अड़ा रहा.

सारी कोशिश करने के बाद भी जब नहीं आया तो बाबूजी दुखी रहने लगे. सत्तर के दशक में जय प्रकाशबाबू की कोशिशों से एक सरकार बनी भी तो उसे बड़े समाजवादियों की करतूतों की वजह से जाना पडा. सरकार की दुर्गति देखकर जयप्रकाश बाबू दुखी रहने लगे. उनकी देखा-देखी मनोहर भैया के बाबूजी ने भी दुःख का सहारा लिया. उन्हें शायद लगा कि पर्याप्त मात्रा में दुःख न होने की वजह से समाजवाद नहीं आ रहा.

बाद में बाबूजी नहीं रहे. जाते वक्त मनोहर भैया से वचन लिया. भैया ने भी बाबूजी को निराश नहीं किया. बताते हैं कि अन्तिम क्षणों में भैया ने बाबूजी को वचन दिया कि समाजवाद लाकर ही रहेंगे.

कालांतर में भैया ने समाजवाद लाने की कोशिश शुरू कर दी. खादी धारण कर लिया. सरकार के ख़िलाफ़ नारे लिखने लगे. काफी हाऊस में समय गुजारने लगे. बाज़ार में में चाय-पान की दुकानों पर दिखने लगे. महीने में एक बार दिल्ली का दौरा करते. सेमिनारों में तकरीरों की झड़ी लगाते. स्थानीय स्तर पर प्रकाशित होने वाली पत्रिका में लिखते. महीने में पन्द्रह दिन अखबारों में वक्तव्य देते कि विकास की बात बेमानी है. कोई विकास नहीं हो रहा है. सरकारी आंकडे ग़लत हैं. दोस्तों के साथ मिलकर प्रकाशकों की 'दुकानों' के चक्कर लगाते. लेकिन समाजवाद भी अपनी जिद पर अड़ा रहा. टस से मस नहीं हुआ. अपने नाम के आगे खोजकर एक उपनाम तक लगा लिया. लेकिन कुछ भी नहीं हुआ.

यही बात उन्हें खाए जा रही थी. यही कारण था कि चिंतित बैठे थे. मैंने कहा; "मनोहर भैया, बाबूजी का सपना आपको पूरा करना ही है. आख़िर आपने उन्हें वचन दिया था."

बोले; "हाँ, मैं भी तो वही सोच रहा हूँ. तुम्हें क्या लगता है? ऐसा क्या किया जाय कि बाबूजी का सपना पूरा कर सकूं."

मैंने कहा; "भैया, मैं क्या बताऊं. लेकिन आप चिंता न करें. मुझे पूरा विश्वास है कि आप जरूर कोई न कोई रास्ता जरूर निकाल लेंगे."

अचानक मनोहर भैया उछल पड़े. उनकी आंखों में रोशनी चमकी. बोले; "अच्छा, तुम्हारा तो अपना ब्लॉग है. मुझे एक बात बताओ अगर मैं एक ब्लॉग बना लूँ तो कैसा रहेगा?"

मैंने कहा; "भैया मैं क्या कह सकता हूँ. लेकिन एक बात जरूर कहूँगा कि इंटरनेट पर ब्लॉग खोलने से आप अपने विचार ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचा सकते हैं."

मनोहर भैया बोले; "तुम्हारा कहना एकदम ठीक है. मैं अपना एक ब्लॉग बनाऊँगा. मुझे लगता है कि समाजवाद अब ब्लॉग से ही आयेगा."

मैंने कहा; "लेकिन भैया, समाजवादी तो वैश्वीकरण का विरोध करते हैं. और ये इंटरनेट से वैश्वीकरण फैला है. ब्लॉग बनाना तो समाजवादी नीतियों के ख़िलाफ़ होगा."

मनोहर भैया ने कुछ देर सोचकर कहा; "मुझे अपने बाबूजी का सपना पूरा करना है. इसके लिए अगर वैश्वीकरण के टूल की मदद लेनी पड़े तो भी मुझे कोई ऐतराज नहीं है. मुझे समाजवाद लाना ही है चाहे वो इंटरनेट के जरिये से आए."

दूसरे दिन ही मनोहर भैया ने अपना एक ब्लॉग बनाया. ब्लॉग पोस्ट पर सबसे पहले उन्होंने अन्य ब्लॉगर की बुराई की. सबसे पहले ये बताया कि बाकी के ब्लॉगर जो कुछ भी लिखते हैं वो सब कचरा है. उनकी पहली पोस्ट देखकर मैंने कहा; "भैया, आपने तो समाजवाद लाने के लिए ब्लॉग शुरू किया था. लेकिन आपने तो बाकी के ब्लॉगर की बुराई शुरू कर दी."

मनोहर भैया ने मेरे कान के पास मुंह लाते हुए धीरे से कहा; "यही तो समाजवाद लाने की कवायद की शुरुआत है. समाजवाद लाने की कोशिश दूसरों की बुराई करने से शुरू होती है. और फिर ये भी तो देखो कि मेरी पोस्ट पर इतने सारे कमेंट आये हैं."

आनेवाले दिनों में पता चलेगा कि मनोहर भैया का समाजवाद ब्लागिंग से आता है या फिर भैया को कोई और रास्ता खोजने की जरूरत पड़ेगी.

Tuesday, October 26, 2010

हिंदी ब्लॉग जगत के लिए मेरा सबसे बड़ा योगदान





विजयादशमी के अवसर पर कोलकाता में नहीं था. कुछ कारणों से गुडगाँव में था. न तो किसी से मुलाकात हो सकी और न ही इस शुभ अवसर पर किसी को बधाई दे सका. वापस आया तो पता चला कि दशमी के दिन हलकान भाई घर पर आये थे. मुझे न पाकर काफी दुखी हुए.

मैंने सोचा कि देर से ही सही उनसे मिल लूँ. यही कारण था कि रविवार को उनसे मिलने गया. मैंने सोचा कि उन्हें दशमी की बधाई दे डालूँ और साथ ही ब्लागिंग पर कुछ चर्चा वगैरह करके एक पोस्ट लिख मारूं और हिंदी ब्लागिंग के प्रति अपने कर्त्तव्य का निर्वाह कर डालूँ.

शाम को उनके घर पर पहुँचा. घर के भीतर कुछ शोर सुनाई दे रहा था. एक बार के लिए समझ में नहीं आया कि क्या कारण हो सकता है?

डोर-बेल बजाया. थोड़ी ही देर में हलकान भाई आये. देखकर लगा कुछ क्रोधित थे. हिम्मत नहीं हुई कि उन्हें तुरंत विजयादशमी की शुभकामनाएं दे डालूँ. फिर मन में आया कि कहीं पूछ न लें कि; "तुम मेरे घर किस लिए आये हो?"

मैंने उनसे धीरे से कहा; "विजयादशमी की शुभकामनाएं, हलकान भाई."

मेरी तरफ देखते हुए बोले; "काहे की शुभकामनाएं? विजयादशमी शुभ कहाँ रही इसबार?"

मैंने कहा; "ऐसा क्यों कह रहे हैं हलकान भाई? विजयादशमी तो हमेशा शुभ ही होती है."

वे बोले; "क्या शुभ होगी? इन जाहिलों के साथ रहकर विजयादशमी मेरे लिए कैसे शुभ होगी?"

मैंने कहा; "कुछ समस्या हो गई क्या हलकान भाई?"

वे बोले; "अरे, अब क्या कहूँ तुमसे? ऐसा जाहिल परिवार मिला है कि समस्या हुई नहीं है, समस्या मेरे घर में बिछौना बिछाकर बैठ गई है."

मैंने कहा; "ऐसा क्यों कह रहे हैं हलकान भाई? लगता है कुछ गंभीर बात हो गई घर वालों से?"

वे बोले; "अब तुमसे क्या बताएं? जब घरवालों का यह हाल है तो बाहर वालों के बारे में क्या कहें?"

मैंने कहा; "पहेलियाँ न बुझायें हलकान भाई. बताएं तो सही कि हुआ क्या?"

अभी मैंने अपनी बात कही ही थी कि भाभी ज़ी आ गईं. बोली; "हमसे सुनो. हम बता रहे हैं. सब मामला ऊ कबिता की बजह से हुआ है."

मैंने कहा; "कौन कविता?"

वे बोलीं; "अरे कौन कबिता क्या? ओही कबिता जो ई अपने ब्लॉग पर लिखते हैं."

मैंने कहा; "क्या हुआ हलकान भई? ऐसा तो नहीं हुआ कि आपने कविता लिखी थी और किसी की गलती से वह डिलीट हो गई?"

हलकान भाई को शायद लगा कि उन्हें पूरी बात बता देनी चाहिए. वे बोले; "अब क्या कहें तुमसे? पिछले सप्ताह मैंने एक कविता अपने ब्लॉग पर पब्लिश की थी. अपने ब्लॉगर भाई-बंधु ने उसे बहुत बढ़िया कविता बताया और उसकी सराहना की. सराहना के कुल छत्तीस कमेन्ट मिले थे. सबकुछ ठीक चल रहा था तबतक मेरी माता ज़ी ने अपना कमेन्ट देकर उस कविता को घटिया बता दिया. मैं कहता हूँ, जब बाकी लोग़ उसे बढ़िया बता रहे हैं तो क्या ज़रुरत थी इनको घटिया बताने की? इनकी देखा-देखी तीन-चार लोग़ और उस कविता को घटिया बता गए. अब तुम्ही बताओ इन जाहिलों के ऊपर गुस्सा नहीं आएगा? ऊपर से माताजी की देखा-देखी हमारे भाई साहब ने भी कमेन्ट कर डाला कि माँ का कहना सही है. कविता घटिया है. ये मेरे परिवार वाले हैं कि मेरे दुश्मन हैं?"

उनकी बात सुनकर भाभी ज़ी ने कहा; "अरे त एही बास्ते कोई अपनी माँ से झगड़ता है? कोई अपना भाई से झगड़ता है? हम कहते हैं ऐसा कबिता लिखना ही काहे जो घर में झगड़ा करवा दे?"

भाभी ज़ी की बात सुनकर हलकान भाई बोले; "आपको कुछ पता नहीं है चीजों के बारे में. आप कुछ मत बोलिए. चुप रहिये. ब्लागिंग में एक एड्भर्स कमेन्ट का मतलब बुझाता है आपको?"

उनकी बात सुनकर भाभी ज़ी बोलीं; "का होगा? पहाड़ टूट जाएगा? कौन सा कैरियर ख़राब हो जाएगा आपका? ब्लागिंग ही पेट भरता है का आपका?"

उनकी बात सुनकर हलकान भाई बोले; "आपसे त बात करना ही अपराध है. आप जाइए चाह बनाइये."

भाभी ज़ी वहाँ से चली गईं.

मैंने कहा; "जाने दीजिये हलकान भाई. जो हो गया सो हो गया. ऐसा हो ही जाता है कभी-कभी."

वे बोले; "अब क्या कहें तुमसे? आजतक कभी भी हमको कविता पर एक भी एड्भर्स कमेन्ट नहीं मिला था लेकिन ई घर वालों की वजह से पहली बार दाग लग गया. ऊपर से नंबर ऑफ कमेन्ट गिरकर सत्तासी से सीधा बयालीस. इसके पहले वाली पोस्ट पर मुझे सत्तासी कमेन्ट मिले थे. और इस पोस्ट पर केवल बयालीस. क्या बताऊँ शिव तुमको? इच्छा तो हो रही है कि ब्लागिंग ही छोड़ दूँ."

मैंने कहा; "ऐसी बात न कहें हलकान भाई. एक छोटी सी बात के लिए ब्लागिंग छोड़ने की क्या ज़रुरत है? आप यह देखिये न कि बच्चन, निराला और दिनकर ज़ी की तरह आपकी सभी कवितायें बहुत बढ़िया हैं. बस इतनी सी बात है कि उन महान कवियों की तरह ही आपकी भी कुछ कवितायें केवल बढ़िया है. कवियों को उनकी बहुत बढ़िया कविताओं के लिए याद किया जाता है. बढ़िया कविताओं के लिए नहीं. आप ब्लागिंग छोड़ने का अपना ख्याल दिल से निकाल दें. ऐसी उंच-नीच हो ही जाती है."

मेरी बात सुनकर बोले; "अब क्या कहें तुमसे? हम तो पोस्ट भी लिख लिए थे कि अब और ब्लागिंग नहीं करेंगे. बाकी तुम कहते हो तो ठीक है. वो पोस्ट पब्लिश करने के लिए शिड्यूल में डाल दिया था...."

मैंने कहा; "आप उस पोस्ट को डिलीट कर दीजिये हलकान भाई. आपसे बहुत उम्मीद है ब्लॉग जगत को. हिंदी ब्लागिंग को ऊपर पहुँचाने में आपकी भूमिका अविस्मरणीय है. आज हिंदी ब्लागिंग जहाँ पर है अगर वहाँ पर आप छोड़ देंगे तो उसे जिस जम्प की ज़रुरत है वह उसे नहीं मिलेगी........"

मैंने बहुत मनाया तो वे मान गए. दोनों ने चाय पी. मैं उनसे विदा लेकर अपने घर आ गया.

हलकान भाई ने ब्लागिंग छोड़ने का अपना फैसला वापस ले लिया. मेरे कहने से उन्होंने ऐसा किया. आशा है हिंदी ब्लॉग जगत मेरे इस प्रयास को स्वर्णाक्षरों में लिखेगा. हिंदी ब्लॉग जगत के लिए मेरा यह सबसे बड़ा योगदान है.

आप बताइए, मेरा यह योगदान याद रखेंगे तो?

Wednesday, September 15, 2010

दिखला के यही मंज़र ब्लॉगर चला जाता है




श्री बशीर बद्र से क्षमा याचना सहित ये ब्लॉग-गजलें पेश कर रहा हूँ. ब्लॉग ग़ज़ल क्या होती है, कृपया यह न पूछें. मैं जवाब नहीं दे पाऊँगा.

हँसी-मजाक की बातें हैं. कृपया इसे सीरियसली न लें. केवल हल्की-फुल्की पैरोडी है.

ब्लॉग ग़ज़ल न.१


दिखला के यही मंज़र ब्लॉगर चला जाता है
चुटकी में शाश्वत लेखन कैसे किया जाता है

उस पोस्ट की लाइन पर झगड़े बहुत वे दोनों
जिस पोस्ट की बातों को सड़ियल कहा जाता है

दोनों से चलो पूछें उसको कहीं देखा है
जो टिप्पणी देने को आता है न जाता है

दुनियाँ में जो कुछ शाश्वत, ब्लागों पे लिखा है वो
अखबार में जो कुछ है, घर में पढ़ा जाता है

मिल जाए गर फालोवर तो नाम हुआ समझो
गर न मिले कभी तो दिल डूबता जाता है


ब्लॉग ग़ज़ल न.२


खुश रहे न कभी उदास रहे
पोस्ट लिक्खा औ बदहवाश रहे

आज टिप्पणियां मिलें कम ही सही
कल बढेंगी यही बस आस रहे

नामवाले तो आते रहते हैं
कोई बेनामी आस-पास रहे

बढ़िया, रोचक, बधाई खूब सुनी
कभी तो गालियों की बास रहे

मिली जो टिप्पणी तो खूब हँसे
नहीं जब भी मिली, उदास रहे

Tuesday, August 31, 2010

इंडिया टुडे - राष्ट्रीय ब्लॉग सर्वे - २०१०






इंडिया टुडे ने जुलाई महीने के अंतिम सप्ताह में देश भर में हिंदी ब्लागिंग पर एक सर्वेक्षण किया. पत्रिका के अनुसार यह सर्वेक्षण अपनी तरह का पहला सर्वेक्षण है जो हिंदी ब्लागिंग के लिए न सिर्फ महत्वपूर्ण है अपितु उसकी दिशा तय करने में निर्णायक साबित होगा.

इस मामले में पत्रिका के प्रधान सम्पादक का कहना है; "हिंदी ब्लागिंग स्वतंत्र अभिव्यक्ति का ऐसा माध्यम बन चुकी है जिसका भविष्य तो उज्जवल है ही, वर्तमान भी कम महत्वपूर्ण नहीं है. लेखन के मीडियम के तौर पर हिंदी ब्लागिंग अब पर्याप्त रूप से पुरानी हो चुकी है. इतनी पुरानी हो चुकी है कि अब तो इस मीडियम का विस्तार दलों, गुटों और एशोसियेशन के तौर पर भी हो रहा है. आज पूरे भारतवर्ष में बीस हज़ार से ज्यादा हिंदी ब्लॉगर हैं. यही कारण था कि हमने पहली बार इतने विशाल स्तर पर एक सर्वे किया. हमने पूरे देश के अट्ठारह बड़े और तैंतीस छोटे शहरों में अपने संवाददाताओं को भेजकर करीब आठ हज़ार हिंदी ब्लागरों से कुल तेरह प्रश्न किये और उनपर उनका मत लेते हुए यह सर्वे करवाया जिसमें कई चौकानेवाले तथ्य सामने आये हैं. आशा है कि हमारी पत्रिका हिंदी ब्लागिंग पर आगे भी सर्वेक्षण करती रहेगी. हम अपना यह सर्वेक्षण राष्ट्र को समर्पित करते हैं."

प्रस्तुत है सर्वेक्षण का परिणाम जो इंडिया टुडे के १६-२३ सितम्बर अंक में प्रकाशित होगा. वैसे आपको इंतज़ार करने की ज़रुरत नहीं है, सर्वेक्षण के परिणाम आप यहीं बांचिये.

०१. ब्लागरों से जब यह पूछा गया कि "उनकी ब्लागिंग का उद्देश्य क्या है?" तो कुल ५७.३७ प्रतिशत ब्लॉगर का यह मानना था कि ब्लागिंग का कोई उद्देश्य हो, यह ज़रूरी नहीं है. जहाँ बड़े शहरों में इस तरह का विचार रखने वाले कुल ४०.२६ प्रतिशत लोग थे वहीँ छोटे शहरों में यह आंकड़ा ५२.१८ प्रतिशत रहा. बड़े शहरों में करीब १९.२७ प्रतिशत ब्लॉगर का मानना था कि वे इन्टरनेट पर अमर होने के लिए ब्लागिंग कर रहे हैं वहीँ ९.८३ प्रतिशत ब्लॉगर यह मानते हैं कि वे अपनी ब्लागिंग से समाज को बदल डालेंगे. छोटे शहरों में समाज बदलने को ब्लागिंग का उद्देश्य बनाने वाले ब्लागरों का आंकड़ा करीब १७.३१ प्रतिशत रहा.

०२. जब ब्लागरों से यह सवाल पूछा गया कि; "ब्लागिंग की वजह से सम्बन्ध बनाने में सहायता मिलती है?" तो ७०.१९ प्रतिशत ब्लॉगर यह मानते हैं कि ब्लागिंग की वजह से सम्बन्ध बनते है. वहीँ १९.८३ प्रतिशत ब्लॉगर यह स्वीकार करते हैं कि ब्लागिंग की वजह से सम्बन्ध बिगड़ते है. ७.१२ प्रतिशत ब्लॉगर का यह मानना है कि ब्लागिंग की वजह से सम्बन्ध बनते-बिगड़ते रहते हैं. बाकी ब्लॉगर यह मानते हैं कि समबन्ध बने या बिगडें, उन्हें इसकी परवाह नहीं है.

०३. एक और महत्वपूर्ण प्रश्न था; "ब्लागिंग करने की वजह से क्या ब्लॉगर को एक पारिवारिक माहौल मिलता है?" इस प्रश्न पर ८९.१६ प्रतिशत ब्लॉगर का मानना था कि उन्हें ब्लागिंग में आने के बाद एक ही चीज मिली है और वह है पारिवारिक माहौल. ६.८७ प्रतिशत ब्लॉगर का ऐसा मानना है कि वे स्योर नहीं है कि उन्हें पारिवारिक माहौल मिला है या नहीं? ऐसे ब्लॉगर का मानना है कि अगर झगड़ा वगैरह होता रहे तो पारिवारिक माहौल का एहसास बना रहता है परन्तु चूंकि झगड़ा परमानेंट फीचर नहीं है इसलिए वे अपने विचार पर पूरी तरह जम नहीं सकते.

०४. एक प्रश्न कि; "ब्लागिंग की वजह से ब्लॉगर को कौन-कौन से रिश्तेदार मिलने की उम्मीद रहती है?" इस प्रश्न के जवाब में ८.९३ प्रतिशत ब्लॉगर का कहना था कि वे एक 'फादर फिगर' मिलने की उम्मीद से रहते हैं वहीँ ४५.६६ प्रतिशत लोग भाई-बहन मिलने की उम्मीद करते हैं. करीब १४.५७ प्रतिशत ब्लॉगर को एक अदद चाचा मिलने की उम्मीद रहती है तो १९.३१ प्रतिशत ब्लॉगर एक दोस्त मिलने की उम्मीद में ब्लागगिंग करते हैं. केवल ७.५६ प्रतिशत ब्लॉगर यह उम्मीद करते हैं कि उन्हें पूरा परिवार ही मिल जाए जिससे उन्हें किसी रिश्ते की कमी नहीं खले. करीब ३.१६ प्रतिशत लोग यह मानते हैं कि पारिवारिक रिश्तों से ज्यादा महत्वपूर्ण है कि उन्हें टिप्पणियां मिले.

०५. हमारे संवाददाताओं ने ब्लागरों से एक सवाल किया कि; "क्या केवल अपना ब्लॉग लिखकर ब्लॉगर बना जा सकता है?" इस सवाल के जवाब में ह्वोपिंग ९७.६८ प्रतिशत ब्लॉगर का यह मानना था कि केवल ब्लॉग लिखकर ब्लागिंग नहीं की जा सकती. जहाँ २२.४४ प्रतिशत ब्लॉगर का यह मानना था कि वे अपना ब्लॉग लिखने के अलावा चर्चा करना पसंद करते हैं वहीँ ५३.७१ प्रतिशत ब्लॉगर का यह मानना है कि वे ब्लॉग लिखने के अलावा ब्लॉगर सम्मलेन को महत्वपूर्ण मानते हैं. १८.८८ प्रतिशत ब्लॉगर यह मानते हैं कि लिखने के अलावा वे एशोसियेशन बनाने को ब्लागिंग का अभिन्न अंग मानते हैं. ४१.५१ प्रतिशत ब्लॉगर यह मानते हैं कि लिखने के अलावा ब्लॉगर सम्मलेन, एशोसियेशन और गुटबाजी करके ही एक सम्पूर्ण ब्लॉगर बना जा सकता है. वहीँ ७.३९ प्रतिशत ब्लॉगर यह मानते हैं कि लेखन, एशोसियेशन और सम्मलेन के अलावा पुरस्कार वितरण करके ही पूर्ण ब्लॉगर बना जा सकता है.

०६. सर्वे में एक प्रश्न था; "आप लेखन की किस विधा का समर्थन करते हैं?" इस प्रश्न के जवाब में जहाँ ८३.१५ प्रतिशत लोगों ने कविता लेखन का समर्थन किया वहीँ १४.१३ प्रतिशत लोगों ने गद्य लेखन का समर्थन किया. केवल १.१८ प्रतिशत लोगों ने दोनों का समर्थन किया. करीब १.५ प्रतिशत लोगों ने यह कहकर किसी का समर्थन नहीं किया कि वे गुट निरपेक्ष संस्कृति को जिन्दा रखना चाहते हैं.

०७. एक प्रश्न कि; "टिप्पणियां कितनी महत्वपूर्ण हैं?" के जवाब में ९१.८९ प्रतिशत ब्लॉगर ने बताया कि टिप्पणियां सबसे महत्वपूर्ण हैं. इसमें से जहाँ ८४.५६ प्रतिशत ब्लॉगर यह मानते हैं कि टिप्पणियां पोस्ट से भी ज्यादा महत्वपूर्ण हैं वहीँ ७.१६ प्रतिशत ब्लॉगर मानते हैं कि टिप्पणियां और पोस्ट दोनों महत्वपूर्ण हैं. करीब ८.७८ प्रतिशत ब्लॉगर मानते हैं कि पोस्ट और टिप्पणियों से ज्यादा महत्वपूर्ण वे खुद हैं.

०८. एक प्रश्न कि; "फीड अग्रीगेटर का रहना कितना ज़रूरी है?" के जवाब में करीब ९२.३९ प्रतिशत ब्लॉगर का यह मानना है कि हिंदी ब्लागिंग के लिए फीड अग्रीगेटर का होना बहुत ज़रूरी है. जहाँ ६७.७२ प्रतिशत ब्लॉगर यह मानते हैं कि फीड अग्रीगेटर के रहने से लोगों को उठाने-गिराने में सुभीता रहता है वहीँ २८.७५ प्रतिशत ब्लॉगर का मानना था कि फीड अग्रीगेटर को पंचिंग बैग की तरह इस्तेमाल करने में मज़ा आता है इसलिए उसका रहना बहुत ज़रूरी है. करीब ३.१८ प्रतिशत ब्लॉगर यह मानते हैं कि फीड अग्रीगेटर रहे या न रहे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि वे लोगों को मॉस-मेल के जरिये सूचित करते हैं कि उनकी नई पोस्ट आ गई है.

०९. जब ब्लागरों से यह प्रश्न किया गया कि "ब्लागिंग करने की वजह से उनका कितने लोगों से झगड़ा हुआ है?" तो जो परिणाम सामने आये वे चौकाने वाले थे. करीब ८.१२ प्रतिशत लोग ही यह जवाब दे सके कि ब्लागिंग करने के बावजूद उनका किसी ब्लॉगर के साथ झगड़ा नहीं हुआ. ९०.१७ प्रतिशत का मानना था कि ब्लागिंग करते हुए उनका किसी न किसी ब्लॉगर से झगड़ा अवश्य हुआ है. वहीँ १.७१ प्रतिशत ब्लॉगर का मानना था कि वे स्योर नहीं है कि उनका किसी अन्य ब्लॉगर के साथ झगड़ा हुआ या नहीं? ऐसे लोगों का मानना था कि अन्य ब्लॉगर से उनकी तू-तू-मैं-मैं हुई भी तो उसे झगड़ा कह जा सकता है या नहीं इस बात पर संदेह है. केवल २४.८९ प्रतिशत ब्लॉगर ही ऐसे थे जिनका दो या दो से कम लोगों से झगड़ा हुआ है. करीब ४०.३७ प्रतिशत ब्लॉगर ऐसे हैं जिनका पाँच से ज्यादा लेकिन नौ से कम लोगों के साथ झगड़ा हुआ. जहाँ १३.७८ प्रतिशत ब्लॉगर का दस से ज्यादा और पंद्रह से कम ब्लॉगर के साथ झगड़ा हुआ वहीँ ११.१० प्रतिशत ब्लॉगर का पंद्रह से ज्यादा और तीस से कम ब्लॉगर के साथ झगड़ा हुआ. कुल ०.३ प्रतिशत ब्लॉगर थे जिन्होंने मॉस लेवल पर यानि पचास से ज्यादा लोगों के साथ झगड़ा किया है.

१०. जब ब्लागरों से यह प्रश्न किया गया कि "हिंदी ब्लागिंग में ज्यादातर झगड़े की वजह क्या है?" तो करीब केवल ७.८९ प्रतिशत लोगों ने व्यक्तिगत मतभेद को झगड़े की वजह बताया. दूसरी तरफ जहाँ ६७.१८ प्रतिशत लोगों ने धार्मिक वैमनष्य को झगड़े की जड़ बताया वहीँ १९.०९ प्रतिशत ब्लागरों ने राजनैतिक विचारधारा को झगड़े की वजह बताया. वैसे एक बात पर सारे ब्लॉगर एकमत थे कि कहीं पर झगड़ा होने से उस संस्था के डेमोक्रेटिक होने का गौरव प्राप्त होता है इसलिए हिंदी ब्लागिंग में झगड़े का मतलब है कि डेमोक्रेटिक सेटअप सुदृढ़ हो रहा है.

११. एक सवाल कि; "संबंध बनाने के लिए कौन से साधन महत्वपूर्ण हैं?" के जवाब में जो परिणाम आये वे चौकाने वाले थे. जैसे करीब ६३.३९ प्रतिशत लोगों का मानना था कि संबंध बनाने के लिए फ़ोन सबसे महत्वपूर्ण साधन है. वहीँ करीब ८.९७% प्रतिशत ब्लॉगर यह मानते हैं कि संबंध बनाने के लिए वे ई-मेल का सहारा लेते हैं. ६.९८ प्रतिशत ब्लॉगर मेल और फ़ोन दोनों का इस्तेमाल करते हैं और बाकी के ब्लॉगर मेल, फ़ोन के अलावा सम्मलेन और व्यक्तिगत मुलाकातों को सम्बन्ध बनाने के लिए महत्वपूर्ण मानते हैं.

१२. जब ब्लागरों से यह पूछा गया कि; "सिनेमा, राजनीति, क्रिकेट और सामजिक मुद्दों के अलावा ब्लॉग पोस्ट के लिए सबसे महत्वपूर्ण विषय क्या है?" तो उसपर करीब ७५.४३ प्रतिशत ब्लागरों का मानना था कि इन सब विषयों के अलावा सबसे महत्वपूर्ण विषय है "चिट्ठाकारों" के बारे में लिखना. करीब ६.७३ प्रतिशत लोगों के लिए यात्रावर्णन एक महत्वपूर्ण विषय है वहीँ ९.११ प्रतिशत लोगों के लिए ब्लागिंग कार्यशाला महत्वपूर्ण विषय है. दूसरी तरफ ८.२७ प्रतिशत लोगों के लिए सम्मान लेन-देन कार्यक्रम महत्वपूर्ण है तो करीब ०.५% प्रतिशत लोगों ने स्वीकार किया कि वे खुद सबसे महत्वपूर्ण विषय हैं.

१३. जब ब्लागरों से यह प्रश्न किया गया कि; "बीच-बीच में ब्लागिंग छोड़ देने की घोषणा एक ब्लॉगर के भविष्य के लिए कितनी महत्वपूर्ण है?" तो उसके जवाब में करीब ९२.१३ प्रतिशत ब्लॉगर मानते हैं कि ब्लागिंग छोड़ देने की घोषणा किसी भी ब्लॉगर के ब्लॉग-जीवन के लिए अति महत्वपूर्ण है. इसमें से करीब ६६.८९ प्रतिशत ब्लॉगर का मानना है कि ऐसी घोषणा से किसी भी ब्लॉगर का ब्लॉग-जीवन न सिर्फ बढ़ जाता है अपितु उसे टिप्पणियां भी ज्यादा मिलने लगती हैं. करीब ७.१६ प्रतिशत ब्लॉगर ही मानते हैं कि ब्लागिंग छोड़ देने की घोषणा से एक ब्लॉगर के ब्लॉग-जीवन पर ख़ास असर नहीं पड़ता. वहीँ जिन लोगों का मानना है कि ऐसी घोषणा से एक ब्लॉगर का ब्लॉग जीवन बढ़ जाता है उनमें से करीब २४.३१ प्रतिशत लोग यह मानते हैं कि दो से ज्यादा बार ब्लागिंग छोड़ देने की घोषणा करने से एक ब्लॉगर का ब्लॉग जीवन औसतन तीन वर्ष बढ़ जाता है. वहीँ चार से ज्यादा घोषनाएं करने वाले ब्लॉगर का ब्लॉग जीवन औसतन पाँच वर्ष बढ़ जाता है.

तो ये थे हमारे प्रथम राष्ट्रीय ब्लॉग सर्वेक्षण के परिणाम. हमारे संवाददाताओं ने न सिर्फ पूरे देश का दौरा किया अपितु सही परिणामों के लिए सैम्पल साइज़ से कोई समझौता नहीं किया. उद्देश्य केवल एक ही था कि पूरे देश के सामने एक सच्ची तस्वीर उभर कर आये. हम उन हिंदी ब्लागरों के भी आभारी हैं जिन्होंने इस सर्वे के लिए अपना समय निकाला. आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि यह सर्वे हिंदी ब्लागिंग में एक मील का पत्थर साबित होगा.

---सम्पादक

Wednesday, August 4, 2010

वर्ष के सर्वश्रेष्ठ सम्मान वितरक - हलकान 'विद्रोही' .




सुबह-सुबह उनके दर्शन हो गए तो सवा सौ ग्राम शुद्ध तुकबंदी वाला वह गाना याद आ गया कि; 'राह में उनसे मुलाकात हो गई, जिससे डरते थे वही बात हो गई....ल ला ला ला ल ला ला ला ला..'
'

जी हाँ, आज सुबह-सुबह हलकान भाई से मुलाकात हो गई. इधर-उधर की बातें हुईं. उन्होंने बिभूति नारायण राय के बयान की निंदा की. उसके बाद मंहगाई पर चिंतित हुए. बात आगे बड़ी तो सुरेश कलमाडी की आलोचना करते हुए इस बात पर चिंता व्यक्त की कि सरकार हम नागरिकों का पैसा पानी की तरह बहा रही है. पैसे के पानी की तरह बहने की बात शुरू हुई तो याद आया कि मानसून की कमी और बाढ़ पर भी बात कर सकते हैं. फिर उसपर भी बात हुई. उसके बाद उन्होंने सरकार की नीतियों पर क्षोभ प्रकट करते हुए आशंका जताई कि आनेवाला समय मिडिल क्लास और लोवर मिडिल क्लास के लिए बहुत कष्टदायक होगा.

बात करते-करते जब मुझे यह लगने लगा कि अब लगभग सभी मुद्दे ख़त्म हो चुके हैं तभी उन्होंने अपनी वसीयत की बात शुरू कर दी. उन्होंने अपने ब्लॉग पर उनकी वसीयत टाइप करने के लिए मुझे धन्यवाद् जैसा कुछ देते हुए कहा; "दूसरे के लिए इतना कुछ करने का जज्बा मैंने बहुत कम ब्लॉगर में देखा है. मेरी वसीयत अपने ब्लॉग पर पब्लिश करने के लिए मैं पोस्ट लिख कर तुम्हें सम्मानित करना चाहता हूँ."

बस उनकी बात सुनकर मैं डर गया. मुझे लगा कि; 'जिस बात से हमेशा डरते रहे, कहीं ऐसा न हो वह हो ही जाए. ऐसा न हो कि हलकान भाई सचमुच मुझे सम्मानित कर दें. वैसे भी मुझे हमेशा डर लगा रहता है कि ब्लॉग पुरस्कार देने वाले किसी दिन पकड़कर सम्मानित कर देंगे तब क्या करूँगा? देखेंगे न लेते बनेगा और न ही ना करते.'

खैर, मैंने उनसे कहा; "हलकान भाई, जाने दीजिये न. क्या सम्मानित करना है? आपने उस पोस्ट पर कमेन्ट कर दिया, यही मेरे लिए बहुत बड़ी बात है."

वे बोले; "केवल कमेन्ट से ब्लॉगर का सम्मान पूरा नहीं होता. ब्लॉगर का असली सम्मान तब होता है जब उसके योगदान के लिए उसे पोस्ट लिखकर सम्मानित किया जाय."

मैंने कहा; "जाने दीजिये न हलकान भाई. मैंने आपकी वसीयत ही तो अपने ब्लॉग पर छापी थी. वह तो मुझे वैसे भी छापना ही था."

वे बोले; "अरे ऐसे कैसे जाने दें? नहीं जाने दूंगा.मैं तुम्हें सम्मानित करके रहूँगा."

फिर कुछ सोचने के बाद बोले; "लेकिन कौन सी कैटेगरी में सम्मानित करूं तुम्हें?"

मैंने कहा; "मैं समझा नहीं."

मेरी बात सुनने के बाद सोचते रहे. अचानक बुदबुदाए; "अच्छा, वर्ष का सर्वश्रेष्ठ टंकक सम्मान कैसा रहेगा?"

मैंने कहा; "टंकक? टंकक का मतलब क्या होता है, हलकान भाई? मैं समझा नहीं?"

वे बोले; "अरे टंकक का मतलब टंकण करने वाला. मतलब टाइप करने वाला. तुमने मेरी वसीयत अपने ब्लॉग पर जो छापी उसके लिए तुमने टाइप तो किया ही न."

कुछ समझ में नहीं आ रहा था. मैं सोचने लगा कि सम्मान मिलेगा और वो भी टंकक का! बड़ी दुविधा में फँसा था. क्या कहूँ हलकान भाई से? उन्हें सीधा-सीधा मना कर दूँ?

बीमारी-उपरान्त पटखनी-पांड़े सम्मानग्रस्त ब्लॉगर
मेरी 'सोचनीय' अवस्था को शायद वे भांप गए. मुझसे बोले; "अरे चिंता मत करो. मैं अपने ब्लॉग पर ज्ञान जी को भी सम्मानित करने वाला हूँ. साथ-साथ तुम्हें भी कर दूंगा. लोग यह तो नहीं कहेंगे कि केवल एक को सम्मानित किया और दूसरे को नहीं किया."

उनकी बात सुनकर मन में आया कि; 'मतलब मेरे साथ ज्ञान भइया भी गए?'

वैसे मुझे बड़ा अजीब लग रहा था. अजीब कैटेगरी है; वर्ष का सर्वश्रेष्ठ टंकक. फिर मन में उत्सुकता जागी कि हलकान भाई से पूछें कि वे भइया को कौन सी कैटेगरी में सम्मानित कर रहे हैं? मैंने उनसे पूछा; "वैसे हलकान भाई, आप ज्ञान भइया को कौन सी कैटेगरी में सम्मानित कर रहे हैं?"

वे बोले; " अभी तक तय नहीं हुआ है. असल में कैटेगरी तय करने वाली हमारी समिति में ज्ञान जी के सम्मान की कैटेगरी को लेकर मतभेद हो गया है. लेकिन चिंता करने की बात नहीं है. हम जल्द ही इस मतभेद को सुलझा लेंगे."

मैंने कहा; "मतलब अभी तक तय नहीं हुआ है? वैसे क्या-क्या कैटेगरी हो सकती है उनके लिए?"

वे बोले; "देखो तीन कैटेगरी में मामला उलझा हुआ है. हमारी समिति के दो मेंबर चाहते हैं कि ज्ञान जी को वर्ष का सर्वश्रेष्ट मार्निंग ब्लॉगर सम्मान दिया जाय. दो मेंबर चाहते हैं कि उन्हें वर्ष का सर्वश्रेष्ठ गंगा प्रचारक ब्लॉगर सम्मान दिया जाय. वही समिति के एक मेंबर इस बात पर टिके हुए हैं कि ज्ञान जी को वर्ष का सर्वश्रेष्ठ संचारक ब्लॉगर सम्मान दिया जाय."

मैंने कहा; "संचारक? यह कौन सी कैटेगरी हुई?"

वे बोले; "संचारक ब्लॉगर का मतलब तो मुझे भी नहीं मालूम है लेकिन अगर हमारी समिति के मेंबर ने ऐसी कोई कैटेगरी बनाई है तो उसका कुछ न कुछ मतलब ज़रूर होगा."

मैंने कहा; "तो आपने बाकायदा समिति बना रखी है जो कैटेगरी का आविष्कार करती है? जिससे ब्लॉगर भाइयों और बहनों को पकड़ कर सम्मानित किया जा सके?"

वे बोले; "अरे इतना बड़ा महोत्सव है. बिना तैयारी के कैसे शुरू कर देता? बाकायदा समिति है. फाइव मेंबर कमीटी . मेजोरिटी का डिसीजन फाइनल होता है. हाँ, कभी-कभी किसी कैटेगरी पर झमेला हो जाता है जैसे ज्ञान जी वाली कैटेगरी पर. ऐसी परिस्थिति में मेरा निर्णय फाइनल और मान्य होता है."

मैंने कहा; "तो हलकान भाई, इसका मतलब आप और भी लोगों को सम्मानित करेंगे? वैसे और कौन-कौन सी कैटेगरी है?"

वे बोले; "बहुत लम्बी लिस्ट है कैटेगरी की. सुनाना शुरू करूँगा तो पूरा एक दिन लगेगा. अभी तक सत्तर कैटेगरी का अनाऊँसमेंट हो चुका है. लेकिन अभी भी करीब एक सौ पैसठ कैटेगरी बाकी हैं. कुछ प्रमुख कैटेगरी हैं जैसे सर्वश्रेष्ठ आंचलिक जूनियर ब्लॉगर, सर्वश्रेष्ठ आंचलिक सीनियर ब्लॉगर, सर्वश्रेष्ठ आंचलिक प्रचारक, सर्वश्रेष्ठ आंचलिक प्रताड़क, सर्वश्रेष्ठ कानूनी ब्लॉगर, सर्वश्रेष्ठ फ़िल्मी ब्लॉगर, सर्वश्रेष्ठ भोजपुरी फ़िल्मी ब्लॉगर, सर्वश्रेष्ठ......"

मैंने कहा; "बस-बस...हलकान भाई मैं समझ गया. आप महान काम कर रहे हैं."

वे बोले; "ब्लागिंग का मतलब केवल पोस्ट और टिप्पणी लिखना नहीं होता है. ब्लागिंग का मतलब सम्मान भी होता है. ब्लागिंग का मतलब अपमान भी होता है. ब्लागिंग का मतलब गुमनाम भी होता है. ब्लागिंग का मतलब...."

मैंने कहा; "समझ गया हलकान भाई. पूरी तरह से समझ गया."

वे बोले; "तो तुम्हारा वर्ष के सर्वश्रेष्ठ टंकक के रूप में सम्मान पक्का..."

पुरस्कार प्रदाता वितरक माननीय हलकान विद्रोही

क्या कहता? कुछ नहीं बोला. हाँ यह सोचते हुए उनसे विदा हुआ कि जब तक पोस्ट लिख रहा हूँ तबतक ठीक है, जिस दिन पोस्ट नहीं लिख पाऊँगा उसी दिन से सम्मान देने का धंधा शुरू करूँगा और सबसे पहले हलकान भाई को वर्ष के सर्वश्रेष्ठ सम्मान वितरक के ख़िताब से सम्मानित करूँगा.

Friday, July 2, 2010

ब्लॉगर हलकान 'विद्रोही' की नई ब्लॉग-वसीयत




अप्रैल २००८ में अपने हलकान भाई, यानि ब्लॉगर हलकान 'विद्रोही' ने अपनी ब्लॉग-वसीयत लिखी थी. मैंने उसे अपने ब्लॉग पर पब्लिश भी किया था. चूंकि ऐसा पहली बार हुआ था कि किसी हिंदी ब्लॉगर ने अपनी ब्लॉग-वसीयत लिखवाई थी, इसलिए उस वसीयत में केवल ग्यारह प्वाइंट थे. हलकान भाई ने वसीयत के बारे में लिखा था;

मैंने अभी तक ग्यारह बातें ही लिखी हैं. इसका कारण यह है कि ग्यारह की संख्या शुभ मानी जाती है. मैं अपनी इस वसीयत में आगे और भी 'कामना' जोड़ सकता हूँ. मैंने फैसला किया है कि इस काम के लिए मैं किसी ब्लॉगर-वकील से बात करूंगा.

पिछले हफ्ते हलकान भाई ने अपनी ब्लॉग वसीयत में बदलाव किया. उन्होंने मुझे नई वसीयत दिखाते हुए कहा; "ले जाओ, अपने ब्लॉग पर छाप देना. तुम्हें अपना लिखा हुआ कुछ छापने की आदत तो है नहीं. कभी डायरी, कभी चिट्ठी छापते रहते हो. ले जाओ एक बार फिर से मेरी वसीयत छाप दो."

मैंने कहा; "जाने दीजिये हलकान भाई. आप इसे पाने ब्लॉग पर ही छाप दीजियेगा."

वे बोले; "नए ट्रेंड के अनुसार एक ही पोस्ट जितने ज्यादा ब्लॉग पर छपे उतना ज्यादा नाम होता है. इसलिए ले जाओ और इसे अपने ब्लॉग पर छाप दो. मैं भी बाद में अपने ब्लॉग पर छाप दूंगा. वसीयत तो मेरी ही है. और ब्लॉग भी मेरा है."

तो मैं हलकान भाई की नई वसीयत छाप रहा हूँ. आप बांचिये.

.....................................................................................

मैं ब्लॉगर हलकान 'विद्रोही' , ब्रह्माण्ड का सबसे धाँसू हिन्दी ब्लॉगर, अपने पूरे होश-ओ-हवाश में ये ब्लॉग-वसीयत लिख रहा हूँ. कल तक मैं समझता था कि वसीयत केवल घर-बार, जमीन-जायदाद, बैंक लॉकर, सोना-चाँदी वगैरह के भविष्य में होने वाले बँटवारे के लिए लिखी जाती है. लेकिन जब से एक साईट ने मेरे ब्लॉग की कीमत दस लाख डॉलर से ज्यादा आंकी है, तबसे ये ब्लॉग ही मेरी सबसे अमूल्य निधि बन बैठा है. रूपये-पैसे, सोना-चाँदी वगैरह की कीमत मेरे लिए दो कौड़ी की भी नहीं रही. इसलिए ये ब्लॉग-वसीयत लिखना मेरे लिए मजबूरी हो चुकी है.

मेरी वसीयत की मुख्य बातें निम्नलिखित हैं.

०१. जिस दिन मेरा आखिरी क्षण आये और डॉक्टर मुझे मृत घोषित कर दें तो भी डॉक्टरों की बात पर विश्वास न किया जाय. मैं सचमुच मरा हूँ कि नहीं ये जानने के लिए मेरे कान में कहा जाय; "हलकान उठो, तुम्हारी पोस्ट पर नया कमेंट आया है." ये सुनने के बाद भी अगर मैं उठकर न बैठूं तो मुझे मृत मान लिया जाय.

०२. मेरे चले जाने के बाद मेरे ब्लॉग के संचालन का काम मेरे तीनों पुत्रों के हाथों में दे दिया जाय. मेरे ब्लॉग का नाम भी बारूद से बदलकर 'बारूद का ढेर' कर दिया जाय. जब मैं अकेले लिखता था तबतक तो बारूद नाम समझ में आता है लेकिन जब वही ब्लॉग मेरी जगह मेरे तीन पुत्र संचालित करेंगे तो 'बारूद का ढेर' नाम खूब
फबेगा.

०३. मेरे मरने के बाद मेरे ब्लॉग को सामूहिक ब्लॉग में कन्वर्ट कर दिया जाय. जब तक मैं लिखूंगा तब तक सप्ताह में तीन से ज्यादा पोस्ट नहीं लिख पाऊंगा. इस बात की वजह से मुझे उन ब्लागरों से हमेशा ईर्ष्या होती रही है जो दिन में पाँच-पाँच पोस्ट ठेलते रहते हैं. मेरी दिली तमन्ना है कि मेरे पुत्र एक दिन में कम से कम बीस पोस्ट ठेलें ताकि हर फीड एग्रीगेटर के पेज पर मेरा ब्लॉग ही छाया रहे. मेरी आत्मा को शान्ति देने का इससे अच्छा तरीका और कुछ नहीं हो सकता.

०४. मेरी मृत्यु के बाद मेरे पुत्र सिर्फ़ उन्ही ब्लॉग पर कमेंट करें जिनके ब्लॉग पर मैं कमेंट करता रहा हूँ. मुझे श्रद्धांजलि देते हुए हुए जितनी भी पोस्ट लिखी जाय, उनपर बहुत सारी फर्जी आईडी बनाकर ढेर सारा कमेंट अवश्य करें. मेरा मंझला पुत्र, जो मुहल्ले के तमाम घरों की दीवारों पर चोरी-छिपे गालियाँ लिखता है, उसे मैं बेनामी कमेंट करने और बाकी के ब्लागरों के लिए गालियाँ लिखने का महत्वपूर्ण काम सौंपता हूँ.

०५. इतने दिनों तक ब्लॉग लिखने के बावजूद मैं आजतक बिना छंद और तुकबंदी की एक भी कविता नहीं लिख सका. ये बात मेरे मन में हीन भावना पैदा करती रही है. मेरा छोटा पुत्र जो रह-रहकर आसमान की तरफ़ देखने लगता है और जिसके अन्दर बुद्धिजीवी बनने के सभी लक्षण मौजूद हैं, मैं उसे बिना छंदों और बिना तुकबंदी वाली कविता लिखने का काम सौंपता हूँ. अगर मेरा छोटा पुत्र इस काम को न कर सके तो उसे चिंता करने की जरूरत नहीं. वह जयशंकर प्रसाद, राम दरश मिश्र और पाब्लो नेरुदा की कविताओं को अपनी कविता बताकर तब तक छापता रहे जब तक पकड़ा न जाए.

०६. मैंने ब्लॉग लिखकर समाजवाद लाने की एक कवायद शुरू की थी. इतने दिनों के बाद मैं अपने अनुभव से कह सकता हूँ कि समाजवाद के आने का चांस बहुत कम है. लेकिन चूंकि मैं इस दर्शन में विश्वास रखता हूँ कि इंसान को हिम्मत नहीं हारनी चाहिए इसलिए मैं चाहता हूँ कि मेरी इस अधूरी कोशिश को मेरे तीनों पुत्र आगे बढायें. हिम्मत न हारना ही असली समाजवादी की निशानी है.

०७. मैंने अपनी 'बकलमख़ुद' लिखकर तैयार कर ली है. हालांकि अजित वडनेरकर जी ने मुझे लिखने के लिए कभी नहीं कहा लेकिन मैंने इस आशा से लिख लिया था कि वे एक न एक दिन जरूर कहेंगे. अगर मेरे जीते जी वे नहीं कहते हैं तो फिर मेरे पुत्रों को मैं जिम्मेदारी सौंपता हूँ कि वे मेरे बकलमख़ुद को मेरे ही ब्लॉग पर छाप लें.

०८. मैंने अभी तक के अपने ब्लागिंग कैरियर में बाकी के ब्लागरों के लेखन को कूड़ा बताया है. मैं चाहता हूँ कि मेरे जाने के बाद मेरे पुत्र मेरे इस काम को आगे बढायें और वे हर दूसरे दिन किसी न किसी ब्लॉगर के लेखन को कूड़ा बताएं. मैं यह भी चाहता हूँ कि मेरे तीनों पुत्र महीने में कम से कम एक बार हिन्दी ब्लागिंग में विद्यमान अपरिपक्वता के बारे में लिखकर बहस जरूर करवाएं. ऐसी पोस्ट पर टिप्पणियों की संख्या में कमीं नहीं आती.

०९. मैंने कई बार ऐसी पोस्ट लिखी जिसमें तमाम महान लोगों को दो कौड़ी का बताया. कई बार तो मैं गाँधी जी को भी बेकार घोषित कर चुका हूँ. मैं चाहता हूँ कि मेरे पुत्र मेरे इस काम को भी आगे बढायें. महीने में कम से कम एक पोस्ट ऐसी लिखें जिसमें किसी महापुरुष को बेकार बतायें. ऐसी पोस्ट लिखने से खूब नाम होता है.

१०. मेरे ब्लॉग पर लगाए गए विज्ञापन की कमाई को मेरे पुत्र आपस में बाँट लें. मुझे आशा ही नहीं पूरा विश्वास है कि इस मामले में कोई झगडा नहीं होगा क्योंकि कमाई की रकम १०० डॉलर पार नहीं कर सकेगी.

११. बहुत कोशिश करने के बाद भी मैं अपने ब्लॉग पर आजतक एक भी विमर्श नहीं चला सका. विश्व साहित्य हो या जाति की समस्या, नारी मुक्ति आन्दोलन हो या फिर विश्व अर्थव्यवस्था, साम्यवाद हो या फिर साम्राज्यवाद, ऐसे किसी भी विषय मैं एक भी बहस आयोजित न कर पाने की अक्षमता मुझे बहुत खलती है. मैं चाहता हूँ कि मेरे बाद मेरे पुत्र मेरे इस ब्लॉग पर महीने में कम से कम एक बहस जरूर आयोजित करें. ऐसी बहस चलाने से मेरी इस हीन भावना से मेरी आत्मा को मुक्ति मिलेगी.

१२. जब तक मैं ब्लॉग लिख रहा हूँ मैंने अपनी तमाम पोस्ट में मेरे अन्दर की कन्फ्यूजियाहट ही दर्शाई है. तीन साल तक ब्लागिंग करने के बावजूद मैं खुद कभी इस कन्फ्यूजन से निकल नहीं पाया कि ब्लागिंग मेरे लिए उपयोगी है या नहीं? मैं चाहता हूँ कि मेरे बाद मेरे तीनों पुत्र भी इसी कन्फ्यूजन का शिकार रहें. ऐसा करने से दूसरों के मन में उनकी छवि एक आत्मनिरीक्षण करने वाले ब्लॉगर की बनी रहेगी.

१३. पिछले तीन महीने से मैं ब्लागिंग पर एक शोध कर रहा हूँ. इस शोध से मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि ब्लॉग एग्रीगेटर सिवाय फर्जीवाड़ा के और कुछ नहीं. मैंने अपनी खोज से यह सिद्ध कर दिया है कि पुराने हिंदी ब्लॉगर असल में ब्लॉगर नहीं बल्कि मठाधीश हैं और एग्रीगेटर के फर्जीवाड़े की वजह से उन्हें ब्लॉगर माना जाता है. मैं जब तक जिंदा हूँ, इस मुद्दे पर मैं रोज पोस्ट ठेलता रहूँगा. मेरे मरने के बाद मेरे तीनों पुत्र मेरे शोध को न सिर्फ आगे बढ़ाएं बल्कि हर दृष्टिकोण से पैदा होनेवाले फर्जीवाड़े पर लिखें.

१४. मेरे ब्लॉग बारूद के अलवा मेरे नौ और ब्लॉग हैं जिन्हें मैं फर्जी आई डी से चलाता हूँ. मैं चाहता हूँ कि मेरे मरने के बाद मेरे बाकी के ब्लॉग भी मेरे पुत्र चलायें. मेरे बाकी के ब्लॉग हैं;

मैं चन्दन तुम पानी
देख फकीरा रोया
डाकिया डाक लाया
क्रांति संभव है
ब्लॉग-आत्मा
यहाँ से भारत को देखो
बादल पर लिख दिया तेरा नाम
जिगर मा बड़ी आग है
जिंदगानी फिर कहाँ

१५. मैं जब से ब्लॉग लिख रहा हूँ तब से ही मैंने अपने ब्लॉग को हर एग्रीगेटर से जोड़ रखा है. हर एग्रीगेटर से जुड़े रहने के बावजूद मैं उन्हें गाली ही देता आया हूँ. मैं चाहता हूँ कि मेरे बाद मेरे पुत्र अपने ब्लॉग को नए-पुराने और भविष्य में आनेवाले अग्रीगेटर से जोडें और मेरी परंपरा को निभाते हुए उन्हें गाली देते रहें.

१६. तमाम ब्लागरों को कमेन्ट करके गाली देने की मेरी क्षमता की वजह से मुझे आजतक एक निहायत ही ईमानदार और खरी-खरी कहने वाला ब्लॉगर माना जाता रहा है. मैं चाहता हूँ कि मेरे बाद मेरे पुत्र मेरे इस काम को आगे बढायें जिससे लोग उन्हें भी ईमानदार मानें.

१७. तमाम कोशिश करने के बाद भी मैं एक भी अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर मिलन अटेंड नहीं कर पाया. मेरी बड़ी इच्छा है कि मैं एक बार अमेरिका में ब्लॉगर मिलन का आयोजन करूं. अगर मेरे जीते जी मैं यह कार्य न कर सकूं तो मेरे पुत्र यह कार्य अवश्य करें और एक ब्लॉगर मिलन वाशिंगटन में आयोजित करें. ऐसा करने से मेरी आत्मा को शांति मिलेगी.

१८. अपने तीन साल के ब्लागिंग जीवन में अब तक मैं अट्टारह बार ब्लागिंग छोड़ने की धमकी दे चुका हूँ और चार बार ब्लॉग बंद कर चुका हूँ. इसका फायदा यह होता है कि टिप्पणियां खूब मिलती हैं और लोगों की टिप्पणी से साबित होता है कि मैं महत्वपूर्ण ब्लॉगर हूँ. मेरे बाद मेरे पुत्र महीने में कम से कम एक बार ब्लागिंग छोड़ने की बात को लेकर पोस्ट अवश्य लिखें. इससे धमकी की प्रैक्टिस होती रहती है.

१९. अपने तीन साल के ब्लागिंग जीवन में करीब हर चौथे दिन मैंने ब्लॉग जगत के तथाकथित खराब माहौल के बारे में पोस्ट लिख कर माहौल खराब करने की कोशिश की. यह बहुत दुर्लभ और महान कला है जिसपर प्रैक्टिस की सहायता से ही मास्टरी की जा सकती है. मैं चाहता हूँ कि मेरे बाद मेरे पुत्र माहौल खराब करने की प्रैक्टिस करते रहे. इससे बहुत नाम होता है.

२०. मेरी सबसे बड़ी ब्लॉग-तमन्ना यह है कि एक दिन मेरे ब्लॉग की चर्चा टाइम मैगेजीन में हो. अगर मेरे जीते जी यह संभव नहीं होता तो मैं चाहूँगा कि मेरे पुत्र मेरे बाद भी कोशिश करें जिससे मेरे ब्लॉग के बारे में कभी न कभी टाइम मैगेजीन में अवश्य छपे.

२१. ब्लॉग लेखन के दौरान मैंने हमेशा ही महिलाओं के उठने-बैठने से लेकर उनके खान-पान और पोशाक के बारे में बहुत ज्ञान दिया है. उन्हें हमेशा रास्ता दिखाया है कि उन्हें समाज में कैसे रहना है और कैसे चलना है. मेरे बाद मेरे पुत्र भी यह काम करते रहें. ऐसा करने से उनकी गिनती भारतीय संस्कृति के सबसे बड़े रक्षकों में होगी जो ईमेज-स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होती है.

साल २०१० में बनने वाली वसीयत में बस इतना ही. अगर भविष्य में मैंने अपनी वसीयत में कोई बदलाव किया तो सार्वजनिक तौर पर उसकी सूचना अपने साथी ब्लागरों को अवश्य दूंगा.

ब्लाग वसीयत लिखी हलकान 'विद्रोही' दिनांक २४-०६-२०१०,

Friday, May 28, 2010

राष्ट्रीय ब्लॉगर दल?




"हें हें ..तो मानते हैं न कि कोई न कोई योजना है?"; प्रभु चावला जी ने हलकान भाई से अपने चिर-परिचित अंदाज़ में पूछा.

हलकान भाई ने शायद सीधी बात का अक्षय कुमार एपिसोड देख रखा था. उन्होंने अक्षय कुमार 'ईस्टाइल' में दांत चियारते हुए कहा; " हे हे ..नहीं-नहीं, ऐसी कोई बात नहीं. हमारी पार्टी ने अभी तक कुछ फैसला नहीं किया है. जब चुनाव परिणाम आयेंगे तो फिर देखा जाएगा. हमारा मानना है कि राजनीति में विचारों का विरोध होता है, लोगों का नहीं. "

अपने हलकान भाई यानी ब्लॉगर हलकान 'विद्रोही' राष्ट्रीय ब्लॉगर दल के महासचिव की कैपेसिटी में सीधी बात नामक कार्यक्रम में प्रभु चावला जी से 'सीधी बात' कर रहे थे. सोलहवीं लोकसभा के चुनाव सम्पन्न होने और नतीजे आने के बीच एक रविवार पड़ गया था. चावला जी ने हलकान भाई को उस रविवार में फिट कर दिया था.

चुनावों में हमसब के दल राष्ट्रीय ब्लॉगर दल यानि 'राब्लाद' का बहुत जोर प्रचार करने की वजह से हलकान भाई को समय नहीं मिला था. वे कुछ थके हुए भी थे लेकिन प्रभु चावला जी द्वारा कई दिनों की कोशिश के बाद वे कार्यक्रम में जाने के लिए तैयार हो गए थे.

"धनबाद ब्लॉगर एशोसियेशन का विलय झारखण्ड ब्लॉगर एशोसियेशन में जब पिछले साल हुआ, उसी से आभास हो गया था कहीं न कहीं यह राजनीतिक महत्वाकांक्षा अब केवल राज्य स्तर की नहीं रही. अब यह राष्ट्रीय हो गई है."; प्रभु चावला जी ने फिर से चार-पांच अदाओं में अपना सिर हिलाते-घुमाते हुए कहा.

अब हलकान भाई को लगा कि अक्षय कुमार 'ईस्टाइल' में बात को टाला नहीं जा सकता. वे अचानक राग दरबारी के लंगड़ की तरह आध्यात्म मोड में आते हुए बोले; "हमारी लड़ाई तो सत्त की लड़ाई है चावला जी. आप पत्रकार हैं न. आप नहीं समझेंगे. आपलोग कहीं न कहीं कहीं नामक जुमला बोलकर पता नहीं क्या-क्या कह जाते हैं. वैसे भी महत्वाकांक्षा कोई बुरी बात नहीं है. "

"हें हें..लेकिन बातें तो हो रही हैं न. आठ महीने पहले रायपुर में जो सम्मलेन हुआ, खबर है कि उसी में यह निर्णय ले लिया गया था कि हाई कमान के फैसले को न मानते हुए प्रदेश ब्लॉगर एशोसियेशन वहां की सभी लोकसभा सीटों पर उम्मीदवार खड़ा करेगा"; प्रभु चावला जी ने अपने किसी विश्वस्त सूत्रों के हवाले से प्राप्त जानकारी को साझा किया.

"देखिये सम्मलेन के निर्णय पहले ब्लॉग पर लिख दिए जाते थे. फोटो-सोटो छप जाया करती थी तो पता चलता था कि क्या हुआ है. जितने लोग सम्मलेन में जाते थे, उतनी पोस्ट आती थी. अब तो सम्मेलनों के निर्णय गुप्त रखे जाते हैं. ऐसे में आपको कहाँ से जानकारी मिली?"; हलकान भाई ने बड़े सर्द लहजे में कहा. इतना कहकर वे हँसने लगे.

उनकी हँसी से प्रभावित प्रभु चावला बोले; "हें हें...कुछ न कुछ तो बात होगी..बिना आग धुंआ नहीं उठता. अच्छा चलिए एक बात बताइए. अगर कांग्रेस को इन चुनावों में कुछ कम सीटें मिलीं तो आपकी पार्टी उसे समर्थन देगी?"

चावला जी की बात सुनकर हलकान भाई ने उनसे उल्टा सवाल किया; "आप यही सवाल कांग्रेस पार्टी से पूछिए. मेरा मतलब अगर आर. बी. डी. को कुछ कम सीटें मिलीं तो कांग्रेस समर्थन करेगी क्या?"

उनका सवाल सुनकर प्रभु चावला सकपका गए. खैर, फिर से दो-तीन बार अपना सिर इधर-उधर करते बोले; "कोलीशन पोलिटिक्स में तो आपको समर्थन देना ही पड़ेगा."

"क्यों देना पड़ेगा? अगर हम सबसे बड़े दल बनकर उभरे जो कि हम उभरेंगे तो फिर तो कांग्रेस समर्थन करेगी हमारी पार्टी को"; इतना कहते हुए हलकान भाई सीरियसता की एक और सीढ़ी चढ़ गए.

उनका आत्मविश्वास देखकर प्रभु चावला की टाई ढीली हो गई. हें हें करते हुए बोले; "अच्छा, आपको क्या लगता है? आपकी पार्टी देश को चला पाएगी? जिस राजनीति की ज़रुरत है कोलीशन को चलाने में आपलोगों को वह राजनीति आती है?"

"बहुत अच्छे ढंग से. बहुत अच्छे ढंग से चलाएगी देश को हमारी पार्टी. चावला साहब हमें राजनीति में नौसिखुआ मत समझिये...... आज की तारीख में पूरे देश में सत्य, अहिंसा, इंसानियत, मुरौव्वत, वगैरह-वगैरह अगर किसी समाज में है तो वह है ब्लॉग समाज. हम एक दिन इस देश में सरकार बनायेंगे यह बात हमें पांच साल पहले से ही पता थी"; हलकान भाई ने जानकारी दी.

"आपकी पार्टी के पास कोई प्लान है देश को चलाने का? मेरा मतलब आपने कोई खाका खींचा है कि आप देश को कैसे चलाएंगे? क्या बदलाव लायेंगे?"; प्रभु चावला जी ने सीधा सवाल पूछा.

"देश को चलाने के लिए हमने पहले से ही प्लान बना रखा है. हमारा प्लान पुराना है........ हम बिना प्लान के कुछ नहीं करते. हमारा प्लान है कि हम पहले समाज को बदलेंगे. फिर देश को बदल डालेंगे. फिर हम विश्व को बदलेंगे. उसके बाद अगर वैज्ञानिकों का, वैसे हमारे ब्लॉग जगत में भी बहुत वैज्ञानिक हैं, फिर भी अगर वैज्ञानिकों का साथ मिला तो हम ब्रह्माण्ड को बदल डालेंगे. आज देखने की बात है कि क्यों हमें लोगों का इतना बड़ा समर्थन मिल रहा है? आज की तारीख
में..."; हलकान भाई बहुत जोश में बोलते जा रहे थे.

मैं टीवी देखते-देखते उन्हें चीयर-अप कर रहा था; "कम्मान, हलकान भाई, कम्मान... आज प्रभु चावला को पहली बार कोई मिला है. आज उनको पता चलेगा कि असली पोलिटिशियन क्या होता है...अब हमारी सरकार बनने से कोई नहीं रोक सकता..."

अचानक लगा जैसे कोई बार-बार पीठ पर थपकी दे रहा है. आँखें खुल गईं. देखा तो पत्नी सामने खड़ी थीं. बोलीं; "सरकार बन गई हो तो अब चाय पी ली जाय?'

मैंने कहा; "क्या हुआ?"

वे बोलीं; "क्या हुआ वो तो तुम बताओगे."

अब कैसे बताता कि सपने में क्या देखा. बता देता तो भद्द पिट जाती.

सुबह से सोच रहा हूँ. इस तरह का सपना? कहीं ये सम्मेलनों, एसोशियेशनों का असर तो नहीं है?

Monday, January 4, 2010

ब्लॉगर हलकान 'विद्रोही' का राष्ट्रकवि 'दिनकर' के नाम पत्र




अब तक यह जग-जाहिर हो गया है कि मेरी ब्लागिंग में मौलिक कुछ भी नहीं. जो कुछ भी मौलिकता है वह दूसरों की है. इंटरव्यू, डायरी, न्यूजपेपर की रपट वगैरह-वगैरह, मैं कहीं से उड़ाकर, कहीं से चोरी कर लाता हूँ और छाप देता हूँ. आप लोगों में से कुछ लोगों को भी आदत पड़ गई है यही सबकुछ पढ़ने की. तो ठीक है. तो आपकी आदत को सम्मान देते हुए मैं एक चिट्ठी छाप रहा हूँ. हलकान 'विद्रोही' जी ने यह चिट्ठी राष्ट्रकवि 'दिनकर' के नाम लिखी थी. शायद उन्होंने कभी सोचा नहीं होगा कि चिट्ठी को वे अपने ब्लॉग पर छापेंगे उससे पहले मेरे हाथ लग जायेगी. अब लग गई तो लग गई. मैं छाप दे रहा हूँ. आप बांचिये.

........................................................


आदरणीय स्वर्गीय राष्ट्रकवि दिनकर जी,

आप आज जीवित रहते तो चरण स्पर्श लिख देता. नहीं हैं तो वह कैसे लिखूँ? चलिए, आप जहाँ भी हों, मेरा मतलब चाहे जहाँ, वहीँ से मेरा चरण स्पर्श स्वीकार कर लें. ना मत कहियेगा, मैं सबका चरण स्पर्श नहीं करता. इस तरह से देखेंगे तो मैं आपके ऊपर एक तरह का एहसान कर रहा हूँ. हे राष्ट्रकवि, आपके मन में विचार उठ रहे होंगे कि मैं कौन? जाहिर है, कभी आप मुझसे मिले नहीं तो पहचानेगे कैसे? तो आपकी दुविधा दूर करते हुए मैं अपना परिचय खुद दे देता हूँ. मैं हलकान 'विद्रोही', मशहूर हिंदी चिट्ठाकार.

अब अगर आप सोच रहे होंगे कि यह चिट्ठी मैं आपको क्यों लिख रहा हूँ तो मैं वह भी बता देता हूँ. हे राष्ट्रकवि, यह चिट्ठी मैं इसलिए लिख रहा हूँ ताकि आपके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रेषित कर सकूँ. हे राष्ट्रकवि, मैं आपके प्रति बहुत कृतज्ञ हूँ. मेरे ऊपर आपका एहसान दिन प्रति दिन बढ़ता ही जा रहा है. एहसान के मामले में आपने काव्य रचकर किसी के ऊपर उतना एहसान नहीं किया जितना मेरे ऊपर केवल दो पंक्तियाँ लिख कर कर दिया.

हे राष्ट्रकवि, आपके तमाम खंड-काव्य, दंड-काव्य वगैरह पढ़कर भी लोग उतना खुश नहीं हुए होंगे जितना मैं आपकी लिखी दो पंक्तियाँ पढ़कर हूँ. अब आप सोच रहे होंगे कि मैं कौन सी दो पंक्तियों की बात कर रहा हूँ? तो सुनिए. हे राष्ट्रकवि, मैं निम्नलिखित दो पंक्तियों की बात कर रहा हूँ;

समर शेष है नहीं पाप का भागी केवल व्याध
जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनका भी अपराध


हे कवि शिरोमणि, वैसे तो आपने तमाम पद्य, गद्य, खंड-काव्य वगैरह लिखे हैं लेकिन मुझे लगता है कि ये दो पंक्तियाँ लिखने के बाद आपको और कुछ लिखने की ज़रुरत ही नहीं थी. क्या ज़रुरत थी रश्मिरथी या उर्वशी लिखने की? अब कुरुक्षेत्र आपने पहले लिख दिया था तो मैं उसका नाम नहीं ले रहा. परन्तु इतना ज़रूर कहूँगा उपरोक्त दो पंक्तियाँ लिखने के बाद अगर आप और कुछ नहीं भी लिखते तो चलता. आप ज़रूर सोच रहे होंगे कि मैं यह सब क्यों लिख रहा हूँ तो हे कवि शिरोमणि, सुनिए;

आपकी लिखी इन दो पंक्तियों की नींव पर ही मेरी ब्लागरी का मकान खड़ा हुआ है. हे राष्ट्रकवि, मैं ब्लॉगर कुछ अलग तरह का हूँ. आये दिन मैं अपने ब्लॉग पर बहस वगैरह करवाता रहता हूँ. मुझे याद है मैंने पहली बार अपने ब्लॉग पर बहस करवाई थी जिसका विषय था; ""ज्यादा मिठास किस में है? चीनी या गुड़ में?"

हे कवि शिरोमणि, मुझे आशा है कि आपको यह सुनकर आश्चर्य नहीं होगा कि महिला ब्लॉगर ने चीनी को मीठी बताया और पुरुष ब्लागरों ने गुड़ को. कुछ ब्लॉगर जो इस बहस को बेमानी और टुच्ची बहस मानकर चल रहे थे, उन्होंने तटस्थ रहने का संकल्प लिया. मुझे इन ब्लॉगर की बात ज़रा भी अच्छी नहीं लगी क्योंकि मैं चाहता था कि जैसे मैं गुड़ को ज्यादा मीठा मानकर चलता हूँ उसी तरह से ये 'तटस्थ' ब्लॉगर भी गुड़ को ही मीठा बताएं. मैं अपनी बात कैसे कहूँ यही सोच रहा था कि मेरे एक मित्र चिट्ठाकार ने आपकी इन दो पंक्तियों की और ध्यान दिलाया. मैंने ये दो पंक्तियाँ पढ़ी और उसे कमेन्ट में अपनी पोस्ट पर डाल दिया. तब से मैं आपकी इन दो पंक्तियों का भक्त बन गया हूँ.

हे कवि शिरोमणि, इन पंक्तियों का मुझपर यह असर हुआ कि मैंने सुबह-शाम इन पंक्तियों का इक्यावन बार पाठ शुरू किया. करीब दो महीने तक पाठ करने के बाद मुझे ये पंक्तियाँ याद हो गईं. आज हाल यह है कि मैं जहाँ-तहां इन पंक्तियों को टांक देता हूँ. मेरे कम्प्यूटर के की-बोर्ड से निकली इन पंक्तियों को पढ़कर मुझे लोग बुद्धिजीवी ब्लॉगर मानने लगे हैं. कह सकते हैं कि मेरी ब्लागरी आपकी इन दो पंक्तियों से निखरती चली गई.

हे कवि शिरोमणि, एक दिन मैंने एक प्रयोग किया. मैंने अपने घर के तराजू के एक पलड़े पर आपकी सारी कृतियाँ जैसे कुरुक्षेत्र, रश्मिरथी, परशुराम की प्रतीक्षा, उर्वशी, संस्कृत के चार अध्याय वगैरह-वगैरह रखा और दूसरे पर आपके द्वारा लिखी गई ये दो पंक्तियाँ. मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा जब मैंने देखा कि दो पंक्तियों वाला पलड़ा नीचे बैठ गया. उस दिन मुझे पता चला कि कितना वजन है आपकी इन दो पंक्तियों में. ऐसे में आपके द्वारा लिखा गया बाकी साहित्य मेरे किस काम का?

हे कवि शिरोमणि, पहले मैं पोस्ट लिखकर टिप्पणी में ये दो पंक्तियाँ लिखता था. कालांतर में यह बदलाव आया कि अब मैं हर पोस्ट के नीचे ये दो पंक्तियाँ पहले से ही टांक देता हूँ. इस मामले में कबीर से प्रभावित रहता हूँ यानि काल करे सो आजकर....से. आज हाल यह है कि अब ब्लॉगर लोग कानाफूसी करते हुए कहते हैं कि मेरी पोस्टों में यही दो पंक्तियाँ पढने लायक हैं और बाकी सब बकवास. उसके लिए मैं यही कहता हूँ कि हे प्रभु, इन्हें क्षमा करना क्योंकि ये नहीं जानते कि.......

हे राष्ट्रकवि, मैंने हिसाब करके देखा है कि पिछले दो महीने तेरह दिन से हिंदी ब्लागरी के तमाम लोग और मेरे कुछ मित्र मुझे बुद्धिजीवी ब्लॉगर मानने लगे हैं. ब्लागिंग के बाय-प्रोडक्ट के रूप में मैंने अपने लिए कुछ लक्ष्य बनाकर रखा है जिसमें प्रमुख है कि मैं एक दिन अखिल भारतीय हिंदी चिट्ठाकार महासभा का अध्यक्ष बन जाऊं. हे कविवर, जिस दिन मैं अध्यक्ष बन गया उसी दिन मैं भारत सरकार से यह मांग करूंगा कि आपकी इन दो पंक्तियों के लिए सरकार आपको भारत रत्न से नवाजे. साहित्य अकादमी और ज्ञानपीठ पुरस्कार आपको पहले भी मिले होंगे लेकिन केवल इन पंक्तियों के लिए एक बार फिर से मरणोपरांत आपको साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजा जाए. और जिस दिन ऐसा हो गया, मैं समझ लूंगा कि मेरे ऊपर आपका एहसान उतर गया.

हे कवि शिरोमणि, कई बार मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि आप भविष्यद्रष्टा थे और आपको पता था कि एक दिन हिंदी ब्लागिंग और हिंदी ब्लॉगर इस देश में धूम मचाएंगे. समाज को दिशा देने का काम हिंदी ब्लागरी में होने वाली बहस ही करेगी. शायद इसीलिए आपने ये दो पंक्तियाँ लिखी ताकि हिंदी ब्लागिंग में होने वाली बहस चलती रहे. हे राष्ट्रकवि, मैं किन शब्दों में आपको धन्यवाद कहूँ?

और मैं क्या लिखूँ? वैसे तो लिखने के लिए और आभार प्रकट करने के लिए और भी बहुत कुछ है, लेकिन अब मेरे पास समय नहीं है और कुछ लिखने का. मुझे आज ही अपने ब्लॉग पर बहस चलाना है. विषय है; "आम मीठा होता है या इमली?" इसलिए मैं अपना पत्र यहीं समाप्त करता हूँ और आपको एक बार फिर से इन पंक्तियों को लिखने के लिए धन्यवाद प्रेषित करता हूँ.

आपका
ब्लॉगर हलकान 'विद्रोही'

Saturday, January 2, 2010

दुआ करें कि हलकान भाई के ब्लॉग पर जल्द ही कोई लाइबेरिया से पधारे.




कल हलकान भाई के घर जाना हुआ. सोचा नए साल के शुभ अवसर पर मिल आऊँ. आजकल वैसे भी नए साल, फ्रेंडशिप डे वगैरह जितने शुभ होते हैं उतना होली-दिवाली वगैरह नहीं होते. हलकान भाई के घर पहुंचे तो देखा कि अपनी ब्लागिंग टेबल पर बैठे थे. बायें हाथ में दो पन्नों वाला एक कागज़ और दायें हाथ में मॉउस. दुआ-सलाम के बाद बातचीत शुरू हुई. मैंने पूछा; "हलकान भाई कैसे हैं?"

वे बोले; "एक मिनट जरा वेट करो यार. मैं एक ज़रूरी काम कर रहा हूँ."

मैंने ध्यान से देखा तो वे अपने ब्लॉग पर लगे उस विजेट को माउस से खोद रहे थे जिसपर तमाम देशों के नाम लिखे रहते हैं और नाम के आगे कुछ संख्या लिखी रहती है. विजेट दर्शाता है कि कौन से देश से कितनी बार पाठक ब्लॉग पर आये. हलकान भाई विजेट पर चलती-फिरती जानकारी देखते और दूसरे ही पल अपने हाथ के कागज़ को. सात-आठ बार देखने के बाद बोले; "अजीब बात है. वहाँ से कोई भी नहीं आया?"

मैंने पूछा; "क्या हुआ हलकान भाई? कहीं से कोई आनेवाला था क्या? कौन आनेवाला था?"

मेरी बात सुनकर उन्होंने कहा; "अरे यार क्या बताऊँ? ये जो विजेट है, इसमें हर देश का नाम दिखाई दे रहा है जिससे पता चलता है कि हर देश में मेरे ब्लॉग के पाठक हैं. लेकिन एक देश का नाम नहीं दिखाई दे रहा."

मैंने पूछा; "कौन सा देश? कहीं आप चिली की बात तो नहीं कर रहे? कहीं ऐसा तो नहीं कि चिली से कोई आया ही नहीं?"

वे बोले; " अरे नहीं यार. चिली में तो मेरे कई पाठक हैं. तुम खुद ही देख लो. चिली के आगे इक्कीस लिखा हुआ है. हमेशा आते-जाते रहते हैं. मैं चिली की बात नहीं कर रहा हूँ."

मैंने पूछा; "फिर शायद अफगानिस्तान से कोई नहीं आया होगा. वहाँ आजकल लड़ाई चल रही है न."

वे बोले; "अरे नहीं यार वहाँ से भी लोग आते हैं. ईराक से भी लोग आते हैं मेरा ब्लॉग पढने. यहाँ तक कि पाकिस्तान से लोग आते हैं और उस इलाके से आते हैं जहाँ आजकल पाकिस्तानी सेना और तालिबान में लड़ाई चल रही है. असल में यह और ही देश है."

मैंने कहा; "कौन सा देश है, बताएँगे तो."

वे बोले; "तुमने नाम भी नहीं सुना होगा."

मैंने कहा; "ठीक है, हो सकता है नहीं सुना होगा. लेकिन आप बताइए तो."

वे बोले; "असल में मैं लाइबेरिया की बात कर रहा हूँ."

मैंने कहा; "लाइबेरिया का नाम तो मैंने सुना है. अभी हाल में ही सुना था न जब मधु कोड़ा जी के ऊपर कार्यवाई शुरू हुई. उन्होंने लाइबेरिया की खानों में इन्वेस्टमेंट किया है. मैंने सुना है न. हलकान भाई आपको मेरे सामान्य ज्ञान पर इतना भी भरोसा नहीं?"

वे बोले; "सुना तो मैंने भी तभी था. लेकिन समस्या वह नहीं है. समस्या यह है कि लाइबेरिया में क्या मेरे ब्लॉग के बारे में किसी को पता नहीं है?"

मैंने कहा; "क्या बात करते हैं हलकान भाई? हमलोगों को खुद लाइबेरिया के बारे में अभी जानकारी हुई है वो भी कर्टसी मधु कोड़ा और आप चाहते हैं कि हमें जानकारी हो गई इसलिए वहाँ से तुरंत पाठक आपके ब्लॉग पर पंहुच जाएँ?"

वे बोले; "कौन नहीं चाहता है? वैसे भी हिंदी ब्लागिंग को लेकर तुम उतने सीरियस नहीं हो, जितना मैं हूँ. ऐसे में तुम तो कहोगे ही न. लेकिन मेरी बात और है. मैं चाहता हूँ हिंदी ब्लागिंग केवल भारत, फिजी, वेस्टइंडीज या उन देशों तक सीमित न रहे जहाँ भारतीय रहते हैं. हिंदी ब्लागिंग हर उस देश में पहुंचे जहाँ मनुष्य रहता है."

मैंने कहा; "कोई बात नहीं है हलकान भाई. आ ही जायेंगे कभी न कभी. लाइबेरिया से भी पाठक आ ही जायेंगे. जब हमारे इन्वेस्टर वहाँ पहुँच गए हैं तो इन्वेस्टमेंट को मैनेज करने वाले भारतीय भी तो पहुंचेंगे ही. एक बार वे पहुँच गए तो फिर आपके ब्लॉग पर वहाँ से भी पाठक आ ही जायेंगे."

वे बोले; "भगवान करे ऐसा ही हो. तुम देख लेना एक दिन हिंदी ब्लागिंग को मैं एलडोराडो तक पहुँचा दूंगा. चाँद तक पहुँचा दूंगा. मंगल तक पहुँचा दूंगा......"

आप भी मेरे साथ दुआ करें कि हलकान भाई के ब्लॉग पर जल्द ही कोई लाइबेरिया से पधारे.

Tuesday, December 8, 2009

चंद फुटकर ब्लॉग-कवितायें




पेश है चंद फुटकर ब्लॉग-कवितायें. इन्हें लिखने की तथाकथित प्रेरणा हाल ही में मिली. हाल ही में मिली? नहीं-नहीं, ब्लॉग पर मिली. टिप्पणियां करने के लिए रखे जाने वाले नामों से. अब तो आप मानेंगे न कि जिसे कविता लिखना होता है उसे प्रेरणा के लिए भटकना नहीं पड़ता. ये अलग बात है कि चिरकुट प्रेरणा से चिरकुट कविता पैदा होती है...:-)

जसौदा कहा कहों मैं बात?
तुम्हरे सुत को करतब ब्लॉग पे
कहत कहे नहिं जात
करि कमेन्ट होई फिरे दिगंबर
बार-बार टिपियात
जो बरजों यो अच्छो नाही
मोको मारत लात
जसौदा कहा कहों मैं बात?

xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx

जदपि मातु बहु अवगुन मोरे, पर असत्य मैं कवहु न भोरे
ता पर मैं रघुवीर दोहाई, जानहु न कछु झूठ उपाई
एक बार सुनु बात हमारी, देहु दुई कान मोरि महतारी
कहत विदेह जेहि हम थकेऊ, धारन किये देह औ फिरेऊ
लिखि टिप्पणी बवाल मचावे, पुनि-पुनि ब्लॉग पे आवे-जावे

जसोदा के लाल संग लिए फिरे जहाँ-तहाँ
पर्दा डारि प्रोफाइल पर टीपे बस इहाँ-उहाँ

xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx

कसो अब कमर, बजाओ बजर
उठो हे वीर उड़ा दो गर्दा
कि मचे बवाल, करो कुछ लाल
कि डालो प्रोफाइल पर पर्दा
बना लो गोल, बजाओ ढोल
कापें सबलोग
कि कोई ऐसी जुगत लगाओ
कि माफी मांगे फिर सब कोय
कि तुमको देखे जो भी रोय
कि गाओ ऐसा कोई गान
कि छेड़ो गाली वाली तान
दिखाओ बन्दर वाला रूप
करो झट से सबको हलकान
तान लो धमकी वाला बान
कि लें सब तुमको अब पहचान
दाग दो कोरट वाला बम
ख़ुशी होंगे तब तुमसे हम

Tuesday, October 27, 2009

आखिर ब्लॉगर हैं..हर स्थिति में अपना झंडा गडेगा ही.




इलाहबाद में ब्लॉगर संगोष्ठी हो गई. जब संगोष्ठी का पता चला तो एक बार मन में आया कि; 'अगर मुझे निमंत्रण न मिला तो एक 'सॉलिड पोस्ट' लिखने का बड़ा सॉलिड बहाना हाथ लगेगा.' यह कहते हुए 'सॉलिड पोस्ट' लिख डालूँगा कि; 'जिन्हें निमंत्रण भेजा गया उनके चुनाव का क्राइटेरिया क्या था? क्यों उन्हें ही निमंत्रण भेजा गया और मुझे नहीं?'

एक पोस्ट लिखकर उन सारे चिट्ठाकारों को अपनी तरफ कर लूँगा जिन्हें निमंत्रण नहीं भेजा जाएगा. टिप्पणियां मिलेंगी सो मिलेंगी ही, आने वाले समय में एक गुट बना लूँगा जो मुझे हिंदी ब्लागिंग में अमर कर देगा. एक पोस्ट और न जाने कितने फायदे.

खैर, ऐसा हो न सका. आयोजकों ने मुझे भी निमंत्रण भेजकर मेरे इरादों पर पानी फेर दिया. फिर सोचा कि निमंत्रण मिल गया है तो यह कहकर ठुकरा दूँ कि; 'आप लोगों ने बड़े शार्ट नोटिस पर हमें निमंत्रण भेजा इसलिए मैं न आ सकूँगा.'

ऐसा भी नहीं कर सका. वो हुआ ऐसा कि जब ये विचार मन में आये तभी तबियत खराब हो गई. वैसे तबियत खराब होने के बावजूद भी इस विचार पर काम किया जा सकता था लेकिन मेरी गलती की वजह से ऐसा न हो सका. असल में मैं पहले ही दो-चार ब्लॉगर बंधु को अपने बीमारी के बारे में बता 'चूका' था. अगर यह बहाना बनाता तो वे लोग मेरी पोल खोल देते. बोलते; "फालतू का बहाना कर रहा है. तबियत खराब है और इस तरह का झूठा बहाना करके अपना भाव बढा रहा है."

ऐसा हो न सका. मतलब अपनी चालों से अपनी ईमेज न बना सका. इस मामले में तमाम ब्लॉगर बंधु बाजी मार ले गए. जिन्हें निमंत्रण न मिला था वे भी और जिन्हें निमंत्रण मिला वे भी.

वैसे इलाहबाद में अपने प्रचार का काम मैंने अनूप जी को आउटसोर्स कर दिया था. मैंने उन्हें एस एम एस भेजकर बता दिया कि अगर वे मेरी बीमारी की चर्चा कर देंगे तो मेरे 'सिम्पैथेक्स' (सहानुभूति का सूचकांक) में कुछ बढ़ोतरी हो जायेगी. स्वास्थ लाभ की कामना करते हुए ही कुछ टिप्पणियां मिल जायेंगी.

एक हिंदी ब्लॉगर को और क्या चाहिए? दस एक्स्ट्रा टिपण्णी और क्या. वो चाहे किसी भी वजह से मिलें.

खैर, संगोष्ठी के दूसरे दिन शाम को स्पानडिलाइटिस की वजह दर्द बहुत बढ़ गया. डॉक्टर को बुलाया गया. उन्होंने कहा; "कल तो लग रहा था कि काफी इम्प्रूवमेंट है. अचानक ऐसा क्या हो गया? क्या किया सारा दिन?"

मैंने कहा; "कुछ नहीं. आपने बेड पर लेटे रहने के लिए कहा था तो मैं लेटा था. हाँ लेटे-लेटे सेलफ़ोन पर इलाहबाद में हुई ब्लॉगर संगोष्ठी की रपट और फोटो देखता रहा."

उन्होंने पूछा; "आपको भी इनवाईट किया गया था क्या?"

मैंने कहा; "हाँ. मुझे भी इनवाईट किया गया था. लेकिन तबियत खराब होने की वजह से जा न सका."

बोले; "बात समझ में आ गई. वहां के आयोजन की रपट पढ़कर और बाकी ब्लॉगर की फोटो-सोटो देखकर ही दर्द बढ़ गया है. यह नए तरह का दर्द है. नाम देना हो तो दे सकते हो 'ब्लागर्स' जीलसी पेन'."

आगे बोले; "अगली बार निमंत्रण मिले तो ज़रूर जाना. चाहे जितना दर्द हो. वहां जाने से दर्द ठीक हो जाएगा. ये जो
स्पानडिलाइटिस हुआ है उसमें ब्लागिंग का ही हाथ है. हो सकता है जिसने दर्द दिया वही दवा भी दे दे. वैसे भी महान गीतकार लिख गए हैं कि; "तुम्ही ने दर्द दिया और तुम्ही दवा...."

तो अब तो डॉक्टर ने भी कह दिया है. अगली बार की तैयारी कर रहा हूँ. बस एक ही चिंता है. कहीं ऐसा न हो कि अगली बार निमंत्रण ही न मिले.

लेकिन फिर सोचते हैं कि अगली बार निमंत्रण न मिला तो फिर सॉलिड पोस्ट लिखने का विकल्प तो रहेगा ही. आखिर ब्लॉगर हैं तो हर स्थिति में अपना झंडा गडेगा ही.

Wednesday, September 30, 2009

ब्लॉगर हलकान 'विद्रोही' की डायरी से कुछ....




रिश्ते बन ही जाते हैं. बहाना कोई भी हो सकता है. हलकान भाई याद हैं आपको? अरे वही, हलकान 'विद्रोही', अपने स्टार ब्लॉगर. वही जिनकी वसीयत छाप दी थी मैंने. उसके बाद उनकी डायरी भी. ब्लागिंग की वजह से ढेर सारे लोगों से जान-पहचान हुई. हलकान भाई उनमें प्रमुख हैं.

विजयादशमी के दिन उनसे मिलने गया था. हमेशा की तरह ब्लागिंग के बारे में सोचते हुए बिजी थे. मुद्दा वही. हिंदी ब्लागिंग को कैसे बढ़ाया जाय? खैर, विजयादशमी की बधाई लेन-देन के लिए उन्होंने समय निकाला. बधाई दी. बधाई ली.

बधाई लेन-देन के बाद फिर उसी बात पर चिंतन. ब्लागिंग के बारे में क्या-क्या किया जा सकता है? ठीक वैसे ही जैसे कई साहित्यकार इस बात पर चिंतित रहते हैं कि आज से बासठ साल बाद हिंदी की दशा क्या होगी?

बात शुरू हुई तो बोले; "तुम भी टिक गए ब्लागिंग में. वो भी दो साल."

मैंने कहा; "हाँ. सोचा तो कभी मैंने भी नहीं था लेकिन सच तो यही है कि टिक गया. सब आपका आर्शीवाद है."

वे बोले; " आर्शीवाद काहे का? असल कारण कुछ और है. तुम्हें अपना तो कुछ मौलिक लिखना है नहीं. दूसरों की लिखी डायरी छाप देते हो. उसी से काम चला रहे हो. पता नहीं डायरी के पन्ने भी खुद टाइप करते हो या उसके लिए भी टाइपिस्ट रखा है."

मैंने कहा; "ऐसा मत कहिये हलकान भाई, मैं खुद ही टाइप करता हूँ. मेरे लिए ब्लागिंग उतनी महत्वपूर्ण नहीं है कि मैं तनख्वाह देकर केवल ब्लागिंग के लिए टाइपिस्ट रख लूँ."

वे बोले; "इसी बात का तो रोना है. हिंदी ब्लागिंग के ज्यादातर ब्लागर के लिए ब्लागिंग महत्वपूर्ण नहीं है. जिस तरह का समर्पण चाहिए वह दिखाई नहीं देता. तुम्हारे अन्दर भी वह भावना नहीं है कि हिंदी ब्लागिंग फूले-फले. समर्पण चाहिए ब्लागिंग के लिए. दूसरों की डायरी छाप कर कितने दिन चलाओगे?"

मैंने कहा; "हाँ, वह तो है. आप ठीक ही कह रहे हैं."

वे बोले; "मुझे ही देखो. हमेशा यह प्रयास रहता है कि हिंदी ब्लागिंग को कैसे समृद्ध किया जाय? कह सकते हो कि मैं ब्लागिंग ही खाता हूँ, ब्लागिंग ही पीता हूँ और ब्लागिंग ही सोता हूँ."

मैंने कहा; "सही कह रहे हैं. अपने ब्लॉग बारूद पर आपने जितना कुछ लिखा है, वह हिंदी ब्लागिंग के लिए संजीवनी है. जब तक आपका ब्लॉग है तब तक समझिये हिंदी ब्लागिंग का स्वर्णकाल चलता रहेगा."

वे बोले; "हा हा.....असल में बारूद तो कुछ नहीं. बारूद ब्लॉग तो हिंदी ब्लागिंग के लिए मेरे योगदान का दस प्रतिशत भी नहीं है. असल योगदान तो मेरे वे ब्लॉग हैं जो मैं अपने नाम से नहीं लिखता."

सुनकर मुझे बड़ा अजीब लगा. मतलब यह कि हलकान भाई किसी और नाम से लिखते हैं?

मैं प्रश्नचिन्ह लिए उनसे कुछ कहने ही वाला था कि उन्होंने मेरे सामने एक डायरी खिसका दी. बोले; "अपने हो. यह पढ़ लो, सब समझ में आ जाएगा."

डायरी पढना शुरू किया. जैसे-जैसे पढता गया, दंग होता गया. मेरी हालत देखकर वे बोले; " आज समय आ गया है कि मेरे योगदान को लोग जानें. पढ़ लो. नोट कर लो. छाप देना अपने ब्लॉग पर. इसी बहाने तुम्हारी एक पोस्ट हो जायेगी. वैसे भी तुम्हें क्या चाहिए? एक डायरी के कुछ पन्ने."

उनके कहने के अनुसार मैं उनकी डायरी की कुछ प्रविष्टियाँ छाप रहा हूँ. चिंता न करें, उन्होंने परमीशन दे दी है. आप पढें और हिंदी ब्लागिंग के लिए उनके योगदान को सराहें.

६ नवम्बर, २००८

अजीब बात है. कोई भी आईडिया मन में आता है. सोचता हूँ कि उस आईडिया को लेकर ब्लॉग बनाऊंगा और यहाँ पता चलता है कि उसी आईडिया को लेकर मुझसे पहले ही किसी ने ब्लॉग बना लिया. पहले सोचा कि ब्लॉगरगण की जीवनी के कुछ हिस्से उनसे लिखवाकर अपने ब्लॉग पर छापूंगा. लेकिन अजित जी को पता नहीं कैसे मेरे आईडिया के बारे में पहले ही पता चल गया. वे मेरा आईडिया ले उड़े. फिर सोचा कि हिंदी ब्लागरों के जन्मदिन पर बधाई देते हुए एक ब्लॉग बना लूँ लेकिन वह आईडिया पाबला जी ले उड़े. फिर सोचा कि सांपों के बारे में जानकारी के लिए एक ब्लॉग बना लूँ लेकिन लवली जी को मेरे आईडिया का पता चल गया और उन्होंने...............पता नहीं ऐसा मेरे साथ ही क्यों होता है?

२ मार्च २००९

आज एक ब्लॉग कंसल्टेंट अप्वाइंट किया. ध्येय एक ही है. हिंदी ब्लागिंग को समृद्ध करना है. उसे आगे ले जाना है. कंसल्टेंट अच्छा है. आईडियावान कंसल्टेंट. जब मैंने उसे यह बताया कि कैसे लोगों को मेरे आईडिया के बारे में पता चल जाता है और वे ब्लॉग बना लेते हैं तो उसने कहा कि यह टेलीपैथी की वजह से होता है. इसलिए मुझे टेलीपैथी पर एक ब्लॉग शुरू कर देना चाहिए. मैंने आज ही त्रिशंकु नाम से एक आई डी बनाई और टेलीपैथी पर एक ब्लॉग शुरू कर दिया......

७ अप्रैल, २००९

कंसल्टेंट के कहने पर आज मैंने एक नया ब्लॉग बनाया जो सरकारी रोडवेज के कंडक्टरों के लिए समर्पित है. मैं इस ब्लॉग पर केवल रोडवेज के कंडक्टरों और उनकी नौकरी और समस्याओं के बारे में लिखूँगा....

१६ अप्रैल, २००९

पिछले सोमवार मैंने एक नया ब्लॉग बनाया. नाम है, "मैं चन्दन तुम पानी". मैं इस ब्लॉग पर हिंदी ब्लागरों की खिचाई करूंगा. पहली पोस्ट में मैंने एक ब्लॉगर की पोस्ट का जिक्र करते हुए पांच लाइन की एक पोस्ट लिखी. उस ब्लॉगर ने 'छात्र' की जगह 'क्षात्र' लिखा था. पांच लाइन की पोस्ट पर मुझे ब्लॉगवाणी पर कुल सत्रह पसंद मिली. टिप्पणियां कुल बाईस. असली ब्लागिंग तो यही है कि पांच लाइन लिखो और बाईस टिप्पणियां मिलें. चिरकुट हैं वे जो बड़ी-बड़ी पोस्ट लिखते हैं और उन्हें कुल तीन पसंद मिलती है.

२३ अप्रैल, २००९

आज मेरे ब्लॉग "मैं चन्दन तुम पानी" पर एक ब्लॉगर ने फर्जी आई डी से मेरे खिलाफ कमेन्ट किया. तकनीकि में अपनी कुशलता के कारण मुझे पता चल गया कि यह ब्लॉगर कौन था लेकिन मैं उसका नाम कैसे लेता? मैं अगर उसका नाम ले लेता तो वह भी मुझे लताड़ के चला जाता कि मैं खुद फर्जी आई डी क्रीयेट करके ब्लॉग लिखता हूँ. ऐसे ही कुछ समय होते हैं जब फर्जी नाम बहुत खलता है.....

१६ मई, २००९

झूठे हैं सब. मिश्रा को फ़ोन करके कहा कि मेरी पोस्ट पर एक पसंद क्लिक कर दो. उसने कहा कि उसने कर दिया और पसंद तेरह से चौदह हो गई. बाद में पता चला किसी और ने वह पसंद दी थी. हद है. एक पसंद भी नहीं दे सकते....

२८ मई, २००९

आज एक ब्लॉग बनाया. 'हिंदी ब्लागरों के चरम दिन' के नाम से. मैंने सोचा है कि इस ब्लॉग पर मैं पोस्ट लिख करा बताऊंगा कि किस हिंदी ब्लॉगर को किस दिन सबसे ज्यादा टिप्पणी और पसंद मिली.

३ जून, २००९

बहुत मज़ा आ रहा है. मेरे हर ब्लॉग के कम से कम एवरेज ९० फालोवर हो गए हैं. सब जलने लगे हैं मेरे ब्लॉग की प्रगति से. मुश्किल एक ही है. किसी को नहीं मालूम कि ये ब्लॉग किसका है. ऐसे में नाम न होने की कसक तो रहेगी लेकिन कुछ किया नहीं जा सकता.

११ जून, २००९

आज मैंने अपनी एक सूक्ति, "ब्लागिंग ही जीवन है" को ढाई बाई तीन फुट के बोर्ड पर लिख कर अपने कम्यूटर के सामने वाली दीवार पर टांग दिया है. यह बोर्ड मुझे ब्लागिंग के लिए मोटिवेट करता रहेगा. लेकिन वही बात है न. एक पत्नी है जिसे मेरी प्रगति फूटी आँखों नहीं सुहाती. बोर्ड देखकर नाराज़ हो गई. कहती है कि घर के लिए सोफे का कवर खरीदने के लिए आना-कानी करता हूँ और बोर्ड पर कुल उन्नीस सौ पचास रूपये खर्च कर आया. अब इसपर कोई क्या कहे? उसे क्या पता कि "ब्लागिंग ही जीवन है" नामक सूक्ति हिंदी ब्लागिंग को आगे बढाने में किस तरह का रोल.....

१२ जुलाई, २००९

कंसल्टेंट के कहने पर आज मैंने एक नया ब्लॉग बनाया है जिसमें मैं उन ब्लॉग का जिक्र करते हुए पोस्ट लिखूँगा जिनके बारे में विदेशी अखबारों और पत्रिकाओं में छपेगा. वो दिन दूर नहीं जब मेरे इस ब्लॉग का जिक्र टाइम मैगजीन में होगा. यह पूरी तरह से एक नया आईडिया है. वैसे तो मैंने सोचा था कि भारतीय अखबारों में हिंदी ब्लॉग के जिक्र को लेकर मैं एक ब्लॉग बनाऊंगा लेकिन पता नहीं पाबला जी को कैसे मेरे आईडिया के बारे में........

२८ अगस्त, २००९

आज कंसल्टेंट ने एग्रीगेटर बनाने का आईडिया दिया. एग्रीगेटर का आईडिया मेरे दिमाग में.........

मैं अभी पढ़ ही रहा था कि उन्होंने मुझसे डायरी लेते हुए कहा; "जितना पढ़ लिए हो, उतना काफी है एक पोस्ट लिखने के लिए. लेकिन पोस्ट लिखना ज़रूर. अब समय आ गया है कि लोग मेरे योगदान के बारे में जानें और हिंदी ब्लागिंग पर किये गए मेरे एहसान को तौलने के लिए तराजू खरीदना शुरू करें.

मैं उनसे मिलकर चला आया. यह सोचते हुए कि आगे की डायरी पढ़ते तो क्या-क्या और पता चलता? कहीं यह तो नहीं लिखा रहता कि;

आज मैं बहुत खुश हूँ. आज से ठीक दस साल पहले मैंने ब्लॉगर बनाया था. कोई नहीं जानता कि एवन विलियम्स के नाम से मैंने ही ब्लॉगर का निर्माण किया था.........

Tuesday, July 14, 2009

घुन्नन-मिलन




घुन्नन जब दफ्तर में आया उस समय मैं अपने सीनियर के दफ्तर में हो रही एक मीटिंग में था. जैसे ही खबर मिली, मैंने तुंरत मीटिंग कैंसल की और अपने दफ्तर पहुंचा. मेरे सीनियर ने मीटिंग कैंसल करते वक्त मुझसे कहा; "मिश्रा जी, मीटिंग कैंसल नहीं करनी चाहिए आपको. बहुत ज़रूरी है."

मैंने उन्हें दो टूक जवाब देते हुए कहा; "सर, अगर बाल-सखा से मीटिंग और आफिसियल मीटिंग के बीच चुनना पड़े तो मैं बाल-सखा से मीटिंग को चुनूँगा."

मेरी बात सुनकर सीनियर डर गए.

कोई नई बात नहीं है. वे ऐसे ही डरते रहते हैं. उन्हें इस बात की चिंता सताती रहती है कि मैं कहीं रिजाइन न कर दूँ. जानकारी के लिए बता दूँ कि मैं बचपन से ही बम्बईया फिल्मों के उस इंस्पेक्टर से प्रभावित रहा हूँ जो इस्तीफा लिखकर जेब में रखता है और बात-बात पर अपने सीनियर को चमकाता रहता है.

दफ्तर आया तो घुन्नन को देखकर लगा जैसे सदियों से बरसात का मुंह न देखे रेगिस्तान में सावन के बादल उमड़ आये. उन्हें अंकवारि भरे पंद्रह मिनट तक भेंटता रहा. इच्छा तो हुई कि एक घंटा तक भेंटे और न जाने कितने वर्षों से घुन्नन को न मिल पाने का मलाल निकाल दें. लेकिन ऐसा हो न सका.

पछतावा हुआ कि घुन्नन से गाँव में क्यों नहीं मिला? गाँव में मिला होता तो कम से कम एक घंटा अंकवारि में भरे रहता घुन्नन को.

खैर, उसके बाद मैंने दफ्तर से पूरे दिन के लिए छुट्टी ले ली. रास्ते से दस किस्म की मिठाइयाँ, तीन पैकेट नमकीन, एक किलो जलेबी पैक करवाई.

जलेबी की कहानी बड़ी मजेदार है. जब मैं और घुन्नन गाँव के प्राईमरी स्कूल में पढ़ते थे, उनदिनों गाँव में जलेबी की गिनती सबसे प्रिय और हमेशा उपलब्ध रहने वाली मिठाई के तौर पर होती थी.

आज भी याद है. स्कूल के पिछवाड़े मोहनलाल हलवाई की दूकान थी. ज्यादा बड़ी नहीं थी. गाँव में हलवाई की दूकान कितनी बड़ी रहेगी? छोटी सी दूकान में कांच के कुछ मर्तबान. किसी में लाई रहती थी तो किसी में चूडा. गट्टा, रेवड़ी और गुड़ से बने सेव के लिए मर्तबान अलग से होते थे. एक मर्तबान में नमकीन रखी रहती थी. मिठाई के नाम पर मोहनलाल जलेबियाँ बनाता था. दो तरह की जलेबी. गुड़ से बननेवाली जलेबी और चीनी से बननेवाली जलेबी. गुड़ से बननेवाली जलेबी को हम चोटिया जलेबी कहते थे. थोड़ी काली होती थी न. अब तो ऐसी जलेबी के दर्शन दूभर हो गए हैं. शहर से नाता क्या जुड़ा, गाँव का सबकुछ पीछे छूट गया. रास्ते तो छूटे ही, चोटिया जलेबी भी छूट गई.

अब तो यादकर के केवल आँखों को नम किया जा सकता है.

मैं और घुन्नन जब क्लास बंक करते तो मोहनलाल की दूकान में बैठकर चोटिया जलेबी खाते. मोहनलाल भी हम दोनों से बहुत प्रसन्न रहता था. उनदिनों जलेबी वजन करके बिकती थी. जब हम ढाई सौ ग्राम जलेबी की फरमाईस करते तो तौलने के बाद मोहनलाल दो जलेबियाँ और रख देता.

सरल-मना मोहनलाल. अब कहाँ मिलेंगे ऐसे लोग?

आज जब इतने वर्षों बाद घुन्नन से मिला तो अनायास ही जलेबी की याद आ गई. इच्छा तो हुई कि अगर उपलब्ध होती तो आज चाहे जितनी भी दूर जाना पड़ता, जाते और चोटिया जलेबी खोजकर जरूर लाते. जैसे ही यह बात मन में आई, मैंने दफ्तर के प्यून को फ़ोन किया. जब मैंने उससे पूछा कि चोटिया जलेबी कहाँ मिल सकती है तो उसे समझ में ही नहीं आया कि मैं कैसी जलेबी की बात कर रहा हूँ. जब मैंने उसे पूरी बात बताई तो उसने कहा कि थोड़ी देर में वो बताएगा.

प्यून से बात करके मैंने फ़ोन डिस्कनेक्ट कर दिया.

उसके बाद घुन्नन से उसके घर-परिवार के बारे में पूछा. उसी समय पता चला कि उसका बेटा अब अट्ठारह वर्ष का हो गया है. समय बीतते देर नहीं लगती. सुनकर विश्वास ही नहीं हुआ कि जिस बच्चे को तब देखा था जब वह डेढ़ वर्षों का था, अब अट्ठारह वर्षों का हो गया है.

मुझे याद है. जब घुन्नन का बेटा एक साल का था, मैं घुन्नन के घर उससे मिलने गया था. उसके बेटे को गोद में लिए बैठा था कि बच्चे ने सू-सू कर दिया. पहले के बच्चे सू-सू करते थे तो जिसकी गोद में करते थे उसके कपडे भीग जाते थे. अब तो बच्चे इतने स्मार्ट हो गए हैं कि सू-सू करते हैं तो पता ही नहीं चलता. कभी-कभी सोचता हूँ तो लगता है कि आज भी बच्चे तो बच्चे ही हैं. असल में स्मार्ट माता-पिता हो गए हैं जो बच्चों को हगीज और न जाने क्या-क्या पहना देते हैं.

ज़माने ने बच्चों को भी बच्चा नहीं रहने दिया. हाय रे सभ्यता.

बात ही बात में घुन्नन ने बताया कि लड़के का एम बी ए के एंट्रेंस एक्जाम में सेलेक्शन हो गया था लेकिन आर्थिक तंगी के कारण उसका एडमिशन अभी तक नहीं हो पाया. मैंने तुंरत घुन्नन से कहा कि वो पैसे की चिंता न करे. मैं उसकी पढ़ाई के लिए पैसे का इंतजाम कर दूंगा. घुन्नन को बहुत संकोच हुआ लेकिन मैंने अपनी बात मनवा ली.

अभी घुन्नन से और बात हो ही रही थी कि दफ्तर से प्यून का फ़ोन आया. उसने बताया कि कैसे उसने बड़ी मेहनत की लेकिन किसी दूकान का पता नहीं मिला जहाँ चोटिया जलेबी मिलती हो. मैं उसकी बात सुनकर दुखी होने ही वाला था कि उसने बताया कि उसके पड़ोस में हलवाई की दूकान है और वह हलवाई अलग से चोटिया जलेबी बनाने पर राजी हो गया है.

प्यून की बात सुनकर मुझे लगा जैसे किसी ने मरते हुए को संजीवनी बूटी खिला दी हो. अपनी हालत के बारे में सोचकर मैं कल्पना करने लगा कि श्री राम को कैसा लगा होगा जब उन्होंने हनुमान जी को संजीवनी बूटी वाले पर्वत के साथ देखा होगा.

खैर, मैंने गाड़ी तुंरत दफ्तर की और मोड़ ली. दफ्तर के नीचे ही प्यून खडा मिल गया. मैंने उसे पाने साथ लिया और उस हलवाई की दूकान की तरफ चल दिया. वहां पहुँच कर हलवाई से आधा किलो जलेबी ली. प्यून ने मजाक में कहा भी इस उम्र में इतनी जलेबी खाना ठीक नहीं लेकिन मैं नहीं माना. फिर मन में आया कि जब इतनी मेहनत करके चोटिया जलेबी खरीद ही ली है तो क्यों न फिर शहर से बाहर कोई प्राईमरी स्कूल भी खोज लिया जाय. ड्राईवर को ऐसे एक प्राईमरी स्कूल की जानकारी थी. वह हमदोनों को वहां ले गया. संयोग देखिये कि इस स्कूल के पिछवाड़े भी एक हलवाई की दूकान थी. मैंने पहले से ख़रीदी चीनी वाली जलेबी ड्राईवर के हवाले कर दी.

मैंने और घुन्नन ने उस दूकान पर बैठकर चोटिया जलेबी खाई. न जाने कितने वर्षों बाद ऐसा लगा कि बिना किसी मशीन का इस्तेमाल किये ही बचपन में पहुँच गए.

शाम को घुन्नन ट्रेन पकड़कर गाँव चला गया. अब मैं उसके वापस आने की बाट जोह रहा हूँ.

.................................................................

बाल-सखा के मिलन पर ब्लाग पोस्ट यहाँ पढ़ सकते हैं. यह तो साहित्यिक पोस्ट है.

Saturday, June 27, 2009

जिज्ञासु अभिषेक और क्लाइमेक्स वाले युधिष्ठिर




पिछली पोस्ट पर अपनी टिप्पणी में अभिषेक ने पूछा; "ई क्लाइमेक्स में युधिष्ठिर जी क्या कर रहे हैं?"

अभिषेक जिज्ञासु ब्लॉगर हैं. बाकी के लोग नहीं हैं. इसलिए मैंने सोचा कि अभिषेक की जिज्ञासा का समाधान करना चाहिए. मेरे मन में आया कि; 'कहीं ऐसा न हो कि अभिषेक की जिज्ञासा का समाधान न करने पर एक टिप्पणीकार नाराज़ हो जाए और भविष्य में लिखी जाने वाली पोस्ट पर टिप्पणी ही न करे. ऐसे में हमें तो एक टिप्पणी का नुकशान हो जाएगा न. (इस बात पर स्माईली नहीं लगाऊँगा. यह बहुत गंभीर बात है.)

तो यह रहा अभिषेक की जिज्ञासा का उत्तर.

..................................................

युधिष्ठिर के हवाले से हम जानते हैं कि मन सबसे तेज भागता है. क्या कहा? युधिष्ठिर के हवाले से कैसे जानते हैं? अरे, मेरे कहने का मतलब उन यक्ष जी के सवालों को याद कीजिये जो उन्होंने युधिष्ठिर जी के भाइयों से पूछा था. तालाब के किनारे. जहाँ युधिष्ठिर के भाई प्यास बुझाने गए और सवालों का जवाब न जानने के कारण उन्हें मरना पड़ा.

अजीब बात है. जो ज्ञानी नहीं हैं, उनको इस दुनियाँ में जीने का अधिकार नहीं है क्या? लेकिन सवाल तो अपनी जगह हैं. आखिर ऐसा क्यों कि उनके भाइयों को यक्ष द्बारा पूछे गए सवालों के जवाब नहीं मालूम थे? क्या युधिष्ठिर चाहते थे कि उनके पास जितना ज्ञान था, सबकुछ भाइयों को नहीं देना है?

और भी सवाल हैं. आखिर सबकुछ घटने के बाद युधिष्ठिर जी सीन में क्यों आये? वही सबसे पहले पानी लाने क्यों नहीं गए? अगर सबसे पहले वही पानी लाते जाते और ये बखेड़ा ही नहीं होता.

आप अगर यह सोच रहे हैं कि मैं ऐसा क्यों कह रहा हूँ तो मेरा जवाब है कि मेरे पास भी तो मन है. मन तेज भागा तो यह साब बातें मन में आईं.

आश्चर्य की बात है न? बाकी भाईयों के मन में यह बात नहीं आई लेकिन युधिष्ठिर के मन में ही क्यों आई?

शायद इसलिए की अज्ञातवास के दौरान बाकी के भाई तो काम-वाम करते थे. जंगल से लकड़ी इकठ्ठा करके लाते थे. खाना बनाते थे. झाडू वगैरह देते थे और युधिष्ठिर आराम से बैठे रहते थे. भीम से पाँव दबवाते थे सो अलग. जो आदमी कोई काम न करे उसके भीतर अध्यात्म कूट-कूट के भर जाता है. तब वह सरल टाइप कुछ सोचता ही नहीं. जब भी सोचता है, गूढ़ ही सोचता है. उसके लिए भोजन और भाषण के अलावा आध्यात्म का सहारा रहता है.

लेकिन मन के तेज भागने वाली बात युधिष्ठिर को किसी ने बताई थी या फिर उन्होंने खुद से जान लिया था? अगर किसी ने बताई होगी तब तो ठीक. लेकिन अगर उन्होंने खुद ही पता लगाई होगी तो कैसे?

शायद ऐसा कुछ हुआ हो.

एक दिन आराम करते-करते युधिष्ठिर थक गए होंगे. थक गए तो उठकर बैठ गए होंगे. बैठे-बैठे बोर हो गए होंगे. बोर होते-होते सोचा होगा कि; "बोर क्यों होना? जब बैठे ही हैं तो कुछ सोच डालते हैं."

बस उन्होंने सोचना शुरू कर दिया होगा; ' अज्ञातवास ख़त्म होने दो, वापस हस्तिनापुर जायेंगे. कृष्ण को बुला लेंगे. उनके साथ बैठकर प्लान बनायेंगे. पहले सीधे-सीधे युद्ध नहीं करेंगे. पहले पाँच गाँव मांगेंगे. दुर्योधन है तो काइयां, इसलिए आराम से तो देगा नहीं. गाली-वाली बकेगा ऊपर से. उसकी वोकावुलरी कित्ती तो खराब है. उसके 'लुक्खेपन' की वजह से हम जनता की सारी सहानुभूति इकट्ठी कर लेंगे. जनता को बताएँगे कि देखो, ये दुर्योधन हमें गद्दी तो छोडो, पाँच गाँव भी नहीं दे रहा. युद्ध की पचास प्रतिशत भूमिका केवल इसी बात पर तैयार कर लेंगे. युद्ध शुरू हो जायेगा तो कौरवों के महारथियों को एक एक करके रास्ते से हटाते जायेंगे. गुरु द्रोण से भी थोडा झूठ बोलना पड़े तो चलेगा. आख़िर युद्ध में सब कुछ जायज है.'

यह सोचते-सोचते अचानक युधिष्ठिर ने यूरेका-यूरेका चिल्लाना शुरू कर दिया होगा. द्रौपदी ने चेहरे पर आश्चर्य के भाव रखकर पूछा होगा; "आप यूरेका-यूरेका नामक गीत क्यों गा रहे हैं, हे आर्यपुत्र?"

युधिष्ठिर ने बताया होगा कि; "प्रिये अभी-अभी मुझे पता चला कि मन सबसे तेज भागता है."

यह सुनकर द्रौपदी जी ने कहा होगा; " ओह. पता चल गया. बहुत बढ़िया बात. अब इसे याद रखियेगा. जब यक्ष प्रश्न करेंगे तो फट से जवाब दे दीजियेगा."

............................................

तो भइया अभिषेक, युधिष्ठिर जी के बहकावे में आकर हम दुपट्टा चोरी काण्ड पर अपने मन को यहाँ-वहां, जहाँ-तहाँ दौड़ा दिए थे.वैसे यक्ष जी ने और भी प्रश्न पूछे थे. उन प्रश्नों के ऊपर भी कभी मन दौड़ाया जाएगा....:-)

Tuesday, April 14, 2009

नवपदार्पण करने वाली कलियाँ और टिप्पणी रुपी भ्रमर




रोज चिट्ठाजगत से मेल मिलता है. किसी दिन २५ तो किसी दिन १९ नए चिट्ठे रजिस्टर होते हैं. लिखा रहता है;

"इन्द्रजाल में नवपदार्पण करने वाली इन कलियों का टिप्पणी रूपी भ्रमरों द्वारा स्वागत करें!"

पूरी लाइन पढ़कर लगता है जैसे अति कोमल ह्रदय के ओनर किसी कवि ने रात में खूब तेल खर्च करके इस लाइन को गढा है. कुल मिलाकर घणी गाढ़ी लाइन है.

नवपदार्पण करने वाली कलियाँ! टिप्पणी रुपी भ्रमर. आहा!

लेकिन एक बात है. कवि ने किसी अलग तरह के अलंकार का सदुपयोग कर डाला है. अब देखिये न. टिप्पणी हुई स्त्रीलिंग. भ्रमर जी हुए पुल्लिंग. ऐसे में टिप्पणी रुपी भ्रमर!

ठीक वैसे ही, चिट्ठा हुआ पुल्लिंग. कलियाँ हुई स्त्रीलिंग.

शायद ये ब्लॉग अलंकार है.

काव्य प्रेमी लोगों से भरा है अपना ब्लॉग-जगत. मामला काव्यात्मक न रहता तो थोडा अटपटा लगता.

काव्य रचने को प्रोत्साहित करने वाले नॉर्मल बगीचे में नवपदार्पण करने वाली कलियाँ भ्रमरों को देखकर ज्यादातर विदक जाती हैं. ये कहते हुए तन जाती हैं कि; "मुवों, तुम्हें और कोई काम नहीं है? हम कलियों ने पदार्पण किया नहीं कि चले आये मंडराने? तुम्हारे मन में हमेशा खोट रहता है."

लेकिन चिट्ठा-बाग़ में ऐसा नहीं हो सकता. इस केस में ऐसा होने का चांस नहीं हैं. यहाँ तो नवपदार्पण करने वाली कलियाँ भ्रमरों का इंतज़ार करती रहती हैं. जैसे कह रही हों;

आजा रे..मैं तो कब से खड़ी...ये अँखियाँ थक गई पंथ निहार...आजा रे.

भ्रमर आ जायें तो ठीक. न आयें तो बड़ी मुश्किल. काहे नहीं आये आज? शायद भटक गए होंगे.

नवपदार्पण करने वाली जिस कली का टिप्पणी रुपी भ्रमरों ने स्वागत नहीं किया वे अपने पास वाली कली से पूछती होगी; " सखी, आज तुम्हारा स्वागत किसी भ्रमर ने किया कि नहीं?... क्या कहा?... तीन भ्रमरों ने तुम्हारा स्वागत किया! हमारा तो स्वागत किसी ने किया ही नहीं."

टिप्पणी रुपी भ्रमरों के स्वागत करने से खुश हुई कली बोलेगी; " सखी, हम ठहरे काव्य-कली. इन भ्रमरों को हमें स्वागत करने में आराम रहता है न. स्वागत गान बनता है काव्य से कॉपी की हुई चार लाइन और बधाई नामक शब्द को जोड़कर. इसीलिए तीन भ्रमर हमारे सामने स्वागत गान गाकर गए हैं."

भ्रमर भी कैसे-कैसे. आड़े-तिरछे मंडराते हुए. भिनभिनाते हुए. तीस्ता नदी से चंचल.

इनके ये गुण भ्रमरों से जाने क्या-क्या करवाते हैं. देखेंगे भ्रमर चले नवपदार्पण करने वाली कलियों की बाग़ की तरफ. पहुँच गए कहीं और. पुराने बगीचे में. वहां पहले से ही डेरा जमाये धूल समेटे फूलों को निहार हर्ष की गंगा में गोते लगा रहे हैं.

ऐसा भी हो सकता है कि तीन-चार भ्रमरों का एक झुंड नवपदार्पण कलियों के चिट्ठा-बाग़ की तरफ उड़ा. देखा सामने से एक भ्रमर वापसी का टिकट टेंट में दबाये चला आ रहा है. इस झुंड को देखकर पूछेगा; " कहाँ जा रहे हो?"

ये बोलेंगे; "नवपदार्पण करने वाली कलियों का स्वागत करने."

वापसी करने वाला भ्रमर बोलेगा; " उस तरफ मत जाओ. आज इन नवपदार्पण कलियों में काव्य-कली है ही नहीं."

बस. इतना काफी है भ्रमरों के इस झुंड के लिए. झुंड में से एक भ्रमर बोलेगे;" जब नवपदार्पण कलियों में काव्य-कली है ही नहीं तो कौन वहां जाकर इधर-उधर उड़े? खाली-पीली दो-चार मिनट मंडराएंगे और फिर वहां से बिना स्वागत किये ही एक-दो-तीन."

पुरायट टाइप भ्रमरों को ट्राइड एंड टेस्टेड टाइप फूल ज्यादा भाते होंगे. ऐसे फूलों को देखकर भ्रमर बोर भी होंगे लेकिन आदत पुरानी हो गई है. कुछ नया देखना ही नहीं चाहते. कहते हैं; "हमें तो पता है. जिस फूल पर बैठेंगे उसका रंग क्या है? उसका गंध कैसा है? हम तो उसी पर बैठेंगे."

काहे उन्ही पर बैठोगे? नया देखने की इच्छा नहीं होती? गेंदा के फूल का कितना दिन स्वागत करते रहोगे? इतनी सारी कलियाँ चिट्ठा-बाग़ में अवतरित हो रही हैं. उनपर मंडराओ. उन्हें फूल बनाओ. तरह-तरह के रंग लिए, तरह-तरह का गंध लिए इन नवपदार्पण करने वाली कलियों का स्वागत करो.

Tuesday, April 7, 2009

धन्य है कविता....धन्य है साहित्य




वैराग्य धारण नहीं किये. धारण हो गया. काहे हुआ, नहीं पता. पता तो अर्जुन जी को भी नहीं था. उनके मन में भी भरम पैदा हो गया था कि; 'जिनको भी मारूंगा, सब अपने ही हैं.' बस एही भरम के वास्ते धर दिए रहे धनुख-बान. बोले लड़बे नहीं करेंगे.

ऊ तो बाद में किशन भगवान सिचुयेशन संभाल लिए. नहीं संभालते तो कंडीशन बड़ा खराब हो जाता. महाभारते नहीं होता. सोचिये केतना लॉस हो जाता. पता नहीं केतना लोग मरने से बच जाता सब. और लोग बच जाते तो इतिहासे का निर्माण नहीं हो पाता. आखिर हमरी संस्कृति में इतिहास का निर्माण मरे हुए लोग करते हैं.

निर्माण नहीं होता ऊपर से इतिहास गरीब भी देखाई देता.

अर्जुन जी के पास किशन भगवान थे, सो ऊ ज्ञान-वान देकर सिचुयेशन संभाल लिए. बोले; "तुम यह न सोचो कि सामने वालों को तुम मार रहे हो. ऊ सब तो पहले ही मरे हुए हैं. ई देखो हमरे मुंह में समाये हुए हैं सब के सब."

अर्जुन बाबू सीन देखकर दंग. बोले; "केशव, अच्छा हुआ जो आप हमको पाप करने से बचा लिए. हम इन लोगों को नहीं मारते तो पापे न होता?

इतना कहते हुए फिर धनुख-बान उठा लिए. सबको सलटा डाले. ओही ज्ञान बाद में गीता का ज्ञान बन गया.

इतिहास को तोड़-मरोड़ कर के पेश करने का तो रिवाजे है हमारे यहाँ. किशन भगवान का ज्ञान था, पता नहीं किसने उसे गीता का ज्ञान करार दे दिया. गीता जी का उल्लेख महाभारत में कहिंयो नहीं है. लगता है बाद में पैदा होने वाली कोई लेखिका होंगी.

अर्जुन बाबू को तो किशन भगवान मिल गए तो वे पाप करने से बच गए.लेकिन हमें कहाँ से मिलें कोई किशन भगवान जी?

हम एही सोच रहे थे. कोई तो उभरे किशन भगवान बनकर. कोई तो इस स्थिति के बारे में बताये. ऐसा काहे हुआ कि कुछ लिखने का मन नहीं कर रहा है? कहीं टिप्पणी करने का मन नहीं कर रहा है.

लेकिन कोई नहीं उभरा. बाद में याद आया कि ई तो कलयुग चल रहा है. इसमें किशन भगवान कहाँ मिलेंगे? ऊ तो द्वापर में ही पृथ्वीलोक पर अपना कोटा समाप्त कर लिए रहे.

लेकिन दू दिन पहले लगा कि; 'का द्वापर और का कलयुग, बिना भगवान के नहीं चलेगा.'

आप क्वेश्चन रेज करें, ऊका पाहिले ही हम बताय देते हैं.

दू दिन पहिले अनूप जी फ़ोन पर उभरे. हमें बूड़ने से बचाने के लिए. बोले; "क्या हाल बना रखा है? कुछ लिखते क्यों नहीं?"

हम बोले; "भैया बड़ा आफत आ गया है. कुछ भी लिखने का मन नहीं कर रहा. पता नहीं ऐसा काहे हुआ?"

हमरी बात सुनकर बोले; "ऐसा है, कि ब्लॉग-धर्म के पालन के दौरान ऐसी स्थिति आती है जब सबकुछ ख़तम लगता है. कुछ लिखने का मन नहीं करता. कुछ पढने का मन नहीं करता. कहीं टिप्पणी करने का मन नहीं करता. इस सन्दर्भ में आदिकालीन ब्लॉगर, श्री जीतेन्द्र चौधरी उर्फ़ जीतू जी का लेख पढ़ा जा सकता है. इस मनःस्तिथि को ब्लॉग-वैराग्य कहते हैं."

हम बोले; "लेकिन भैया, अभी त हमको दू साल भी नहीं हुआ, ब्लॉग लिखते हुए."

वे बोले; "तुम थेंथर हो तो दो साल टिक गए. टैलेंटेड ब्लॉगर तो दो महीने में ही ब्लॉग-वैराग्य को अचीव कर लेते हैं.कितने तो एक बार अचीव कर लेते हैं तो उसमें से निकल ही नहीं पाते. तुम्हारा तो निकल आने का चांस अभी भी है."

अनुभव बोल रहा था. हम सुन रहे थे.

ब्लॉग-वैराग्य शब्द सुनकर लगा केतना धाँसू च फांसू शब्द है. पूरा तरह से फांसने का काबिलियत रखता है शब्दवा. फिर हम सोचे कि; 'इसका मतलब हम वैरागी हो गए? ई सिचुयेशन तो हमरे ब्लॉग-कुंडली में थी ही नहीं.'


जैसे ही यह बात मन में आई, दिनकर जी का लिखा हुआ याद आ गया. ऊ लिखे हैं;

ज्वलित देख पान्चाग्नि जगत से निकल भागता योगी
धुनी बनाकर उसे तापता अनाशक्त रसभोगी

दिनकर जी का लिखा हुआ तो याद आया ही, साथ-साथ एक कुछ और याद आ गया. आप सोच रहे होंगे कि और का याद आ सकता है? तो हम बता दें कि याद आनेवाली बात थी आदिकालीन ब्लॉग-साहित्य में दर्ज ई कविता. कविता में लिखा है;

जब रोवे ब्लॉगर अज्ञानी
आँखों से बरसावे पानी
तब-तब बड़का ब्लॉगर आवे
ज्ञान-वान दे औ समझावे

जिस स्थिति में तुम हो भाई
तुम्हें देख आँखें भर आई
हमें पता है तुम्हरी पीड़ा
हमरे भी त फटी बेवाई

कहते इसे ब्लॉग वैराग्य
समझो है तुम्हरा सौभाग्य
जो हम तुमको हैं समझाते
कौन बताता हम न आते?

इस स्थिति से निकलो जल्दी
लगे फिटकरी चाहे हल्दी
चिरकुट सा ही कुछ लिख डालो
ब्लॉग-पेज को तुम भर डालो

एक बार वैराग्य जो छूटे
माया आकर तुमको लूटे
माया भी तो तरह-तरह की
कहीं पहेली कहीं जिरह की

अद्भुत माया टिप्पणियों की
ब्लॉग पोस्ट की औ कड़ियों की
कैसे इससे बच पाओगे ?
ब्लॉग-वाग को रच पाओगे?

बस, इतना साहित्य काफी था, ब्लॉग-वैराग्य दूर करने के लिए. जैसे ही कविता याद आई,

वैराग्य ढेर हो गया
पूरा अंधेर हो गया
मन चंगा हो गया
ह्रदय में दंगा हो गया
चिरकुटई करने लौटे आये
जेब में ढेर सारे मुखौटे लाये
फिर से ब्लॉग रंग डालेंगे
ठंडाई में भंग डालेंगे

धन्य है कविता और साहित्य. समीर भाई, कविताओं पर साधुवाद और बधाई ऐसी ही नहीं लुटाते. आज पता चला कि कविता कुछ भी करवा सकती है.

ब्लॉगर को वैराग्य-विमुख भी कर सकती है.

Friday, March 20, 2009

मौजत्व पर धोये...




विषय मिले या ना मिले, खुलकर मौज मनाय
मौज चौगुना हो रहा, विषय अगर मिल जाय

सतत मौज की बात तो, जैसे बरखा मास
आँखें निरखत मौज को देखि देखि आकाश

पूरी फुरसत जो मिले, मौज-पृष्ठ भरि जाय
फुरसत गर आधी मिले, खुला रहे अध्याय

आफिस टाइम कर रहा मौज बीच आघात
आधे में ही मौज को चले छोड़कर भ्रात

मौज-मौज तो सब करें, मौज लेय न कोय
मौज बड़ा ही कठिन है सबसे मौज न होय

मौज मिले तो समझ लें दिन सुन्दर बन जाय
मिले नहीं गर मौज तो भृकुटी फिर तन जाय

गर तनाव हो जाय तो, हो दिमाग जो बंद
मौज-नीति फालो करो, पाओ परमानन्द

उत्तम कछु नहि मौज से, सबका ये आधार
नहीं अगर यह पास तो, ले लो मौज उधार

पाठ पढ़े जो मौज का, ब्रह्मज्ञान वो पाय
जीवन में सबकुछ मिले, पेट-वेट भर जाय

सब तत्वों से बड़ा है दुनियाँ में मौजत्व
इसके आगे फेल हैं जीवन के हर तत्त्व

कानपुरी मौजत्व की बात निराली होय
इसके चक्कर जो पड़े खड़ा-खड़ा वो रोय

Friday, March 6, 2009

चिट्ठाकारों का गुझिया सम्मेलन- भाग २




....आगे का हाल

नीरज जी गजल सुना रहे थे. लगभग सारे चिट्ठाकार वाह वाह कर रहे थे. लेकिन जैसे ही उन्होंने शेर सुनाया कि;

हमारी तो समझ लेना उसी दिन यार तुम होली
बिपाशा हाथ से अपने खिलाये जब पकी गुझिया

फुरसतिया जी तड से बोल पड़े; "फिर तो समझ लीजिये कि आपकी होली हो चुकी. बिपाशा गुझिया पका दे, यह तो उसके इस जनम में होने से रहा."

फुरसतिया जी की बात सुनकर सब हंस पड़े.

शास्त्री जी बोले; "आप शायद ठीक कह रहे हैं. आधुनिकता का यह हाल है कि बहू-बेटियाँ हमारी संस्कृति की पहचान गुझिया तक को भूलती जा रही हैं. फिर भी मैं कहूँगा कि भारतीय संस्कृति की रक्षा के लिए बिपाशा को कोशिश तो करनी ही चाहिए."

अपना वक्तव्य ख़त्म करके शास्त्री जी ने कहा; "सस्नेह शास्त्री."

शास्त्री जी की बात सुनकर फुरसतिया जी ने कहा; " कोई फायदा नहीं है. फ़र्ज़ कीजिये कि बिपाशा गुझिया बना भी दे. क्या होगा उससे? वो तो जैतून के तेल में गुझिया पका डालेगी. डायट गुझिया. इतनी हैल्थ कांशस बच्ची है, ऐसे में वो तो चाहेगी कि मुनक्का, छुहाड़ा, किशमिश वगैरह भी 'लो कैलोरी' वाला रहे. ऐसी गुझिया खाकर होली मनाने से तो अच्छा है कि नीरज जी मेरी गुझिया खाकर होली मना लें."

फुरसतिया जी की इस बात पर सारे हो हो करके हंसने लगे.

नीरज जी को पता चल चुका था कि काव्यपाठ में तर्क ने व्यवधान डाल दिया. दुनियाँ भर में तर्क की वजह से न जाने कितनी कवितायें बनते-बनते रह गईं और न जाने कितनी पढ़ी नहीं गईं. तर्क ने विज्ञान को ही आगे बढाया. साहित्य को तो पीछे ढकेल दिया.

वे आगे का शेर पढ़ने की कोशिश करते हुए सबको चुप कराने लगे तभी किसी ने आवाज़ लगाई; "नीरज जी आपकी इस गजल को आपके गुरुदेव का आशीर्वाद तो मिला ही नहीं."

यह सुनकर नीरज जी बोले; "गुरुदेव का आशीर्वाद कैसे मिलता? आजकल वे हास्य गजलों को एडिट करने में व्यस्त हैं. चेले भी तो बहुत हो गए हैं अब."

उसके बाद फुरसतिया जी की तरफ देखते हुए बोले; "शुकुल जी, भाई हम तो आपकी गुझिया ही खा लेंगे. आपकी गुझिया कड़ी तो होती है, लेकिन उसमें स्माइली लगाकर आप सबकुछ बैलेंस कर देते हैं. वैसे भी बिपाशा की बनाई गुझिया की ऐसी भयानक तस्वीर आपने पेश की है कि उसकी गुझिया तो मैं खाने से रहा."

नीरज जी की बात पार फुरसतिया जी बोले; "असल में कड़ी गुझिया ज्यादातर फेंक कर मारने के काम आती है. ऐसे में स्माइली लग जाय तो लोग खाने के लिए तैयार हो जाते हैं."

उनकी बात सुनकर कुश बोले; "सत्य वचन सत्य वचन."

कुश की बात पर फुरसतिया जी का ध्यान उनकी तरफ गया. वे बोले; "तुम्हारी गुझिया कहाँ है? दिखाओ"

उनकी बात पर कुश बोले; "मेरी बनाई हुई गुझिया का आप केवल फोटो देख सकते हैं. मैंने एक ऐसा टेक्नालागिकल इनोवेशन किया है जिससे आप गुझिया के फोटो पर क्लिक करके असली गुझिया पर पहुँच जायेंगे."

कुश की बात पर सबने उन्हें बहुत सराहा. शायद फोटो वाली चिट्ठाचर्चा करते-करते यह आईडिया आया होगा. उनके इस इनोवेशन पर गुझिया इंसपेक्टर अनीता जी बहुत प्रभावित दिखीं. उन्होंने कुश को सलाह दी कि वे तुंरत अपनी इस खोज का पेटेंट करवा लें.

शास्त्री जी ने कुश को अनीता जी की सलाह मानने के लिए सजेस्ट किया. उन्होंने बताया कि कुश ने तुंरत पेटेंट नहीं करवाया तो पश्चिमी देश का कोई 'कुशाग्र बुद्धि' गुझिया कुक अपने नाम से इसका पेटेंट करवा लेगा.

किसी ने कुश की एक गुझिया खाकर उसे स्वादिष्ट बताया. अपनी गुझिया से प्रभावित होकर कुश ने घोषणा कर डाली कि "टोस्ट विद टू होस्ट" का नाम अगले सीजन में "गुझिया विद टू बुझिया" रख दिया जायेगा.

कुश की इस घोषणा पर सबने वाह वाह किया. कुछ तो वहीँ पर अगले सीजन के लिए बुकिंग कराने पर आमादा हो गए. सबसे ज्यादा उत्साह पूजा जी ने दिखाया. पूजा जी का उत्साह देखकर कुश ने उनसे पूछा; "पहले तुम बताओ, तुमने कितनी गुझिया बनाई?"

कुश के सवाल पर पूजा जी ने कहा; "मैंने बिलकुल अलग ढंग की गुझिया बनाई है. सबसे अलग गुझिया. असल में मैंने पुराने गुझिया रूल्स फालो नहीं किया. मैंने अपना नया गुझिया रूल्स बनाया. मेरी सारी गुझिया मेरे बनाए गए रूल्स के हिसाब से बनी हैं."

सब उत्सुक हो गए. यह जानने के लिए पूजा जी ने नए किस्म की कैसी गुझिया बनाई है? देखने पर पता चला कि उनकी बनाई गई गुझिया सचमुच अलग थी. मैदा की जगह मावा ने ले ली थी और जहाँ मावा रहना चाहिए वहां मैदा भरा हुआ था. किसी ने कहा; "ऐसी गुझिया को मान्यता नहीं मिलनी चाहिए."

"आपके कहने से कुछ नहीं होता. अपनी बनाई गुझिया के लिए मुझे गुझिया इंसपेक्टर से पहले ही सर्टिफिकेट मिल चुका है"; पूजा ने बताया.

कुश ने कहा; "सर्टिफिकेट पहले ही मिल चुका है! क्या करोगी इस सर्टिफिकेट का?"

"मुझे जब गुझिया पर डॉक्टरेट मिलेगा तब यह सर्टिफिकेट काम आएगा. वैसे गुझिया बनाने के साथ-साथ मैंने एक कविता भी लिखी है. सुनिए;

लड़की हूँ मैं
मुझे गुझिया मत समझना
मत समझना कि
गुझिया की तरह बंद हूँ मैं
लड़की हूँ मैं

मत समझना कि
मुझे ज़रुरत है
मैदे के किसी कवर की
उस कवर की
जो आंच बढ़ जाने पर टूट जाता है
उसकी ज़रुरत
गुझिया के मसाले को होती है
मुझे नहीं
लड़की हूँ मैं

गुझिया के मसाले में
लुप्तप्राय हो जाने वाला पोस्ता भी नहीं हूँ मैं
न ही मैं हूँ
गुझिया में छिपी हुई किशमिश
जिसका अस्तित्व
गुझिया के कवर में छिप जाता है
जो दिखाई नहीं देता
जिसे धूप भी घायल कर जाती है
वो किशमिश भी नहीं हूँ मैं
लड़की हूँ मैं

पूजा जी ने जैसे ही कविता पाठ ख़त्म किया, समीर भाई ने कहा; "सुन्दर अभिव्यक्ति. बधाई."

तबतक फुरसतिया जी बोले; "पूजा मैडम को टिप्पणी के साथ आप अपनी अति मीठी गुझिया भी दें."

फुरसतिया जी की बात सुनकर ज्ञान जी बोले; "अति मीठी साधुवादी गुझिया बोलिए."

फुरसतिया जी बोले; "सही है. सही है. समीर जी साधुवादी गुझिया का पेटेंट करवा लें."

....जारी रहेगा

Wednesday, March 4, 2009

चिट्ठाकारों का गुझिया सम्मलेन - भाग १




"बड़ी देर से कोशिश कर रहा हूँ लेकिन गुझिया पर स्माइली नहीं लगा पा रहा हूँ. इब क्या करूं?" फुरसतिया जी ने अपनी समस्या बताते हुए जैसे मदद की गुहार कर डाली.

"गुझिया पर स्माइली! समस्या तो है. इसके लिए तो शायद ई-गुरु से संपर्क करना पड़ेगा. आप चाहें तो मैं अंकित से पूछ कर बताता हूँ"; अजित भाई ने समाधान सुझाया.

"एक बार और कोशिश कर लेते हैं"; यह कहते हुए फुरसतिया जी स्माइली लगाने में लीन हो गए.

स्माइली लगाते-लगाते बोले; "भारत का मानचेस्टर कुली-कबाड़ियों का शहर न होकर हलवाइयों का शहर होता तो स्माइली लगाने में दिक्कत नहीं होती. किसी भी हलवाई को फ़ोन करके पूछ लेते."

अचानक अजित भाई से मुखातिब होते हुए बोले; "वैसे, गुझिया शब्द के सफ़र के बारे में कुछ बताएं";

होली के मौके पर गुझिया सम्मलेन में सारे चिट्ठाकार गुझिया बनाने की कोशिश में जुटे थे. डॉक्टर अनुराग के कहने पर होली के मौके पर किये गए इस सम्मलेन को क्षेत्रीय सम्मलेन न मानकर भारतीय सम्मलेन के रूप में आयोजित किया गया था.

लिहाजा पूरे भारत के चिट्ठाकार जुटे थे.

फुरसतिया जी द्बारा गुझिया शब्द के सफ़र के बारे में पूछे जाने पर अजित भाई उत्साहित हो गए. उन्होंने गुझिया शब्द के बारे में बताते हुए कहना शुरू किया; "गुझिया शब्द असल में संस्कृत की धातु...."

"लग गई स्माइली. लग गई स्माइली"; अचानक फुरसतिया जी उठकर चिल्लाने लगे. उन्हें देखकर लग रहा था कि आर्कीमीडीज ने यूरेका-यूरेका नामक गीत इसी राग में गाया होगा.

फुरसतिया जी की इस घोषणा पर समीर भाई बोल पड़े; "बहुत बेहतरीन स्माइली लगाई है भाई. इसके लिए आपको साधुवाद और बधाई."

"आपने बिना गुझिया पर स्माइली देखे कैसे जाना कि मैंने बेहतरीन स्माइली लगाई है?"; फुरसतिया जी ने समीर भाई से पूछ लिया.

फुरसतिया जी के अचानक किये गए इस सवाल से समीर भाई अकबका गए. थोड़ा संभले और कहा; " आप अपनी पोस्ट पर इतनी धाँसू स्माइली लगाते हैं. ऐसे में गुझिया पर भी धाँसू ही लगाया होगा."

फुरसतिया जी समीर भाई की बात से असहमत होते हुए बोले; "आपको मेरी पोस्ट और मेरी गुझिया में कोई अंतर दिखाई नहीं देता?"

"अंतर क्या होगा? जैसे पोस्ट पर मौज लेते हैं वैसे ही गुझिया पर भी मौज ही लिया होगा"; समीर भाई ने अपने निष्कर्ष पर पहुचने का कारण बताया. उनकी बात सुनकर सब हंस पड़े.

वैसे समीर भाई की टिपण्णी सुनकर फुरसतिया जी को लगा कि कहीं समीर भाई अपनी टिपण्णी को आगे बढ़ाकर कविता में परिवर्तित न करे दें. उन्हें इस बात का भी डर था कि एक बार टिपण्णी कविता बनी नहीं कि समीर भाई उसको गाने लगेंगे.

लिहाजा उन्हें रोकने की चाहत लिए फुरसतिया जी ने और ही बात छेंड़ दी. वे बोले; "और आप की बनाई गुझिया कहाँ है? दिखाइये."

फुरसतिया जी द्बारा बात को मोड़ दिए जाने से समीर भाई की टिप्पणी को कविता बनाने की कोशिश नाकाम हो गई. वे बोले; "मैं गुझिया बनाना चाहता था लेकिन भाई लोगों ने मेरे मसाले में उतनी ही चीनी डाली है जितनी दूसरों के. मेरी गुझिया दूसरों से ज्यादा मीठी नहीं होगी तो मेरे लिए गुझिया बनाना संभव नहीं होगा."

"ये तो ठीक बात नहीं है"; ताऊ जी ने समीर भाई की बात को उठाते हुए कहा. इधर-उधर देखते हुए ताऊ जी ने बीनू फिरंगी को आवाज़ देते हुए कहा; "ओय बीनू, कठे है तू?"

उनकी बात सुनकर बीनू फिरंगी दौड़ते हुए आये. बोले; "मैं तो अठे ही था ताऊ. बता, के काम है?"

"काम ये है कि जल्दी से आधा किलो चीनी ले आ और समीर जी के मसाले में डाल"; ताऊ जी ने बीनू फिरंगी को निर्देश देते हुए कहा.

"अभी लाया ताऊ"; कहते हुए बीनू फिरंगी चीनी लाने दौड़ पड़ा.

समीर भाई के लिए चीनी का इंतजाम हो रहा था कि ज्ञान जी आ गए. उन्हें देखकर ताऊ जी बोले; "भाई, सही बात है. समीर जी की गुझिया बाकियों से मीठी तो होने ही चाहिए. वैसे ज्ञान जी, आपका तो ये दूसरा गुझिया सम्मलेन होगा?"

"हाँ, ये मेरा दूसरा गुझिया सम्मलेन है. पिछले साल मैंने करीब तीन सौ गुझिया बनाई थी. इस बार पता नहीं उतना बना पाऊँगा कि नहीं"; ज्ञान जी ने उनके द्बारा अटेंड किये गए गुझिया सम्मेलनों के बारे में बताया.

" अरे क्यों नहीं होगा? बिलकुल होगा जी. इस बार भी आप उतनी ही गुझिया बनायेंगे. आपकी गुझिया तो ब्लॉग-जगत की पहचान बन गई है"; ताऊ जी ने उनका हौसला बढ़ाते हुए बताया.

उनकी बात सुनकर ज्ञान जी कहा; "कोशिश रहेगी जी. लेकिन समस्या एक ही है. कभी-कभी लगता है कि एक ही तरह की गुझिया बनाते-बनाते गुझिया का मसाला ही ख़तम हो जायेगा."

ज्ञान जी की बात पर फुरसतिया जी ने मौजाते हुए कहा; "आप तो केवल गुझिया बनाईये. वैसे भी जब आपको लगे कि एक ही तरह की मीठी गुझिया बनाते-बनाते बोर हो रहे हैं तो दो-चार दर्जन नमकीन गुझिया बना डालिए."

फुरसतिया जी की बात सुनकर सब हंस पड़े.

तबतक डॉक्टर अनुराग आ धमके. सबको देखकर बोले; " अच्छा हुआ आप सब ने गुझिया सम्मलेन को क्षेत्रीय नहीं बनाया. वैसे गुझिया है भी बड़े मजे की चीज. तरह-तरह के आकार की गुझिया. ये त्रिभुजाकार गुझिया देखकर मन में आता है जैसे बनाने वाले ने त्रिवेणी लिख दी हो."

त्रिवेणी की बात आते ही फुरसतिया जी का मौजत्व कुलांचे मारने लगा. अनुराग जी से मुखातिब होते बोले; "और वो पैराबोलिक गुझिया को देखकर मन में क्या आता है?"

अनुराग जी इस सवाल के लिए तैयार नहीं थे. अचानक किये सवाल से अदबदा गए. कुछ सोचकर बोले; "उन गुझिया को देखकर मन में आता है जैसे किसी ने नज़्म लिख दी है."

अनुराग जी की बात सुनकर कुश ने टिप्पणी दे मारी. बोले; "आप हमेशा दिल की बात कहते हैं जी. इसीलिए तो हम आपकी त्रिवेणी और नज्मों सॉरी आपके गुझिया के दीवाने हैं."

कुश की बात सुनकर अनुराग जी यादों में खो गए. बोले; "हॉस्टल में रहते हुए एक बार गुझिया बनाने की कोशिश की थी. जाट के साथ बाईक पर सामान लाने गए थे. जितने पैसे लेकर निकले उनमें से एक पैकेट सिगरेट...."

अनुराग जी यादों में खोये ही थे कि कविता जी आ गईं. उन्हें देखकर फुरसतिया जी बोले पड़े; " कविता जी, आपने कितनी गुझिया बनाई? कहाँ हैं आपकी बनाई हुई गुझिया?"

फुरसतिया जी की बात सुनकर कविता जी ने सफाई देते हुए कहा; "गुझिया तो हमने बनाई है लेकिन उसे बक्शे में रखकर ताला लगा दिया है. आपको पता है कि नहीं, गुझिया चोरी की कई घटनाएं हो चुकी हैं?"

"ठीक ही किया आपने. ये चोर लोग पता नहीं कब सुधरेंगे? हमने भी जितनी गुझिया बनाई थी, सबको बंद करके ताला लगा दिया है"; अचानक डॉक्टर अमर कुमार बोल पड़े.

डॉक्टर साहब की बात सुनकर फुरसतिया जी पूछ बैठे; "आपने गुझिया बनाई? कब बनाई, मैंने तो आपको गुझिया बनाते देखा ही नहीं?"

फुरसतिया जी की बात सुनकर डॉक्टर साहब ने बताया; "मैंने तो तीन बजे सुबह ही उठकर करीब अस्सी गुझिया बना ली थी. वैसे आप देखना चाहेंगे क्या?"

सबकी उत्सुकता बढ़ गई. सबने एक साथ गुझिया देखने की फरमाईस की. डॉक्टर साहब ने ताला खोलकर जब गुझिया दिखाया तो सब हंसने लगे. एक से बढ़कर एक डौल, सुडौल, बेडौल गुझिया थी. डॉक्टर साहब बोले; "मैं तो ऐसी ही गुझिया बनाता हूँ. बेबाक गुझिया. आपको आकार पसंद न आये तो मैं क्या करूं?

गुझिया पर्यवेक्षण करते हुए अरविन्द जी बोले; "डॉक्टर साहब की बनाई गुझिया देखकर एक बार फिर से साबित हो गया की गुझिया के विकास का इतिहास सचमुच बड़ा रोचक था."

"गुझिया के विकास का भी कोई इतिहास है क्या?"; अचानक फुरसतिया जी पूछ बैठे.

फुरसतिया जी की बात सुनकर अरविन्द जी को लगा कि अब गुझिया पर्यवेक्षण ढंग से कर दिया जाय. वे बोले; "असल में शुरुआती रूप को देखा जाय तो शुरू-शुरू में गुझिया गोलाकार होती थी. जैसे बाटी होती है. लेमार्क ने इस विषय पर अपनी पुस्तक "आधुनिक गुझिया का विकास" में लिखा है...."

तबतक फुरसतिया जी बोल पड़े; "बड़े मौजी लोग थे ये लेमार्क और डार्विन. भाई गुझिया तक को नहीं छोडा! उसके विकास का भी इतिहास लिख डाला?"

उनकी इस बात पर शास्त्री जी बोले; " गुझिया पर अगर अंग्रेजी में किताब लिखी गई है तो मैं गुझिया नहीं बनाऊंगा. मैं हर वो चीज नहीं करूंगा जो अंग्रेजी से किसी भी तरह जुड़ी हो."

शास्त्री जी की बात सुनकर फुरसतिया जी बोले; " कोई भी भाषा बुरी नहीं होती. गुझिया के बारे में अगर अंग्रेजी में लिखा गया है तो इससे तो भारतीय संस्कृति को बढ़ावा ही मिला होगा."

शास्त्री जी फुरसतिया जी से प्रभावित नहीं हुए. बोले; "मैं आपसे सहमत नहीं हूँ. इस विषय पर आपसे शास्त्रार्थ करने के लिए भी तैयार हूँ. आप मानिए कि एक बार किसी चीज की अंग्रेजी हो गई तो आधुनिकता में सराबोर लोग पब में भी गुझिया बेचने लगेंगे. मेरा तो मानना है कि...."

शास्त्रार्थ की बात सुनकर सबने विमर्श के महत्व पर टिप्पणी दे डाली.

शास्त्रार्थ और विमर्श जैसी भारी-भरकम चीजों से दूर नीरज गोस्वामी जी एक जगह कागज़ सामने रख पेंसिल को दांत तले दबाये आसमान पर ताक-झाँक कर रहे थे. उन्हें देख किसी ने आवाज़ लगाईं; "नीरज जी, आप गुझिया नहीं बना रहे हैं?"

वे बोले; "अभी तो मैं फिलहाल गुझिया पर गजल लिख रहा हूँ. लगभग मुकम्मल हो चुकी है. मुलाहिजा फ़रमाएँ"; इतना कहते हुए उन्होंने गजल पढ़नी शुरू कर दी...

गज़ब की ये मिठाई है कहें जिसको सभी गुझिया
बिना मावा भरे किसकी बता अच्छी बनी गुझिया

कभी तुम भूल कर मत देखना इसको हिकारत से
अगर किस्मत में हो लिख्खी तभी मिलती सही गुझिया

हमारी तो समझ लेना उसी दिन यार तुम होली
बिपाशा हाथ से अपने खिलाये जब पकी गुझिया

... जारी रहेगा.