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Monday, October 5, 2015

द्वापर-युग का एक टीवी पैनल डिस्कशन




महाभारत में युधिष्ठिर के राजसूय-यज्ञ का प्रसंग पढ़ रहा था. राजसूय-यज्ञ के समय हुए शिशुपाल वध की बात पढ़ी. श्रीकृष्ण पूजन पर शिशुपाल के असम्मति से संवैधानिक संकट जैसी किसी चीज का निर्माण हो गया. संयोग भी देखिये कि यह शिशुपाल जी द्वारा किया गया श्रीकृष्ण का सौवां अपमान निकला। खैर, सभा में धर्म वगैरह की व्याख्या पढ़ी गई. तर्कों के तीर छोड़े गए. इन तीरों को काटने के लिए नए तर्कों के तीर गढ़े गए. फिर उधर से तर्क-तीर चले. फिर इधर से उनको काटा गया.

तर्क वगैरह कटने के बाद काटने के लिए एक ही चीज बची थी, शिशुपाल की गर्दन. श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र को भेज शिशुपाल जी की गर्दन काट उन्हें यमपुरी भेज दिया. देवताओं ने ऊपर से पुष्पवर्षा की.

धर्मराज युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ की समाप्ति हुई.

मन में आया कि वहाँ जो कुछ भी हुआ उसको बड़ी सहजता से क्यों स्वीकार किया गया? फिर मन में आया कि; वैसे और कर भी क्या सकते थे लोग़? उन दिनों टीवी चैनल तो थे नहीं कि पैनल डिस्कशन होते, रपट निकलती, विशेषज्ञ बैठते और बाल की खाल निकालते. ऐसा करने से शिशुपाल जी का मामला आराम से दस-बारह वर्षों तक चलता. इन्वेस्टिगेशन होता. एस आई टी जांच करती. रपट लीक होती. मानवाधिकार कार्यकर्ता नारे लगाते. मानवाधिकार नेता टीवी पर दलीलें देता. दूसरों की बात न सुनता और समय निकालकर कैंडिल मार्च कर डालता। शिशुपाल जी के लिए न्याय की मांग उठाई जाती।

कुल मिलाकर बड़ी बमचक मचती.

शायद कुछ ऐसे:-

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न्यूज-आवर पर अरनब गोस्वामी.

अरनब - "When so-called religion pushes humanity to the backseat, ladies and gentlemen, when some human beings start believing, they are more equal than others.. when rulers with help of the powerful seek to finish other rulers, then we are bound to be pushed many generation back, then we as human beings are doomed...then humanity is threatened to be finished..

..and amidst this threat to humanity ladies and gentlemen, I am here tonight on Newshour, yet again to save the humanity from ruthless and powerful

"Good evening. In a bizarre turn of events, परसों करीब 10 बजे सुबह इंद्रप्रस्थ में युधिष्ठिर की भरी सभा में दिन-दहाड़े श्रीकृष्ण ने चेदिप्रदेश के महाराज शिशुपाल का मर्डर कर दिया. उस महाराज शिशुपाल का जो राजा तो थे ही, श्रीकृष्ण के फूफा भी थे. हमारे सोर्सेज बताते हैं कि सभा में प्रजेंट शिशुपाल के दोस्तों ने विरोध किया लेकिन उनकी आवाज़ को दबा दिया गया. सवाल यह है कि इस देश में अब Rule of Dharma है या नहीं? सवाल यह भी उठता है कि क्या अधर्मियों की आवाज़ को ऐसे ही दबा दिया जाएगा?

तरह-तरह के दावे किये जा रहे हैं. चेदिप्रदेश के मानवाधिकार कार्यकर्ता और महाराज शिशुपाल के दोस्त चाहते हैं कि इस मामले की पूरी छानबीन SIT से कराई जाय लेकिन इंद्रप्रस्थ में उनकी बात नहीं सुनी जा रही है. आज इंद्रप्रस्थ में युधिष्ठिर के महल के सामने इन मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शन किया तो पुलिस ने उनके ऊपर लाठीवर्षा की. ऐसे में The nation wants to know the truth.

सच क्या है यह देश जानना चाहता है. हमारे साथ हैं हस्तिनापुर से कृपाचार्य to interpret Dharma. हस्तिनापुर से ही हमारे साथ हैं महामंत्री विदुर. We also wanted Shree Krishna to come and defend himself but he refused. वे नहीं आये. उनको represent करने के लिए हमारे साथ इंद्रप्रस्थ से हैं बलराम. इन्द्रप्रस्थ से ही हमारे साथ है सहदेव.

और स्टूडियो में मेरे साथ है चेदिप्रदेश से आये नरोत्तम कलसखा जो ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट हैं और Save the Demon नाम का NGO चलाते हैं और जो चाहते हैं कि शिशुपाल मर्डर केस की जांच SIT करे. साथ ही मेरे दायीं ओर हैं वरिष्ठ पत्रकार मिस्टर आशुतोष.

विदुर जी, मैं आपसे शुरू करना चाहता हूँ. क्या हुआ यह? भरी सभा में किसी को क़त्ल कर देना कहाँ तक जायज़ है?"

विदुर:- "देखें ऐंकरश्री, पहले तो मैं आपको बता दूँ कि शिशुपाल श्रीकृष्ण के फूफा नहीं बल्कि उनके फूफेरे भाई थे. अब आप के सवाल पर आता हूँ. देखें, जिसे आप क़त्ल कह रहे हैं दरअसल वह क़त्ल नहीं है. उसे वध कहते हैं. धर्मशास्त्रों के अनुसार क़त्ल और वध में अंतर होता है."

अरनब:-"लेकिन विदुर जी, end result तो दोनों का एक ही है न. आप उसको कोई भी word दे दें लेकिन दोनों का result यह है कि एक आदमी मारा जाता है."

विदुर:-"ऐंकरश्री, आप पहले मेरी बात पूरी तो होने दें. देखें, किसी अपराध के दंडस्वरुप अगर किसी को मारा जाता है तो उसे वध...."

(स्टूडियो में बैठे नरोत्तम कालसखा उत्तेजित होकर)

नरोत्तम कालसखा:-"आप ये बताएं..आप ये बताएं.."

(स्टूडियो में बैठे आशुतोष के चेहरे पर मुस्कान आ जाती है. वे मुस्कुराते हुए ना ना के इशारे में सिर हिलाते है जिससे लगता है कि वे न केवल विदुर से असहमत है बल्कि यह भी लगता है कि पूरे राष्ट्र में उनकी सी समझ रखनेवाला कोई नहीं)

अरनब:-"okay okay. Narottam ji wants to rebut you विदुर जी. मैं नरोत्तम जी के पास जाता हूँ. नरोत्तम जी, यह बताएं कि विदुर जो कह रहे हैं आप उससे सहमत हैं?"

नरोत्तम कालसखा:-"बिलकुल नहीं अरनब। ये तथाकथित धर्म के जानकर केवल शब्दों से खेलना जानते हैं. ये विदुर जी आज हस्तिनापुर में बैठकर धर्म सिखा रहे हैं लेकिन मैं बता दूँ कि उनकी यह दलील शब्दों की जादूगरी के सिवा और कुछ नहीं है. मैं पूछता हूँ कि केवल अपमान करने से किसी कि हत्या कर देना कैसा धर्म है?"

आशुतोष:-"मैं तो और आगे जाकर कहूँगा कि ……

अरनब:- "one second one second आशुतोष। मैं आपके पास आऊंगा, मैं आऊंगा। विदुर जी, जवाब दें. नरोत्तम जी पूछ रहे है कि केवल अपमान के लिए किसी का murder कर देना कैसा धर्म है?"

विदुर:-"देखें, आप मुझे अपनी बात पूरी करने देंगे तब तो मैं कुछ कहूँगा. मुझे लगता है कि आपको मुझे बोलने का मौका देना चाहिए।"

अरनब:-"वैसे तो मैं किसी को मौका नहीं देता विदुर जी लेकिन आप कह रहे हैं तो आपको दे देता हूँ"

विदुर:-"धन्यवाद। और अब मेरी बात ख़त्म होने तक मुझे टोकें नहीं। देखें, यह अपमान के एवज में की गई हत्या का मामला नहीं है. यह उससे आगे का मामला है. दरअसल मामला अधर्मी को दण्डित करने का है. बात केवल यह नहीं है कि शिशुपाल ने श्रीकृष्ण का अपमान किया, बात यह भी है कि शिशुपाल अपने क्षेत्र के राजाओं से बिना किसी वजह युद्ध करता रहा है. प्रजा को और ऋषि-मुनियों को वर्षों से सताता रहा है. यह केवल श्रीकृष्ण के अपमान का मामला नहीं है. यह धर्म और अधर्म का युद्ध...

नरोत्तम कालसखा:-"विदुर जी, आज आपको धर्म याद आ रहा है.…"

(कृपाचार्य हाथ उठाकर बोलने की अनुमति लेना चाहते है. अनुमति न मिलने पर शुरू हो जाते है)

कृपाचार्य:-"शास्त्रों के अनुसार …"

अरनब:-"कृपाचार्य जी, मैं आऊंगा आपके पास. मैं आऊंगा। wait for your turn. अभी आप नरोत्तम जी को बोलने दें. go ahead नरोत्तम जी"

नरोत्तम कालसखा:-"अरनब मैं विदुर जी से वही कह रहा था कि धर्म तो यह भी कहता है कि स्त्री की हत्या नहीं करनी चाहिए. यदि श्रीकृष्ण धर्म के अनुसार ही आचरण करते हैं तो पूतना की हत्या क्यों की? उस समय धर्म का विचार उनके मन में क्यों नहीं आया? क्यों नहीं सोचा कि स्त्री की हत्या धर्म के विरुद्ध है?"

विदुर :-"देखें ऐक्टिविस्टश्री, पूतना एक राक्षसी थी और वासुदेव कृष्ण ने उसकी हत्या नहीं अपितु उसका भी वध ही किया था. वह श्रीकृष्ण को मारने के लिए गई थी. धर्म कहता है कि कोई भी व्यक्ति अपने जीवन को बचाने के लिए किसी का भी वध कर.…"

नरोत्तम कालसखा:-"सुनिए सुनिए विदुर जी पहले मेरी बात सुनिए"

विदुर:-"आपको याद हो तो त्रेता युग में भी.…"

नरोत्तम कालसखा:-"अरे सुनिए सुनिए विदुर जी, मेरी बात भी तो सुनिए। देखिये ऐसा है कि मैं कोई पूतना का पक्ष नहीं ले रहा लेकिन आपसे जरूर पूछना चाहूँगा कि; हो सकता है पूतना हत्या करने के इरादे से गई होगी पर उसने श्रीकृष्ण की हत्या तो नहीं की न. केवल शक के बिला पर उसकी हत्या कर देना तो अपराध हुआ."

आशुतोष:-"बिलकुल"

विदुर:-"तो कालसखा जी, आप क्या चाहते हैं कि पूतना श्रीकृष्ण को मार देती तभी उसका वध किया जा सकता था?"

सहदेव:-"मैं कहना चाहूँगा…"

अरनब:-"सहदेव जी, सहदेव जी, हम आपको बोलने का मौका देंगे, हम देंगे मौका। फिलहाल नरोत्तम जी को उनकी बात पूरी करने दें. हाँ, go ahead नरोत्तम जी"

नरोत्तम कालसखा:-"मैं वही कह रहा था. मैं पूछता हूँ कि क्या सबूत है कि पूतना श्रीकृष्ण की हत्या के इरादे से ही गई थी? श्रीकृष्ण ने कह दिया और आप मान गए? और फिर एक बात बताएं विदुर जी; क्या आप नहीं मानते कि हत्याऑं के मामले में श्रीकृष्ण का रिकार्ड ही खराब है? पूतना को तो जाने दें, श्रीकृष्ण ने उसे भी मार डाला जो उनका खुद का मामा था, महाराज कंस. आज यह बात तो जग के सामने है कि उन्होंने महाराज कंश को मार डाला था. अब महाराज शिशुपाल की हत्या कर दी जो खुद उनके फूफेरे भाई थे. एक बहुत ही वीर राजा। और फिर आपको याद हो तो इन्ही कृष्ण ने बचपन में ही बकासुर की हत्या कर दी थी. वृषभासुर को मार डाला. मैं पूछता हूँ बचपन से ही केवल हत्याएं करना कौन सा धर्म है?"

विदुर:-"नरोत्तम जी, पहले आप की जानकारी के लिए बता दूँ कि राक्षसों और अपराधियों को मारना...."

अरनब:-"okay okay ओके..मैं आशुतोष की तरफ आता हूँ. tell me Ashutosh, ये जो भरी सभा में दिन-दहाड़े हत्या हुई है, इसके बाद आप इस मामले को कहाँ जाता हुआ देखते हैं?"

आशुतोष-"अर्नब, यह मामला उतना सीधा नहीं है जितना दिखाई देता है. जहाँ तक मेरी जानकारी है, श्रीकृष्ण का इस तरह से रिएक्ट करना ठीक नहीं था. मैं एक बात और बता दूँ अर्नब. देखें पहले यह बात सुनी गई कि इन्द्रप्रस्थ की सभा में ही शिशुपाल ने श्रीकृष्ण का सौवीं बार अपमान किया लेकिन सूत्रों की मानें तो यह शिशुपाल द्वारा श्रीकृष्ण का सौवां अपमान नहीं था. खुद मेरे अपने सोर्स ने बताया है कि यह सौवां अपमान नहीं था. मैंने इस केस को बहुत नजदीक से फालो किया है और मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि जल्द ही इस केस में ऐसे-ऐसे तथ्य सामने आ सकते हैं जो न केवल उन सभी तथ्यों से भिन्न होंगे जो अभी पब्लिक डोमेन में हैं बल्कि पूरे देश को आश्चर्यचकित कर देंगे."

अरनब:-"जैसे? क्या खुलासा हो सकता है इस केस में?"

आशुतोष :-"अर्नब, मुझे मेरे सोर्सेज से जानकारी मिली है कि यह केस बहुत पेंचीदा है. जितनी खोजबीन मैंने की है उससे हैरत में डाल देने वाली बातें आई हैं सामने. अपमानों का रजिस्टर मेंटेन करने वाले श्रीकृष्ण के कर्मचारी से भी मेरी बात हुई है और उसने भी इसबात से इंकार नहीं किया कि अपमानों की एंट्री करने में उससे भी गलती हो सकती है."

बलराम:-"अब यह तो...."

अरनब:-"one sec, one sec, one sec. बलराम जी मैं आता हूँ आपके पास. आपके पास आता हूँ. आशुतोष को उनकी बात … okay okay go ahead आशुतोष"

आशुतोष:-"मैं वही कह रहा था कि अपमानों के रजिस्टर में एंट्री करने में गलती भी हो सकती है अर्नब"

अरनब:-"जैसे? किस तरह की गलती की बात कर रहे हैं आप?"

आशुतोष:-"जैसे ऐसा भी हो सकता है कि महाराज शिशुपाल द्वारा किया गया श्रीकृष्ण का कोई अपमान दो बार रिकार्ड हो गया हो. या ये भी हो सकता है कि कोई 2-3 अपमान दो बार रिकार्ड हो गए हों. और अर्नब अगर ऐसा कुछ हुआ है तो फिर यह महाराज शिशुपाल द्वारा किया गया सौवां अपमान नहीं था. या तो सौ से कम होगा या फिर ज्यादा लेकिन सौवां नहीं हो सकता।

कृपाचार्य:-"धर्म में गणित …"

सहदेव:-"यह किस तरह की बात...."

आशुतोष:-"वैसे अर्नब, मैंने उडती खबर यह भी सुनी है कि अपमानो के रजिस्टर में कुछ उलट-फेर भी हुआ है. मेरे सोर्सेज बताते हैं कि रजिस्टर से बीच के दो पन्ने फाड़े गए है. अब पता नहीं यह बात कितनी सच है लेकिन सवाल तो अपनी जगह है. और अर्नब, मैंने इस केस को जिस तरह से फालो किया है.."

विदुर:-(व्यंग करते हुए) "यह तो अभी परसों की घटना है पत्रकार श्री. दो दिन में कितना फालो कर लिया आपने?

अरनब:-"okay okay..let me go to Balram..बलराम जी, यह बताइए कि क्या यह सच है कि अपमानों की entry वाले register में हेर-फेर हुई है. ऐसी बात सुनाई दे रही है कि ऐसा हुआ है. आप क्या कहना चाहते हैं?"

सहदेव:-"what rubbish?"

अरनब:-"सहदेव जी, आप अरनब के show में हैं. रबिस कुमार दूसरे चैनल के anchor हैं. हाँ, go ahead बलराम जी"

बलराम:-(शांति के साथ) "देखिये, ऐसी बात बिलकुल नहीं है. अब आशुतोष जी को पता नहीं कौन से सोर्स से जानकारी मिली है लेकिन मैं स्पष्ट शब्दों में कहना चाहूँगा कि अपमानों के रजिस्टर में कोई हेर-फेर नहीं हुई है. रजिस्टर कभी भी कोई भी आकर देख सकता है. हम कुछ छिपा नहीं रहे. रही बात..."

नरोत्तम कालसखा:-(कंधे उचकाते हुए) "लेकिन...लेकिन..."

अरनब:-"okay Narottam ji wants to rebut you. Go ahead Narottam ji."

नरोत्तम कालसखा:-"बलराम जी, आपसे मेरा एक अलग ही प्रश्न है. ये बताइए कि क्या सबूत है कि श्रीकृष्ण ने अपनी बुआ को शिशुपाल जी महराज के केवल सौ अपमानों को क्षमा करने का वचन दिया था? हो सकता है उन्होंने सवा सौ अपमानों को क्षमा करने का वचन दिया हो. या हो सकता है कि एक सौ चालीस अपमानों को क्षमा करने का वचन दिया हो. कोई सबूत है किसी के पास कि उन्होंने सौ अपमानों की ही बात की थी?"

बलराम:-"फिर तो आप यह भी कह सकते हैं कि …"

आशुतोष:- (जल्दी जल्दी) मैं इसपर कुछ कहना चाहूँगा। अर्नब मैं इसपर ये ...."

अरनब:- (हाथ उठाकर)"I will come back to you Ashutosh. Let Balram ji speak. मैं वापस आऊंगा आपके पास. Yes go ahead Balram ji"

बलराम:-"नरोत्तम जी, जब श्रीकृष्ण ने बुआ को वचन दिया था उस समय मैं वहीँ पर था. और मैं आपको सच बताता हूँ कि उसने सौवें अपमान के बाद ही मारने का वचन दिया था. अगर आपको मेरी बात का विश्वास न हो तो बुआ से पूछ सकते हैं."

नरोत्तम कालसखा:-"देखिये बलराम जी मुझे आपकी बात का विश्वास क्यों हो? आप तो श्रीकृष्ण के भाई हैं. और रही बात बुआ से पूछने की तो क्या गारंटी है कि आप, श्रीकृष्ण और युधिष्ठिर बुआ जी पर दबाव डाल के उनसे नहीं कहलवा देंगे कि श्रीकृष्ण ने केवल सौ अपमानों को क्षमा करने की बात कही थी?"

बलराम:-"अब देखिये वैसे तो आपको हमारी किसी बात का विश्वास नहीं होगा लेकिन मेरा कहना यही है कि तथ्यों को जाने बिना...."

कृपाचार्य:-"धर्मानुसार तो यह …"

सहदेव:-"राजनीतिक विमर्श में ऐसे आरोप …"

आशुतोष:-"धर्म की आड़ में अपराध ...."

विदुर:-"ये कालसखा जी विचित्र बात कर …"

(सारे एक साथ बोले जा रहे हैं. किसी की बात सुनाई नहीं दे रही है)

अरनब:- (परेशान होकर झल्लाते हुए,ऊंची आवाज़ में) "Gentlemen, please! one at a time.. please. Ek minute ek minute …ek minute सहदेव जी, मैं आपके पास आता हूँ. आऊंगा मैं आपके पास. एक मिनट कृपाचार्य जी please … (शांति छा जाती है)
thank you. okay let me go back to Ashutosh . आशुतोष ये बताइए कि अब क्या देखते हैं इस केस में? अब जबकि media ने इस case को अपने हाथ में ले लिया है?"

आशुतोष:-"अर्नब, ये नरोत्तम जी का प्वाइंट महत्वपूर्ण है. मेरी बात एक सैनिक से हुई जिसने ये बताया कि जब श्रीकृष्ण ने अपनी बुआ को महाराज शिशुपाल के अपमानों को क्षमा कर देने की बात कही थी तो वह वहीँ पर था. और आपको हैरत होगी कि उसने बताया कि श्रीकृष्ण ने एक सौ पचहत्तर अपमानों को क्षमा करने का वचन दिया था....."

बलराम:-"यह तो बिल्कुल ही झूठ बात ...."

अरनब:-"बलराम जी बलराम जी, आप आशुतोष को उनकी बात तो पूरी करने दीजिये। एक वरिष्ठ पत्रकार हैं. इनके बाल कितने सफ़ेद हैं यह तो देखिये। उनको नहीं तो कम से कम उनके बालों को तो इज़्ज़त दीजिये। हाँ, go ahead Ashutosh"

आशुतोष:-"वही मैं कह रहा था अर्नब। देखें अब इसमें कितना सच है और कितना झूठ यह कह पाना मेरे लिए मुश्किल है लेकिन उस सैनिक ने मुझे यही बताया. और एक बात अर्नब, अब जिस तरह से सबूत एक-एक करके सामने आने लगे हैं उससे तो यही लगता है कि यह मामला बड़ा पेंचीदा होता जा रहा है. कुछ अपमान विशेषज्ञों ने तो यहाँ तक कहा है अर्नब कि यह क्लीयर नहीं है कि श्रीकृष्ण ने एक सौ अपमान होते ही महाराज शिशुपाल को मारने की बात कही थी या फिर एक सौ अपमान होने तक क्षमा कर देते और एक सौ एकवाँ अपमान होने के बाद मारते. मेरे विचार से यह बात कम महत्वपूर्ण नहीं है. और मेरा ऐसा मानना है..."

(बलराम हैरत भरी निगाह से आशुतोष को देखते हैं)

अरनब:-"okay, joining me now...अब हमें join कर रहे हैं हस्तिनापुर से आचार्य शकुनी. शकुनी जी, हमें ये बताएं...."

(Program coordinator गलती से अरनब को शकुनि से connect न करके किसी और से connect कर देता है) (एक कान में ऊँगली दबाये,जैसे कि earpiece पकड़े हुए हों,एक आदमी कुर्सी पर दीखता है)

अरनब:-"शकुनि जी, आपको हमारी आवाज़ आ रही है?"

उधर बैठा व्यक्ति:-"अरे कौन शकुनि? मैं भ्रष्टाचार विशेषज्ञ अशांत कुलभूषण हूँ और मैं यहाँ पर घोड़ों की खरीद में जो scam हुआ है उसपर बोलने आया था. ये कहाँ आप मुझे शकुनि बना रहे है?"

अरनब:-"sorry sorry, अशांत जी, गलती से studio ने आपको connect कर दिया। वैसे आप आये हैं तो शिशुपाल जी की हत्या पर भी अपने विचार दे दें"

अशांत कुलभूषण:-"देखिये मैं भ्रष्टाचार विशेषज्ञ हूँ और उसी पर बोलूँगा। और आपने कहा था कि साढ़े नौ बजे से वो debate शुरू करेंगे और यहाँ already दस बजने वाले है"

अरनब:-"बस, ये debate ख़त्म करके मैं वापस आता हूँ."

(उस कुर्सी पर कुछ क्षणों के लिए अँधेरा छा जाता है और जब फिर फोकस किया जाता है तो कुर्सी पर शकुनि दीखते हैं)
पीछे से आवाज़ आती है-प्रोग्राम को-ऑर्डिनेटर की- "अरनब,, now Mr Shakuni is connected..go ahead)

अरनब:-"हाँ तो अब हमारे साथ हैं हस्तिनापुर से आचार्य शकुनि। शकुनि जी, हमें ये बतायें ...."

विदुर :-(मुख पर तंग होने का भाव लिए हुए) "ऐंकरश्री, महाराज शकुनी आचार्य नहीं हैं. आपको कम से कम इतनी जानकारी तो रहनी ही चाहिए. शकुनी गांधार नरेश हैं और पिछले कई वर्षों से अपनी बहन के घर बैठकर मुफ्त की रोटियां तोड़ रहे हैं."

अरनब:-"sorry sorry..विदुर जी. चलिए गंधार नरेश शकुनी ही सही. शकुनी जी, हमें ये बताएं कि ये इन्द्रप्रस्थ में जो महाराज शिशुपाल की हत्या का मामला हुआ है, इसके बारे में आप क्या सोचते हैं?"

शकुनी:-"यह तो बहुत ही क्रूर हत्या का मामला है भांजे अरनब...क्षमा करो भाई,, मैंने तुम्हें भी भांजा कह डाला. एक सौ भांजो से दिन-रात मामा-मामा सुनते-सुनते आदत ख़राब हो गई है. हाल यह है कि एक दिन मेरे मुँह से जीजाश्री के लिए भी भांजे धृतराष्ट्र निकल आया था...

(2 second का पॉज जैसे साँस ले रहे हों)

हाँ तो मैं यह कह रहा था कि यह तो वासुदेव कृष्ण द्वारा क्रूर हत्या का मामला है. ऐसे में मैंने और भांजे दुर्योधन ने यह निर्णय लिया है कि कुछ ही दिनों में काशीनरेश के दरबार में होने वाले राजाओं के सम्मलेन में हमलोग इस मामले को उठाएंगे और चाहेंगे कि श्रीकृष्ण को उनके इस अपराध के लिए घोर दंड मिले. मैंने तय किया है कि हम इस मामले को मीडिया में उछालते रहेंगे जिससे शिशुपाल की आत्मा को न्याय मिले."

अरनब:-"okay, last एक minute रह गया है मेरा पास. नरोत्तम जी, यह बताएं कि अब आपका क्या प्लान होगा? आप और आपके जैसे हजारों "मानव धिकार" activists क्या चाहते हैं?"

नरोत्तम कालसखा:-"अरनब, हमारा stand बिलकुल क्लीयर है. हम यह चाहते हैं कि एक independent SIT से इस मामले की जांच कराई जाय और श्रीकृष्ण को तुरंत सज़ा दी जाय. जबतक यह नहीं होता, हम आन्दोलन करते रहेंगे। परसों हमने इंद्रप्रस्थ Gate पर एक candle march का आयोजन किया है. (मुस्कुराते हुए)
आशा है कि आप अपने channel पर coverage जरूर देंगे। और...(गंभीर होते हुए कठोर आवाज़ में) हम आपके साथ मिलकर यह सुनिश्चित करेंगे कि महाराज शिशुपाल की आत्मा को न्याय मिले."

अरनब:-"Gentlemen, अब हमारे पास वक़्त नहीं है.So let's conclude...(पॉज)
लेकिन We promise you that we will make it sure that justice is done in this case.Your channel has always stood for justice. हस्तिनापुर में कृपाचार्य और इन्द्रप्रस्थ में सहदेव जी, आपको भी thanks. समय की कमी के कारण हम आपको समय न दे सके but I promise you ,,कि अगली बार हम आप दोनों को भी समय देंगे. Goodbye and Goodnight."

Saturday, July 26, 2014

एकलव्य री-विजिटेड




पाठशाला में सारी तैयारी हो चुकी थी. गुरु द्रोणाचार्य अपने चेलों की नेट-प्रैक्टिस के लिए चिड़िया को पेड़ पर टंगवा चुके थे. उन्हें पता था कि केवल अर्जुन को ही चिड़िया की आँख दिखाई देगी और उनके बाकी चेले निशाना लगाने के बावजूद पेड़ से लेकर मैदान तक सबकुछ देखेंगे. फिर भी उन्होंने खानापूर्ति के लिए युधिष्ठिर से पूछा; "युधिष्ठिर, तुमने चिड़िया पर निशाना लगा लिया हो तो बताओ कि तुम्हें क्या-क्या दिखाई दे रहा है?"

युधिष्ठिर बोले; "हे गुरुदेव, मुझे डाल से लटकाई गई चिड़िया दिखाई दे रही है. जिस डोरी से उसे लटकाया गया है, वह डोरी दिखाई दे रही है. पेड़ दिखाई दे रहा है. पेड़ की डालें दिखाई दे रही हैं. पत्ते दिखाई दे रहे हैं. आप दिखाई दे रहे हैं. और हे गुरुदेव, मुझे संसार में चारों तरफ फैला अधर्म दिखाई दे रहा है. अधर्म से पीड़ित धर्म दिखाई दे रहा है. मुझे दुशासन के कान में कुछ कहता दुर्योधन दिखाई...."

गुरु द्रोणाचार्य बोले; "ए बेटा, तुमसे नहीं होगा. तुम एक तरफ खड़े हो जाओ."

उसके बाद उन्होंने भीमसेन को निशाना लगाने के लिए कहा. जब भीम ने निशाना लगा लिया तब उन्होंने उनसे पूछा; "वत्स भीमसेन, तुम्हें क्या-क्या दिखाई दे रहा है?"

भीमसेन बोले; "गुरुदेव मुझे वह सबकुछ दिखाई तो दे ही रहा है जो भ्राताश्री युधिष्ठिर को दिखाई दे रहा था, उसके अलावा मुझे नेट प्रैक्टिस के बाद खाए जानेवाले जलपान दिखाई दे रहे हैं. मुझे बगीचे में आम के पेड़ के नीचे रखे टेबल पर रखा खीर का पात्र और लड्डुओं से भरा परात दिखाई दे रहा है. साथ ही मुझे उस बदमाश दुर्योधन का माथा दिखाई दे रहा है और हे गुरुदेव, इच्छा तो हो रही है कि पहले मैं इस दुर्योधन का माथा फोड़ आऊँ, निशाना वगैरह बाद में लगाउँगा"

भीमसेन की बात सुनकर गुरु द्रोण बोले; "तुम भी अपना धनुष-वाण लेकर हट जाओ और युधिष्ठिर के पास खड़े हो जाओ. तुम्हें मेरी आज्ञा है कि दुर्योधन के पास मत जाना"

भीमसेन जाकर युधिष्ठिर के पास खड़े हो गए.

इसी तरह गुरु द्रोण ने सभी चेलों से एक ही प्रश्न कर और उनके जवाब सुनकर भगा दिया. उन्होंने अंत में अर्जुन को बुलाया. अर्जुन ने धनुष पर वाण रखकर निशाना लगाया. गुरु द्रोण ने उनसे पूछा; "अर्जुन, तुम बताओ कि तुम्हें क्या-क्या दिखाई दे रहा है?"

अर्जुन बोले; "हे गुरुदेव, आपको यह नहीं पूछना चाहिए कि मुझे क्या-क्या दिखाई दे रहा है? आप मात्र यह पूछें कि मुझे क्या दिखाई दे रहा है"

द्रोण बोले; "ऑब्जेक्शन सस्टेंड. अच्छा मैं फिर से प्रश्न करता हूँ; तुम्हें क्या दिखाई दे रहा है?"

अर्जुन बोले; "हे गुरुदेव, मुझे उस चिड़िया की आँख दिखाई दे रही है और आँख के अलावा कुछ दिखाई नहीं दे रहा"

यह सुनकर गुरु द्रोण की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा. उन्होंने अर्जुन को गले से लगा लिया. इस दृश्य को देखकर आकाश में बैठे इंद्र के प्रभारी देवताओं के मन में आया कि तुरंत पुष्पवर्षा कर दी जाय लेकिन वे ऐसा न कर पाये. जल्दी-जल्दी में वे पुष्प लाना भूल गए थे.

खैर, गुरुवर देशबंधु … क्षमा करें, गुरुवर द्रोण ने अर्जुन को गले से लगाया. उन्हें शाबाशी प्रदान की और बोले; "हे पांडुनंदन अर्जुन, मैं आज तुम्हें वचन देता हूँ कि इस संसार में तुमसे बड़ा धनुर्धर कोई नहीं होगा"

उसदिन के लिए नेट प्रैक्टिस खत्म हुई और सारे राजकुमार जलपान पर टूट पड़े.

कुछ दिन बीते. एकदिन सारे राजकुमार पाठशाला में पड़े-पड़े बोर हो रहे थे तो उन्होंने सोचा कि क्यों न जंगल में घूम लिया जाय. घूमने का फैसला कर वे निकल पड़े. अब राजकुमार हैं तो उनके कुत्ते भी होंगे ही. हस्तिनापुर महाराज भरत के जमाने से आगे बढ़ चुका था इसलिए बाघों की जगह अब कुत्तों ने ले ली थी.

तो सारे राजकुमार एक कुत्ता लेकर जंगल भ्रमण पर निकल गए. अपने धर्म का पालन करते हुए कुत्ता राजकुमारों के पीछे-पीछे चल रहा था. कुछ दूर जाने के बाद राजकुमारों पीछे मुड़कर देखा तो कुत्ता उनके साथ नहीं था. अब वे जंगल भ्रमण भूल कुत्ते की खोज में निकल गए. खैर, थोड़ी देर बाद कुत्ता मिला. कुत्ते अक्सर मिल ही जाते हैं.

लेकिन राजकुमारों के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा जब उन्होंने देखा कि कुत्ते के मुँह में सात वाण ठूंस दिए गए हैं और इस तरह ठूंसे गए हैं कि कुत्ते के मुंह में खून भी नहीं लगा था. बाकी राजकुमारों के लिए तो बात आई-गई हो गई लेकिन अर्जुन चिंतित थे. उन्हें तुरंत गुरु द्रोण का वचन याद आया. कुत्ते को लिए वे गुरु द्रोण के पास पहुंचे और छूटते ही प्रणाम कर बोले; "हे गुरुवर, आपने तो वचन दिया था कि मुझसे बड़ा धनुर्धर पूरे संसार में नहीं होगा फिर यह कौन है जिसने वाण चलाकर कुत्ते के मुंह बंद कर दिया? इसका अर्थ यह है कि कोई न कोई है जो मुझसे बड़ा धनुर्धर है"

गुरु द्रोण भी आश्चर्यचकित थे. इतने बड़े धनुर्धर की जानकारी मिलने के बावजूद वे खुश होने की जगह दुखी थे. उन्हें लगा कि उनका वचन तो असत्य साबित हो जाएगा. वे अर्जुन और बाकी राजकुमारों को लिए उस धनुर्धर की खोज में निकल गए जिसके अंदर धनुर्धरी की ऐसा प्रतिभा थी. कुछ दूर चलने के पश्चात उन्हें एक स्थान पर वाण चलकर प्रैक्टिस करता हुआ एक योद्धा मिला. कुत्ते ने भी योद्धा को पहचान लिया और वहीँ रुक गया. सब जान चुके थे कि यही वह धनुर्धर है जिसने कुत्ते की यह दशा की थी.

गुरु द्रोण को देखकर वह धनुर्धर रुक गया. उसने गुरु द्रोण को प्रणाम किया. कुछ ही क्षणों में उन्होंने उसे पहचान लिया. वह एकलव्य था. उसने गुरु द्रोण को सारी बात बताई कि कैसे पाठशाला से वापस किये जाने के बाद उसने गुरु द्रोण की मूर्ति बनाई और उसे ही प्रणाम करके धनुर्विद्या सीखने लगा. उधर वह सारी बात बता रहा था और इधर गुरुवर मन ही मन सोच रहे थे कि वे कैसे अपने वचन की लाज रखें.

अंत में उन्होंने दुविधा और शर्म का त्याग कर एकलव्य से गुरुदक्षिणा में अँगूठा मांग डाला. उनके अपने वचन के आगे एकलव्य की प्रतिभा के लिए कोई स्थान नहीं था.

गुरुदक्षिणा में अंगूठा काटकर देने की उनकी मांग सुनकर एकलव्य जरा भी विचलित नहीं हुआ. उसने कहा; "हे गुरुश्रेष्ठ, मैं गुरुदक्षिणा में आपको अपना अँगूठा देने में जरा भी पीछे नहीं हटूँगा. परंतु हे गुरुदेव, आपसे धनुर्विद्या सीखने चक्कर में मैंने महीनों से स्नान नहीं किया है. अब मैं कोई राजकुमार तो हूँ नहीं, जो विद्या ग्रहण करते समय भी ठाट से रहता. ऐसे में हे गुरुदेव, आपको गुरुदक्षिणा में अंगूठा देने से पहले मैं शुद्ध होना चाहता हूँ. मैं कल स्नान करूँगा और उसके बाद आपको अँगूठा काटकर दे दूँगा. आप मुझे कल सुबह तक का समय दें"

गुरु द्रोण खुश हो गए. वे तो खुश थे ही, धनुर्धर अर्जुन यह सोचकर उनसे भी ज्यादा खुश थे कि संसार के सबसे बड़े धनुर्धर के उनके पद पर अब कोई संकट नहीं था. दोनों वापस पाठशाला आ गए.

दूसरे दिन गुरु द्रोण नींद से जाग, नित्यक्रिया कर एकलव्य की प्रतीक्षा करने लगे. सारे राजकुमार उनके साथ थे. पाण्डु राजकुमार यह सोचकर फूले नहीं समा रहे थे कि गुरुवर द्वारा एकलव्य से अँगूठा लेने के कारण अर्जुन महान बने रहेंगे. वे एकलव्य की प्रतीक्षा कर रहे थे तभी हस्तिनापुर विश्वविद्यालय के उपकुलपति का चारण एक नोटिस लिए उपस्थित हुआ. उसने गुरु द्रोण के हाथ में नोटिस थमा दिया. उन्होंने नोटिस खोला.

यह उपकुलपति की तरफ से एक कारण बताओ नोटिस था जिसमें लिखा था; "एकलव्य नामक छात्र से मिली शिकायत के अनुसार यह प्रकाश में आया है कि आप गुरुदक्षिणा में शिष्यों से उनका अँगूठा कटवा लेते हैं. अगर यह सच है तो आप यह बतायें कि क्यों न उपकुलपति द्वारा आपके पाठशाला को दी गई मान्यता को रद्द कर दिया जाय और आपके ऊपर मानवाधिकार को नष्ट करने का मुकदमा क्यों न चलाया जाय?"

अभी वे यह नोटिस पढ़ ही रहे थे कि अनुसूचित जनजाति आयोग के कार्यालय से एक नोटिस......

परेशान गुरुवर के माथे पर पसीने की बूँदें पड़ने लगी. वे पोछना शुरू ही करने वाले थे कि अचानक नींद से उठकर बैठ गए. देखा तो सामने उनका पुत्र अस्वथामा खड़ा था. उसने गुरु द्रोण पर दृष्टि डाली मानो कोई प्रश्न कर रहा हो.

गुरु द्रोण बोले; "अपराध बोध अब जीवनपर्यन्त साथ नहीं छोड़ेगा पुत्र"

Friday, May 23, 2014

महाभारत के बाद




लड़ाई ख़त्म चुकी थी. कौरव हार चुके थे. पितामह भी धर्मराज युधिष्ठिर को समझा-बुझा कर शासन करने के लिए राजी कर चुके थे. धर्मराज के पास भी राज करने के सिवा और कुछ भी करने के लिए बचा नहीं था. उन्होंने फैसला किया कि खुद को व्यस्त रखने के लिए राज करना जरूरी है. भगवान श्रीकृष्ण भी भविष्य के हस्तिनापुर की नीव कैसी हो, इसपर चिंतन कर रहे थे. अर्जुन गांडीव को धो-पोंछ कर रखने की तैयारी कर रहे थे. बात भी सही थी. जब कोई शत्रु बचा ही नहीं तो फिर गांडीव धो-पोंछ कर रखना ही श्रेयस्कर था. सहदेव भविष्यवाणियां करने में व्यस्त थे. भीम सुबह के नाश्ते के बाद दोपहर के भोजन का मेन्यू और शाम के नाश्ते के बाद रात के भोजन का मेन्यू फाइनल करने में व्यस्त रहने लगे थे. द्रौपदी ने अपने केश बाँधने की तैयारी कर ली थी. हेयर स्टाइलिस्ट उन्हें तरह-तरह के हेयर स्टाइल वाले ब्रॉश्चर दिखाने में व्यस्त थी. माता कुंती अपने व्यस्त पुत्रों को देखकर प्रसन्न होने में व्यस्त थीं.

हस्तिनापुर में तमाम पदों पर बैठनेवाले के नामों की चर्चा चल रही थी. लोग अनुमान लगाने में व्यस्त थे. कौन सा विभाग किसे मिलेगा? कौन हस्तिनापुर में व्यापार मंत्री बनेगा? कौन सेनापति बनेगा? कौन रक्षामंत्री बनेगा? मीडिया व्यस्त. सोशल मीडिया व्यस्त. अखबार व्यस्त. संपादक व्यस्त. महान टीवी चैनलों के महान ऐंकर व्यस्त. चिरकुट चैनलों के चिरकुट ऐंकर व्यस्त. खबरिया टीवी चैनल धर्मराज युधिष्ठिर पर डाक्यूमेंट्री ठेल रहे थे. जिन टीवी चैनलों ने द्रौपदी के चीरहरण के लिए वर्षों तक धर्मराज युधिष्ठिर के द्यूतक्रीड़ा को दोषी माना था, उन्होंने भी उनके बारे में पॉजिटिव बातें ही दिखाने की शपथ ले रखी थी. इन डॉक्यूमेंट्री में लगभग सभी चैनलों ने यह तय कर लिया था कि किसी भी हालत में धर्मराज के जीवन से जुड़े द्यूतक्रीड़ा एपिसोड को नहीं दिखाना है. उन्हें शंका थी कि कहीं लोग यह कहकर हंसी उड़ाना न शुरू कर दें कि; अरे धर्मराज तो जुआ खेलते थे.

तमाम बातों को लेकर लोग चर्चा में व्यस्त थे. जो चर्चा में व्यस्त नहीं थे वे धर्मराज की जय-जयकार में व्यस्त थे. जो जयकार में व्यस्त नहीं थे वे अपना काम करने में व्यस्त थे. जिनके पास कोई काम नहीं था वे धर्मराज को सुझाव देने में व्यस्त थे. जिधर नज़र पड़ती उधर ही व्यस्त लोगों का मजमा दिखाई देता. कुल मिलाकर हस्तिनापुर विकट व्यस्तकाल से गुजर रहा था.

सब तरफ पांडवों के समर्थक ही दिखाई दे रहे थे. कौरवों के समर्थक या तो चुपके से छुट्टियां बिताने अवंती चले गए थे या कन्वर्ट होकर पांडवों के समर्थक पद की शपथ ले चुके थे. पत्रकार चिंतामणि गोस्वामी यह सोचकर व्यस्त थे कि कैसे धर्मराज युधिष्ठिर से एक साक्षात्कार निकाल लिया जाय? अपनी इस इच्छा को फलीभूत होते हुए देखने हेतु वे एकबार नकुल के सारथी से 'सोर्स' भी लगवा चुके थे. उसने पत्रकारश्री को वचन दिया था कि वह नकुल से कहकर उनका यह काम करवा देगा.

इधर धर्मराज युधिष्ठिर पदों पर बैठनेवाले की संभावित सूची को लेकर व्यस्त थे. उन्हें पता था कि कौरवों के वर्षों पुराने कुशासन के कारण हस्तिनापुर एक लाबीस्ट-प्रधान राज्य बन चुका था. एक दिन धर्मराज हस्तिनापुर में भरे जाने वाले पदों के संभावित उम्मीदवारों की सूची देख रहे थे. उन्हें पता था कि किसको कहाँ लगाना है? किसको कौन सा पद देना है. इंद्रप्रस्थ में अपने सुशासन के चलते उन्हें सब पता था कि क्या-क्या करना है. इधर दाहिने हाथ में लेखनी और बाएं हाथ में सूची लिए धर्मराज ने अपना काम शुरू ही किया था कि सेवक संदेश लेकर आया और बोला; "हे महाराज, हे पांडुनंदन धर्मराज युधिष्ठिर, आपसे मिलने प्रजा के कुछ लोग आये हैं"

धर्मराज को लगा कि प्रजा के लोग क्यों आये हैं? अचानक क्या हो गया? उन्होंने अभीतक किसी जनता दरबार लगाने का अनाउंसमेंट भी नहीं करवाया था. खैर, कुछ सोचने के बाद उन्होंने कहा; "ठीक है उन्हें अंदर भेज दो"

सेवक को कुछ याद आया और उसने धर्मराज को जानकारी देते हुए कहा; "परन्तु महाराज, करीब डेढ़ हज़ार लोग आये हैं. सबको अंदर ले तो आऊँ परन्तु वे खड़े कहाँ होंगे?"

धर्मराज ने कुछ सोचकर कहा; "इतने आये हैं? परन्तु क्यों? और सारे क्यों मिलना चाहते हैं?"

सेवक बोला; "ये तो पता नहीं महाराज लेकिन कहा तो यही"

धर्मराज बोले; "तो फिर उनसे कहो कि केवल १०-१५ लोग ही अंदर आएं"

सेवक ने जाकर भीड़ को सूचना दी. बोला; "महाराज को मैंने जानकारी दी. उन्होंने आप में से केवल १०-१५ लोगों को उनसे मिलने की आज्ञा दी है."

अभी उनसे इतना कहा ही था कि भीड़ में से एक युवक चिल्लाया; "मैंने आपसे कहा था कि उन्हें मेरा नाम बताएं. आपने क्या बताया नहीं कि मैं चहचह डॉट कॉम पर उनका फालोवर हूँ? और मुखसर्ग डॉट कॉम पर भी उनका समर्थक हूँ?"

सेवक बोला; "अब यह सब मुझे नहीं पता. उन्होंने तो यही कहा कि १०-१५ लोगों से ज्यादा लोग नहीं जा सकते. आपस में फैसला कर लें कि कौन कौन जाएगा"

उसका इतना कहना था कि बातों का सैलाब आ गया. एकसाथ हज़ारों लोगों ने बोलना शुरू कर दिया. कौन क्या कह रहा था, किसी की समझ में नहीं आ रहा था. कुछ वैसा ही नज़ारा था जैसा पेड़ पर बैठे पक्षियों के झुंड ने नीचे किसी सर्प को देख लिया हो. कोई तर्क दे रहा था तो कोई कुतर्क. सब एकसाथ कुछ न कुछ दे रहे थे. चारों तरफ से तर्क, वितर्क, कुतर्क के वाणों की वर्षा हो रही थी. किसी को पता भी नहीं चल रहा था कि वह क्या कह रहा है? क्या सुन रहा है? क्या कहना चाहता है? क्या सुनना चाहता है?

यह कार्यक्रम देर तक चलने की संभावना को देखते हुए अचानक सेवक चिल्लाया; "अगर इसी क्षण आपसब चुप नहीं हुए तो आपसब को राजमहल के अहाते से बाहर कर दिया जाएगा"

भय बिनु होइ न प्रीति के सिद्धान्त को एकबार फिर से सही पाया गया. सब चुप हो गए. कुछ देर बाद भीड़ ने दस लोगों को जाने दिया. थोड़ी देर में ही दसों धर्मराज युधिष्ठिर के सामने थे. उन्हें देखते ही धर्मराज ने पूछा; "हे, महानुभावों, अपना परिचय दें एवं यहाँ आने का प्रयोजन बताएं."

उनकी बात सुनते ही उनमें से एक अति उत्साहित होकर बोला; "महाराज, पहचाना मुझे? मैं रमाकांत. आपको चहचह डॉट कॉम पर फॉलो करता हूँ"

उसकी बात सुनकर धर्मराज बोले; "रमाकांत! मैंने यह नाम पहले नहीं सुना. अपना पूरा परिचय दें."

वो बोला; "अरे धर्मराज, मैं चहचह डॉट कॉम पर आपका फालोवर. अरे वो @धर्मराजभक्त याद है आपको? वो मेरा ही हैंडल है. अरे वही जिसकी डीपी में त्रिशूल लगा हुआ है. मैं आपकी हर चहचह आर सी करता था. मैंने ही पहली बार #फाइवविलेजेजफॉरपांडव हैसटैग चहचह डॉट कॉम पर ट्रेंड करवाया था. याद है आपको? दुर्योधन का वह फोटोशॉप किया पिक्चर जिसमें आप उसकी छाती पर पाँव रख तलवार घुसाने ही वाले थे, उसे मैंने ही अपनी कारीगरी से बनाया था."

धर्मराज बोले; "मुझे सब याद है लेकिन आपने वहां डी पी में त्रिशूल लगाया है और यहाँ अपना नाम रमाकांत बता रहे हैं तो मैं कैसे पहचानूँगा?"

अभी ये दोनों बात ही कर रहे थे कि एक और समर्थक बोल पड़ा; "और महाराज मुझे पहचाना आपने? मैं वही हूँ जिसने चहचह डॉट कॉम पर अपनी चहचह में दुशासन को गाली दिया था. पाँच सौ आर सी मिला था उसे."

अचानक एक और सामने आया. बोला; "और मैंने जयद्रथ को पूरा सात महीने तक ट्रॉल किया था"

सबने अपना-अपना परिचय दिया। सुनकर धर्मराज बोले; "मुझसे क्या चाहते हैं महानुभावों?"

एक बोला; "महाराज, देखिये आप भी मानेंगे कि कुरुक्षेत्र में युद्ध के दौरान ही नहीं, उससे पहले से ही हमने आपके लिए काम किया. हस्तिनापुर की प्रजा के बीच पूरा समर्थन और माहौल हमने तैयार किया. आप जरूर मानेंगे कि युद्ध में आपकी विजय हमारे कारण ही हुई."

धर्मराज बोले; "हे महानुभावों, मैं मानता हूँ कि आपने हम पांडवों का समर्थन किया परन्तु इसका बार-बार बखान करके मुझे शर्मिंदा न करें. आप भी मानेंगे कि युद्ध जीतने के लिए हमारे साथ तमाम योद्धा लड़े. उन्होंने कुरुक्षेत्र के मैदान में लड़ाई की. तो क्या उनको इसका क्रेडिट नहीं मिलना चाहिए? वैसे आप चाहते क्या हैं?"

समर्थकों में से एक बोला; "हम यह चाहते हैं कि आप हस्तिनापुर में तमाम पदों पर नियुक्ति हमारे अनुसार करें. हम जिसे कहें उसे सेनापति बनायें. जिसे कहें उसे रक्षामंत्री बनाएं. हम जिसे कहें उसे ………

धर्मराज ने उसे बीच में ही टोकते हुए कहा; "हे समर्थकश्री, समर्थन करना एक बात है और राजकाज के कामों में दखल देना सर्वथा दूसरी. युद्ध समाप्त हो चुका है. अब राज-काज करने का समय आ गया है. अब मुझे काम करना है. अब पदों पर नियुक्ति का काम मुझे करने दें क्योंकि अगर राजकाज ठीक से नहीं चला तो बेइज्जती मेरी होगी, आपकी नहीं. सत्य तो यह है कि केशव भी पदों पर नियुक्ति के मुद्दे पर मुझे कुछ नहीं कह रहे. आपको समझना चाहिए कि ............."

अचानक सब चुप हो गए. कुछ ही मिनटों में समर्थकगण वहां से छंटने. जाते-जाते एक बोल गया; "चलो यहाँ से. सब ऐसे ही होते हैं. जब जरूरत थी तो समर्थन ले लिया और आज कह रहे हैं..........राजकाज चलाने दो, इन्हें भी देख लेंगे जैसे कौरवों को देखा"

Saturday, August 11, 2012

भरत और बाघ...कालिया मर्दन




भरत और बाघ


ऋषि दुर्वाशा के शाप का यह असर हुआ कि महराज दुष्यंत ने शकुंतला को पहचानने की जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया. नदी में अंगूठी गिरने के कारण देवी शकुंतला की स्थिति और दयनीय हो गई थी. वे एकबार फिर से महराज को याद नहीं दिला सकीं कि कैसे दोनों ने ऋषि कन्व के आश्रम में गन्धर्व विवाह किया था. कुल मिलाकर जब मामला हाथ से निकल गया सा प्रतीत हुआ तो देवी शकुंतला को वापस लौटना पड़ा. वे पहले की तरह ही ऋषि के आश्रम में रहने लगी. उनका पुत्र भरत अब बड़ा होने लगा था.

अब उसकी उम्र खेल-कूद की हो गई थी इसलिए उसने खेल-कूद शुरू कर दिया था.

उधर एक दिन रोज-रोज के राजकीय झमेलों से त्रस्त महराज दुष्यंत फिर से आखेट के लिए अपनी सेना लेकर निकले. उनको उन्ही जंगलों से गुजरना था जिसमें देवी शकुंतला अपने पुत्र के साथ रहती थीं. उन्हें पता था कि इसी जंगल में उनका मिलन अपने पुत्र भरत से होगा. वे जब जंगल में पहुंचे तो उन्होंने ने देखा कि बालक भरत तो है लेकिन इस बार वह बाघों के साथ नहीं खेल रहा. इसबार वह गिलहरियों के साथ खेल रहा था और उन गिलहरियों के दांत गिन रहा था.

महराज को बहुत क्रोध आया. उन्होंने वहीँ से पुकारा; "शकुंतले..शकुंतले."

महाराज की पुकार सुन देवी शकुंतला ने उन्हें पहचान लिया. वे प्रसन्न होकर दौड़ती हुई आईं. उन्हें देखते ही दुष्यंत ने प्रश्न किया; "यह क्या शकुंतले? हमारा पुत्र भरत, जिसे बाघों के साथ खेलना चाहिए था, जिसे बाघों के दांत गिनने चाहिए थे वह गिलहरियों के साथ खेल रहा है और उनके दांत गिन रहा है? ऐसा अनर्थ क्योंकर भला?"

देवी शकुंतला ने धैर्य के साथ कहा; "हे आर्यपुत्र, वैसे तो आप राजा हैं परन्तु आपको अपने ही राज्य के बारे में कुछ नहीं पता. तो हे आर्यपुत्र आप जानना ही चाहते हैं कि ऐसा अनर्थ क्यों हुआ तो सुनिए. जब हमारा पुत्र एक वर्ष का हुआ उसी समय आपके राज्य में बाघों की संख्या घटकर एक हज़ार चार सौ ग्यारह रह गई थी. उनमें से केवल दो बाघ इस जंगल में रहते थे. जबतक वे थे, तबतक तो पुत्र भरत उनके साथ खेलता था. उन्ही के दांत गिनता था. परन्तु जबतक वह चार वर्ष का हुआ, ये दो बाघ भी शिकारियों ने मार दिए. ऐसे में अब यह गिलहरियों के दांत नहीं गिनेगा तो क्या पक्षियों के दांत गिनेगा?"

महराज दुष्यंत अपने राज्य में हुए बाघों के इस संहार के बारे में कुछ नहीं कह सके. वे अपने सेनापति के साथ यह विमर्श करने लगे कि ऐसा क्या किया जाय कि उनके राज्य में फिर से बाघ दिखाई देने लगें.

कालिया मर्दन


कालिया मर्दन का समय आ गया था. श्रीकृष्ण कई दिनों से सोच रहे थे कि उन्हें एक दिन कालिया मर्दन करके "यदा यदा ही धर्मस्य....." को फिर से सिद्ध करना है. उन्होंने मैया यशोदा से गेंद बनवाई और एक दिन अपने सखाओं के साथ यमुना किनारे चल दिए. उन्हें पता था कि सखाओं के साथ गेंद खेलनी है और किसी बहाने उसे यमुना में डालना है जिससे उन्हें यमुना में घुसकर कालिया मर्दन का अवसर मिले. वे गेंद खेलने लगे. कुछ देर बाद उन्होंने गेंद को यमुना में फेंक डाला. सारे उपक्रम करके वे यमुना में घुस गए.

उन्होंने डुबकी तो लगाईं परन्तु इसबार उन्हें कालिया नाग कहीं दिखाई न दिया. बहुत प्रयास के बाद भी जब उन्हें वह नहीं मिला तो उन्हें यह चिंता होने लगी कि कहीं कालिया किसी और नाग का शिकार तो नहीं हो गया? उन्होंने यमुना की तलहटी से ही आवाज़ लगाईं; "कालिया... कालिया..."

उनकी पुकार की प्रतिध्वनि पाताललोक तक जाने लगी. प्रतिध्वनि श्रीकृष्ण के मित्रों तक भी पहुंची जिन्हें एकसाथ कई बार सुनाई दिया; "कालिया..कालिया...कालिया...कालिया..या.. या "

श्रीकृष्ण के मित्र भी चिंतित हो उठे. उन्हें इस बात का भय नहीं था कि कालिया श्रीकृष्ण पर आक्रमण कर देगा. उन्हें पता था कि उनका कान्हा कालिया को काबू कर लेगा और कुछ देर बाद ही उसके फन पर खड़ा हो मुरली बजाते हुए प्रकट होगा. बाद में कालिया नाग कान्हा से अपने जीवन की भीख मांगेगा और कान्हा उसे जीवनदान देकर वहाँ से विदा करेंगे. परन्तु ऐसा नहीं हुआ.

उधर कालिया नाग की खोज में श्रीकृष्ण नागलोक तक पहुँच गए. वहाँ उन्हें कालिया मिला. उसने श्रीकृष्ण को प्रणाम किया. श्रीकृष्ण ने उससे पूछा; "यह क्या कालिया? आजकल तुम यमुना में नहीं रहते? यमुना छोड़कर नागलोक में आ बसे हो? मैंने तो सोचा था कि आज मैं तुम्हारा मर्दन कर अपने उस धर्म का पालन करूँगा जिसके लिए मैंने अवतार लिया है."

श्रीकृष्ण की बात सुनकर कालिया दुखी मन से बोला; "हे कान्हा, आप तो अन्तर्यामी हैं. आप ही बताइए कि मैं एक तुच्छ नाग, यमुना में कैसे रहूं? उस यमुना में जिसमें अब जल नहीं बल्कि हरियाणा, दिल्ली और आगरा की गन्दगी भरी हुई है? हे कान्हा, आप तो यमुना में कूद गए क्योंकि आप भगवान हैं लेकिन मैं कैसे रहता जब वहाँ रहने से मुझे मेरी मृत्यु साफ़ दिखाई दे रही थी? अब तो यमुना में भरे रसायनों और विष के कारण मेरा अपना विष भी जाता रहा. जब मुझे प्रतीत हुआ कि अब वहाँ रहना मेरी मृत्यु का कारण बन सकता है तो मैंने यहाँ नागलोक में शरण ले ली."

श्रीकृष्ण की समझ में नहीं आ रहा था कि वे कालिया से क्या कहें? कुछ ही देर में मित्रों के साथ अपने घर की ओर चले जा रहे थे.

Wednesday, July 25, 2012

श्री राम और पांडवों का वनवास - दो नव-कथाएँ




भगवान श्री राम का वनवास.

वनवास के दौरान श्री राम अनुज लक्ष्मण और सीता जी के साथ गंगा किनारे खड़े हैं. वे आज ही गंगापार करके आगे बढ़ जाना चाहते हैं. घाट पर केवट जी की नाव पानी में लंगर के सहारे खड़ी हुई है. नाव के मालिक केवट जी भी खड़े हैं. सीता जी के माथे पर चिंता की लकीरें हैं. लक्ष्मण जी कुछ नाराज़ टाइप लग रहे हैं. श्री राम ने समर्पण वाली मुद्रा इख्तियार कर ली है. कुल मिलाकर बड़ी टेंशन वाली स्थिति बन गई है.

हुआ ऐसा कि गंगा पार कर लेने की इच्छा लिए जब श्री राम, श्री लक्ष्मण और सीता जी घाट पर पहुंची तब नाव बंधी थी लेकिन केवट जी वहाँ नहीं थे. घाट तक पहुँचने से पहले तीनों ने मन ही मन कितना कुछ सोच रखा था. तीनों को इस बात का विश्वास था कि वहाँ पहुँचते ही केवट जी न केवल उनका स्वागत करेंगे बल्कि पूरे परिवार के साथ उपस्थित रहेंगे. रास्ते की थकान दूर करने के लिए वे तीनों के पाँव धोयेंगे और घर से आया बढ़िया शरबत पिलायेंगे. परन्तु घाट पर पहुँचने के बाद तीनो को उस समय बहुत आश्चर्य हुआ जब उन्होंने देखा कि नाव अकेली खड़ी है और केवट जी गायब है. पास ही कुछ बच्चे क्रिकेट खेल रहे थे. श्री राम ने उनमें से एक को यह कहकर भेजा कि वह केवट जी को उनके घर से बुला लाये.

केवट जी आये. उन्होंने श्री राम का अभिवादन किया. रामचन्द्र जी ने उन्हें बताया कि वे लक्ष्मण और सीता जी के साथ उसी समय पार जाना चाहते हैं. यह कहकर जैसे ही उन्होंने नाव की तरफ कदम बढ़ाया केवट जी ने उन्हें रोक दिया. भगवान राम को लगा कि शायद केवट जी इस बात से डर गए हैं कि नाव पर पाँव रखते ही नाव कहीं पत्थर की न हो जाए. उन्होंने केवट जी से कहा; "डरो मत भाई. कुछ नहीं होगा. मेरे छूने से यह नाव पत्थर की नहीं होगी. क्या तुम पिछली बात भूल गए जब तुमने हम तीनों को पार उतारा था? क्या पिछली बार तुम्हारी नाव पत्थर की हुई थी?"

यह सुनकर केवट जी बोले; "प्रभु यह तो हमें पता है. पिछली बार हम अवश्य डर गए थे लेकिन इस बार डरने का कोई कारण नहीं है. मेरे पुत्र ने विकिपीडिया पढ़कर हमें बता दिया है कि पिछली बार मेरे अन्दर फालतू का डर समा गया था."

भगवान राम बोले; "फिर तुम मुझे नाव पर पाँव रखने से क्यों रोक रहे हो अनुज?"

उनकी बात सुनकर केवट जी ने सिर लटका कर कहा; "प्रभु, हम आपको पार तो उतार देते लेकिन समस्या यह है कि अब हम नाव खेने का काम नहीं करते. गंगा में खड़ी यह नाव जो आप देख रहे हैं यह तो हमने इसलिए खड़ी कर रखी है ताकि कोई इसे खरीद ले. आपने शायद इसपर लगा फॉर सेल का बोर्ड नहीं देखा."

भगवान राम ने पूछा; "नाव खेने का काम नहीं करते? तो फिर तुम नाविकों की रोजी-रोटी कैसे चलती है?"

केवट जी ने भगवान राम की तरफ देखते हुए कहा; "शायद प्रभु को मनरेगा के बारे में नहीं पता. हे भगवन, जब बिना मेहनत किये हमें मजदूरी मिल जाय तो फिर कोई बेवकूफ ही होगा जो मेहनत करके नाव चलाए और लोगों को पार उतारे."

यह कहकर केवट जी चलते बने. भगवान राम ने लक्ष्मण जी से बात की और तीनों ने तय किया कि वे पैदल चलकर लॉर्ड कर्जन पुल से गंगा पार कर लेंगे ताकि शिवकुटी पहुँचा जा सके.

पांडवों का वनवास

वन में चलते-चलते पांडव थक चुके थे. थकते भी न कैसे? पेड़ों के कट जाने से वन में ऑकसीजन की कमी हो गई थी. इस वन में फैले पल्यूशन को लेकर अदालत की ग्रीनबेंच कई मुक़दमे देख रही थी. सभी भाइयों को प्यास लग चुकी थी. कहीं आस-पास पानी दिखाई नहीं दे रहा था. कारण यह भी था कि मनरेगा से तालाबों का जो ब्यूटिफिकेशन हुआ था उसकी वजह से बरसात का पानी तालाब तक पहुचने से मना कर देता था. इलाके के कुँए भी सूख चुके थे. यह बात और थी कि वन के रास्ते में भी उन्हें जग-प्रसिद्द विदेशी कोला धोखा कोला की कई होर्डिंग्स दिखाई दी थीं. पूरे राष्ट्र का यही हाल था. पीने का स्वच्छ पानी कहीं मिले या न मिले, धोखा कोला हर जगह मिलता था. गाँवों और जंगलों में भी धोखा कोला की दूकाने खुल गईं थीं. देखकर लगता था जैसे लोग़ स्नान वगैरह के लिए भी कोला का ही उपयोग करते थे.

जब उन्हें लगा कि और आगे जाना मुश्किल है, तब सारे भाई एक जगह बैठ गए. प्यास इतनी कि कुछ बोल भी नहीं पा रहे थे. मन में आया कि किसी दूकान से धोखा कोला खरीद कर ही पी लें लेकिन माताश्री का डर था कि शायद वे नाराज़ न हो जायें. बैठे-बैठे वे कुछ सोच रहे थे तभी नकुल युधिष्ठिर से बोले; "भ्राताश्री, सोचने से तो प्यास और बढ़ती जा रही है. हम जैसे-जैसे सोचते जा रहे हैं, शरीर से पसीना और भी बह रहा है. मैं जाकर किसी तालाब पर अपनी प्यास बुझाता हूँ और आपसब के लिए भी पानी ले आता हूँ."

इतना कहकर नकुल वहाँ से चल दिए. करीब एक किलोमीटर पैदल चलकर वे एक तालाब के किनारे पहुंचे. तालाब देखकर उन्हें बड़ी ख़ुशी हुई. अभी उन्होंने तालाब से पानी लेने के लिए अंजुली आगे की ही थी कि पब्लिक एड्रेस सिस्टम पर अनाउन्समेंट हुआ; "सावधान नकुल, तुम्हें इस तालाब से पानी पीने का अधिकार नहीं है."

अपने पिछले अनुभव से नकुल को पता था कि तालाब यक्ष का है सो यक्ष प्रश्न करेगा ही. वे पूरी तैयारी के साथ आये थे. यक्ष द्वारा पिछली बार किये गए प्रश्नों का उत्तर तो उन्होंने रट ही लिया था, साथ ही उपकार गाइड पढ़कर और ढेर सारे प्रश्नों का उत्तर रटकर पूरी तैयारी कर ली थी. आवाज़ सुनते ही उनका मन एक साथ सारे प्रश्न और उनके उत्तरों पर कुछ ही क्षणों में घूम-फिर कर वापस आ गया. नकुल जी भी इस बात से अस्योर्ड हुए कि मन सबसे तेज भागता है. इतना तेज कि कुछ ही क्षणों में हजारों प्रश्न और उनके उत्तरों पर घूम-फिर ले.

उन्होंने अपना हाथ तालाब के पानी के पास से खींचते हुए कहा; "प्रणाम यक्ष. मुझे पता था कि तालाब से जल लेने से पहले आप मुझसे प्रश्न करेंगे. पूछिए प्रश्न. मैं इसबार पूरी तैयारी के साथ आया हूँ."

नकुल की बात सुनकर पब्लिक एड्रेस सिस्टम से फिर आवाज़ आई; "हे युधिष्ठिर के अनुज नकुल, शायद आपको पता नहीं कि अब यह तालाब यक्ष का नहीं रहा. हमारी कंपनी धोखा कोला ने अब यह तालाब यक्ष से खरीद लिया है. कहने का तात्पर्य यह है कि अब इस तालाब के पानी का कार्पोरेटाईजेशन हो चुका है. वैसे तो इस तालाब के पानी का उपयोग अब केवल कोला बनाने के लिए होता है लेकिन फिर भी चूंकि आप थके और प्यासे हैं और साथ ही आप धर्मराज युधिष्ठिर के अनुज भी हैं, इसलिए हम आपको इसका पानी दे सकते हैं. शर्त केवल एक ही है कि आपको एक लीटर पानी के लिए पंद्रह स्वर्ण मुद्राएं देनी पड़ेंगी."

नकुल के टेंट में इस समय स्वर्ण मुद्राएं कहाँ से आती? उन्हें लगा कि अगर मुद्रा न रहने के कारण उन्हें पानी न मिला तो वे प्यासे मार जायेंगे. उन्होंने कंपनी के कर्मचारी की बात को अनसुना करके तालाब से पानी लेने के लिए हाथ बढ़ाया ही था कि पीछे से दो सिक्यूरिटी गार्ड्स ने उन्हें पकड़ लिया. दोनों ने मिलकर नकुल जी के हाथ में हथकड़ी पहना दी और उन्हें लेकर वहीँ बने धोखा कोला कंपनी के तालाब रक्षा केंद्र में चले गए.

इधर जब बहुत देर तक नकुल नहीं लौटे तब बारी-बारी से सहदेव, भीम और अर्जुन भी तालाब के किनारे गए और जबरदस्ती पानी लेने के आरोप में अरेस्ट कर लिए गए. सबसे अंत में धर्मराज युधिष्ठिर ने माताश्री को प्रणाम किया और अपने चारों भाइयों की खोज में निकले.

वे जब तालाब के किनारे पहुंचे तो उनके अन्दर उनका कांफिडेंस कुलांचें मार रहा था. आखिर प्रश्नों का उत्तर जानने के लिए उन्हें तो उपकार गाइड भी रटने की ज़रुरत नहीं थी. अपना कांफिडेंस लिए वे तालाब के किनारे पहुंचे और बोले; "यक्ष जी को पांडु नंदन युधिष्ठिर का प्रणाम पहुंचे. मैं आपके सारे प्रश्नों का उत्तर देने को तैयार हूँ परन्तु मुझे अपने मृत भाई कहीं दिखाई नहीं दे रहे. आप उन्हें हमारे सामने प्रस्तुत करें और अपने प्रश्नों के उत्तर लेकर उन्हें फिर से जीवन देने की फॉरमेलिटी पूरी करें ताकि मैं जल पी सकूँ, उन्हें भी पिला सकूँ और माताश्री के लिए भी ले जा सकूँ."

धर्मराज युधिष्ठिर की बात सुनकर एक सिक्यूरिटी गार्ड ने उन्हें सारी बातें बताई कि कैसे उनके सभी भाई अरेस्ट हो चुके हैं और यह कि बिना मुद्रा दिए उस तालाब से पानी लेना कानूनन जुर्म है. धर्मराज वहाँ से चल दिए. किसी वकील की तलाश में ताकि भाइयों की बेल करवाई जा सके.

Friday, May 11, 2012

द्वापर युग का एक टीवी पैनल डिस्कशन




दो-तीन दिन पहले महाभारत से युधिष्ठिर के राजसूय-यज्ञ का प्रसंग पढ़ रहा था. राजसूय-यज्ञ के समय हुए शिशुपाल वध की बात भी पढ़ी. श्रीकृष्ण पूजन पर शिशुपाल के ऑब्जेक्शन से इन्द्रप्रस्थ की सभा में धर्म की व्याख्या वगैरह पढ़ी गई. तर्कों के तीर चले. उन तीरों को काटने के लिए नए तर्क गढ़े गए. फिर उधर से तर्क-तीर चले. फिर इधर से उनको काटा गया. तर्क वगैरह काटने के बाद काटने के लिए एक ही चीज बची थी. शिशुपाल की गर्दन. ऐसे में श्रीकृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र को भेजकर शिशुपाल जी की गर्दन काटकर उनको यमपुरी भेज दिया. देवताओं ने उप्पर से पुष्पवर्षा की. धर्मराज युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ की समाप्ति हुई.

मन में आया कि वहाँ जो कुछ हुआ क्यों उसको बड़ी सहजता से स्वीकार कर लिया गया? वैसे देखा जाय तो और कर भी क्या सकते थे लोग़? उन दिनों टीवी चैनल भी तो नहीं थे कि पैनल डिस्कशन होते. रपट निकलती. विशेषज्ञ बैठते और बाल की खाल निकालते. ऐसा करने से शिशुपाल जी का मामला आराम से दस-बारह सालों तक चलता. इन्वेस्टिगेशन होता. एस आई टी जांच करती. उसकी रपट लीक होती. मानवाधिकार कार्यकर्त्ता नारे लगाते. मानवाधिकार नेता टीवी पर दलीलें देते. दूसरों की बात न सुनते. कैंडिल मार्च होता. शिशुपाल के लिए न्याय की मांग होती.

कुल मिलाकर बड़ी बमचक मचती.

शायद कुछ ऐसे;



न्यूज-आवर पर अरनब गोस्वामी जी आ चुके हैं. आते ही शुरू हो गए; "गुड़ इवेनिंग. इन अ बिजार टर्न ऑफ इवेंट, परसों करीब १० बजे सुबह श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर के इन्द्रप्रस्थ की एक भरी सभा में महाराज शिशुपाल का क़त्ल कर दिया. उस शिशुपाल का जो राजा तो थे ही, श्रीकृष्ण के फूफा भी थे. सभा में शिशुपाल के जो दोस्त थे उन्होंने इसका विरोध किया लेकिन उनकी आवाज़ को दबा दिया गया. सवाल यह है कि इस देश में अब रूल ऑफ धर्मा है कि नहीं? तमाम तरह के अलग-अलग दावे किये जा रहे हैं. एक तरफ चेदिप्रदेश के मानवाधिकार कार्यकर्त्ता चाहते हैं कि इस मामले की पूरी छानबीन हो. वहीँ उनकी बात नहीं सुनी जा रही है. ऐसे में द नेशन वांट्स टू नो द ट्रुथ. सच क्या है यह देश जानना चाहता है. और इसके लिए वी हैव अ फुल पैनल टूनाईट ऑन न्यूज-आवर. हमारे साथ हैं हस्तिनापुर से कृपाचार्य टू इन्टरप्रेट धर्मा. हस्तिनापुर से ही हमारे साथ हैं महामंत्री विदुर. वी आल्सो वांटेड श्रीकृष्ण टू कम एंड ..लेकिन वे नहीं आये. इसलिए हमारे साथ हैं बलराम. उधर चेदिप्रदेश से हमारे साथ हैं नरोत्तम कलसखा जो ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट हैं और जो चाहते हैं कि शिशुपाल के मर्डर की जांच एस आई टी करे. इन्द्रप्रस्थ से हमारे साथ है सहदेव. और हमारे स्टूडियो में मेरे साथ है बरिष्ठ पत्रकार आशुतोष. विदुर जी, मैं आपसे शुरू करना चाहता हूँ. क्या हुआ यह? भरी सभा में किसी को क़त्ल कर देना कहाँ तक जायज़ है?"

विदुर; "देखें ऐंकर श्री, पहले तो मैं आपको बता दूँ कि शिशुपाल श्रीकृष्ण के फूफा नहीं बल्कि उनके फूफेरे भाई थे. अब आप के सवाल पर आता हूँ. देखें, जिसे आप क़त्ल कह रहे हैं दरअसल वह क़त्ल नहीं है. उसे वध कहते हैं. धर्मनीति के अनुसार क़त्ल और वध में अंतर होता है."

अरनब; "लेकिन विदुर जी, एंड रिजल्ट तो दोनों का एक ही है न. आप उसको कोई भी वर्ड दे दें लेकिन दोनों का रिजल्ट यह है कि एक आदमी मारा जाता है."

विदुर; "ऐंकर श्री, पहले आप मेरी बात पूरी तो होने दें. देखें, किसी के अपराध की सज़ा के रूप में अगर किसी को मारा जाता है तो उसे वध....

नरोत्तम कालसखा; "आप ये बताएं..आप ये बताएं.."

अरनब; "ओके ओके. नरोत्तम जी वांट्स टू री-बट यू विदुर जी. मैं नरोत्तम जी के पास जाता हूँ. नरोत्तम जी, यह बताएं कि विदुर जो कह रहे हैं आप उससे सहमत हैं?"

नरोत्तम कालसखा; "बिलकुल नहीं. ये सो-काल्ड धर्म के जानकर केवल शब्दों से खेलते हैं. ये आज विदुर जी हस्तिनापुर में बैठकर धर्म सिखा रहे हैं लेकिन मैं आपको बता दूँ कि ये इनकी शब्दों की जादूगरी के अलावा और कुछ नहीं है. मैं पूछता हूँ कि केवल अपमान करने से किसी कि हत्या कर देना कौन सा धर्म है?"

अरनब; "विदुर जी, जवाब दें. नरोत्तम जी का कहना है कि केवल अपमान के बदले किसी का मर्डर कर देना कौन सा धर्म है?"

विदुर; "देखें, आप मुझे अपनी बात पूरी करने देंगे तब तो मैं कुछ कहूँगा. देखें, यह अपमान के एवज में हत्या का मामला नहीं है. असल मामला अधर्मी को दण्डित करने का है. बात केवल यह नहीं है कि शिशुपाल ने श्रीकृष्ण का अपमान किया. बात यह भी है कि शिशुपाल अपने इलाके में राजाओं से युद्ध, प्रजा को अशांति और ऋषि-मुनियों को वर्षों से सताता रहा है. यह केवल श्रीकृष्ण के अपमान का मामला नहीं है. यह धर्म और अधर्म का युद्ध...

नरोत्तम कालसखा; "विदुर जी, आज आपको धर्म याद आ रहा है. धर्म तो यह भी कहता है कि स्त्री की हत्या नहीं करनी चाहिए. अगर ऐसा ही है तब श्रीकृष्ण ने पूतना की हत्या क्यों की? उस समय धर्म का विचार उनके मन में क्यों नहीं आया? उनके मन में क्यों नहीं आया कि स्त्री की हत्या धर्म के विरुद्ध है?"

विदुर ; "देखें, पूतना एक राक्षसी थी. और वासुदेव कृष्ण ने उसकी हत्या नहीं बल्कि उसका भी वध ही किया था. वह श्रीकृष्ण को मारने के लिए गई थी. धर्म यह कहता है कि कोई भी अपने जीवन को बचाने के लिए किसी का भी वध कर सकता है."

नरोत्तम कालसखा; "मैं माननीय विदुर जी से पूछना चाहता हूँ कि हो सकता है पूतना हत्या करने के इरादे से गई होगी लेकिन उसने हत्या तो नहीं की न श्रीकृष्ण की. ऐसे में उसकी हत्या कर देना तो अक्षम्य हुआ."

विदुर; "तो कालसखा जी, आप क्या चाहते हैं कि पूतना पहले श्रीकृष्ण को मार देती क्या तभी उसका वध किया जा सकता था?"

नरोत्तम कालसखा; "मैं कहता हूँ कि क्या सबूत है कि पूतना श्रीकृष्ण की हत्या के इरादे से ही गई थी? श्रीकृष्ण ने कह दिया और आप मान गए? और फिर एक बात बताएं, क्या आप नहीं मानते कि हत्याऑं के मामले में श्रीकृष्ण का रिकार्ड ही खराब है. पूतना को तो जाने दें, श्रीकृष्ण ने उसे भी मार डाला जो उनका खुद का मामा था. महाराज कंस. आज शिशुपाल जी की हत्या कर दी जो खुद उनका फूफेरा भाई था. बचपन में ही इन्ही श्रीकृष्ण ने बकासुर की हत्या कर दी थी. वृषभासुर को मार डाला. मैं पूछता हूँ बचपन से ही केवल हत्याएं करना कौन से धर्म का है?"

विदुर; "नरोत्तम जी, पहले आप की जानकारी के लिए बता दूँ कि राक्षसों और अपराधियों को मारना...."

अरनब; "ओके ओके..मैं आशुतोष की तरफ आता हूँ. टेल मी आशुतोष, ये जो भरी सभा में हत्या हुई है, इसके बाद आप इस मामले को कहाँ जाता हुआ देखते हैं?"

आशुतोष; "अर्नब, यह मामला उतना सीधा नहीं है जितना दिखाई देता है. जहाँ तक मेरी जानकारी है, श्रीकृष्ण का इस तरह से रिएक्ट करना शायद ठीक नहीं था. और मैं एक बात और बता दूँ अर्नब. पहले यह बात सुनाई दी कि इन्द्रप्रस्थ की सभा में ही शिशुपाल ने श्रीकृष्ण का सौवीं बार अपमान किया लेकिन मेरी जानकारी के मुताबिक यह शिशुपाल द्वारा श्रीकृष्ण का सौवां अपमान नहीं था. मैंने इस केस को बहुत नजदीक से फालो किया है और मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि इस केस में ऐसे-ऐसे तथ्य सामने आ सकते हैं जो उन सभी बातों से भिन्न होंगे जो बातें अभी तक पब्लिक डोमेन में हैं."

अरनब; "जैसे? क्या खुलासा हो सकता है इस केस में?"

आशुतोष ; "जो मैंने खोजबीन की उससे तो बड़ी हैरत में डाल देने वाली बातें आई हैं सामने. जैसे मैंने अपमानों का रिकार्ड रखने वाले श्रीकृष्ण के कर्मचारी से भी बात की. उसका मानना है कि अपमानों का रिकार्ड रखने में गलती भी हो सकती है. ऐसा भी हो सकता है कि कोई अपमान दो बार रिकार्ड हो गए हों. या ऐसा भी हो सकता है कि कोई २-३ अपमान दो बार रिकार्ड हो गए हों. वैसे अर्नब, मैंने उडती खबर यह भी सुनी है कि अपमानो के रजिस्टर में कुछ उलट-फेर भी हुआ है. अब पता नहीं यह बात कितनी सच है लेकिन सवाल तो अपनी जगह है. और अर्नब, मैंने इस केस को जिस तरह से फालो किया है.."

विदुर; "ये तो अभी परसों की घटना है पत्रकार श्री. दो दिन में कितना फालो कर लिया आपने?

अरनब; "ओके ओके..लेट मी गो टू बलराम..बलराम जी, यह बताइए कि क्या यह सच है कि अपमानों के रजिस्टर में हेर-फेर हुई है. ऐसी बात सुनाई दे रही है कि ऐसा हुआ है. आप क्या कहना चाहते हैं?"

बलराम; "देखिये, ऐसी बात बिलकुल नहीं है. अपमानों का रजिस्टर कभी भी कोई भी आकर देख सकता है. हम कुछ छिपा नहीं रहे. रही बात..."

नरोत्तम कालसखा; "लेकिन...लेकिन..."

अरनब; "ओके, नरोत्तम जी वांट्स टू री-बट यू. गो अहेड नरोत्तम जी."

नरोत्तम कालसखा; "बलराम जी, ये बताइए कि क्या सबूत है कि श्रीकृष्ण ने अपनी बुआ को शिशुपाल जी महराज के केवल सौ अपमानों को क्षमा करने का वचन दिया था? हो सकता है उन्होंने सवा सौ अपमानों को क्षमा करने का वचन दिया हो. या हो सकता है कि एक सौ चालीस अपमानों को क्षमा करने का वचन दिया हो. कोई सबूत है किसी के पास कि उन्होंने सौ अपमानों की ही बात की थी?"

बलराम; "नरोत्तम जी, जब श्रीकृष्ण ने बुआ को वचन दिया था मैं वहीँ पर था. और मैं आपको सच बताता हूँ कि उसने सौवें अपमान के बाद ही मारने का वचन दिया था. अगर आपको मेरी बात का विश्वास न हो तो बुआ से पूछ सकते हैं."

नरोत्तम कालसखा; "देखिये बलराम जी मुझे आपकी बात का विश्वास क्यों हो? आप तो श्रीकृष्ण के भाई हैं. और रही बात बुआ से पूछने की तो क्या गारंटी है कि आप, श्रीकृष्ण और धर्मराज युधिष्ठिर बुआ जी पर दबाव डाल के उनसे नहीं कहलवा देंगे कि श्रीकृष्ण ने केवल सौ अपमानों को क्षमा करने की बात कही थी?"

बलराम; "अब देखिये वैसे तो आपको हमारी किसी बात का विश्वास नहीं होगा लेकिन मेरा कहना यही है कि तथ्यों को जाने बिना...."

अरनब; "ओके लेट मी गोबैक तो आशुतोष. आशुतोष ये बताइए कि अब क्या देखते हैं इस केस में? अब जबकि मीडिया ने इस केस को अपने हाथ में ले लिया है?"

आशुतोष; "अर्नब, ये नरोत्तम जी का प्वाइंट महत्वपूर्ण है. मेरी बात एक सैनिक से हुई जिसने ये बताया कि जब श्रीकृष्ण ने अपनी बुआ को महाराज शिशुपाल के अपमानों को क्षमा कर देने की बात कही थी तो वह वहीँ पर था. और आपको हैरत होगी कि उसने बताया कि श्रीकृष्ण ने एक सौ पचहत्तर अपमानों को क्षमा करने का वचन दिया था. अब इसमें कितना सही है और कितना गलत यह कह पाना मेरे लिए मुश्किल है लेकिन उस सैनिक ने मुझे यही बताया. और एक बात अर्नब. अब जिस तरह से सबूत एक-एक करके सामने आने लगे हैं उससे तो यही लगता है कि यह मामला बड़ा पेंचीदा होता जा रहा है. कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि यह क्लीयर नहीं है कि श्रीकृष्ण ने एक सौ अपमान होते ही महाराज शिशुपाल को मारना की बात कही थी या फिर एक सौ अपमान होने तक क्षमा कर देते और एक सौ एकवा अपमान होने के बाद मारते. यह बात कम महत्वपूर्ण नहीं है. और मेरा ऐसा मानना है..."

अरनब; "ओके ज्वाइनिंग मी नाऊ...अब हमें ज्वाइन कर रहे हैं हस्तिनापुर से आचार्य शकुनी. शकुनी जी, हमें ये बताएं...."

विदुर ; "ऐंकर श्री, महाराज शकुनी आचार्य नहीं हैं. आपको कम से कम इतनी जानकारी तो रहनी ही चाहिए. शकुनी गांधार नरेश हैं और पिछले कई वर्षों से अपनी बहन के घर बैठकर मुफ्त की रोटियां तोड़ रहे हैं."

अरनब; "सॉरी सॉरी..विदुर जी. चलिए गंधार नरेश शकुनी ही सही. शकुनी जी, हमें ये बताएं कि ये इन्द्रप्रस्थ में जो महाराज शिशुपाल की हत्या का मामला हुआ है, इसके बारे में आप क्या सोचते हैं?"

शकुनी; "यह तो बहुत ही क्रूर हत्या का मामला है भांजे अरनब. क्षमा करो, मैंने तुम्हें भी भांजा कह डाला. एक सौ भांजो से दिन-रात मामा-मामा सुनते-सुनते आदत ख़राब हो गई है. हाल यह है कि एक दिन मेरे मुँह से जीजाश्री के लिए भी भांजे धृतराष्ट्र निकल आया था... हाँ तो मैं यह कह रहा था कि यह तो वासुदेव कृष्ण द्वारा क्रूर हत्या का मामला है. ऐसे में मैंने और भांजे दुर्योधन ने यह निर्णय लिया है कि कुछ ही दिनों में काशीनरेश के दरबार में होने वाले राजाओं के सम्मलेन में हमलोग इस मामले को उठाएंगे और चाहेंगे कि श्रीकृष्ण को उनके इस अपराध के लिए घोर दंड मिले. मैंने तय किया है कि हम इस मामले को मीडिया में उछालते रहेंगे जिससे शिशुपाल की आत्मा को न्याय मिले."

अरनब; "ओके, लास्ट एक मिनट रह गया है मेरा पास. नरोत्तम जी, यह बताएं कि अब आपका क्या प्लान होगा? आप और आपके जैसे हजारों मानवाधिकार कार्यकर्त्ता क्या चाहते हैं?"

नरोत्तम कालसखा; "अरनब, हमारा स्टैंड बिलकुल क्लीयर है. हम यह चाहते हैं कि एक इंडिपेंडेंट एस आई टी से इस मामले की जांच कराई जाय और श्रीकृष्ण को तुरंत सज़ा दी जाय. जबतक यह नहीं होता, हम आन्दोलन करते रहेंगे और हम यह निश्चित करेंगे कि महाराज शिशुपाल की आत्मा को न्याय मिले."

अरनब; "जेंटिलमेन, अब हमारे पास वक़्त नहीं है. लेकिन वी प्रोमिस यू दैट वी विल मेक इट स्योर दैट जस्टिस इज डन इन दिस केस. योर चैनल विल फाईट फॉर जस्टिस. हस्तिनापुर में कृपाचार्य और इन्द्रप्रस्थ में सहदेव जी, आपको भी थैंक्स. समय की कमी के कारण हम आपको समय न दे सके बट आई प्रोमिस यू कि अगली बार हम आप दोनों को भी समय देंगे. गुडबाय एंड गुड़नाइट."