बड़ी बमचक मची है कि कवि और साहित्यकार साहित्य अकादमी टाइप संस्थाओं से मिले पुरस्कार लौटा रहे हैं. लोग अपने-अपने विचार प्रकट कर रहे हैं. दूसरों के विचार काट रहे हैं. तर्क, वितर्क और कुतर्क किये जा रहे हैं. कुछ लोग बता रहे हैं कि जिन कवियों को ये पुरस्कार मिले हैं उनकी कविताएं घटिया हैं. कुछ बता रहे हैं कि कुछ कवियों को पिछले शासकों की बड़ाई लिखने के लिए पुरस्कार मिले हैं. लेकिन मैं आपको बता दूँ कि राजाओं-महाराजाओं का यशगान कवियों का कोई नया शगल नहीं है.
कल मेरी नज़र युवराज दुर्योधन की डायरी के पेज १४१ पर पडी. यहाँ टाइप कर दे रहा हूँ. आप बांचिये कि युवराज क्या लिखते हैं?
"आज हस्तिनापुर साहित्य रत्न से सम्मानित कवि रमाकांत बाजपेयी ने पांडवों को इंद्रप्रस्थ दिए जाने के विरोध में अपना सम्मान लौटा दिया। उधर जयद्रथ और दुशासन ने और कवियों को सम्मान लौटाने के लिए उकसा दिया है. ये कवि और साहित्यकार पुरस्कार लौटाकर पितामह और चाचा विदुर को कैसे परेशान करते हैं, अब हस्तिनापुर यह देखेगा। इतने महान कवि रमाकांत बाजपेयी से शुरुआत हो गई है तो मामला आगे ही बढ़ेगा, पीछे नहीं जाएगा. मुझे आज इस महान कवि की वह रचना याद आ गई जिसके लिए उन्हें पिताश्री ने अपने हाथों से साहित्य-रत्न का पुरस्कार दिया था. जो कुछ ऐसी थी;
जय हो नरेश धृतराष्ट्र सहित युवराज सुयोधन की जय हो,
हमको जिससे सम्मान मिला उस राष्ट्र और धन की जय हो,
जय हो गांधारी-पुत्री की, जय हो दामाद जयद्रथ की,
जय हो घोड़ो की, गदहों की, और उनमें जुते हुए रथ की.
भारत भर का जो है गौरव, ऐसा है कोई राज कहाँ,
जिनपर हो गर्व धर्मपथ को ऐसा है कोई आज कहाँ?
व्यवहार हो जिनका न्यायोचित, जिनसे जीवित मानवता हो,
जो धर्म-कर्म का रखे ध्यान, बस न्यायपथों पर चलता हो,
जिसने अपना सुख त्याग रखा हो प्रजाजनों का ध्यान यहाँ,
जो अहंकार तजकर देता हो बुद्धिमनों को मान यहाँ,
जो कवियों का सम्मान करे, जो बाँटे हमको पुरस्कार,
ऐसे न्यायोचित राजा प्रति हम आज प्रकट करते अभार,
जब पांडु मरे और अकस्मात हो गया हस्तिनापुर अनाथ,
सबको चिंता थी क्या होगा, कैसे जीयेंगे सभी साथ,
तब प्रजाजनों के मुखर बिंदु पर एक नाम बस आया था,
धृतराष्ट्र नाम के उस योद्धा को इसी राष्ट्र ने पाया था,
जो गुण वैभव की खान रहा जिसके जीवन का दान मिला,
जिस राजा के वैभव-प्रताप को दुनियाँ भर में मान मिला,
जिसके सौ पुत्रों ने स्थापित किया धर्म का राज यहाँ,
जिनके बल, बुद्धि और तेज़ से कांपे अधरम आज यहाँ,
जिसने आँखों का किया दान औ दिया प्रजा को बस प्रकाश,
जिसको देखे यह राष्ट्र और फट उर में उसके जगे आस,
जिसके कृपाण की ध्वनि से डरता रहा सदा अन्यायी है,
जिसके भुज के प्रताप पर चढ़कर मानवता निज आई है,
जिसने पुत्रों को दिया ज्ञान कि धर्ममार्ग पर चलना है,
स्थापना धर्म की हो उनको दीपक की भांति ही जलना है
जिसने पांडवों को किया मुक्त जिम्मेवारी की धारा से,
जिसके कारण ये राष्ट्र दूर ही रहा कलंकित कारा से,
जिसके पुत्रों से लाक्षागृह में जली न्याय की अमिट आग,
जिन पुत्रों के चलते जागा है राष्ट्रप्रेम का बड़ा भाग,
यह महाकवि उसके समक्ष अपना यह शीश नवाता है,
और उस नरपति से निजहित में थोड़ा उत्कोच कमाता है.
Monday, October 19, 2015
दुर्योधन की डायरी - पेज १४१
Friday, September 25, 2015
दुर्योधन की डायरी-पेज-१०१
भारत के इतिहास में किसी काल-खंड के बारे में भविष्यवाणी करते हुए ऋषि भृगु ने दुर्योधन से कुछ कहा था जिसको युवराज दुर्योधन ने जस का तस डायरी में टीप दिया था. बांचे ऋषिवर ने क्या कहा था;
विवेचना नहीं बस पण होगा,
तर्कों का मोल नगण्य होगा,
विद्वान जुबां नहि खोलेंगे,
बस केवल ऐंकर बोलेंगे,
सब पोलिटिकल दल्ले होंगे,
मरकट की नाई ढब होंगे,
ये कौवे गाना गायेंगे,
दरबारी राग सुनायेंगे,
कोयल छोड़ेगी वन उपवन,
औ चमगादड़ टेरेंगे मन,
जज ट्वीट में ताडेगा गोरी,
जस्टिस देगा भर-भर बोरी,
युवराज करेगा सेमिनार,
चमचे गायेंगे गुन हज़ार,
खुंदक ट्वीटेंगी दत्त-घोष,
मढ़ देंगी एकहि शीश दोष,
कॉमी राइट कर देगा रॉंग,
पीयेगा बस चायनीज भांग,
स्वामी की बातें भी कैसी,
सरकारों की ऐसी-तैसी
ये है बगुला या कि है ये क्रो,
दिस नेशन टुनाइट वांट्स टू नो,
चिल्लायेंगे टॉमी, पतरा,
कानों के पर्दों को खतरा,
वो सत्यवान तब होगा ट्राल,
जो रोज करेगा नव बवाल,
आपी तोड़ेंगे लॉ औ लू,
नेता ट्वीटेगा; प्राउड ऑफ़ यू,
भैंसे तब हाँकेगी लाठी,
न देखेंगी कद या काठी,
आरक्षण मांगेंगे पटेल
होगा ऐसा भी अजब खेल,
खतरे में होगा लोकतंत्र,
जब चोर फिरें होकर स्वतंत्र,
चंदन चलकर लिपटे भुजंग,
देखेगा जंगल हो के दंग,
रेतों पर भी तैरेगी नाव,
जब भी आयेगा इक चुनाव,
नेता सपने तब बेंचेंगा,
जनता की धोती खेंचेंगा,
सम्मान मिलेगा चोरों को,
सोना-चाँदी लतखोरों को,
होंगे व्यापारी साधु-संत,
ये कलयुग की महिमा अनंत,
फॉरेनर बहू कहाएगी,
जो राष्ट्र पे जुल्म ढहायेगी,
नंगा होगा निर्धन का तन,
लूटेंगे शासक सारा धन,
रक्खेंगे देश अँधेरे में,
अपने पिंजरे के घेरे में,
तब बुद्धि की चुप्पी व्याधेगी,
बस अपना मतलब साधेगी।
जो नर चुटकुले सुनाएंगे,
वो महाकवि कहलायेंगे,
तब पत्रकार निर्मम होगा,
कागज़ पर केवल तम होगा,
वासी भूलेगा शिष्टाचार,
फैलेंगे सारे नव विकार,
अधरम जब चरम पे डोलेगा,
विष को तब वायु में घोलेगा,
जो भी भ्रष्टाचारी होगा,
वो पद का अधिकारी होगा,
यह राष्ट्रभाग जब फूटेगा,
पुच्छल तारे सा टूटेगा,
लेकिन अशांति का दावानल,
हो चाहे जितना सुदृढ़, अटल,
उसको नारायण तोड़ेंगे,
औ राष्ट्रदृष्टि को मोड़ेंगे।
Thursday, January 30, 2014
युवराज दुर्योधन का साक्षात्कार
आज युवराज दुर्योधन की डायरी के बिखरे पन्नों के बीच उनका एक इंटरव्यू मिला जो द्वापर युगीय किसी पत्रकार ने लिया था जिसका नाम चिंतामणि गोस्वामी है. गोस्वामी जी का कोई विकीपेज तो नहीं जिससे उनके बारे में जानकारी मिले लेकिन इंटरव्यू में उन्होंने जैसे सवाल किये, उन्हें पढ़कर कहा जा सकता है कि वे बड़े धाकड़ पत्रकार थे. मुझे पूरा विश्वास है कि उनके अंदर पत्रकारिता इस तरह से भरी थी कि उनके वंशज आज के भारतवर्ष में कहीं न कहीं पत्रकारिता झाड़ रहे होंगे।
खैर, आप युवराज का इंटरव्यू बांचिये जो मैं यहाँ नीचे टाइप कर रहा हूँ.
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चिंतामणि गोस्वामी: स्वागत है युवराज आपका. आपने साक्षात्कार के लिए समय दिया, उसके लिए मैं आपका आभारी हूँ.
युवराज: धन्यवाद गोस्वामी जी.
चिंतामणि गोस्वामी: युवराज, साक्षात्कार के आरम्भ में ही मैं आपको सूचित कर दूँ कि मैं आपसे जो प्रश्न पूछूंगा वे विशिष्ट प्रश्न होंगे. विशिष्ट इसलिए क्योंकि ऐसे प्रश्न आपसे से निकटता रखनेवाले किसी पत्रकार ने पहले नहीं किये होंगे.
युवराज: जैसी आपकी इच्छा पत्रकार श्री. मुझे कोई आपत्ति नहीं है.
चिंतामणि गोस्वामी: मेरा पहला प्रश्न यह है कि आपने पिछले चौदह वर्षों में व्यक्तिगत साक्षात्कार नहीं दिया. क्या कारण है?
युवराज: ऐसा नहीं है कि मैंने साक्षात्कार नहीं दिया.
चिंतामणि गोस्वामी: युवराज मैं व्यक्तिगत साक्षात्कार के बारे में कह रहा था. आपने इससे पहले चौदह वर्ष पूर्व संवाददाताओं के साथ एक प्रश्नोत्तर सत्र किया जब समाचार माध्यमों ने आपके ऊपर आरोप लगाया था कि आपके संबंध पुरोचन से थे.
युवराज: मैं हस्तिनापुर में परिवर्तन देखना चाहता हूँ.
चिंतामणि गोस्वामी: आपके पुरोचन से संबंध थे या नहीं?
युवराज: प्रश्न यह नहीं कि पुरोचन के साथ मेरे संबंध थे या नहीं? प्रश्न यह है कि युवराज सुयोधन कौन हैं?
चिंतामणि गोस्वामी: कौन हैं युवराज सुयोधन?
युवराज: चलिए मैं आपसे प्रश्न पूछता हूँ. आप बताएं कि कौन हैं चिंतामणि गोस्वामी?
चिंतामणि गोस्वामी: आप मुझसे प्रश्न पूछ रहे हैं?
युवराज: हाँ. आप बताएं न कि कौन हैं चिंतामणि गोस्वामी? देखिये, आप जब छोटे होंगे तब आपके मन में तो आया ही होगा कि बड़े होकर आप क्या बनेंगे?
चिंतामणि गोस्वामी: ये मेरे प्रश्न का उत्तर नहीं हुआ युवराज.
युवराज: चलिए मैं आपको बताता हूँ कि चिंतामणि गोस्वामी कौन हैं? चिंतामणि गोस्वामी बाल्यकाल में कुछ बनना चाहते होंगे. अब वे युवराज तो बन नहीं सकते ऐसे में वे पत्रकार बन गए. अब प्रश्न यह है कि वे युवराज क्यों नहीं बन सकते?
चिंतामणि गोस्वामी: अच्छा चलिए मैं दूसरा प्रश्न पूछता हूँ. आपने पांडवों को लाक्षागृह में आग लगाकर मारने का प्रयत्न किया?
युवराज: पांडव हमारे प्रिय है.
चिंतामणि गोस्वामी: परन्तु आपने उन्हें मारने का प्रयत्न किया था या नहीं?
युवराज: मैं बाल्यकाल से ही पांडवों से प्रेम करता हूँ. इस पृथ्वी पर पांडव मेरे सबसे प्रिय रहे हैं.
चिंतामणि गोस्वामी: लेकिन आपने फिर भी उनकी हत्या करने का प्रयास किया?
युवराज: आग मैंने नहीं लगाई थी.
चिंतामणि गोस्वामी: चलिए मैं आपसे एक और प्रश्न पूछता हूँ. आपने गुरु द्रोण की पाठशाला में भीम को भी मारने का प्रयत्न किया था?
युवराज: मेरे पिताश्री धृतराष्ट्र जन्म से अंधे हैं.
चिंतामणि गोस्वामी: यह मेरे प्रश्न का उत्तर नहीं हुआ.
युवराज: चलिए मैं अपनी बात को ऐसे समझाता हूँ. पत्नी के कहने पर आप हाट में आलू लेने जाते हैं और आपको बीच में आभूषणों का व्यापारी मिल गया. क्या आप आलू भूलकर आभूषण पर मुद्रा व्यय करेंगे? नहीं करेंगे. क्यों? क्योंकि आपके पास उतनी मुद्रा है ही नहीं.
चिंतामणि गोस्वामी: मैं आपसे एक और प्रश्न करता हूँ. आपने दुशासन को आदेश क्यों दिया कि वे द्रौपदी को भरी सभा में निर्वस्त्र कर दें?
युवराज: मेरी माताश्री ने विवाहोपरांत अपनी आँखों पर पट्टी बांधने का संकल्प लिया था.
चिंतामणि गोस्वामी: यह मेरे प्रश्न का उत्तर नहीं हुआ युवराज.
युवराज: आप मेरी बात को ऐसे समझने का प्रयत्न करें. देखिये, नितिशास्त्र कहता है कि हर कार्य धर्मानुसार होना चाहिए. अब आप कोई कार्य धर्मानुसार तब तक नहीं कर सकते जबतक आपको धर्म की व्याख्या का ज्ञान नहीं है. प्रश्न यह नहीं कि द्रौपदी को निर्वस्त्र करने का प्रयत्न किया गया या नहीं, प्रश्न यह है कि धर्म क्या होता है? एक और प्रश्न यह भी है कि क्या चिंतामणि गोस्वामी धर्म का पालन कर रहे हैं? इसका उत्तर यह है कि वे नहीं कर रहे क्योंकि उन्होंने पत्रकारिता की शिक्षा ली है, धर्म की नहीं. अब प्रश्न यह उठता है कि जब उन्होंने धर्म की शिक्षा नहीं ली तो फिर धर्म की शिक्षा किसने ली? उत्तर यह है कि धर्म की शिक्षा युवराज सुयोधन और उनके भाइयों ने ली. अब प्रश्न यह है कि किससे ली? तो उसका उत्तर यह है कि गुरु द्रोण से ली. तो जब हर प्रश्न का प्रमाणिक उत्तर मैं आपको दे ही रहा हूँ तो फिर यह कहना कि मैं आपके प्रश्न का सही उत्तर नहीं दे रहा, तर्कसंगत नहीं जान पड़ता.
चिंतामणि गोस्वामी: परन्तु युवराज, मेरा प्रश्न यह था कि आपने द्रौपदी को भरी सभा में निर्वस्त्र करने की आज्ञा क्यों दी?
युवराज: मैंने जब अपने बाल्यकाल से ही अपनी माताश्री को आँखों पर पट्टी बांधे देखा तभी से मेरे ह्रुदय में यह बात घर कर गई कि बड़ा होकर मुझे स्त्रियों के अधिकार के लिए कुछ करना है. मैंने तभी से अपना पूरा जीवन स्त्रियों के अधिकार की रक्षा में समर्पित कर दिया.
चिंतामणि गोस्वामी: अच्छा कुरु-नंदन, मेरा प्रश्न अब राज्य की समस्याओं के बारे में है. यह बताएं युवराज कि हस्तिनापुर में मंहगाई की समस्या, भ्रष्टाचार की समस्या, किसानो की समस्या और ऐसी ही न जाने कितनी और समस्याएं हैं, जिनसे हस्तिनापुरवासी संघर्ष कर रहे हैं. आपके पास शक्ति है कि आप इन समस्याओं का समाधान कर सके. आपने आजतक कभी इस समस्याओं का समाधान की दिशा में क्यों नहीं सोचा?
युवराज: मैंने इन समस्याओं पर समग्र चिंतन किया है.
चिंतामणि गोस्वामी: परन्तु किसी ने आपको इन समस्याओं पर बात करते नहीं देखा.
युवराज: मैंने अपनी डायरी में इन समस्याओं और इनसे जुडी चिंताओं का वर्णन किया है.
चिंतामणि गोस्वामी: परन्तु प्रजा-जनों को आपकी डायरी से क्या लेना-देना?
युवराज: आपने मेरे उत्तर को समझा नहीं. चलिए मैं आपको ऐसे समझता हूँ. कल्पना कीजिये कि मैं आखेट के लिए जंगल में गया. आप प्रश्न कर सकते हैं कि आपके प्रश्न का मेरे आखेट और हस्तिनापुर के जंगल से क्या लेना-देना? तो उसका उत्तर यह है कि आखेट ही हर प्रश्न का उत्तर है. और मैं जबतक जंगल में नहीं जाऊँगा तबतक आखेट नहीं कर पाऊंगा. प्रश्नों के जंगल में ही कहीं उत्तरों का भी एक जंगल समाया हुआ है. मैंने हमेशा से प्रश्न और उत्तरों के जंगल में विचरण करने को ही अपना धर्मं माना है. इस काल की सबसे बड़ी आवश्यकता है कि हम युवराजों के लिए आरक्षित जंगलों को प्रजा-जनों के लिए खोल दें. यदि जंगल खुले तो हर प्रश्न के साथ उसका उत्तर भी खुल जायेगा परन्तु समस्या यह है कि जब मैं जंगलों को खोलने की बात करता हूँ तो पांडव यह बात नहीं करते.
चिंतामणि गोस्वामी: युवराज मेरा अगला प्रश्न यह है कि आपके मामाश्री क्या आपको अधर्म करने के लिए उकसाते रहे हैं?
युवराज: जब पाठशाला में गुरु द्रोण ने एकलव्य को धनुर्विद्या सिखाने से मना कर दिया था मुझे उसी क्षण लगा था कि ये एकलव्य एकदिन बहुत बड़ा धनुर्धर बनेगा।
चिंतामणि गोस्वामी: युवराज यह मेरे प्रश्न का उत्तर कैसे हुआ?
युवराज: यही कारण है कि मैं हस्तिनापुर में राजपाट के तौर-तरीके में आमूल-चूल परिवर्तन करना चाहता हूँ. धर्म क्या है? अधर्म क्या है? प्रश्न क्या और उत्तर क्या है? इन सब बिंदुओं पर विचार कर उनकी पुनः व्याख्या प्रजा-जनों को संतोष प्रदान करेगी।
चिंतामणि गोस्वामी: युवराज, ये बताएं कि प्रजा-जनों के भले के बारे में आपके पास कोई योजना है?
युवराज: हमारे पास प्रजा-जनों की भलाई की समग्र योजना है. हम निकट भविष्य में हस्तिनापुरवासियों को खेल-कूद का सम्पूर्ण अधिकार प्रदान करने वाले हैं.
चिंतामणि गोस्वामी: युवराज मेरा एक प्रश्न यह है कि क्या आप भीम से लड़ने के लिए उद्यत हैं? मैं यह प्रश्न इसलिए पूछ रहा हूँ कि प्रजा-जनों में ऐसे अनुमान लगाये जा रहे हैं कि आप भीम से भयाक्रांत हैं. इस बात को कहाँ तक सत्य माना जाय?
युवराज: मैंने बाल्यावस्था से ही अपने पिताश्री को संजय के सहारे चलते हुए देखा है. मेरी माताश्री ने विवाहोपरांत ही आँखों पर पट्टी बांधने का निर्णय ले लिया था. मेरी एकमात्र बहन का विवाह जयद्रथ जैसे हलकट के साथ हो गया. मेरे मामाश्री न जाने कितने वर्षों से अपनी बहन के घर की रोटियां तोड़ रहे हैं. पितामह ने सदैव अर्जुन को ही अपना चहेता माना. मैं द्रौपदी स्वयंवर में द्रौपदी को वरण नहीं कर पाया. भीम बाल्यावस्था में हम भाइयों को पटककर मारता था. भीम को विष देकर मारने का प्रयत्न किया तो वह नागलोक में जाकर और बलशाली बन गया. मित्र कर्ण को द्रौपदी ने सूत-पुत्र कहा और मैं कुछ नहीं कर पाया. गुरु द्रोण को वचन देने के उपरांत भी मैं महाराज द्रुपद को बंदी बनाकर लाने में असफल रहा. पत्रकार श्री जिस युवराज सुयोधन के साथ इतनी दुर्घटनाएं हुई हों, उसके पास खोने को क्या रह जाता है? मुझे अब किसी से भय नहीं लगता.
चिंतामणि गोस्वामी: तो क्या मैं यह निष्कर्ष निकालूँ कि आवश्यकता पड़ने पर आप भीम से युद्ध करने के लिए तत्पर हैं?
युवराज: न केवल तत्पर हूँ अपितु यह भी कहता हूँ कि भीम का वध भी करूँगा।
चिंतामणि गोस्वामी: हे कुरु-नंदन आपने यह साक्षात्कार देकर मुझे अनुगृहीत किया. धन्यवाद.
युवराज: धन्यवाद.
Tuesday, December 24, 2013
दुर्योधन की डायरी - पेज ५८६
द्रौपदी स्वयंवर के पश्चात युवराज लिखते हैं;
फिर से पराजय. पराजय पर पराजय. लगता है जैसे मेरे भाग्य में पराजय के अलावा और कुछ लिखा ही नहीं. उधर अर्जुन तीर चलाकर द्रौपदी को वर ले गया और इधर मैं महाराज द्रुपद का धनुष तक न उठा सका. संतोष इसबात का है कि मैं अकेला योद्धा नहीं जो धनुष नहीं उठा सका. महाराज विराट, शिशुपाल, जरासंध, महाराज शल्य, भगदत्त कौन उठा सका द्रुपद के धनुष को? न ही मेरे भाई उठा सके. दुशासन, युयुत्स, दुर्मुख, विकर्ण, सब के सब धराशायी हुए लेकिन मीडिया और विशेषज्ञ हैं कि मेरे ही पीछे पड़े हुए हैं.
मैं पूछता हूँ और कुछ नहीं है दिखाने को?
मामाश्री ने कितनी कोशिश की कि मीडिया मेरी पराजय को कम और भरी सभा में द्रौपदी द्वारा मित्र कर्ण को सूतपुत्र कहे जाने वाले मामले को ज्यादा उछाले लेकिन ये मीडिया वाले मानते ही नहीं. एकबार तो मन में आया कि शायद इनलोगों को पिछले महीने का हफ्ता नहीं मिला इसलिए ये मेरे पीछे पड़े हुए हैं लेकिन खुद दुशासन ने कहा कि अभी दस दिन पहले ही उसने खुद सम्पूर्ण हस्तिनापुर की मीडिया को अपने हाथों से उनका हफ्ता थमाया था.
अब तो मुझे मामाश्री की बात में सच्चाई दिखाई दे रही हैं कि ये लोग बार-बार मेरी पराजय की चर्चा करके अपना रेट बढ़ाना चाहते हैं.
हमलोग तो इसबात पर भी राजी हो गए थे कि ठीक है मेरी पराजय की बात न करके अर्जुन द्वारा द्रौपदी को जीत लिए जाने की ही चर्चा करो. उसी पर पैनल डिस्कशन करवाओ फिर भी ये नहीं मान रहे. वो तो भला हो मामाश्री का जिन्होंने प्रजा के लोगों के नाम से अखबारों और टीवी चैनलों में सवाल उठवाये कि "जब दुर्योधन और अर्जुन, दोनों को जब गुरु द्रोण ने ही धनुर्विद्या सिखाई तो फिर ऐसा क्यों है कि अर्जुन ने तो महाराज द्रुपद द्वारा बनाये लक्ष को वेध दिया परन्तु दुर्योधन या उसका कोई भी भाई ऐसा नहीं कर सका?" या कि; "कहीं ऐसा तो नहीं कि गुरु द्रोण ने कुछ धनुर्विद्या कुरु राजकुमारों को सिखाई ही नहीं?" और "अगर यही सच है तो फिर गुरु द्रोण को अपने पद पर बने रहने का अधिकार है?"
ये सवाल उठे तब जाकर मीडिया का ध्यान गुरु द्रोण की तरफ गया और मुझे थोड़ी राहत मिली. अच्छा है इसी बहाने गुरु द्रोण की भी थोड़ी छीछालेदर हो गई. ये मेरे बचपन से ही मुझसे जलते रहे हैं.
वैसे विरोधी गुट के दो-तीन विशेषज्ञों ने तो बोलना शुरू भी कर दिया था कि मैंने तीर चलाने की कभी प्रैक्टिस ही नहीं की. कि मैं हमेशा केवल षड्यंत्र में ही बिजी रहा. कि मुझे मामाश्री के साथ मदिरापान करने और तीन पत्ते खेलने के अलावा कुछ आता ही नहीं. कि मैं ऐसा नकारा हूँ जो न तो धनुर्विद्या ही सीख पाया और न ही राजनीति. कि मेरी राजनीति का अर्थ केवल षडयंत्र करना है. कि मैंने अब तक केवल अधर्म का साथ दिया है. कि मेरी वजह से ही हस्तिनापुर अधर्म फ़ैल गया है. कि मैंने कभी इसके विरुद्ध कुछ नहीं कहा.
आखिरकार इसे रोकने के लिए मामाश्री को फिर से सामने आना पड़ा. उन्होंने अपने प्रिय टीवी ऐंकर को आज्ञा दी कि ऐसे विशेषज्ञों को बोलने ही नहीं दिया जाय. बाद में जैसे ही इन विशेषज्ञों ने ऐसे मुद्दे उठाए, ऐंकर ने शोर मचाकर उन्हें बोलने ही नहीं दिया.
ये विशेषज्ञ मेरे पीछे कई वर्षों से पड़े हुए हैं. मुझे याद है जब गुरु द्रोण ने हम राजकुमारों के शिक्षा देने के बाद गुरुदक्षिणा में हमें पांचाल नरेश द्रुपद को बंदी बनाकर उनके हवाले करने के लिए कहा था और सर्वप्रथम मैं अपने भाइयों और अपनी सेना लेकर द्रुपद को बंदी बनाने के लिए उनके राज्य पर आक्रमण कर दिया था परन्तु हार गया था. इन विशेषज्ञों ने मेरी बहुत खिल्ली उड़ाई थी. कुछ ने तो यहाँ तक कहा था कि मुझे और राजाओं के साथ संधि करके उन्हें साथ लेकर महाराज द्रुपद पर आक्रमण करना चाहिए था. अब इन्हें कौन बताये कि शिक्षा लेकर पाठशाला से निकले नौजवान के मन में पूरी दुनियां के सामने खुद को प्रूव करने का अवसर भी कुछ होता है. ऊपर से पाठशाला में गुरु द्रोण ने खुद हमसब को "लीडिंग फ्रॉम द फ्रंट" का सिद्धांत बताया था. अब ऐसे में एक राजकुमार दूसरे राजाओं के साथ संधि करके किसी राजा पर आक्रमण करेगा तो उसकी बेइज्जती नहीं होगी?
ये विशेषज्ञ तभी से मुझे नाकारा साबित करने पर तुले हुए हैं और आजतक करते जा रहे हैं. उस समय भी मामाश्री मेरी रक्षा के लिए मैदान में आये थे और उन्होंने अपनी मीडिया के थ्रू यह स्टोरी चलवाई थी कि मीडिया के लिए मेरी पराजय से ज्यादा महत्वपूर्ण है इसबात पर चर्चा करना कि जब अर्जुन ने महाराज द्रुपद को बंदी बना ही लिया था तो क्या जरूरत थी भीम को पांचाल नरेश के सैनिकों, अश्वों और हाथियों को मारने की? उधर मीडिया ने इस स्टोरी को उछाला इधर कुछ एनिमल राइट्स ऐक्टिविस्ट्स और कुछ सोल्जर राइट्स ऐक्टिविस्ट ने मामले को तूल दिया था तब जाकर लोगों का ध्यान मेरी विफलता से हटकर भीम के कर्म पर डाला गया. बड़ी ऐसी-तैसी हुई थी भीम की उस समय.
परन्तु ये विशेषज्ञ भी बड़े हेहर टाइप हैं. ये बीच-बीच में किसी न किसी मुद्दे पर मेरी आलोचना करने का मौका ढूढ़ ही लेते हैं. कभी यह कहते हैं कि मैंने लाक्षागृह में पांडवों को जलाकर मार देने का षड़यंत्र रचा तो कभी यह कहते हैं कि मैंने बचपन में भीम को खीर में जहर मिलाकर मारने का षड़यंत्र रचा. अब इन्हें कौन समझाये कि एक युवराज के लिए षड़यंत्र से महत्वपूर्ण कर्म भी कोई होता है क्या? युवराज षड़यंत्र नहीं करेंगे तो क्या खेतों में जाकर धान काटेंगे? ऊपर से कभी-कभी ये लोग यह कहते हुए नया पैतरा शुरू कर देते हैं कि अगर मौका मिलता तो दुशाला शायद कुरुवंश को मुझसे बहुत ज्यादा कुशलता से नेतृत्व देती.
मेरी भी समझ में नहीं आता कि मेरे भाग्य में केवल पराजय ही क्यों है?
खैर, मामाश्री ने आज शाम को सलाह दी कि मैं अपनी नेतृत्व की क्षमता को दर्शाने के लिए जगह-जगह जाकर लोगों से मिलूँ. कह रहे थे कि इस पराजय पर से मीडिया और प्रजा का ध्यान हटाने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि मैं हस्तिनापुर में वर्षों से चल रहे सिस्टम को बदलने की बात कर दूँ. कि मैं हस्तिनापुर वासियों को आगाह करूँ कि प्रजा को सत्य के मार्ग पर चलना चाहिए. कि उसे यह ध्यान रखना चाहिए कि वे सपने में भी अधर्म के मार्ग पर कभी न जाएँ. कि प्रजा को आपसी भाई-चारा बढ़ाने की जरूरत है. कि हमें नए मूल्य स्थापित करने की आवश्यकता है. कि आज हस्तिनापुर में सबसे बड़ी समस्या अधर्म है. कि जल्द ही मैं अपने निर्णय प्रजा से पूछकर लूँगा.
जब मामाश्री मुझे यह समझा रहे थे तो दुशासन ने खिस्स से हँस दिया. मैंने कर्ण की तरफ देखा और बनावटी गुस्सा दिखाते हुए दुशासन से पूछा; "क्यों हँसा तू?"
वो बोला; "भ्राताश्री, अब आप जो भी अधर्म के कार्य करेंगे उसमें प्रजा की भी हिस्सेदारी होगी"
और हमसब ठहाका लगाकर हँसने लगे.
अब सोने चलता हूँ. सुबह जल्दी उठकर भाषण याद करना है. कल दोपहर हस्तिनापुर चेम्बर्स ऑफ़ कॉमर्स में व्यापारियों को सम्बोधित करना है.
Tuesday, September 24, 2013
दुर्योधन की डायरी - पेज १३७७
आज दिन भर बहुत व्यस्त रहा. प्रजा के लिए बनी महाराज भरत मुफ्त में पेट भरो योजना का उद्घाटन करने के लिए पिताश्री के साथ जाना पड़ा. जयद्रथ और दुशासन ने उद्घाटन समारोह के सारे इंतजाम बहुत मस्त किये थे. राजकवि तो काशीनरेश द्वारा आयोजित किसी कवि सम्मलेन में गए थे इसलिए योजना के लिए नारा लिखने का काम उप राजकवि ने किया. उन्होंने जो नारा लिखा वह भी ठीक-ठाक ही लगा. वैसे सिस्टर दुशाला ने सजेस्ट किया कि मुफ्त का गेंहू दो किलो, कार्ड दिखाओ और ले लो की जगह अगर दान का गेंहू दो किलो, कार्ड दिखाओ और ले लो होता तो अच्छा रहता. उसका कहना था कि ऐसा करने से बिना किसी मेहनत के यह बात प्रजा के बीच साबित हो जाती कि हमलोग दानी भी हैं. साथ ही यह बात एकबार फिर से बता दी जाती कि हम राजा है.
वह कह रही थी कि यह बात बीच बीच में प्रजा पर जाहिर करते रहना चाहिए क्योंकि कई बार प्रजा की हरकतों से लगता है जैसे वह हमारे राजत्व पर सवाल कर रही है.
राजमहल ने योजना के विज्ञापन के लिए कुल सत्रह अखबारों का फ्रंट पेज बुक कर लिया था. हस्तिनापुर एक्सप्रेस का तो फ्रंट और बैक-पेज दोनों ही बुक कर लिया गया था. एक समय था जब यह अखबार राजमहल के विरुद्ध खूब लिखा करता था. वो तो भला हो मामाश्री का जिन्होंने इसके नए संपादक को साध लिया और तब से अखबार हमारे पक्ष में लिखने लगा. मुझे याद है पहली बार इसी संपादक के साथ मिलकर मैंने और मामाश्री ने भीम को बदनाम किया था. गुप्तचरों द्वारा खींचकर लाई गई भीम और हिडिम्बा के विवाह की तस्वीरें सबसे पहले इसी संपादक के लिए लीक की गई थीं. साथ ही इस संपादक ने तमाम संपादकीय लिखकर साबित कर दिया था कि कैसे एक आर्य ने राक्षस कुल की एक कन्या के साथ विवाह कर घोर अपराध किया है. बड़ी थू थू हुई थी भीम की.
लिखना पड़ेगा कि प्रेस मैनेजमेंट के जो गुर मामाश्री ने तब सिखाये वह आजतक काम आ रहा है. आज ये अखबार न होते तो प्रजा को यह बताना कितना मुश्किल होता कि हाल ही में हमने चाय-पान की दुकानों पर जो स्पेशल मनोरंजन कर लगाया है वह कितना जरूरी था. इसी अखबार ने लोगों में यह बात फैलाई कि राजमहल का घाटा किस तरह से इतना बढ़ गया है कि नए कर जरूरी हो गए हैं. कैसे नहीं लगाता चाय-पान की दुकानों पर कर? प्रजा के लोग इन्हीं दुकानों पर बैठकर राजमहल और उसके लोगों की आलोचना करते हैं. जिसे देखो वह मुझे गाली देता है. मुझे अत्याचारी कहता है. दुशासन को अधर्मी कहता है. जयद्रथ के बारे में अनाप-सनाप बकता है. दुशासन ने यहाँ तक सुझाव दिया कि हस्तिनापुर में चाय-पान की दुकानों पर बैन लगा देना चाहिए. मैं तो तैयार हो गया था, वो तो कर्ण और मामाश्री ने बताया कि अगर इन दुकानों पर बैन लगा दिया गया तो लोगों में असंतोष बढ़ेगा. मामाश्री ने उसी दिन यह रहस्योद्घाटन किया कि प्रजा को आपस में बात करने से कभी रोकना नहीं चाहिए. बातचीत करने से उनके मन की भड़ास निकल जाती है. बोले; "हमें चाय और पान की दुकानों का आविष्कार करने वाले को धन्यवाद कहना चाहिए भांजे जिसने बहुत सोच समझकर इसका आविष्कार किया. अगर ये दुकानें न होंगी तो प्रजा अपनी भड़ास कहाँ निकालेगी? और यदि भड़ास न निकली तो उसके आन्दोलन का रूप लेने का खतरा हमेशा मंडराता रहेगा"
मामाश्री द्वारा सिखाये गए इसी पाठ का कमाल है कि प्रेस मैनेजमेंट में आजतक कोई दिक्कत नहीं आई. मुझे याद है, एकबार दुशासन ने पितामह और काकाश्री विदुर के हस्ताक्षर फोर्ज कर काशीनरेश को पत्र लिखकर आग्रह किया कि वे भीम को काशी नगरी में प्रवेश की अनुमति न दें क्योंकि उसने गुरु द्रोण की पाठशाला में मेरी और दुशासन की कुटाई की थी. पता नहीं कैसे वह पत्र हस्तिनापुर टाइम्स के हाथों लग गया और जब बात प्रजा के बीच निकल आई तब इसी संपादक ने अपने अखबार में तरह तरह से सम्पादकीय लिखकर यह बात फैलाई कि दरअसल वह पत्र दुशासन ने नहीं बल्कि पांडवों के दल में से ही किसी ने लिखा था क्योंकि पांडव एक-दूसरे को पसंद नहीं करते थे. जब यह लगा कि प्रजा को इसबात का विश्वास नहीं हो रहा है तब इस मामले को दबाने के लिए यह बात फैलाई गई कि माताश्री मुझसे, दुशासन और मामाश्री से बहुत रुष्ट हैं. खुद मामाश्री ने सम्पादक को यह आईडिया दिया कि वह ऐसा छापेगा तो लोगों का ध्यान उसपर चला जायेगा और काशीनरेश के नाम लिखे जाने वाले पत्र की बात दब जायेगी।
वैसे तो आज के कार्यक्रम के समय लिए जाने वाली तस्वीरों से कल के अखबार भरे रहेंगे लेकिन सुनने में यह भी आया है कि कुछ लोग इस योजना का विरोध कर रहे हैं. इन लोगों से निपटना मुझे अच्छी तरह से आता है. अगर यह भी नहीं कर सका तो फिर मामाश्री के रहने का क्या फायदा? मामाश्री ने चुनकर इक्यावन अर्थशास्त्री, इक्कीस अख़बारों के सम्पादक, ग्यारह बुद्धिजीवी, पाँच नाट्यकर्मी और एक सौ एक गुप्तचर को भाड़े पर ले लिया है जो यह फैलायेंगे कि यदि यह योजना लागू नहीं हुई तो प्रजा भूख से मर जाएगी और किस तरह से यह योजना महाराज भरत को असली श्रद्धांजलि होगी। मामाश्री ने प्लान बनाया है कि चूंकि आगे चलकर मुझे ही हस्तिनापुर का राज बनना है इसलिए प्रजा में यह सन्देश जाना जरूरी है कि इस योजना की रूपरेखा न सिर्फ मैंने तैयार की है बल्कि मैं ही यह निश्चित करूंगा कि यह योजना पूरी तरह से लागू हो और हर हस्तिनापुरवासी का कल्याण हो.
अब सोने चलता हूँ क्योंकि कल सुबह ही इन अर्थशास्त्रियों, संपादकों और बुद्धिजीवियों की क्लास लेकर उन्हें बताना है कि इस योजना के बारे में क्या-क्या बातें फैलानी हैं.
Tuesday, January 1, 2013
दुर्योधन की डायरी - पेज 699
सात दिन हो गए द्रौपदी चीरहरण कार्यक्रम हुए। मीडिया वाले हैं कि उसके बारे में बात करके अघा नहीं रहे। करते जा रहे हैं, करते जा रहे हैं। पता नहीं कबतक करेंगे? मैं पूछता हूँ, और कोई विषय नहीं है क्या? द्वारका से तीरंदाजों की बी-टीम भी तो हस्तिनापुर आयी है, उसपर समाचार कब दिखाएँगे? आचार्य देवधर शास्त्री लिखित नाटक "प्रतापी युवराज" का मंचन हो रहा है, उसपर कोई समाचार कैप्सूल क्यों नहीं दिखाते? राजमहल ने हाल ही में "मुफ्त का गेंहू दो किलो, कार्ड दिखाओ औ ले लो" नामक नारे के साथ प्रजा के लिए अपनी नई स्कीम लांच की है, उसके बारे में क्यों नहीं लिखते? मंहगाई कम करने के राजमहलिक प्रयासों के बारे में क्यों नहीं लिखते? कोई टीवी चैनल यह नहीं दिखा रहा है कि किस तरह से परसों आखेट के दौरान मैंने एक हिरन मार गिराया? अभी पंद्रह दिन पहले ही कर्ण ने तपस्या करके अपने लिए नए अस्त्र की प्राप्ति की है, उसपर कोई कार्यक्रम नहीं दिखा रहा। जयद्रथ ने नर्तकियों के एक नृत्य नाटिका का उद्घाटन करते हुए रीबन काटा लेकिन किसी न्यूज चैनल ने उसकी चर्चा नहीं की। न ही कोई यह दिखा रहा है कि कृपाचार्य, गुरु द्रोण, पितामह और चाचा विदुर ने "धर्म और राजनीति" नामक सेमिनार में हिस्सा लेते हुए बड़े जोरशोर से अपने विचार रखे।
इतने बड़े-बड़े कार्यक्रम हुए लेकिन पता नहीं क्यों मीडिया इनपर बात नहीं कर रहा? जिसे देखो वही द्रौपदी चीरहरण की बात किये जा रहा है और प्रजा से सुझाव मांग रहा है कि प्रजा बताये कि चीरहरण की ऐसी घटनाओं को भविष्य में कैसे रोक जाय? मैं पूछता हूँ, चीरहरण की घटनाओं को रोकने का सुझाव प्रजा कैसे देगी? उसे किसी के चीर को हरने का कोई अनुभव है क्या? उसे अगर पता ही होता तो सबसे पहले अपना चीरहरण रोकती न। मुझे तो बहुत गुस्सा आया। एकबार तो सोचा कि अखबारों और न्यूज चैनलों का लाइसेंस ही कैंसिल कर दूँ लेकिन भला हो मामाश्री का कि उन्होंने मुझे रोक दिया। मुझसे बोले; "क्रोध में युवराजों की दृष्टि अक्सर क्षीण हो जाती है भांजे। क्रोध के जिस अश्व पर तुम सवार हो, उसपर से उतरो। उसपर से उतरोगे तब तुम्हें वास्तविकता का पता चलेगा।"
गजब हैं मामाश्री भी। बिंब और दर्शन ठेलने पर उतारू हो जाएँ तो मजाल है कि बड़े से बड़ा भावार्थ-वीर भी उनकी बातें समझ जाए। जब करीब ढाई मिनटों तक मैंने उन्हें प्रश्नवाचक मुद्रा में देखा तो उन्होंने मुंह खोला। बोले; "राजनीति का एक पाठ हमेशा याद रखना भांजे। जब प्रजा रूपी कीडे-मकोड़े किसी बात पर बहस करना चाहें तो उन्हें रोकना नहीं चाहिए। दूसरी तरफ जब मीडिया रूपी राजमहलिक सेना उस प्रजा की बहस में हिस्सा ले और उन्हें हिस्सा दे तो उसे भी नहीं रोकना चाहिए। इससे 'हमारी' मीडिया की क्रेडिबिलिटी पुनः स्थापित करने में मदद मिलती है। वत्स दुर्योधन, तुमने यह तो देखा कि मीडिया द्रौपदी चीरहरण पर बहस कर रही है परन्तु अगर तुम अपने क्रोध के अश्व से उतर कर देखते तब तुम्हें मामला समझ में आता। समझ में आता कि मुद्दा द्रौपदी के चीरहरण से तो दूसरे दिन ही हट गया था। तुम क्रोध में थे इसलिए तुम्हें दिखाई नहीं दिया कि विशेषज्ञ, न्यूज एंकर, लेखक, बुद्धिजीवी वगैरह मिलकर चीरहरण पर नहीं अपितु धर्मराज युधिष्ठिर की गलतियों पर बात कर रहे हैं। सारे इस बात पर बहस किये जा रहे हैं कि क्या युधिष्ठिर को अधिकार था कि वह अपने भाइयों और पत्नी को दांव पर लगाता? तुम्हें यह दिखाई नहीं दिया कि हमारी मीडिया किस तरह से प्रजा से सुझाव मांग रही है कि वह बताये कि द्यूतक्रीडा राष्ट्र के लिए सही है या नहीं? तुमने यह नहीं देखा कि हमारे एंकर यहाँ तक सवाल उठा रहे हैं कि जब द्रौपदी को दुशासन दरबार में ले आया तो भीम का क्रोध से लाल हो जाना उचित था या नहीं? क्रोध में तुमने यह नहीं देखा भांजे कि हमारे धर्मशास्त्री और बुद्धिजीवी यह प्रश्न कर रहे हैं कि तुम्हारे अधीन होने के बाद भी राजदरबार में भीम का क्रोधित हो जाना क्या धर्म के विरुद्ध नहीं था? अगर तुम ध्यान से देखो तो पाओगे कि मीडिया एक तरह से तुम्हारी मदद ही तो कर रहा है। तुम मेरे एक प्रश्न का उत्तर दे दो। मुझे बताओ कि कौन सा न्यूज एंकर चीरहरण पर बात कर रहा है?"
पूरे सात मिनट बोले मामाश्री। जब बोलते हैं तो बड़े से बड़ा धनुर्धर उनकी बातों से ही मूर्छित हो जाए। उनकी बातें सुनकर मुझे लगा कि मैं तो ऐं-वें ही हलकान हुआ जा रहा था, मामाश्री ने तो सबकुछ पहले ही मैनेज कर लिया है। एकबार फिर से मेरे मन में आया कि अगर मामाश्री नहीं होते तो मैं कौन घाट लगता?
अभी परसों लंच के बाद मैं दुशासन, जयद्रथ और कर्ण इसबात पर विचार कर रहे थे कि क्या किया जाय कि मीडिया और प्रजा का ध्यान द्रौपदी चीरहरण से हटे? दुशासन ने तो यहाँ तक सुझाव दिया कि ध्यान हटाने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि दो-चार न्यूज चैनल के कैमरामैन और संवाददाताओ को किसी बहाने हाट में बुलाया जाय और वहीँ दुशासन किसी युवती को छेड़ दे। एक बार अगर इस छेड़-छाड़ की घटना को मीडिया उछाल देगा तो प्रजा का ध्यान राजदरबार में हुई द्रौपदी की बेइज्जती से हट जाएगा। जयद्रथ ने तो यहाँ तक कहा कि क्यों न हम किसी राज्य पर हमला कर दें? हमला कर देंगे तो प्रजा फट से राष्ट्रप्रेमी हो जाएगी और उसे कुछ याद नहीं रहेगा। कर्ण ने सुझाव दिया कि द्वारका से आई तीरंदाजी की बी-टीम के साथ "राजमहल वैरियर्स" का एक फ्रेंडली मैच करवा सकते हैं।
लेकिन मामाश्री की बात सुनकर मुझे लग रहा है कि कुछ भी करने की जरूरत नहीं है। मुझे अब उनका ही लिखा एक नारा याद आ रहा है कि; "जिन भांजों के साथ हो शकुनि मामा, उनका क्या कर लेगा पहलवान गामा?"
अब मुझे जरा भी टेंशन नहीं है। आज सोच रहा हूँ तो सात दिन पहले दरबार में जो कुछ भी हुआ था वह आँखों के सामने नाच गया। अब लग रहा है कि उस दिन बहुत जोर बच गए। याद आ रहा है कि दुशासन जब द्रौपदी के केश पकड़कर उसे घसीटते हुए दरबार में लाया तो भीम जिस तरह से क्रोधित हुआ, एक क्षण के लिए मेरे मन में भय समा गया था। कोई उस समय देखता तो उसे मेरी आँखों में मृत्यु का भय साफ़ दिखाई देता। मैं सचमुच डर गया था और मुझे लगा कि भीम अभी उठेगा और गदा मार के मेरा माथा फोड़ डालेगा। उसका गुस्साया चेहरा देखकर मेरे मन ने मुझसे कहा; "निकल ले सुयोधन। अगर दरबार में बैठा रहा तो ये भीम आज तेरी हड्डी-पसली एक कर देगा। तुझे मार डालेगा। अभी तो अपनी जान बचा। जान बचेगी तो द्रौपदी को निर्वस्त्र करके उसे जंघा पर बैठाने का सांस्कृतिक कार्यक्रम फिर कभी कर लेगा लेकिन अगर जान ही न बची तो ...."
अब लग रहा है कि ये तो अच्छा हुआ कि द्रौपदी ने पितामह से धर्म पर प्रश्न करके मुद्दे को वहीँ डाईल्यूट कर दिया। मामाश्री की बातें याद आ रही हैं तब समझ मं आ रहा है कि द्रौपदी के प्रश्न की वजह से मुद्दा धर्म वगैरह के चक्कर में फंस कर रह गया नहीं तो कस्सम से बता रहा हूँ, भीम उसदिन मुझे नहीं छोड़ता। अब देखता हूँ तो साफ़ दिखाई देता है कि ये धर्मशास्त्री, विशेषज्ञ, और ज्ञानी टाइप लोग और सबके उप्पर मामाश्री न रहें तो मुझ जैसों के लिए जीना मोहाल हो जाए। रोज ग़दर मची रहे। इनकी वजह से ही उसदिन बच गया था मैं नहीं तो भीम दांत पीसकर तबाही मचाने ही वाला था। थोडा सपोर्ट धर्मराज के ज्ञान से भी मिला उन्होंने ने ही भीम को धर्म ये कहता है और धर्म वो कहता है, बताकर रोक लिया। उन्होंने ही उसे याद दिलाया कि धर्म के अनुसार पांडव बंधु अब मेरे अधीन हैं। भला हो ऐसे धर्माचारियों का जो धर्म के रास्ते पर चलकर अधर्मियों को बचाकर रखते हैं। बाद में मुझे इस बात का एहसास हुआ कि अगर धर्म पर प्रश्न न उठा होता तो उसदिन मामला गदा से ही सुलझता।
आज समझ में आया कि मामाश्री धर्मशास्त्रियों और बुद्धिजीवियों को काहे इतना बढ़ावा देते हैं? पितामह के स्टेटमेंट कि; धर्म कहता है कि पांडव अब सुयोधन के अधीन हैं, ने मुझे बचा लिया। ढाई घंटों तक विद्वानों और तर्कशास्त्रियों को इस बात पर बहस करते देख आनंद आया कि युधिष्ठिर के पास क्या-क्या करने का अधिकार था और क्या-क्या नहीं?
आज शाम की मीटिंग में मामाश्री अट्ठास करते हुए आये। हाथ में तमाम कागज़ थे। बोले; "लो अपनी आँखों से देख लो भांजे कि हमारे अपने न्यूज चैनल्स और अखबारों ने तुम्हें किस तरह से बचा लिया।"
देखा तो उन कागजों पर प्रजा द्वारा दिए गए सुझाव लिखे थे। न्यूज ऐंकर्स ने उनसे सुझाव मांगे थे। यह कहते हुए कि प्रजा द्वारा दिए गए सुझावों को पितामह की अध्यक्षता वाली उस थ्री-मेम्बर्स कमिटी तक पहुंचा दिया जाएगा जो हस्तिनापुर में द्यूतक्रीड़ा के नियमों में होने वाले बदलाव के बारे में विचार कर रही है। एक से बढ़कर एक सुझाव थे। किसी ने सुझाव दिया था कि अबसे द्यूतक्रीड़ा के नियमों में परिवर्तन करके यह निश्चित किया जाय कि भविष्य में कोई भी अपने भाइयों को दांव पर न लगा सके। किसी ने यह सुझाव दिया था कि समाज में महिलाओं की स्थिति पर विचार करने के लिए एक और टू-मेंबर कमिटी बने जो महिलाओं के उत्थान के तरीकों पर अपने विचार राजमहल को दे। किसी ने लिखा था कि ऐसे नियम बनाये जाएँ जिससे कोई महिला किसी युवराज को अंधे का पुत्र कभी न कह सके और अगर कोई महिला ऐसा करे तो उसके लिए कठोर दंड का प्रावधान हो। किसी ने सुझाव दिया था कि द्यूतक्रीड़ा में कोई भी व्यक्ति भाइयों को दांव पर लगाए लेकिन पत्नियों को दांव पर लगाने का अधिकार उसे न दिया जाय। किसी ने तो यहाँ तक सुझाव दिया था कि किसी को भी ऐसा महल बनाने की अनुमति न दी जाय जिसमें फर्श की जगह पानी और पानी की जगह फर्श दिखाई दे। किसी ने सुझाव दिया था यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि भविष्य में द्यूतक्रीड़ा का कार्यक्रम किसी न्यूट्रल जगह जैसे किसी स्टेडियम में हो न कि राजमहल में। किसी बैंकर ने सुझाव दिया था कि नए प्रावधानों के अनुसार द्यूतक्रीड़ा में अगर कोई अपना सबकुछ हार जाए तो उसके लिए बैंक से लोन लेकर द्यूतक्रीड़ा के कार्यक्रम को आगे बढाने का महत्वपूर्ण काम सुनिश्चित किया जाना चाहिए। अगर ऐसा हो जाएगा तो बैंकिंग इंडस्ट्री में क्रेडिट ग्रोथ बरकरार रहेगी और हस्तिनापुर की इकॉनमी मजबूत होगी।
ऐसे-ऐसे सुझाव जिसे पढ़कर मेरी हँसी रुक नहीं रही थी। कहाँ मैं सोच रहा था कि द्रौपदी के लिए कुछ कैश कम्पेंशेसन की घोषणा कर देनी चाहिए ताकि मामला यहीं रुक जाए और कहाँ मामाश्री ने मामले को नया ही मोड़ दिला दिया था। फिर भी मैंने एकबार अपने मन की बात उनसे शेयर की। मैंने कहा; "मामाश्री, क्यों न हम द्रौपदी के लिए कुछ कैश कम्पेंशेसन दिला देते?"
वे बोले; "कैसी बातें करते हो भांजे? अगर ऐसा करोगे तो मेरे मामा होने का क्या फायदा? में तो सोच रहा था कि हम उल्टा द्रौपदी से कैश ले लेंगे। यह कहते हुए कि दुशासन ने इतनी मेहनत की परन्तु वह साड़ी नहीं उतार पाया। ऐसे में क्या धर्म यह नहीं कहता कि पांडव यह सुनिश्चित करें कि दुशासन ने जो बेकारी की उसके लिए उसे कुछ कैश मिले?" आगे बोले; "अब हमें इस मामले को नया मोड़ देना है। अब मैं यह सुनिश्चित करूंगा कि पूरा हस्तिनापुर इसबात पर बहस करे कि समाज में आमूल-चूल परिवर्तन कैसे लाया जाय? मैं सोच रहा हूँ कि समय आ गया है। समय आ गया है इस थ्योरी को उछालने का कि उसदिन राजदरबार में जो कुछ भी हुआ, उसके लिए पूरा हस्तिनापुर दोषी है। याद रखना भांजे, पूरा हस्तिनापुर दोषी है, इसका मतलब कोई दोषी नहीं है? क्या धर्म पूरे हस्तिनापुर को दंड देगा? अब तुम चिंता छोडो और अपनी युवाराजी पर ध्यान दो। तुम्हें कुछ नहीं होगा। याद रखो मेरा वो नारा कि; "जिन भांजों के साथ हो शकुनि मामा, उनका क्या कर लेगा पहलवान गामा?"
गज़ब हैं मामाश्री भी। मामा कसम, ऐसा मामा दुनियाँ के सभी युवराजों को मिले ताकि उसकी युवाराजी चलती रहे।
Saturday, December 15, 2012
दुर्योधन की डायरी - पेज 1108
फिर से मीडिया में वही किचकिच, वही झिकझिक। अवन्ती की तीरंदाजी टीम हस्तिनापुर के दौरे पर जब से आई है, हमारी टीम के प्रदर्शन को देखते हुए मीडिया ने फिर से हाहाकार मचा रक्खा है। इसबार फिर से पितामह तीरंदाजी के अपने कौशल से प्रभावित नहीं कर सके। एक समय था जब वे एक तीर से सात पक्षियों को मार गिराते थे लेकिन इसबार तो केवल एक पक्षी को ही तीर लगा। और वह भी गिरा नहीं। उसने हवा में ही खुद को पार्क करके अपने हाथों से ही तीर खींचकर फेंक दिया। ये लगातार पांचवा वर्ष है जब पितामह लोगों की आशा के अनुरूप प्रदर्शन नहीं कर सके।
पिछले करीब दस वर्षों से मैं कह रहा हूँ कि अब समय आ गया है कि पितामह कम्पीटेटिव आर्चरी से संन्यास की घोषणा कर दें लेकिन वे हैं कि मानते ही नहीं। कहते हैं; "जब तक मैं तीरंदाजी एन्जॉय कर रहा हूँ मुझे प्रतियोगिता में हिस्सा लेने से न रोको वत्स, मुझे न रोको।"
मेरी समझ में आजतक यह नहीं आया कि जो तीरंदाज केवल एन्जॉय करने के लिए धनुष-वाण लिए प्रतियोगिता स्थल पर पधारेगा वह प्रदर्शन कैसे करेगा? उसकी सारी एनेर्जी तो एन्जॉय करने में लग जायेगी।
सात-आठ साल पहले से ही प्रतियोगिता में पितामह का निशाना चूकना शुरू हो चुका था। जब मीडिया ने उनके चुक जाने की बात शुरू की तो अगले ही साल उन्होंने काशी से आई तीरंदाजी टीम के खिलाफ एक तीर से आठ पक्षियों को मार गिराया। बस फिर क्या था, विशेषज्ञों और पत्रकारों को लगने लगा कि उन्हें उनका खोया हुआ टच मिल गया है। लेकिन अगले साल से फिर उनका प्रदर्शन फिर से लुढ़कने लगा। हाल यह है कि आठ की तो कौन कहे, एक तीर से तीन पक्षी भी नहीं गिरते अब।
कितनी बार कहा कि तीरंदाजी में उनके लिए अब कुछ भी साबित करने के लिए बचा नहीं है लेकिन वे सुनें तब तो। समझते ही नहीं कि वे अपना चरम पर प्रदर्शन कर चुके हैं और अब समय आ गया है कि वे तीरंदाजी से संन्यास लेकर घर बैठें। घर बैठें और अपनी बायोग्राफी लिखें। स्वयं लिखने का मन न हो तो किसी पत्रकार को किराए पर ले लें और उससे लिखवा लें। इन पत्रकारों को भी चार पैसे मिल जायेंगे। वैसे भी इन बेचारों को कोई पूछता नहीं। ये दिन-रात मेरा, जयद्रथ, मामाश्री, दुशाशन और पिताश्री के गुणगान करते रहते हैं। ऐसे में पितामह की बायोग्राफी लिखने का काम मिल जाएगा तो इन्हें भी चाटुकारिता करने से उपजी बोरियत से कुछ समय के लिए ही सही, छुटकारा तो मिलेगा। बोरियत से छुटकारा मिलेगा तो ये दोबारा दोगुने उत्साह के साथ नए-नए तरीके से हमारे गुण गायेंगे।
मुझे हमेशा से ही इसबात का पूरा विश्वास रहा है कि पितामह की बायोग्राफी की खूब डिमांड होगी और उन्हें कोई न कोई बड़ा प्रकाशक भी मिल ही जाएगा। मामाश्री ने तो यहाँ तक कहा कि कि प्रकाशक नहीं मिल रहे तो मैं खुद ही एक पब्लिशिंग हाउस खोल दूँ ताकि पितामह और चाचा विदुर जैसे लोग अपनी बायोग्राफी लिखने के लिए उत्साहित रहे और रोज-रोज राजकाज के कार्यों में दखल देना बंद करें। यह बात अलग है कि कर्ण के अनुसार बायोग्राफी में लिखने के लिए बचा ही क्या है? अभी तक पितामह के ऊपर दस से ज्यादा पुस्तकें पहले ही छप चुकी हैं।
न जाने कितनी बार मैंने उनसे कहा होगा लेकिन पितामह ठहरे पितामह। हर बार यह कहकर टाल देते हैं कि; "फॉर्म इज टेम्पोरैरी बट क्लास इज परमानेंट वत्स, क्लास इज परमानेंट।"
तीरंदाजी के एक्सपर्ट्स और पत्रकारों ने मिलकर तीन-चार ऐसे जुमले गढ़ डाले हैं कि उन्हें आगे रखकर पितामह बीस-पच्चीस वर्ष तक और प्रतियोगिताओं में भाग ले सकते हैं। ऊपर से बीच-बीच में कृपाचार्य और गुरु द्रोण इनकी तीरंदाजी प्रतिभा की बड़ाई कर देते हैं तो उन्हें और बहाना मिल जाता है। कई बार तो मुझे खुद लगता है कि आचार्यों की बात आगे रखकर अभी बहुत समय तक वे प्रतिस्पर्धात्मक तीरंदाजी में अपने करतब दिखा सकते हैं। लगता है जैसे इच्छा मृत्यु की तरह ही इच्छा तीरंदाजी का वरदान भी दबाकर बैठे हैं।
समझ में नहीं आता कि अब दिखाने के लिए क्या बचा है? कुछ साबित करने के लिए भी किसी न नहीं कहा। विश्व भर में तो अपने करतब दिखा चुके हैं। क्या काशी और क्या मथुरा, क्या गंधार और क्या विदर्भ, कोई ऐसी जगह नहीं बची है जहाँ लोगों को उन्होंने अपनी प्रतिभा के दर्शन नहीं करवाए। जब पहली बार मैंने तीरंदाजी से संन्यास लेने की तरफ इशारा किया तो बोले; "वत्स दुर्योधन, मैं तुम्हारी बात समझता हूँ लेकिन मुझे अपने उस वचन की रक्षा करनी है जो मैंने पिताश्री को दिया था वत्स, जो मैंने अपने पिताश्री को दिया था। मैं इस बात को कैसे भूल जाऊं कि राष्ट्र की सुरक्षा का तात्पर्य केवल बाहर के राजाओं से सुरक्षा नहीं है वत्स, केवल बाहर के राजाओं से सुरक्षा नहीं है। राष्ट्र की सुरक्षा का तात्पर्य अन्य देश के तीरंदाजों को प्रतियोगिता में पराजित करना भी है वत्स, पराजित करना भी है।"
आजतक समझ में नहीं आया कि क्षण भर में आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत लेने वाले पितामह के लिए तीरंदाजी से संन्यास लेना इतना कठिन क्यों है? कितनी बार तो परशुराम जी ने कहा कि वे खुद प्रतियोगिता में भाग न लेकर राजकुमारों और युवराजों को तीरंदाजी के गुर सिखाएं परन्तु पितामह टस से मस नहीं हुए। पिछली बार परशुराम जी जब हस्तिनापुर पधारे थे तब उन्होंने फिर से संन्यास की बात की तरफ इनका ध्यान इंगित करते हुए कहा था; "हे भीष्म, एक तीरंदाज को उस समय तीरंदाजी से संन्यास की घोषणा कर देनी चाहिए जब वह अपने चरम पर प्रदर्शन कर रहा हो। जब लोग यह प्रश्न करें कि ये संन्यास क्यों ले रहे हैं?"
पितामह का उत्तर था; "मैं आपकी भावनाओं को प्रणाम करते हुए अनुरोध करना चाहूँगा कि अपने चरम पर रहते हुए अगर मैंने तीरंदाजी को त्याग दिया तो पूरा विश्व कहेगा कि मैं स्वार्थी हूँ। और अगर मैंने ऐसा किया तो पिताश्री की आत्मा मुझे कभी क्षमा नहीं करेगी महर्षि, कभी क्षमा नहीं करेगी।"
अब इन्हें कौन समझाये कि चाहे हस्तिनापुर के सारे तीरंदाजों का प्रदर्शन घटिया हो परन्तु मीडिया इन्ही के बारे में बात करेगी। इन्ही का विरोध करेगी। देखा जाय तो मैंने या दुशासन ने भी अवंती के तीरंदाजों के साथ होने वाली प्रतियोगिता में कोई तीर नहीं मारा परन्तु सब इन्ही को भला-बुरा कह रहे हैं। सब इन्ही के पीछे पड़े हैं। जितने तरह के विशेषज्ञ उतनी बातें।
एक विशेषज्ञ कह रहे थे कि ; "किंचित ऐसा हो रहा है कि उम्र के इस पड़ाव पर जब पितामह धनुष-वाण से लैस प्रतियोगिता स्थल पर जाते हैं उस क्षण दर्शकों की तालियों से उनका ह्रदय भर आता है और भावनाएं उन्हें अपने बाहुपाश में ले लेती हैं जिससे पितामह अपना लक्ष्य भूल जाते हैं।"
अब इस विशेषज्ञ को कौन समझाये कि उनका यह प्रदर्शन तो है आखिर उम्र की वजह से। वर्षों से इन्हें देखने वाले और आदर देने वाले दर्शक अपनी भावनाओं का प्रदर्शन तो करेंगे ही। इन्हें तो अपने लक्ष्य की तरफ देखना होगा। आखिर हाल यह हो गया है कि जिसने पूरे जीवन में धनुष-वाण को हाथ नहीं लगाया होगा वह भी कह रहा है कि पितामह तीरंदाजी भूल गए हैं। हर पान की दूकान पर, चाय की दूकान पर, हर हाट में, हर घाट पर, सब इन्ही के बारे में बात कर रहे हैं। लोग ऐसी बात करते हैं कि मुझे तक शर्म आ रही है।
एक और विशेषज्ञ का कहना है कि ; "पितामह का ध्यान अब तीरंदाजी से हटकर तमाम और विषयों पर चला गया है। अब तो राजमहल ने उन्हें उस कमिटी का अध्यक्ष भी बना दिया है जिसे हस्तिनापुर में न्याय प्रणाली की प्रक्रिया पर इन्क्वायरी करके एक रिपोर्ट देनी है। इसके पहले कम से कम ग्यारह कमिटियों पर वे थे ही। ऊपर से रोज-रोज इन्हें कुछ न कुछ करने बाहर जाना पड़ता है। कभी किसी विद्यालय में किसी डिपार्टमेंट का उदघाटन करने तो कभी कहीं और।"
मामाश्री का कहना है कि अब समय आ गया है कि आचार्य द्रोण, कृपाचार्य वगैरह इनसे बात करें। हो सकता है कल दरबार में इस विषय में कुछ बात हो।
Friday, August 3, 2012
दुर्योधन की डायरी - पेज १२१८
कल सुबह युवराज दुर्योधन की डायरी का यह पेज मिला जिसमें उन्होंने राजमहल में मनाये जानेवाले राखी के त्यौहार के बारे में लिखा है. आज टाइप करके पब्लिश कर रहा हूँ. बांचिये.
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आज राजमहल में राखी का त्यौहार मनाया गया. सावन की पूर्णिमा आने ही वाली है, इस बात की सूचना सबसे पहले राजमहल के सर्वेंट क्वार्टर्स से मिलती है. पिछले हफ्ते से ही सारथियों और चारणों के घरों से टेपरेकॉडर्स पर राखी वाले गाने बजने शुरू हो गए थे. एक से बढ़कर एक गाने जिन्हें सुनकर राजमहल के राजकुमार मन ही मन खुश तो होते हैं लेकिन अपनी ख़ुशी का इजहार सार्वजानिक तौर पर नहीं करते. मुझे वह गाना बहुत पसंद है जिसमें बहन भाई को त्यौहार का भावार्थ समझाते हुए कहती है कि जिसे वह रेशम का तार समझ रहा है असल में वह बहन का प्यार है. यह गाना शायद किसी फ़िल्मी गीतकार ने लिखा है. गाने के बोल हैं; "इसे समझो न रेशम का तार भइया, ये है बहना का प्यार भइया..." या फिर "ये है राखी का प्यार भइया..." ऐसा ही कुछ है.
गाने के बोल मुझे पूरी तरह से याद हैं लेकिन लिख दूंगा तो लोग़ मुझे डाउन मार्केट युवराज समझेंगे और मुझे हे दृष्टि से देखेंगे. राजमहल के अलिखित नियम के अनुसार एक युवराज डाउन मार्केट भले ही हो लेकिन दीखना नहीं चाहिए.
इन फ़िल्मी गानों के अलावा राखी के त्यौहार का पता करीब पंद्रह दिन से बाज़ार में सजी राखी की सीजनल दूकानों से मिलती है. ये दुकानें अपने साज श्रृंगार से हमें सूचना देती हैं कि त्यौहार आनेवाला है. वैसे तो हर वर्ष हस्तिनापुर के सबसे बड़े सभागार को किराए पर लेकर तमाम व्यापारी एक राखी फेयर का आयोजन करते हैं लेकिन फुटकर दुकानों का रहना भी आवश्यक है. ये दुकानें न रहें तो प्रजा कहाँ से राखी खरीदेगी? आखिर राखी फेयर में बिकनेवाली राखियाँ सब खरीद भी तो नहीं सकते.
हर वर्ष दुशाला करीब सवा सौ राखियों का ढेर इसी फेयर से ले आती है. बाज़ार में सजी दुकानें भी देखने में बुरी नहीं लगती. दुकानें चाहे जैसी हों, राखियों की चमक इन दूकानों को चमकाए रखती है. राखी की दुकानें मुझे होली की याद दिलाती हैं. राखी के अलावा होली ही ऐसा त्यौहार है जो सीजनल दुकानें खोलने की सुविधा देता है और रंग और गुलाल के कारण उन दिनों भी चिरकुट से चिरकुट दूकान सुन्दर लगती है.
माताश्री ने मामाश्री को राखी बांधी. ये अच्छा है कि मामाश्री वर्षों से यहीं जमे हुए हैं और माताश्री को हज़ारों मील जाकर उन्हें राखी नहीं बांधनी पड़ती. कई बार यह बात मन में आती है कि मामाश्री का हस्तिनापुर में रहने का केवल यही एक फायदा है बाकी तो सब नुकशान ही नुकशान है. माताश्री द्वारा राखी बाँधने पर मामाश्री जो स्वर्ण मुद्राएं सगुन में देते हैं वह भी इसी राजमहल की होती हैं. जितनी मुद्राएं मामाश्री गंधार से बांधकर माइग्रेशन के समय ले आये थे, वे सारी तो न जानें कितने वर्षों पहले ही ख़तम हो गईं. हाल यह है कि त्योहारों पर वे बलराम हलवाई की दूकान से जो लड्डू मंगवाते है, उसके लिए भी मुद्राएं मुझे ही देनी पड़ती हैं.
कई बार मैंने सलाह दी कि किसी चारण को गांधार भेजकर नानाश्री से स्वर्ण मुद्राएं मंगवा लें तो बहाना बना देते हैं. यह कहते हुए मना कर देते हैं कि हस्तिनापुर से गांधार तक का रास्ता बहुत बड़ा और खतरनाक है. पता चला कि कोई चारण उधर से स्वर्ण मुद्राएं लादकर चला और खाइबर पास तक आते-आते लुटेरों ने मुद्राएं लूट लीं. आगे बोले कि खाइबर पास के आगे तो रास्ता और भी खतरनाक है. स्वात घाटी तो संसार के सबसे भयंकर लुटेरों से भरी पड़ी है. मैंने तो यह भी कहा कि नानाश्री मुद्राओं की रक्षा के लिए पूरी सेना भी तो भेज सकते हैं लेकिन मामाश्री ने एक और तर्क देकर मामले को वही रफा-दफा कर दिया. तर्क या कुतर्क देना तो कोई इनसे सीखे. वैसे भी कोई क्यों सीखेगा? मामाश्री मेरे हैं और मैं उनके साथ रहता हूँ तो मैं सीखूँगा न.
हस्तिनापुर में उनके रहने का कम से कम यह फायदा तो हो कि उनके तमाम तर्क-कुतर्क केवल मैं सीखूँ.
दुशाला ने हम भाइयों को राखी बांधी. पूरे वर्ष में यही एक दिन होता है राखी बंधवाते हुए दुशाला के प्यार को देखकर मन में आता है कि सारे छल-कपट, क्रूरता, लड़ाई, झगड़े, राजपाट, वगैरह छोड़-छाड़ कर हम भाई, माताश्री, पिताश्री शांति से रहें. जीवन में परिवार के साथ शांति से रहने से अच्छा कुछ नहीं है. राखी वाले दिन अपने भाइयों के लिए उसके मन में प्यार को देखकर हम भाइयों के मन से सारे छल-कपट कुछ क्षण के लिए ख़तम हो जाते हैं.
मुझे याद है, एक बार मैंने यह सुझाव मामाश्री को दिया. मैंने कहा कि पांडवों के साथ लड़ाई-झगड़े से अच्छा है कि हमसब शांति से रहें तो वे भड़क गए. बोले एक राजकुमार के ऐसी बातें शोभा नहीं देतीं. बोले; "एक बात सदैव याद रखना भांजे, अपने उद्देश्य से भटकना मृत होने के समान है." जोश में आ गए और लगभग चिल्लाते हुए कहने लगे; "एक बात कभी मत भूलना भांजे, वर्षों से शेर की सवारी करने वाला युवराज जिस दिन शेर से उतरा, शेर उसे खा जाएगा."
उनके इस सदुपदेश पर कोई भांजा अपने मामाश्री क्या कह सकेगा? मैं चुप हो गया.
दुशाला ने आज राजमहल में राखी बाँधने का बढ़िया उत्सव आयोजित कर रखा था. गाने-बजाने का प्रोग्राम भी था. उसने कल शाम को ही हमें निर्देश दे रखा था कि मैं और बाकी के सारे भाई उसे राजमहल में एक ही जगह इकट्ठे मिलने चाहिए. ऐसा न हो कि कोई कहीं आखेट के लिए जंगलों में चला जाए और कोई बीयरपान करने. उसने तो सारथियों तक को कह रखा था कि अगर कोई भाई बाहर जाने का प्रोग्राम बनाये तो सारथी सबसे पहले उसे सूचित करें. कल शाम को उसने कहा; "भ्राताश्री, आचार्य बिंदु प्रकाश ने आदेश दिया है कि इस वर्ष वृषभ राशि वाले भाइयों को राखी बाँधने का शुभ मुहूर्त सुबह के दस बजे निकला है. इसलिए मैं चाहती हूँ कि आपसब राजमहल में ही रहें."
अजीब बात है. अब ये ज्योतिषी राशि के हिसाब से भी राखी बाँधने का मुहूर्त बताने लगे हैं. इन ज्योतिषियों के धंधे भी अजीब हैं.
खैर, हमसब ने राखी बंधवाई. राजकवि किसी कवि सम्मलेन में भाग लेने काशी गए हुए थे तो उसने उप-राजकवि से ही राखी गीत लिखवा लिया था. उप-राजकवि को भी क्या कहूँ? उन्होंने राखी-गीत में भी उन्ही शब्दों का प्रयोग किया जिनका प्रयोग वे वीर-रस की कविताओं में करते रहे हैं. मामाश्री की चापलूसी करके ये उप-राजकवि बने हैं लेकिन मैं कहता हूँ कि अयोग्य होने के बावजूद अगर सिफारिश करके एकबार आप कोई पदवी हथिया लेते हैं तो कोशिश करके अपने अंदर थोड़ा तो इम्प्रूवमेंट ले आयें लेकिन इन्हें कहाँ इस बात की समझ है? खैर, दुशाला ने अपनी सहेलियों के साथ उनका लिखा हुआ गीत गाया और उसके बाद राखी बांधी.
बाकी सब तो ठीक था लेकिन हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी उसे वही दिक्कत हुई. हर वर्ष राखी बांधते समय वह आधा लड्डू तो भाइयों को खिलाती है और बाकी का आधा खुद खाती है. आधे के हिसाब से हर वर्ष बेचारी को घंटे दो घंटे के अंदर ही पचास लड्डू खाने पड़ते हैं. देखकर तकलीफ होती है लेकिन कुछ किया भी तो नहीं जा सकता. ऊपर से इसबार बलराम हलवाई ने लड्डू बनाने के लिए जिस घी का इस्तेमाल किया वह मुझे थोड़ा घटिया लगा. एक तरफ तो यह बढ़िया घी का इस्तेमाल नहीं करता दूसरी तरफ हम भाइयों से कहता है कि राखी के दिन लड्डू खाते हुए हम सौ भाई अगर फोटो खिंचवा लें तो वह उन फोटो की होर्डिंग्स बनवाकर अपना विज्ञापन कर लेगा. लो कर लो बात. यह केवल लड्डू खिलाकर हम भाइयों से विज्ञापन करवाना चाहता है. इससे हमें क्या फायदा होगा? सारा फायदा तो इसका होगा. यह हमें बेवकूफ समझता है.
अरे अगर हमें फोटो खिंचवाना ही होगा तो हम प्रजा के बीच जाकर किसी आम आदमी के घर भोजन करते हुए फोटो खिंचवायेंगे और उसकी होर्डिंग लगवाएंगे कि इसके लिए विज्ञापन करेंगे?
खैर, त्यौहार बड़े मजे से मनाया गया. मैंने दुशाला को परफ्यूम भेंट किया. दुशासन ने उसके लिए अवंती से साड़ियाँ मंगवा रखी थीं. उसने उसे उपहार में साड़ियाँ दी. यह अलग बात है कि उसे ज्यादातर साड़ियों का रंग पसंद नहीं आया. दुशासन ने तुरंत अपने गुप्तचरों को आदेश दिया कि अगली बार जब अवंती से साड़ियों का व्यापारी हस्तिनापुर पधारे तो उसको किडनैप करके उसके पास जितनी भी साड़ियाँ हो, उसे दुशाला के सामने लाया जाय. बहन को जो साड़ियाँ पसंद आएँगी, वह उन्हें रख लेगी. आज उपहार के रूप में जो साड़ियाँ उसे पसंद नहीं आयीं, उस बात के लिए अवंती के साड़ी व्यापारी को दण्डित करने का एक ही तरीका है और वह ये है कि उसे साड़ियों की कीमत न दी जाय.
अब सोने जाता हूँ. कल सुबह जल्दी उठना है. मामाश्री ने आदेश दिया है कि कल हमसब को मिलकर लाक्षागृह में पांडवों को जलाकर मार देने के प्रोग्राम को अंतिम रूप देना है.
Wednesday, February 29, 2012
दुर्योधन की डायरी - पेज २९९३
फिर से बहस शुरू हो गई कि क्या क्रिकेट की वजह से हॉकी और बाकी के खेलों की दुर्गति हो रही है? हर एक-दो साल पर ऐसी बहस छेड़ी जाती है ताकि हमारी बहस प्रधान संस्कृति की रक्षा होती रहे. क्या कहा आपने? यह हमारी संस्कृति कैसे हुई? तो फिर मैं आपको बता देता हूँ कि हमारी संस्कृति में एक खेल दूसरे खेलों को हजारों साल से दबाता आया है. अगर यकीन नहीं आये तो युवराज दुर्योधन की डायरी का यह पेज बांचिये.
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फिर से वही बवाल खड़ा हो गया है. फिर से लोग़ इस बात पर हलकान हुए जा रहे हैं कि एक खेल के रूप में तीरंदाजी को जितनी प्राथमिकता मिल रही है उतनी न तो तलवारबाजी को मिल रही है और न ही कुश्ती को. गुप्तचर बता रहे थे कि मीडिया, प्रजा, बुद्धिजीवी, पत्रकार, कलाकार, तक आजकल इतने हलकान हैं कि उन्हें भूख भी देर से लग रही है. एक गुप्तचर तो मुझसे यह बताकर मेरे गले में पड़ा हार उतरवा ले गया कि मंहगाई के बवाल को भी भुलाकर पूरा हस्तिनापुर इसी एक मसले पर बहस किये जा रहा है. चाय-पान की दूकान से लेकर अखबारों के सम्पादकीय पृष्ठों तक में बस यही मसला छाया हुआ है. यह सब देखकर लगता है कि लोगों को बवाल खड़ा करने के लिए विषयों की कमी न तो पहले थी और न ही आज है. अपने अनुभवों से लिख सकता हूँ कि हस्तिनापुर में जब खड़े होने की बात आती है तो मार्ग में बैठा बैल और राजमहल में बैठा राजकुमार भी बवाल का मुकाबला नहीं कर सकता. मार्ग में बैठे बैल को खड़ा करने के लिए पुचकार से लेकर गुस्सा और डंडा तक दिखाना पड़ता है लेकिन बवाल ऐसे ही खड़ा हो जाता है. राजमहल में बैठे राजकुमार को उठाने के लिए कहीं किसी मामे या कहीं किसी जीजे को मशक्कत करनी पड़ती है लेकिन बवाल खड़ा कर देना चुटकी बजाने का काम हो गया है.
कोई भी कभी भी और कहीं भी बवाल खड़ा कर सकता है.
राजमहल के गुप्तचर से लेकर विशेषज्ञ तक इस बात पर खुश हैं कि बवाल खड़ा करने जैसे कर्म पर अब बुद्धिजीवियों, लेखकों, कवियों और गुरुओं का एकतरफ़ा अधिकार नहीं रहा. हालत यह हो गई है कि प्रजा के दो-चार चिरकुट भी किसी पत्रकार के साथ मिलकर बवाल खड़ा कर सकते हैं. अभी तीन-चार महीने पहले ही इनलोगों ने मंहगाई की समस्या पर बवाल खड़ा कर दिया था और अब इस तीरंदाजी को मिलने वाली प्राथमिकता पर. मुझे तो यहाँ तक लगता है कि ये लोग़ एक बवाल से जल्दी ही बोर भी हो जाते होंगे नहीं तो हर दो महीने पर नए मसलों पर बवाल कैसे खड़ा होता? पिछले कई वर्षों से खेलों में तीरंदाजी को मिलने वाली प्राथमिकता पर छुट-पुट बहस हो जाया करती थी और लोग़ बहस-धर्म का पालन करके चुप हो जाया करते थे. लेकिन पता नहीं क्यों इस बार मामला कुछ ज्यादा ही छाया हुआ है.
सभी को यह शिकायत है अन्य खेलों के मुकाबले में तीरंदाजी को बहुत ज्यादा तवज्जो मिल रही है. न सिर्फ विशेषज्ञों, पत्रकारों और बुद्धिजीवियों का बल्कि प्रजा का भी मानना है कि तीरंदाजी की वजह से बाकी के खेल जैसे तलवारबाजी, भाला-फेंक, ऊंची कूद, लम्बी कूद, लंगड़ी, लबेद, ढेला-फेंक, कुश्ती वगैरह बैकसीट पर चले गए हैं. कोई न तो ऐसे खेल खेलना चाहता है और न ही इनके बारे में बात करता है. लोगों को इस बात की शिकायत भी है कि हस्तिनापुर की मीडिया भी केवल तीरंदाजी को ही तवज्जो दिए जा रही है.
कई बार तो मन में आया कि ऐसी बहस को रोकने का जो फूलप्रूफ तरीका है उसको लगाकर इस बहस पर विराम डलवा दूँ. मन में आया कि चचा विदुर से कहकर गुरु द्रोण, कृपाचार्य और पितामह वाली एक थ्री मेम्बर कमिटी का गठन करवा दिया जाय जो यह पता लगाए कि क्या सच में तीरंदाजी को बाकी खेलों के मुकाबले ज्यादा तवज्जो मिल रही है? अगर ऐसा है तो क्यों है, कब से है और कैसे इसे दूर किया जा सकता है? वह तो भला हो मामाश्री का जिन्होंने मेरे मन में उपजे इस विचार को अपनी आज्ञा का बाण चलाकर धरासायी कर दिया.
मामाश्री का कहना था कि ऐसा करने की ज़रुरत नहीं है. कमिटी बैठाने से प्रजा शांत हो जायेगी और फिर से महंगाई का मसला लेकर आवाज़ उठाना शुरू कर देगी. ऊपर से एक बार कमिटी के गठन की सूचना प्रजा तक पहुंची तो फिर वह कमिटी के रिपोर्ट की प्रतीक्षा करने लगेगी. और फिर प्रजा का क्या भरोसा? कहीं द्रौपदी के गुप्तचरों ने भड़का दिया तो फिर रिपोर्ट न आने पर जुलूस से लेकर नारेबाजी तक कर सकती है. ऊपर से आजकल कमिटी की रिपोर्ट चचा विदुर के पास जाने से पहले ही लीक भी होने लगी हैं. हमेशा इस बात का खतरा रहता है कि कहीं किसी अखबार का सम्पादक कमीशन रिपोर्ट को लीक करवाने का प्लान बना रहा होगा. मामाश्री के सुझाव पर इच्छा हुई कि फट से नारा लगा दूँ कि; "जब तक सूरज चाँद रहेगा, मामा तेरा नाम रहेगा" लेकिन कर्ण वहीँ बैठा था इसलिए नारा नहीं लगा सका.
ऐसा सीरियस मित्र मिला है कि इसके सामने बचकानी हरकतें भी नहीं कर सकता.
एक दिन मैंने मामाश्री से पूछा था कि तीरंदाजी ने बाकी खेलों को पीछे छोड़ दिया है तो इसका क्या कारण हो सकता है? बिफर पड़े. बोले कि मैं युवराज हूँ मुझे ऐसी चिरकुट बातों के बारे में नहीं सोचना चाहिए. अगर मैं ऐसी बातों पर अपना समय देने लगा तो फिर पांडवों के खिलाफ साजिश कौन करेगा? उन्हें सताने क प्लान कौन बनाएगा? अगर मैं ऐसी बातों के बारे में सोचने लगा तो फिर बन चुका युवराज. उन्होंने बात को आगे बढ़ने ही नहीं दिया. यह बोलकर कमरे से निकल
गए कि इस तरह के प्रश्न एक युवराज को शोभा नहीं देते. युवराज अगर खेलों के बारे में चिंतित होने लगे तो फिर लड़ाई-झगड़ा, राज-हड़प, साजिश-वाजिश के बारे में कौन सोचेगा?
लेकिन मन ही तो है. जो सवाल मन में आया तो जाने क नाम ही नहीं ले रहा था. शाम को तीन पत्ते खेलने समय भी यह बात मन से नहीं गई. विचार किया. फिर काफी विचार किया. और किया. करता गया. जितना सोचता, बार-बार आँखों के सामने धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाये मछली की आँख पर निशाना साधे अर्जुन दिखाई दे रहा था.
फिर मन में यह आया कि ऐसा क्यों न हो? तीरंदाजी में जो ग्लैमर है वह किसी और खेल में कहाँ है? धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाए योद्धा को तो जाने ही दीजिये ऐसा करते हुए मनुष्य भी बड़ा स्मार्ट लगता है. कोई योद्धा प्रत्यंचा न भी चढ़ाए और अपना धनुष-बाण लिए कहीं बैठे-बैठे अगर उसे निहारता भी है तो भी बड़ा क्यूट लगता है. जैसे हाथ का कमंडल और सिर पर कच्चे-पक्के केश का जूड़ा टुटपुन्जिये ऋषि को भी महान बना देता है वैसे ही धनुष-बाण किसी भी आदमी को योद्धा या राजकुमार के रूप में प्रस्तुत कर सकता है.
धनुष-बाण से लैश कोई राजकुमार जब राजमहल से निकलता है तो देखते ही बनता है. कई बार तो मैं खुद जब कंधे पर धनुष और तरकश टाँगे चलता हूँ तो मन में एक ही विचार आता है कि मुझे देखकर इस समय देवतागण न सिर्फ प्रसन्न हो रहे होंगे बल्कि पुष्पवर्षा भी कर रहे होंगे. यह बात और है कि आजतक कोई भी पुष्प मुझसे आकर नहीं टकराया. मेरी बड़ी तमन्ना है कि एक बार देवताओं द्वारा बरसाया गया पुष्प आकर मुझसे टकराए. सिर पर गिरकर घायल भी कर जाएगा तो भी कोई गम नहीं.
यह ऐसा अस्त्र है जो किसी भी राजकुमार के व्यक्तित्व में चार-चाँद लगा देता है. इधर राजकुमार ने कंधे पर धनुष टांगा नहीं कि उधर उसकी चाल में अंकड़ अपने आप आ जाती है. कई बार तो मैंने खुद महसूस किया है कि दुशासन की चाल में आई अकड़ उसके कंधे पर रखे धनुष-बाण का नतीजा है. जब भी वह धनुष-बाण लिए चलता है तब द्रौपदी की साड़ी न उतार पाने की वजह से उसके मन में पैदा हुआ डिप्रेशन भी फट से गायब हो जाता है.
दूसरी बात यह है कि धनुष-बाण हर तरह के साज-सज्जा के साथ फबता है. किसी दिन राजकुमार अगर मुकुट, आभूषण, माला, केश-सज्जा, मेक-अप वगैरह न भी करे और केवल श्वेत वस्त्र पहने सन्यासी के वेश में भी निकले तो भी ग्लैमरस दिक्खेगा बस शर्त यह है कि वह कंधे पर धनुष-बाण रख ले. कंधे पर रक्खा धनुष-बाण लप्पू से लप्पू राजकुमार को भी फोटोजेनिक बना देता है. वहीँ शरीर पर लपेटी गई धोतिका के साथ अगर राजकुमार तलवार या गदा लेकर चले तो कोई भी उसे राजकुमार मानने के लिए राजी नहीं होगा. सबको यही लगेगा कि कोई गरीब ब्रह्मण किसी राजकुमार की गदा और तलवार चुराकर लिए जा रहा है. ऊपर से धोतिका लपेटे राजकुमार अगर भाला लेकर चले तो लगेगा कि कोई ऐसा सैनिक है जिसे दो-चार दिन पहले ही सेना में भर्ती किया गया है और उसकी पोशाक अभी तक सिलाई होकर नहीं आई है.
वैसे भी तीरंदाजी की एक सबसे बढ़िया बात यह है कि छोटा-मोटा योद्धा भी महीने-दो महीने की प्रैक्टिस कर ले तो वह भी धनुर्धारी बन सकता है. आखिर दूर से ही तो बाण छोड़ना है. लगा तो लगा और नहीं लगा तो दूसरा बाण है. उसे चला लेगा. अब यह कोई गदा या तलवार तो है नहीं कि आमने-सामने युद्ध करना पड़ेगा और अगर वार चूक गया तो कर्म के अनुसार स्वर्ग या नरक की यात्रा करनी पड़ जायेगी. धनुष-बाण चलाना सबको सरल लगता है. उसके आगे भी देखा जाय तो फिर सभी अपने कर्मों से तीरंदाजी को ही प्रमोट करते रहे हैं. गुरु द्रोण को ही ले लो. अर्जुन की ऐसी ईमेज बना दी है इन्होने कि छोटे-छोटे बच्चे अर्जुन ही बनना चाहते हैं. कोई भीम नहीं बनना चाहता. यहाँ तक कि एकलव्य के मन में गुरु द्रोण की चेलाई का ख़याल आया तो उसने भी उनकी प्रतिमा बनाने के बाद हाथ में धनुष-बाण ही उठाया. पाठशाला में प्रतियोगिता हुई तो वह भी चिड़िया की आँख में बाण मारने की. द्रौपदी के स्वयंवर में भी प्रतियोगिता हुई तो वहाँ भी मछली की आँख को बाण से बेध देने की ही प्रतियोगिता हुई. यहाँ तक कि एकलव्य को भी जब परफॉर्म करने का मौका मिला तो उसने भी स्वान के मुँह की सिलाई तलवार से नहीं बल्कि बाणों से ही की.
पता नहीं हम कबतक संस्कृति को ढोते रहेंगे. मुझे तो लगता है कि हमारा धनुष-बाण प्रेम श्री राम के जमाने से शुरू हुआ जब सीता जी के स्वयंवर में भी कुछ उठाने की बात आई तो वहाँ भी धनुष को प्राथमिकता दी गई. मैं कहता हूँ वहाँ क्यों नहीं कोई गदा या तलवार रखी गई? अगर ऐसा हुआ होता तो शायद आज हस्तिनापुर में और भी खेलों को महत्वपूर्ण माना जाता. केवल तीरंदाजी पर ही जाकर सबकुछ ख़तम नहीं होता.
Tuesday, February 7, 2012
दुर्योधन की डायरी - पेज ३४२१
जबसे युद्ध की घोषणा हुई है, जान का बवाल हो गया है. जगह-जगह जाकर सपोर्ट के लिए गिड़गिडाना पड़ रहा है. न दिन को चैन और न रात को आराम. इतनी जगह जाकर राजाओं से सपोर्ट के लिए रिक्वेस्ट करने से तो अच्छा था कि केशव की बात मानकर पांडवों को पाँच गाँव ही दे देता. आज ही केशव का सपोर्ट लेने द्वारका पहुँचा. द्वारका की सीमा में रथ घुसा ही था कि पत्रकारों की तरफ़ से चिट्ठी मिली. इन पत्रकारों को भी कोई काम-धंधा नहीं है. जहाँ कहीं पहुँच जाओ, ये अपने सवाल की लिस्ट लिए खड़े रहते हैं. पत्रकार महासभा की तरफ़ से जो चिट्ठी मिली उसमें आग्रह किया गया था कि एक प्रेस कांफ्रेंस कर दूँ. आग्रह तो क्या, पढ़कर लगा जैसे ये पत्रकार धमकी दे रहे हैं कि केशव से मिलने से पहले प्रेस कांफ्रेस नामक नदी पार करना ही पड़ेगा.
सवाल वही घिसे-पिटे. "आपने पांडवों को वनवास और अज्ञातवास दिया था. इसके लिए आप दुःख व्यक्त करते हैं क्या?"
अब इस सवाल का क्या जवाब दूँ? दुःख ही व्यक्त करना रहता तो इतने कुकर्म क्यों करता? पहला कुकर्म करने के बाद ही दुखी होकर हिमालय के लिए निकल लेता और सारा जीवन भोजन, भ्रम, भाषण में काट देता. मन में तो आया कि एक सवाल मैं भी पूछ लूँ कि; "युवराज भी दुखी होते हैं कभी?"
मैं पूछता हूँ दुखी होने के लिए लोगों की कमी है क्या? इन पत्रकारों का मन प्रजा का दुःख देखकर नहीं भरता जो चाहते हैं कि युवराज भी दुखी हो जाए?
एक पत्रकार ने तो यहाँ तक पूछ दिया कि; "लाक्षागृह में पांडवों को जलाकर मार देने की कोशिश नाकाम होने के पीछे क्या कारण थे?" पूछ रहा था; "क्या राजमहल का कोई व्यक्ति पांडवों से मिला हुआ था?"
अब कोई इसका क्या जवाब दे? सालों पहले हुई घटनाओं पर प्रश्न पूछना कहाँ की पत्रकारिता है? एक बार मन में आया कि ये पत्रकार और बात पर सवाल क्यों नहीं करते? राजमहल द्वारा चलाई गई योजनाओं पर सवाल क्यों नहीं करते? फिर मन में आया कि राजमहल की योजनाओं पर सवाल करेंगे तो उन योजनाओं से जुड़े भ्रष्टाचार पर भी सवाल उठेगा. ऐसे में यही ठीक है कि ये पत्रकार उन्ही पुरानी बातों को लेकर पड़े रहें. ये हमारे लिए भी अच्छा है और मामाश्री के लिए भी.
एक पत्रकार ने पूछा; "युद्ध शुरू होने से मंहगाई की समस्या गहरा जायेगी. ऐसे में प्रजा में असंतोष व्याप्त होगा?"
इस तरह के बेतुके सवाल सुनकर दिमाग भन्ना जाता है. हर बार वही सारे सवाल. मैं यहाँ युद्ध को लेकर चिंतित हूँ और इन पत्रकारों को मंहगाई की पड़ी है.
कोई पूछ बैठा कि सालों से जो कुकर्म हम करते आए हैं, उनके लिए हम माफी मांगने के लिए तैयार हैं क्या?
अरे, हम माफी क्यों मांगे? किस-किस कुकर्म पर माफी मांगते फिरेंगे? ऐसा शुरू किया तो देखेंगे कि पूरा जीवन ही माफीनामा लिखते बीत गया. फिर हम राजा कब बनेंगे?
एक पत्रकार ने पूछा कि दुशासन ने मेरे ही कहने पर द्रौपदी की साड़ी उतारने की कोशिश की थी. द्रौपदी चूंकि केशव की बहन है, ऐसे में मैं केशव से युद्ध के लिए मदद कैसे मांग सकता हूँ?
इस पत्रकार का सवाल सुनकर तो लगा कि उसका गला वहीँ दबा दूँ. फिर याद आया कि ये हस्तिनापुर नहीं बल्कि द्वारका है. ऊपर से मैं यहाँ सपोर्ट लेने के लिए आया हूँ. ऐसे में राजनीति का तकाजा यही है कि गला दबाने के प्लान को डिस्कार्ड कर दिया जाय. यही सवाल हस्तिनापुर के किसी पत्रकार ने किया होता तो जवाब में "नो कमेन्ट" कह कर निकल लेता. ऊपर से बाद में पत्रकार की कुटाई भी करवा देता. लेकिन द्वारका में ऐसा कुछ कर नहीं सकता. जब तक केशव का सपोर्ट हासिल न हो जाए, कुछ भी करना ठीक नहीं होगा.
यही कारण था कि मुझे कहना ही पड़ा कि अगर उस समय ऐसा कुछ हुआ था तो वो दुर्भाग्यपूर्ण था. न्याय-व्यवस्था का काम है कि उस घटना की पूरी तहकीकात करे और अगर दुशासन का दोष निकलता है तो उसे सजा मिलेगी. मेरी इस बात पर पत्रकार पूछ बैठा कि; "तहकीकात की क्या ज़रूरत है? आप तो वहीँ पर थे."
अब इसका क्या जवाब दूँ? पत्रकारों को समझ में आना चाहिए कि राज-पाट चलाने का एक तरीका होता है. हर काम थ्रू प्रापर चैनल होना चाहिए. जांच होगी. सबूत इकठ्ठा किए जायेंगे. उसके बाद न्यायाधीश बैठेंगे. न्यायाधीश सुबूतों की जाँच करेंगे. उसके बाद फ़ैसला सुनायेंगे. वैसे यह अच्छा है कि ऐसे सवाल किये जाते हैं तो हमारे पास न्याय-व्यवस्था में अपनी आस्था जताने का मौका मिल जाता है.
वैसे पत्रकारों से मैंने वादा कर डाला है कि उस घटना की जांचा करवाऊंगा. वादा करने में अपना क्या जाता है? एक बार युद्ध ख़त्म हो जाए तो फिर कौन याद रखता है ऐसे वादों को? युद्ध समाप्त हो जाए तो फिर इन पत्रकारों से भी निबट लूंगा और उनके सवालों से भी. अगर युद्ध समाप्त होने के बाद फिर से कोई ये मामला उठाएगा ही तो एक जाँच कमीशन बैठा दूँगा. मेरे पिताश्री का क्या जाता है? मैंने तो सोच लिया है कि अगर जाँच कमीशन बैठाना भी पड़ा तो क्या फ़िक्र? मैं जो चाहूँगा, वही तो होगा. मैं तो साबित कर दूँगा कि दुशासन ने द्रौपदी की साड़ी उतारने की कोशिश नहीं की. ख़ुद द्रौपदी ही राज दरबार में आकर अपनी साड़ी उतारने लगी. ताकि वहां हंगामा करके दुशासन को फंसा सके.
ऐसी रिपोर्ट बनवा दूँगा कि द्रौपदी को ही सज़ा हो जायेगी.
Wednesday, January 4, 2012
दुर्योधन की डायरी - पेज १४८९
फिर से वही बातें. फिर से वही नीतिवचन. जिसे देखो एक ही बात की रट लगाए हैं कि पांडवों को उनका राज-पाट वापस मिलना चाहिए. मैं पूछता हूँ कौन सा राज-पाट? जो उनका कभी था ही नहीं? जिसकी थोड़ी-बहुत भी औकात है वह भी दिन में चार बार नीतिवचन ठेल देता है. एक ही बात समझाये जा रहा है कि हम हस्तिनापुर का राज-पाट पांडवों को सौंप दें. मैं पूछता हूँ क्या पिताश्री ने यह राज-पाठ उनको वापस सौंपने के लिए स्वीकार किया था? राज-पाट न हुआ पड़ोसी का गहना हो गया जिसे किसी उत्सव से वापस आने के बाद शरीर से उतारें और उसे सौंप दें.
एक पितामह हैं. पहले मन ही मन चाहते थे कि पांडवों को उनका राज-पाट वापस मिल जाए लेकिन अब तो चचा विदुर से बात-बात में बोल भी देते हैं. साथ ही एक प्रश्न जोड़ देते हैं - तुम कहो विदुर कि नीति क्या कहती है? मुझे क्या पता नहीं है कि वे ऐसा क्यों करते हैं? मुझे सब पता है. मैं बच्चा थोड़े न हूँ. मैं पूछता हूँ क्यों दूँ वापस? कभी-कभी तो यह लगता है कि पितामह से निपटने के लिए मामाश्री का सुझाव ही ठीक था. मुझे याद है कि एक दिन मीटिंग में मामाश्री ने कहा था कि जब यह लगे कि पितामह राज-पाट वापस देने के लिए बहुत ज्यादा हस्तक्षेप कर रहे हैं तब उन्हें बदनाम कर दिया जाय. मीडिया में यह खबर फैला दी जाय कि काशीनरेश की पुत्रियों को इन्होने जो वर्षों पहले किडनैप किया था, उसके लिए आजकल ये हर महीने पश्चाताप सप्ताह मनाते हैं. मामाश्री का कहना था कि एक बार अगर यह बात फैला दी गई तो फिर लोग़ इनके पश्चाताप की बात नहीं करेंगे बल्कि यह सवाल उठाने लगेंगे कि काशीनरेश की पुत्रियों को किडनैप करके अपने भाई के साथ ज़बरदस्ती उनका विवाह कर देना नीतिगत सही कर्म था या नहीं? ऐसा होने से हर चाय-पान की दूकानों पर रोज पितामह की बेईज्ज़ती ख़राब होगी.
वैसे कहने को तो खुद मैंने पिताश्री से कितनी बार कहा कि जब भी ये पांडव राज-पाट वापस देने की बात शुरू करें, हमें काकाश्री पांडु के ऊपर ऋषी किन्दम की हत्या का आरोप लगाकर उनकी ईमेज का सत्यानाश कर देना चाहिए. एक बार काकाश्री के ऊपर आरोप लगने शुरू हुए और प्रजा में कन्फ्यूजन बना तो फिर उनके पुत्रों के विरुद्ध भी कुछ न कुछ प्लांट कर ही देंगे. और फिर नहीं भी कर सके तो लोग़ तो प्रश्न पूछेंगे ही कि जिस राजा के माथे पर एक ऋषि की हत्या का कलंक है उसके पुत्रों को राज करने का अधिकार है या नहीं? इतिहास बताता है कि प्रजा के लोगों को प्रश्न पूछने में बड़ा मज़ा आता है. वैसे भी जब एक धोबी ने श्रीराम से प्रश्न पूछ लिए तो पांडव किस खेत के बैंगन हैं? और अगर यह बात प्रजा के लोग़ नहीं भी पूछ सके तो फिर अपने विद्वान किस दिन काम आयेंगे? उनसे कॉलम लिखवा कर पांडवों की इज्ज़त के परखच्चे उड़वा दूंगा.
इतना बढ़िया सुझाव था लेकिन पिताश्री माने तब तो? मेरी बात को कान ही नहीं देते. कहने लगे कि चचा विदुर से विचार करके बतायेंगे. अरे चचा विदुर कभी हमारे पक्ष में कुछ कहते हैं जो इस बात पर हमारा पक्ष लेंगे?
मैं कहता हूँ क्या बुराई है ऐसा करने में? पिताश्री कहने लगे कि किसी मृत व्यक्ति के लिए मरणोपरांत इस तरह की बात करना राजनीति के नियमों के विरुद्ध है. राजनीति के नियम, माय फुट. मैंने तो यहाँ तक कहा कि ठीक है अगर वे नहीं चाहते कि मरणोपरांत उनके भाई की बेईज्ज़ती इस बात से हो कि उन्होंने ऋषि किन्दम की हत्या की थी, तो इसी बात को फैला देते हैं कि काकाश्री ने आखेट के दौरान गौ-हत्या कर दी थी. इस बात का आरोप लगाकर भी तो उनकी बदनामी करवाई जा सकती है. जितने गवाहों की ज़रुरत होगी मैं ले आऊंगा. लेकिन उन्होंने मेरी इस बात पर को भी नहीं सुना. मेरी बात मान ली गई होती तो आज पितामह और चचा विदुर किस मुँह से पांडवों को राज-पाठ वापस सौंप देने की बात करते?
कैसे बताऊँ कि इनलोगों को राज-पाट सौंप देने की बात पर मेरी छाती पर सांप डोल जाते हैं. कैसे भूल जाऊं कि इस भीम ने मुझे और मेरे भाइयों को कितना सताया है. आजतक याद है कि एकबार मैं और दुशासन पेड़ पर कैरी तोड़ने चढ़े थे तो इसी भीम ने लात मारकर पेड़ हिला दिया था और हम दोनों भाई पके हुए आम की तरह गिर गए थे. कैसे भूल जाऊं कि यही भीम मेरे भाइयों को केश से पकड़कर उनका माथा आपस में भिड़ा देता था. ऐसा लुच्चा भीम था और ये लोग़ उसे ही राज-पाट सौंपना चाहते हैं? ये गुरु द्रोण, वैसे तो सामने कुछ नहीं कहते लेकिन मैंने सुना है कि वे भी चाहते हैं पांडवों को उनका तथाकथित अधिकार मिलना चाहिए. मैंने तो मामाश्री से साफ़-साफ़ कह दिया है कि जिस दिन ये बोले उस दिन पूरा हस्तिनापुर देखेगा कि मैं क्या करता हूँ? पूरी मीडिया में इनका पुराना केस खुलवा दूंगा कि कैसे इन्होने एकलव्य से उसका अंगूठा कटवा लिया था. मानवाधिकार वालों को इनके पीछे ऐसा लगाऊंगा कि इन्हें मुँह छिपाने के लिए जंगल कम पड़ जायेंगे.
एक बात समझ में नहीं आती. मेरे, कर्ण, दुशासन और मामाश्री के रहते पिताश्री सलाह भी लेते हैं तो हमेशा ही एक मामूली राजनीतिज्ञ कणिक से. कल शाम को पिताश्री ने बुलाया था वो भी ढाई घंटा लेक्चर दे गया. मैं पूछता हूँ कि इस मामले में जो काम हमारी धूर्त-मण्डली कर पाएगी क्या कणिक कर पायेगा? आज शाम को मीटिंग में मामाश्री ने सुझाव दिया है कि अब समय आ गया है कि हर पांडव के नाम से दस-पाँच लफड़े मीडिया में फैला दिए जायें.
मामाश्री ने तमाम बातों की लिस्ट बना ली है. सबसे पहले भीम की ऐसी-तैसी करनी है. अब समय आ गया है कि भीम और हिडिम्बा की मैरेज को एक बड़ा इश्यू बनाया जाय. प्रजा को यह बताया जाय कि भीम ने एक राक्षसी के साथ कैसे विवाह किया? इस विवाह के बाद क्या पांडवों को अधिकार है कि वे राज-पाट वापस मिलने की बात करें? साथ ही भीम और हिडिम्बा के विवाह के लिए युधिष्ठिर को दोषी करार दे दिया जाय. विद्वानों और बुद्धिजीवियों को कहकर इस बात पर जोर डलवाता हूँ कि वे लिखें कि एक आर्य ने राक्षसी के साथ विवाह किया तो इसमें युधिष्ठिर का भी हाथ है. भीम तो हिडिम्बा को मारने जा रहा था लेकिन युधिष्ठिर ने उसे समझा-बूझा कर भीम को विवश किया कि वह हिडिम्बा से विवाह कर ले. यह प्रश्न उठाया जाय कि अगर बड़ा भाई अपने छोटे भाई को रोकने की बजाय एक राक्षसी के साथ विवाह करने के लिए उकसाता है तो फिर ऐसा व्यक्ति क्या राज-पाठ ग्रहण करने लायक है? जो व्यक्ति अपने भाई को गलत रास्ते पर जाने के लिए उकसा सकता है, क्या गारंटी है कि वह राज-पाट ठीक तरह से चलाएगा? क्या गारंटी है कि वह हस्तिनापुर को किसी के हाथों बेंच नहीं देगा?
फिलहाल तो पांडवों के चरित्र-हनन की शुरुआत यहाँ से शुरू करते हैं. आगे बाकी पांडवों के विरुद्ध कुछ न कुछ निकालते रहेंगे. कल मामाश्री ने कुछ समाचार पत्रों के संपादकों की मीटिंग बुलाई है ताकि इस पर काम शुरू किया जा सके.
Wednesday, December 7, 2011
दुर्योधन की डायरी - पेज ३२०३
बहुत बढ़ गई है प्रजा भी. बताओ, मेरे फैसले पर बवालिया निशान लगा दिया. ऐसा कौन सा जुलुम कर दिया मैंने जो प्रजा इस तरह से बवाल कर रही है? अरे मैंने यही तो ढिंढोरा पिटवाया कि प्रजा के लोग़ चाय-पान की दुकानों में बैठकर राजमहल के बारे में उल्टी-सीधी बातें न किया करें? मैं कहता हूँ उल्टी-सीधी बातें करने के अलावा भी कोई काम है कि नहीं इनके पास? कोई काम नहीं है तो चौपाल पर बैठकर बिरहा गायें? खुद इनलोगों को भी आनंद आएगा. अगर बिरहा इसलिए नहीं गा सकते क्योंकि पुरानी धुनें अब बोर करती हैं तो नई धुनें तैयार करें. नई धुनें तैयार नहीं कर सकते तो परदेस के किसी संगीतकार की धुन चुरा लें. किसी फ़िल्मी गाने की धुन चुरा लें. मैं कहता हूँ मन हो तो चाहे संगीतकार को ही चुरा लें लेकिन बिरहा गाते रहें. इनका मन भी बहलता रहेगा और राजमहल के लोगों को गाली देकर जीभ थका देने की ज़रुरत भी नहीं पड़ेगी.
आठ-नौ महीनों से गुप्तचर रपट दे रहे थे कि प्रजा के लोग़ न केवल मेरे बारे में बल्कि दुशासन, कर्ण, जयद्रथ और दुशाला के बारे में भी उल्टी-सीधी बातें करते हैं. किसी को जयद्रथ के मदिरापान करके सड़कों पर बवाल करने पर रोष है तो कोई इस बात पर गुस्सा है कि दुशासन ने उसकी बहन को मेले में छेड़ दिया था. कोई ये कह रहा है कि मामाश्री गंधार से आयात किये जाने वाले घोड़ों पर दलाली खाते हैं. मुझे आश्चर्य तो तब हुआ जब लोग़ इस बात पर भी बहस करने लगे कि राजमहल ने उस पानवाले को वाणिज्य और व्यापार में उसके योगदान के लिए भरतश्री से सम्मानित क्यों किया जिसकी दूकान से दुशासन पान खाता है? किसी को महगाई बढ़ जाने से शिकायत है तो किसी को किसानों की खराब होती हालत पर.
यहाँ तक कि लोग़ पुरानी बातें भी खोदकर निकाल ले आये हैं. बिना सबूत के यह आरोप लगा रहे हैं कि गुरु द्रोण के आश्रम में पढ़ाई-लिखाई के दौरान मैंने और दुशासन ने भीम को खीर में जहर खिलाकर मार देने की कोशिश की थी. मैंने पूछता हूँ कहाँ है सुबूत कि हम भाइयों ने ऐसा कुछ किया? किसके पास है इस बात का सुबूत? एक अखबार के कार्टूनिस्ट ऐसा कार्टून बनाया जिसमें उसने दिखाया कि भीम खीर का इंतज़ार कर रहा है और मैं दुशासन के साथ मिलकर उसकी खीर में जहर मिला रहा हूँ. मुझे तो बड़ा गुस्सा आया. मेरी चलती तो मैं तो उसी दिन उस कार्टूनिस्ट के ऊपर बलात्कार का आरोप लगाकर उसे जेल में ठूंसवा देता लेकिन मामाश्री ने रोक दिया. गुप्तचरों ने यह भी सूचना दी कि प्रजा के लोग़ फिर से पुरानी बात निकाल लायें कि लाक्षागृह में पांडवों को जलाकर मार देने की साजिश मैंने की थी. बिना सबूत के किसी के ऊपर आरोप लगाना कहाँ तक उचित है? मैं पूछता हूँ किसी के पास कोई रिकार्डिंग्स है क्या जिसमें मैं और मामाश्री पांडवों को जलाकर मार देने की साजिश रचा रहे हैं? अगर सबूत नहीं है तो फिर मैं कैसे मान लूँ कि वह साजिश हमने की थी? सोच रहा हूँ कि अब समय आ गया है एक ऐसा कानून लाने का जिसमें ऐसा प्रावधान हो कि अगर कोई बिना रिकार्डिंग्स के किसी के ऊपर कोई आरोप लगाता है तो उसके ऊपर देशद्रोह का मुकदमा करके उसे सीधा जेल में ठूंस दें.
मैं पूछता हूँ प्रजा का जन्म क्या शिकायत करने के लिए होता है? अब रात्रि के इस पहर यहाँ तो कोई है नहीं जो मेरे इस सवाल का जवाब देगा तो मैं खुद ही अपने सवाल का जवाब लिख देता हूँ. प्रजा का जन्म केवल और केवल राजा, युवराज और राजपरिवार के लोगों की जै-जैकार करने के लिए होता है. ऐसे में अगर प्रजा केवल जै-जैकार न करके शिकायत करने लगेगी तो विशेषज्ञ और बुद्धीजीवी भी यही कहेंगे कि प्रजा अपने कर्त्तव्य का पालन ठीक ढंग से नहीं कर रही. और फिर विशेषज्ञ और बुद्धिजीवी ऐसा क्यों नहीं कहेंगे? मैं तो कहता हूँ कि अगर वे ऐसा नहीं कहेंगे तो उनसे कहलवा दूंगा. ये हर साल ज़मीन का प्लाट किसलिए लेते हैं? इन्हें ताम्रपत्र, शॉल और नकदी क्या चुप रहने के लिए देता हूँ? अगर कोई बुद्धिजीवी ऐसा कहने से इन्कार करेगा तो राजपरिवार को हक है कि वो नए बुद्धिजीवी पैदा कर ले. वैसे देखा जाय तो हमें किस बात का हक नहीं है? बुद्धिजीवी तो क्या, हम चाहें तो नई प्रजा भी पैदा कर सकते हैं.
समस्याएं हैं. अरे प्रजा है तो समस्याएं तो रहेंगी ही. किसी कवि ने कहा है कि; "राजा है तो प्रजा है. प्रजा है तो समस्याएं हैं. समस्याएं हैं तो शिकायतें हैं. शिकायतें हैं तो समाधान है. समाधान है तो रास्ते हैं. रास्ते हैं तो राजमहल है. क्योंकि हर रास्ता राजमहल तक जाता है."
मानता हूँ कि किसान परेशान है. मंहगाई बढ़ी हुई है जिससे प्रजा हलकान है. लेकिन मैं पूछता हूँ कि किसी चीज का बढ़ना क्या उचित नहीं है? सच कहूँ तो मंहगाई बढ़ने में ही फबती है. मंहगाई के घटने में वो मज़ा नहीं है जो उसके बढ़ने में है. वैसे भी क्या हमने अपनी तरफ से प्रजा को मदद देने की कोशिश नहीं की? क्या राजमहल ने प्रजा में मुद्रा नहीं बांटा? अभी तीन महीने पहले ही अपने जन्मदिन पर दुशाला ने अपने हाथों से प्रजा के हज़ारों लोगों को इक्यावन रूपये और कंबल दिया था. माताश्री के कहने पर किसानों का कर्ज माफ़ कर दिया गया था. मानता हूँ कि जिन किसानों का कर्ज माफ़ किया गया था उनमें हमारे किसान ही ज्यादा थे लेकिन दो-चार हज़ार किसानो को तो कर्ज माफी का फायदा मिला ही. ऐसे में राजमहल के लोगों के बारें में उल्टी-सीधी बातें करना क्या एहसान-फरामोशी की निशानी नहीं है?
मामाश्री के कहने पर सात महीने पहले नगर के सभी चाय-पान के दुकानदारों को बुलाकर उन्हें लालच भी दिया. मैंने तो उनसे कहा भी कि वे अपनी दुकानें बंद कर दें ताकि लोग़ जमा नहीं हों. जब लोग़ जमा ही नहीं होंगे तो फिर राजपरिवार के बारे में उल्टी-सीधी बातें बंद हो जायेंगी. दुशासन ने तो अति-उत्साह में मुहावरा भी पढ़ डाला. बोला; "न रहेगी दूकान, न होंगी उल्टी-सीधी बातें" लेकिन वे दूकानदार कहने लगे कि ऐसा करने से वे भूखे मर जायेंगे. मामाश्री ने उनसे कहा भी कि उनका जो भी नुकशान होगा हम उसके एवज में उन्हें हर महीने पैसे देंगे लेकिन वे माने ही नहीं. दुशासन और जयद्रथ ने तो यहाँ तक कहा कि यदि मैं आज्ञा दूँ तो वे मिलकर इन दूकानदारों को वही धुनक के धर देंगे.
वो तो बाद में मित्र कर्ण से पता लगा कि चाय-पान की दूकानों को एक-दम से बंद करवा देने का फैसला उचित नहीं होगा. कर्ण ने यह बताकर हमारी आँखें खोल दीं कि हस्तिनापुर के जो हालात हैं उसे देखते हुए चाय-पान की दूकान चलने देना ही श्रेयस्कर रहेगा. उसी से पता चला कि लोग़ पान खाकर जब पीक से अपना मुँह भर लेते हैं तब वे कुछ बोल नहीं पाते. और जब पीक से मुँह भरा रहेगा तो कौन राजपरिवार के खिलाफ उल्टी-सीधी बातें करेगा? कर्ण ने तो यहाँ तक सुझाव दिया कि राजपरिवार को खुद मुद्रा खर्च करके चाय-पान की नई दुकानें खुलवानी चाहिए ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग़ पान की पीक से अपना मुँह भर सकें.
खुद मैंने सब्सिडी देकर चाय-पान की हज़ारों नई दुकानें खुलवा दीं लेकिन उसका फायदा कुछ ही महीनों तक रहा. केवल कुछ महीनों तक ही लोग़ पान खाकर अपना मुँह पीक से भरते रहे. कुछ दिनों के लिए उनकी शिकायतें कम हो गई थीं लेकिन फिर से शुरू हो गई हैं. पिछले हफ्ते मेरे सबसे काबिल गुप्तचर ने सूचना दी कि किसी ने ह्विसपर कैम्पेन के जरिये प्रजा में यह बात फैला दी है कि पान की पीक को मुँह में देर तक रखना हानिकारक होता है. इसलिए जो भी पान और तम्बाकू का सेवन करे उसे बीच-बीच में थूकते रहना चाहिए.
मामाश्री और मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ कि कैसे जानकार और जागरूक लोग़ निकल आये हैं? ऐसे लोग़ जिन्हें यह पता है कि तम्बाकू और पान का सेवन हानिकारक होता है. ऐसे जानकार और पढ़े-लिखे लोग़ तो राजपरिवार के लिए खतरा बन सकते हैं. मैंने तो मामाश्री से कहा कि अबा समय आ गया है कि राजपरिवार के लोगों के खिलाफ शिकायत को रोकने का यही तरीका है कि किसानो के बोलकर पान की खेती ही बंद करवा दी जाय. साथ ही अब हस्तिनापुर में प्रजा के लिए चाय आयात करने पर रोक लगा देनी चाहिए ताकि लोग़ चाय-पान के बहाने एक जगह इकठ्ठा न हो सकें.
मामाश्री ने तो मेरे इस सुझाव को एक कदम और आगे बढ़ा दिया. उन्होंने सुझाव दिया कि अब प्रजा के सेवन के लिए अफीम का आयात शुरू किया जाय. गांधार में अफीम की पैदावार खूब होती है. उन्होंने गंधार के एक अफीम उद्योगपति को कल राजमहल में बुलाया है. देखते हैं क्या होता है.
Monday, September 5, 2011
दुर्योधन की डायरी - पेज ३७१
आज शिक्षक दिवस है. मैंने सोचा कि एक बार उलट-पलट कर देखा जाय कि युवराज दुर्योधन ने शिक्षक दिवस पर कुछ लिखा है क्या? पता चला कि उन्होंने शिक्षक दिवस पर तो कुछ नहीं लेकिन अपने समय के शिक्षक और शिक्षा पर कुछ लिखा है. पढ़कर लगा कि ज्यादा कुछ बदलाव नहीं आया है.
क्या कहा आपने? मैं ऐसा क्यों लिख रहा हूँ? आप खुद ही पढ़ लीजिये कि मैं ऐसा क्यों लिख रहा हूं.
दुर्योधन की डायरी - पेज ३७१
सालाना इम्तिहान को अब केवल दो महीने रह गए हैं लेकिन गुरु द्रोण हैं कि पिछले तीन दिन से क्लास में आ ही नहीं रहे हैं. कोई खबर भी नहीं है कि कहाँ हैं? विद्यार्थी अपनी-अपनी तरह से अनुमान लगाये जा रहे हैं. अर्जुन कह रहा था कि वे अवंती में छुट्टियाँ बिताने गए हैं तो वहीँ भीम ने बताया कि हस्तिनापुर में ही किसी फ़ूड फेस्टिवल का उद्घाटन करने गए हैं. इस भीम को खाने की बातों के अलावा और कुछ सूझता ही नहीं. इसकी नज़र हमेशा खाने पर रहती है. पेटू कहीं का. मैंने कई बार अश्वथामा से पूछने की कोशिश तो टाल गया. मामला क्या है समझ नहीं आ रहा.
खैर, मामला चाहे जो हो लेकिन गुरुदेव इस तरह से पढायेंगे तो सिलेबस कैसे ख़त्म होगा? तीन दिन पहले जब मैंने सवाल किया कि गुरुदेव परीक्षा को अब केवल दो महीने रह गए हैं लेकिन आपने भूगोल और समाजशास्त्र का सिलेबस पूरा नहीं किया तो भड़क गए. बोले; "तुम्हें समाजशास्त्र का ज्ञान है कोई? जितना पढ़ा है, उसे भी अपने व्यवहार में प्रयोग किया है कभी? कल शाम को क्रीड़ास्थल पर मिले थे तो मुझे प्रणाम नहीं किया. और कहते हो कि समाजशास्त्र का सिलेबस ख़त्म नहीं हुआ."
ये अर्जुन, भीम वगैरह को फेवर तो करते ही थे अब बात-बात पर हमें डाटते रहते हैं. हमें डाटने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देते. अब इन्हें कौन समझाए कि दिन में सत्रह बार प्रणाम करते-करते छात्र एक-आध बार भूल भी तो सकता है. समाजशास्त्र के सिलेबस में क्या बस प्रणाम करना लिखा है? और कुछ नहीं लिखा? समाज क्या केवल प्रणाम और आशीर्वाद से ही चलता है? मानता हूँ कि गुरुदेव ब्राह्मण हैं और उन्हें न केवल विद्यार्थियों से लेकिन राज्य के साधारण नागरिकों से प्रणाम लेना अच्छा लगता है लेकिन प्रणाम के लिए इतना भी क्या लालायित रहना? मैं कहता हूँ कि दो-चार प्रणाम कम भी मिलेंगे तो क्या उनका डिमोशन हो जाएगा? कई बार तो मन में आता है कि इनके ब्राह्मण होने की बात को प्रजा में उछाल दिया जाय और पिछड़ी जाति के नागरिकों को इनके खिलाफ भड़का दिया जाय लेकिन चचा विदुर की वजह से रुक जाता हूँ.
मेरा मानना है कि इनके ब्राह्मणत्व की बात को अगर उछाल दिया जाय फिर एकलव्य को इनके खिलाफ खड़ा किया जा सकता है. दुशासन तो कह रहा था कि मैं ही एकलव्य को फिनांस करके गुरु द्रोण की शिकायत उप-कुलपति से करवा दूँ कि ये गुरुदक्षिणा में रुपया-पैसा, ज़मीन-जायदाद नहीं बल्कि अंगूठा कटवा लेते हैं. एक बार एकलव्य इनकी शिकायत उप-कुलपति से कर दे फिर हज़ार-पाँच सौ विद्यार्थियों को कुछ पैसा-वैसा खिलाकर इनके निवास स्थान पर नारे लगवा दूँ. इनका कैरियर खराब हो जाएगा. रिटायरमेंट के बाद पेंशन के लिए मोहताज़ हो जायेंगे ये.
अभी ये पूरे डेढ़ महीने की छुट्टी बिताकर आए हैं. प्रयाग गए थे. संगम के किनारे माघ महीने में कल्पवास करने. अपनी जगह अपने किसी रिश्तेदार को पढ़ाने का काम सौंप गए थे. रिश्तेदार हमें पढाता था लेकिन हाजिरी रजिस्टर में गुरुदेव की हाजिरी लगती थी. प्रयाग से लौटने के बाद पूरे महीने की सैलरी भी उन्ही को मिली. ये सब बातें अगर पिताश्री को बता दूँ तो इनकी शामत आ जायेगी. बिदुर चचा को बताने का कोई फायदा तो है नहीं. वे तो गुरुदेव को ही सपोर्ट करते हैं. वैसे भी मेरी बात पर उन्हें ज़रा भी विश्वास नहीं सो उन्हें बताने का कोई फायदा भी नहीं है. फिर सोचता हूँ कि गरीब आदमी हैं, इनकी नौकरी चली गई तो इनका घर-परिवार कैसे चलेगा?
फिर भी ये जिस तरह से हमारे साथ व्यवहार करते हैं मन तो करता ही है कि इनके खिलाफ अफवाहें उड़ा कर इन्हें बदनाम कर दूँ. ह्विसपर कैम्पेन चला दूँ कि मैंने पाठशाला में तमाम तरह की अनर्गल बातें नोट की हैं. कि गुरुदेव ये मिड-डे मील के रिकार्ड में गड़बड़ करते हैं. कि पाठशाला को मिलने वाली राशि से कुछ निकालकर इन्होने अश्वथामा के नाम एफडी कर ली है. फिर सोचता हूँ कि अगर मैं इनके खिलाफ खड़ा हो गया तो ये कहीं के न रहेंगे.
ऐसा नहीं है कि पाठशाला में गुरुदेव कोई गड़बड़ी नहीं करते. पिछली छमाही इम्तिहान के बाद उन्होंने हमारी कापी जांचने का काम अश्वत्थामा से करवाया था. ख़ुद बैठे-बैठे ताश खेलते थे और अश्वत्थामा कॉपी जांचता था. ये बात तो मुझे तब पता चली जब मैं, दु:शासन और अश्वत्थामा फ़िल्म देखने गए थे. अश्वत्थामा ने ही बताया था कि मैं गणित में फेल हो रहा था लेकिन उसने मेरा नंबर इसलिए बढ़ा दिया क्योंकि पिछले महीने मैंने उसे आईसक्रीम खिलाई थी.
गणित में मेरी कमजोरी तो मुझे ले डूबेगी.
हस्तिनापुर में प्राथमिक शिक्षा की हालत सचमुच बहुत ख़राब है. जानते सभी हैं लेकिन कोई इसके बारे में कुछ करने के लिए तैयार नहीं है. करने के नाम पर चचा विदुर और कृपाचार्य कभी-कभी मीडिया में प्राथमिक शिक्षा पर चिंता व्यक्त कर देते हैं. जब वे चिंता व्यक्त करते हैं तो पूरे हस्तिनापुर के नागरिकों को लगता है कि ये लोग़ सच में चिंतित हैं और कुछ करना चाहते हैं. एक बार चिंता व्यक्त करके ये लोग़ फिर साल-छ महीने चुप रहते हैं और जब कहीं कोई पत्रकार या सम्पादक कुछ लिख देता है तो ये सभी एक बार फिर से चिंता व्यक्त कर देते हैं. उधर प्राथमिक शिक्षा की हालत खराब होती जा आरही है और इधर इन लोगों की चिंता व्यक्त करने की कला निखरती जा रही है. कई बार तो ये लोग़ यह कहकर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं कि श्री राम के दिनों में अयोध्या में भी प्राथमिक शिक्षा की हालत ऐसी ही थी और विश्वामित्र और वशिष्ट जैसे महागुरु भी केवल चिंता ही व्यक्त करते थे और कुछ नहीं करते थे.
एक दिन मैने गुरुदेव से प्राथमिक शिक्षा की ख़राब हालत के बारे में कहा तो बोले; "राजमहल से ऐसे आदेश मिले हैं कि सारी इनर्जी उच्च शिक्षा पर लगाई जाय. हमें ज्यादा से ज्यादा मैनेजमेंट ग्रैजुएट पैदा करने हैं."
मैं कहता हूँ कि जब आधार ही मजबूत नहीं रहेगा तो उच्च शिक्षा की पढाई करके क्या फायदा? लेकिन मेरी बात कौन सुने? फिर सोचता हूँ, मुझे भी इन सब बातों में नाक घुसाने की जरूरत नहीं है. लेकिन सच बात पर कोई ध्यान नहीं देता. नागरिकों को कहाँ मालूम है कि उच्च शिक्षा पर जोर और मैनेजमेंट ग्रेजुयेट पैदा करने के पीछे मामाश्री और उनके लोगों का हाथ है. किसी को नहीं पता कि मामाश्री ने अपने लोगों को लगाकर तमाम मैनजेमेंट कालेज खुलवा दिए हैं और अपने कुछ और रिश्तेदारों को महाजन बनाकर आगे कर दिया है ताकि विद्यार्थियों को लोन देकर इन कालेजों में एडमिशन दिलवाया जा सके और धंधा मस्त चले. महाजनों, इन कालेज के बोर्ड और मामाश्री की लॉबी का कमाल है जो दिन-रात हस्तिनापुर में मैनेजमेंट ग्रैजुयेट पैदा होते चले जा रहे हैं. ये कालेज वाले हर साल फीस बढ़ा देते हैं और विद्यार्थियों को भी फीस पेमेंट करने में कोई अड़चन नहीं दिखाई देती क्योंकि मामाश्री के अप्वाइंट किये गए महाजन इन विद्यार्थियों को लोन देने के लिए पैसा हाथ में लेकर खड़े हैं.
खैर, इन सब बातों से मुझे क्या लेना-देना? मेरे पिताश्री का क्या जाता है? मैं अगर ऐसी टुच्ची बातों के बारे में सोचूँगा तो फिर राजा कैसे बनूंगा? और फिर मुझे पढ़-लिख कर कौन सा क्लर्क बनना है? मैं तो राजा बनूंगा. और एक बार मैं राजा बन गया तो हजारों मैनेजमेंट ग्रेजुयेट मेरे लिए काम करेंगे.
मुझे तो अपनी राजनीति की फिकर है. मुझे लगता है कि नयी खुराफात करने का मौका आ गया है. आज दु:शासन बता रहा था कि राजमहल से ख़बर आई है कि एकलव्य ने कुछ युवकों का दल बना लिया है और कल राजमहल के सामने प्रदर्शन कर रहा था और नारे लगा रहा था. गुरुदेव ने उसे शिक्षा दे देती होती तो आज ऐसा नहीं होता. जब दु:शासन से मैंने पूछा कि एकलव्य क्या चाहता है तो उसने बताया कि वो मैनेजमेंट और इंजीनियरिंग कालेज में आरक्षण चाहता है. जिस दिन गुरुदेव ने उसे लौटाया था उस दिन मैं मिला होता तो उसके लिए ज़रूर कुछ करता. लेकिन अब सोचता हूँ कि एकलव्य और उसके साथियों को आरक्षण दिलाने का वादा मैं ख़ुद ही कर दूँ. भविष्य में जब भी अर्जुन वगैरह से झमेला होगा तो ये एकलव्य बहुत काम आएगा.
कल ही एकलव्य से अप्वाईंटमेंट फिक्स करूंगा.
Saturday, March 19, 2011
दुर्योधन की डायरी - पेज २०१२
कल होली है. होनी भी चाहिए. इसी महीने में तो होती है. सावन में नागपंचमी होती है और उसके बाद छट. आगे बढें तो दुर्गापूजा और दिवाली. ऐसे में होली इसी महीने में आकर झमेला ख़त्म करे, यही सबके लिए अच्छा है. लेकिन जब भी होली आती है तो मुझे खुद के अभागे होने का ख्याल मन में आता है. ऐसा न कहूँ तो और क्या कहूँ? सबसे बड़ा भाई होने का सबसे बड़ा डिसएडवान्टेज ये है कि भौजाई की कमी खलती है. और ऐसी-वैसी नहीं, बहुत खलती है. बड़ा भाई होने का मतलब यह नहीं कि आदमी केवल बड़ा भाई होकर रहता है. बड़े भाई होने का मतलब यह भी होता है कि आदमी जन्मजात जेठ होकर रह जाता है. जेठ होना होली के मौके पर बहुत दुःख देता है.
एक तो जनम से जेठ थे ही ऊपर पांडवों को वनवास-ए-बामुसक्कत की सजा दे डाली. मामला वैसे ही निकला जैसे कोढ़ में खाज. ऐसा नहीं हुआ होता तो होली के मौके पर देवर बनने का एक चांस तो रहता. जैसा कि एक महान गीतकार ने लिखा है; 'गिले शिकवे भूल कर दोस्तों, दुश्मन भी गले मिल जाते हैं...' तो एक दिन दुश्मनी भूलकर द्रौपदी भाभी के साथ होली खेल आता. लेकिन इनलोगों को सजा देकर सब गुड गोबर कर डाला.
वैसे फिर मन में बात आती है कि दुविधा तो वहाँ भी रहती. हो सकता है वहाँ भी होली नहीं खेल पाता क्योंकि भाभी को कन्फ्यूजन रहता कि मुझे देवर समझे या जेठ. आख़िर वे केवल युधिष्ठिर भइया की पत्नी नहीं हैं, नकुल और सहदेव की पत्नी भी वही हैं.
खुद से यही बात करके मन पर सतोष का छींटा मार लेता हूँ. संतोष के छीटों के साथ ऐसे समय में मदिरा भी थोड़ा हेल्प कर देती है.
वैसे एक बात से इन्कार नहीं कर सकता कि जबसे इनलोगों को वनवास का टिकट थमाया है, ये होली के मौके पर जरूर याद आ जाते हैं. लेकिन याद आने पर भी क्या किया जा सकता है? इसलिए होली खेलता भी हूँ तो कर्ण के साथ. उसके साथ होली खेलने में क्या मज़ा? बहुत बोरिंग होती है इस कर्ण की होली. चुटकी भर गुलाल भी गाल पर लगाते समय इतनी एहतियात बरतता है मानो किसी दुधमुंहे बच्चे को लगा रहा हो. न तो फाग सुनता है और न ही कवि सम्मलेन में कवियों की तथाकथित कवितायें. कविताओं पर कान न देने की बात तो समझ में आती है लेकिन फाग? फिर सोचता हूँ तो मुझे लगता है जैसे फाग भी उसे युद्धगीत जैसा लगता होगा. मदिरा की तो बात दूर ठंडाई में भंग तक मिलाने नहीं देता.
ऐसे मौकों पर उसके साथ रहकर तो यही लगता है कि हमारे करम फूट गए.
बोर आदमी है. बोर क्या महाबोर है. आता है और गुलाल लगाते हुए गले मिलकर चला जाता है. रुकने के लिए कहता हूँ तो एक ही बहाना बनाकर निकल लेता है - धनुष बाण साफ करना है और बाण चलाने की प्रैक्टिस करनी है. पता नहीं कब युद्ध शुरू हो जाए.
आकर चला जाता है तो मेरी होली दुशासन और जयद्रथ के साथ सिमट कर रह जाती है. राजमहल से बाहर निकल कर लोगों को होली खेलते हुए देखने की बड़ी इच्छा होती है लेकिन राजपुत्र होने का भी अपना डिसएडवांटेज है. लोगों के बीच में जाकर होली भी नहीं खेल सकता. न जाने कितने सालों से जितनी गिनी-चुनी बदमाशियां कर सकता हूँ, सब राजमहल में ही करनी पड़ती हैं. अब तो ये पुरानी बदमाशिया भी बोर करने लगी हैं. हाल यह हो चला है कि होली के अवसर पर खुद को बदमाश मानने में भी शर्म आने लगी है.
वही ठंडाई, वही नर्तकियां, वही ठंडाई का गिलास और वही दरबारी. कई बार संजय को फुसला कर इस बात पर राजी करने की कोशिश की कि वह हस्तिनापुर में खेली जानेवाली होली का लाईव टेलीकास्ट ही दिखा दे लेकिन वह तो पिताश्री को छोड़कर किसी की बात ही नहीं मानता. कहता है उसके चैनल पर होनेवाले हर टेलीकास्ट का एक्सक्लूसिव राईट्स पिताश्री के पास है. पिताश्री ने थोड़ी इज्ज़त क्या दी, सिर पर चढ़कर बैठ गया. मैं पूछता हूँ राजकुमारों की हसरतों और फरमाइशों का ख्याल दरबारी और सारथी नहीं रखेंगे तो कौन रखेगा? कई बार मन में आया कि इसके ऊपर यह आरोप लगा कर इसे डिशमिश करवा दूँ कि यह घोड़ों के लिए खरीदे जाने वाले भोजन की कालाबाजारी करता है लेकिन कर्ण द्वारा मना करने पर मन मारकर बैठ जाना पड़ा.
जल्द ही इसका कुछ करना पड़ेगा.
पिछले बरस दु:शासन भेष बदलकर लोगों की भीड़ में घुस गया था और अपने सेलफ़ोन के कैमरे से फोटो खींच लाया था. वही दो-चार फोटो देखने को मिली थी. इस साल तो यह भी होने से रहा. दुशासन बाहर जाने से भी डर रहा है. आज़ाद हिंद ढाबे पर इसने बीयरपान करके नशे में किसी लड़की को छेड़ा था और उसके आशिक ने इसकी धुलाई क्या की, अब वह अकेले तो क्या चार सिपाहियों के साथ भी बाहर निकलने से डरता है.
सुबह से ही बीयरपान में मस्त है. कहता है दो दिन बीयर पीकर गुज़ार देगा. अपने चमचों को भेजकर बालाजी वाइन शॉप से जबरदस्ती चार क्रेट बीयर उठावा लाया है. उधर जयद्रथ मोहिनी-अट्टम देखने में बिजी है. सुना है दो दिन तक इस बात पर अड़ा रहा कि उज्बेकिस्तान से आई नर्तकी को भारत-नाट्यम परफार्म करना ही पड़ेगा. काफी झमेले और बहस के बाद वह नर्तकी मोहिनी अट्टम करने पर राजी हुई.
ये ऐसे बिजी हैं तो मुझे अपना होली प्रोग्राम खुद ही बनना पड़ेगा. क्या किया जा सकता है? ऐसे ही दरबार में रहना पड़ेगा और हास्य कवि सम्मेलन में 'कवियों' के चुटकुले सुनकर होली मनानी पड़ेगी. ये लोग़ पिछले दस सालों से उन्ही बासी चुटकुलों की कविता बनाकर ठेलते रहे हैं. ऊपर से कहते हैं कि कविता सुना रहे हैं.
इतनी-इतनी मुद्रा देकर इन कवियों को बुलाया जाता है लेकिन इन्हें जरा भी शर्म नहीं. आने-जाने का किराया अलग. ऊपर से कहते हैं कि फर्स्ट क्लास का टिकट न देकर इन्हें डायरेक्ट मुद्रा ही दे दी जाय. दुशासन का एक गुप्तचर बता रहा था कि दो-तिहाई कवि फर्स्ट क्लास के टिकट का पैसा लेकर सेकंड क्लास से आते-जाते हैं. ऊपर से एक कवि तो इस बात पर अड़ गया कि उसके स्वागत के लिए उसे गेंदा के फूलों की माला न पहनाई जाय. वह चाहता है कि उसे केवल गुलाब के फूलों की माला पहनाई जाय. बेवकूफ को यह नहीं पता कि गुलाब के फूलों की माला बनाने में माली को कितनी तकलीफ होती है? कवियों को लाने के लिए दो घोड़ों के रथ भेजे गए थे. एक कवि अड़ गया. बोला जब तक उसके लिए चार घोड़ों का रथ नहीं जाएगा तबतक वह राजमहल में कविता सुनाने आएगा ही नहीं.
मुझे इस कवि के बारे में पता है. विद्यार्थियों के बीच चुटकुले सुनाकर इसने अपना बाज़ार गरम किया है.
वैसे कोई-कोई कवि गलती से एकाध बार कविता भी सुना बैठता है. परसों के कवि सम्मेलन में किसी कवि ने ये कविता सुनाई थी. मुझे अच्छी लगी. लिख देता हूँ. कवि का नाम तो याद नहीं क्योंकि मैं भंग के नशे में था लेकिन कविता यूं थी...
क्या फागुन की ऋतु आई है
डाली-डाली बौराई है
हर और सृष्टि मादकता की
कर रही फ्री में सप्लाई है
धरती पर नूतन वर्दी है
खामोश हो गई सर्दी है
कर दिया समर्पण भौरों ने
कलियों में गुंडागर्दी है
मनहूसी मटियामेट लगे
खच्चर भी अप टू डेट लगे
फागुन में काला कौवा भी
सीनियर एडवोकेट लगे
फागुन पर सब जग टिका लगे
सेविका परम प्रेमिका लगे
बागों में सजी-धजी कोयल
टीवी की उदघोषिका लगे
जय हो कविता कालिंदी की
जय रंग-बिरंगी बिंदी की
मेकप में वाह तितलियाँ भी
लगती कवियित्री हिन्दी की
पहने साड़ी वाह हरी-हरी
रस भरी रसों से भरी-भरी
नैनों से डाका डाल गई
बंदूक दाग गई धरी-धरी
हर और मची हा-हा, हू-हू
रंगों का भीषण मैच शुरू
साली की बालिंग पर देखो
जीजा जी हैं एल बी डब्ल्यू
भाभी के रन पक्के पक्के
हर ओवर में छ छ छक्के
कोई भी बाल न कैच हुआ
सब देवर जी हक्के-बक्के
गर्दिश में वही बेचारे हैं
बेशक जो बिना सहारे हैं
मुंह उनका ऐसा धुआं-धुआं
ज्यों अभी इलेक्शन हारे हैं
क्या फागुन की ऋतु आई है
मक्खी भी बटरफिलाई है
कह रहे गधे भी सुनो-सुनो
इंसान हमारा भाई है
नोट: युवराज तो भंग के नशे में थे इसलिए उन्हें कवि का नाम याद नहीं लेकिन आपको बता दूँ कि यह कविता प्रसिद्द कवि श्री डंडा लखनवी की है.
Saturday, January 15, 2011
दुर्योधन की डायरी - पेज २३१६
आज पढ़िए युवराज दुर्योधन की डायरी का वह पेज जिसमे उन्होंने अपनी किड-सिस्टर दुशाला ज़ी के जन्मदिन मनाने के बारे में लिखा है. न न, यह मत कहियेगा कि जन्मदिन मनाने की प्रथा पश्चिम के देशों से आई है. कुछ पश्चिम से नहीं आया. सब यहीं था और हजारों वर्षों से यहीं था:-)
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आज राजमहल में एक बार फिर से ख़ुशी का माहौल है. राजमहल बना ही है ख़ुशी के लिए. मुझे तो कभी-कभी लगता है कि राजमहल न हो तो ख़ुशी कहीं दिखाई ही न दे. जब ख़ुशी नामक अनुभूति की खोज की गई होगी साथ-साथ राजमहल का निर्माण भी कर दिया गया होगा ताकि ख़ुशी बड़ी जगह पर जाकर बैठ सके.
वैसे आज की ख़ुशी किसी पार्टी की वजह से नहीं है. दरअसल आज दुशाला का जन्मदिन है. आज वह बहुत खुश थी. साथ में हम भाई लोग भी. देखा जाय तो हमें खुश होने के अलावा काम ही क्या है? हमारे लिए तो खुश दिखना अपने आप में बहुत बड़ा काम है. एक बात जरूर है. जन्मदिन की खुशी बाकी सभी खुशियों से अलग होती है. शादी-व्याह पर उतनी खुशी नहीं होती जितनी जन्मदिन पर होती है. शादी-व्याह पर भी खुशी होती ही है लेकिन रूपये-पैसे खर्च होने की वजह से कुछ-कुछ सैडनेश अपने आप क्रीप-इन कर जाती है. वहीँ जन्मदिन की खुशी में किसी सैडनेश की मिलावट का चांस बिल्कुल नहीं रहता. और दुशाला के जन्मदिन पर तो बिलकुल ही नहीं. आख़िर उसके जन्मदिन पर भारी मात्रा में रुपया-पैसा वसूल कर लिया जाता है. ऐसे में सैडनेश दिखाई भी देती है तो उनके चेहरों पर जिनसे वसूली की जाती है.
मुझे याद है जब पहली बार दुशाला ने सार्वजनिक तौर पर अपना जन्मदिवस मनाया था. उसने उसे 'स्वाभिमान दिवस' के रूप नाम दिया था. अपने जन्मदिवस को स्वाभिमान दिवस के रूप में मनाने का लॉजिक भी बड़ा मजेदार दिया था उसने. वह चाहती थी कि उसके जन्मदिन पर वह और पूरा खानदान इतना अभिमान करे कि उसे देखकर द्रौपदी जल-भुन जाए. उसका कहना था कि द्रौपदी का अपना कोई स्वाभिमान तो बचा नहीं था ऐसे में दुशाला के जन्मदिन को स्वाभिमान दिवस के रूप में मनाने से द्रौपदी का जल-भुन जाना पक्का था.
पिछले तीन महीने से तैयारियां चल रही थीं. द्वार बनाये गए. पोस्टर छपाए गए. निमंत्रण पत्र छापे गए. तरह-तरह की कलाओं से हस्तिनापुर को सजाया गया. बाहर के राज्यों से कारीगरों और हलवाइयों की टोलियाँ आयीं. प्रजा के लोगों की संख्या देखते हुए बहुत बड़ी जगह चाहिए थी. यह तो अच्छा हुआ कि दुशासन के सुझाव पर नगर के बीचों-बीच एक चिल्ड्रेन पार्क पर कब्जा कर लिया गया नहीं तो बड़ी तकलीफ हो जाती. जितने गेस्ट आये थे उन्हें तो खड़े होने की जगह ही नहीं मिलती. वैसे भी सौ भाइयों की दुलारी बहन के लिए जितना भी किया जाता कम ही होता.
दुशाला की इच्छा है कि वह इसी चिल्ड्रेन पार्क में प्रजा के बीच अपने जन्मदिवस पर खीर खाने का शुभ कार्य करे. वैसे भी मेरा मानना है कि केवल खीर खाने का क्यों, उसे तो कुछ भी खाने का अधिकार है. सुयोधन की बहन चाहे तो हम उसे पूरा हस्तिनापुर खाने के लिए दे दें. सौ भाईयों की एक बहन होना साधारण बात तो नहीं.
और हम भाई ऐसा करें भी न क्यों? दुशाला का जन्मदिवस अच्छे दिन और अच्छे पैसे लेकर आता है. तरह-तरह की सौगात. तरह-तरह के गिफ्ट. कहीं कोई मोतियों का हार ले आता है तो कहीं कोई मुद्रा का. फूलों और मुद्रा के हार इतने वजनी कि बिना चार-पाँच लोगों के हाथ लगाए उठते भी नहीं. हमने भी तैयारी में कोई कसर नहीं छोड़ते. तैयारियों के तहत सबसे पहले राज्य के व्यापारियों से पैसा वसूला गया. बाद में व्यापरियों से टैक्स के रूप में पैसा वसूलने वाले सेल्स टैक्स अफसरों से पैसे की वसूली कर ली गई है. सड़क निर्माण के लिए काम करने वाले अभियंताओं से पैसा खींचा गया है. मामाश्री ने सुझाव दिया था कि मदिरा के ठेकेदारों से वसूल की जाने वाली रकम इसबार बढ़ा दी जाए. उनके सुझाव की वजह से इसबार भारी मात्रा में वसूली की गई है. आने-जाने वाले वाहनों से वसूली करने का काम तो वैसे भी जन्मदिवस के एक महीने बाद तक चलता ही रहेगा.
मुझे याद है. पहली बार जब दुशाला द्बारा सार्वजनिक तौर पर जन्मदिवस मनाया गया था, उस वर्ष भी मामाश्री के कहने पर दुशासन और जयद्रथ ने पैसा वसूली का महत्वपूर्ण कार्य किया था. वो तो बाद में कर अधिकारियों ने दुशाला से उसके जन्मदिवस के उपलक्ष में वसूल किए गए पैसों का हिसाब मांगकर थोड़ा लफड़ा खड़ा करने की कोशिश की थी लेकिन मामाश्री ने साबित कर दिया कि ज़बरन वसूली की कोई घटना नहीं हुई थी. ये तो प्रजा के लोगों ने प्यार से अपनी राजकुमारी को धन भेंट किया था.
प्रजा द्बारा धन भेंट करने की वजह से ही उसके बाद हमलोग उसका जन्मदिवस आर्थिक सहयोग दिवस के रूप में मनाते हैं. मुझे याद है, दुशासन ने हँसते हुए कहा था कि आर्थिक सहयोग दिवस के रूप में जन्मदिवस मनाने से प्रजा के बीच संदेश जाता है कि अगर वो आर्थिक सहयोग में हिस्सा नहीं लेगी तो दुशासन प्रजा के ख़िलाफ़ असहयोग पर उतर आएगा. और अगर ऐसा हो गया तो फिर प्रजा को सहयोग देने वाला कोई दिखाई नहीं देगा.
दुशाला के जन्मदिवस के उपलक्ष में जब मैंने उसे उपहार स्वरुप कुछ देने की मंशा जताई तो उसने कहा कि अगर मैं कुछ देना ही चाहता हूँ तो उसी जगह पर दुशाला की प्रतिमा स्थापित करवा दूँ जहाँ पिताश्री की प्रतिमा है. मैंने उसे वचन दिया है कि मैं अलग से वसूली का कार्यक्रम चलाकर नगर के बीचों-बीच किसी पार्क में दुशाला की प्रतिमा स्थापित करवाऊंगा.
परसों ही कपड़े का एक व्यापारी जन्मदिवस के उपलक्ष में दुशाला के लिए एक नया ड्रेस देकर गया है. इसबार वो बिल्कुल नए तरह का ड्रेस पहनना चाहती थी. उसे किसी इमेज डेवेलपमेंट एजेन्सी ने बताया है कि प्रजा के बीच अपनी इमेज को और लोकप्रिय बनने के लिए उसे नए तरह के कपड़े पहनने की ज़रूरत है.
अज शाम को जन्मदिवस के उपलक्ष में वह इक्कीस सौ लोगों को कम्बल बांटना चाहती है. हँसते हुए बता रही थी कि कम्बल बांटने जैसा महत्वपूर्ण राजकीय कार्य अगर जन्मदिवस पर किया जाय तो इसके दूरगामी परिणाम देखने को मिलते हैं. दुशासन ने किसी व्यापारी की दूकान से कल शाम को ही कम्बल उठवा लिया था.
जन्मदिवस की ये बहार ऐसे ही चलती रही. जन्मदिवस ऐसा ही मनाया जाता रहे. प्रजा ऐसे ही धन भेंट करती रहे. और क्या चाहिए...?
Friday, January 7, 2011
दुर्योधन की डायरी - पेज २८८९
मंहगाई को लेकर बड़ी हडकंप मची है. सब हलकान हो रहे हैं. टीवी न्यूज चैनल पर पैनल डिस्कशन करके मंहगाई को रोकने की कोशिश की जा रही है लेकिन मंहगाई है कि रूकती नहीं. ठीक वैसे ही जैसे दिल है कि मानता नहीं. कुछ लोगों ने तो मंहगाई से बोर होकर कहना शुरू कर दिया है कि इससे अच्छा तो अंग्रेजों का राज था. जमाखोरी तो नहीं होती. वैसे मेरा कहना है कि क्या ऐसा पहली बार हुआ है कि मंहगाई बढ़ गई है? ऐसा तो हर युग में होता आया है. विश्वास नहीं होता तो द्वापर युग में लिखी युवराज दुर्योधन की डायरी पढ़िए. मेरी बात आपको सच लगेगी:-)
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दुर्योधन की डायरी - पेज २८८९
कल शाम को पार्टी में पता चला कि मंहगाई बढ़ गई है. कई बार लगता है जैसे अगर पार्टी का आयोजन न हो तो पता ही न चले कि दुनियाँ में क्या हो रहा है? कौन घट रहा है? कौन बढ़ रहा है? कौन अटका पड़ा है? किसको कौन सा पुरस्कार मिलने वाला है? किसके खिलाफ मीडिया के हाथ सबूत आ गए हैं? ये सारी बातें पार्टी में ही तो पता चलती हैं. लेकिन मंहगाई की बात और वह भी पार्टी में?
मंहगाई बढ़ने का ब्रेकिंग न्यूज अगर पार्टी में सुनने को मिले तो अजीब हालत हो जाती है. कल भी वही हुआ. बीयर का स्वाद जो ख़राब हुआ तो फिर ठीक होने में बड़ा समय लगा. ऐसा ख़राब हुआ कि कबाब से भी नहीं सुधरा. हुआ ये कि पार्टी में खाना बनाने के लिए जिस कैटरर को बुलाया गया था उसने पार्टीबाज मेहमानों के खाने का दाम प्रति प्लेट बढ़ा दिया. अब बढ़ा दिया तो बढ़ा दिया. हमें क्या फरक पड़ता है? हमें कौन सा बैंक से लोन लेकर पार्टी करनी है? लेकिन दु:शासन ने नादानी कर दी. उसने कैटरर से झगड़ा कर लिया. अड़ गया कि जिस रेट में ठेका दिया था उससे एक पैसा ज्यादा नहीं मिलेगा. वैसे कैटरर की भी क्या गलती है? बेचारा मंहगाई की मार कितनी सहेगा?
खैर, मैंने दु:शासन को समझाया. तब जाकर मामला शांत हुआ. उसे अलग तरीके से समझाना पडा. अब है तो नादान ही. एक बार भी उसने नहीं सोचा कि अगर ये बात बाहर चली गई कि हम राजघराने के लोग भी मंहगाई से पीड़ित हैं तो लोग़ क्या कहेंगे? न्यूज चैनल वाले सुबह-शाम ब्रेकिंग न्यूज चलाएंगे और राजमहल से वक्तव्य मांगेंगे.
मामाश्री से मंहगाई का कारण पूछा तो पता चला कि स्वर्णमुद्रा की कीमत कम हो गई है. लेकिन यहाँ थोड़ा कन्फ्यूजन है. जहाँ एक तरफ़ तो स्वर्ण की कीमतें बढ़ गई हैं वहीं दूसरी तरफ़ मुद्रा की कीमत घट गई है. मामला कुछ समझ में नहीं आ रहा. वैसे मेरी समझ में क्या आएगा जब अर्थशास्त्रियों की समझ से बाहर है. इतनी-इतनी तनख्वाह मिलती है इन अर्थशास्त्रियों को लेकिन ये अपना काम ठीक से नहीं कर सकते. ये अर्थव्यवस्था के बारे में जो भी बोलते हैं, उसका उलटा होता है. इससे अच्छा होता कि मौसम वैज्ञानिकों के हाथ में ही अर्थव्यवस्था दे दी जाती. मौसम विज्ञानी भी मौसम के बारे में जो कुछ भी बोलते हैं, वो भी कभी नहीं होता. सोचता हूँ कुछ दिनों के लिए अर्थशास्त्रियों को मौसम विभाग में और मौसम वैज्ञानिकों को अर्थ विभाग में शिफ्ट कर दूँ. आख़िर बात तो एक ही है. अगले साल विदुर चचा से कहकर ऐसा ही करवा दूँगा.
मंहगाई बढ़ने के कारणों के बारे में जितने मुँह उतनी बात. खैर, कल अर्थशास्त्रियों की बैठक है. देखता हूँ क्या होता है.
दुर्योधन की डायरी - पेज २८९०
अभी-अभी अर्थशास्त्रियों की बैठक से आया हूँ. मंहगाई की समस्या तो वाकई बहुत बड़ी समस्या का रूप ले चुकी है. लेकिन इससे भी बड़ी समस्या है अर्थशास्त्रियों को समझना. जितने अर्थशास्त्री आए थे सब मंहगाई का अलग-अलग कारण बता रहे थे. कुछ कह रहे थे कि ब्याज दरों के कम होने से ऐसा हो रहा है क्योंकि प्रजा के हाथ में बहुत ज्यादा पैसा आ गया है और वे मनमाने ढंग से चीजों के दाम दे रहे हैं. कुछ का कहना है कि ये समस्या केवल हस्तिनापुर की समस्या नहीं है. पड़ोसी राज्यों में भी ये समस्या है. कुछ कह रहे थे कि पड़ोसी राज्यों में तो क्या सारे ब्रह्माण्ड में यही समस्या है.
मेरी समझ में यह नहीं आता कि प्रजा के हाथ में ज्यादा पैसा आ गया है से क्या मतलब? क्या प्रजा बैंक से लोन लेकर सब्जी, चावल, दाल वगैरह खरीद रही है?
मीटिंग में एक अर्थशास्त्री जो कभी-कभी गुप्तचर भी बन जाता है, तो यहाँ तक कह रहा था कि केशव ने भी आजकल दूध का सेवन बंद कर दिया है क्योंकि दूध बहुत मंहगा हो गया है. कुछ का कहना था कि भगवान शिव ने भी आजकल फल खाना कम कर दिया है. पहले जब भगवान् शिव को चीजें मंहगी लगती थीं तो वे बीजिंग से सस्ती चीजें इंपोर्ट कर लेते थे लेकिन अब वहां भी चीजें सस्ती नहीं रही. लिहाजा भगवान शिव ने भी आजकल बीजिंग से चीजें मंगानी बंद कर दी हैं.
मीटिंग तो क्या थी, सारे अर्थशास्त्री हंसने का उपक्रम कर रहे थे और बढ़िया खुशबू वाली दार्जीलिंग चाय का मज़ा ले रहे थे.
एक अर्थशास्त्री, जिसका चश्मा बहुत मोटे ग्लास का था, और जिसे देखने से लग रहा था कि उसने काफ़ी अध्ययन किया है, उसने बताया कि समस्या और कहीं है. चूंकि उसकी बातें ज्यादा नहीं सुनी जाती इसलिए उसकी बात पर किसी ने कुछ ख़ास ध्यान नहीं दिया. लेकिन मुझे लगा कि शायद इसके पास कोई ठोस कारण है, सो मैंने उससे पूछ लिया कि असली समस्या क्या है?
उसने बताया कि खाने के समान सही समय पर सही जगह नहीं पहुँच रहे हैं. सड़कों की हालत ठीक नहीं है. जो ट्रक खाने का समान लेकर अपने गंतव्य स्थल पर दो दिन में पहुंचता था उसी ट्रक को अब चार दिन लग रहे हैं. उसका कहना था कि बुनियादी सेवाओं को सुधारने के लिए राजमहल ने कुछ नहीं किया. पथ परिवहन मंत्री ने वादे तो बहुत बड़े-बड़े किये थे लेकिन काम के नाम पर कुछ नहीं किया.
कुछ अर्थशास्त्रियों का अनुमान था कि अनाज और खाने के सामानों की भारी मात्रा में जमाखोरी हुई है. अब जमाखोरों के ख़िलाफ़ कार्यवाई भी तो नहीं कर सकते. मेरे ही कहने पर दु:शासन और जयद्रथ ने इन जमाखोर व्यापारियों से काफी मात्रा में पैसा वसूल कर रखा है. अब ऐसे में जमाखोर व्यापारियों के ख़िलाफ़ कार्यवाई करना तो ठीक नहीं होगा. उधर मंहगाई की मार से परेशान जनता रो रही है.
वैसे हमें मालूम है कि कुछ नहीं किया जा सकता लेकिन जनता को दिखाना तो पड़ेगा ही कि हम मंहगाई रोकने के लिए सबकुछ कर रहे हैं.
इसलिए मैंने तीन कदम उठाने का फैसला किया है.पहला, व्याज दरों में बढोतरी कर दी जायेगी. दूसरा प्रजा को सस्ते अनाज उपलब्ध कराने के तरीकों की खोज के बारे में सुझाव देने के लिए एक कमिटी का गठन किया जायेगा. तीसरा; कुछ जमाखोर व्यापारियों पर छापे की नौटंकी खेलनी पड़ेगी. छापे मारने का काम सबसे अंत में होगा. और तब तक नहीं होगा, जब तक इन व्यापारियों के पास ख़बर नहीं पहुँच जाती कि उनके गोदामों पर छापा पड़ने वाला है.
देखते हैं, मंहगाई रोकने के हमारे 'प्रयासों' का क्या होता है?

