बी बी पी यानि ब्लॉगर-ब्लॉगर पार्टनरशिप की एक और ब्लॉग पोस्ट. यह ब्लॉग-पोस्ट मैंने और विकास गोयल जी ने मिलकर लिखा है. पढ़कर देखिये.
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कौन बनेगा करोड़पति के सेट पर. अमिताभ बच्चन साहब अपनी दोनों हथेलियों का गठबंधन लिए हुए आते हैं और आते ही शुरू हो जाते हैं; "वेलकम वेलकम वेलकम...अ वेरी गुड एवेनिंग टू आल ऑफ यू...नमस्कार, आदाब, सत श्रीअकाल...देवियों और सज्जनों, मैं अमिताभ बच्चन आपसब का इस अद्भुत खेल में स्वागत करता हूँ जिसका नाम है कौन बनेगा करोड़पति...जैसा कि कल आपने देखा, मुंबई के बाबूराव गणपतराव आप्टे यहाँ से बारह लाख पच्चास हज़ार रूपये जीत कर गए.... और एकबार फिर से यह सिद्ध हुआ कि ज्ञान जो है, वही आपको आपका सही स्थान दिलाता है...और आज हमारे साथ दस नए कंटेसटेंट्स हैं. आइये उनका परिचय जान लेते हैं........तो फिर आइये शुरू करते हैं फास्टेस्ट फिंगर फर्स्ट..आपसब को पता है कि क्या करना है...और फास्टेस्ट फिंगर फर्स्ट के लिए आपका प्रश्न है;
इन भारतीय अभिनेताओं को उनकी अभिनय क्षमता के अनुसार नीचे से ऊपर के क्रम में लगायें..प्रश्न एक बार पुनः सुन लें...इन भारतीय अभिनेताओं को उनकी अभिनय क्षमता अर्थात ऐक्टिंग स्किल्स के अनुसार नीचे से ऊपर के क्रम में लगायें...और आपके ऑप्शंस हैं..
ए) डीनो मोरिया
बी) तुषार कपूर
सी) अर्जुन रामपाल और
डी) हरमन बावेजा.
ऑप्शंस एकबार फिर से देख लें...ए) डीनो मोरिया... बी) तुषार कपूर... सी) अर्जुन रामपाल और डी) हरमन बावेजा...
कंटेस्टेंट्स ने जवाब दिए और कम्यूटर की स्क्रीन देखते हुए अचानक बच्चन साहब ठीक वैसे ही चिल्लाने लगे जैसे फिल्म हम में सुदेश भोंसले की आवाज़ में चिल्लाते हुए उन्होंने जुम्मा जी को पुकारा था; "और सबसे पहले सही जवाब दिया है मुंबई के इक्कीस वर्षीय विकास गोयल ने... बहुत खूब! विकास जी, आपने केवल ढाई सेकंड्स में ही फास्टेस्ट फिंगर फर्स्ट पूरा किया...ओह! आह! वैसे इतने कठिन प्रश्न का आपने न केवल सही उत्तर दिया बल्कि बहुत ही कम समय में दिया... इस बात पर मैं यह अवश्य कहूँगा कि बहुत तेज़ दिमाग है आपका. क्या आप डाबर च्यवनप्राश का सेवन करते हैं?"
विकास; "नहीं सर, च्यवनप्राश नहीं, हाँ मैं हाजमोला खाता हूँ. वैसे तो सर क्वेश्चन रियली बहुत टफ था ...इन एक्टर्स में कौन ऊपर और कौन नीचे, यह बताना आम इंसान के बस की बात नहीं....फिर भी यह दिमाग की बात नहीं है सर, यह तो अँगुलियों को चलाने की बात...और सर, अगर आप चौबीस घंटों में से सोलह घंटे स्मार्टफोन पर फेसबुक और ट्विटर करेंगे तो आप भी ढाई सेकंड्स में यह कर लेंगे..."
अमिताभ बच्चन; "हा हा हा ...परन्तु आपने कोशिश की..जो हिम्मत दिखाई, उसके लिए आप बधाई के पात्र हैं. ...बिना कोशिश के यह कर पाना असंभव होता. इस बात पर मुझे बाबूजी की कविता याद आती है कि; लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती...."
विकास; "..कोशिश करने वालों की हार नहीं होती..सर, पिछले एपिसोड में आप यह कविता सुना चुके हैं."
अमिताभ बच्चन; "हा हा हा..तो चलिए फिर हम और आप मिलकर खेलते हैं कौन बनेगा करोड़पति. तो देवियों और सज्जनों आपने देखा कि किस तरह से मुंबई से आये विकास गोयल जी ने......."
हॉट सीट पर बैठने के बाद...
अमिताभ बच्चन; "तो विकास जी, आप हमें और हमारे दर्शकों को अपने बारे में कुछ बताइये.."
विकास; "सर, मैं मस्स्त.. आई लाइक रीडिंग...पढ़ना मुझे बहुत पसंद है."
अमिताभ बच्चन; "ओ..आपको पढ़ना पसंद हैं..बहुत खूब! वैसे क्या पढ़ना पसंद करते हैं आप? मेरा तात्पर्य है कि किस तरह की किताबें..?"
विकास; "सर, मैं बॉम्बे टाइम्स पढ़ता हूँ. बहुत पढ़ता हूँ. इसके अलावा मुझे पोलिटिक्स, क्रिकेट, सिनेमा..बहुत रूचि है मेरी..और आय ऐम अ बिग फूडी..आय लव ट्रैवेलिंग.."
अमिताभ बच्चन; "ओह, यह सब चीज़ें भी आपको बहुत पसंद हैं! बहुत खूब! वैसे आपकी पसंद ट्विटर सेलेब्रिटी जैसी है... तो क्या आप भी ट्विटर पर..."
विकास; "सर, बिलकुल सही पहचाना आपने. मैं ट्वीटर ही हूँ. और सर, आप भी तो ट्विटर पर..."
अमिताभ बच्चन; "हाँ, मैं भी ट्विटर पर हूँ..और अब तो मैं फेसबुक पर भी...वैसे आपने कभी ट्विटर पर मुझे फालो नहीं किया."
विकास; "सर, आप भी तो कहाँ मुझे फालो करते हैं?"
अमिताभ बच्चन; "हा हा हा..और अपने जीवन के बारे में कुछ बताइए."
विकास; "बताना क्या है सर, मैं बिलकुल मस्त...
अमिताभ बच्चन; "मेरे कहने का तात्पर्य यह था कि अपने आरंभिक जीवन के बारे में कुछ बताइए..मेरा मतलब बचपन में जब घर वालों को पैसे की तंगी...जैसे जब आप स्कूल में अपने पैसेवाले मित्रों को खर्च करते हुए देखते थे और आपके पास पैसे नहीं होते थे तो आपको कैसा लगता था?"
विकास; "पैसे की कमी कभी रही ही नहीं..अपने स्कूल में मैं ही सबसे पैसेवाला था सर. ..हमेशा मैं ही खर्च करता था. ...मॉम-डैड भी बिलकुल कूल हैं. "
यह सुनकर अमिताभ बच्चन के साथ-साथ ऑडिएंस का चेहरा भी उतर जाता है. वे यह सुनकर दुखी हो जाते हैं कि हॉटसीट पर एक ऐसा कंटेस्टेंट बैठा हैं जिसके पास बहुत पैसा है. जिसे पैसे की कमी की वजह से पिज्जा न खा पाने का दुःख कभी नहीं रहा और न ही मनचाही पढ़ाई न कर पाने का.
अमिताभ बच्चन; "तो फिर चलिए हम और आप मिलकर खेलते हैं कौन बनेगा करोड़पति. खेल के नियम तो आपको पता ही होंगे....."
विकास; "सर, पिछले १२ सालों से देख रहा हूँ...मैं ही क्यों पूरे इंडिया को गेम के रूल्स मालूम हैं. आप तो बस सवाल कीजिये."
अमिताभ बच्चन; "हा हा हा..तो फिर यह रहा पाँच हज़ार रुपयों के लिए आपका पहला प्रश्न; इन फिल्मों में से कौन सी फिल्म अभिषेक बच्चन की एक प्रसिद्द फिल्म है? प्रश्न एक बार फिर से सुन लें...इनमें से कौन सी मूवी अभिषेक बच्चन की एक प्रसिद्द मूवी है? और आप के ऑप्शंस हैं;
ए) बोल खान
बी) बोल कपूर
सी) बोल बच्चन और
डी) बोल देवगन.
विकास को लगा जैसे बच्चन साहब ऑप्शंस में "सी बोल बच्चन" कहकर मूवी देखने का इशारा कर रहे हैं. फिर उसके मन में आया कि चार की जगह अगर पाँच ऑप्शंस होते तो बोल कुमार को भी अकॉमोडेट किया जा सकता था.. सोचते-सोचते अचानक बोल पड़ा; "सर, मैं लाइफ-लाइन यूज करना चाहूँगा.."
अमिताभ बच्चन; "ओह! पहले ही प्रश्न में लाइफ-लाइन का प्रयोग ...वैसे आप चाहें तो प्रश्न को फिर से देख सकते हैं, हमें कोई जल्दी नहीं है. बहुत प्रसिद्द यह जो है फिल्म अभिषेक की...आपको एक हिंट दे दूँ कि इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर सौ करोड़ रूपये कमाये हैं..."
विकास; "सर, मैं सिर्फ अच्छे एक्टर्स की मूवी देखता हूँ.."
अमिताभ बच्चन; "तो फिर आप लाइफ लाइन इस्तेमाल करना चाहते हैं...जनता जनार्दन, विकास जी को आपके मदद की आवश्यकता है...आप उनकी मदद कीजिये...वे अपनी लाइफ-लाइन का इस्तेमाल करना चाहते हैं. अपने-अपने वोटिंग मीटर्स तैयार रखिर..और आपका समय शुरू होता है अब.."
कहते हुए बच्चन साहब ने अपने दाहिने हाथ की तर्जनी को हवा के ऊपर पटक दिया.
वोटिंग समाप्त ..रिजल्ट आते ही अमिताभ बच्चन; "ओह, जनता ने तो आपका काम काफी आसान कर दिया..हालाँकि करीब उनत्तीस प्रतिशत लोगों का मानना है कि सही जवाब है डी) "बोल देवगन" परन्तु वहीँ पर पैंसठ प्रतिशत लोगों का का मानना है कि सही जवाब है सी) "बोल बच्चन" ..और अपने पुराने अनुभवों से मैं कह सकता हूँ कि बहुत कम मौके ऐसे आते हैं जब जनता इतनी भारी मात्रा में एक-दूसरे के साथ सहमत होती है. तो आप जनता के साथ जाना चाहेंगे? लॉक कर दूँ सी) बोल बच्चन? "
विकास; "नहीं सर."
सुनकर स्टूडियो ऑडिएंस में खुसर-पुसर शुरू हो जाती है. कई लोग़ जिन्होंने सी) बोल बच्चन को वोट दिया था, उन्हें भी अपने ज्ञान पर शंका होने लगी. शायद प्रोडक्शन वालों में से किसी ने इशारा किया होगा कि ऑडिएंस चुप हो गई. अमिताभ बच्चन जी बोले; "ओह, विकास जी, आश्चर्य की बात है कि पैसठ प्रतिशत जनता सी) कह रही है फिर भी आप जनता के साथ नहीं जाना चाहते."
विकास; "सर, अगर जनता को सही गलत का पता होता तो ऐसी फिल्में सौ करोड़ कमा पाती क्या? और सर, सच कहूँ तो जनता को अगर सही-गलत का पता होता तो देश का जो हाल है, वह भी नहीं होता."
अमिताभ बच्चन; "तो फिर आप क्या करना चाहेंगे?"
विकास; "सर, मैं एक्सपर्ट एडवाइज यूज करना चाहूँगा."
अमिताभ बच्चन; "बहुत खूब! कम्प्यूटर जी, विकास जी एक्सपर्ट एडवाइज यूज करना चाहते हैं...आज की हमारी एक्सपर्ट हैं विख्यात अभनेत्री कटरीना कैफ जी. कम्प्यूटर जी, कटरीना जी से हमारा संपर्क स्थापित करवाइए."
अभी संपर्क स्थापित हो ही रहा था कि विकास बोल पड़ा; "सर, मैं कटरीना के साथ जाना चाहता हूँ."
अमिताभ बच्चन; "परन्तु अभी तक तो कटरीना जी ने जवाब भी नहीं दिया."
विकास; "सर मैं जवाब के साथ जाने की बात नहीं कर रहा हूँ, मैं कटरीना के साथ घर जाने की बात कर रहा हूँ."
अमिताभ बच्चन; "हा हा हा...कम्यूटर जी, कटरीना कैफ जी से संपर्क स्थापित करवाया जाय."
बहुत कोशिश के बाद भी संपर्क स्थापित नहीं हो सका. अमिताभ बच्चन जी ने कहा; "भाई साहब, लगता है कटरीना जी ने आपकी उनके साथ घर जाने की बात सुन ली और उन्होंने लाइन डिस्कनेक्ट कर दिया है. तो अब आपके पास सिर्फ दो ऑप्शंस बचे हैं. एक है फोन अ फ्रेंड और दूसरा है डबल डिप. आप कौन सा ऑप्शन इस्तेमाल करना चाहेंगे?"
विकास ; "सर, मैं फोन अ फ्रेंड करना चाहूँगा."
अमिताभ बच्चन; "कम्यूटर जी, विकास गोयल जी द्वारा फोन अ फ्रेंड ऑप्शन के लिए दी गई इनके मित्रों की सूची दिखाई जाय."
कम्यूटर जी स्क्रीन पर चार लोगों की सूची दिखाते हैं.
अमिताभ बच्चन; "इन चार में से आप किसे फोन कर करना चाहेंगे?"
विकास; "सर, शिव कुमार मिश्रा को."
अमिताभ बच्चन; "मित्र हैं आपके? आपके साथ कॉलेज में पढ़ते थे? क्या करते हैं शिव कुमार जी?"
विकास ; "नहीं सर, कॉलेज वॉलेज में नहीं थे, ट्विटर से फ्रैंडशिप हुई इसके साथ. और करेगा क्या? दिन भर ट्वीट करता रहता है.... ये लिस्ट में आपने जो चार फ्रेंड्स देखे हैं, इन सभी से सोशल मीडिया पर ही फ्रैंडशिप हुई. रीयल लाइफ के फ्रेंड मेरे हैं ही नहीं. जो हैं, सारे नेट फ्रेंड्स हैं."
अमिताभ बच्चन; "ओह, तो आपके सारे मित्र जो हैं, वह सोशल मीडिया की वजह से बने...यह बहुत अच्छी बात है कि तकनीकि ने पूरी दुनियाँ के लोगों को एक-दूसरे के साथ मिला दिया है. मित्रता करवा दिया है. तो कम्प्यूटर जी, शिव कुमार मिश्रा को कोलकाता में फोन लगाया जाय. "
कम्प्यूटर जी ने शिव कुमार मिश्रा को फ़ोन लगा दिया. जैसे ही उन्होंने फ़ोन उठाया अमिताभ बच्चन जी बोले; "हेलो, शिव कुमार जी..?"
उधर से आवाज़ आई; "जी, बोल रहा हूँ."
अमिताभ बच्चन; "शिवकुमार जी, नमस्कार, मैं अमिताभ बच्चन बोल रहा हूँ कौन बनेगा करोड़पति से."
उधर से आवाज़ आई; "हाँ बोलिए."
अमिताभ बच्चन; "शिव कुमार जी, मैं अमिताभ बच्चन बोल रहा हूँ कौन बनेगा करोड़पति से."
उधर से आवाज़ आई; "मैं आपको पहचान गया हूँ सर. आप आगे भी कुछ बोलना पसंद करेंगे?"
अमिताभ बच्चन; "हा हा हा..इस समय आपके मुंबईवासी मित्र विकास गोयल जी हमारे सामने हॉटसीट पर बैठे हैं."
उधर; "अच्छा! कुछ जीत भी लिया है क्या उसने?"
अमिताभ बच्चन; "नहीं, अभी यह उनका पहला ही प्रश्न है और उसका सही जवाब देने के लिए उन्हें आपके मदद की जरूरत है. अगली आवाज़ जो आप सुनेंगे, वह आपके मित्र विकास जी की आवाज़ होगी. आपको इसके लिए तीस सेकंड्स मिलेंगे. और आपका समय शुरू होता है अब."
कहकर अमिताभ बच्चन जी ने एकबार फिर अपने दाहिने हाथ की तर्जनी को हवा पर दे मारा. हवा को फिर से चोट लग गई.
विकास; "अबे, आखिर मिल ही गया न तू. सवाल जवाब ऑप्शंस गए भाड़ में पहले तू ये बता कि मेरे पचीस हज़ार रूपये और आई-फोन का चार्जर कब देगा बे? तीन महीने से जब भी तुझे फोन करता हूँ, तू मुंबई का नंबर देखकर उसको काट देता है. आज पहले तू बता कि मेरा पैसा वापस कब करेगा?......"
अमिताभ बच्चन; "ओह, विकास जी, आपका समय समाप्त हो गया. आपके हाथ से यह मौका जाता रहा. वैसे ये बताइए कि कितने महीने हो गए इन्हें आपसे उधार लिए हुए?"
विकास ; "अरे सर, पूछिए मत. चार महीने हो गए हैं. कितनी बार फोन किया, फोन ही नहीं उठाता. मेल किया, उसका भी जवाब नहीं दिया. डी एम तक का जवाब नहीं देता है. ऊपर से पिछले तीन महीने में तीन बार मुंबई आकर वापस जा चुका है. वापस गया और फेसबुक पर मुंबई की पिक्स लगाई तब मुझे पता चला...."
अमिताभ बच्चन; "परन्तु आपके हाथ से प्रश्न के सही जवाब देने का एक और मौका चला गया."
विकास ; "अरे सर, आपका क्वेश्चन तो पाँच हज़ार का था. मेरा तो यहाँ इस बन्दे ने पचीस हज़ार लिया हुआ है."
अमिताभ बच्चन; "तो फिर अब क्या करना चाहेंगे आप? आपके पास सिर्फ एक लाइफ-लाइन है और वह है डबल डिप. इसके बारे में मैं आपको बता दूँ. आप कोई भी ऑप्शन चुन सकते हैं. अगर वह गलत हुआ तो फिर आपको एक और मौका दिया जाएगा कि आप दूसरा ऑप्शन चुन सकते हैं."
विकास; "सर, कितना अच्छा होता कि भारत में इलेक्शंस भी ऐसे ही होते. हम एक सरकार चुनते और अगर वह हमारी उम्मीद पर खरी न उतरती तो हम बटन दबाकर दूसरी पार्टी को चुन लेते और अपनी गलती सुधार लेते."
अमिताभ बच्चन; "हा हा हा ..कौन बनेगा करोड़पति के इस ऑप्शन से देश की दिशा और दशा सुधर सकती है. चूँकि पूरा भारत उनकी बात सुनता है इसलिए मैं आमिर खान जी से अनुरोध करूँगा कि वे देश के लिए हमारी इस सौगात को भारत के चुनाव आयोग के पास.....वैसे विकास जी, अब आप क्या करना चाहेंगे?"
विकास; "सर, अब मैं क्विट करना चाहता हूँ. मुझे देर हो रही है. आज मेरा एम टीवी रोडीज का ऑडिशन है."
इतना कहकर विकास उठा खड़ा हुआ. जैसे ही वह बाहर गया अमिताभ बच्चन जी फिर शुरू हो गए; "ओह्ह, तो अभी अभी आपने देखा देवियों और सज्जनों कि एकमात्र ज्ञान ही ......"
Sunday, September 16, 2012
वंस अपॉन अ टाइम ऑन केबीसी...
Thursday, September 22, 2011
ऐ मेरे दाता.....
गाने के रियलिटी-शो में दस साल के बच्चे ने हारमोनियम बजाते हुए एक ग़ज़ल इस तरह से गाई जैसे बड़े-बड़े उस्ताद गाते हैं. उसने मेंहदी हसन स्टाइल में ग़ज़ल के शेरों को सुर और मुर्कियों के बल पर पहले तो कंट्रोल में लिया फिर उन्हें पटका. उसके बाद उनका कॉलर पकड़ कर उनके ऊपर चढ़ बैठा. काफी देर तक वह उन्हें तरह-तरह से रगेदता रहा. कुछ मिनटों तक ग़ज़ल पर आवाज़ की ठनक, सरगम की सनक और राग का प्रहार होता रहा. जैसे-जैसे उसपर बच्चे का आक्रमण बढ़ता जा रहा था, ग़ज़ल के शेर कमज़ोर पड़ते जा रहे थे. दर्शक ताली बाजा रहे थे और जज-गुरु लोग़ बच्चे की आवाज़ के अनुसार अपना हाथ ऐसे ऊपर-नीचे कर रहे थे जैसे कोई बच्चा हवा में हाथों की गाड़ी बनाकर उसे उड़ाता है.
एक समय ऐसा आया जब लगा कि बेचारे शेर अब पूरी तरह से पस्त हो चुके हैं. उनमें अब कोई जान नहीं रही कि गायक बच्चा उन्हें और रगेदे. समय सीमा, समय का अभाव या फिर शायद ग़ज़ल के माफीनामे की वजह से बच्चे ने प्लेटफॉर्म पर धीरे-धीरे रुकने वाली रेलगाड़ी स्टाइल में अपना गाना रोका. स्टैंडिंग ओवेशन की बहार आ गई. ऐंकर ने बच्चे को दोनों हाथों से उठा लिया. महागुरु आश्चर्यचकित होने की अपनी चिर-परिचित मुख मुद्रा लुटाने लगीं. कुल मिलाकर विकट रियलटीय टेलीविजन के दर्शन होने लगे.
कुछ देर तक बच्चे को अपनी गोद में रखने के बाद ऐंकर ने उसे नीचे उतारा और अपने ऐन्करीय धर्म का पालन करते हुए शुरू हो गया; "गुरु कैलाश? क्या कहना चाहेंगे आज आप?"
गुरु कैलाश चूल्हे पर रखे पानी के पहले उबाल की तरह शुरू होना ही चाहते थे लेकिन शब्दों की शॉर्ट-सप्लाई के कारण अदबदा गए. कुछ क्षणों तक अ ब स करने के बाद और काफी मशक्कत और खोजबीन के बाद जब कुछ शब्द उनके मुँह लगे तो वे शुरू हो गए; "आज~~~ मैं मेरे दाता से कहना चाहूँगा कि ऐ मेरे दाता, ऐ मेरे मालिक, ऐ मेरे भगवान इन्हें ऐसे ही रखना. इनके ऊपर कृपा करना. मैं तो कहूँगा कि आज मेरे दाता ने इन्हें अपना आशीर्वाद दिया...ये भटकने न पाए... आज इनका यश, इनका ऐश्वर्य पूरी दुनियाँ देख रही है. बच्चे तो भगवान की मूरत होते हैं. 'प्रथ्वी' पर आज इनका जो नाम हो गया है.... आज पूरा ब्रह्माण्ड इन्हें दुआएं दे रहा है. तो ऐ मेरे दाता.......महागुरु, आज तो इसने बावला कर दिया."
जज-गुरु की गलती नहीं है. वे और क्या करेंगे जब ऐसे बिकट टैलेंटेड बच्चे प्रतियोगी बनकर स्टेज पर उतर जायेंगे और सुरों के चौके-छक्के जड़ने लगेंगे? टैलेंटेड, मेहनती और इतने परफेक्ट कि सुनकर मन में आता है जैसे इनका गला बाकायदा ऑर्डर देकर बनवाया गया है. पॉवर-पॉइंट प्रजेंटेशन के बाद. बिलकुल परफेक्ट. कहीं कोई दोष नहीं. हाँ, परफेक्ट होने के चक्कर में इन बच्चों ने अपना बचपना कहाँ और किसके पास गिरवी रख छोड़ा है वह शोध और जांच, दोनों का विषय है. अगर शोध या जांच के बाद यह पता चल भी जाए कि कहाँ और किसके पास रखा गया है तो भी उस बचपने को वापस पाने का कोई अर्थ नहीं क्योंकि तबतक ये इतने उस्ताद हो चुके होते हैं कि इन्हें बचपने और मासूमियत के तीर-कमान की ज़रुरत ही नहीं रहती.
गुरु, महागुरु, गेस्ट गुरु, बैंड वाले, दर्शक, संगीत प्रेमी वगैरह इन बच्चों को देखकर दाँतों तले ऊँगली दबाते हैं. और फिर ऐसा क्यों न हो? दस साल के बच्चे के मुँह से राहत फ़तेह अली खान की आवाज़ इस तरह से निकलती है कि अगर वे सुन लें तो सोचने लग जायें कि; 'ये बच्चा मुझसे मेरी आवाज़ कब चुरा ले गया?' सुनने वालों को यह भी लग सकता है कि 'दो-तीन महीने के लिए ये बच्चा राहत बाबू का गला उधार मांग लाया है.'
न तो इन बच्चों की आवाज में कोई कमी है और न ही हुनर में. अगर किसी ऑड-डे पर ख़ुदा न खास्ता इनसे कोई गलती हो जाती है तो जज साहब उन्हें बताते हैं कि; "ये जो हरकत-उल-आवाज़ तुमने ऐसे ली थी, उसे गाने में रफ़ी साहब ने वैसे लिया है", या फिर; "तुमने गाने को चार से उठाया. अगर तीन से उठाया होता तो जो ऊंची आवाज़ में तुम्हारा सुर गया, वह नहीं जाता."
सब तरह के नुक्श निकाल कर भी जज-गुरु यह कहना नहीं भूलते कि; "फिर भी तुमने कमाल का गाया."
गेस्ट-गुरु के रूप में आया कोई संगीतकार बच्चे को बताना नहीं भूलता कि उसकी आवाज़ रेकॉर्डिंग स्टूडियो के लिए ही बनी है. साथ ही वादा भी कर डालता है कि दो साल बाद वह अपने सारे गाने उसी बच्चों से गवायेगा. पूरे सेट पर ख़ुशी का मौसम आ जाता है. कई-कई बार तो इतनी ख़ुशी आ जाती है कि डर लगता है कि सेट की दीवारें फट न पड़ें. जितना खुश वह बच्चा नहीं होता उससे ज्यादा उसके माँ-बाप खुश होते हैं. ठीक वैसे ही एलिमिनेशन पर बच्चा जितना दुखी नहीं रहता उससे ज्यादा उसके माँ-बाप दुखी होते हैं. उन्हें देखकर लगता है जैसे अब इनका जीवन व्यर्थ हो गया. इनके ऊपर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है और अब ये इससे कैसे उबरेंगे?
इन बच्चों में परफेक्शन, गुण, मेहनत, कला वगैरह वगैरह कूट-कूट कर भर गए है.
लेकिन जो चीज इन्हें छोड़कर चली गई है उसकी बात?
जब से हमने तय किया है कि हम अपने देश को इकॉनोमिक सुपर पॉवर और सामरिक दृष्टि से भी महाशक्ति बनायेंगे तबसे देश में रियलिटी शो की संख्या में दिन दूनी नहीं तो रात में चौगुनी वृद्धि तो ज़रूर हुई है. तरह-तरह के विषयों पर रियलिटी शो बनाये जा रहे हैं. यहाँ तक कि अच्छे-खासे घर-दुआर वाले लोग़ जंगलों में जाकर वास कर रहे हैं ताकि रियलिटी शो बन सके. कई लोग़ सांप-छछूंदर, केकड़े-अजगर के साथ खुद को कांच के डब्बे में कैद कर ले रहे हैं और उन जानवरों को सता रहे हैं ताकि जानवरों को तंग करने वाली उनकी हरकतों को कैमरे में कैद करके उसे रियलिटी शो में बदला जा सके.
कई बार मन में आता है कि अच्छा हुआ जो श्री राम ने त्रेता युग में जन्म लेकर खुद को उसी युग में सरयू नदी के हवाले कर दिया. सोचिये अगर आज श्री राम खुद को सरयू नदी के हवाले करते तो क्या होता? उनके जल समाधि को लाइव टेलीकास्ट करने के लिए चैनलों में होड़ लग जाती. ये चैनल वाले एक कांख में अपनी पूरी बेशर्मी दबाये और दूसरी में रूपये की थैली लिए उनके पास एक्सक्ल्यूसिव राइट्स के लिए पहुँच जाते. गारंटी तो नहीं डे सकता लेकिन फिर भी ऐसा ज़रूर लगता है कि अगर वे आज होते तो ये रियलिटी शो वाले उनके वनवास की खबर पर उनके पास भीड़ लगा लेते और उनके वनवास को रियलिटी शो में बदल देने के लिए उन्हें पक्का लालच देते. जनक भले ही विदेह होंगे लेकिन सीता स्वयंवर के अवसर पर कोई न कोई चैनल वाला स्वयंवर के लाइव टेलीकास्ट की एक्स्क्यूसिव राइट्स के लिए पैसे लेकर रोज उनके राजमहल के चक्कर लगाता.
आज इन शो बनाने वालों को परफेक्ट सिंगर और परफेक्ट डांसर वगैरह की तलाश है लेकिन इस परफेक्शन से ये दर्शकों को कितने वर्षों तक चमत्कृत या फिर बोर कर पायेंगे? मुझे तो पक्का विश्वास है कि एक समय ऐसा भी आएगा जब शो बनाने वाले ये लोग़ ऐसे बच्चों को ढूढेंगे जिनके पास मासूमियत होगी. जिनमें बचपना होगा. जिनमें परफेक्शन नहीं होगा. जो बच्चे 'कम्प्लीट' सिंगर या 'कम्प्लीट' डांसर नहीं होंगे. और फिर ये लोग़ उन बच्चों की मासूमियत, तुतलाहट वगैरह पर रियलिटी शो बनायेंगे.
और तब हमें जज-गुरु द्वारा सुनने को मिलेगा; "आज~~ मैं मेरे दाता से कहूँगा कि ऐ मेरे दाता, ऐ मेरे ईश्वर, ऐ मेरे मालिक, इनको हमेशा मासूम बनाये रखो....ये जो इनकी तुतलाहट है वो हमेशा ऐसे ही बनी रही. ऐ मेरे दाता इनकी नाक ऐसे ही बहती रहे जिससे ये बच्चे लगें....आज पूरी 'प्रथ्वी' में इनकी मासूमियत की चर्चा हो रही होगी........................."
समस्या एक ही है. आज रियलिटी शो है...कल भी रियलिटी शो ही रहेगा. बिक्री के लिए केवल कमोडिटी बदल जायेगी.
Tuesday, September 14, 2010
सिंगिंग रियल्टी शो- एक निबंध
एक जमाना था जब परीक्षा का प्रश्नपत्र सेट करने वाले विद्वान् विद्यार्थियों को चैलेन्ज जैसा देते थे कि वे पोस्टमैन, मेरा गाँव, रेलयात्रा जैसे विषयों पर निबंध लिख कर दिखायें. पोस्टमैन नहीं आते तो मेरा गाँव आ जाता. मेरा गाँव नहीं आता तो रेलयात्रा आ जाता. कुल मिलाकर विकट सरल दिन थे. विद्यार्थीगण बहुत जोर रटते थे और परीक्षा की कापी रंग आते थे. अब चूंकि ज़माना हर ज़माने में बदलता है इसलिए अब ऐसे पुराने विषयों पर निबंध लिखने के लिए नहीं कहा जाता. और कारण यह भी हो सकता है कि पोस्टमैन की जगह कूरियर बॉय ने ले ली है और उसके चरित्र चित्रण की बारीकियों का निर्धारण अभी तक नहीं हो पाया है.
हाल ही में एक विद्यार्थी के परीक्षा की कॉपी मिल गई. अरे भाई साहब, हाल ही में से मेरा मतलब है परसों. अब हिंदी दिवस से दो दिन पहले इतिहास की कॉपी थोड़े न मिलेगी. तो प्रस्तुत है उस विद्यार्थी द्वारा लिखा गया निबंध जिसका शीर्षक है; सिंगिंग रियलटी शो. अब मेरे ऊपर गुस्सा न होइए कि शीर्षक अंग्रेजी में क्यों है? है तो है. शीर्षक पर ध्यान मत दीजिये अब निबंध बांचिये.
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भारत में रियल्टी शो का इतिहास बहुत पुराना नहीं है. हाँ, यह ज़रूर है कि तमाम तरह के रियल्टी शो में सबसे पुराना शो गाने का ही है. वैसे इतिहासकारों और विद्वानों का मानना है कि हमारे देश में भी रियल्टी शो का इतिहास पुराना हो सकता था लेकिन उनदिनों सेल फ़ोन न होने के कारण ऐसा हो नहीं सका.
विद्वानों का मानना है कि १९८५ में जब श्री वारेन एंडरसन को सरकारी कार में हवाई अड्डे ले जाया जा रहा था उस समय उनके कार में बैठाकर एयरपोर्ट प्रस्थान करने की रीयल तस्वीर टीवी कैमरे से ले ली गई थी लेकिन उनदिनों सेल फ़ोन न होने के कारण दूरदर्शन वो फूटेज दिखाकर दर्शकों से यह नहीं कह सका कि; "वारेन एंडरसन को कार में बैठाकर भगाने के लिए कौन जिम्मेदार है? आपके आप्शन हैं; (ए) राजीव गाँधी (बी) अर्जुन सिंह (सी) नरसिम्हा राव और (डी) रतन नूरा. अपना जवाब हमें पाँच शून्य शून्य सात एक पर भेज दीजिये. जवाब के आगे अपना नाम और अपना पता ज़रूर लिखिए."
ऐसा न हो सका और हम इतिहास का निर्माण नहीं कर सके. एक अदद सेल फ़ोन न होने की वजह से सब गुड़ गोबर हो गया. अगर सेल फोन होता तो हम रीयल्टी शो के आविष्कार का पेटेंट करवा लेते और फिर अमेरिकी इंटरटेनमेंट कम्पनियाँ भारत सरकार को लाइसेंस फीस देकर ही अपने देश में रीयल्टी शो कर पातीं. खैर, जो हो गया सो हो गया.
गाने का रियल्टी शो केवल गाने के बारे में नहीं होता. यह जजों के बारे में भी होता है. यह प्रतियोगी के माँ-बाप के बारे में भी होता है और यह एंकर के बारे में भी होता है. सेलेक्शन का प्रोसेस बहुत झमेले वाला होता है. (सर जी, नंबर मत काटियेगा. प्रोसेस का हिंदी शब्द दिमाग में नहीं आ रहा है) कभी-कभी सेलेक्शन में इतना झमेला हो जाता है जितना इलेक्शन में नहीं होता. (सर जी, सेलेक्शन से इलेक्शन की तुकबंदी मिला दिया है मैंने. आशा है आप उसके लिए एक नंबर ज्यादा देंगे).
जहाँ सिंगिंग रियल्टी शो के लिए सेलेक्शन होने वाला रहता है वहाँ कई घंटे पहले से ही भीड़ हो जाती है. अक्सर ऐसा देखा जाता है कि प्रतियोगी के माँ-बाप एक दिन पहले शाम पाँच बजे से ही लाइन लगा देते हैं. जिन माँ-बाप को गाने और संगीत के बारे में थोड़ा-बहुत आईडिया होता है वे पाँच बजे से लाइन लगाते हैं और जिन माँ-बाप को गाने के बारे में कम जानकारी रहती है वे उनसे भी दो घंटे पहले से यानि ३ बजे शाम से ही लाइन लगा देते हैं.
सेलेक्शन के समय प्रतियोगी का कर्त्तव्य होता है कि वह जजों को अपने कर्म से रिझाए.रिझाने के इस महत्वपूर्ण काम को करने के ढेरों तरीके हैं. जैसे प्रतियोगी अगर गरीब रहे तो जज जल्द रीझते हैं. या फिर प्रतियोगी अगर सात सौ किलोमीटर चलकर सलेक्शन के लिए आडिशन देने आये तो भी जज लोग रीझ जाते हैं. सेलेक्शन प्रोसेस (सर जी, क्षमा कीजियेगा अभी तक माइंड में प्रोसेस का हिंदी शब्द नहीं घुसा) का एक महत्वपूर्ण विषय होता है प्रतियोगी का खाना न खाने की वजह से बेहोश हो जाना.
रीयल्टी शो रीयल लगे इसके लिए कई बार प्रतियोगी जजों को घटिया और निकम्मा बता देता है. कोई-कोई प्रतियोगी गाली भी दे डालता जिसे चैनल वाले आवाज़ के पैबंद से ढक देते हैं. ऐसा होने से शो करीब बावन प्रतिशत ज्यादा रीयल लगता है.
जो प्रतियोगी गाना गाकर जजों को खुश कर देता है जज उसे तुरंत सेलेक्ट कर लेता है और उसे मुंबई बुला लेता है.मुंबई बुलाने का यह सिद्धांत नया नहीं है. इतिहास गवाह है कि पिछले करीब साठ वर्षों से कोई भी भारत के किसी भी कोने से चलता है तो वह मुंबई ही पहुँचता है. भारत के हर कोने से चली हुई सड़क, रेलगाड़ी और ट्रक अक्सर मुंबई ही पहुँचती है. विद्वानों का मत है कि मुंबई पहुँचने के इस ऐतिहासिक सिद्धांत की नींव श्री देवानंद ने रखी जब वे पंजाब से निकलकर फ्रोंटियर मेल पकड़कर सीधा मुंबई पहुंचे थे.
मुंबई पहुंचकर सारे प्रतियोगी अभ्यास वगैरह करते हैं. उन्हें हमेशा कान में आई-पॉड का हेडफोन लगाये देखा जा सकता है. वे अभ्यास करके जजों के सामने गाते हैं. इस दौरान प्रतियोगी पाँव छूने का भी अभ्यास करता है. वह ऐसा इसलिए करता है जिससे प्रोग्राम में आनेवाले हर गेस्ट जज का और बाकी जजों का जब-तब पाँव छूता रहे. पाँव छूना गायक बनने के लिए गायन के रियाज से भी ज़रूरी है.
जज लोग करीब नब्बे प्रतिशत प्रतियोगियों को बताते हैं कि उनके पास प्ले-बैक की वायस है. वैसे जानकारों का ऐसा मानना है कि जजों की यह बात सही नहीं है क्योंकि अगर ऐसा होता तो अभी तक भारतवर्ष में प्ले-बैक गायकों की संख्या करीब तीन लाख सत्तावन हज़ार होती.
यह भी देखा गया है कि अपने कमेन्ट में जज लोग ऐसे स्टेटमेंट देते हैं जो किसी की समझ में नहीं आता. उनमें कुछ स्टेटमेंट हैं; "तुम्हारी आवाज़ का थ्रो बहुत बढ़िया है", "तुम्हारी वायस की टेक्सचर गज़ब है", "तुम्हारी आवाज़ जो है उसकी फैब्रिक मुझे बहुत पसंद है".
ऐसी बातें सुनकर प्रतियोगी को अपने ऊपर शंका होने लगती है. वह यह सोचने में बिजी हो जाता है कि; "वह एक गायक है या बुनकर?"
जजों के कमेन्ट के बारे में प्रतियोगियों की इस नासमझी को दूर करने के लिए हाल ही में आल इंडिया सिंगिंग रिअलिटी शो पार्टीसिपेंट्स पैरेंट्स एसोसियेशन ने यूजीसी से यह मांग रखी कि वह एक शोध करवाए जिससे प्रतियोगियों और उनके अभिभावकों को जजों के कमेन्ट समझने में आनेवाली मुश्किलों को दूर किया जा सके. सरकार पहले तो नहीं मान रही थी लेकिन जब किसी विद्वान ने उसे यह बताया कि सिंगिंग रियल्टी शो के पार्टिसिपेंट्स बहुत बड़ा वोटबैंक साबित हो सकते हैं तो सरकार ने उनकी मांग मान ली.
रियल्टी शो के दौरान जज यह बताते रहते हैं कि जैसे ही यह शो ख़त्म हुआ देश को उसकी आवाज़ मिल जायेगी. उनकी बात सुनकर लगता है जैसे यह शो नहीं होता तो देश गूंगा ही रहता. कुछ सूत्रों का यह भी मानना है कि जब चैनल वाले अपने विज्ञापनों में देश की आवाज़ खोजने का दावा करते हैं उनदिनों देश की सबसे पावरफुल नेत्री को अपनी आवाज़ पर शंका होने लगती है और वे ज्यादा बोलने लगती हैं.
कई बार ऐसा भी होता है कि शो में आनेवाले प्रतियोगी जजों से ज्यादा जानकार होते हैं. ऐसे में जब कोई प्रतियोगी शास्त्रीय संगीत पर आधारित कोई गीत, ठुमरी या टप्पा गाता है तब जज घबड़ाकर राग और सरगम के साथ-साथ अपना हाथ हिलाते-डुलाते और ऊपर-नीचे करते हैं. जानकारों का ऐसा मानना है कि जज ऐसा इसलिए करते हैं जिससे देशवासियों का यह भ्रम बना रहे कि उन्हें संगीत का ज्ञान है.
हाल ही में किये गए एक सर्वेक्षण के अनुसार जब टीवी पर रियल्टी शो देखनेवाला दर्शक जब इस बात पर स्योर हो जाता है कि कोई प्रतियोगी बहुत अच्छा गा रहा है उसी समय जज उस प्रतियोगी के गाने को घटिया बता देता है. ऐसा करने से जज और जनता के बीच ज्ञान की खाई और चौड़ी हो जाती है. मनोरंजन की दुनियाँ में इसे जजेज सरप्राइज अटैक कहते हैं.
चूंकि ऐसे शो में ज्यादातर जज फ़िल्मी दुनियाँ के चुक गए संगीतकार होते हैं इसलिए उन्हें प्रतियोगियों से यह कहते हुए शर्म नहीं आती वे अपनी अगली फिल्म में फलां प्रतियोगी से एक गाना गवाएंगे. सबको यह मालूम रहता है कि जब इस जज को ही कोई फिल्म नहीं मिलेगी तो फिर उस फिल्म में प्रतियोगी के गाना गाने का सवाल ही नहीं उठता. ऐसे में जजों द्वारा किया जानेवाला यह अनाऊँस्मेंट देशवासियों के मनोरंजन का साधन बनता है.
कम्पीटीशन से धीरे-धीरे करके प्ले-बैक की वायस वाले एक-एक प्रतियोगी का निष्कासन होता रहता है. अंत में जिसका निष्काशन नहीं हो पाता उसे विजेता घोषित कर दिया जाता है और उसकी आवाज़ को ही देश की आवाज़ मान लिया जाता है. कुछ विद्वानों का मानना है कि अभी तक सारे रियल्टी शोज मिलाकर देश को करीब तीन हज़ार चार सौ तेरह आवाजें मिल चुकी हैं. शायद यही कारण है कि देश में हर मामले पर अलग-अलग आवाज़ सुनाई देती है.
प्ले-बैक वायस के मालिक प्रतियोगी जब प्रतियोगिता से निकलते हैं तो उनके माँ-बाप को भी टीवी कैमरे के सामने अपना हुनर दिखाने का मौका मिलता है. ये माँ-बाप अपनी हैसियत और टैलेंट के हिसाब रो लेते हैं और दुखी दीखते हैं.
प्राइसवाटर हाउस कूपर्स द्वारा हाल ही में किये गए एक सर्वे के अनुसार भारत में अगले आठ वर्षों में करीब चालीस हज़ार सात सौ सिंगिंग रियल्टी शोज बनने की संभावना है. कुछ विद्वान मानते हैं कि अगर भारत को अपने ट्वेंटी-ट्वेंटी मिशन (सर जी, यहाँ क्रिकेट की बात नहीं कर रहा हूँ मैं. यहाँ मैं कलाम साहब के इंडिया ट्वेंटी ट्वेंटी मिशन की बात कर रहा हूँ) की सफलता के लिए भारतवर्ष को कुल तीन करोड़ सिंगर तैयार करने पड़ेंगे. यह संख्या करीब सात करोड़ होती लेकिन चूंकि चार करोड़ प्रतियोगी डांसिंग रियल्टी शोज में भी भाग लेंगे इसलिए गायकों की संख्या करीब तीन करोड़ ही रखी गई है.
कुल मिलाकर भारत में सिंगिंग रियल्टी शोज का भविष्य उज्जवल है. भविष्य इतना उज्जवल है कि हर माँ-बाप अपने बेटे-बेटियों को सिंगर ही बनाना चाहता है. अब माँ-बाप भी नहीं चाहते कि बेटी/बेटे डॉक्टर-इंजिनियर बने.समाजशास्त्रियों का ऐसा मानना है कि आनेवाले वर्षों में देश में डाक्टरों और इंजीनियरों की भयंकर कमी हो सकती है.
माँ-बाप की चाहत की बात को आप निम्नलिखित संवाद से आंक सकते हैं;
"नहीं माँ, मैं डॉक्टर बनना चाहती हूँ. मुझे सिंगर नहीं बनना है"; बेटी ने अपनी माँ को समझाते हुए कहा.
"क्या कहा!, डॉक्टर बनना चाहती हो? डॉक्टर बनकर हमारी नाक कटवावोगी क्या? बेटा, आजकल कोई डॉक्टर इंजीनियर बनता है भला?"; माँ कहती है.
"नहीं माँ. प्लीज मेरी बात सुनो. गाने की प्रैक्टिस करके मैं थक जाती हूँ. फिर पढाई नहीं कर पाती"; बेटी ने कहा.
"अरे बेटा, क्या जरूरत है पढाई करने की? आजकल कोई पढाई करता है भला?"; माँ कहती है.
"मेरी बात सुनो तो माँ. हमारी टीचर भी कहती हैं कि दुनियाँ में हर कोई सफल नहीं हो सकता. मैं मानती हूँ कि मैं डॉक्टर बनने से असफल कहलाऊंगी. तो क्या हुआ? मैं एवरेज बच्ची हूँ इसलिए डॉक्टर बन जाऊंगी. जो बच्ची तेज है, वो सिंगर बन जायेगी. यही तो होगा"; बच्ची कहती है.
माँ उसी जगह से पतिदेव को आवाज लगाती है; "अजी सुनते हो?"
पतिदेव वहीँ से जवाब देगे; "अरे क्या हुआ, क्यों शोर मचा रही हो?"
"शोर नहीं मचाऊंगी तो और क्या करूंगी. सुन लो, तुम्हारी लाडली बेटी क्या कह रही है. कह रही है डॉक्टर बनेगी. लो और सर पर चढ़ाकर रखो इसे. डॉक्टर बनकर हमारा नाम डूबोने के लिए ही बड़ा कर रहे हैं हम इसे"; माँ ने जवाब दिया.
अब बच्ची को समझाने की बारी पिताश्री की है; "बेटा, एक बार कांटेस्ट में पार्टीसिपेट कर लो. अगर नहीं जीत पाओगी तो हम अपने किस्मत को रो लेंगे. फिर तुम्हारी जो इच्छा हो, करना. हम तुम्हें डॉक्टर बनने से नहीं रोकेंगे."
नोट:
सर जी, अब और नहीं लिख पा रहा हूँ. पेन पकड़ने की वजह से अंगुलियाँ दर्द कर रही हैं. वैसे आपको राज की बात बताऊँ तो मैंने भी एक रियल्टी शो में ऑडिशन दिया था. मेरा सेलेक्शन हो गया है. परीक्षा के बाद मैं भी मुंबई जा रहा हूँ.
Wednesday, June 9, 2010
बेल अप्लिकेशन - एपिसोड २
गतांक से आगे...
जै माता दी की चिंघाड़ सुनकर लोग भौचक्के हो एक-दूसरे को देखने लगे. अचानक लोगों ने देखा कि हाथ में माइक और सिर पर बाल रखे हुए हिमेश रेशम्मैया जी खड़े हैं. लोगों को समझते देर नहीं लगी कि जै माता दी नामक नारा उन्होंने ही लगाया है. वे अनु मलिक से गले मिले. पता नहीं चला कि किसने किसे गले लगाया. सरोज खान के पाँव छू लिए. उसके बाद एंकर ने तीनो को बताया कि उन्हें अपनी-अपनी कुर्सी संभाल लेनी चाहिए.
तीनो जब कुर्सी पर बैठ गए तो एंकर ने कहा; "कैसा लग रहा है आप लोगों को? अनु जी यह बताएं कि ये कांसेप्ट कैसा लगा आपको? मेरा मतलब अगर आप जैसे गुनी लोग इस तरह से देश की सेवा करेंगे तो एक तरह से अच्छा ही है?"
एंकर की बात सुनकर वे बोले; "लेट मी टेल यू हुसैन कि टैलेंटेड कलाकार कुछ भी कर सकता है. अगर वह सिंगिंग कम्पीटीशन जज कर सकता है तो वह कुछ भी जज कर सकता है. आज हम यहाँ हैं तो अपने टैलेंट के बूते पर हैं और जैसा कि मैंने कहा कि टैलेंटेड कलाकार कुछ भी कर सकता है. यहाँ तक कि देश सेवा भी."
उनका जवाब सुनकर एंकर हुसैन ने जनता से ताली पिटवा दी. उसके बाद तीनों जज स्टेज की तरफ देखने लगे. वे शायद कंटेस्टेंट लोगों के दर्शन करना चाहते थे. जब उन्हें लगा कि वे लोग वहां अभी तक नहीं आये हैं तो अनु मलिक नाराज हो गए. बोले; "ये लोग अभी तक यहाँ क्यों नहीं आये? किसे इंतज़ार करवा रहे हैं ये लोग मालूम है इन्हें? आई टेल यू हुसैन दे आर प्लेयिंग विद देयर लाइव्स. अनु मलिक ने आजतक किसी का इंतज़ार नहीं किया."
उनकी बात सुनकर हुसैन नामक एंकर बोले; "बस आ जायेंगे अनु जी."
तब तक लोगों ने देखा कि पाँचों कंटेस्टेंट रूपी मुलजिम स्टेज पर आ खड़े हुए.
पाँचों लोग बहुत मज़े में खड़े हुए थे. उनके चेहरे पर ख़ुशी व्याप्त थी. पता नहीं किस बात की ख़ुशी थी? सेलेब्रिटी जजों को देखने की या फिर वे यह सोच कर खुश हो रहे थे कि यहाँ बैठे जज उन्हें रिहा करके ही मानेंगे. एंकर हुसैन ने वहां के नियम वगैरह बता दिए. पता चला कि मुलजिमों से जज लोग ही पूछताछ कर लेंगे. सवाल-जवाब वही लोग करेंगे और उसके हिसाब से फैसला सुना देंगे.
सवाल-जवाब के लिए सबसे पहले राठौर साहब को चुना गया. उन्हें चांस मिला तो वे स्टेज पर आये. आते ही अनु मलिक से बोले; "सर, मैं आपका बहुत बड़ा फैन हूँ. आपका वो गाना 'एक गरम चाय की प्याली हो उसे कोई पिलाने वाली हो' मुझे बहुत पसंद है."
उनकी बात सुनकर अनु मलिक बोले; "लेट मी टेल यू राठौर कि आप मेरे फैन हैं, इसका मतलब यह नहीं कि मैं आपको मुंबई आने का टिकेट...सॉरी सॉरी मैं आपको जमानत दे दूंगा. आई एम अ टैलेंटेड सेल्फ मेड मैन...मैं हमेशा सच्चाई का साथ देता हूँ. मैं जो सवाल करता हूँ आप केवल उसका जवाब दीजिये."
राठौर साहब को लगा था कि अनु मलिक उनसे वही गाना यानि एक गरम चाय की प्याली हो वहीँ गवा लेंगे. लेकिन जब ऐसा नहीं हुआ तो वे मुँह लटकाए बोले; "समझ गया सर. मैं आपकी बहुत इज्जत करता हूँ. आप सवाल पूछिए मैं जवाब दूंगा."
अचानक एक फिर से हिमेश चिल्ला पड़े; "जै माता दी, लेट्स रॉक."
इतना सुनकर अदालत की कार्यवाई शुरू हो गई.
अनु मलिक ने राठौर साहब से पूछा; "हाँ तो ये बताओ राठौर कि आपके ऊपर जो आरोप हैं, उनमें कितनी सच्चाई है?"
सवाल सुनकर राठौर साहब बोले; "जरा भी सच्चाई नहीं है सर. जरा भी सच्चाई नहीं है. ये तो मेरे दुश्मनों की साजिश है. मुझे अनायास ही फंसाया जा रहा है."
"लेकिन कौन फंसा रहा है आपको?"; अनु मलिक ने दूसरा सवाल दागा.
उनका सवाल सुनकर राठौर साहब बोले; "मुझसे लोग जलते हैं सर. ये मीडिया वाले जलते हैं. सारे पत्रकार जलते हैं. मैं कहता हूँ सर कि पूरा देश जलता है मुझसे. पूरे देश ने मिलकर मेरे खिलाफ साजिश रची है."
अनु मलिक ने सवालों का सिलसिला आगे बढ़ाते हुए पूछा; "लेकिन उस लड़की ने तो आपकी वजह से आत्महत्या की. आरोप है कि आपने उसे मोलेस्ट किया था."
"झूठ है सर. सरासर झूठ है. वह लड़की तो मलेरिया की वजह से मरी थी. आपको तो मालूम ही है. वह लड़की टेनिस खेलती थी. घास में मलेरिया के एक मच्छर ने उसे काट लिया जिसकी वजह से उसे मलेरिया हो गया. मैंने तो डॉक्टर से कहा था कि उसके मलेरिया से मरने का एक सर्टिफिकेट बना दो. वो बोला आप इतने बड़े पुलिस अफसर हैं. आप कह देंगे कि वह मलेरिया से मरी तो मरी"; राठौर साहब ने जवाब दिया.
"लेकिन आपने उसे स्कूल से निकलवा दिया था. और आपने उसके भाई को भी अपनी ऑथोरिटी का इस्तेमाल करके पुलिस से पिटवाया. क्या यह सब झूठ है?"; अनु मलिक ने फिर से पूछा.
"सरासर झूठ है सर. मैंने उसे स्कूल से नहीं निकलवाया. मैंने उसके भाई को पिटवाया था लेकिन वह इसलिए कि वह एक दिन ट्रैफिक सिग्नल तोड़कर भाग रहा था. मुझे जब इसका पता चला तो मुझे उसी समय वह बात याद आई जो पुलिस ट्रेनिंग में सिखाई गई थी कि अगर पॉवर पास में है तो उसका इस्तेमाल भी करना चाहिए. मैंने तो केवल पॉवर का इस्तेमाल किया सर. अब मेरी पावर की वजह से उसका भाई पिट गया तो...."; राठौर साहब बोलते जा रहे थे.
"लेकिन आपके ही डिपार्टमेंट के अफसर ने इन्क्वाइरी करने के बाद रिपोर्ट दी थी कि आप दोषी हैं"; अनु मलिक ने कहा.
"डिपार्टमेंट की बात है सर. डिपार्टमेंट में लोग तो एक-दूसरे से जलते हैं न. आप डिपार्टमेंट में नहीं थे न इसलिए आपको यह बात पता नहीं रहेगी"; राठौर साहब ने अपनी सफाई दी.
"आपको क्या लगता है? आपको जमानत मिल जायेगी?"; अनु मलिक ने उनसे ही पूछ लिया.
"सर मुझे इस देश की न्याय-व्यवस्था पर पूरा भरोसा है. और अब तो आपके ऊपर भी यकीन हो चला है. आप सच्चे इंसान हैं और मैं भी एक सच्चा इंसान हूँ. मुझे मालूम है कि आप मेरी सच्चाई की क़द्र करेंगे"; राठौर साहब ने अपनी सच्चाई का बखान कर डाला.
जब राठौर साहब से सवाल-जवाब का दौर ख़तम हुआ तो एंकर स्टेज पर आ धमका. मामले को आगे बढाते हुए उसने अनु मलिक से पूछा; "अनु जी, क्या कहना चाहेंगे आप राठौर साहब के बारे में? कैसा लगा आपको?"
अनु मलिक बोले; "मैं तो यही कहना चाहूँगा कि; 'राठौर तेरा अंदाज़ निराला है, तूने हमसब को घायल कर डाला है. गजब की तेरी मुस्कान है, तूने चश्मा भी पहन रखा काला है."
अनु मलिक की बात सुनकर सबने ताली बजाई. उसके बाद एंकर सरोज खान से मुखातिब हुआ. बोला; "मास्टर जी, क्या कहना चाहेंगी आप? कैसा लगा आपको?"
"एक्सेलेंट. आपका 'प्रफार्मेंस' बहुत बढ़िया था. आप मुझे सीधा सेवेंटीज में ले गए. फिलिम विश्वनाथ की याद ताजा कर दी आपने. आपको याद हो तो उस फिलिम में प्राण साहब थे. गोलू गवाह के क्रिदार में. उनका प्रोफेशन ही गवाही का था. और वे कितनी सफाई से झूठ बोल जाते थे कि.....आपने वह याद ताजा कर दी. यू आर माई 'सी थ्री'. इधर आइये और अपना ईनाम ले जाइए." सरोज खान ने राठौर साहब के परफार्मेंस के बारे में बताया.
राठौर साहब दौड़ के सरोज खान के पास गए. उन्होंने राठौर को १०१ रुपया ईनाम दिया. ईनाम लेकर वे कूदने लगे. तीन-चार बार हवा में पंच मारा. उसके बाद बोले; "यस...यस...यस...आई न्यू इट..."
उसके बाद बोले; "थैंक यू मैम."
इतना कहकर वे चुप हो गए लेकिन लोगों के मन में एक बात आई कि ये सी थ्री क्या है? एंकर हुसैन बोला; "मास्टर जी, ये आपका सी थ्री क्या है?"
उसकी बात सुनकर सरोज खान ने क्लेरिफिकेशन दिया. बोलीं; "सी थ्री का मतलब है चिरकुट चरित्र, चिरकुट झूठ और चिरकुट बेहयाई. जिन भी कंटेस्टेंट के पास ये तीनों होंगे, ही विल बी माय सी थ्री.."
अचानक एंकर हुसैन बोले; "और अनु जी आज हमारे बीच में हैं राठौर साहब के चाचाजी जो सीधा पानीपत से आये हैं."
उसके इतना कहते ही कैमरा घूमते हुए एक बुजुर्ग के ऊपर जाकर ठहर गया. लोगों को पता चल गया कि वही राठौर साहब के चाचाजी थे. हुसैन ने उनसे पूछा; "नमस्कार चाचाजी. कैसा लग रहा है यहाँ आकर?"
वे बोले; "राम राम जी. बहुत बढ़िया लग रहा है..... मैं सरोज खान जी का बहुत बड़ा फेन हूँ. वो जी इनका कोरियोग्राफ किया गाना था मेरा पिया घर आया ओ राम जी वो मुझे बहुत पसंद है."
उनकी बात सुनकर सरोज खान खुद से थोड़ा और प्यार करने लगीं. अभी वे कुछ कहती तभी हुसैन ने चाचाजी से सवाल किया; "अच्छा ये बताइए चाचाजी कि राठौर साहब क्या शुरू से ही ऐसे थे?"
"हाँ जी शुरू से ही ऐसा था यह तो.लड़कियों को छेड़ने के मामले में बहुत मेहनती था. जब बारहवीं में पढ़ता था तो अपने कोलेज से तीन किलोमीटर पैदल चलकर जाता था दूसरे कोलेज में लड़कियों को छेड़ने के लिए. तब हम उतने पैसे वाले नहीं थे..... बस का किराया नहीं रहता था लेकिन ये पैदल चलकर दूसरे कोलेज जाता था. बहुत स्ट्रगल किया है जी इसने लड़कियों को छेड़ने के लिए....... स्ट्रगल का असर है कि एक दिन ऐसे मोकाम पर पहुँचा जब ये चेंबर में बैठकर लड़कियों को छेड़ने लायक बना. बहुत स्ट्रगल किया है जी....."; इतना कहते-कहते चाचाजी जी की आँखों में आंसू आ गए.
उनके आंसू देखकर राठौर जी की आँखें भी भर आईं. उसके बाद हुसैन ने चाचाजी से सवाल किया; "अच्छा ये बताइए चाचाजी कि जब राठौर साहब लड़कियों को छेड़ते थे तो घर पर शिकायत नहीं आती थी?"
वे बोले; "आती थी. मेरे फादर यानि इसके दादाजी इसे डाटते थे. जब तक यह उनके पास रहता था तब तक तो सिर झुकाकर सब कुछ सुनता था लेकिन जब उनके घर से बाहर निकलता था तो यह मुस्कुराता था. इसकी मुस्कराहट से लोग और नाराज़ हो जाते थे. लेकिन इसके ऊपर....इस मामले में इसने बड़ा स्ट्रगल किया है जी.."
उनकी बात सुनकर हिमेश रेशम्मैया बोले; "बिना स्ट्रगल के कुछ होता नहीं है. मुझे ही देख लीजिये. मैंने कितन स्ट्रगल किया तब जाकर आज इस मोकाम पर पहुँचा हूँ कि इंडिया का नंबर वन सिंगर बना हूँ....सब कहते हैं सलमान भाई ने मुझे आगे बढाया लेकिन यह बकवास है. हुसैन मैं बताता हूँ...मेरे फादर अपने समय के सबसे बड़े म्यूजिक डायरेक्टर थे. लेकिन जब मेरे भाई........तब मैंने अपने फादर से प्रोमिज किया कि मैं आपका बेटा एक दिन आपके सपने पूरा करूंगा. और आज मैं यहाँ हूँ. आज मैं जो कुछ भी हूँ अपने डैड की वजह से. आई लव यू डैड.."
अनु मलिक को हिमेश की बात सुनकर जम्हाई आने लगी थी. साथ ही वहां बैठी जनता भी मुँह बाए जम्हाई ले रही थी. शायद यह इस बात का असर था कि पिछले तीन सालों में कम से तीस बार सभी हिमेश की यह कहानी सुन चुके थे.
......जारी रखा जाय?
Tuesday, June 8, 2010
बेल अप्लिकेशन
राठौर साहब की बेल अप्लिकेशन रिजेक्ट हो गई. क्या कहा आपने? अंग्रेजी के शब्द इस्तेमाल करने के लिए मेरे ब्लॉग के सामने धरना दे देंगे? अच्छा चलिए सुधार कर लेता हूँ. कल राठौर साहब की जमानत की अर्जी नामंज़ूर हो गई. अब ठीक है? थैंक यू. ठीक है, ठीक है बाबा..अरे वही, धन्यवाद.
चलिए आगे की बात करता हूँ. हाँ तो मैं कह रहा था कि राठौर साहब की जमानत अर्जी खारिज हो गई. कभी-कभी खारिज भी हो जाती है. जब देश की अदालतों में कुछ बड़े लोगों की जमानत की अर्जी खारिज होती है तो उसे न्याय व्यवस्था में क्रांति कहते हैं. ऐसी घटनाओं की वजह से जनता का विश्वास न्याय व्यवस्था में पुनः स्थापित हो जाता है और वह दाल-रोटी खाओ अदालत के गुन गाओ नामक गाना गुनगुनाने लगते हैं.
वैसे मेरा मानना है कि ऐसे बड़े लोगों की जमानत की अर्जी खारिज करना एक तरह से स्ट्रेटेजिक जुडिशियरी मैनेजमेंट का नमूना है और जुडिशियरी की इमेज बिल्डिंग एक्सरसाइज का हिस्सा है. एक और मजे की बात. जब इस तरह के फैसले आते हैं और अपराधी के वकील से सवाल किया जाता है तो उसका उत्तर होता है; "मैंने अभी तक फैसला पूरी तरह से पढ़ा नहीं है. बिना पढ़े कमेन्ट करना संभव नहीं है."
दूसरी तरफ अपराधी कहता है ; "मुझे देश की न्याय-व्यवस्था में पूरा विश्वास है"; इतना कहकर वह कैमरे के सामने मुस्कुरा देता है. उसकी बेशर्मी देखकर कैमरा खुद शरमा लेता है. अपने देश की न्याय-व्यवस्था पर सबसे ज्यादा विश्वास अपराधियों को ही है.
खैर, राठौर जी की अर्जी के रिजेक्ट होने की बात चल रही थी. अब राठौर जी क्या करेंगे? किसी और अदालत में जायेंगे? वहां जायेंगे तो क्या होगा? मैं सोच रहा था तो मुझे लगा कि अगर सिंगल जज बेंच ने उनकी अर्जी नामंज़ूर कर दी है तो उन्हें किसी बड़ी बेंच के सामने अपनी अर्जी ठेल देनी चाहिए. फिर ख़याल आया कि हमारी अदालतें मुकदमों से लबालब भरी पड़ी हैं. मतलब मुकदमों की बाढ़ का पानी हमेशा खतरे के निशान से ऊपर बहता रहता है. ऐसे में तुरत-फुरत में बड़ी बेंच तो क्या मचिया भी नहीं मिलेगी जिसके सामने वे अपनी जमानत की अर्जी रख सकें.
तो फिर क्या हो सकता है?
मैं इस पर सोच ही रहा था कि मुझे देश की नई संस्कृति की पैदाइश रियलटी शो के जजों की याद आई. मुझे लगा कि क्यों न राठौर साहब जमानत की अपनी अर्जी इन रियलटी शो के जजों की अदालत में ठेल दें. भाई बुराई क्या है? ये भी तो जज ही हैं. वो जज नहीं तो ये जज. रियल्टी शो में जज लोग जिस तरह से कंटेस्टेंट को आंकते हैं, उस तरह से तो अदालतों के जज भी नहीं आंक सकेंगे.
पिछले तीन-चार साल में जिस तरह से फिल्म इंडस्ट्री के तमाम चिरकुट जजबाजी में उतरे हैं अगर उस रफ़्तार से न्याय प्रणाली में जजों की नियुक्ति होती तो तमाम मुक़दमे निबट गए होते. मेरा मतलब है जिस तरह से प्लान बनाकर फिल्म और टेलीविजन वाले चल रहे हैं उससे लग रहा है जैसे वे साल २०१५ तक इस देश में आठ करोड़ सिंगर और नौ करोड़ डांसर्स पैदा करके मानेंगे. लगता है जैसे यह प्लान कलाम साहब के ट्वेंटी-ट्वेंटी अजेंडा का एक हिस्सा है.
लेकिन अगर ऐसा हो गया, मेरा मतलब अगर राठौर साहब ने अपना बेल अप्लिकेशन इन जजों की कोर्ट में दाखिल किया तो कैसा सीन होगा? शायद कुछ ऐसा;
देश में फैले राठौर साहब के तमाम फैन्स, जो उन्हें अपना हीरो मानते हैं, उनलोगों ने राठौर साहब से सामूहिक आह्वान करते हुए लिखा; "आप हमारे आयडल हैं. हमने तमाम ट्रिक्स ऑफ़ द ट्रेड आपसे ही सीखें हैं. चूंकि आप हमारे आयडल हैं इसलिए हम चाहते हैं कि आप अपना केस इंडियन आयडल के जज अनु मलिक की अदालत में पेश करें. हमें आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि वे आपकी जमानत की अर्जी मंज़ूर कर लेंगे."
यह सामूहिक आह्वान पढ़कर राठौर साहब भाव विह्वल हो गए. जिस तरह से नेता अपने चमचों के आह्वान और नारे सुनकर खुश होता है उसी तरह से राठौर साहब खुश हो गए. अपने फैन्स को मान देते हुए उन्होंने अपनी अर्जी अनु मलिक की अदालत में पेश कर दी. अर्जी देखते हुए अनु मलिक बोले; "मुझे अकेले जज-गीरी करने की आदत नहीं है. मैं जबतक अपने अगल-बगल बैठे जजों से डिफर न हो लूँ, मेरा खाना नहीं पचता. दूसरी बात यह भी है कि अगर और जज न रहेंगे तो मैं अपने बनाए गाने सुनाकर किसे बोर करूंगा? मैं चाहूँगा कि कम से कम दो और जजों की नियुक्ति हो."
बहुत छान-बीन करके दो और जज खड़ाकर के तीन जजों की एक बेंच तैयार कर दी गई. इस बेंच में अनु मलिक के अलावा सरोज खान और हिमेश रेशम्मैया को रखा गया. जब बेंच तैयार हो गई तो वह उसने बताया कि उन्हें सिंगल कंटेस्टेंट कोर्ट की आदत नहीं है इसलिए वे चाहेंगे कि राठौर के साथ कम से कम चार और कंटेस्टेंट आयें जिन्हें जमानत की या उसी तरह के किसी चीज की ज़रुरत है. अगर ऐसा नहीं हुआ तो फिर बेंच कोर्ट में नहीं बैठेगी.
उनकी इस डिमांड पर राठौर साहब ने और लोगों की खोज शुरू की. ज्यादा खोज-बीन की ज़रुरत नहीं पड़ी. उन्हें दिल्ली में ही सज्जन कुमार मिल गए. सज्जन कुमार के ऊपर उनकी सज्जनता की वजह से तमाम धाराएं बह रही हैं. आये दिन उनके ऊपर वारंट इश्यू होता रहता है. राठौर साहब ने जब सज्जन कुमार को बताया कि अनु मलिक की अध्यक्षता वाली बेंच उनके लिए कुछ कर सकती है तो वे तुरंत तैयार हो गए. सज्जन कुमार के अलावा छत्रधर महतो, विकास यादव और अब्दुल करीम तेलगी भी अपना मुकदमा इस तीन जजों की बेंच के सामने रखने पर राजी हो गए.
वह दिन आया जब सुनवाई होनी थी. तीनो जज एक-एक करके अदालत में आये. अदालत तो क्या थी, किसी रियलटी शो का मंच था. मंच पर एनाउंसर था. पंद्रह सौ रूपये वाले बिग-बाजारीय सूट में घुसा हुआ. हाथ में माइक. अचानक उसने दहाड़ना शुरू किया; "जिस दिन का इंतज़ार था, आज वह दिन आ गया. जी हाँ दोस्तों आज तीन जजों की इस अदालत में पाँच महान लोगों के मामलों की सुनवाई होगी. चलिए सबसे पहले स्वागत करते हैं अपने पहले जज का हू इज नन अदर देन द
डैशिंग एंड लैशिंग अनु मलिक. लेडिज एंड जेंटिलमैन, गिव अ बिग राऊंड ऑफ़ अप्लाज तो अनु मलिक."
अनु मलिक स्टेज पर अवतरित हुए. बैकग्राऊंड म्यूजिक के साथ उनका गाना बज रहा था, 'ऐसा पहली बार हुआ है सतरा-अठरा सालों में..' अपने गाने के सामने वे बड़े गर्व के साथ खड़े हो गए. मुख पर कुछ इस तरह की संतुष्टि जैसे मन ही मन कह रहे हों; "पंचम दा, ऐसा गाना बनाकर दिखाओ तो जानें. अरे हम असली म्यूजिक बनाते हैं असली...." अचानक उन्होंने गाना शुरू कर दिया; "ऊंची है बिल्डिंग, लिफ्ट तेरी बंद है.."
एंकर ने कहा; "अनु जी, आपको मुक़दमे की सुनवाई करनी है. म्यूजिक कांटेस्ट जज नहीं करना है."
उसकी बात सुनकर अनु मलिक बोले; "बॉस, अनु मलिक इज अ सेल्फ मेड मैं. मजाक नहीं है. टैलेंट है तो दिखाएँगे नहीं?"
एंकर की समझ में नहीं आया कि वह क्या बोले. अभी उसने कोई जवाब सोचने का काम शुरू ही किया था कि अचानक बैकग्राऊंड से म्यूजिक शुरू हो गया. साथ में गाने का झरना फूट पड़ा; "एक दो तीन, चार पाँच छ सात आठ नौ..."
एंट्री हुई सरोज खान की. सौ-सौ के करीब पंद्रह नोटों से लैस सरोज खान न्यू सलवार-सूट में ठुंसी हुई स्टेज पर आई. 'एक दो तीन चार पांच छ सात आठ नौ...' गाने पर सरोज खान ने चार-पांच एनर्जेटिक ठुमके लगाए. देखकर लगा जैसे फिल्म प्रोड्यूसर्स को कन्विंस करना चाहती हों कि 'मैं अभी भी डांस डायरेक्शन कर सकती हूँ.'
दर्शकों ने अभी इन दो जजों की करतूत झेलना शुरू ही किया था कि अचानक स्टेज पर एक धड़ाका हुआ और कोई बड़े जोर से चिल्लाया; 'जय माता दी'.
..........जारी रहेगा.

