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Wednesday, July 11, 2012

अंडर-अचीवर प्रधानमंत्री और ओवर-अचीवर यन्त्र.




न्यूयार्क से प्रकाशित होनेवाली टाइम पत्रिका ने हमारे प्रधानमंत्री को अंडर-अचीवर करार दे दिया. वैसे अगर शायरों और गीतकारों की मानें तो करार देना कोई बुरी बात नहीं. याद कीजिये पुरानी फिल्मों में जब नायिका तमाम बहाने बनाकर नायक से मिलने आती थी और उसे लता मंगेशकर जी की आवाज़ में बताती कि; "मैं तुमसे मिलने आई मंदिर जाने के बहाने.." तो नायक के दिल को करार मिल जाता था और वह भी फट से रफ़ी साहब या किशोर कुमार जी की आवाज़ में नायिका को बता देता था कि; "तुम मुझसे जो मिलने आई सनम, मेरे दिल को करार आया..."

लगता है विषयांतर हो गया. पोस्ट २०१० के ब्लॉगर की यही त्रासदी है. वह कहीं से भी चलता है, बालीवुड पहुँच जाता है. ठीक वैसे ही जैसे पुरानी फिल्मों में कोई भी भारत के किसी भी कोने से भागता तो मुंबई जाने वाली गाड़ी में ही बैठता था और अगले शॉट में वह वीटी स्टेशन से बाहर निकलते हुए बरामद होता था.

आप इसे बालीवुडिश हैंग-ओवर कह सकते हैं.

खैर, मैं बता रहा था कि टाइम पत्रिका ने हमारे प्रधानमंत्री को अंडर-अचीवर करार दे दिया. लेकिन यह वाला करार शायद वह वाले करार जितना मज़ेदार नहीं था. लिहाजा इसपर तमाम लोग़ बेक़रार हो गए. टीवी न्यूज चैनल समेट पूरे भारतवर्ष को बहस का एक नया मुद्दा मिला. कुछ विद्वानों ने याद दिलाया कि हम अभी भी विदेशी मानसिकता के शिकार हैं और जब कोई विदेशी कुछ कहता है तभी उसे सच मानते हैं. इन विद्वानों ने यह भी बताया कि; "टाइम पत्रिका ने तो प्रधानमंत्री को आज अंडर-अचीवर बताया है, हम तो उन्हें पहले ही अंडर-अचीवर करार दे चुके हैं."

काफी टीवी पैनल डिस्कशन हो चुके हैं. कुछ पाइप-लाइन में भी होंगे. तमाम विद्वान इस मुद्दे पर टीवी स्टूडियो में बोलने के लिए नई टाई खरीद रहे होंगे. कुछ अपनी विट को धो-मांज रहे होंगे. तैयारी जोरों पर होगी. सरकार के कुछ योद्धा यह भी देख रहे होंगे कि टाइम पत्रिका का भारत में क्या-क्या है और उसे कौन-कौन से डिपार्टमेंट से नोटिस भेजी जा सकती है? कुछ अति उत्साही योद्धा यह भी सोच सोच सकते हैं - क्या पत्रिका का पिछले ५-६ साल का इनकमटैक्स असेसमेंट री-ओपन किया जा सकता है? मनीष तिवारी जी जैसे प्रवक्ता सरकार और प्रधानमंत्री के बचाव के लिए पुरानी टाइम पत्रिका की कॉपी खोज रहे होंगे जिसमें पत्रिका ने अटल बिहारी बाजपेयी या अडवाणी की बुराई की होगी.

ऐसे में यह जानने के लिए कि और तमाम विद्वानों का इस मुद्दे पर क्या मत है, चंदू चौरसिया ने दिल्ली और कई शहरों में जाकर लोगों की राय इकठ्ठा की. पेश है उनमें से कुछ वक्तव्य;

लालू प्रसाद जी; "इसमें का राय जानना चाहता है तुम? ...आ सुनो पहिले.. बीच में मत बोलो. आ ई जो प्रधानमंत्री को ई लोग़ बताया है...का बताया है? अंडर? का? टेकर? अंडरटेकर?..अंडरअचीभर? अच्छा...अरे वोही अंडरअचीभर. देखो ई कुछ खराब नहीं है. एकदम्मे कुछ नहीं अचीभ करने से बढ़िया है अंडरअचीभ करना. आ देखो सरकार चलाने का मतलब ई नहीं होता कि कुछ अचीभ करना ही है. देखो प्रधानमंत्री हैं बिदबान... बूझो की डिग्री है उनके पास, उनका ईज़त पूरा दुनियाँ में है...सो जब जो चाहेंगे ऊ अचीभ कर लेंगे..जल्दी कौन बात का है? ... आ सबसे बड़ा बात है कि सेकुलर हैं..प्रधानमंत्री जे हैं से सेकुलर आदमी हैं. आ देश को सेकुलर आदमी का ज़रुरत पहिले है अचीभर का बाद में. सेकुलर लोग़ सत्ता में नहीं रहेगा तो फ्रिकाप्रस्त लोग़ राज करने लगेगा... आ फिर सोनिया जी भी हैं साथ में... जो चीज परधानमंत्री नहीं अचीभ कर पाए ऊ सोनिया जी अचीभ कर लेंगी... बैलेंस हो जाएगा न. केतना टाइम लगता है कुछ अचीभ करने में? आ हामी को देखो, रेलमंत्री थे तब केतना कुछ अचीभ कर लिए थे.. त हमारा कहना एही है ई पत्रिका फत्रिका का कहता है उसपर मत जाओ...ई सब सच नहीं बोलता...देखो न, हम रेलमंत्री होकर एतना कुछ अचीभ किये, हमरा लिए त नहीं लिखा कि हम ओभर-अचीभर हैं. ज़रूरी बात है कि सेकुलर हाथ में देश का बागडोर है."

मनीष तिवारी; "मेरा यह कहना है कि विदेशी पत्रिकाओं की बात को हमें तभी सच मानना चाहिए जब वे हमारी सरकार की प्रशंसा करें. हमारा यह मानना है कि जब ये पत्रिकाएँ आलोचना करती हैं तब ये झूठ बोल रही होती हैं. यह हमारी पार्टी का ऑफीशियल स्टैंड है जिसे भारत के हर नागरिक का समर्थन है. हमारी पार्टी अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गाँधी जी के नेतृत्व में सरकार ने बहुत कुछ अचीव किया है जिसे टाइम पत्रिका ने तवज्जो ही नहीं दी. उन्ही के नेतृत्व में ही मनरेगा जैसा प्लान चलाकर सरकार ने कितना अचीव किया है सबके सामने है. एक प्लान चलाकर हमने देश को गड्ढों से भर दिया, वह तो टाइम को दिखाई नहीं देता. और फिर अंडर-अचीवर की बात पर मैं टाइम के एडिटर से पूछता हूँ कि रिचर्ड बाबुराव स्टेंजेल, तुम्हें क्या हक है कि तुम दूसरों को अंडर-अचीवर कहो? तुम खुद सर से पाँव तक अंडर-अचीवमेंट में डूबे हुए हो. मैं केवल इतना जानना चाहता हूँ कि भारत जैसे बड़े देश में टाइम की कितनी कॉपी बेंचते हो तुम? टाइम को कितने भारतीय जानते हैं? ऐसे में अंडर-अचीवर कौन हुआ, तुम कि डॉक्टर मनमोहन सिंह?...क्या कहा? एडिटर के नाम में बाबुराव नहीं है? अच्छा मैं गूगल करके पता करता हूँ कि एडिटर के फादर का क्या नाम है?"

प्रधानमंत्री; "मैं ग़ालिब को कोट करना चाहूँगा और टाइम मैगेजीन से यही कहूँगा कि; माना कि तेरी दीद के काबिल नहीं हैं हम, तू मेरा शौक तो देख, मेरा इंतज़ार तो देख."

अन्ना जी; "देखो लोकशाही है..लोकशाही में कोई किसी को कुछ भी कह सकता है. पंथ-प्रधान को भी कुछ भी कह सकता है. आज अगर सरकार जनलोकपाल बिल पारित कर देती तो जनलोकपाल इस मामले की जांच कर के बता सकता था कि पंथ-प्रधान अंडर-अचीवर है या नहीं? और एक बार ये बात गलत साबित हो जाती तो फिर हम टाइम पत्रिका की आफिस के सामने अनशन कर देते. पत्रिका से पूछते कि उसने हमारे पंथ-प्रधान को ऐसा कैसे कहा?"

हिंदी रक्षक प्रोफ़ेसर मनराज किशोर; "पहले तो मुझे इस बात का जवाब चाहिए कि टाइम नामक पत्रिका का कोई हिंदी संस्करण भी है क्या? अगर नहीं है तो क्या अधिकार है इस पत्रिका को उस देश के प्रधानमंत्री को अंडर-अचीवर बताये जिसमें अस्सी करोड़ से ज्यादा लोग़ हिंदी बोलते हैं? क्या टाइम के सम्पादक यह बता सकते हैं कि अंडर-अचीवर शब्द के लिए हिंदी का कौन सा शब्द है? क्या उन्हें पता है? अगर नहीं तो उन्हें यह अधिकार नहीं है कि वे ऐसा कहें. जो पत्रिका का हिंदी संस्करण तक नहीं निकलता उस पत्रिका ने क्या कहा यह बात हमारे लिए जरा भी महत्वपूर्ण नहीं है."

दिग्विजय सिंह जी; "अभी मैं कुछ नहीं कहना चाहूँगा. फिलहाल मैं यह पता करने की कोशिश कर रहा हूँ कि टाइम मैगेजीन और आर एस एस के बीच क्या सम्बन्ध हैं? कल मुझे अजीज बरनी ने बताया है कि प्रधानमंत्री को अंडर-अचीवर बताने में आर एस एस का हाथ है. एकबार मैं यह कन्फर्म कर लूँ फिर मैंने प्रेस कान्फरेन्स करके बताऊंगा कि असल मामला क्या है?"

अरनब गोस्वामी; "वेट फॉर अ डे ऐज आई ऍम ट्राइंग तो गेट लीजा कर्टिस अलांग विद कुमार केतकर, विनोद शर्मा, लॉर्ड मेघनाद देसाई एंड सुहेल सेट ऑन न्यूज-आवर. ओनली दे विल बी एबुल टू टेल हाउ करेक्ट इज टाइम्स असेसमेंट ऑफ आर प्राइममिनिस्टर. आई अस्योर यू एंड आल आर व्यूवर्स दैट आई विल पुट सम डायरेक्ट एंड टफ क्वेश्चंस टू दिस वेरी एमिनेंट पैनल."

येदुरप्पा जी; "आई डिक्लाइन टू कमेन्ट ऐज माई एस्ट्रोलॉजर हैज एडवाइज्ड मी टू नॉट स्पीक ऑन द इश्यू टिल ट्वेल्व थर्टी पीएम ऑफ फोरटेंथ जुलाई."

प्रनब मुख़र्जी जी; "ओलदो, आई हैभ स्टाप कोमेंटिंग ऑन पोलिटिकल मैटार्स बाट सीन्स इयु आर सेयिंग दैट ईट इज ए मैटोर रिलेटेड टू ओभरआल आचीभमेंट ईंक्लुडिंग इकोनोमी, आल आई हैभ टू से ईज, इभेन ऐन अचीभमेंट आफ एट पारसेंट आफ दा टोटल मैटोर ईज नाट बैड. सो, उइ शूड नाट फारगेट दैट दीस सो कोल्ड अंडरअचीभमेंट ईज ओल्सो ड्यू टू दा फैल्योर आफ दा यूरोपीयन इकोनोमी ओल्सो."

श्री कपिल सिबल; "ये तो देखिये इस पर एक बैलेंस व्यू लेने की ज़रुरत है. एक सरकार का लीडर क्या अचीव करता है उसको उसके बाकी मंत्रियों के अचीवमेंट के साथ देखना होगा. अगर आप यह कहते हैं कि प्रधानमंत्री जी अंडरअचीवर हैं तो वहीँ पर मेरे जैसे मंत्री भी हैं जो ओवर-अचीवर हैं. ऐसे में टाइम मैगेजीन को यह भी देखने की ज़रुरत है कि कुल मिलाकर मामला बैलेंस हो जाता है. और फिर टाइम के इस कमेन्ट को सीरियसली लेने की ज़रुरत नहीं है. जब हमारे पास अचीवमेंट और ओवर-अचीवमेंट हैं, तो फिर हम अंडर-अचीवमेंट की बात क्यों करें? वैसे भी टाइम के इस असेसमेंट का इम्पैक्ट इलेक्शंस में जीरो रहने वाला है और जिस बात का इम्पैक्ट इलेक्शन में जीरो है उसको सीरियसली वैसे भी नहीं लेना चाहिए."

श्री चन्दन सिंह हाटी, मैनेजर हिमालय रुद्राक्ष प्रतिष्ठान; "क्या आप अंडर-अचीवर कहे जाने से परेशान रहते हैं? क्या आप अंडर-अचीवर कहे जाने से दुखी रहते हैं? क्या आप ओवर-अचीव करते हैं और फिर भी लोग़ आपको अंडर-अचीवर कहते हैं? क्या इसकी वजह से आपका दिन का चैन और रात की नींद गायब हो जाती है? तो फिर खुश हो जाइए क्योंकि हिमालय रुद्राक्ष प्रतिष्ठान पहली बार लेकर आया है ओवर-अचीवर यन्त्र. जी हाँ, यह ओवर-अचीवर यन्त्र वैदिक मन्त्रों के जाप और उनकी शक्ति से परिपूर्ण है. आपको ओवर-अचीवर कहलाने के लिए अब मेहनत करने की जरूरत नहीं है. आपको बस यह यन्त्र हमारे द्वारा बताये गए विधि के अनुसार अपने कार्यालय में पूजा के बाद लगा लेना है. फिर देखिएगा कि दुनियाँ कैसे आपको न सिर्फ ओवर-अचीवर मानने लगेगी बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर की पत्र-पत्रिकाएँ आपकी तस्वीर कवर-पेज पर छापकर नीचे बड़े-बड़े अक्षरों में लिखकर आपको ओवर-अचीवर बतायेंगी. जी हाँ, भारतवर्ष में पहली बार....."

अभी तो इतने ही महान लोगों के वक्तव्य से काम चलिए. पब्लिक डिमांड पर और लोगों के वकतव्य छाप दिए जायेंगे:-)

Tuesday, June 5, 2012

बाबाओं को चरणस्पर्श




नेता जी ने बाबाजी के पाँव छू लिए. बाबाजी ने भी छुआ लिए. छु-छुआ कर दोनों धन्य हुए. त्रेता टाइप युग की घटना होती तो देवता लोग़ ऊपर से पुष्पवर्षा वगैरह भी कर देते लेकिन यह तो ठहरा कलियुग. ऐसा युग जिसमें जमाना हमेशा से खराब ही रहा है. लिहाजा पुष्पवर्षा का चांस नहीं बना. बाबा और नेता, दोनों को केवल धन्य होकर संतोष करना पड़ा. अब इस जुग में देवता कहाँ से आयेंगे? हमें भी यही सोचकर संतोष करना चाहिए कि हमारे नेता और हमारे बाबा लोग़ ही इस युग के देवता हैं. ऐसे में होना यह चाहिए था कि बाबा जी के कुछ लोग़ और नेता जी के कुछ लोग़ लोग़ पुष्प वगैरह बाज़ार से खरीद कर रखते और जैसी ही छुआ-छूत कार्यक्रम हुआ वैसे ही ये लोग़ एक-दूसरे के ऊपर पुष्पवर्षा कर डालते. हमारी संस्कृति की रक्षा भी होती और दोनों देवता पुष्प से नहा भी लेते.

नेताजी जी ने तो वैसे भी पाँव छूने के बाद घोषणा कर दी थी कि वे भारतीय संस्कृति की रक्षा का जिम्मेदारी पूर्ण कार्य कर रहे थे.

भारतीय संस्कृति की रक्षा के तमाम महत्वपूर्ण कर्मों में बाबाओं के पाँव छू लेना सबसे महत्वपूर्ण कर्म है जिसकी जिम्मेदारी बाबा और उनके भक्तों ने अपने कन्धों पर लाद रखी है. मैंने ऐसी अफवाह भी सुनी है कि अगर किसी बाबा का पाँव दो घंटे से ज्यादा समय तक न छुआ जाय तो वह हलकान च परेशान होने लगता है. कुछ लोग़ तो यहाँ तक बताते हैं कि कि ऐसे बिकट समय में बाबा लोग़ अपने चेलो-चपाटों को इशारा कर देते हैं और वे उनके पाँव छू लेते हैं ताकि बाबाजी का ब्लड प्रेशर कंट्रोल में रहे. उधर चेलों ने पाँव छुआ और इधर बाबा की हलकानियत गई.

वैसे देखा जाय तो इस मामले में योगगुरु टाइप बाबा लोग़ बहुत लकी हैं. उन्हें कभी इसकी वजह से परेशानी नहीं उठानी पड़ती. वे योगशिविर में सुबह-शाम अपने पाँव खुद ही छूते रहते हैं.

बाबाओं के लिए पाँव छुआ लेना अपने आप में बड़ा एक्सपर्टात्मक कार्य है. ठीक वैसे ही जैसे पाँव छू लेना. इस कार्य में छूने और छुआने वाले, दोनों को हमेशा अलर्ट रहना पड़ता है. ठीक वैसे ही जैसे सीमा पर खड़ा सिपाही हमेशा अलर्ट रहता है. यह सोचते हुए कि उधर से कोई घुसने की कोशिश किया नहीं कि इधर से गोली दागनी है. कुल मिलाकर अब न चूक चौहान टाइप परिस्थिति हमेशा बनी रहती है. ऐसे में अगर पाँव छूने-छुआने की प्रैक्टिस होती न रहे तो मामला गड़बड़ा सकता है. जैसे अगर छूने वाले के मन में अचानक पाँव छूने की इच्छा जाग उठे तो छुआने वाले को चाहिए कि वह तुरंत अपना पाँव आगे कर दे. अगर वह इस क्षण में चूक जाता है तब कुछ भी हो सकता है. हो सकता है कि छूने वाले को लगे कि; "जब यही अपना पाँव छुआने में इंट्ररेस्ट ही नहीं दिखा रहा तो मुझे क्या ज़रुरत है आगे बढ़कर जबरदस्ती पाँव छूने की?" छूने वाले के मन में यह विचार भी आ सकता है कि; "हटाओ जाने दो. जो यह नहीं जानता कि पाँव कैसे छुवाया जाता है उसका पाँव छूकर भी क्या फायदा? दरअसल इसका पाँव छूने लायक ही नहीं है."

संस्कृति रक्षा के इस कर्म में बाबाजी लोग़ बड़े एक्सपर्ट होते हैं. कुछ बाबा तो बैठे-बैठे अपना पाँव फैलाकर आगे किये रहते हैं. एवर-अलर्ट टाइप. ऐसे बाबाओं को पाँव न छुए जाने का कष्ट कभी नहीं सताता. कोई न कोई उनका पाँव छूता ही रहता है. उन्होंने पाँव आगे कर दिया तो कर दिया. आनेवाले को झक मार के पाँव छूना ही पड़ेगा. अगर उसने ऐसा नहीं किया तो फिर बाबाजी से आगे की बात ही नहीं हो सकती. ऐसे बाबा से वार्तालाप भी पाँव छूने से ही शुरू होता है. कह सकते हैं कि छूने वाले के हाथ को ही वार्तालाप शुरू करना है और बाबा जी के पाँव को उस शुरुआत के लिए इशारा करना रहता है. पाँव का छुआ जाना या न छुआ जाना ही यह तय करता है कि वार्तालाप किस तरह का होगा? भक्त ने अगर पाँव छू लिए तो गारंटी है कि बाबा जी उसके बेटे चुन्नू और बेटी गुड़िया का कुशल-क्षेम और उनकी पढ़ाई के बारे में भी पूछेंगे लेकिन अगर पाँव छूने के मामले में भक्त चूक गया तो फिर कोई गारंटी नहीं कि बाबाजी उसके कुशल-क्षेम के बारे में भी पूछें.

लगातार विचरण करने वाले बाबा जी को अलग तरह से अलर्ट रहना पड़ता है. चलते समय वे अपना दाहिना पाँव आगे फेंकते हुए चलते हैं ताकि भक्त को उनका पाँव छूने में न तो कोई कष्ट हो और न ही असमंजस. बाबा जी का पाँव आगे है मतलब भक्त को छूने का सिग्नल मिल रहा है. ऐसा करने से भक्त को सुभीता रहता है. उसका सेवेंटी परसेंट असमंजस अपने आप चला जाता है. वह पहला मौका मिलते ही बाबा का पाँव छू लेता है. बाबा भी अपना हाथ भक्त के सिर पर रखकर उसके पाँव छूने का फल उसे तुरंत दे देते हैं. भक्त अगर पैसेवाला रहा तो उसे उठकर अपने हृदय से भी लगा सकते हैं. बाबा जी का यह कर्म निश्चित करता है कि दोनों के हृदय मिल जायें और एक बड़े हृदय की सृष्टि करें ताकि वह अपने अन्दर बहुत कुछ समो ले.

पाँव छूने के एवज में मिलनेवाले आशीर्वाद भी अलग-अलग तरह के होते हैं. जैसे बाबागीरी के धंधे में आया नया-नया बाबा हर भक्त के ऊपर हाथ रख देता है. वहीँ सीजंड बाबा उस पोज में केवल हाथ ऊपर कर देता है जिस पोज में हमारे देवतागण आशीर्वाद देते थे. बाबाजी अगर डबल-सीजंड हुए तो वह अपना हाथ भी नहीं उठाते. वे केवल मुस्कान में अपना आशीर्वाद मिक्स करके भक्त के लिए ठेल देते हैं और भक्त उसे रिसीव कर लेता है. ऐसे बाबाओं के भक्तों का रिसीवर हमेशा ऑन रहता है, यह सोचते हुए कि क्या पता बाबा कब मुस्कुरा दें? कुछ बाबा तो हमेशा मुस्कुराते रहते हैं. उन्हें देखकर लगता है कि चुटकुलों की रेडिओ तरंगें उनके कानों से हमेशा टकराती रहती हैं और उसके प्रभाव से बाबा मुस्कुराते रहते हैं. वैसे मैंने एक बाबा के बारे में यह सुना है कि वे आशीर्वाद स्वरुप भक्त के सिर पर अपना पाँव दे मारते थे. फिर भक्त चाहे प्रधानमंत्री ही क्यों न हो. एक और बाबा अपना आशीर्वाद देने के लिए अंडे की उल्टी करते थे. कड़ी मेहनत करके उल्टी करते और फिर जीवविज्ञान के तमाम सिद्धांतों को धता बताते हुए मुँह से अंडा निकालते और भक्त को दे देते थे. भक्त और बाबा दोनों धन्य हो लेते.

यह अलग बात है कि बाबा द्वारा इतना कठिन कार्य करने के बावजूद देवताओं ने कभी आकाश से पुष्पवर्षा नहीं की.

यह तो हुई बाबाओं की बात. लेकिन क्या हमारी संस्कृति में पाँव छूने का कार्यक्रम बाबाओं और भक्तों तक ही सीमित है? बिलकुल नहीं. गुरुओं और बड़े-बुजुर्गों के पाँव छूने की भी संस्कृति है हमारे यहाँ. यह अलग बात है कि पाँव छूते-छुआते हुए ज्यादातर बाबाओं और भक्तों को ही देखा जाता है. कई गुरु तो शिष्य द्वारा पाँव न छुए जाने पर समाजशास्त्र के पर्चे में शिष्य के नंबर तक काट लेते हैं. युवराज दुर्योधन ने खुद अपनी डायरी के एक पेज में इस बात का जिक्र किया था कि कैसे क्रीड़ास्थल पर पाँव न छुए जाने पर एकबार गुरु द्रोण उनसे नाराज़ हो गए थे.

बहुत कम गुरु ऐसे होते हैं जो सार्वजनिक स्थल पर शिष्य द्वारा पाँव छू लिए जाने पर नाराज़ हो जाते हैं. ऐसे में वे अपने शिष्यों को क्लास-रूम में हिदायत देकर रखते हैं कि; "बाहर मिलने पर मेरे पाँव कभी मत छूना." शायद गुरु को मालूम रहता है कि अगर शिष्य ने कहीं सड़क पर आते-जाते पाँव छू लिए तो दुनियाँ को पता चल जाएगा कि वे गुरु हैं. ऐसे में इस बात का चांस बनता है कि दुनियाँ वाले अगले साल अपने बेटे-बेटियों, पोते-पोतियों के एडमिशन के समय गुरु जी को स्कूल-कालेज में मिलकर परेशान करें. यह कहते हुए कि; "बॉबी का नंबर कम आया है इसलिए एडमिशन नहीं हो रहा. आप अगर कह देते तो एडमिशन कमिटी उसका केस कंसीडर कर लेती."

बुजुर्गों के पाँव छूने को लेकर भी तमाम बातें हैं. कई बुजुर्ग भी इस बात से परेशान रहते हैं कि फलाने की शादी में फलाने के बेटे ने उनका पाँव नहीं छुआ. कई बुजुर्ग तो बेटे के माँ-बाप से शिकायत तक कर देते हैं. यह कहते हुए कि; "देखो कैसा बिगड़ गया है. मुझे देखा और पहचान भी लिया लेकिन पाँव नहीं छुआ उसने." उधर बच्चे की हालत ख़राब है और उसे माँ-बाप के सामने झूठ बोलना पड़ता है, यह कहते हुए कि; 'मैंने नानाजी का पाँव छुआ था. इनको ही याद नहीं."

वैसे पाँव छूने की रश्म धीरे-धीरे बदलती रही है. पहले बच्चे अपने बुजुर्गों के दोनों पाँव छूते थे. कालांतर में जैसे-जैसे जमाना थोड़ा ख़राब हुआ, एक पाँव छूने लगे. जमाना थोड़ा और ख़राब हुआ तो बुजुर्ग के सामने केवल झुकने लगे. आज हालत यह है कि दाहिना हाथ आगे करके बुजुर्ग के घुटने तक ले जाते हैं और वही हाथ खींचकर छाती से लगा लेते हैं. एक नौजवान ने पाँव छूने की इस 'इश्टाइल' कि व्याख्या करते हुए मुझे बताया कि; "भइया, इस तरह से पाँव छूने का मतलब और ही होता है."

मैंने पूछा; "वह और ही मतलब क्या है?"

वह बोला; "नौजवान अपना हाथ बुजुर्ग के घुटने तक ले जाता है फिर उसे खींचकर अपने छाती से लगा लेता है जिसे देखकर यह लगता है जैसे वह बताना चाहता हो कि आपका घुटना टूटे तो मेरे दिल को ठंडक पहुंचे."

एक और केस होता है...खैर, जाने दीजिये.

Thursday, April 21, 2011

सीडी सीडी सब करें सीडी सुने न कोय...




पिछले कई दिनों से सीडी काण्ड चल रहा है. प्रेस कान्फरेंस की जा रही हैं. सीडी जारी की जा रही हैं. पप्पू के पापा की खोज हो रही है. ऐसे में ब्लागरीय धर्म यह है कि सीडी पर कुछ लिखा जाय. तो पेश हैं कुछ सीडीयात्मक धोये..सॉरी दोहे.



सीडी सीडी सब करें सीडी सुने न कोय,
जो कोऊ सीडी सुने मन भीतर ही रोय

सीडी उतनी ही भली जा में बात समाय
इधर-उधर एडिट करे मुद्रा लेव कमाय

सीडी को कर दे 'अमर' नेता की कांफ्रेंस
कल तक जिनसे दुश्मनी कहाँ आज डिफरेंस

सीडी देती है दिशा राजनीति को आज
इसे उसे बदनाम कर बनता जाए काज

सीडी चमके जहाँ पर वहीँ उजाला होय
दो सीडी चमकाय के निज चरित्र को धोय

सीडी जो जारी करे उसको बड़ा गुमान
उसकी सबसे दोस्ती उड़ा रहा पकवान

सीडी चली बाज़ार में बढ़ता चला बवाल
पप्पू के पापा कहाँ चहुँ दिश एक सवाल

सीडी अन्दर कैद हैं नेता और वकील
इक दूजे में गाड़ते लम्बी-लम्बी कील

सीडी ही शाश्वत यहाँ बाकी मायाजाल
बातचीत को टेप कर बना उसे कंगाल

सीडी ही करवा रहा राजनीति में न्याय
करे धुलाई इस तरह जैसे लाइफबॉय

सीडी की आकृति हमें बता रही यह भेद
जिस थाली में खा रहे उसमें कर दो छेद

सीडी उल्टी ना चले उल्टा चले दिमाग
कभी-कभी यूँ जार दे जैसे जारे आग

सीडी जो जारी करे सदा उड़ाये मौज
डील करे कानून से है चमचों की फौज

सीडी नेता के लिए जैसे हो ब्रह्मास्त्र
और सजाये आधुनिक राजनीति का शास्त्र

सीडी तो सस्ती यहाँ सस्ता साथ विचार
लगे टेस्टी इस कदर जैसे कोई अचार

सीडी सुविधा दे रही छेड़-छाड़ कर देउ
प्रश्न अगर उठ खड़ा हो शरण लैब की लेउ

सीडी देखन से लगे जैसे पहिया गोल
पर रहता उसमें सदा किसी ढोल की पोल

सीडी बिके बाज़ार में जैसे लेमनचूस
खोल कभी षड्यंत्र और कभी किसी का घूस

सीडी की बातें यहाँ सदा निराली होय
कभी फंसे नेता कभी बैरिस्टर भी रोय

सीडी का फ्यूचर सदा ब्राइट बीच बाज़ार
कभी काम है कलम का और कभी तलवार

सीडी तो घूमे यहाँ महिमा लिए अनंत
हर मौसम में हिट रहे बारिश, शरद, बसंत

Saturday, April 2, 2011

जिससे पूरा भारत बोरियत से बचे




डियर माही,

इससे पहले कि 'डियर माही' जैसा संबोधन तुम्हारे मन में किसी तरह की गलतफहमी को जन्म दे, मैं साफ़-साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मैं कोई 'टीनेजर गर्ल' नहीं बल्कि एक पुरुष हूँ. मेरे इस स्पष्टीकरण के पीछे कारण यह है कि तमाम टीवी चैनलों के संवाददाताओं ने मेरे सामान्य ज्ञान में बढ़ोतरी करते हुए मुझे न जाने कितनी बार बताया है कि ज्यादातर लड़कियां ही तुम्हें माही कहकर पुकारती हैं. वैसे भी अगर मैं डियर महेंद्र सिंह धोनी जैसे किसी संबोधन का इस्तेमाल करता तो उसे देखकर मुझे ही नहीं बल्कि औरों को भी लगता जैसे मैं तुम्हें कानूनी नोटिस भेज रहा हूँ. पढ़ने में भी यह संबोधन 'कूल' नहीं लगता.

नतीजा यह हुआ कि मैं तुम्हें डियर माही लिखकर संबोधित कर रहा हूँ.

तो डियर माही, मेरे इस पत्र लिखने के पीछे एक कारण है. नहीं-नहीं, जो तुम सोच रहे हो, वह कारण नहीं है. वर्ल्डकप फाइनल से पाँच घंटे पहले तुम्हारे सामने कोई डिमांड रखकर मैं तुम्हें नर्वस नहीं करना चाहता. दरअसल कारण यह है कि, मैं यह चिट्ठी लिखकर अपने ब्लॉग पर लगाना चाहता हूँ जिससे मुझे एक अदद ब्लॉग पोस्ट की प्राप्ति हो जाए. आखिर एक ब्लॉगर को और क्या चाहिए? एक पोस्ट, और क्या?

वैसे मैं चाहता तो तुम्हारी टीम और क्रिकेट वर्ल्ड कप पर सवा सौ ग्राम की अशुद्ध तुकबंदी वाली एक चवन्नी कविता लिख डालता और किसी हिंदी न्यूज़ चैनल को फोन कर देता तो वे मेरी कविता कवर करने तुरंत आ जाते और वह तुम्हारे पास पहुँच जायेगी, मैं यह सोचकर अपने मन में दर्जन भर लड्डू फोड़ लेता. शायद तुम्हें पता न हो लेकिन एक अनुमान के अनुसार इस प्रोसेस से हमारे हिंदी न्यूज चैनलों ने पिछले दस वर्षों में करीब चार हज़ार सात सौ अट्ठावन हिंदी कवि पैदा किये हैं.

लेकिन मैंने सोचा कि ऐसा कुछ किया जाय जिससे मुझे एक ब्लॉग पोस्ट भी मिल जाए और तुम्हारा मोटिवेशन भी हो जाए. माही, मुझे पता नहीं कि भारत जब पिछली बार २००३ वर्ल्डकप के फाइनल में पहुँचा था तो हमारे कोच जॉन राइट ने कप्तान सौरव गांगुली को कैसे मॉटिवेट किया था? मुझे यह भी नहीं पता कि जब इसबार हम फिर से फाइनल में पहुँच गए हैं तो गैरी कर्स्टन क्या कर रहे हैं? मैं तुम्हें बताना चाहता हूँ कि तुम्हरी टीम के लिए वर्ल्डकप जीतना क्यों ज़रूरी है? वे कौन से कारण हैं जिनके लिए १२१ करोड़ भारतीय तुम्हें आशीर्वाद और प्यार देंगे.

तो हे अधिनायक, ध्यान लगाकर सुनो;

जैसा कि तुम्हें मालूम है हम २५ जून, १९८३ में क्रिकेट वर्ल्डकप जीते थे. वैसे कुछ चिरकुटों ने पिछले २-३ दिनों से यह भ्रम फैला रखा है कि हमें उस वर्ल्डकप में विजयश्री की प्राप्ति २ अप्रैल १९८३ के दिन हुई थी लेकिन यह सही नहीं है. खुद गूगलदेव ने यह बात कन्फर्म की है. और हे अधिनायक, आज की तारीख में गूगल से बढ़कर कौन है?

तो मैं कह रहा था कि २५ जून, १९८३ के दिन हम वर्ल्डकप जीते थे और उसके बाद केवल स्पोर्ट्स चैनलों पर लगातार जीतते जा रहे हैं. हाल यह है कि एक अनुमान के अनुसार हम स्पोर्ट्स चैनलों पर १९८३ का वर्ल्डकप १९८३ बार जीत चुके हैं. वैसे कुछ सूत्रों का मानना है कि यह आंकड़ा करीब आठ हज़ार दो सौ तक पहुँच सकता है. हम अगर इन दो सख्याओं का औसत भी निकालें तो हे अधिनायक, हम स्पोर्ट्स चैनलों पर करीब पाँच हज़ार बार वर्ल्डकप जीत चुके हैं. और तो और स्पोर्ट्स चैनलों के फुटेज के सहारे हमारे हिंदी न्यूज चैनल भी करीब ढाई हज़ार बार टीवी पर हमें वर्ल्डकप दिलवा चुके हैं.

हे अधिनायक, मुझे तो लगता है कि पिछले कई वर्षों में इन स्पोर्ट्स चैनलों के ट्रांसमिशन सेंटर में कुछ इस तरह का वार्तालाप होता होगा;

क्लर्क अपनी कुर्सी छोड़कर नीचे रतिराम चौरसिया की पान दूकान पर पान खाने जा रहा है. बीच में प्रोग्राम डायरेक्टर मिल जाता है. डायरेक्टर पूछता हा; "कहाँ जा रहे हो?"

क्लर्क'; "पान खाने नीचे जा रहा हूँ. आधे घंटे में वापस आता हूँ."

डायरेक्टर; "तो एक काम करो न. जाने से पहले वो १९८३ वर्ल्डकप फाइनल की सीडी लगाते जाओ. तुम जबतक पान खाकर वापस आओगे इंडिया फाइनल जीत जाएगा."

हे अधिनायक, हाल यह है कि बाथरूम में जाने से पहले एक भारतीय देख रहा है कि स्पोर्ट्स चैनल इंग्लिश प्रीमियर लीग का हाइलाइट्स दिखा रहा है और जब वह बाथरूम से बाहर आता है तो देखता क्या है कि मोहिंदर अमरनाथ माइकल होल्डिंग्स को एल बी डब्लू करके स्टंप लिए भागे जा रहे हैं. देख कर लगता है जैसे अगर वे आज इतनी जोर से न भागेंगे तो उन्हें स्टंप चोरी के इल्जाम में अरेस्ट कर लिया जाएगा. हे अधिनायक, तुम्हें यह जानकार आश्चर्य होगा कि १९८३ वर्ल्डकप फाइनल टीवी पर देखने की वजह से बेटा माँ के बार-बार कहने के बावजूद सब्जी लेने बाज़ार नहीं जाता और घर वालों को उस दिन केवल दाल-रोटी से गुज़ारा करना पड़ता है. वैसे सत्य यह है कि बेटा सोचता है कि क्या पता स्पोर्ट्स चैनल कल से भारत को जितवाना ही बंद कर दे. ऐसे में जब तक जितवा रहा है तब तक तो जीतते रहो.

हे अधिनायक माही, १२१ करोड़ लोग़ अट्ठाइस वर्षों से कपिल देव को दौड़ कर रिचर्ड्स का कैच लेते हुए देख रहे हैं. मानता हूँ कि गावस्कर के अनुसार; "कपिल वाज अ ग्रेट एथिलीट" लेकिन अब उनकी उमर भी तो देखो. पचास के पार पहुँच गए हैं. ऐसे में जब वे आजकल हाइलाइट्स में दौड़ते हैं तो धड़का लगा रहता है कि इस बार वे कैच नहीं पकड़ सके तो? अगर इस बार कैच छूट गया तो फिर रिचर्ड्स बड़ी दुर्गति करेगा हमारी. अभी तक तो कपिल कैच पकड़ते आये हैं लेकिन हे अधिनायक, यह क्रिकेट ही तो है. क्या पता अगली हाइलाइट्स में उनसे कैच छूट जाए और उसके बाद रिचर्ड्स ऐसा मारे कि आउट ही न हो? बीस ओवर भे नहीं लगेंगे वेस्ट- ईंडीज को मैच जीतने में.

और फिर हे अधिनायक, तुम्हें तो पता ही है कि हमारी संस्कृति और दर्शन में ऐसा बताया गया है कि हर चीज में जान होती है. अगर हम इस लिहाज से देखें तो क्या तुम्हें नहीं लगता कि हमें गोर्डन ग्रीनिज के उस स्टंप की रक्षा करनी चाहिए जिसे पिछले अट्ठाइस वर्षों से बलविंदर सिंह संधू अपने इन-स्विंगर से उखाड़ते आ रहे हैं. एक बार ठहरो और सोचो कि हर बार बॉल से धक्का खाने के बाद उस स्टंप की क्या दशा होती होगी? और फिर यह भी तो सोचो कि क्या होगा अगर अगली हाइलाइट्स में संधू का बॉल स्विंग ही न किया? क्या होगा तब? ग्रीनिज हमारी बड़ी दुर्गति करेगा. १९८३ में ही उसके पास बड़ा अनुभव था अब तो पूरे अट्ठाइस वर्षों का अनुभव उसमें जुड़ गया है. ऐसे में अगर वह अगले हाइलाइट्स में स्क्वायर ड्राइव लगाकर चौका मार दे तो? पता नहीं तुम्हें मालूम है कि नहीं लेकिन मुझे मालूम है कि उसने एक इंटरव्यू में कहा था कि; "अगर बॉल मेरे बैट पर ठीक से नहीं आती तो चौका हो जाता है. अगर आ जाती है तो फिर छक्का तो है ही."

हे अधिनायक, कभी तुमने माइकल होल्डिंग्स के पैड की दुर्गति के बारे में सोचा है? मोहिंदर अमरनाथ की बॉल पिछले अट्ठाइस वर्षों से उसके पैड पर एक ही जगह लग रही है. उसके पैड की दुर्दशा के बारे में सोचते हुए लगता है जैसे बेचारा पैड न जाने कितनी बार मरा होगा. उसके बाद मोहिंदर जिस तरह से भागते हैं और भीड़ उनका पीछा करती है वह देखकर लगता है जैसे अगर भीड़ इनके ऊपर टूट पड़ी और ये घायल हो गए तो फिर अगले हाइलाइट्स में कौन जेफरी डुजों को बोल्ड करेगा और कौन मार्शल को आउट करेगा? जिस तरह से डुजों टिक गया था, वह तो अगली हाइलाइट्स में मैच जीत ले जाएगा और हमारा जीता हुआ एक मात्र वर्ल्डकप हमसे छिन जाएगा.

और फिर अब समय आ गया है कि हम भारतीय मोहिंदर की उमर का लिहाज करे और उन्हें बार-बार लगातार दौड़ने की जिम्मेदारी न दें. अब तो उनके लिए यही सही रहेगा कि वे किसी टीवी स्टूडियो में बैठकर अपनी बेसुरी आवाज़ में मैच के दिन "मेरा रंग दे बसंती चोला" की गुहार लगायें और पूरे भारत का मनोरंजन करें.

हे अधिनायक, अगर ध्यान से देखो तो लॉर्ड्स की बालकोनी पर वर्ल्डकप उठाये हुए कपिल देव फबते तो बहुत हैं लेकिन हर बार मुझे ये खटका लगा रहता है कि इतनी भीड़ में कहीं कोई वेस्टइंडियन धक्का-मुक्की करके उनके हाथ से कप लेकर भाग न ले. आजकल चूंकि राजा लोग़ किसी एक्सक्लूसिव जगह पर कप उठाकर जीतने वाले कैप्टन के हाथ में नहीं रखते इसलिए ये डर नहीं रहता कि कोई धक्का-मुक्की में कप लेकर निकल लेगा. आजकल तो बाकायदा मैदान के बीच में कप दिया जाता है जहाँ भीड़-भाड़ कम रहती है.

इसलिए हे अधिनायक, और किसी बात के लिए नहीं तो कम से १२१ करोड़ भारतीयों को पिछले इतने वर्षों की बोरियत से तो बचाओ. किसी को केवल ख़ुशी देना ही महान काम नहीं होता. मैं तो समझता हूँ कि उसे बोरियत से बचाना महानतम काम होता है और आज पूरा भारत तुमसे यह चाहता है कि तुम और तुम्हारी टीम उसे ख़ुशी तो दे ही साथ ही आनेवाले वर्षों में उसे बोरियत से भी बचाए. मेरा तो ऐसा मानना है कि हमारे पूर्व राष्ट्रपति ए पी ज़ी अब्दुल कलाम के ट्वेंटी-ट्वेंटी मिशन (क्रिकेट से मत जोड़ लेना इसे) को अचीव करने के लिए यह भी महत्वपूर्ण है कि पूरा भारत बोरियत से बचा रहे.

इसलिए हे अधिनायक, पूरे भारत की शुभकामनाएं तुम्हारे और तुम्हारी टीम के साथ हैं. कप जीतो हमें बोरियत से उबारो.

May God of cricket save us from this boriyat!!

Wednesday, December 15, 2010

हाँ, याद आया....




तमाम घटनाएं किसी न किसी काल-खंड का हिस्सा बन कर रह जाती हैं. यह जो महीना चल रहा है इसके भाग्य में लिखा था कि इसी समय पूरा देश शीला के जवान होने की बात पर अपनी प्रतिक्रिया दे. परन्तु शीला की जवानी के अलावा और भी बातें हैं जिनपर इस काल-खंड का अधिकार है.

विकिलीक्स को ही ले लीजिये. विकिलीक्स ने भी साल २०१० के इस महीने को महत्वपूर्ण बना दिया है. उधर लीक्स होते जा रहे हैं और इधर यह महीना महत्वपूर्ण होता जा रहा है. विकिलीक्स के महत्व का इस बात से पता लगता है कि कुछ लोगों ने इसे यू एस ओपन भी कहना शुरू कर दिया है. हर वर्ष अगस्त महीने में होने वाला यू एस ओपन इस साल दिसम्बर में भी हो रहा है. वहीँ ये लीक्स पहले होने वाले क्रिकेट सीरीज केबिल एंड वायरलेस सीरीज की भी याद दिला गए.

वैसे मुझे एक बात से ही शिकायत है. विकिलीक्स वालों ने जब अमेरिकी दूतावासों के दस्तावेज लीक करने शुरू किये तो उन्हें हर लीक के साथ यह चेतावनी भी लिख देनी चाहिए थी कि नक्कालों से सावधान. या फिर हमारी कोई शाखा नहीं है. ऐसा नहीं करने से गड़बड़ हो गई न. पाकिस्तान के कुछ अखबारों ने नकली दस्तावेज लीक कर दिए जिसके अनुसार दिल्ली मिष्ठान्न भण्डार ने वित्तवर्ष २००९-१० के लिए जितनी मिठाई बनाने का दावा किया था उससे करीब ढाई किलो मिठाई कम बनाई. बाद में ब्रिटेन के एक अखबार ने यह बताया कि पाकिस्तानी अखबारों का यह दावा बिलकुल गलत है और दिल्ली मिष्ठान्न भण्डार के बारे में अमेरिकी दूतावासों से कोई भी टिप्पणी नहीं हुई थी.

वहीँ दूसरी तरफ ब्रिटेन के अखबार न्यूज ऑफ द वर्ल्ड ने एक स्टिंग ऑपरेशन करके बताया कि इन नकली दस्तावेजों के पीछे मजीद मज़हर और सलमान बट्ट का हाथ है.

हाथ से याद आया कि पिछले बीस दिनों में पूरे देश में इस बात पर चर्चा हो रही है कि टेलिकॉम मिनिस्टर 'ये' राजा ने अपनी ईमानदारी का दावा करने के बावजूद इस्तीफ़ा क्यों दिया? इसके पीछे किसका हाथ है? तमाम अटकलें चल ही रही थीं कि विकिलीक्स से लीक हुए एक केबिल के अनुसार राजा के इस्तीफे के पीछे करूणानिधि का हाथ है. इस केबिल के अनुसार हालाँकि पहले तो करूणानिधि तैयार नहीं थे लेकिन जब उन्हें मनाने के लिए दिल्ली से कांग्रेसी नेता करीब डेढ़ दर्जन शॉल लेकर चेन्नई पहुंचे तब करूणानिधि जी राजा बाबू के इस्तीफे के लिए राज़ी हो गए.

अमेरिकी दूतावास की एक महत्वपूर्ण सूचना के अनुसार शॉल की खेप चेन्नई पहुँचने के बाद स्वयं सोनिया गाँधी जी ने चेन्नई जाकर श्री करूणानिधि को शॉल लपेट दिया और उसके बाद वे राजा के इस्तीफे के लिए राज़ी हो गए. एक अनुमान के अनुसार श्री करूणानिधि के पास अब करीब सत्तावन हज़ार दो सौ शॉलें हैं.

जैसा कि विदित ही है कि राजा के ऊपर बहुत बड़ी धनराशि के हेर-फेर का आरोप है.

धनराशि से याद आया कि हाल ही में कौन बनेगा करोड़पति में अपनी आदत के अनुसार प्रश्न पूछने वाले श्री अमिताभ बच्चन ने श्री राजा से पूछा; "क्या करना चाहेंगे आप इस धनराशि से?" जिसके जवाब में श्री राजा ने उन्हें बताया कि; "दिस्स यिज्ज याल ल्लीडार्स मणी."

उनके इस जवाब से करूणानिधि ने राहत की साँस ली.

मणी से याद आया कि मणिशंकर ऐय्यर पिछले करीब एक महीने से इस बात से नाराज़ हैं कि तमाम और स्कैम के आ जाने से कॉमनवेल्थ स्कैम कहीं खो गया और उसकी वजह से उन्हें पैनल डिस्कशन के लिए किसी टीवी चैनल से निमंत्रण नहीं आ रहा है. पिछले करीब डेढ़ महीने से कोई स्टेटमेंट न दे सकने के कारण श्री ऐय्यर का हाजमा खराब होने के चांस बढ़ गए हैं. तीन दिन पहले ही उन्होंने बताया कि वे तो कारावास में बंद चीन के नेता लिऊ जिअयाबो को नोबेल दिए जाने पर भी स्टेटमेंट दने के लिए तैयार हैं लेकिन कोई चैनल उनकी बाईट ले ही नहीं रहा.

चीन के इस विद्रोही नेता को शांति का नोबेल देने की बात पर याद आया कि चीन ने तमाम देशों को यह कहते हुए चेतावनी दी कि जो भी देश इस समरोह में जाएगा उसके साथ चीन के सम्बन्ध बिगड़ सकते हैं. यह चेतावनी भारत के लिए भी थी. चीन की इस बात पर भारत ने यह कहते हुए कान नहीं दिए कि; "कश्मीर का मुद्दा ही केवल बाइ-लैटरल है. जहाँ तक नोबेल समारोह की बात है तो वह एक अंतर्राष्ट्रीय मुद्दा है और भारत यह समारोह अटेंड करेगा."

नोबेल समारोह में भारत की शिरकत के बाद चीन ने भारत से कहा कि; "हम अपना यह अपमान नहीं भूलेंगे. भविष्य में जब भी अरुंधती राय को 'भूगोल' के लिए और आसिफ अली जरदारी को 'फिजिक्स' के लिए नोबेल पुरस्कार मिलेगा तो चीन भी वह समारोह अटेंड करके बदला ले लेगा."

भारत सरकार ने चीन के इस वक्तव्य की जांच सीबीआई को सौंप दी है.

सी बी आई से याद आया कि टेलिकॉम घोटाले की जांच कर रही सी बी आई ने अपनी एक गुप्त रिपोर्ट में नीरा राडिया की तारीफ़ की है. सी बी आई का मानना है कि नीरा ज़ी की वजह से ही देश में चल रहे दलाली के लेटेस्ट रेट्स सामने आये हैं. अखिल भारतीय दलाल महासंघ ने भी एक धन्यवाद प्रस्ताव पारित कर नीरा राडिया के प्रति आभार व्यक्त किया है. दलाल संघ के सदस्यों का मानना है कि पिछले सात सालों से वे एवरेज रेट्स ग्यारह परसेंट पर काम कर रहे थे लेकिन थैंक्स टू नीरा ज़ी अब यह रेट पंद्रह परसेंट हो जाएगा.

ज्ञात हो कि नीरा राडिया ज़ी पीआर फर्म वैष्णवी कम्यूनिकेशंस की मालकिन हैं.

मालकिन से याद आया कि बिहार के मोतिहारी जिले के डुगडुगा गाँव की रेनू कुमारी ने यह कहकर सबको चौंका दिया कि वे सूर्य की असली मालकिन हैं. सूर्य की रजिस्ट्री के दस्तावेज दिखाते हुए रेनू ज़ी बताया कि उन्होंने सन १९७८ में ही सूरज की रजिस्ट्री अपने नाम करवा ली थी. रेनू ज़ी के इस क्लेम की वजह से स्पेन की महिला अन्जेल्स डुरान के क्लेम को गहरा झटका लगा है. ज्ञात हो कि मिस डुरान ने पूरी दुनिया को यह कहते हुए चौंका दिया था कि उन्होंने सूर्य की रजिस्ट्री अपने नाम करवा ली है और अब से सूर्य उनकी प्रापर्टी है.

मिस डुरान और रेनू ज़ी के अलावा दुनिया भर के तमाम लोग समय-समय पर यह दावा करते आये हैं कि वे सूर्य, चन्द्रमा, वृहस्पति, मंगल और ऐसे ही तमाम ग्रहों के मालिक हैं. हाल ही में येल यूनिवर्सिटी ने ऐसे क्लेम पर पी एचडी करने के लिए अपने स्टुडेंट्स को प्रोत्साहित करना शुरू कर दिया.

वैसे भारतीय समाचार चैनलों में इस बात के कयास लगाये जा रहे हैं कि सूरज के असली मालिक अरिंदम चौधरी हो सकते हैं.

अरिंदम चौधरी से याद आया कि.....

नोट: मैंने यह पोस्ट न्यूज दैट मैटर्स नॉट के लिए लिखी थी.न्यूज दैट मैटर्स नॉट बहुत बढ़िया फेक न्यूज साईट है. इसके एडिटर तनय सुकुमार डेलही कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग (दिल्ली प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय) के छात्र हैं. तनय का अपना ब्लॉग भी है और मैंने उनका लिखा हुआ जितना भी पढ़ा है, उसको देखते हुए कह सकता हूँ कि मुझे वे एक बहुत परिपक्व लेखक लगे.

न्यूज दैट मैटर्स नॉट पर कंट्रीब्यूट करने वाले ज्यादातर लेखक इंजीनीयरिंग स्टुडेंट्स हैं. न्यूज दैट मैटर्स नॉट फेक न्यूज और सटायर के ऊपर भारतवर्ष की दूसरी सबसे पॉपुलर साईट है.

Friday, January 22, 2010

कोहरा-प्रधान जीवन




पिछले कई दिनों से जीवन कोहरा-प्रधान हो गया है. चारों तरफ कोहरा ही कोहरा है. इधर कोहरा, उधर कोहरा. आसमान में कोहरा जमीन पर कोहरा. सड़क पर कोहरा. पगडंडी में कोहरा. मैदान में कोहरा पेड़ पर कोहरा. कोहरे के ऊपर कोहरा और कोहरे के नीचे कोहरा.

कुल मिलाकर जीवन में कोहरे का महत्व बढ़ गया है. जिनके इलाके में कोहरा नहीं है वे बेचारे निराश होते हुए कह रहे हैं कि; "कितने लकी हैं वे लोग जिनके इलाके में कोहरा पड़ा है. एक हम हैं जो कोहरे के लिए तरस गए हैं."

जो कोहरे की वजह से देर से आफिस पहुँच रहे हैं वे संतुष्ट हैं कि उनका जीवन कोहरे से प्रभावित है. उनके पास कल तक जितनी कहानियां थीं उसमें कोहरे की कहानी और जुड़ गई. वे इस बात से मन ही मन प्रमुदित च किलकित हैं कि कोहरे की इस कहानी को अपने नाती-पोतों को सुना सकेंगे.

आज से बीस-पचीस साल बाद जब कभी कोहरा पड़ेगा तो वे कहेंगे; "अब कहाँ पड़ता है कोहरा? ये कोहरा भी कोई कोहरा है? कोहरा तो पड़ा था साल २०१० के जनवरी महीने में. हाथ को हाथ नहीं सूझ रहा था. खाने बैठे थे. रोटी के साथ सब्जी की जगह जगह अचार उठा लिया और मुंह की जगह नाक में डाल लिया. ऐसा कोहरा पड़ा था उस साल. ये कोहरा तो उस कोहरे के सामने कुछ नहीं है."

मुझे पूरा विश्वास है कि ऐसे लोग उन लोगों को हेयदृष्टि से देखते होंगे जिनके इलाके में कोहरा नहीं पड़ रहा है.

टीवी न्यूज़ चैनल पर तो कल से हालात बहुत खराब हो गए हैं. संवाददाता बेचारे कोहरे को कवर करते हलकान हुए जा रहे हैं. कोई रेलवे स्टेशन पर कोहरा कवर कर रहा है तो कोई हवाई अड्डे पर. संवाददाता कैमरे के सामने खड़े हुए बता रहा है; " आप देख सकती हैं सोनिया कि विजिबिलिटी जीरो है."

उधर टीवी स्टूडियो में बैठी सोनिया चाहकर भी नहीं पूछ पा रही हैं कि; " सौरभ, विजिबिलिटी अगर जीरो है तो तुम कैसे दिखाई दे रहे हो?"

रेलगाड़ियाँ लेट चल रही हैं. हवाई जहाज लेट उड़ रहे हैं. कुछ तो कैंसल हो जा रहे हैं. लेट चलते-चलते रेलगाड़ियाँ बोर हो जा रही हैं तो आपस में भिड़ जा रही हैं. रेल विभाग पर कोहरे की मार बहुत जोर से पड़ी है. अधिकारियों को घर से भी काम करना पड़ रहा है. जो नहीं कर पा रहे हैं वे भी काम कर रहे हैं. कुल मिलाकर विकट कोहरामय है सबकुछ.

कोहरे से हो रहे नुक्सान का हिसाब लगाया जा रहा है. न जाने कितने लोग कैलकुलेटर पर अंगुलियाँ फेरते बिजी हैं. एयरलाइंस की फ्लाईट कैंसल हो गई? आज कुल पचास करोड़ का नुक्सान हुआ. कैंसिलेशन के वजह से पेट्रोल-डीजल नहीं बिका सो अलग. सबकुछ जोड़ लें तो कुल मिलाकर सुबह से ग्यारह बजे तक सत्तावन करोड़ चौबीस लाख का नुक्सान हो चुका है. युवराज को आज छत्तीसगढ़ जाकर छात्रों से मिलना था. फ्लाईट कैंसल होने की वजह से वे नहीं जा सके. छात्र उनका इंतज़ार करके अपने-अपने घर चले गए. कुल ढाई सौ छात्रों ने अगर चार घंटा इंतज़ार किया तो कुल मिलाकर १००० छात्र घंटे का नुक्सान हो गया. उधर युवराज का सात घंटे का नुक्सान सो अलग.

इतनी सर्दी के बीच बसंत आ गया. बसंत को सर्दी से डर नहीं लगा होगा इसलिए आ गया. अन्य वर्षों के मुकाबले जल्दी आ गया. सर्दी उसके आने से वैसे ही खफा थी जैसे रोज रात को साढ़े नौ बजे सोने वाले किसी नियम के स्ट्रिक्ट आदमी के घर में अचानक कोई बिना बताये आ जाए.

लेकिन सर्दी भी इतनी जल्दी हार मानने वाली थोड़े न है. सत्ता हस्तांतरण इतना ईजी नहीं होने देना चाहती. बसंत के आने से सर्दी इस कदर गुस्सा हुई कि उसने कोहरे के साथ हाथ मिलाया और उसे लाकर बसंत के सामने खड़ा कर दिया. लो झेलो अब. हमें नहीं समझते न. अब इससे निपटो. बसंत की गाड़ी पटरी से उतर गई है.

अब कोहरा केवल बसंत को ही नहीं बल्कि साथ-साथ कुलवंत, यशवंत और हनुमंत को भी हलकान किये है.

कल तक बसंत पर कविता लिखने वाले कवियों ने अब कोहरे पर कविता लिखनी शुरू कर दी है. कोई कवि आसमान को कोहरे की मोटी चादर में लपेट दे रहा है तो कोई अपनी गाड़ी को कोहरे के कम्बल में लपेट कर सुला दे रहा है. कोई तो समय को ही कोहरे में लिपटा बता दे रहा है. कुल मिलाकर विकट कविताई करवा रहा है यह कोहरा.

कविताई का वातावरण ऐसा चौचक बना है कि वीर-रस का कवि बसंत और कोहरे के युद्ध का वर्णन करते हुए कविता लिख सकता है.

लेकिन ऐसा नहीं है कि कोहरे की वजह से केवल और केवल नुक्सान ही हो रहा है. अगर कोहरे के बीच दिमाग से काम लिया जाय तो कुछ लोगों के लिए कोहरा वरदान भी साबित हो सकता है. शर्त केवल एक ही है वे कोहरे का सही इस्तेमाल करें. अब अपने पचौरी साहब को ही ले लीजिये. उनके संस्थान ने बताया कि हिमालय के ग्लेशियर २०३५ तक पिघल जायेंगे. अब जब नए आंकड़े इकठ्ठा करके वैज्ञानिक और रमेश बाबू उनके पीछे पड़ गए तो वे परेशान हो गए. समझ में नहीं आ रहा कि क्या कहें?

लेकिन अगर वे थोड़ा धीरज से काम लें तो कह सकते हैं कि; " हम क्या करें? कोहरे की वजह से विजिबिलिटी जीरो हो गई थी. रिपोर्ट ठीक से नहीं पढ़ पाए. ३०३५ को २०३५ पढ़ गए. या यह भी कह सकते हैं कि इस विकट कोहरे में कुछ भी ठीक से दिखाई नहीं दिया और मिट्टी वाले पहाड़ को ही ग्लेशियर समझ गए और साल २०३५ वाली भविष्यवाणी कर गए. "

नई पोस्ट लिख कर अगर कोई ब्लॉगर अपने साथी ब्लॉगर से उसे पढ़ने और कमेन्ट करने के लिए कहे तो साथी ब्लॉगर कह सकता है कि; "भैया हमारे इलाके में कोहरे की वजह से विजिबिलिटी जीरो है. या फिर केवल तीन इंच है. ऐसे में पोस्ट पढ़ना और कमेन्ट करना तो संभव नहीं है. अग्रीगेटर पर पसंद बढ़ाने के लिए भी मत कहना. अग्रीगेटर पर विजिबिलिटी माइनस में चल रही है."

इतना कहने के बावजूद फिर भी अगर पोस्ट लिखने वाला ब्लॉगर पोस्ट पढ़ने और कमेन्ट करने के लिए अडिग रहे तो सामने वाला कमेन्ट में जय हो की जगह क्षय हो लिख डालेगा और हाय-तौबा मचाने पर कह देगा कि; "तुम्हें विश्वास नहीं हो रहा था न कि हमारे इलाके में विजिबिलिटी जीरो हो गई है. कमेन्ट पढ़कर अब तो विश्वास हो गया होगा. सही में कुछ दिखाई नहीं दे रहा है."

कुल मिलाकर यही कहना है कि भैया सर्दी के मौसम में कोहरा, ओस वगैरह तो रहेगा ही. इतना हलकान होने की क्या ज़रुरत है? वैसे भी ग्लोबल वार्मिंग की बात सच साबित हुई तो कुछ ही सालों में कोहरा और ओस तो केवल म्यूजियम में रखने की चीजें हो जायेंगी. इसलिए जब तक कोहरा वगैरह के दर्शन हो रहे हैं करते जाइए. मस्त रहिये.

Wednesday, August 19, 2009

कुर्बान जाऊं आपकी महानता पर




इतिहास पुरुषों के साथ यह बड़ा बवाल है. वे दुनियाँ से कूच करने के बाद भी लोगों को चैन से नहीं रहने देते. इतिहास पुरुषों के चक्कर में न जाने कितने इतिहास बन जाते हैं. जिन्ना जी को ही ले लीजिये. क्या कहा? कहाँ मिलेंगे? अरे भैया, ले लीजिये से मेरा मतलब है उन्हें लेकर मत जाइए. मेरा मतलब है कि उनकी बात कर लीजिये. हाँ, अब समझे.

तो मैं कह रहा था कि जिन्ना जी को ही ले लीजिये. आज इस असार संसार में नहीं है तो क्या हुआ, औरों को डुबाय दे रहे हैं. देखकर लगता है जैसे उकसाते रहते हैं कि; "मेरे बारे में यह कह दो. मेरे बारे में वह कह दो. मुझे महान बता दो."

मैं पूछता हूँ, आप महान थे तो थे. लेकिन इतना भी क्या महान होना कि दूसरों को उकसाय दें कि दूसरे पग-पग पर आपको महान कहते फिरें? जिनके ऊपर साम्प्रदायिक होने के आरोप लगते रहते हैं वे भी आपको सेकुलर बताते रहते हैं. मैं पूछता हूँ, महानता की कोई लिमिट है कि नहीं?

देखकर तो यही लगता है कि आप लिमिटलेस महान थे. आखिर आज तक ऐसा नहीं हुआ कि नेहरु जी को किसी पाकिस्तानी नेता ने महान कह दिया हो और उसकी छीछालेदर हो गई हो. ऐसे में तो यही कहा जा सकता है कि महानता में आप सबसे ऊपर थे. इतने ऊपर कि न जाने कितने लोगों का बुढापा खराब कर दिया आपने. हो सकता कुछ और अभी भी लाइन में हों.

कुर्बान जाऊं आपकी महानता पर.

अब तो ऐसा लगता है कि जिसे अपना बुढापा खराब करवाना हो, वो आपको महान बता कर खराब करवा लें. अब जसवंत सिंह जी को ही ले लीजिये. फिर वही सवाल? उन्हें लेकर क्या करेंगे? क्या कहा? उन्हें पार्टी में से निकाल दिया गया? अरे भैया पार्टी में से ही निकाला गया है. पार्टी कोई अफीम पीने की थोड़े न थी. पार्टी से मतलब राजनीतिक पार्टी से है न. अफीम पीने की पार्टी होती तो पेज थ्री की खबर बनती. ये खबर तो पेज वन की है. अंतर तो है ही.

हाँ तो मैं जसवंत सिंह जी की बात कर रहा था. क्या-क्या नहीं किया उन्होंने पार्टी से निकलने के लिए. पार्टी हारी तो इलेक्शन इंचार्ज नेताओं के ऊपर आरोप लगा दिया. उससे कुछ नहीं हुआ तो चिट्ठी लिख डाली. चिट्ठी से भी जब कुछ नहीं बना तो ब्रह्मास्त्र का प्रयोग कर डाला. उन्हें लगा होगा कि पार्टी वाले ऐसे नहीं निकालेंगे. जिन्ना को महान बता दो और फिर देखो असर. जिन्ना जी की महानता पर प्रकाश डाला और असर हो गया. निकाल दिए गए.

भारतीय संस्कृति की रक्षा का दावा करने वालों के लिए ब्रह्मास्त्र का मतलब ही बदल गया है. समझ में नहीं आता कि सालों से पॉलिटिक्स में रहने वाले पोलिटिकली करेक्ट बातें करना कब सीखेंगे?

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सिंह जी की किताब के विमोचन के अवसर पर मंच पर एक सज्जन को देखा. एकदम नामवर सिंह जी जैसे. देखकर लगा जैसे उनके जुड़वा भाई हैं. एक बार के लिए लगा कि कहीं ऐसा न हो कि कोई उन्हें नामवर सिंह समझ कर ऐसी छीछालेदर न कर दे जैसी उदय प्रकाश जी की हुई.

अच्छा हुआ किसी ने नहीं देखा. हो सकता था जल्दबाजी में उन्हें नामवर सिंह ही समझ लिया जाता और फिर.....

Friday, August 14, 2009

एक मौसमी पोस्ट - स्वाइन फ्लू




ये स्वाइन फ्लू भी बड़ा जबर रोग है. इतनी दूर से चला लेकिन भारत पहुँच कर ही दम लिया. दम भी ऐसा कि भारतवासियों को दम नहीं लेने दे रहा. इससे अच्छा तो चायनीज फ्लू था जो चला तो ठीक लेकिन कहीं नहीं जा सका. जाता भी कैसे, चीन में पैदा हुई चीजें वैसे भी ज्यादा दिन नहीं चलतीं.

लेकिन स्वाइन फ्लू तो आकर ही बैठ गया. हालत यह है कि छींकना मुश्किल हो गया है. इस बात का डर रहता है कि छींक सुनकर (अब छींक को देख तो नहीं सकते न) दोस्त-यार साथ ही न छोड़ दें. किसी को एक बार खांसी आ जाए तो लोग ऐसे देखते हैं जैसे धमकी दे रहे हों कि; "अगर मुझे स्वाइन फ्लू हुआ तो मैं तुम्हें नहीं छोडूंगा."

हमारे एक मित्र स्वाइन फ्लू को लेकर अति-उत्साही हो गए. इतने उत्साही जैसे कोई नया ब्लॉगर पहली पोस्ट पर चार से ज्यादा टिप्पणियां मिलने पर होता है. उत्साह ने उनके मन में घर बसाया तो मुझसे बोले; "ऐसा करें न, कि अगले दस दिन के लिए आफिस बंद कर देते हैं."

मैंने पूछा; "क्या ज़रुरत है आफिस बंद करने की? कलकत्ते में तो अभी तक स्थिति सामान्य है."

मेरी बात सुनकर उन्होंने विश्व-प्रसिद्द कहावत ठेल दी. बोले; "प्रेवेंशन इज बेटर दैन क्योर."

जब मैंने कहा कि वे ओवर रेअक्ट कर रहे हैं तो बोले; "अच्छा, ठीक है लेकिन डॉक्टर से मिलकर स्वाइन फ्लू के बारे जानकारी तो हासिल कर ही लेना चाहिए."

इतना कहते हुए तुंरत अपने डॉक्टर को फ़ोन कर दिया. बोले; "आज मैं आपसे मिलना चाहता हूँ. मुझे स्वाइन फ्लू के बारे में जानकारी चाहिए."

उन डॉक्टर साहब को मेरे दोस्त के साथ बात करने में बड़ा मज़ा आता है. वे तुंरत राजी हो गए. एक बार भी नहीं कहा कि; "मेरे पास आने की क्या ज़रुरत है? इन्टरनेट पर उसके बारे में जानकारी हासिल कर लो. टीवी देख लो. अभी सारे चैनल स्वाइन-मय हो लिए हैं."

और तो और यह भी कह सकते थे कि हिंदी ब्लॉग पढ़ लो. स्वाइन फ्लू तो क्या, उसके बाप के बारे में भी जानकारी मिल जायेगी. लेकिन नहीं.

अब मित्र के साथ ही शाम को घर के लिए निकलता हूँ तो उनके साथ डॉक्टर के पास जाना पड़ा. साढ़े आठ बजे उन्होंने डॉक्टर साहब को फ़ोन करके बता दिया कि; "आप अपने चेंबर में ही रहें. मैं आपसे मिलने आ रहा हूँ."

नौ बजे डॉक्टर साहब के पास पहुंचे. डॉक्टर साहब से मिलने में मुझे दिलचस्पी नहीं थी. इस बात का पता मेरे दोस्त को था. इसलिए वे मुझसे बोले; "आप तो जायेंगे नहीं. गाडी में बैठिये. मैं पॉँच मिनट में आता हूँ."

चले गए. चालीस मिनट बाद आये. मैंने पूछा; "क्या-क्या सावधानी के लिए कहा डॉक्टर साहब ने?"

बोले; "अरे कुछ नहीं. वही सब कहा जो टीवी में बताता है. हाथ धोकर रखिये. ज्यादा लोगों से नहीं मिलना है. स्वीमिंग बंद कर दीजिये. और ज्यादा कुछ नहीं."

मैंने कहा; "और क्या बातें हुईं?"

मित्र बोले; "वही सब. कह रहे थे कि मुझे अपना बिजनेस और आगे बढ़ाना चाहिए. फिर बोले कि कौन सी पिक्चर देखी मैंने? फिर बोले एक दिन चलिए साथ में पिक्चर देखने चलते हैं."

लीजिये. मैंने सोचा था कि स्वाइन फ्लू के बारे में जानकारी लेने गए हैं. और यहाँ पिक्चर देखने की बातें हो रही हैं. जहाँ रात को नौ बजे घर पहुँचते हैं, वहां साढ़े दस बजे घर पहुंचे.

घर पहुंचे और टीवी देखा तो वहां भी स्वाइन फ्लू से कोई बचाव नहीं. कोई चैनल खोल लीजिये आज कल हर ब्रेकिंग न्यूज स्वाइन फ्लू के बारे में है. एक हैल्थ मिनिस्टर है. बेचारा न घर का रहा न मंत्रालय का. केवल न्यूज चैनल का होकर रह गया है. पिछले सात दिनों से बयान की सफाई करते फिर रहा है. मैंने ये नहीं कहा. मैंने वो नहीं कहा. मैंने ३३ प्रतिशत वाली बात नहीं कही. टैमीफ्लू के बारे में दिए गए मेरे बयान को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया.

बेचारा यही कहते फिर रहा है. मिनिस्ट्री का बारह तो क्या साढ़े बारह बज गया है.

टीवी चैनल के संवाददाता मास्क पहने घूम रहे हैं. बड़े क्यूट लग रहे हैं. चिरकुट संवाददाता भी डॉक्टर लग रहा है. हॉस्पिटल से रिपोर्टर लोग रिपोर्टिंग कर रहे हैं. मास्क पहने संवाददाता ऐसा लग रहा है जैसे कोई डॉक्टर हो और माइक्रोफोन से ही ऑपरेशन करने के लिए कमर कसे है.

आज नीरज भैया से बात हो रही थी. मैंने कहा; "खोपोली तो पुणे और मुंबई के बीच है. ऐसे में वहां की स्थिति क्या है?"

वे बोले; " बड़ी हालत खराब है यहाँ तो. सब डरे हुए हैं. फैक्टरी में लोगों को देखकर लग रहा है जैसे डब्लूएचओ ने डॉक्टरों का एक विशिष्ट दल हमारी फैक्टरी के लिए भेज दिया है. चश्मा पहने मजदूर भी डॉक्टर दिखाई दे रहा है."

मैंने पूछा और क्या हो रहा है तो बोले; "हमें तो डर है कि कहीं कोई बुजुर्ग वायरस बाकी के वायरसों को यह न कह दे कि खोपोली में एक शायर रहता है. जाओ उनसे तरन्नुम में गजलें सुनकर आ जाओ. हम बताते हैं बंधुवर, अगर ऐसा हो गया तो खोपोली में भी स्वाइन फ्लू फैलने की आशंका है."

अब हम तो यही कहेंगे कि ऐसा न हो.

और यह कहेंगे कि स्वाइन तो जाने से रहे. भला स्वाइन फ्लू ही चला जाए.

Wednesday, July 29, 2009

लश्कर-ए-तैयबा तो एक कव्वाली गाने वाला आरगेनाइजेशन है




एक हैं हाफिज़ सईद साहेब. हैं पकिस्तान के लेकिन अपना कार्यक्षेत्र हिन्दुस्तान को बना रखा है. ट्रेनिंग-व्रेनिंग देने में माहिर हैं. ट्रेनिंग देकर नौजवानों को स्वर्ग भेजने का पुण्य कार्य करते हैं. मुंबई पर हुए हमले में इनका नाम है. भारत ने सुबूत दिया तो अरेस्ट हो लिए. बाद में पकिस्तान ने बताया कि सुबूत पर्याप्त नहीं हैं तो छोड़ दिए गए. फिर भारत चिल्लाया कि हमने तो सुबूत दिए थे. पाकिस्तान फिर चिल्लाया कि आपके सुबूत काफी नहीं हैं. इतने नाकाफी कि हाफिज़ सईद को रोककर रखने में असफल हैं.

कल पाकिस्तान ने फिर बताया कि भारत ने पर्याप्त सुबूत नहीं दिए इसलिए हाफिज़ सईद को रोककर रखना उनके बस की बात नहीं.

पकिस्तान के बस में वैसे भी कुछ नहीं है. दिल्ली से लाहौर तक बस गई. लाहौर से दिल्ली नहीं आई.

खैर, पकिस्तान ने भारतीय सरकार को एक पत्र लिखकर खुलासा किया कि सुबूत इकठ्ठा करने के लिए पकिस्तान ने बहुत प्रयास किया लेकिन सुबूत मिले नहीं. उनकी कोशिशों का लेखा-जोखा निम्नलिखित है;

०१. हमें लगा कि अगर यह बात सच है कि मुंबई पर हमला हाफिज़ सईद साहेब ने पकिस्तान से नौजवानों को भेजकर करवाया तो उन्होंने रिक्रूटमेंट के लिए अखबारों में विज्ञापन ज़रूर दिए होंगे. यह कहते हुए कि; "ज़रुरत है साहसी नौजवानों की जो मुंबई पर हमला कर सकें."

कहते हैं इस तरह के हमलों के लिए काफी दिनों तक तैयारी की ज़रुरत है. हमने पिछले दो सालों का अखबार छान मारा लेकिन हमें हाफिज़ सईद द्बारा दिए गए इश्तिहार किसी अखबार में नहीं मिले. इससे यह साबित होता है कि मुंबई पर हुए हमले में उनका हाथ नहीं है.

०२. तमाम जुगत लगाकर हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि अगर इन नौजवानों को पकिस्तान में ट्रेनिंग दी गई है तो जिस स्कूल में ट्रेनिंग दी गई है, उस स्कूल को फीस पेमेंट करने का कोई तो सुबूत होगा. हाफिज़ सईद के घर की तलाशी में हमें किसी स्कूल की फीसबुक नहीं मिली. इससे साबित होता है कि इस हमले में हाफिज़ साहेब का हाथ नहीं है.

०३. अगर हाफिज़ सईद साहेब ने इन नौजवानों को पाकिस्तान से मुंबई भेजा होता तो उन्होंने ज़रूर कोई बड़ा मजमा लगाकर उन्हें बिदाई दी होती. मजमा लगता तो उसकी फोटोग्राफी भी हुई होती. टीवी पर दिखाया भी गया होता. हमने बहुत कोशिश की लेकिन हमें इस कार्यक्रम की विडियो रिकॉर्डिंग नहीं मिली. इससे यह साबित होता है कि मुंबई पर हुए हमले में हाफिज़ साहेब का कोई हाथ नहीं है.

०४. हिंदुस्तान का कहना है कि कसाब एंड पार्टी कराची से चलकर मुंबई तक बोट से पहुंचे. खोज करने के बाद कराची पोर्ट पर हमें यह तो पता चला कि किसी हाफिज़ सईद ने एक बोट भाड़े पर ली थी लेकिन पोर्ट के फार्म में जहाँ यह पूछा गया था कि; "बोट भाड़े पर लेने का मकसद क्या है?" वहां पर जवाब में लिखा गया था कि "बोट पर चढ़कर कुछ नौजवान मुंबई घूमने के लिए जायेंगे."

हमारा मानना है कि अगर यह बोट इस इरादे से भाड़े पर ली गई होती कि उसमें सवार नौजवान मुंबई पर हमला करने जा रहे हैं तो पोर्ट के फार्म में इस बात का डिसक्लोजर ज़रूर रहता. इससे यह साबित होता है कि मुंबई हमले में हाफिज़ साहेब का कोई हाथ नहीं है.

०५. हाफिज़ साहेब के घर से हमें रेकॉर्ड्स मिले हैं जिनसे पता चलता है कि उन्होंने कुछ सेटेलाईट फ़ोन की खरीदारी की थी. लेकिन यहाँ हम बताना चाहेंगे कि फ़ोन कंपनी को दिए गए डिसक्लोजर में यह नहीं कहा गया है कि ये फ़ोन मुंबई में हमले के लिए इस्तेमाल होने वाले थे.

०६. हाफिज़ सईद साहेब के डेरे से हमें मुंबई के नक्शे वगैरह मिले तो सही लेकिन पूछताछ के बाद पता चला कि हाफिज़ साहेब ने नक्शे इसलिए मंगवाए थे क्योंकि वे मुंबई में लैंड प्रोपर्टी में इन्वेस्ट करना चाहते थे.

०७. हमने हाफिज़ साहेब से पूछा कि; "क्या मुंबई में हुए हमले में आपका हाथ है?" इसके जवाब में उन्होंने हमें बताया कि मुंबई में हुए हमले में उनका हाथ नहीं है. इससे यह साबित होता है कि मुंबई पर हुए हमले में हाफिज़ साहेब का हाथ नहीं है.

०८. हमने हाफिज़ साहेब से यह भी पूछा कि; "क्या लस्कर-ए-तैयबा दहशतगर्दों का आरगेनाइजेशन है?" इसके जवाब में उन्होंने हमें बताया कि; "नहीं जनाब. लश्कर-ए-तैयबा तो एक कव्वाली गाने वाला आरगेनाइजेशन है."

हमारे पास उनकी बात पर विश्वास न करने का कोई कारण ही नहीं था. इससे साबित होता है कि मुंबई हमले में हाफिज़ साहेब का हाथ नहीं है.

०९. हमने नेशनल जियोग्राफी और डिस्कवरी जैसे चैनलों से भी खोज की लेकिन उनके पास भी इन नौजवानों द्बारा करांची से मुंबई तक किये गए सफ़र की विडियो रिकॉर्डिंग नहीं है. ऐसे में यह साबित होता है कि जिन लोगों ने मुंबई पर हमला किया वे पाकिस्तानी नहीं थे.

१०. हमें हाफिज़ सईद और कसाब के कुछ विडियो मिले हैं लेकिन हमने देखा कि हर विडियो में हाफिज़ साहेब कसाब को कव्वाली की बारीकियां समझा रहे हैं. इससे हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि कसाब मुंबई गया भी होगा तो कव्वाली गाने की प्रैक्टिस करने.

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हिन्दुस्तानी सरकार ने उसे आतंकवादी समझकर अरेस्ट कर लिया.

हम हिन्दुस्तानी सरकार से यही कहेंगे कि अगर उसके पास मुंबई पर हुए हमले की प्लानिंग और हमले का शुरू से लेकर अंत तक विडियो रिकॉर्डिंग हो तो हमें मुहैय्या कराये. फिर हम सोचेंगे कि हाफिज़ साहेब से पूछताछ की ज़रुरत है या नहीं.

Thursday, April 16, 2009

हम पुरस्कार से हैं कि पुरस्कार हमसे है?




सरकार ने धोनी को सूचित किया. बोली; "तुम तो पद्मश्री हो."

धोनी बोले; "हमें मालूम है. तुम हमें क्या बताओगी?"

सरकार बोली; "सॉरी. हमें लगा कि आपको बता दें."

धोनी जी बोले; "हमें हनुमान समझने की भूल न करो. हम क्या-क्या हैं, हमें मालूम है."

सरकार बोली; "तो अपना पुरस्कार लेने आ जाओ."

धोनी जी बोले; "तुम हमें सम्मान के लायक समझ रही हो. लेकिन हम बदले की भावना से काम करने वालों में से नहीं हैं. हम तुम्हें सम्मान के लायक नहीं समझते."

सरकार बोली; "यह कोई नई बात नहीं है. हमें वैसे भी सम्मान के लायक तो कोई नहीं समझता. हमारा सम्मान मत कीजिये लेकिन पुरस्कार का तो सम्मान कीजिये."

धोनी जी बोले; "ऐसे पुरस्कारों को हम सम्मान नहीं बल्कि सामान समझते हैं. वैसे भी ये पद्मश्री आई पी एल से बड़ा है क्या?"

सरकार बोली; "अरे, बड़ा तो है ही."

धोनी बोले; "काहे का बड़ा है? पुरस्कार देश में दिया जायेगा और आई पी एल विदेश में होगा. ऐसे में कौन बड़ा?"

सरकार बोली; "अरे पद्मश्री सबको नहीं मिलता."

धोनी बोले; "क्यों? सचिन को तो मिला हुआ है."

सरकार बोली; " इसीलिए तो सचिन ने आकर बाकायदा राष्ट्रपति से अपना पुरस्कार लिया था."

धोनी बोले; "सचिन को आई पी एल में हमसे कम पैसे भी तो मिले थे. ऐसे में वे पुरस्कार तो लेंगे ही."

सरकार बोली; "सचिन भी तो महान खिलाड़ी है. अगर वे पुरस्कार लेने आये तो आप क्यों नहीं?"

धोनी बोले; "काहे के महान? आज मेरे पास ज्यादा विज्ञापन हैं कि सचिन के पास?"

सरकार बोली; "पता नहीं."

धोनी बोले; "जब पता नहीं तो बहस काहे करती हो? ट्रेड रेकॉर्ड्स देखो. उसके बाद बात करो."

सरकार बोली; "ये पुरस्कार...."

धोनी बोले; "अरे क्या पुरस्कार पुरस्कार की रट लगाये जा रही हो? हम पुरस्कार से हैं कि पुरस्कार हमसे है?"

धोनी जी इतना कहकर दक्षिण अफ्रीका चले गए.

पुरस्कार धोनी जी का पंथ देखते-देखते सोच रहा है; "फालतू में गले पड़ने गए? न जाने कितने लेखक, कलाकार, अपना काम ईमानदारी से करते-करते इस दुनियाँ से चले गए. मेरी तरफ ताकते रहते थे. इस अभिलाषा के साथ कि मैं उन्हें मिल जाता तो उनका जीवन सफल हो जाता....... "

Wednesday, January 21, 2009

.....ऐसे में काहे का आम आदमी जी?




प्रधानमंत्री जैसे ख़ास लोगों को सारी सुविधायें रहती हैं. इतनी सुविधायें कि वे कुछ भी कर सकते हैं. अब देखिये न, दो दिन पहले प्रधानमन्त्री आम आदमी बन गए. आम आदमी के रूप में तमाम अखबारों में फोटू-सोटू भी छप गए. फोटू के नीचे जानकारी दी गई कि प्रधानमंत्री अपना ड्राइविंग लाईसेंस रि-न्यू कराने के लिए ख़ुद गए.

अखबारों और टीवी न्यूज़ चैनल के कैमरामैन भाई उमड़ पड़े. ये देखने और दिखाने के लिए कि आम आदमी के रूप में प्रधानमंत्री कैसे लगते हैं?

लेकिन सच बताऊँ तो मुझे तो बिल्कुल वैसे ही लगे जैसे प्रधानमंत्री बने लगते हैं. वही पहनावा, वही चाल-ढाल और वही मुस्कुराने का अंदाज़. आम आदमी कब मुस्कुराता है, ये बात कैमरा पकड़े पत्रकार नहीं बता सकते. कहते हैं, समरथ को नहीं दोष गोसाईं. आख़िर वे समर्थ हैं. प्रधानमंत्री हैं. ऐसे में जब चाहे, जो चाहें, बन सकते हैं. यहाँ तक कि आम आदमी भी.

कोई आम आदमी थोड़े न हैं जो कुछ बनने के सपने ही देखता रहता है. बन नहीं पाता.

लेकिन उन्हें अचानक आम आदमी बनने की ज़रूरत क्यों आन पड़ी? क्या देखना चाहते थे कि आम आदमी बनकर कैसा महसूस होता है? या ये देखना चाहते थे कि प्रधानमंत्री को आम आदमी के रूप में देखकर लोगों का रिएक्शन कैसा रहेगा?

खैर, सोचने लगा तो मुझे लगा शायद आम आदमी बनने का उनका निर्णय अपने सचिव के साथ हुई बातचीत के दौरान लिया गया हो. कैसी बातचीत?

शायद ऐसा कुछ हुआ हो...

प्रधानमंत्री: भाई, बहुत दिन हो गए, कुछ नया नहीं हो रहा है. बड़ी बोरियत के दिन हैं.

सचिव: हाँ सर. मुझे भी यही लग रहा है. जबसे न्यूक्लीयर डील पास हुई है, लगता है जैसे करने के लिए कुछ बचा ही नहीं. मुंबई में हुआ आतंकवादी हमला भी अब पुराना हो गया. संसद का अधिवेशन भी ख़त्म हो गया. सत्यम के डूबने के बाद आपने वक्तव्य दे ही दिए कि किसी को बख्शा नहीं जायेगा. दो-तीन दिन से मैं भी बड़ा बोर हो रहा हूँ.

प्रधानमंत्री: सही कह रहे हो. अब तो पकिस्तान भी कुछ करने की एक्टिंग करने लगा है. अब उसके ख़िलाफ़ कहने को भी कुछ नहीं रहा. ऐसे में बोरियत के दिन काटे नहीं कटते. २६ जनवरी की तैयारियां चल रही हैं लेकिन उससे मन नहीं बहलता.

सचिव: सर, आपका कहना बिल्कुल ठीक है. वैसे एक सुझाव दूँ सर?

प्रधानमंत्री: ज़रूर दीजिये. आप सचिव हैं. आप सुझाव नहीं देंगे तो कौन देगा? आप दीजिये. उसे मानना है कि नहीं, वो मुझपर छोड़ दीजिये.

सचिव: सर, बोरियत दूर करने के लिए आप नई फ़िल्म देख लीजिये. चांदनी चौक टू चाइना.

प्रधानमंत्री: हो गया? छ महीने हो गए जब से लेफ्ट वालों ने हमें सपोर्ट देना बंद किया है. और आप ऐसी फ़िल्म देखने का सुझाव भी दे रहे हैं जिसका नाम चांदनी चौक टू चाइना है. कहाँ गई है आपकी बुद्धि?

सचिव: सॉरी सर. वो क्या हुआ कि मैं कल ही अक्षय कुमार के साथ बैठकर फ़िल्म देख कर आया हूँ न. उन्होंने दिल्ली में हुए फ़िल्म के प्रीमियर के पास मुझे भेजे थे. वहां मिली आवाभगत से मैं प्रभावित हो गया इसीलिए लेफ्ट वाली बात भूल गया.

प्रधानमंत्री: राइट. सॉरी आपको कहना ही चाहिए.

सचिव: सर, आपको एक बात बतानी थी.

प्रधानमंत्री: कौन सी बात?

सचिव: वो क्या है सर, कि आपका ड्राइविंग लाईसेंस रि-न्यू करने का समय आ गया है. कल मोटर वेहिकल डिपार्टमेंट वालों को बुला लूँ?

प्रधानमंत्री: बुला लीजिये. लेकिन बुलाने की क्या ज़रूरत है? उन्हें बोलिए रि-न्यू करके भेज देंगे.

सचिव: ठीक है सर. वैसा ही करता हूँ.

प्रधानमंत्री: .....अरे रुकिए. उन्हें ये सब कहने की ज़रूरत नहीं है.

सचिव: क्यों सर?

प्रधानमंत्री: मैं सोच रहा हूँ कि मैं ख़ुद ही चला जाऊं.

सचिव: आप ख़ुद ही जायेंगे! लेकिन सर...लाईसेंस के लिए आप ख़ुद ही जायेंगे? ऐसा तो आम आदमी करते हैं.

प्रधानमंत्री: अरे इसीलिए तो मैं जाना चाहता हूँ. ये बढ़िया रहेगा न. कल एक घंटे के लिए मैं आम आदमी बनना चाहता हूँ. मज़ा आ जाएगा आम आदमी बनाकर. कल एक घंटे के लिए ही सही, बोरियत से छुटकारा तो मिलेगा.

सचिव: ठीक कहा सर. मैं अभी सारे अखबारों और टीवी न्यूज़ चैनल वालों को ख़बर पहुँचा देता हूँ कि कल आप मोटर वेहिकल डिपार्टमेंट के कार्यालय पर आम आदमी बनेंगे.

प्रधानमंत्री मोटर वेहिकल डिपार्टमेंट के कार्यालय जाकर फोटू खिंचा आम आदमी बन गए. लेकिन ये भी बनना कोई बनना है? न तो वहां दलालों को घूस दिया. न तो डिपार्टमेंट के बाबू ने उन्हें घंटे भर बिठा के रखा. न ही बाबू ने फाइल न मिलने के बहाने दूसरे दिन आने के लिए कहा.

ऐसे में काहे का आम आदमी जी? आम आदमी तो हम उन्हें तब मानते जब उन्हें किसी दलाल को पकड़कर घूस देकर अपना काम करवाना पड़ता.

Tuesday, December 16, 2008

ब्लागाचार्य के खडाऊं का उपयोग श्रेयस्कर रहता...




हर देश के अपनी रीति-रिवाज़ होते हैं. मुझे तो आज ही पता चला कि ईराक में परंपरागत रिवाज़ के अनुसार ईराक वाले 'गुडबाय किस' देने के लिए जूते फेंककर मारते हैं. बढ़िया परम्परा है. अपने देश में जूता शादी-व्याह में चुराकर कर पैसा वसूल करने के काम आता है या फिर हनुमान जी के मन्दिर के सामने चुराए जाने के. एक बार उत्तर प्रदेश के विधानसभा में मार-पीट के काम आया था लेकिन उसके बाद हमारे विधायक इस परम्परा को आगे नहीं ले जा सके.

आज अखबार में पढ़ा और टीवी पर देखा कि संयुक्त राज्य अमेरिका के नए राज्य ईराक में किसी पत्रकार ने जॉर्ज बुश के ऊपर जूते फ़ेंक कर 'गुडबाय किस' देने की कोशिश की. ईराक का पत्रकार था, लिहाजा निशाना बिल्कुल सही था. लेकिन जॉर्ज बुश ठहरे अनुभवी आदमी. साल २००० में जब राष्ट्रपति पद के लिए शपथ लेने जाने वाले थे उसी समय इनके पिताश्री ने ईराक की मिसाईलों से बचने की ट्रेनिंग दी थी. लिहाजा बुश बाबू फेंके गए जूते को डाज कर गए. वे फट से अपना सर झुका गए.

ऐसे मौकों पर सिर झुकाना श्रेयस्कर रहता है.

पत्रकार को जूते फेंककर मारने का अधिकार है और राष्ट्रपति बुश को उससे बचने का. इसी को लोकतंत्र कहते हैं.

खैर इस घटना पर देश-विदेश के नेताओं और श्रेष्ठजनों ने अपने-अपने वक्तव्य दिए. पेश है उन्ही वक्तव्यों में से कुछ चुनिन्दा वक्तव्य.

लालू प्रसाद जी: "हम त पहिले ही कह रहे थे कि बजरंग दल और आरएसएस वाले ऐसा कुछ करने के फिराक में हैं. इनलोगों के ऊपर बैन लगना चाहिए. हमें पता है कि ये पत्रकार बजरंग दल का है."

लालकृष्ण आडवानी: "हमारा मानना है कि पोटा जैसे कानून फ़िर से लाने की ज़रूरत है. अगर कठोर कानून नहीं लाये गए तो इस तरह की घटनाएं होती रहेंगी."

शिवराज पाटिल: "हम इस घटना की 'निर्भर्त्सना' करते हैं. हमें राष्ट्रपति बुश के परिवार के साथ सहानुभूति है. आई बी की रिपोर्ट थी कि जूते फेंके जा सकते हैं लेकिन पत्रकार कौन से पाँव का जूता फेंकेगा, इसके बारे में जानकारी नहीं थी. ऐसे में इस तरह की घटनाओं को रोकना कठिन हो जाता है......."

अमिताभ बच्चन: "अब देखिये जो हो गया उसे भूल जाना चाहिए. हमें याद रखना चाहिए कि बुश भी इसी दुनियाँ में रहेंगे और वो पत्रकार भी.....पूज्यनीय बाबू जी कहा करते थे कि आदमी को भविष्य की और देखना चाहिए. मुझे उनकी कविता याद आ रही है; "जो बीत गई वो बात गई...."

प्रकाश करात: "ये घटना साम्राज्यवाद के मुंह पर जूता है. हमें तो इस बात का पछतावा है कि केवल एक पत्रकार के पास जूता था. हम चीन की सरकार से कहेंगे कि वे सस्ते जूते बनाकर ईराक के पत्रकारों को मुहैया करवाए जिससे आने वाले दिनों में ज्यादा जूते फेंके जा सके."

बाबा रामदेव: "राष्ट्रपति बुश ने जिस तरह से फेंके गए जूते से अपना बचाव किया उससे ऐसा प्रतीत होता है कि वे नियमित कपालभांति और अनुलोम-विलोम प्राणायाम करते हैं...हे हे हे...बड़ी-बड़ी बीमारी ठीक हो जाती है. हमने देखा है कि ह्रदय-रोग, कैंसर जैसी बीमारियाँ भी प्राणायाम से ठीक हो जाती हैं..... हाँ..हाँ..करो बेटा...करो..."

नटवर सिंह: " ये घटना हमारे लिए अच्छी ख़बर है. अब मैं सोच रहा हूँ कि अपने पुत्र जगत सिंह को एकबार फिर से ईराक भेज दूँ. हमारे पास मौका है कि फ़ूड फॉर आयल प्रोग्राम की तरह ही हम शूज फॉर आयल प्रोग्राम में हिस्सा ले सकते हैं....."

कुलदीप नैय्यर: "इस तरह की घटनाएं विचलित ज़रूर करती हैं लेकिन हमारा मानना है कि भारत और पकिस्तान एक दिन फिर से एक देश हो जायेंगे. जूता फेंकने की ये घटना दोनों देशों की दोस्ती के आड़े नहीं आएगी...."

अटल बिहारी वायपेयी : "राजधर्म नहीं निभाना लोकतंत्र में अच्छी बात नहीं है....केवल राजधर्म निभाना ही ज़रूरी नहीं है...काजधर्म निभाना भी उतना ही ज़रूरी है....मेरी इस बात को ध्यान में रखते हुए पत्रकार ने अपना 'काजधर्म' निभाया...मैंने आज ही एक नई कविता लिखी है;

गीत नया गाता हूँ, मीत नया पाता हूँ
'गुडबाय किस' देने का धर्म निभाता हूँ
हार नहीं मानूंगा, रार भी मैं ठानूंगा
बुश के कपाल पर जूता बरसाता हूँ

गीत नया गाता हूँ....

अर्जुन सिंह: " मैं ईराक की संसद में ये मुद्दा उठाऊंगा कि केवल जूते फेंककर मारने की इजाजत न दी जाए. मैं संसद में ऐसी घटनाओं के लिए चप्पल और सैंडिलों, जिन्हें दलित वर्ग का समझा जाता रहा है, के लिए सत्ताईस प्रतिशत का आरक्षण देने की अपनी मांग रखूंगा... मेरा विचार है कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय इस पत्रकार को मुक़दमा लड़ने के लिए धन मुहैय्या करवाए..हम उसे धन ज़रूर देंगे ताकि वो अपना बचाव कर सके,

सद्दाम हुसैन: "बुश ने ईराक में कुर्दों की तरह रेबेल होने का काम किया. पत्रकार की जगह मैं होता तो बुश के ऊपर पॉँच टन नर्व गैस फेंक मारता..."

कार्ल मार्क्स: "ये एक ऐतिहासिक घटना है जो एक न एक दिन होनी ही थी...."

मार्टिन लूथर किंग: "मैं एक ऐसे ही विश्व की कल्पना करता था जहाँ हर पत्रकार जूते फेंक कर मारने के लिए स्वतंत्र हो...."

जॉर्ज बुश सीनियर: " हमारी कोशिशों की वजह से ईराक में इतनी डेमोक्रेसी आ गई कि पत्रकार भी शासकों के ऊपर जूते फेंक सकते हैं. सद्दाम के रहते ऐसा नहीं हो पाता...."

मनेका गाँधी: "हमने पता लगा लिया है कि फेंका गया जूता चमड़े का था. इसका मतलब किसी एक जानवर को मारकर उसका चमड़ा इस्तेमाल किया गया होगा. हम इस पत्रकार के ख़िलाफ़....."

अमर सिंह: "इस पत्रकार को जूते खरीदने के लिए मैंने पैसा नहीं दिया. माननीय मुलायम सिंह जी ने हमसे कहा होता तो हम ज़रूर उसे पैसा......"

बिल गेट्स: "हम कोशिश करेंगे कि विन्डोज़ के अगले एडिशन में हम ऐसा सॉफ्टवेर इंटीग्रेट करें जिससे जूते फेंकने से पहले सही कोण और रफ़्तार के साथ-साथ सामने वाले के सिर झुकाने के रफ़्तार का सही पता लगाया जा सके."

फिडेल कास्त्रो: "जूता फेंकने के लिए हम इस पत्रकार को एक दर्जन सिगार गिफ्ट करेंगे...."

सचिन तेंदुलकर: "जब तक ये पत्रकार जूता फेंकने को एन्जॉय करता है, इसे फेंकते रहना चाहिए...."

इमाम बुखारी: "एक काफिर के ऊपर जूते फेंकने के लिए हम इस पत्रकार को पाँच करोड़ का इनाम देंगे...."


और अंत में कुछ ब्लॉगर क्या कहते हैं....

अनूप शुक्ल जी: " सही है. मौज लेना चाहिए. फ़िर चाहे वो जूता फेंककर ही क्यों न मिले."

समीर लाल जी: " क्या जूता फेंका है. इसके लिए उस पत्रकार को साधुवाद और बधाई."

आलोक पुराणिक जी: "क्या केने... क्या केने...जमाये रहिये जी.."

डॉक्टर अनुराग आर्य: "रेड लाईट के पास वाले फुटपाथ पर जो जूते मिलते हैं, उन्हें फेंकने में आसानी होगी..."

कुश: " इस प्रहार के लिए ब्लागाचार्य के खडाऊं का उपयोग श्रेयस्कर रहता..."

प्रमोद सिंह जी: "धुंध में बटोरे गए जूतों को अकबका कर फेंकने की....पत्रकार ने सलाम सॉरी सलम वाला काम किया है..."

अजित वडनेरकर जी: "अभी कुछ कह पाना मुश्किल है. पहले मैं जूता और पत्रकार जैसे शब्दों की व्युत्पत्ति पर पोस्ट लिखूंगा उसके बाद ही इस घटना पर कोई टिप्पणी करूंगा..."

Monday, December 8, 2008

आशा है फोन का सदुपयोग होता रहेगा...




अभी तक फोन का 'उचित' उपयोग करके हिन्दी फिल्मों में ही भ्रम च गलतफहमी पैदा की जाती थी. आज से नहीं, सालों से. हम फिल्मों से बहुत कुछ सीखते ही हैं. इसलिए फ़ोन के इस कंट्रीब्यूशन को असली ज़िन्दगी में भी उतारने की कोशिश चलती रहती है.

अभी तक हुई तमाम कोशिशों में हाल के दिनों में एक अंतर्राष्ट्रीय कोशिशें भी जुड़ गई. सुनने में आया कि किसी अति टैलेंटेड बन्दे ने फोन का सदुपयोग करते हुए प्रणव मुख़र्जी बनकर पकिस्तान के राष्ट्रपति को धमका दिया. बोला; "हम आपके देश पर हमला कर देंगे."

फोन की माया देखिये कि पकिस्तान के राष्ट्रपति भी युद्ध की तैयारी करवाने लग गए. दुनियाँ को बता डाला कि भारत के विदेशमंत्री फ़ोन करके धमकियाते हैं.

मैं तो कहूँगा जी कि जिसने भी ये फ़ोन किया होगा, बड़ा ही टैलेंटेड बन्दा होगा जी. आजतक सुनते आए हैं कि लोग नेताओं और अभिनेताओं की नक़ल का काम स्टेज पर हँसाने के लिए करते हैं. लेकिन फ़ोन करके दूसरे देश के राष्ट्रपति को युद्ध की धमकी का काम पहली बार हुआ है.

वैसे भी नक़ल करने के लिए मिमक्री आर्टिस्ट बड़े लोगों को चुनते हैं. कोई अमिताभ बच्चन की नक़ल करता है तो कोई बाजपेयी जी की. खैर, वे लोग इस तरह से बोलते हैं कि उनकी नक़ल करना आसान है. लेकिन प्रणव मुख़र्जी की नक़ल!

उनकी नक़ल करने के लिए अद्भुत टैलेंट चाहिए. बड़ा कलेजे वाला बन्दा होगा जी. कलेजे वाला नहीं होता तो प्रणव मुख़र्जी की नक़ल कैसे करता? उनकी आवाज़, उनकी ग़लत हिन्दी, उनकी ग़लत अंग्रेजी और न जाने क्या-क्या. पता नहीं कैसे बोला होगा जी प्रणव मुख़र्जी की आवाज़ में?

मैंने तो एक बार सुना था कि मुख़र्जी बाबू ने अमेरिका में अंग्रेजी में भाषण दिया. भाषण ख़त्म हुआ तो किसी अमरीकी नेता ने लिखित अर्जी दी. ये लिखते हुए कि; "इन्होने जो अपने भाषण में कहा उसका अंग्रेजी अनुवाद उपलब्ध करवाया जाय."

अब कोई बन्दा ऐसे नेता की नक़ल कर ले तो अति टैलेंटेड होगा ही. कितनी बार बन्दे को "वी" की जगह "उई" बोलना पड़ा होगा. बोला होगा; "उई उविल रेड इयोर कान्ट्री."

बड़ी मेहनत का काम किया होगा बन्दे ने.

एक तरफ़ तो कोई नकली प्रणव मुख़र्जी बनकर फ़ोन करता है और उसे सच मान लिया जाता है. वहीँ दूसरी तरफ़ असली बराक ओबामा किसी कांग्रेस वूमेन को फ़ोन करते हैं तो वो फ़ोन उठाकर रख देती हैं. ये कहते हुए कि; "मुझे मालूम है कि तुम बराक ओबामा नहीं हो."

खैर, अब भाई लोगों ने ट्रेंड सेट कर ही दिया है. आशा है लोग इसे आगे बढायेंगे.

कल को सुनने में आ सकता है कि कोई भारत का सांस्कृतिक मंत्री बनकर पाकिस्तानी सांस्कृतिक मंत्री को फोन कर देगा. बोलेगा; " हमारे मन में इच्छा जागी है कि आपके साथ होली खेलें. आ जाइये."

पाकिस्तान का मंत्री तुंरत हवाई जहाज पकड़कर भारत में. होली खेलने. ऐसे में सांस्कृतिक सहयोग के नए-नए द्वार खुल जायेंगे.

और तब तक खुले रहेंगे जबतक अगला आतंकवादी हमला नहीं होता.

Sunday, November 30, 2008

अढतालीस सौ का फायदा देखिये न आप.... दो सौ का नुक्शान क्यों देखते हैं?




मुंबई में हुआ आतंकवादी हमला ख़त्म हो चुका था. नेता जी पुलिस मुख्यालय के सामने हलकान से घूम रहे थे. कभी इधर जाते तो कभी उधर. पता नहीं उनकी कौन सी चीज खो गई थी. हाथ में एक कागज़ था. उस कागज़ को देखते और फिर इधर-उधर घूमने लगते. कभी कोई पुलिस वाला मिल जाता तो उससे बात करते और उदास हो जाते.

एक पत्रकार टकरा गया. नेता जी ने उसे नमस्ते कहा. पत्रकार ने उनके नमस्ते का जवाब दिया. जवाब मिलते ही नेता जी पूछ बैठे; "आपके पास शहीदों की लिस्ट है क्या?"

पत्रकार ने उन्हें अजीब नज़र से देखा. शायद सोच रहा था कि इन्हें अचानक शहीदों की इतनी फ़िक्र क्यों होने लगी?

उसने सवाल दाग दिया. उसने पूछा; "क्या हो गया? आपका कोई रिश्तेदार शहीद हो गया क्या?"

नेता जी ने भी पत्रकार को अजीब नज़र से देखा. जैसे कह रहे हों; " बड़ा बकलोल आदमी है. किसने इसे पत्रकार बना दिया? नेता का रिश्तेदार कैसे शहीद हो सकता है?"

फिर उन्होंने कहा; "नहीं, वो बात नहीं है. मेरे पास शहीदों की एक लिस्ट है. मैं बस ये चाहता था कि आपके पास भी कोई लिस्ट हो, तो मैं टैली कर लूँ."

पत्रकार नेता जी को घूरने लगा. उसके मन में फिर वही सवाल आया कि इन्हें अचानक शहीदों की फ़िक्र क्यों होने लगी? खैर, उसने नेता जी से दुबारा सवाल किया; "लेकिन आप शहीदों की लिस्ट देखकर क्या करेंगे?"

नेता जी को लगा कि अब इसने सवाल ठीक किया है. लिहाजा उन्होंने शहीदों की लिस्ट देखने का कारण बताया. बोले; "बात ये है कि मैं बहुत देर से कोशिश कर रहा हूँ लेकिन पुलिस का कोई बड़ा अफसर मिल ही नहीं रहा जो शहीद हुआ हो लेकिन उसके परिवार वालों को इनाम न मिला हो."

पत्रकार को नेता जी की परेशानी समझ में आ गई. उसने कहा; "लेकिन बड़े अफसर तो शहीद हुए ही हैं. आप अगर इनाम देना ही चाहते हैं तो घोषणा कर दें."

नेता जी पत्रकार को देखने लगे. फिर बोले; "अरे क्या घोषणा कर दूँ? मैं यहाँ आता उससे पहले ही नेताओं ने शहीद हुए बड़े पुलिस अफसरों के परिवार वालों को इनाम की घोषणा कर दी. अजीब बात है. जरा सा देरी हो जाए तो यहाँ लोग गला काटने को खड़े हैं. ऊपर से दूसरे राज्य के नेता महाराष्ट्र के शहीद पुलिस अफसरों को इनाम दे रहे हैं. ये कहाँ तक ठीक है?"

पत्रकार बोला; "आपका कहना भी ठीक है. होना तो ये चाहिए कि जिस राज्य में हमला हुआ है पहले वहां के नेता इनाम की घोषणा कर दें, उसके बाद अगर कोई शहीद बचे तो दूसरे राज्य के नेताओं को इजाजत मिले. दिल्ली में हमला हुआ था तो भी यूपी के एक नेता ने इनाम की घोषणा की थी. यहाँ हुआ तो गुजरात के नेता ने इनाम की घोषणा कर दी."

पत्रकार द्बारा अपनी बात का समर्थन होता देख नेता जी पुलकित हो गए. बोले; "मैं तो कहता हूँ कि शहीद पुलिस वालों को इनाम घोषणा के मामले में राज्य के नेताओं को फिफ्टी परसेंट का रिजर्वेशन मिलना चाहिए. मैं ये बात असेम्बली में उठाऊँगा."

पत्रकार नेता जी की दूरदृष्टि से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका. फिर भी उसने नेता जी को समझाया; "चलिए कोई बात नहीं. जो हुआ सो हुआ. शहीद हुए बड़े पुलिस अफसरों के परिवार वालों को इनाम मिल चुका है तो आप किसी कांस्टेबल के परिवार वालों को इनाम की घोषणा कर दें."

पत्रकार की बात सुनकर नेता जी बोले; "और कर ही क्या सकते हैं? अब तो मुझे किसी छोटे-मोटे कांस्टेबल के परिवार को ही इनाम देकर संतोष करना पड़ेगा."

पत्रकार उनकी बात सुनकर बोला; "ठीक है. अब अगली बार याद रखियेगा. अगली बार जब आतंकवादी हमला होगा तो जल्दी वारदात की जगह पहुंचियेगा ताकि इनाम की घोषणा कर सकें."

पत्रकार की बात सुनकर नेता जी बोले; "आप वारदात की जगह पर पहुचने की बात कर रहे हैं? मैं तो मुठभेड़ शुरू होने से पहले ही इनाम की घोषणा कर दूँगा. मैं तो पहले ही कह दूँगा कि हमले में जो भी पुलिस वाला शहीद होगा उसके परिवार वालों को मैं इनाम दूँगा."

इतना कहकर नेता जी शहीद हुए पुलिस कांस्टेबल का नाम नोट करने लगे. साथ में मन ही मन सोच रहे थे कि 'जल्दी ही कोई आतंकवादी हमला हो तो मुझे इनाम घोषणा करने का मौका मिलेगा.'

चलते-चलते:

आर आर पाटिल, गृहमंत्री हैं. महाराष्ट्र जैसे राज्य के. भारत में हुए सबसे बड़े आतंकवादी हमले को "बड़े शहरों में इस तरह की छोटी-छोटी घटनाएं होती रहती हैं" बता गए. कह रहे थे कि आतंकवादी तो पॉँच हज़ार लोगों को मारने आए थे. हमारी कोशिश की वजह से केवल दो सौ लोग मारे गए. अढतालीस सौ का फायदा देखिये न आप. दो सौ का नुक्शान क्यों देखते हैं?

उनके सर में बहुत बाल हैं. उसी का असर है कि मुंह से ऐसे बाल-सुलभ कमेन्ट निकलते रहते हैं. जय(?) महाराष्ट्र?

Monday, November 10, 2008

न जाने कौन सा गुंडा वजीर बन जाए




हाल ही में दिल्ली विश्वविद्यालय के कुछ छात्रों ने विरोध के 'लोकतांत्रिक तरीकों' में इजाफा कर डाला. 'हम हैं नए, अंदाज़ क्यूं हो पुराना?' के सिद्धांत पर काम करते हुए इन छात्रों ने अपने ही एक प्रोफेसर के मुंह पर थूक दिया. असहमति होने पर नारे लगाना, मार-पीट करना और तोड़-फोड़ जैसे टुच्चे और पुराने तरीकों का महत्व कम होता जा रहा है. ऐसे में छात्रों का कर्तव्य है कि वे नए तरीकों का अविष्कार करें. आख़िर पुराने तरीकों को नए छात्र कितने दिन ढोयेंगे?

विरोध के लिए उठाये गए इस कदम को लोकतंत्र के परिपक्व होने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जाय या नहीं, इसपर समाजशास्त्री दिन-रात एक कर रहे होंगे. हो सकता है जल्द ही कोई वक्तव्य भी दें. लेकिन हम तो आज आपको उस छात्र का एक साक्षात्कार बंचवाते हैं, जिसने प्रोफेसर के मुंह पर थूका था.

पत्रकार: नमस्कार, थूकन प्रसाद जी. मुझे बड़ी खुशी है कि मैं आपका इंटरव्यू ले रहा हूँ. ये बताईये, प्रोफेसर साहब के मुंह पर थूकने के बाद, आपके गौरव में कितना इजाफा हुआ?

थूकन प्रसाद: नमस्कार जी. मेरा इंटरव्यू लेकर आपको खुशी होनी ही चाहिए. आपको खुशी नहीं होगी, तो मैं इसका विरोध करूंगा. अब विरोध के नाम पर मैं कुछ भी कर सकता हूँ. आपके मुंह पर थूक भी सकता हूँ. तो अब गेंद आपके पाले में है. ये आप पर निर्भर करता है कि आप खुश होंगे, या....

पत्रकार: नहीं-नहीं, मैं खुश हूँ. सचमुच खुश हूँ. आपको मेरा विरोध करने की ज़रूरत नहीं है.

थूकन प्रसाद: ये अच्छा हुआ कि आप समझ गए. हम तो चाहते हैं कि किसी को हमारे विरोध का सामना न करना पड़े. वैसे अब मैं आपके सवाल पर आता हूँ. गौरव में इजाफा होने के बारे में पूछा है आपने. तो ये समझिये कि बहुत इजाफा हुआ है. जो लोग हमें जानते नहीं थे, वे जानने लगे हैं. साथ में डरने लगे हैं कि...

पत्रकार: समझ गया. वैसे ये बताईये कि प्रोफेसर के मुंह पर थूकने के बाद आपको कैसा लगा?

थूकन प्रसाद: थूकने के बाद हम हल्का महसूस करने लगे. हमें लगा जैसे शरीर से कोई बोझ उतर गया.

पत्रकार: मतलब ये कि आपका थूक बड़ा वजनदार है.

थूकन प्रसाद: हाँ, वही समझ लें.

पत्रकार: अच्छा, ये बताईये कि थूकने की प्रेरणा आपको कहाँ से मिली?

थूकन प्रसाद: प्रेरणा कहीं से मिले, ये ज़रूरी नहीं. वैसे अगर सच कहूं तो थूकने की प्रेरणा हमें बोर होने से मिली. बोरियत जो न कराये. नारे लगाकर, तोड़-फोड़ और मार-पीट वगैरह करके हम बोर हो गए थे. ऐसे में हमने सोचा कि कुछ नया किया जाय. नए करने की ललक ने हमें थूकने के लिए प्रेरित किया.

पत्रकार: वैसे ये बताईये, थूकने में आपने जो परफेक्शन हासिल किया है, वो क्या किसी प्रैक्टिस का नतीजा है? मेरा मतलब ऐसा कैसे हुआ कि आपने थूका और थूक सीधे प्रोफेसर साहब के मुंह पर गिरा?

थूकन प्रसाद: ये अच्छा सवाल किया है आपने. देखिये लोगों को ये लगता है कि थूकना साधारण काम है. लेकिन आपको बता दूँ कि थूकना कोई मामूली काम नहीं है. बड़ा परफेक्शन चाहिए इस काम में. वैसे थूकने में हमारे इस परफेक्शन के पीछे मेरे पिताजी का हाथ है.

पत्रकार: पिताजी का हाथ है! आपके कहने का मतलब आपके पिताजी आपको थूकने की प्रैक्टिस करवाते थे?

थूकन प्रसाद: नहीं, इस मामले में आप मुझे एकलव्य कह सकते हैं. असल में हमने बचपन से ही अपने पिताजी को पान और खैनी खाकर थूकते हुए देखा है. नौवीं कक्षा तक आते-आते हम ख़ुद पान मसला खाने लगे. उसके बाद पान का सेवन शुरू किया. हम विश्वविद्यालय के प्रांगन में पान मुंह में दबाये एक जगह बैठे थूकते रहते हैं.

पत्रकार: आप तो वाकई में एकलव्य हैं. अच्छा, ये बताईये कि प्रोफेसर के मुंह पर थूकने के पीछे कोई और कारण था क्या?

थूकन प्रसाद: हाँ. एक और कारण था. हम भारतीय संस्कृति के प्रति अपना उत्तरदायित्व निभा रहे थे.

पत्रकार: भारतीय संस्कृति के प्रति उत्तरदायित्व निभा रहे थे? वो कैसे?

थूकन प्रसाद: वो ऐसे कि हम बचपन से तमाम मुहावरे सुनते आए हैं. जैसे "मैं उसके मुंह पर न थूकूं."..."मैं उसके द्वार पर थूकने न जाऊं...मैं थूक कर चाटने वालों में से नहीं हूँ...मैं...वैस भी हम जिस पार्टी से हैं, भारतीय संस्कृति के रक्षा की जिम्मेदारी उसी पार्टी ने अपने कंधे पर ले रखी है. अब मेरे ऐसा करने से दो-दो काम हो गए. संस्कृति की रक्षा भी और पार्टी का काम भी.

पत्रकार: समझ गया, समझ गया. अच्छा ये बताईये, इस घटना के बाद आपको लगता है कि विरोध के इस नए तरीके का इस्तेमाल आम हो जायेगा?

थूकन प्रसाद: होना ही चाहिए. लेकिन उससे पहले मैं चाहूँगा कि इस तरीके के अविष्कार का क्रेडिट मुझे मिले.

पत्रकार: और क्या-क्या चाहते है आप?

थूकन प्रसाद: हमारी मांग है कि थूक कर विरोध जताने को संविधान में मौलिक अधिकार के रूप में जगह दी जाय. और इस तरीके के इस्तेमाल पर छात्रों को सत्ताईस प्रतिशत का आरक्षण भी मिले.

पत्रकार: और अगर सरकार ने आपकी मांग को ठुकरा दिया तो?

थूकन प्रसाद: तो हम सरकार का विरोध करते हुए उसके ऊपर थूक देंगे. उसके बाद हम इंतजार करेंगे कि हमारी पार्टी की सरकार आए और संविधान में उचित संशोधन करके थूकने के अधिकार को मौलिक अधिकार बना दे. अगर संविधान में संशोधन के लिए हमारी पार्टी के पास बहुतमत नहीं रहा तब हम उस दिन का इंतजार करेंगे जब हम ख़ुद मंत्री बनेंगे और....

पत्रकार उनकी बात सुनकर कुछ मन ही मन बुदबुदा उठा. ध्यान से सुनने पर पता चला कि पॉपुलर मेरठी साहब का एक शेर टांक रहा था. शेर है;

अजब नहीं कभी तुक्का जो तीर हो जाए
दूध फट जाए कभी तो पनीर हो जाए
मवालियों को न देखा करो हिकारत से
न जाने कौन सा गुंडा वजीर हो जाए

Wednesday, November 5, 2008

मुबारकबाद लीजिये....गंगा राष्ट्रीय नदी हो जायेगी.




सरकार ने घोषणा की है कि वो जल्द ही गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित कर देगी. ये भविष्य में होने वाली घोषणा के लिए एक घोषणा है. घोषणा करना सरकार चलाने की प्रक्रिया में सबसे महत्वपूर्ण काम है. जो सरकार काम नहीं करती, वो घोषणा करती है. कह सकते हैं कि घोषणा से ही सरकार चलती है. अब जैसे किसी जिले में सबकुछ सूख गया हो, पीने का पानी न हो, आदमी और जानवर मर रहे हों, फसलें नष्ट हो रही हों लेकिन जब तक सरकार उसे सूखाग्रस्त जिला घोषित नहीं करती, तबतक वहां पर सूखा नहीं पड़ता.

गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित करने की ज़रूरत अचानक क्यों पड़ गई? हमारे पूर्वजों का और हमारा सामान्य ज्ञान जितना भी कमज़ोर हो, हमें पता है कि गंगा कई हज़ार साल से भारतवर्ष में ही बहती है. फिर इस तरह की घोषणा करने का क्या मतलब? इसे क्या गंगा नदी का राष्ट्रीयकरण माना जाय? कहीं सरकार को ये डर तो नहीं था कि जल्दी से इसे राष्ट्रीय नदी घोषित करो, नहीं तो कहीं कोई इसे अंतर्राष्ट्रीय नदी घोषित न कर दे?

ये तो जी वैसा ही हो गया जैसे कोई कहे कि; "दिल्ली जो भारतवर्ष की राजधानी है, भारत का ही एक शहर है." या फिर ये कि; "मनमोहन सिंह, जो भारतवर्ष के प्रधानमंत्री हैं, भारत के ही नागरिक हैं."

क्या कारण हो सकता है गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित करने का? कुछ भी कारण हो सकता है. हम तो केवल अनुमान लगा सकते हैं. हो सकता है ऐसी घोषणा इसलिए की गई कि सरकार तीन-चार महीनों से अर्थ-व्यवस्था के बारे में की जाने वाली घोषणाओं से बोर हो गई हो. या फिर इसलिए कि किसानों को कर्जमाफी की घोषणा के बाद कोई महत्वपूर्ण घोषणा नहीं हुई थी. या फिर हो सकता है कि आतंकवाद से निबटने की घोषणा करते-करते सरकार बोर हो गई हो और सोचा हो कि फॉर अ चेंज एक अलग तरह की घोषणा की जाय.

फिर सोचता हूँ कि चलिए ये गनीमत है कि सरकार ने गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित किया. सोचिये अगर ये घोषणा करती कि गंगा एक नदी है, तो क्या होता? कुछ नहीं होता. कर भी क्या सकते हैं? हाँ, अगर कोई सवाल पूछता तो सरकार ऐसी घोषणा करने के बाद सफाई भी दे देती कि;

"वो क्या है जी कि हमें डाऊट था कि इतने प्रदूषण और गन्दगी झेल रही गंगा को क्या हम अब भी नदी कह सकते हैं? आज आपको बताते हुए हमें अपार हर्ष हो रहा है कि जो कमीशन हमने बैठाया था उसने तरह-तरह के करतब दिखाकर इस बात की पुष्टि की है कि गंगा को अगले पचीस साल तक नदी कहा जा सकता है. अब पचीस साल के बाद क्या होगा, उसकी गारंटी हम नहीं दे सकते."

लेकिन अब अगर इस तरह की घोषणा हो ही जायेगी तो क्या कर सकते हैं. लेकिन एक बात मन में है. गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित करने से राजनीति के गरमाने का चांस बढ़ तो नहीं जायेगा? नहीं...आप बुरा न मानिए. ऐसा तो मैं इसलिए सोच रहा था कि हर घोषणा के बाद राजनीति गरम न हो तो ऐसी घोषणा का क्या फायदा?

इतने घटक, इतनी पार्टियाँ, इतने नेता हैं. किसी न किसी तरफ़ से कुछ न कुछ तो बात आ ही सकती है.

कल को करूणानिधि कह सकते हैं कि गोदावरी को राष्ट्रीय नदी क्यों घोषित नहीं किया गया? सरकार ने तमिल भावनाओं का आदर नहीं किया. हम सरकार से अपने एम पी वापस ले लेंगे. लालू जी कह सकते हैं कि कोसी को राष्ट्रीय नदी घोषित क्यों नहीं किया गया? हम अपने एमपी वापस ले लेंगे. कम्यूनिष्ट कह सकते हैं कि गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित करना धर्मनिरपेक्षता के ख़िलाफ़ है. ये बेचारे अपने एमपी वापस नहीं ले सकते. इनके एमपी तो बहुत पहले वापस हो गए हैं. उल्फा को नाराजगी का एक और बहाना मिल सकता है. उल्फा वाले कह सकते है कि ब्रह्मपुत्र को राष्ट्रीय नदी क्यों घोषित नहीं किया गया? इसके विरोध में हम दस बम और फोड़ेंगे. मायावती कह सकती हैं कि उन्होंने 'जमुना' के किनारे ताज कॉरिडोर बनवाया तो 'जमुना' को राष्ट्रीय नदी क्यों नहीं घोषित किया गया. वे तो यह भी कह सकती हैं कि गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित करना मनुवादियों का कुकृत्य है.

कहीं ऐसा तो नहीं कि गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित करके सरकार अपना क़र्ज़ उतार रही है. कहीं ये तो नहीं सोच रही कि गंगा से भी राष्ट्र को पहचान मिली है. अब वक्त आ गया है कि इसको राष्ट्रीय नदी बनाकर क़र्ज़ उतार दिया जाय.

गंगा को राष्ट्रीय नदी बनाकर सरकार क्या करने वाली है? प्रदूषण कम कर सकती है? अगर राष्ट्रीय नदी घोषित करना ही प्रदूषण कम करने की पहली सीढ़ी है तो भइया ये काम पहले ही कर देते. पचीस साल बीत गए, इतना पैसा खर्च हुआ. एक्शन प्लान चालाया गया. सेमिनार हुए. बहस हुई. क्या ज़रूरत थी ये सब करने की? राष्ट्रीय नदी घोषित कर देते और प्रदूषण अपने आप कम हो जाता. और अगर इस तरह की घोषणा से ही नदियों की रक्षा होनी है तो मैं तो कहूँगा कि बाकी नदियों में मीठा पानी नहीं बह रहा है. उनमें अमृत नहीं जा रहा. उनमें भी प्रदूषण ही जा रहा है. बाकी की नदियाँ भी भारत की ही हैं. उन्हें भी राष्ट्रीय नदियाँ घोषित करके काम ख़तम करिए.

या फिर ऐसा इसलिए हो रहा है कि गंगा की पूजा होती है और गंगा के बहाने सरकार वोटरों की पूजा करने निकली है?

Wednesday, October 22, 2008

अब तो चंद्रयान का सहारा है............




कल भारत टेस्ट मैच जीत गया. ये भी कह सकते हैं कि ऑस्ट्रेलिया हार गया. वही, नज़र का चक्कर है. विशेषज्ञ बता रहे थे कि भारत की जीत बहुत महत्वपूर्ण है. ये विशेषज्ञ लोग कोई नई बात क्यों नहीं कहते? जब भी भारत जीतता है, उस जीत को महत्वपूर्ण बता देते हैं. कभी हारने पर नहीं कहते कि ये हार बहुत महत्वपूर्ण है.
कह रहे थे कि अब भारतीय क्रिकेट नई ऊंचाई पर पहुँच जायेगा.

पिछले दस सालों से सुनते आ रहे हैं. जब भी टीम जीतती है तो भारतीय क्रिकेट नई ऊंचाए छूने के लिए निकल पड़ता है. इस तरह से हर दो साल पर एक बार भारतीय क्रिकेट को नई ऊंचाई मिल ही जाती है. लेकिन नई ऊंचाई छूने के बाद छ महीने में ही फिर नीचे आ जाता है. किसी ने विशेषज्ञ से इसके बारे में पूछ लिया तो शायद जवाब मिले; "नई ऊंचाईयों को छूने के लिए पहले नीचे तो आना ही पड़ेगा. इसलिए जब भी क्रिकेट नीचे आए, तो डरने की ज़रूरत नहीं. बस ये ध्यान में रखिये कि नई ऊचाईयों को छूने के लिए नीचे आया है."

वैसे कुछ तो प्रगति हुई है. ऐसा हम मानते हैं. पहले तो क्रिकेट बोर्ड को जब नया अध्यक्ष मिल जाता था, तभी कहा जाता था कि भारतीय क्रिकेट अब नई ऊंचाई छूएगा. इस लिहाज से प्रगति महत्वपूर्ण है.

नई ऊचाईयों से याद आया कि भारत ने स्पेस यात्रा में भी नई ऊचाई छू ली है. चंद्रयान पृथ्वी से चाँद की तरफ़ रवाना हो चुका है. वैज्ञानिक बता रहे थे कि ये यात्रा महत्वपूर्ण है. देश में सबकुछ महत्वपूर्ण ही हो रहा है. इस लिहाज से हम महत्वपूर्ण देश के महत्वपूर्ण इतिहास का हिस्सा बन रहे हैं. ये एक महत्वपूर्ण बात है.

चंद्रयान जब चाँद पर जायेगा तो वहां की मिट्टी, हवा वगैरह का निरिक्षण च परिक्षण करेगा. हमारे वैज्ञानिक देश की हवा, मिट्टी, पानी वगैरह जांचकर बोर हो लिए होंगे. शायद इसीलिए अब चाँद की मिट्टी वगैरह देखना चाहते हैं. बात भी तो सही है. यहाँ की मिट्टी में प्लास्टिक से लेकर तमाम रसायन इस कदर मिल चुके हैं कि उन्हें भी कोई नई मिट्टी चाहिए बोर होने के लिए. एक बार मिट्टी, हवा वगैरह से आश्वस्त हो गए तो फिर वहीँ चलकर बसने का प्रबंध भी कर सकते हैं. पृथ्वी पर हाऊसिंग मार्केट का हाल बुरा है. चाँद पर शायद कुछ अच्छा हो.

ऐसी बात सोचकर हम कन्फर्म हो लेते हैं कि हम "क्यों ना जन्नत को भी दोज़ख में मिला दें यारों" की तर्ज पर काम कर रहे हैं.

ये जन्नत और दोज़ख से याद आया कि चंद्रयान तिरंगा लेकर गया है. तिरंगे को चाँद पर फहराया जायेगा. आप पूछ सकते हैं कि तिरंगे से जन्नत और दोज़ख का क्या सम्बन्ध. तो मैं कहना चाह रहा था कि हमारे ही देश में जन्नत है जहाँ की कई जगहों पर हम तिरंगा नहीं फहरा पाते. वैसे ठीक भी है. दुनियाँ को बता तो सकेंगे कि हम चाँद पर फहरा कर आए हैं. तिरंगा.

वैसे सुना है कि सरकार एक बात से चिंतित है. कुछ लोगों ने आगाह किया है कि चंद्रयान की ये यात्रा कवियों को बुरी लग सकती है. कविगण जिस चाँद को न जाने क्या-क्या बताकर कविता लिख लेते थे, उन सारी उपमाओं पर खतरा मंडरा रहा है.

वैसे हम तो जी आस लगाए बैठे हैं कि चंद्रयान वापस लौट कर आएगा तो देश में मंहगाई की समस्या से लेकर तमाम और समस्याओं के समाधान के लिए कुछ उपाय सुझायेगा. देखते हैं, क्या होता है.

चंद्रयान बिना किसी रुकावट के चाँद की तरफ़ बढ़ रहा है. वहीं हमारे शहरों में रुकावटें ही रुकावटें पैदा हो रही हैं. किसी शहर में परीक्षा देने में रुकावट आ रही है तो किसी शहर में हड़ताल और बंद की वजह से रुकावट आ रही है. लेकिन हर शहर में एक ही बात कामन है; गुंडागर्दी. बिना गुंडागर्दी के न तो परीक्षाएं दी जा सकती हैं, और न ही रोकी जा सकती हैं. और तो और गुंडागर्दी बिना बंद भी नहीं करवाया जा सकता. रुकावट केवल गुंडागर्दी में नहीं आ रही है.

अब तो चंद्रयान का सहारा है. शायद चंद्रयान कुछ मदद करे.

मदद से याद आया कि कानून की मदद से एक दिन के लिए ही सही, ठाकरे बाबू को पुलिस लाकअप में डाल दिया गया. वैसे उसी कानून की मदद से वे निकल भी गए. शायद लाकअप का ही डर था कि हमारे शहर में ममता बनर्जी ने कल ही एलान किया कि वे और उनकी पार्टी अब राज्य में बंद, रास्ता रोको, रेल रोको और ऐसी ही तमाम पुण्य वाले काम नहीं करेंगी. ऐसा जागरण क्यों हुआ? पता नहीं क्यों हुआ. ममता जी ने नहीं बताया.

कुछ लोग कह रहे हैं कि नैनो बंगाल से निकल ली, इसलिए ममता जी के पास कोई काम नहीं है. किसी के निकल लेने से नेता लोग बेरोजगार हो जाते हैं. कुछ ये भी कह रहे हैं कि राज ठाकरे की हालत से ममता जी डर गई हैं. खैर, जो भी हो, कम से कम पार्टी तो बंद नहीं करेगी. ये राहत की बात है.

वैसे मन में ये बात भी आती है कि बंद न करने की बात एक नेता ने की है. ऐसे में उनकी बात को वे ख़ुद कितना महत्वपूर्ण मानती हैं, ये तो समय बतायेगा. लेकिन एलान के तौर पर उनकी ये बात महत्वपूर्ण है.

रहनी ही चाहिए. आख़िर देश में सबकुछ महत्वपूर्ण हो रहा है.

वैसे अब तो चाँद पर चंद्रयान पहुँच जायेगा. इसलिए चांदनी पर उदय प्रताप जी के दो छंद पढिये....

जब से संभाला होश, मेरी काव्य-चेतना में,
.................................मेरी कल्पना में आती-जाती रही चांदनी
आधी-आधी रात को चुराकर आंखों से नींद,
.................................खेत-खलियान में बुलाती रही चांदनी
सुख में तो सभी संग रहते किंतु दुःख में भी
.................................मेरे साथ-साथ गीत गाती रही चांदनी औ;
जाने किस बात पर मैं चांदनी को भाता रहा
.................................और बिना बात मुझे भाती रही चांदनी


कल रात चुपके से खिड़की के रास्ते
.............................उतर आई किरणों की डोरी-डोरी चांदनी
देखता रहा मैं ठगा-ठगा सा परियों के रूप
.............................को भी मात करती थी गोरी-गोरी चांदनी
मेरे सिरहाने आ तकिये पर बैठ गई
.............................थपकी दे गाने लगी लोरी-लोरी चांदनी
मुझको तो भेज दिया सपनों की दुनिया में
.............................जाने कब निकल गयी चोरी-चोरी चांदनी

Wednesday, October 8, 2008

अहा, ब्लॉग मौसम भी क्या है...




पिछली पोस्ट पर डॉक्टर अमर कुमार जी ने अपनी टिपण्णी में लिखा "ब्लागिंग के मौसम के बारे में बताओ गुरु." उनकी टिप्पणी से लगा कि उन्होंने ने ठान लिया है कि; "आज इस ब्लॉगर की खटिया खड़ी कर दो." मेरे कहने का मतलब ये कि किसी को गुरु कह दो, बस. उसके बाद उसकी खटिया खड़ी होनी तय है.....:-)

अब ब्लागिंग के मौसम के बारे में हम क्या बताएं? ब्लागिंग का मौसम तो फील करने के लिए होता है. यही एक मौसम है जिसमें सारे मौसम समाहित हैं. ब्लागिंग का मौसम अपने हिसाब से गरमी, सर्दी, बरसात वगैरह बना लेता है. अपने हिसाब से चलता है. अपने हिसाब से लिखवा लेता है. गाँधी जयन्ती है तो गाँधी जी को हैपी बर्थ डे बोल डालो. बाढ़ आ गई तो बाढ़ पर हाथ फेर लो.

अमर सिंह पिछले कई दिनों से पलटी मार रहे हैं. सोचा उनकी पलटी पर ही कीबोर्ड कुर्बान कर दूँ. लेकिन फिर सोचा कि असल में तो लिखने की बात तब आती जब वे पलटी न मारते. अमर सिंह जी पलटी न मारें तब जाकर कोई न्यूज़ बनती है. वे पलटी मार लें तो कैसी न्यूज़?

कहीं ख़बर पढ़ी कि उन्होंने ने इंसपेक्टर शर्मा के परिवार को जो चेक दिया था उसमें कुछ 'मिस्टिक' थी. पता चला कि दस लाख के चेक में एक के सामने केवल पाँच शून्य थे. चेक ग़लत निकला. एक बार सोचा कि उनके ईनाम वाले चेक पर कुछ लिख डालूँ. फिर सोचा लोग हँसेंगे. वे ये सोचते हुए हँसेंगे कि मैं अमर सिंह की पढ़ाई-लिखाई पर उंगली उठा रहा हूँ. वो भी तब जब वे कैमरे के सामने 'अंग्रेज़ी बोल लेते हैं.'

ब्लॉगर बंधु ये सोचते हुए भी हंस सकते हैं कि; "इस ब्लॉगर को ये भी नहीं पता कि अमर सिंह को कैश में लेन-देन करने की आदत है. ऐसे में वे अगर चेक लिखने का महान कष्ट करेंगे तो चेक में गलती तो होनी ही है."

लिहाजा अमर सिंह जी भी आज हाथ से निकल लिए.

फिर मन में लाऊडली सोचा कि नैनो बंगाल से निकल ली. नैनो पर ही लिख डालूँ. लेकिन नैनो तो बंगाल से बाहर चलकर गुजरात पहुँच गई. कार एक्सपर्ट बता रहे थे; "फुएल एफिसियेंट कार है." साबित भी हो गया. पहली ड्राइव में ही बंगाल से गुजरात. बिना कहीं रुके हुए. बिना किसी रिफिलिंग के. इसे कहते हैं तगड़ा विज्ञापन. एक फुएल एफिसियेंट कार का इससे अच्छा विज्ञापन और क्या होगा?

लेकिन सोचता हूँ अभी तो इसे गुजरात पहुंचे एक दिन ही हुए हैं. अब कोई गुजरात पहुँच जाए और उसपर चर्चा न हो, ऐसा हो नहीं सकता. नैनो तो न जाने कितनो के नयनों में गड़ रही होगी अभी. नैनो पर लिखने का मौसम सेट इन करने वाला है.

विज्ञापन की बात पर याद आया कि विज्ञापन के साधन बढ़ते जा रहे हैं. रेडिओ, टीवी, अखबार वगैरह तो थे ही, अब दुर्गापूजा के पंडालों ने भी विज्ञापन का भार संभाल लिया है. मैं उन विज्ञापनों की बात नहीं कर रहा जो कई सालों से इन पंडालों पर विराजते थे. जैसे गोरेपन की क्रीम से लेकर दिमाग को ठंडा रखने वाला तेल.

मैं तो नए विज्ञापनो की बात कर रहा हूँ. आप पूछेंगे कि नया माने किस चीज का विज्ञापन? तो ब्लॉगरगण आपको ये बताते हुए अपार हर्ष हो रहा है कि इस बार हमारे शहर में दुर्गा पूजा के पंडालों में फिल्मों के और फिल्मी कलाकारों के विज्ञापन और पोस्टर देखने को मिल रहे हैं. कल ही एक नई 'फिलिम' के हीरो हिरोइन लोग आए थे. उनलोगों ने पूजा भी की और फिलिम का विज्ञापन भी किया.

अच्छी बात है. कोई बड़ा भार बाँट लेना ही किसी भी व्यवस्था के पुख्ता होने की निशानी है. और यहाँ मैं केवल विज्ञापन-व्यवस्था की बात कर रहा हूँ.

फिलिम से बात याद आई. कल हमारे एक मित्र किडनैप नामक फिलिम के शिकार हो गए. खूब काम करके परेशान थे तो फिलिम देखने चले गए. सिनेमा हाल से मुझे तीन बार फोन किया. हर बार एक ही बात; "सर, ऐसी घटिया फिलिम मैंने अपनी ज़िन्दगी में नहीं देखी."

उनकी बात सुनकर मुझे याद आया कि जब ये पिछली बार 'फिलिम' देखने गए थी, तब भी यही बात कही थी. देखते-देखते थक गए तो सिनेमा हाल से निकल लिए. फिर फ़ोन किया मुझे. मैंने पूछा; "फ़िल्म ख़त्म हो गई?"

वे बोले; "बीच में ही छोड़कर आ गया. लगभग एक घंटा तक वेट किया कि अब शायद कुछ अच्छी लगे..अब शायद कुछ अच्छी लगे. लेकिन ऐसा हुआ नहीं."

मैंने पूछा; "तब तो ठीक ही हुआ जो बीच में ही छोड़कर निकल लिए."

वे बोले; "निकलने के सिवा और कोई रास्ता नहीं था. वेट करते-करते लगा जैसे कोई क्रिकेट मैच देख रहे हैं जिसमें भारत को जीतने के लिए दस ओवर में १६५ रन चाहिए लेकिन विकेट केवल तीन बचे हैं. बस, निकल लिए."

विकेट से याद आया कि सौरव गांगुली ने कल संन्यास ले लिया. अरे भइया, क्रिकेट से संन्यास. आपलोग भी कैसी-कैसी बातें सोचते हैं? बहुत महान खिलाड़ी थे. ऐसा टीवी चैनल वाले बता रहे हैं. वही टीवी चैनल वाले जो अभी परसों तक उनकी बखिया उधेड़ने का कोई मौका हाथ से जाने नहीं देते थे.

लेकिन मैं तो इस बात से उत्साहित हैं कि सौरव अब बंगाल की सेवा करेंगे. मतलब देश की सेवा तो खूब की लेकिन अब बारी है बंगाल की सेवा करने की. मतलब ये कि राजनीति वगैरह से बंगाल का भला करें. उनके जैसे लीडर की ज़रूरत भी है.

आज हमारे शहर के अखबार भी परेशान थे. बता रहे थे कि; " नैनो और सौरव, दोनों की वजह से इस साल बंगाल के दुर्गापूजा में खटास आ गई है."

हाँ, दुर्गापूजा से याद आया कि आज सुबह से ही लोग दुखी हैं. आज आखिरी दिन जो है दुर्गापूजा का. ये ठीक नहीं है. दुर्गापूजा केवल तीन दिन हो, ये अच्छी बात नहीं. कुछ तो बदले. पिछले सौ सालों से केवल तीन दिन की दुर्गापूजा. नवमी के दिन तक सबकुछ ख़तम. लाखों रुपये खर्च करके पंडाल बनते हैं. चंदा उगाहा जाता है. साल भर का वेट और केवल तीन दिन! बहुत नाइंसाफी है ये.

मैं कहता हूँ नवमी के बाद दशमी भी तो आती है. दशमी के बाद एकादशी. एकादशी के बाद...कहने का मतलब ये कि कम से कम पन्द्रह दिन तो चलाना ही चाहिए.

दुर्गापूजा से याद आया कि दुर्गापूजा पर ही कुछ लिख लेता. पिछले साल इस मौसम में दुर्गापूजा पर हुई निबंध प्रतियोगिता में एक प्रतियोगी का निबंध पोस्ट कर दिया था. वो भी रिजेक्टेड निबंध. अब इस बार क्या लिखें?

अच्छा इस बार आपको एक नई बात बताता हूँ. कई सालों से दुर्गापूजा के पंडालों को नंबर देने की प्रथा वगैरह चलती ही आ रही है. नंबर के साथ-साथ इनाम में पैसे भी मिलते हैं. पहले केवल एक कंपनी ऐसी प्रतियोगिता को स्पांसर करती थी. बाद में इस तरह के पुरस्कारों की बाढ़ आ गई. कोई टीवी चैनल, कोई बैंक, कोई न्यूज़पेपर और न जाने कौन-कौन, ऐसी प्रतियोगिता चलाते हैं.

ऐसी प्रतियोगिता में जज की कुर्सी पर पहले साहित्यकारों, सम्पादकों, कलाकारों, पेंटरों वगैरह का कब्ज़ा था. सारे के सारे अपने बंगाल के. लेकिन केवल बंगाल के जजों को देखकर शायद लोग बोर हो गए थे. इसीलिए इस बार हमारे शहर के एक न्यूज़पेपर ने यहाँ के अमेरिकन कंसुलेट जनरल को जज बना दिया. उन्होंने अपना जजमेंट दे दिया. न्यूज़पेपर बहुत खुश है. आज उन्होंने ख़बर भी छापी है.

धत्त तेरे की...ब्लागिंग के मौसम के बारे में लिखने बैठा और न जाने क्या-क्या लिख गया. खैर, अब लिख ही दिया तो पोस्ट कर देते हैं.

ब्लॉगरगण इसी में ब्लागिंग के मौसम को खोजने की कोशिश करें. अगर कहीं दिखे तो सूचित भी करें.

Monday, October 6, 2008

देश विकट 'मौसमीय' दिनों से गुजर रहा है....




पहले जीवन सरल था. कुल मिलकर तीन-चार मौसमों में बंटा जीवन. धीरे-धीरे बीत जाता था. चार मौसम कम्प्लीट होने से ही जीवन का एक साल कम हो जाता.

ये अलग बात है कि किसी की उम्र के बारे में कोई जानना चाहता तो पूछ लेता; "वैसे भाई साहब ने कितने बसंत देख लिए?"

भाई साहब ये सोचते हुए ढेर हो लेते कि; 'ये ऐसा क्यों सोचते हैं कि मैंने सिर्फ़ बसंत ही देखा है. जेठ की गरमी, भादों की मूसलाधार बारिश और जनवरी की शीतलहर क्या मेरे बिहाफ पर कोई और देख गया है? भादों का कीचड़ और कोसी की बाढ़ भी तो मैंने देखी है. उसके बारे में क्यों नहीं पूछते? क्यों नहीं पूछते कि; "छाती तक लगे हुए पानी से कितने साल गुजरे हो?"

लेकिन जैसा कि शुकुल जी कहा है; "लोग बीते हुए समय को अपनी सुविधा से देखते हैं. जो अच्छा मिलता है, उसी को याद करते हैं."

अब जाहिर सी बात है कि इन मौसमों में सबसे बढ़िया बसंत को ही याद करेंगे.

पहले लोग अपने जीवन को मौसम-वाईज जी लेते थे. ज्यादा कठिन जीवन नहीं था. ये सोचते हुए जीते कि; 'बस ये गरमी से बच गए तो बरसात किसी तरह से झेल ही लेंगे. बरसात में आई बाढ़ से बच गए तो फिर सर्दी की शीतलहर. और उससे बच गए तो बसंत में थोड़ा चैन रहेगा. बसंत तक साईकिल चल गई तो एक साल बीत लेगा. आज पचपन के हैं, एक साल बाद छप्पन के हो जायेंगे. ऐसा करते-करते जीवन बीत जायेगा.'

ठीक वैसे ही जैसे टेस्ट मैच ड्रा करने के चक्कर में कोई महान बैट्समैन सेशन वाईज बैटिंग करने की फिराक में रहता है.

ज्यादातर होता भी ऐसा ही था. गरमी गई नहीं कि बरसात आ गई. बरसात शुरू हुई तो लोग सोचने लगते कि; 'बस तीन महीने और, फिर सर्दी आ जायेगी.' सर्दी बीतने के कगार पर आई तो ऋतुराज आ जाते थे. डेढ़-दो महीने रहते. कुछ कवितायें वगैरह लिखवाते. होली खेलने का मौका देते. पूरा माहौल रंगीन करने के बाद गरमी को आने का रिक्वेष्ट करते हुए निकल लेते.

लेकिन अब जीने का मामला उतना सरल नहीं रहा. मौसमों की संख्या बढ़ गई है. तीन-चार मौसम तो भगवान ने बना कर दिए थे. अब अगर किसी को कुछ मिले तो उसका कर्तव्य है कि वो उसमें अपनी हैसियत और औकात के हिसाब से इजाफा कर ले.

हमने अपनी हैसियत के हिसाब से इजाफा भी किया. अपनी मेहनत से कई सारे मौसमों का आविष्कार किया. त्योहारों का मौसम, चुनावों का मौसम, भगदडों का मौसम, विस्फोटों का मौसम, ढिलाई का मौसम, मंहगाई का मौसम, पढाई का मौसम, लिखाई का मौसम, इश्क का मौसम, मुश्क का मौसम, शिक्षा का मौसम, परीक्षा का मौसम वगैरह वगैरह. (अगर किसी मौसम का नाम लेना भूल गया तो उस मौसम से आग्रह है, कि क्षमा करें.)

कुल मिलाकर जीवन अब विकट मौसमीय बन चुका है. हालत ये है कि इस मौसमीय माहौल में जीते हुए चिंता और चिंतन, दोनों अलग लेवल पर पहुँच चुके हैं.

चिंता की बात ये कि इतने सारे मौसम समूचे देश में एक साथ सेट-इन भी नहीं करते. दो महीने पहले महाराष्ट्र के लोग बरसात से दो-दो हाथ कर चुके तब जाकर बिहार के लोगों को मौका मिला. बेचारे पूरा एक महिना बेहाल रहे. तब जाकर कहीं गुजरात का नंबर आया. गुजरात वाले खाली हुए तो बरसात से जूझने का नंबर उड़ीसा वालों का आया.

ऐसे ही एक महिना पहले दिल्ली के लोग विस्फोटों के मौसम से गुजरे तब जाकर कर्णाटक वालों का, गुजरात वालों का, जयपुर वालों का नंबर आया. अब चिंता इस बात की है कि अगला नंबर किसका है?

कभी-कभी तो लगता है कि इतने सारे राज्य हुए ही क्यों? न तो इतने राज्य होते और न ही विस्फोटों के मौसम को इतनी चिंता होती.

अब यही देखिये न, बंगाल में पूजा का मौसम आ गया तो साथ ही साथ ये चिंता भी है कि कहीं विस्फोटों का मौसम यहीं न सेट-इन कर जाए. एक साथ दो-दो मौसम से जूझने के लिए तैयारी चल रही है. पूजा की तैयारी तो कर रहे हैं लेकिन मन में सोचते जा रहे हैं कि; "अच्छा, कौन से दिन निकलें कि सुरक्षित घर लौट आयें. पुलिस वाले बता रहे हैं कि पूजा के दौरान विस्फोट होने का चांस है. अगर होगा तो कौन से दिन हो सकता है? कहीं ऐसा तो नहीं कि घर से पूजा देखने निकले और घर वापस ही नहीं लौटे?"

कहीं मौसम का शिकार तो नहीं हो जायेंगे? अभी मंहगाई के मौसम से जूझ ही रहे थे कि ये लोग सर पर चढ़ आए.

बंगाल वाले इससे परेशान हैं तो छत्तीसगढ़ में चुनावों का मौसम आ गया है. वे बेचारे भी परेशान. मंहगाई के मारे लोगों को अगर चुनावों के मौसम से भी गुजरना पड़े तो फिर उनके कष्ट का कोई अंत नहीं. फिर तो वहां चुनाव के मौसम के बाद मंहगाई के मौसम के ख़त्म न होने की संभावना असीम है.

करीब सात-आठ महीने बाद असम में एक बार फिर से हिंसा का मौसम सेट-इन कर चुका है. अब ये कितने दिन चलेगा ये देखने की बात है. अभी दस दिन हुए थे वहां बाढ़ का मौसम आए हुए. अब हिंसा का मौसम भी आ गया तो तो दोनों मौसम मिलकर धूम मचाएंगे.

दिल्ली में पिछले तीन-चार महीने से न्यूक्लीयर डील और खरीद-फरोख्त का मौसम चल रहा है. पिछले दस-पन्द्रह दिन तक इफ्तार पार्टियों का मौसम रहा. अब रामलीला का मौसम आएगा. वो ख़तम होगा तो विदेशी नेताओं के आने का मौसम शुरू होगा.

सर्दियाँ आने को हैं. ऐसे में कश्मीर घाटी में आतंकवादी मौसम सेट-इन करेगा. आतंकवादी बेचारे अगर अभी बॉर्डर नहीं क्रॉस कर सके तो उन्हें सर्दी का मौसम बहुत सताएगा. पूरे पांच महीने का इंतजार उनके लिए ठीक नहीं रहेगा.
ऐसे में अच्छा यही रहेगा कि आतंकवादी मौसम अभी आ जाए.

कुल मिलाकर देश विकट 'मौसमीय' दिनों से गुजर रहा है. गुजरना ही पड़ेगा. आख़िर इतने सारे मौसमों का आविष्कार हमने ही तो किया है. कोई दूसरा थोड़ी न आएगा इनसे गुजरने के लिए.