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Thursday, September 22, 2011

ऐ मेरे दाता.....




गाने के रियलिटी-शो में दस साल के बच्चे ने हारमोनियम बजाते हुए एक ग़ज़ल इस तरह से गाई जैसे बड़े-बड़े उस्ताद गाते हैं. उसने मेंहदी हसन स्टाइल में ग़ज़ल के शेरों को सुर और मुर्कियों के बल पर पहले तो कंट्रोल में लिया फिर उन्हें पटका. उसके बाद उनका कॉलर पकड़ कर उनके ऊपर चढ़ बैठा. काफी देर तक वह उन्हें तरह-तरह से रगेदता रहा. कुछ मिनटों तक ग़ज़ल पर आवाज़ की ठनक, सरगम की सनक और राग का प्रहार होता रहा. जैसे-जैसे उसपर बच्चे का आक्रमण बढ़ता जा रहा था, ग़ज़ल के शेर कमज़ोर पड़ते जा रहे थे. दर्शक ताली बाजा रहे थे और जज-गुरु लोग़ बच्चे की आवाज़ के अनुसार अपना हाथ ऐसे ऊपर-नीचे कर रहे थे जैसे कोई बच्चा हवा में हाथों की गाड़ी बनाकर उसे उड़ाता है.

एक समय ऐसा आया जब लगा कि बेचारे शेर अब पूरी तरह से पस्त हो चुके हैं. उनमें अब कोई जान नहीं रही कि गायक बच्चा उन्हें और रगेदे. समय सीमा, समय का अभाव या फिर शायद ग़ज़ल के माफीनामे की वजह से बच्चे ने प्लेटफॉर्म पर धीरे-धीरे रुकने वाली रेलगाड़ी स्टाइल में अपना गाना रोका. स्टैंडिंग ओवेशन की बहार आ गई. ऐंकर ने बच्चे को दोनों हाथों से उठा लिया. महागुरु आश्चर्यचकित होने की अपनी चिर-परिचित मुख मुद्रा लुटाने लगीं. कुल मिलाकर विकट रियलटीय टेलीविजन के दर्शन होने लगे.

कुछ देर तक बच्चे को अपनी गोद में रखने के बाद ऐंकर ने उसे नीचे उतारा और अपने ऐन्करीय धर्म का पालन करते हुए शुरू हो गया; "गुरु कैलाश? क्या कहना चाहेंगे आज आप?"

गुरु कैलाश चूल्हे पर रखे पानी के पहले उबाल की तरह शुरू होना ही चाहते थे लेकिन शब्दों की शॉर्ट-सप्लाई के कारण अदबदा गए. कुछ क्षणों तक अ ब स करने के बाद और काफी मशक्कत और खोजबीन के बाद जब कुछ शब्द उनके मुँह लगे तो वे शुरू हो गए; "आज~~~ मैं मेरे दाता से कहना चाहूँगा कि ऐ मेरे दाता, ऐ मेरे मालिक, ऐ मेरे भगवान इन्हें ऐसे ही रखना. इनके ऊपर कृपा करना. मैं तो कहूँगा कि आज मेरे दाता ने इन्हें अपना आशीर्वाद दिया...ये भटकने न पाए... आज इनका यश, इनका ऐश्वर्य पूरी दुनियाँ देख रही है. बच्चे तो भगवान की मूरत होते हैं. 'प्रथ्वी' पर आज इनका जो नाम हो गया है.... आज पूरा ब्रह्माण्ड इन्हें दुआएं दे रहा है. तो ऐ मेरे दाता.......महागुरु, आज तो इसने बावला कर दिया."

जज-गुरु की गलती नहीं है. वे और क्या करेंगे जब ऐसे बिकट टैलेंटेड बच्चे प्रतियोगी बनकर स्टेज पर उतर जायेंगे और सुरों के चौके-छक्के जड़ने लगेंगे? टैलेंटेड, मेहनती और इतने परफेक्ट कि सुनकर मन में आता है जैसे इनका गला बाकायदा ऑर्डर देकर बनवाया गया है. पॉवर-पॉइंट प्रजेंटेशन के बाद. बिलकुल परफेक्ट. कहीं कोई दोष नहीं. हाँ, परफेक्ट होने के चक्कर में इन बच्चों ने अपना बचपना कहाँ और किसके पास गिरवी रख छोड़ा है वह शोध और जांच, दोनों का विषय है. अगर शोध या जांच के बाद यह पता चल भी जाए कि कहाँ और किसके पास रखा गया है तो भी उस बचपने को वापस पाने का कोई अर्थ नहीं क्योंकि तबतक ये इतने उस्ताद हो चुके होते हैं कि इन्हें बचपने और मासूमियत के तीर-कमान की ज़रुरत ही नहीं रहती.

गुरु, महागुरु, गेस्ट गुरु, बैंड वाले, दर्शक, संगीत प्रेमी वगैरह इन बच्चों को देखकर दाँतों तले ऊँगली दबाते हैं. और फिर ऐसा क्यों न हो? दस साल के बच्चे के मुँह से राहत फ़तेह अली खान की आवाज़ इस तरह से निकलती है कि अगर वे सुन लें तो सोचने लग जायें कि; 'ये बच्चा मुझसे मेरी आवाज़ कब चुरा ले गया?' सुनने वालों को यह भी लग सकता है कि 'दो-तीन महीने के लिए ये बच्चा राहत बाबू का गला उधार मांग लाया है.'

न तो इन बच्चों की आवाज में कोई कमी है और न ही हुनर में. अगर किसी ऑड-डे पर ख़ुदा न खास्ता इनसे कोई गलती हो जाती है तो जज साहब उन्हें बताते हैं कि; "ये जो हरकत-उल-आवाज़ तुमने ऐसे ली थी, उसे गाने में रफ़ी साहब ने वैसे लिया है", या फिर; "तुमने गाने को चार से उठाया. अगर तीन से उठाया होता तो जो ऊंची आवाज़ में तुम्हारा सुर गया, वह नहीं जाता."

सब तरह के नुक्श निकाल कर भी जज-गुरु यह कहना नहीं भूलते कि; "फिर भी तुमने कमाल का गाया."

गेस्ट-गुरु के रूप में आया कोई संगीतकार बच्चे को बताना नहीं भूलता कि उसकी आवाज़ रेकॉर्डिंग स्टूडियो के लिए ही बनी है. साथ ही वादा भी कर डालता है कि दो साल बाद वह अपने सारे गाने उसी बच्चों से गवायेगा. पूरे सेट पर ख़ुशी का मौसम आ जाता है. कई-कई बार तो इतनी ख़ुशी आ जाती है कि डर लगता है कि सेट की दीवारें फट न पड़ें. जितना खुश वह बच्चा नहीं होता उससे ज्यादा उसके माँ-बाप खुश होते हैं. ठीक वैसे ही एलिमिनेशन पर बच्चा जितना दुखी नहीं रहता उससे ज्यादा उसके माँ-बाप दुखी होते हैं. उन्हें देखकर लगता है जैसे अब इनका जीवन व्यर्थ हो गया. इनके ऊपर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है और अब ये इससे कैसे उबरेंगे?

इन बच्चों में परफेक्शन, गुण, मेहनत, कला वगैरह वगैरह कूट-कूट कर भर गए है.

लेकिन जो चीज इन्हें छोड़कर चली गई है उसकी बात?

जब से हमने तय किया है कि हम अपने देश को इकॉनोमिक सुपर पॉवर और सामरिक दृष्टि से भी महाशक्ति बनायेंगे तबसे देश में रियलिटी शो की संख्या में दिन दूनी नहीं तो रात में चौगुनी वृद्धि तो ज़रूर हुई है. तरह-तरह के विषयों पर रियलिटी शो बनाये जा रहे हैं. यहाँ तक कि अच्छे-खासे घर-दुआर वाले लोग़ जंगलों में जाकर वास कर रहे हैं ताकि रियलिटी शो बन सके. कई लोग़ सांप-छछूंदर, केकड़े-अजगर के साथ खुद को कांच के डब्बे में कैद कर ले रहे हैं और उन जानवरों को सता रहे हैं ताकि जानवरों को तंग करने वाली उनकी हरकतों को कैमरे में कैद करके उसे रियलिटी शो में बदला जा सके.

कई बार मन में आता है कि अच्छा हुआ जो श्री राम ने त्रेता युग में जन्म लेकर खुद को उसी युग में सरयू नदी के हवाले कर दिया. सोचिये अगर आज श्री राम खुद को सरयू नदी के हवाले करते तो क्या होता? उनके जल समाधि को लाइव टेलीकास्ट करने के लिए चैनलों में होड़ लग जाती. ये चैनल वाले एक कांख में अपनी पूरी बेशर्मी दबाये और दूसरी में रूपये की थैली लिए उनके पास एक्सक्ल्यूसिव राइट्स के लिए पहुँच जाते. गारंटी तो नहीं डे सकता लेकिन फिर भी ऐसा ज़रूर लगता है कि अगर वे आज होते तो ये रियलिटी शो वाले उनके वनवास की खबर पर उनके पास भीड़ लगा लेते और उनके वनवास को रियलिटी शो में बदल देने के लिए उन्हें पक्का लालच देते. जनक भले ही विदेह होंगे लेकिन सीता स्वयंवर के अवसर पर कोई न कोई चैनल वाला स्वयंवर के लाइव टेलीकास्ट की एक्स्क्यूसिव राइट्स के लिए पैसे लेकर रोज उनके राजमहल के चक्कर लगाता.

आज इन शो बनाने वालों को परफेक्ट सिंगर और परफेक्ट डांसर वगैरह की तलाश है लेकिन इस परफेक्शन से ये दर्शकों को कितने वर्षों तक चमत्कृत या फिर बोर कर पायेंगे? मुझे तो पक्का विश्वास है कि एक समय ऐसा भी आएगा जब शो बनाने वाले ये लोग़ ऐसे बच्चों को ढूढेंगे जिनके पास मासूमियत होगी. जिनमें बचपना होगा. जिनमें परफेक्शन नहीं होगा. जो बच्चे 'कम्प्लीट' सिंगर या 'कम्प्लीट' डांसर नहीं होंगे. और फिर ये लोग़ उन बच्चों की मासूमियत, तुतलाहट वगैरह पर रियलिटी शो बनायेंगे.

और तब हमें जज-गुरु द्वारा सुनने को मिलेगा; "आज~~ मैं मेरे दाता से कहूँगा कि ऐ मेरे दाता, ऐ मेरे ईश्वर, ऐ मेरे मालिक, इनको हमेशा मासूम बनाये रखो....ये जो इनकी तुतलाहट है वो हमेशा ऐसे ही बनी रही. ऐ मेरे दाता इनकी नाक ऐसे ही बहती रहे जिससे ये बच्चे लगें....आज पूरी 'प्रथ्वी' में इनकी मासूमियत की चर्चा हो रही होगी........................."

समस्या एक ही है. आज रियलिटी शो है...कल भी रियलिटी शो ही रहेगा. बिक्री के लिए केवल कमोडिटी बदल जायेगी.

Tuesday, September 14, 2010

सिंगिंग रियल्टी शो- एक निबंध




एक जमाना था जब परीक्षा का प्रश्नपत्र सेट करने वाले विद्वान् विद्यार्थियों को चैलेन्ज जैसा देते थे कि वे पोस्टमैन, मेरा गाँव, रेलयात्रा जैसे विषयों पर निबंध लिख कर दिखायें. पोस्टमैन नहीं आते तो मेरा गाँव आ जाता. मेरा गाँव नहीं आता तो रेलयात्रा आ जाता. कुल मिलाकर विकट सरल दिन थे. विद्यार्थीगण बहुत जोर रटते थे और परीक्षा की कापी रंग आते थे. अब चूंकि ज़माना हर ज़माने में बदलता है इसलिए अब ऐसे पुराने विषयों पर निबंध लिखने के लिए नहीं कहा जाता. और कारण यह भी हो सकता है कि पोस्टमैन की जगह कूरियर बॉय ने ले ली है और उसके चरित्र चित्रण की बारीकियों का निर्धारण अभी तक नहीं हो पाया है.

हाल ही में एक विद्यार्थी के परीक्षा की कॉपी मिल गई. अरे भाई साहब, हाल ही में से मेरा मतलब है परसों. अब हिंदी दिवस से दो दिन पहले इतिहास की कॉपी थोड़े न मिलेगी. तो प्रस्तुत है उस विद्यार्थी द्वारा लिखा गया निबंध जिसका शीर्षक है; सिंगिंग रियलटी शो. अब मेरे ऊपर गुस्सा न होइए कि शीर्षक अंग्रेजी में क्यों है? है तो है. शीर्षक पर ध्यान मत दीजिये अब निबंध बांचिये.

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भारत में रियल्टी शो का इतिहास बहुत पुराना नहीं है. हाँ, यह ज़रूर है कि तमाम तरह के रियल्टी शो में सबसे पुराना शो गाने का ही है. वैसे इतिहासकारों और विद्वानों का मानना है कि हमारे देश में भी रियल्टी शो का इतिहास पुराना हो सकता था लेकिन उनदिनों सेल फ़ोन न होने के कारण ऐसा हो नहीं सका.

विद्वानों का मानना है कि १९८५ में जब श्री वारेन एंडरसन को सरकारी कार में हवाई अड्डे ले जाया जा रहा था उस समय उनके कार में बैठाकर एयरपोर्ट प्रस्थान करने की रीयल तस्वीर टीवी कैमरे से ले ली गई थी लेकिन उनदिनों सेल फ़ोन न होने के कारण दूरदर्शन वो फूटेज दिखाकर दर्शकों से यह नहीं कह सका कि; "वारेन एंडरसन को कार में बैठाकर भगाने के लिए कौन जिम्मेदार है? आपके आप्शन हैं; (ए) राजीव गाँधी (बी) अर्जुन सिंह (सी) नरसिम्हा राव और (डी) रतन नूरा. अपना जवाब हमें पाँच शून्य शून्य सात एक पर भेज दीजिये. जवाब के आगे अपना नाम और अपना पता ज़रूर लिखिए."

ऐसा न हो सका और हम इतिहास का निर्माण नहीं कर सके. एक अदद सेल फ़ोन न होने की वजह से सब गुड़ गोबर हो गया. अगर सेल फोन होता तो हम रीयल्टी शो के आविष्कार का पेटेंट करवा लेते और फिर अमेरिकी इंटरटेनमेंट कम्पनियाँ भारत सरकार को लाइसेंस फीस देकर ही अपने देश में रीयल्टी शो कर पातीं. खैर, जो हो गया सो हो गया.

गाने का रियल्टी शो केवल गाने के बारे में नहीं होता. यह जजों के बारे में भी होता है. यह प्रतियोगी के माँ-बाप के बारे में भी होता है और यह एंकर के बारे में भी होता है. सेलेक्शन का प्रोसेस बहुत झमेले वाला होता है. (सर जी, नंबर मत काटियेगा. प्रोसेस का हिंदी शब्द दिमाग में नहीं आ रहा है) कभी-कभी सेलेक्शन में इतना झमेला हो जाता है जितना इलेक्शन में नहीं होता. (सर जी, सेलेक्शन से इलेक्शन की तुकबंदी मिला दिया है मैंने. आशा है आप उसके लिए एक नंबर ज्यादा देंगे).

जहाँ सिंगिंग रियल्टी शो के लिए सेलेक्शन होने वाला रहता है वहाँ कई घंटे पहले से ही भीड़ हो जाती है. अक्सर ऐसा देखा जाता है कि प्रतियोगी के माँ-बाप एक दिन पहले शाम पाँच बजे से ही लाइन लगा देते हैं. जिन माँ-बाप को गाने और संगीत के बारे में थोड़ा-बहुत आईडिया होता है वे पाँच बजे से लाइन लगाते हैं और जिन माँ-बाप को गाने के बारे में कम जानकारी रहती है वे उनसे भी दो घंटे पहले से यानि ३ बजे शाम से ही लाइन लगा देते हैं.

सेलेक्शन के समय प्रतियोगी का कर्त्तव्य होता है कि वह जजों को अपने कर्म से रिझाए.रिझाने के इस महत्वपूर्ण काम को करने के ढेरों तरीके हैं. जैसे प्रतियोगी अगर गरीब रहे तो जज जल्द रीझते हैं. या फिर प्रतियोगी अगर सात सौ किलोमीटर चलकर सलेक्शन के लिए आडिशन देने आये तो भी जज लोग रीझ जाते हैं. सेलेक्शन प्रोसेस (सर जी, क्षमा कीजियेगा अभी तक माइंड में प्रोसेस का हिंदी शब्द नहीं घुसा) का एक महत्वपूर्ण विषय होता है प्रतियोगी का खाना न खाने की वजह से बेहोश हो जाना.

रीयल्टी शो रीयल लगे इसके लिए कई बार प्रतियोगी जजों को घटिया और निकम्मा बता देता है. कोई-कोई प्रतियोगी गाली भी दे डालता जिसे चैनल वाले आवाज़ के पैबंद से ढक देते हैं. ऐसा होने से शो करीब बावन प्रतिशत ज्यादा रीयल लगता है.

जो प्रतियोगी गाना गाकर जजों को खुश कर देता है जज उसे तुरंत सेलेक्ट कर लेता है और उसे मुंबई बुला लेता है.मुंबई बुलाने का यह सिद्धांत नया नहीं है. इतिहास गवाह है कि पिछले करीब साठ वर्षों से कोई भी भारत के किसी भी कोने से चलता है तो वह मुंबई ही पहुँचता है. भारत के हर कोने से चली हुई सड़क, रेलगाड़ी और ट्रक अक्सर मुंबई ही पहुँचती है. विद्वानों का मत है कि मुंबई पहुँचने के इस ऐतिहासिक सिद्धांत की नींव श्री देवानंद ने रखी जब वे पंजाब से निकलकर फ्रोंटियर मेल पकड़कर सीधा मुंबई पहुंचे थे.

मुंबई पहुंचकर सारे प्रतियोगी अभ्यास वगैरह करते हैं. उन्हें हमेशा कान में आई-पॉड का हेडफोन लगाये देखा जा सकता है. वे अभ्यास करके जजों के सामने गाते हैं. इस दौरान प्रतियोगी पाँव छूने का भी अभ्यास करता है. वह ऐसा इसलिए करता है जिससे प्रोग्राम में आनेवाले हर गेस्ट जज का और बाकी जजों का जब-तब पाँव छूता रहे. पाँव छूना गायक बनने के लिए गायन के रियाज से भी ज़रूरी है.

जज लोग करीब नब्बे प्रतिशत प्रतियोगियों को बताते हैं कि उनके पास प्ले-बैक की वायस है. वैसे जानकारों का ऐसा मानना है कि जजों की यह बात सही नहीं है क्योंकि अगर ऐसा होता तो अभी तक भारतवर्ष में प्ले-बैक गायकों की संख्या करीब तीन लाख सत्तावन हज़ार होती.

यह भी देखा गया है कि अपने कमेन्ट में जज लोग ऐसे स्टेटमेंट देते हैं जो किसी की समझ में नहीं आता. उनमें कुछ स्टेटमेंट हैं; "तुम्हारी आवाज़ का थ्रो बहुत बढ़िया है", "तुम्हारी वायस की टेक्सचर गज़ब है", "तुम्हारी आवाज़ जो है उसकी फैब्रिक मुझे बहुत पसंद है".

ऐसी बातें सुनकर प्रतियोगी को अपने ऊपर शंका होने लगती है. वह यह सोचने में बिजी हो जाता है कि; "वह एक गायक है या बुनकर?"

जजों के कमेन्ट के बारे में प्रतियोगियों की इस नासमझी को दूर करने के लिए हाल ही में आल इंडिया सिंगिंग रिअलिटी शो पार्टीसिपेंट्स पैरेंट्स एसोसियेशन ने यूजीसी से यह मांग रखी कि वह एक शोध करवाए जिससे प्रतियोगियों और उनके अभिभावकों को जजों के कमेन्ट समझने में आनेवाली मुश्किलों को दूर किया जा सके. सरकार पहले तो नहीं मान रही थी लेकिन जब किसी विद्वान ने उसे यह बताया कि सिंगिंग रियल्टी शो के पार्टिसिपेंट्स बहुत बड़ा वोटबैंक साबित हो सकते हैं तो सरकार ने उनकी मांग मान ली.

रियल्टी शो के दौरान जज यह बताते रहते हैं कि जैसे ही यह शो ख़त्म हुआ देश को उसकी आवाज़ मिल जायेगी. उनकी बात सुनकर लगता है जैसे यह शो नहीं होता तो देश गूंगा ही रहता. कुछ सूत्रों का यह भी मानना है कि जब चैनल वाले अपने विज्ञापनों में देश की आवाज़ खोजने का दावा करते हैं उनदिनों देश की सबसे पावरफुल नेत्री को अपनी आवाज़ पर शंका होने लगती है और वे ज्यादा बोलने लगती हैं.

कई बार ऐसा भी होता है कि शो में आनेवाले प्रतियोगी जजों से ज्यादा जानकार होते हैं. ऐसे में जब कोई प्रतियोगी शास्त्रीय संगीत पर आधारित कोई गीत, ठुमरी या टप्पा गाता है तब जज घबड़ाकर राग और सरगम के साथ-साथ अपना हाथ हिलाते-डुलाते और ऊपर-नीचे करते हैं. जानकारों का ऐसा मानना है कि जज ऐसा इसलिए करते हैं जिससे देशवासियों का यह भ्रम बना रहे कि उन्हें संगीत का ज्ञान है.

हाल ही में किये गए एक सर्वेक्षण के अनुसार जब टीवी पर रियल्टी शो देखनेवाला दर्शक जब इस बात पर स्योर हो जाता है कि कोई प्रतियोगी बहुत अच्छा गा रहा है उसी समय जज उस प्रतियोगी के गाने को घटिया बता देता है. ऐसा करने से जज और जनता के बीच ज्ञान की खाई और चौड़ी हो जाती है. मनोरंजन की दुनियाँ में इसे जजेज सरप्राइज अटैक कहते हैं.

चूंकि ऐसे शो में ज्यादातर जज फ़िल्मी दुनियाँ के चुक गए संगीतकार होते हैं इसलिए उन्हें प्रतियोगियों से यह कहते हुए शर्म नहीं आती वे अपनी अगली फिल्म में फलां प्रतियोगी से एक गाना गवाएंगे. सबको यह मालूम रहता है कि जब इस जज को ही कोई फिल्म नहीं मिलेगी तो फिर उस फिल्म में प्रतियोगी के गाना गाने का सवाल ही नहीं उठता. ऐसे में जजों द्वारा किया जानेवाला यह अनाऊँस्मेंट देशवासियों के मनोरंजन का साधन बनता है.

कम्पीटीशन से धीरे-धीरे करके प्ले-बैक की वायस वाले एक-एक प्रतियोगी का निष्कासन होता रहता है. अंत में जिसका निष्काशन नहीं हो पाता उसे विजेता घोषित कर दिया जाता है और उसकी आवाज़ को ही देश की आवाज़ मान लिया जाता है. कुछ विद्वानों का मानना है कि अभी तक सारे रियल्टी शोज मिलाकर देश को करीब तीन हज़ार चार सौ तेरह आवाजें मिल चुकी हैं. शायद यही कारण है कि देश में हर मामले पर अलग-अलग आवाज़ सुनाई देती है.

प्ले-बैक वायस के मालिक प्रतियोगी जब प्रतियोगिता से निकलते हैं तो उनके माँ-बाप को भी टीवी कैमरे के सामने अपना हुनर दिखाने का मौका मिलता है. ये माँ-बाप अपनी हैसियत और टैलेंट के हिसाब रो लेते हैं और दुखी दीखते हैं.

प्राइसवाटर हाउस कूपर्स द्वारा हाल ही में किये गए एक सर्वे के अनुसार भारत में अगले आठ वर्षों में करीब चालीस हज़ार सात सौ सिंगिंग रियल्टी शोज बनने की संभावना है. कुछ विद्वान मानते हैं कि अगर भारत को अपने ट्वेंटी-ट्वेंटी मिशन (सर जी, यहाँ क्रिकेट की बात नहीं कर रहा हूँ मैं. यहाँ मैं कलाम साहब के इंडिया ट्वेंटी ट्वेंटी मिशन की बात कर रहा हूँ) की सफलता के लिए भारतवर्ष को कुल तीन करोड़ सिंगर तैयार करने पड़ेंगे. यह संख्या करीब सात करोड़ होती लेकिन चूंकि चार करोड़ प्रतियोगी डांसिंग रियल्टी शोज में भी भाग लेंगे इसलिए गायकों की संख्या करीब तीन करोड़ ही रखी गई है.

कुल मिलाकर भारत में सिंगिंग रियल्टी शोज का भविष्य उज्जवल है. भविष्य इतना उज्जवल है कि हर माँ-बाप अपने बेटे-बेटियों को सिंगर ही बनाना चाहता है. अब माँ-बाप भी नहीं चाहते कि बेटी/बेटे डॉक्टर-इंजिनियर बने.समाजशास्त्रियों का ऐसा मानना है कि आनेवाले वर्षों में देश में डाक्टरों और इंजीनियरों की भयंकर कमी हो सकती है.

माँ-बाप की चाहत की बात को आप निम्नलिखित संवाद से आंक सकते हैं;

"नहीं माँ, मैं डॉक्टर बनना चाहती हूँ. मुझे सिंगर नहीं बनना है"; बेटी ने अपनी माँ को समझाते हुए कहा.

"क्या कहा!, डॉक्टर बनना चाहती हो? डॉक्टर बनकर हमारी नाक कटवावोगी क्या? बेटा, आजकल कोई डॉक्टर इंजीनियर बनता है भला?"; माँ कहती है.

"नहीं माँ. प्लीज मेरी बात सुनो. गाने की प्रैक्टिस करके मैं थक जाती हूँ. फिर पढाई नहीं कर पाती"; बेटी ने कहा.

"अरे बेटा, क्या जरूरत है पढाई करने की? आजकल कोई पढाई करता है भला?"; माँ कहती है.

"मेरी बात सुनो तो माँ. हमारी टीचर भी कहती हैं कि दुनियाँ में हर कोई सफल नहीं हो सकता. मैं मानती हूँ कि मैं डॉक्टर बनने से असफल कहलाऊंगी. तो क्या हुआ? मैं एवरेज बच्ची हूँ इसलिए डॉक्टर बन जाऊंगी. जो बच्ची तेज है, वो सिंगर बन जायेगी. यही तो होगा"; बच्ची कहती है.

माँ उसी जगह से पतिदेव को आवाज लगाती है; "अजी सुनते हो?"

पतिदेव वहीँ से जवाब देगे; "अरे क्या हुआ, क्यों शोर मचा रही हो?"

"शोर नहीं मचाऊंगी तो और क्या करूंगी. सुन लो, तुम्हारी लाडली बेटी क्या कह रही है. कह रही है डॉक्टर बनेगी. लो और सर पर चढ़ाकर रखो इसे. डॉक्टर बनकर हमारा नाम डूबोने के लिए ही बड़ा कर रहे हैं हम इसे"; माँ ने जवाब दिया.

अब बच्ची को समझाने की बारी पिताश्री की है; "बेटा, एक बार कांटेस्ट में पार्टीसिपेट कर लो. अगर नहीं जीत पाओगी तो हम अपने किस्मत को रो लेंगे. फिर तुम्हारी जो इच्छा हो, करना. हम तुम्हें डॉक्टर बनने से नहीं रोकेंगे."


नोट:

सर जी, अब और नहीं लिख पा रहा हूँ. पेन पकड़ने की वजह से अंगुलियाँ दर्द कर रही हैं. वैसे आपको राज की बात बताऊँ तो मैंने भी एक रियल्टी शो में ऑडिशन दिया था. मेरा सेलेक्शन हो गया है. परीक्षा के बाद मैं भी मुंबई जा रहा हूँ.

Wednesday, September 8, 2010

मुन्नी जी, कोई भी बदनामी आख़िरी नहीं होती.




बहुत हो चुका. मुन्नी की बदनामी अब और बर्दाश्त नहीं होती. पिछले एक महीने से मुन्नी है कि उठते-बैठते बदनाम हुई जा रही है. बार-बार लगातार. सुबह हुई नहीं कि रेडिओ पर बदनामी का नगाड़ा पीट दिया. दोपहर में टीवी पर बदनामी की ढोलक पीट दी. रात को, इंटरटेनमेंट चैनल पर, फ़िल्मी चैनल पर, म्यूजिक चैनल पर, न्यूज चैनल पर, बदनामी की शहनाई बजा दी. कल तो सड़क पर बदनाम हो गई. मैंने देखा कि एक रिक्शावाला अपने रिक्शे में रेडिओ टाँगे रिक्शा चलाते जा रहा था कि अचानक मुन्नी 'रिश्के' पर बदनाम होने लगी. आस-पास के लोग चौंक करके मुन्नी की बदनामी सुनने लगे. कुछ ने ऐसी भाव-भंगिमा बनाई जिसे देखकर लगा कि बन्दा सोच रहा है कि कहीं मुन्नी ने उसी को तो डार्लिंग नहीं कहा? कहीं उसी के लिए तो बदनाम नहीं हुई?

कोई जगह नहीं बची है जहाँ मुन्नी बदनाम नहीं हो रही. ऊपर से तुर्रा ये कि; 'मैंने बदनामी का यह कार्यक्रम तो डार्लिंग तेरे लिए किया है." जैसे कह रही हो कि; "बदनाम होने का मेरा कोई प्लान नहीं था लेकिन हे डार्लिंग तुम मुझे इतने क्यूट लगे कि कि मैंने नाम को छोड़कर बदनाम होने का फैसला कर डाला."

मुन्नी का डार्लिंग मुन्नी के साथ जहाँ-तहाँ बदनामी का कार्यक्रम आयोजित कर ले रहा है. होड़ सी लगी है लोगों में.देखकर लगता है जैसे आक्शन सिस्टम के तहत बोली लग रही है और मुन्नी और उसके डार्लिंग से भाई लोग सिफारिश कर रहे हैं कि; "डार्लिंग जी, आज अगर मुन्नी को हमारे चैनल पर बदनाम कर देते तो बहुत बढ़िया होता. हम बड़ी आशा लेकर आये हैं कि मुन्नी जी पहले हमारे ही चैनल पर बदनाम होंगी. ना मत कहियेगा."

या फिर इसका उल्टा भी हो सकता है यानि डार्लिंग जी चैनल वालों से कह रहें हों कि; "भाई साहब, आप इजाजत दें तो मैं अपनी मुन्नी को आपके चैनल पर प्राइम टाइम पर बदनाम कर लूँ."

कहीं-कहीं तो वे भाई भी मुन्नी को अपने चैनल पर बदनाम कर लेना चाहते हैं जिनके चैनल पर छोटे-छोटे बच्चे गाने में अपनी किस्मत और आवाज़ आजमा रहे हैं. उधर बच्चे स्टेज पर गाना गाने के लिए तैयार हुए और इधर डार्लिंग अपनी मुन्नी को लिए पहुँच गए उसे बदनाम करने के लिए. बच्चे भी मुन्नी की बदनामी की सरगम सुन ले रहे हैं ताकि अपने गाने में कभी फिट कर सकें.

एक चैनल पर देखा कि मुन्नी को बदनामी के गुर सिखाने वाली जज के रूप में बैठी थी. बस फिर क्या था, मुन्नी अपने डार्लिंग जी को पर्स की तरह दबाये पहुँच गई और फटाफट बदनाम हो ली. बदनामी का गुर सिखाने वाली फारहा जी ने भी साथ दिया तो बदनामी में चार चाँद लग गए. डार्लिंग जी भी खुश. मन ही मन सोच रहे होंगे कि; "आज तो बढ़िया बदनामी हुई. ऐसी बदनामी पिछले चैनल पर नहीं हो पाई थी."

हाँ, कभी-कभी यह ज़रूर लग रहा है जैसे मुन्नी इतनी भारी मात्रा में बदनाम होकर समाज में डिवाइड क्रियेट कर रही हैं. आखिर मुन्नी जी को भी सोचना चाहिए कि इतनी बड़ी मात्रा में बदनाम होकर वे न जाने कितनों को इन्फिरियारिटी कम्प्लेक्स दे रही होंगी और उनकी बदनामी देखकर न जाने कितने अपने भाग्य को कोस रहे होंगे कि; "हे भगवान, हमने क्या गुनाह किया था जो हमें बदनामी से महरूम रखा? मुन्नी जितनी न सही लेकिन उतनी बदनामी तो दे ही सकते थे कि हमें भी बदनाम होने पर गर्व होता."

शायद इसी इन्फिरियारिटी कम्प्लेक्स का नतीजा है कि कोई मुन्नी जी से पूछ नहीं रहा है कि; "क्या ज़रुरत है इतना बदनाम होने की? वह भी इस स्टाइल से बदनाम हुई हो कि ग्रेस पूरी तरह से एब्सेंट है. बदनाम होना है तो हो लो लेकिन ग्रेसफुली बदनाम हो. क्या तुम्हें यह नहीं पता कि बदनाम होने के बाद जब तुम झंडु बाम हो रही हो तो बहुत चीप लग रही हो? उस समय बदनामी रसातल में चली गई है?"

वैसे भी एक-दो बार कहीं बदनाम हों लें वह ठीक है लेकिन रोज-रोज हर दो घंटे पर बदनाम होना कहाँ तक जायज है? बदनामी की कोई लिमिट है कि नहीं? देखकर लगता है जैसे आपकी बदनामी ही भारत की प्रगति पर चार चाँद लगाएगी? अरे चैनल वालों का क्या है? उनके चैनल तो बदनामी पर ही चल रहे हैं. आज आपकी बदनामी है कल किसी और की होगी. हर न्यूज चैनल पर कोई न कोई नीलाभ, रोहित और अमिताभ बैठे हैं जो हर घंटे आपकी बदनामी पर विशेष झाड़े जा रहे हैं. कई बार तो लगता है जैसे चलता हुआ प्रोग्राम बंदकर ब्रेकिंग न्यूज दिखाना न शुरू कर दें कि मुन्नी पाँच मिनट पहले शाबाश चैनल पर एक बार फिर से बदनाम हो गई हैं.

तो हे मुन्नी जी, माना कि आपके हिसाब से आपने बदनामी की दुनियाँ में नया रिकार्ड बना डाला है लेकिन आप बदनामी के हथौड़े से हमारे सिर पर कितनी बार चोट करेंगी? हम आपको बताना चाहते हैं कि अब सिर तो क्या आपके बदनाम हथौड़े की चोट से हमारी आँखें भी सूज गई हैं. अब आपकी बदनामी बर्दाश्त के बाहर हो गई है. इसलिए अपनी बदनामी पर लगाम लगायें. इस बात को ध्यान में रखें कि बदनामी क्या है कल कोई और आएगा और वह आपसे भी ज्यादा बदनाम होकर दिखा देगा. कोई भी बदनामी आख़िरी नहीं होती.

Friday, October 12, 2007

गंवई रामलीला और हास्य के विभिन्न प्रसंग





जीवन में हास्य के लिये हाईटेक साधनों का मुंह जोहने की जरूरत नहीं है। हास्य चहुं ओर बिखरा है| समेटने वाले चाहियें| आजकल रामलीला प्रारम्भ होने का समय है| मैं उस विषय में अपनी अतीत की स्मृतियों को आपके सामने रख कर यह बताने का यत्न करूंगा कि टेलीवीजन युग न होने पर भी कितना सशक्त हास्य रामलीला के माध्यम से उभारा जाता था और सर्वजन उसमें कितना रस लिया करते थे| याद आने पर सोचता हूँ कि रामलीला के कामेडी ट्रैक भी गजब होते थे| लगभग हर दिन हर प्रसंग में कामेडी दिखाई देती थी| एब्सर्ड कामेडी के अनेक नमूने देखने को मिलते थे| जरा आप अवलोकन करें -

सबसे पहले याद आया सीता-स्वयंवर|

"आई ऍम हियर टू मैरी सीता, डाटर आफ जनक"; एक आदमी सूट-बूट पहने, टाई बांधे, स्टेज पर आता था और आते ही अवधी उच्चारण वाली अंग्रेजी में ये संवाद दे मारता था। जनक के दरबार में बैठे लोग अचंभित हो जाते थे. सबके चहरे पर 'भाषाई-विस्मय' उभर पड़ता था. जनक के दरबार का सबसे अनुभवी अनुवादक कुछ देर तक इस आदमी से बातें करने के बाद सारे दरबारियों को बताता था कि 'ये जॉन हैं और इंग्लैण्ड से आए हैं. इन्हें भी सीता के स्वयंवर के लिए निमंत्रण पत्र भेजा गया था. ये भी धनुष तोड़कर सीता से विवाह करना चाहते हैं.' दरबार में बैठे लोग इतनी जानकारी पा लेने के बाद चहरे के विस्मय को किनारे लगा उस आदमी का अभिवादन करते थे.

इसी स्वयंवर में एक आदमी और आता था।सिर पर रेडियो का एरियल बांधे रहता था. आकर जनक के दरबारियों से बताता था कि वह आकाशवाणी में काम करता है. उसे देवताओं का रेडियो सिग्नल मिला कि सीता का स्वयंवर होने वाला है, सो वह भी अपनी किस्मत आजमाने आया है.

अद्भुत आनंद आता था जब राम-जन्म के पहले वाला एपिसोड देखते थे। राजा दशरथ शिकार करके वापस आते थे. अपने कक्ष में बैठने के बाद अचानक आईना देखते थे. आईने में ख़ुद को देखकर उन्हें पता चलता था कि उनकी दाढी के बाल सफ़ेद हो गए लेकिन उन्हें संतान नहीं हुई. सही बात है. जो राजा दिन-रात शिकार में मशगूल रहे, उसे पता भी कैसे चले कि उसकी उम्र काफी हो गई. उनकी इस हरकत से एक बात स्पष्ट हो जाती थी. तब भी लोग ख़ुद के बारे में जानने के लिए आईना ही देखते थे. उनको भी पता था कि 'जड़ दो चांदी में चाहे सोने में, आईना झूठ बोलता ही नहीं.' तो राजा दशरथ अपनी दाढी के सफ़ेद बाल देखकर अचंभित हो जाते थे. स्टेज पर ढोल और 'हरमुनिया' लेकर बैठी मंडली गाना शुरू कर देती थी...
भजु सिया रामा हो
रामा एक बार भूपति मन माही
भजु सिया रामा हो
हो रामा भई गलानि हमारे सुत नाही।
इस तरह की कामेडी उस एपिसोड में भी दिखाई देती थी, जब विश्वामित्र राम और लक्ष्मण को लेकर जनकपुर के बाज़ार में जाते थे। बाज़ार में लगभग हर चीज की दुकानें सजाई जाती थीं. मिठाई से लेकर मूंगफली तक, पान से लेकर पकौड़े तक - सब कुछ बिकता था. मजा तो तब आता था जब हम एक आदमी को उसी बाज़ार में अखबार बेचते हुए देखते थे. अखबार बेचने वाला गाँव की ताज़ा ख़बर बताकर अखबार बेचता था. जिस दिन ये एपिसोड होता था उस दिन अपने गांव में हुई सारी घटनाओं के बारे में बताता था, जैसे किसके साथ किसकी मार-पीट हुई, किसकी भैंस किसके खेत में चरती हुई पाई गई. एक बार तो उसी दिन गाँव में एक बुजुर्ग के मरने की ख़बर भी अखबार वाले ने बताई और रामचन्द्र जी को अखबार बेच डाला!

कॉमेडी एक एपिसोड में और दिखाई देती थी. रावण मारीच के पास जाता है और उससे सोने का हिरन बनने की गुजारिश करता है. सोपारी लाल शर्मा, हमारे गाँव के 'नाऊ ठाकुर' यानि नाई थे। बड़ा प्यारा व्यक्तित्व. मारीच का रोल करते थे. बेचारे धोती-कुर्ता और चश्मे के साथ ही अपना पार्ट कर जाते थे. मारीच को स्टेज पर सोते हुए दिखाया जाता था. रावण जब आता था तो मारीच उसकी आरती करता था. आरती के बोल भी मजेदार...
ॐ जय रावण देवा
स्वामी जय रावण देवा
आधी रात को आयो
मोरे प्राण लेवा
ॐ जय रावण देवा॥
हमारे गाँव के अर्जुन सिंह मास्टर सुखेन वैद्य का रोल करते थे. वही रामलीला कमेटी के कोषाध्यक्ष भी थे. कई बार ऐसा भी होता था कि अर्जुन सिंह माईक पर गाँव वालों द्वारा दिए गए चंदे का व्योरा देते-देते ही सुखेन का रोल करने के लिए चल देते थे, वही कपडे पहने हुए.

रामलीला का एक और प्रसंग बड़ा दिलचस्प रहता था. राम का चरित्र बाक़ी के दिन कोई और करता. लेकिन जिस दिन लक्ष्मण को मेघनाद का बाण लगता, उस दिन केवल राजेंद्र पाण्डेय राम का रोल निभाते थे. कारण केवल इतना कि उस दिन राम को विलाप करना होता था और राजेंद्र पाण्डेय का गला बड़ा अच्छा था. वे अच्छा विलाप करने में माहिर थे. लक्ष्मण का सिर अपनी गोद में लिए विलाप करते थे -
भाई कोई मुझे ये बताये
किसने दुनिया में दुःख ऐसे पाए
किसपर यूँ बज्र भीषण गिरा है
किसका यूँ छोटा भाई मरा है
रामलीला में काम करने वाले कलाकार भी कुछ कम नहीं थे. चंद्र बली मिश्र के बारे में मैंने पहले भी लिखा है कि किस तरह से मिश्र जी मौका मिलते ही संवाद के बीच में शेर बोल जाते थे. राम उजागिर दुबे दशरथ का रोल करते थे; और दशरथ मरण के बाद वही हनुमान का भी रोल करते थे. कुल मिलाकर रामलीला से मिलने वाला मनोरंजन अदभुत था.

समय बदला है - तेजी से। गंवई रामलीला की बजाय टेलीवीजन चलने लगा है - तेज तेज! पर इस तेजी में कहीं वह चंहु ओर बिखरा हास्य छिप गया है। और हम लोगों के पास समय की ऐसी किल्लत हो गयी है कि उस हास्य को ढ़ूंढने की फुर्सत ही बिला गयी है।

आपके पास कुछ यादें हैं उस हास्य की? अगर हां, तो जरा बतायें!

Sunday, July 15, 2007

नौटंकी से टीवी न्यूज तक की मनोरंजन यात्रा




सालों पहले गाँव में रहते थे। मनोरंजन के साधन बहुत कम थे। रेडियो सुन लेते थे। कभी-कभी गाँव में 'राम सिंह कि नौटंकी' आती थी। दोस्तो के साथ जेठ कि दुपहरिया में दो किलोमीटर पैदल चल कर देख आते थे। बड़ा आनंद मिलता था। नौटंकी में संवाद अदायगी बड़ी दिलचस्प होती थी। सारे संवाद कविता में होते थे। एक नमूना हाज़िर है:

बात हमसे सुनो मामा माहिल मेरे
आज गंगा-दशहरा नहाऊँगा मैं;
जिद हमारी ये भैया को समझाय दो
तेग से शीश वर्ना उड़ाऊँगा मैं

या फिर

ज्यादा बढ-बढ के बातें ना कर बेशरम
जो गरजता है, ज्यादा बरसता नहीं;
आज तक ऎसी धमकी सहा ना उदल
गीदड़ों की तरह वो चहकता नहीं

देखकर बड़ा मज़ा आता था। देखने के बाद घंटो तक ऐक्टर की संवाद अदायगी की प्रशंसा या फिर बुराई करते थे। सितम्बर और अक्टूबर के महीने में रामलीला देखते थे। यूपी में रामलीला बड़ी दिलचस्प होती है। वहाँ भी संवाद कविता में ही कहे जाते थे। उसका भी एक नमूना:

मैं परशुराम कहलाता हूँ
तुम केवल राम कहाते हो;
मेरा ही आधा नाम छीन
मुझपर ही धाक जमाते हो

सबसे मजेदार बात ये होती कि संवाद बीच में ही रोक कर माइक पर एलान शुरू हो जाता। "ईक्यावन रुपये का चन्दा श्री लाल साहब सिंह ने कमिटी को प्रदान किया। हम उनका शुक्रिया अदा करते हैं"।

मैंने तो एक बार रामलीला में राक्षस का रोल भी किया था। हमारे गाँव में एक बुजुर्ग थे। नाम था चंद्र बली मिश्र। उन्हें शेर सुनाने का बड़ा शौक़ था। लेकिन रहते थे गाँव में और वहाँ श्रोता खोजना बड़ा मुश्किल काम है। कौन उनसे शेर सुनता। इसलिये शेर न सुना पाने की भड़ास रामलीला में निकालते थे। जामवंत का रोल करते थे। मुझे याद है; मैं जिस दिन अपने चहरे पर कोयले से बनाई गई मूंछ और एक पुरानी जंग लगी तलवार लेकर राक्षस का रोल करने वाला था, चंद्र बली मिश्र मुझे स्टेज के पीछे ले गए। मुझसे कहा; "जब मैं तुम्हारे सामने लड़ने के लिए आऊंगा तब तुम मुझसे कहना कि तू क्या तलवार चलाएगा बुड्ढे। तब मैं एक शेर बोलूँगा"। वैसा ही हुआ। मैं राक्षस बन कर 'जामवंत' के सामने आया और फट से उनका सिखाया हुआ डायलाग दे मारा; "तू क्या तलवार चलायेगा बुड्ढे"? और मौक़े का फायदा उठाकर उन्होने एक शेर दाग दिया:

बूढा हुआ तो क्या हुआ पर ठाट वही है
तलवार पुरानी है मगर काट वही है

कुछ ऐसा होता था मनोरंजन उन दिनों! मुझे अभी तक याद है। रात में कोयले से बनाई गई मूंछ चिपकी रह गई। सुबह माँ ने देखा और मुझे तुरंत दो झापड़ मारे।

कालांतर में मनोरंजन करने के लिए हिंदी सिनेमा आया। मनोरंजन का साधन बदल गया. आजकल सुबह आफिस जाने से पहले मिथुन दा कि फिल्में टीवी पर दिख जाएँ तो नाश्ता करते-करते देखता हूँ। बड़ा मज़ा आता है। ऊंटी में फिल्माई गई मूवी। एक जगह डान्स और उसी जगह फाइट के फिल्माये सीक्वेंस देख कर आनंद आ जाता है। मेरे दोस्त मुझे ये कहते हुए गालियाँ देते हैं कि "तुम बडे कमीने किस्म के इन्सान हो। कहीँ भी मनोरंजन ढूँढ लेते हो"।

शाम को मनोरंजन का सबसे बड़ा साधन हिंदी न्यूज चैनल हो गए हैं। एक से बढकर एक न्यूज़ दिखाते हैं। मैं ऐसे समाचार देख कर आनंद ले लेता हूँ। न्यूज़ के शीर्षक सुनकर ही मज़ा आ जाता है। एक नमूना देखिए:

क्रिकेट पर 'विशेष' हो तो शीर्षक कुछ भी सकता है; जैसे 'कटा दी नाक', 'हम नहीं सुधरेंगे', 'फिर गरज उठा बूढ़े शेर का बल्ला' (सचिन तेंदुलकर के शतक बनाने पर। ये अलग बात है कि उसके ठीक एक दिन पहले बेकार खेल पर 'खतम हुआ शेर' शीर्षक से 'विशेष' दिखाया गया हो)। और विषयों पर भी शीर्षक कुछ कम दिलचस्प नहीं होते। सबसे प्रिय विषय है दाऊद इब्राहिम और उनके कार्य-कलाप। उसके बाद मेरठ, दिल्ली, कानपुर, गाजियाबाद और ऐसे कई शहरों के प्रेम प्रसंग का नंबर आता है। कुछ शीर्षक बडे हिट हैं; जैसे 'डॉन की महबूबा', 'वो कौन थी', 'पति, पत्नी और वो', 'भेजा फ्राई', 'लौट आई कल्पना'।

'अँधेरे में सूरज', ये शीर्षक था उस प्रोग्राम का जो आजतक पर प्रसारित हो रहा था। एक क्षण के लिए लगा, शायद इंडोनेशिया के जंगलों में सालों से लगी आग के बारे में बात हो रही है, जिसकी वजह से सारे इलाक़े में धुआं फ़ैल गया है और सूरज बड़ी मुश्किल से दिखाई देता है। लेकिन थोड़ी ही देर में बात समझ में आ गई। पता चला कि सूरज नाम का लड़का किसी बोर-वेल में गिर गया है और उसे निकालने के लिए इस न्यूज़ चैनल ने 'मुहिम' चला रखी है। सूरज को निकालने के लिए किये जा रहे प्रयास का प्रसारण हो रहा था। साथ में ये भी कह रहे थे; "आप हमें अपनी राय दें"। मुझे लगा हमारी राय से क्या होगा। राय नहीं हुई कोई रस्सी हुई जिसे मिलते ही सूरज उसे पकड़कर अँधेरे से उजाले में आ जाएगा। ये क्या बात हुई? अगर हमारी राय के सहारे ही सूरज बाहर आ जाएगा तो फिर सेना की क्या ज़रूरत है वहाँ? इतने सारे मजदूर काम कर रहे हैं। मशीनें लाई गईं हैं। क्यों मजदूर वहाँ पर गड्ढा खोद रहे हैं। आख़िर इस चैनल ने 'मुहिम' तो चला ही रखी है। फिर हमारे राय की ज़रूरत क्यों आन पड़ी?

लेकिन राय से कुछ नहीं होने वाला है, ये तो केवल मेरी सोच थी। मैंने देखा कि थोड़ी देर में ही देश के कोने-कोने से लोगों ने अपनी राय रूपी रस्सी भेजना शुरू कर दिया। इनमें से कुछ ऐसे भी होंगे जो ढाई सौ ग्राम टमाटर इस लिए नहीं खरीदते क्योंकि टमाटर बहुत 'मंहगा' हैं। लेकिन जब एस एम एस करके राय देने की बात आती है, तो सबसे आगे रहते हैं। खैर; बहुत से लोगों ने अपनी राय दी। लेकिन शायद राय देने से बात बनी नहीं। इसलिये उन्होने हार कर मंदिरों में पूजा और यज्ञ शुरू कर दिया। न्यूज़ चैनल वालों ने ऐसे यज्ञ का प्रसारण भी किया। सताई हुई आम और गरीब जनता जो दो वक़्त की रोटी के लिए तड़पती रहती है, कितना पैसा खर्च करके एस एम एस भेजती है। पूजा और यज्ञ करती है।

मेरे मन में एक विचार आया। आख़िर 'इम्प्रूवमेंट' का स्कोप हर क्षेत्र में रहता है। इस तरह के प्रोग्राम में भी आने वाले दिनों में इम्प्रूवमेंट नज़र आएगा। हो सकता है आनेवाले दिनों में एस एम एस और फ़ोन के द्वारा भेजे गए जनता की राय को चैनल बच्चे तक पहुंचा सकता है। उसके बाद खुद बच्चा ही फैसला कर ले कि वो कौन से राय के सहारे बाहर निकलना चाहता है। जैसे चैनल का प्रतिनिधि बच्चे से कह सकता है; "सूरज, नाशिक से मंगेश बापत ने राय दी है कि आपके गड्ढे के ठीक बगल में एक और गड्ढा खोदा जाया। फिर दोनो गड्ढों को जोड़ दिया जाय और आपको बाहर निकाल लिया जाय। क्या आप उनके राय से सहमत हैं"? हो सकता है बच्चे को ये राय पसंद आ जाये और वो इसी राय के सहारे बाहर आने का मन बना ले। ऐसा भी हो सकता है कि बच्चे को ये राय पसंद ना आये और वो कहे; "नहीं। इस तरह से तो 'प्रिन्स' को बाहर निकाला गया था। मैं उसकी नक़ल करके क्यों बाहर आऊँ"?

एक और राय सुना सकते हैं चैनल वाले। "सूरज, मथुरा से कन्हैया चौबे ने राय दी है कि आपको कृष्ण के नाम का जाप करना चाहिए। इससे दो बातें होंगी। एक तो आप डरेंगे नहीं और दूसरा आप बोर होने से बच जायेंगे"। हो सकता है बच्चे को राय पसंद आ जाये। अगर नहीं आई तो वो साफ-साफ बोल देगा; "नहीं। मैं उनके राय से सहमत नहीं हूँ। कृष्ण के नाम का जाप करने से अच्छा होगा कि मैं फिल्मी गाने गाकर अपनी बोरियत दूर करूं"।

एक और चैनल का दृश्य याद आ गया तो उसके बारे में भी बताता चलूँ। चार साल की उपासना को तीन दिन पहले याद आया कि असल में वो उपासना नहीं बल्कि कल्पना चावला है। आप पूछेंगे कौन कल्पना? अरे वही जो अंतरिक्ष में गई थी और वापस आते समय जिनकी मृत्यु हो गई। कितनी दुखद घटना थी। टीवी चैनल वाले पंहुच गए हैं केमरा लेकर और चार साल की बच्ची से प्रश्न पूछ रहे हैं:

"बेटी तुम्हारा नाम कल्पना चावला है"?
"हाँ", बच्ची ने जवाब दिया।
"तुम्हारे पिताजी का नाम बनारसी लाल चावला है"?
"हाँ", बच्ची ने फिर जवाब दिया।

स्टूडियो में बैठा एंकर इस बात के पीछे पड़ा है कि कल्पना के मरने में और उपासना के पैदा होने में पूरे ५१ दिन का अंतर था। तो ५१ दिन तक कल्पना की आत्मा कहॉ थी। उसके चहरे के भाव देख कर लग रहा था जैसे इसके बस में होता तो तुरंत एक जांच कमीशन बैठा देता। टीवी चैनल ने कल्पना चावला के पिता को भी बुला रखा है। यहाँ भी वही बात। "आप अपनी राय हमें लगातार दीजिए"। आप बतायें कि ये क्या है।

अरे हम कैसे बतायें कि ये क्या है। ये बच्ची हमसे पूछ कर कल्पना चावला बनी थी क्या? उसके बारे आप (टीवी वाले) तो बता ही रहे हैं। फिर हम नया क्या बतायेंगे।

तकनीक विकसित हो रही है, मनोरंजन परिष्कृत हो रहा है. पर चंद्र बली मिश्र के जबरी ठूंसे शेर की रामलीला का मजा क्यों नहीं आ रहा है? आप कोई राय देंगे? बस मोबाइल उठाइये और एस एम एस कीजिये - 0420 पर! वैसे आप चाहें तो इस पोस्ट पर टिप्पणी भी कर सकते हैं. :)