जब भी 'कविता' लिखने के लिए जरूरी मात्रा में तुकबंदी करने बैठा, पचास ग्राम से ज्यादा तुकबंदी नहीं कर सका. आज पहली बार हुआ कि तुकबंदी की मात्रा सौ ग्राम पहुँच गई. इसीलिए ये कविता लिख डाली. झेलिये:
ब्लॉग खोलकर बैठ गए हैंपोस्ट ठेलकर खुश हो जाते
दिन में बीसों बार देखते
पाठक कितने आते-जाते
बने निवेशक टिप्पणियों के
बिना मांग के भी दे देते
अगर मिले ना वापस भी तो
दिन कट जाता पीते-खाते
तीन के बदले एक मिले जो
चेहरा उसपर भी खिल जाता
कभी-कभी ऐसा भी होता
नहीं मिले फिर भी टिपियाते
मिले टिपण्णी यही जरूरी
नाम दिखे या हो बेनामी
कभी-कभी गाली पाकर भी
ब्लॉगर कितने खुश हो जाते
विषयों की भी कमी नहीं है
नेता, जनता, रेल, खेल में
कविता हो या गजल, कहानी
खोजें जहाँ वहीं पर पाते
लेकिन मोदी बिना अधूरी
ब्लागिंग की ये अमर कहानी
जहाँ मिले मौका खुश होकर
उन्हें कोसते और गरियाते
और एक उपलब्धि हमारी
हमने मेहनत से पाई है
तन्मयता से गुटबाजी कर
अपनी बातों को फैलाते
भाषा की ऐसी की तैसी
हम तो 'लिक्खें' नूतन भाषा
हिन्दी में अंग्रेजी जोडें
और अंग्रेजी में 'हिन्दियाते'
बड़े निराले नाम ब्लॉग के
और अनूठे ब्लॉगर के भी
सब में दर्शन रहे खोजते
कुछ में बिन खोजे ही पाते
ऐडसेंस में बड़ा सेंस है
जिनको बात समझ में आई
पोस्टों की बस झड़ी लगाकर
पाठकगण को बहुत सताते
गाली लिक्खें, कसें फब्तियाँ
दुखी अगर कोई हो जाता
अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का
टूटा हुआ रेकॉर्ड बजाते
ये सारी बातें हैं फिर भी
कोई डोर हमें बांधे है
मिलकर हमसब गिरते-पड़ते
चिट्ठापथ पर चलते जाते
चिट्ठापथ पर चलते जाते


