सुदर्शन मेरे मित्र हैं. पढ़ाते हैं. जब पढ़ते थे तो लिखते भी थे. कल कह रहे थे; "जल्दी-जल्दी बुजुर्ग होने की चाहत कभी-कभी बचपना करवा देती थी." आजकल नहीं लिखते. समय न मिलने की शिकायत है. समय के अभाव की बात होती है तो एक शेर टांक देते हैं. कहते हैं;
आसमाँ गर्दिश में था तो पुरशुकूं थी ज़िन्दगी
जब से घूमी है ज़मीं, हर आदमी चक्कर में है
बुजुर्ग बनने की चाहत में उनका किया हुआ एक बचपना पढिये.
कि महफ़िल में कल जिक्र उनका जो आया
मैं लब को सिये था, न कुछ मैंने बोला
मगर सारी नज़रें थीं मेरी तरफ़ ही
कोई तो बताये ये है माज़रा क्या
तुम्हारा शहर तो बहुत ही अजब है
सभी कुछ यहाँ जगमगाता ही रहता
मगर हर कोई दौड़ता, भागता है
कोई तो बताये, ये हा माज़रा क्या
वो, कल जिसका चर्चा था सारे शहर में
मिला आज मुझको तो तनहा बहुत था
जो मशहूर है, वो अकेला भी है क्यूं
कोई तो बताये ये है माज़रा क्या
ये क्या हो गया है, जुबानें हैं खामोश
सभी पर हैं पहरे, सभी हैं डरे से
वो जब चाहें, जो चाहें, करके निकल लें
कोई तो बताये ये है माज़रा क्या
---सुदर्शन अग्रवाल
Friday, August 29, 2008
कोई तो बताये ये है माज़रा क्या....
Thursday, August 28, 2008
हलवा-प्रेमी राजा
उसने राजा के ऊपर कभी एहसान किया था. राजे-महाराजे होते ही ऐसे थे कि उनके ऊपर कोई न कोई एहसान कर गुजरता था. राजाओं की बेचारगी के किस्सों से इतिहास भरा है. सूर्यवंशी दशरथ जी भी कभी इतनी बेचारगी के दौर से गुजरे कि कैकेयी जी जैसों के एहसान तले दबे. नतीजा हम सभी जानते हैं.
मजे की बात ये कि एहसान से दबे राजा-महाराजा वादा कर डालते थे; "हम तुम्हें एक वचन देते हैं. अभी तो अपनी तिजोरी में रख लो. जब इच्छा हो, भंजा लेना." दशरथ जी से प्रभावित इस राजा ने भी इस आदमी को वचन की हुंडी थमा दिया था. एक दिन इस आदमी ने अपनी तिजोरी में रखे राजा के वचन को निकाला. उसे धोया-पोंछा और उसे लेकर राजा जी के पास पहुँचा. बोला; "वो आपने मुझे जो वचन दिया था, आज मैं उसे भजाने आया हूँ."
राजा जी के पास कोई चारा नहीं था. एक बार तो उन्होंने सोचा कि वचन की इस हुंडी को एक कटु-वचन कहकर बाऊंस करवा दें. लेकिन इस बात की चिंता थी कि अगर ऐसा हुआ तो ये आदमी उन्हें बदनाम कर सकता था. हल्ला मच देगा कि राजा जी के वचन की हुंडी तो बाऊंस हो गयी. एक प्रेस कांफ्रेंस ही तो करना था. राजा की इज्जत धूल में मिल जाती. टीवी न्यूज चैनल वाले चटखारे लेकर राजा की ऐसी-तैसी करने में देर नहीं लगाते.
इन्ही सब बातों को ध्यान में रखकर राजा जी बोले; "अच्छा मांगो. क्या चाहिए तुम्हें?"
वो बोला; "मैं कुछ दिनों के लिए राजा बनना चाहता हूँ. देखना चाहता हूँ कि क्या-क्या मज़ा लूटा जा सकता है."
राजा जी बोले; "ठीक है. तुम बन जाओ राजा." ये कहते हुए राजा जी ने उसे सिंहासन पर बैठा दिया.
इस आदमी ने कंधे पर लटक रही अपनी झोली को महामंत्री के हवाले किया और राजा के सिंहासन पर पसर गया. महामंत्री को हिदायत दी कि उसकी झोली को बहुत संभालकर रखा जाय. आख़िर अब वो एक राजा की झोली थी. बड़ी कीमती.
जिस दिन राज सिंहासन पर पसरा, उसी दिन से मज़ा लूटना शुरू कर दिया. दरबारियों को बुलावा भेजा. जब सारे दरबारी हाज़िर हुए तो उसने आदेश दिया; "सबके लिए सोने की कटोरी में हलवा पेश किया जाय."
हंसी-मज़ाक करते सबने हलवा खाया. दरबारियों को भी खूब मज़ा मिल रहा था. राजा और उसके दरबारियों की शाम हलवामयी होने लगी.
सुबह-शाम हलवे में डूबा ये राजा मस्त था. एक दिन मंत्री ने आकर कहा; "महाराज, पड़ोस के राजा ने हमारे राज्य पर चढ़ाई कर दी है." राजाओं को और काम ही क्या था? शिकार करने से बोर हुए तो पड़ोस के राज्य पर चढ़ाई कर दो.
मंत्री की बात सुनकर राजा बोला; "चढ़ाई कर दी? अच्छा कोई बात नहीं. दरबारियों को बुलाओ."
सारे दरबारी आ पहुंचे. सबके आने के बाद राजा ने फ़िर वही फरमाइस की; "सबके लिए हलवा ले आओ." हलवा खाकर सारे दरबारी खुश. दरबार खारिज.
दूसरे दिन मंत्री फिर दौड़ते हुए आया. बोला; "महाराज पड़ोस के राज्य का राजा तो हमारे नगर में प्रवेश कर चुका है."
राजा ने फिर दरबारियों को बुलाया. फिर वही हलवे की फरमाइस. फिर वही हलवा भक्षण कार्यक्रम और फिर से दरबार खारिज. ऐसे ही एक दिन और बीता.
तीसरे दिन मंत्री फिर दौड़ता हुआ आया. बोला; "महाराज, पड़ोस का राजा तो आपके महल में प्रवेश कर चुका है."
मंत्री की बात सुनकर उसने बिना किसी चिंता के कहा; "महल में प्रवेश कर चुका है? अच्छा, एक काम करो. मेरी झोली ले आओ. वही झोली जो मैंने तुम्हें रखने के लिए दी थी."
झोली को हाज़िर किया गया. उसने अपनी झोली कंधे पर टांगी और वहां से चलने लगा. मंत्री ने कहा; "महाराज कहाँ जा रहे हैं? इस समय सिंहासन छोड़कर जाना उचित नहीं. "
वो बोला; "भइया, मैं तो हलवा खाने आया था. मैंने पेट भरकर अपनी साध पूरी कर ली. अब तुम जानो और तुम्हारे राजा. मैं तो चला." ये कहते हुए वो आदमी निकल लिया.
इस हलवा-प्रेमी राजा का 'लेटेस्ट एडिशन' इस समय हमारे ऊपर शासन तो नहीं कर रहा?
Monday, August 25, 2008
स्टिंग आपरेशन और न्याय-व्यवस्था - एक री-ठेल पोस्ट
(सं) वैधानिक सूचना:
दिल्ली में हुए बीएमडब्लू केस में एनडीटीवी ने एक स्टिंग आपरेशन किया था. इस स्टिंग आपरेशन में दो महान वकील, श्री आर के आनंद और श्री आई यू खान खान को 'वकालत' करते पाया गया था. मैंने ये पोस्ट उस समय लिखी थी. वैसे पिछले दिनों दोनों वकीलों को अदालत ने दोषी करार दे दिया.
मैं इस पोस्ट को फिर से पब्लिश कर रहा हूँ. कारण यह है कि इस पोस्ट पर मुझे एक भी कमेन्ट नहीं मिला था. अब जैसा कि मैं हमेशा से कहता आया हूँ; "मैं कमेन्ट पाने के लिए लिखता हूँ." इसीलिए मेरी आप सब से गुजारिश है कि आप कमेन्ट जरूर करें. बिना पढ़े भी कमेन्ट करेंगे तो चलेगा. बस कमेन्ट कीजियेगा. प्लीज.
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करीब एक सप्ताह हो गया, देश की जनता का इस देश की न्याय व्यवस्था पर से विश्वास उठ गया है. वो भी इसलिये कि, देश के दो विख्यात वकील एक 'स्टिंग ऑपरेशन' में कुछ ऐसा करते दिखे जो न्याय व्यवस्था के हिसाब से ठीक नहीं माना जाता. टीवी चैनल ने इन वकीलों की करतूत दिखाने के साथ-साथ जनता के सामने एक सवाल भी दाग दिया;
'इस स्टिंग ऑपरेशन को देखने के बाद आपका विश्वास क्या देश कि न्याय व्यवस्था से उठा गया है?'
टीवी चैनल जब भी ऐसे सवाल करते हैं, जनता फूली नहीं समाती. जनता को लगता है कि देश के लिए कुछ करने का असली मौका आज हाथ लगा है. अगर उसने संदेश नहीं भेजे तो देश रसातल में चला जाएगा. नतीजा ये हुआ कि जनता ने संदेशों कि झड़ी लगा दी. टीवी चैनल को बताया कि 'आपने ये दिखाकर हमारी आंखें खोल दीं. कमाल कर दिया आपने. हमारा विश्वास सचमुच ऐसी न्याय व्यवस्था से उठ गया.
मानो कह रहे हों; "आज सुबह तक हम अपने देश कि कानून व्यवस्था को दुनिया में सबसे अच्छा मानते थे लेकिन आज हमने ऐसा मानने से इनकार करना शुरू कर दिया है." टीवी चैनल भी कुछ ऐसा बर्ताव करता है जैसे कह रहा हो; " देखा; अगर हम नहीं दिखाते तो तुम्हें कैसे पता चलता कि हमारे देश में क्या हो रहा है? एहसान मानो हमारा कि हम हैं."
सालों से हम ऐसी व्यवस्था देखते आ रहे हैं. लेकिन ऐसा क्यों है कि 'स्टिंग ऑपरेशन' देखने के बाद हमारे चेहरे पर ऐसे भाव हैं जैसे मिस वर्ल्ड का खिताब जितने के बाद उस सुंदरी के चेहरे पर होता है जिसने खिताब जीता है. हम सालों से ऐसी व्यवस्था के शिकार हैं. आंकड़े निकाले जायेंगे तो मिलेगा कि हम सभी न सिर्फ इस व्यवस्था के शिकार हैं, बल्कि इसका हिस्सा भी हैं. न्याय व्यवस्था कि धज्जी उड़ाते हुए न जाने कितनों को देखा जा सकता है. नेता हो या पुलिस, जनता हो या वकील, कोई अछूता नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने कावेरी जल-विवाद में फैसला दिया. लेकिन कर्णाटक के तत्कालीन मुख्यमंत्री ने नहीं माना. हड़ताल और बंद को लेकर न्यायालय के फैसले को कौन मानता है? हमारी मौजूदा केंद्र सरकार ने तो पिछले दो-तीन सालों में सुप्रीम कोर्ट के कितने ही फैसले विधेयक पास करके रद्द कर दिए हैं. आये दिन हमारी लोकसभा के स्पीकर न्यायपालिका को धमकी देते रहते हैं. तो फिर 'स्टिंग ऑपरेशन' देखकर चहरे पर ऐसे भाव क्यों हैं?
मुझे सत्तर के दशक कि एक हिन्दी फिल्म याद आती है. सुभाष घई ने बनाई थी. नाम था विश्वनाथ. उसमें प्राण साहब ने एक बड़ा ही मजेदार चरित्र निभाया था. गोलू गवाह का चरित्र. एक ऐसा आदमी जिसका काम ही है कोर्ट के बाहर मौजूद रहना और पैसे लेकर किसी के लिए गवाही देना. हम अंदाजा लगा सकते हैं; जब सत्तर के दशक में ऐसा हाल था, तो फिर आज कैसा होगा? तुलना की बात केवल इस लिए कर रह हूँ क्योंकि सुनाई पड़ता है कि ज़माना और खराब हो गया है. नैतिकता करीब ३० से ४० प्रतिशत और गिर गई है.
१९९१ में इस देश में आर्थिक सुधारों की शरुआत हुई. वैसे मुझे आजतक समझ में नहीं आया कि अपने शासन को सबसे अच्छा बताने वाले लोगों को अपने द्वारा किये गए कामों में सुधार कि ज़रूरत क्यों महसूस होने लगी? चलिये ये एक अलग विषय है. आर्थिक सुधारों के साथ-साथ क्या सरकार को और बातों में सुधार की आवश्यकता महसूस नहीं हुई? न्याय व्यवस्था में सुधार, पुलिस में सुधार, शिक्षा में सुधार; ये बातें सरकार के कार्यक्रम में नहीं हैं क्या? चलिये सरकार कि बात अगर छोड़ भी दें, तो हमने क्या किया? आरक्षण पाने के लिए हम ऐसा 'आंदोलन' कर सकते हैं, जिसमें लोगों का मरना एक आम बात है. लेकिन हम ऐसा आंदोलन नहीं कर सकते जिसकी वजह से सरकार से सवाल कर सकें कि हे राजा क्या हमें इन सुधारों कि ज़रूरत नहीं है? और अगर है तो फिर कब शुरू करेंगे आप इन सुधारों को?
हमारी ताक़त केवल आर्थिक सुधारों को रोकने में और आरक्षण पाने के लिए झगड़ा करने में लगी हुई है. टीवी पर बहस करके बात ख़त्म कर दी जाती है. बहस में नेता और विशेषज्ञ आते हैं. साथ में तथाकथित जनता भी रहती है जो सवाल करती है. वास्तव में वह सवाल करने नहीं आती वहाँ पर. आती है ये देखने कि टीवी कि स्क्रीन पर दिखने में मैं कैसा लगता हूँ.
टीवी पर एक बहस देखी मैंने. उसमें एक वकील आये थे. उनसे पूछा गया कि उन्हें क्या लगता है; न्याय व्यवस्था की ऐसी हालत क्यों हैं? क्यों जज और वकील घूस लेते हुए देखे जाते हैं? क्यों गवाह तोड़े जाते हैं या किसी किसी-किसी केस में ख़त्म कर दिए जाते हैं? उन्होने इन सवालों का बड़ा रोचक जवाब दिया. उन्होने बताया; वकीलों को बैठने की जगह नहीं है, अदालत में टाईपराइटर ठीक से काम नहीं करते, बुनियादी सुविधाओं की कमी है. आप खुद सोचिये. सुविधाओं की कमी है, इसलिये लोग घूस लेते हैं! गवाह तोड़े जाते हैं. किसी ने उनसे ये नहीं पूछा कि अगर ऐसी बात है तो फिर आपने क्या किया? कहीँ पर किसी को सुविधाएं बढाने के लिए आवेदन भी किया क्या? शायद अच्छा ही हुआ कि किसी ने नहीं पूछा. उनका जवाब शायद ये होता कि भैया मुझसे क्यों पूछते हो; मैं आम इन्सान हूँ क्या? मैं तो वकील हूँ. मैं न्याय व्यवस्था से तो पीड़ित नहीं हूँ. फिर मुझे क्या पडी है कि मैं सरकार से कहूँ कि सुविधाओं को बढाया जाय.
जब तक हम टीवी कि तरफ देखेंगे कि वो हमें बताये कि हमारे साथ क्या बुरा हो रहा है; जब तक हम संदेश भेजकर अपना नाम टीवी कि स्क्रीन पर देखने कि ललक मन में रखेंगें; जब तक हमारा 'आंदोलन' टीवी के पैनल डिस्कशन तक आकर रूक जाएगा; तब तक कहीँ भी सुधार की संभावना नहीं है. क्योंकि न्याय-व्यवस्था से जुड़े बहुत सारे लोग न्याय नहीं होने देंगे.
आख़िर न्याय व्यवस्था उनके हाथों में है - वे व्यवस्था से पीड़ित नही है.

