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Friday, October 31, 2008

तब तो अच्छा है, हम रोज सबेरे पूजा के लिए समय बढ़ा दें...




- आसाम में बम फट गया, आप कुछ करते क्यों नहीं?

- और क्या करें, दुःख तो प्रकट कर दिया.

- दुःख प्रकट करके क्या मिलेगा? देश में दुःख तो पहले से ही व्याप्त है.

- वो तो ठीक है लेकिन किसी चीज का स्टॉक बढ़ जाए तो हर्ज क्या है?

- लेकिन दुःख प्रकट करने के अलावा और भी तो कुछ कीजिये.

- करेंगे करेंगे. फिलहाल तो हम श्रीलंका की समस्या सुलझा रहे हैं?

- वो तो देख रहे हैं. लेकिन कभी भारत की समस्याओं के बारे में भी तो सोचिये.

- सोचा तभी तो न्यूक्लीयर डील पास करवा दिया. और क्या चाहिए?

- लेकिन आपकी डील से बाकी की समस्याओं पर तो कोई असर नहीं पड़ रहा.

- पड़ेगा, पड़ेगा. थोड़ा धीरज धरो.

- वही तो कर रहे हैं. धरने के लिए धीरज ही तो बचा है. आटा, दाल, चावल वगैरह भी तो नहीं बचा है धरने को.

- यही तो कमीं है तुम्हारे अन्दर. आटा,दाल से कभी ऊपर उठोगे कि नहीं?

- हम तो पृथ्वी से भी उठते जा रहे हैं. आटा, दाल की बात जाने दीजिये.

- उठना ही चाहिए.

- मुंबई में इतना कुछ हुआ जा रहा है. कुछ सोचिये.

- केवल सोचेंगे क्यों? हमने अपील की है न. सब ठीक हो जायेगा.

- लेकिन कुछ प्रशासनिक कार्यवाई भी तो होनी चाहिए.

- गाँधी जी के देश में अपील से सबकुछ निबट जाता है. प्रशासनिक कार्यवाई की क्या ज़रूरत?

- अपील का कोई असर तो हो नहीं रहा है.

- होगा, होगा. धीरज धरो.

- फिर वही धीरज?

- तुम्ही ने तो कहा कि धरने को और कुछ नहीं है.

- और आपने पकड़ लिया?

- हमारी तो पकड़ने की आदत है. हमें तो तिनका, ननका कुछ भी मिले, हम तो पकड़ लेते हैं.

- कोई तिनका मिला हो, तो घुमाईये न.

- तिनका की जाने दो, हमारा ट्रबुल शूटर अभी भी हमारे साथ है.

- कौन?

- इतना भी नहीं समझते? अभी तो पूरे भारत में एक ही है.

- अच्छा, उनकी बात कर रहे हैं.

- और क्या समझे तुम?

- हमने सोचा बुश की बात कर रहे हैं.

- रह गए तुम भी बकलोल. उनके आगे बुश की क्या औकात?

- सही कह रहे हैं. बुश की औकात कुछ नहीं. होती तो वही न्यूक्लीयर डील न पास कर दिए होते?

- हाँ, सही समझे.

- लेकिन आपके ट्रबुल शूटर ने न जाने कहाँ-कहाँ से किसका-किसका कांट्रेक्ट ले रखा है.

- काबिल आदमी है.

- और कोई काबिल नहीं है आपकी नज़र में?

- कोई नहीं.

- तब तो अच्छा है, हम रोज सबेरे पूजा के लिए समय बढ़ा दें.

Wednesday, October 29, 2008

तीन तो जाने दीजिये, एक भी नहीं आया




कल सुबह से ही हम लकी हो लिए हैं. ये न समझिये कि मैंने दिवाली के दिन जुआ खेलकर पैसा-वैसा कमा लिया है. वो तो हुआ ऐसा कि चार-पाँच लोगों ने कल दीपावली के शुभ अवसर पर एस एम एस भेजकर मुझे बताया; "तीन लोग मुझसे आपका मोबाइल नंबर पूछ रहे थे. हमने उन्हें आपका मोबाइल नंबर तो नहीं दिया लेकिन आपके घर का पता अवश्य दे दिया. ये तीन लोग हैं, सुख, समृद्धि और शान्ति. आज ये तीनों आपके घर ज़रूर आयेंगे."

ये तो एस एम एस का निचोड़ टाइप है. एस एम एस बड़ा था. पढ़ने लगा तो पहली लाइन पढ़कर ही डर गया. पहली लाइन में लिखा था; "तीन लोग आपका मोबाइल नंबर पूछ रहे थे."

एक बार तो पढ़कर डर गया. ये सोचते हुए कि तीन-तीन लोग नंबर काहे खोज रहे हैं? सोचने लगा कि कौन हैं भाई ये लोग? वो भी एक नहीं, तीन-तीन लोग हैं. पता नहीं क्या लफड़ा है? मोबाइल नंबर क्यों पूछ रहे हैं? कोई धमकी-वमकी देने का प्लान बनाया है क्या? कोई भाई टाइप लोग तो नहीं हैं? शंका इसलिए और बढ़ गयी क्योंकि तीनों ने कई लोगों से मेरा ही मोबाइल नंबर जानने की कोशिश की. आख़िर मामला क्या है?

खैर, आगे पढ़ा तो पता चला कि ये तीनों कोई और नहीं बल्कि सुख, समृद्धि और शान्ति हैं.

लेकिन तीनों एक साथ? सुख आने से शान्ति तो आ सकती है लेकिन समृद्धि आने से? उसके आने से कहाँ शान्ति? अशांति ही अशांति है.

दादा, भाई टाइप लोग पूछने लगते हैं; "सुना है तुम्हारे यहाँ समृद्धि बस गयी है. ये समृद्धि तुम्हारे यहाँ आकर क्यों जम गयी है? सुना है भारी मात्रा में आई है. इसमें से थोड़ा हमें भी ट्रान्सफर कर दो. और सुनो, ट्रान्सफर नहीं किया तो..."

मैंने ख़ुद कई बार लोगों को दूसरों की समृद्धि का बंटवारा करते देखा है.

लकी तो फील कर रहा था लेकिन एक बात से शिकायत भी थी. मैं पूछता हूँ कि इन तीनों को मेरे घर आना ही था तो दूसरों से मेरा नंबर मांगने की क्या ज़रूरत थी? दूसरों से नंबर पूछने पर वे लोग गुमराह कर देते तो? देवी-देवताओं ने जब इन तीनों को मेरे घर भेजा तो उन्हें चाहिए था कि पता भी बता देते. पता नहीं बताया कोई बात नहीं. कम से कम मोबाइल नंबर तो दे देते.

फिर सोचता हूँ, देवताओं ने इन तीनों की ड्यूटी न जाने कहाँ-कहाँ लगाई होगी. ऐसे में दो-चार लोगों का पता और मोबाइल नंबर बताना भूल भी जाएँ तो कैसा अचम्भा? लेकिन फिर भी देवी-देवताओं की ऐसी गलती से कोई लफड़ा हो जाता तो?

आख़िर ऐसा भी तो हो सकता था कि इन तीनों ने जिन लोगों से मेरा मोबाइल नंबर पूछा हो सकता है वे इन तीनों को गुमराह कर देते. हो सकता है वे ख़ुद अपना ही मोबाइल नम्बर दे देते. फिर देखा जाता कि सुख, समृद्धि और शान्ति सिमकार्ड के रास्ते चलकर उनके मोबाइल में घुस गए.

मोबाइल जबतक उनके पास है तबतक तीनों उन्ही के यहाँ डटे हुए हैं. बाकी दुनियाँ में सारे लोग हलकान हुए जा रहे हैं. हलकान होने से काम न चलता देख, इनका मोबाइल ही चोरी करने का प्लान बनाने लगते. उनके पुराने मोबाइल फ़ोन की कीमत अचानक ही बढ़ जाती. लोग मुंह माँगी कीमत देने पर उतारू हो जाते.

लेकिन इस मामले में मैं बड़ा लकी निकला. मेरा लक देखिये कि सुख, समृद्धि और शान्ति ने भले लोगों से ही मेरा मोबाइल नंबर पूछा. किसी ऐरे-गैरे या ख़राब टाइप लोगों से नहीं.

ख़राब लोगों से पूछा होता तो वे लोग घर का पता तो जाने दीजिये, मोबाइल नंबर तक नहीं बताते. ऊपर से इन तीनों को अपना ही मोबाइल नंबर देकर ख़ुद ही निहाल हो लेते. लेकिन हमारे चाहने वालों ने ऐसा कुछ नहीं किया. आख़िर भले लोग जो हैं.

ऐसे ही भले लोगों की वजह से अभी भी दुनियाँ में पाप कभी-कभी डिफ़ीटेड फील करता है.

सुबह से लकी फील करने का जो कार्यक्रम शुरू हुआ वो शाम तक मुझे पूरी तरह से मस्त किए रहा. मन में आया कि दोस्त-यार टाइप लोगों को बता दूँ कि आज कौन-कौन मेरे घर आने वाला है. फिर सोचा बताना ठीक रहेगा? ऐसा न हो कि ये लोग नज़र लगा दें.

आख़िर इस तरह की सोच ही तो पक्की दोस्ती की निशानी है.

फिर सोचा कि एक बार बता दूँ ताकि दोस्त-यार जल-भुन जाएँ. ऐसा इसलिए कि यही सोच इंसानियत को पक्का करती है.

मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूँ कि मनुष्य जब भी ऐसा सोचता है, मुकेश साहब का गीत "न मैं भगवान हूँ न मैं शैतान हूँ, दुनियाँ जो चाहे समझे, मैं तो इंसान हूँ" गाकर संतोष कर लेता है.

खैर, सुबह से लकी फील करने का 'दिवालीय कार्यक्रम' शाम आते-आते मेरा पेशेंस टेस्ट कर रहा था. अचानक मुझे एहसास हुआ कि एस एम एस करने वाले भले आदमी ने बताया ही नहीं कि इन तीनों के आने का एक्जेक्ट टाइम क्या होगा?

आख़िर एक बार आने का समय पता चल जाता तो समय से केवल आधे घंटे पहले से इंतजार शुरू करते. बाकी के समय आराम से बैठते. जब इन लोगों के आने का समय होता तो घर के सामने कुर्सी डालकर बैठ जाते. जैसे ही ये तीनो दिखाई देते इन्हें चाय-पानी पूछ लेता. चाय-पानी से इनका मन भरा हुआ होता तो बिना सुगर वाला लड्डू खिला देता. वो भी न खाते तो भुजिया, नमकीन वगैरह का यथोचित इंतजाम कर डालता.

वेट करते-करते जान निकली जा रही थी. पूजा भी कर रहा था तो दरवाजे की तरफ़ देख लेता.

एक बार तो पत्नी ने पूछ ही लिया; "ये बार-बार दरवाजे की तरफ़ क्यों देख रहे हो?" अब उसे कैसे बताऊँ कि आज कौन-कौन आने वाला है. मैंने सोच रखा था कि पत्नी को सरप्राईज दूँगा.

आख़िर सुखी दाम्पत्य जीवन के लक्षण ही यही हैं कि पति-पत्नी एक-दूसरे को सरप्राईज देते रहें.

पूजा ख़त्म हो गई. प्रसाद तक खा गया. प्रसाद का लड्डू खाकर इंतजार करते रहे. थोड़ी देर बाद प्रसाद में रखा सेब खा गया. थोड़े और इंतजार के बाद पानीफल खा गया. इंतजार और बढ़ा तो मेहनत करके मुसम्मी तक खा गया. लेकिन इन तीनो का कहीं पता नहीं.

मन में तो आया कि इंतजार करते-करते कोई फिल्मी गाना गुनगुना लूँ. गाना गुनगुनाते हुए इंतजार करने से मनुष्य स्मार्ट लगता है.

खैर, नाक से गाना शुरू ही किया था कि एक मित्र का फ़ोन आ गया. उसने पूछा; "क्या कर रहे हो?"

मैंने सोचा इसे सच नहीं बताऊँगा. मैंने उससे कहा; "पूजा कर रहा था. तुम क्या कर रहे हो?"

मेरी बात सुनकर वो बोला; "असल में कुछ लोग आने वाले हैं. उन्ही का इंतजार कर रहा हूँ. इंतजार करते-करते बोर हो रहा था तो सोचा चलो तुम्हें फ़ोन कर लूँ."

उसकी बात सुनकर मुझे लगा कि इतनी रात गए ये किसका इंतजार कर रहा है? मैंने उसे कुरेदा तो वो बोला; "हैं दो-तीन लोग. आप उन्हें नहीं पहचानते."

उसकी इस बात पर मुझे उसके ऊपर शंका हुई. आख़िर एक दोस्त दूसरे दोस्त के ऊपर शंका न करे तो दो कौड़ी का दोस्त. अगर शंका दोनों तरफ़ से होती रहे तो दोस्ती में दरार नहीं आती.

मैंने कहा; "अरे नहीं जानता तो कोई बात नहीं. नाम तो बताओ, शायद पहचान लूँ."

बड़ी हील-हुज्जत के बाद उसने बताया. तब जाकर पता चला कि वो भी इन्ही तीन लोगों का इंतजार कर रहा था. उसे भी किसी भले आदमी ने बताया था कि ये तीनो उसके घर भी आने वाले हैं.

हम दोनों बात करने लगे तो लगा कि सारा शहर ही इंतजार में है. रात को तो कोई नहीं आया. तीन को तो जाने दीजिये, एक भी नहीं आया.

सुबह उठकर सोचने लगे कि कल शाम को ही अगर कर्मों का लेखा-जोखा तैयार कर लेते तो इतना इंतजार तो नहीं करना पड़ता.

Saturday, October 25, 2008

ई बाज़ार का अऊर का होगा?.....




बाज़ार गिर गया. गिरना ही था. कितने दिन खड़ा रहता? इमारतें गिरती हैं, पेड़ गिरते हैं, ब्रिज गिरते हैं, नेता गिरते हैं. और तो और इंसान भी मौका देखकर गिर लेते हैं. देखा-देखी बाज़ार भी गिर लिया. आख़िर सबकुछ गिर रहा था. अब ऐसे में अगर बाज़ार न गिरता तो उसकी बड़ी किरकिरी होती.

वैसे भी, बाकी सबलोग गिरते-गिरते बाज़ार को हेयदृष्टि से निहारते होंगे. कहते होंगे; "एक हम हैं जो गिरते जा रहे हैं और एक तुम हो जो खड़े हुए हो. ज़रा भी शरम नहीं बची है तुम्हारे अन्दर? इतनी भी औकात नहीं कि गिर जाओ."

बाज़ार को इन इमारतों, ब्रिजों और इंसानों की हेयदृष्टि बर्दाश्त नहीं हुई होगी और गिर लिया. वैसे ये शोध का विषय हो सकता है कि बाज़ार की वजह से सबकुछ गिरा या बाकी सबकुछ की वजह से बाज़ार. वही, पहले मुर्गी आई या पहले अंडा?

बाज़ार गिरा तो बाज़ार में रखी बाकी चीजें भी गिर गईं. वो सारी चीजें जो अभी तक खड़ी हुई थीं. अर्थ-व्यवस्था गिर गई, रुपया गिर गया, क्रूड गिर गया. बैंक गिर गए. अमेरिका तक गिर गया. क्या-क्या गिनाऊँ, लिस्ट बड़ी लम्बी है.

अब बाज़ार गिरा तो चर्चा भी होगी. हर चर्चा का आधार गिरावट ही है. बिना चर्चा के किसी गिरावट का महत्व नहीं. वो चाहे संकृति हो या बाज़ार. जाहिर सी बात है कि बाज़ार की गिरावट पर भी चर्चा होगी. और ये चर्चा दो जगह सबसे ज्यादा हो रही है. एक टीवी पर और दूसरी चाय-पान की दूकान पर.

कल रतीराम चौरसिया की दूकान पर पान खाने गया. पान लगाने के लिए कहा. रतीराम जी पान लगाते-लगाते बोले; "बाज़ार त बहुते गिर गया."

मैंने कहा; "पूछिए मत. बहुत गिर गया है."

मेरी बात सुनकर बोले; "वैसे आप का क्या हाल है? आप भी त बाज़ार वाले ही हैं. आप भी गिरे का?"

मैंने कहा; "हाँ. अब बाज़ार में रहकर हम कैसे बचे रह सकते थे. हमें भी गिरा हुआ ही समझिये."

क्या करता शायरों वाली 'साफगोई' होती तो कहकर निकल लेता कि; "बाज़ार से गुजरा हूँ, खरीदार नहीं हूँ." लेकिन इतनी 'साफगोई' अब दुर्लभ है. इस डिप्लोमेसी के ज़माने में साफगोई प्रीमियम में मिलती है. वैसे भी रतीराम जी को हमारे बारे में पता नहीं होता तो ये भी कहकर निकल लेते कि; "ये शेयर-वेयर के बारे में तो हमें कुछ पता नहीं है जी. हम तो ऐसी चीजों से दूर ही रहते हैं."

ठीक राम दयाल की तरह जिनका ट्रेडिंग अकाउंट हमारे यहाँ ही चलता है लेकिन मैंने सुना कि किसी से कह रहे थे; "अरे बाप रे. हम और शेयर! न न, हम ये सब चीजों से दूर ही रहते हैं. अरे, शेयर का है? जुआ."

खैर, रतीराम जी मेरी बात सुनकर मुस्कुरा दिए. बोले; "सही बात है. बजार में रहेंगे त बचना तो मुश्किल ही है. बाकी एक बात कहेंगे."

मैंने पूछा; "कौन सी बात?"

वे बोले; "न जाने केतना बाज़ार वाला सब आता है हमारे इहाँ पान खाने. ई लोग का बात का वजह से हमारे अन्दर त बड़ा हीन भावना उपज जाता है."

उनकी बात सुनकर मुझे बड़ा अजीब लगा. मैंने पूछा; "क्यों, आपके अन्दर हीन भावना क्यों है?"

बोले; "असल में का है कि हमरे दूकान पर पान खाते-खाते जब आप जईसा लोग बताता है कि उनका लाखों डूब गया त हमको बड़ा हीन भावना होता है."

मैंने कहा; "पैसा उनका डूबा, लेकिन हीन भावना से आप ग्रसित हैं. ये बात कुछ समझ में नहीं आ रही है."

मेरी बात सुनकर मुझे ऐसे देखा जैसे कह रहे हो; 'आप भी पूरा बकलोले हैं.' फिर मुस्कुराते हुए बोले; "असल में उनका 'लास' का फिगर सब सुनकर हमको लगता है कि एक ई लोग हैं जो 'लास' करके देश का अर्थ-व्यवस्था में अपना योगदान कर रहा है और एक हम हैं कि कोई योगदान नहीं दे पा रहे हैं."

उनकी बात सुनकर लगा जैसे चौरसिया जी प्लान बनाकर खिचाई करने पर उतारू हैं. उनके महीन मजाक करने की आदत से मैं वाकिफ था. इसीलिए मैंने कुछ नहीं कहा.

लेकिन बात ऐसे कैसे ख़त्म हो जाती. समस्या ये थी कि वहीँ पर जगत बोस खड़े थे. बोस बाबू टेक्नीकल अनालिस्ट है. रतीराम जी की बात सुनकर बोले; "अरे चौरसिया जी, देश की अर्थ-व्यवस्था में तो आप योगदान कर ही रहे हैं आप. पान बेंच रहे हैं. इससे तो जीडीपी बढ़ ही रहा है. जीडीपी समझते हैं कि नहीं?.... ग्रास डोमेस्टिक प्रोडक्ट्स. माने ये कि आप जितना काम कर रहे हैं, उससे जो पैसा निकल रहा है, वो देश के इनकम में जुट रहा है. जीडीपी को हिन्दी में सकल घरेलू उत्पाद कहते हैं. आप समझ लीजिये...."

उसकी बात सुनते-सुनते अचानक रतीराम जी धीरे से बोल पड़े; "समझ गए हम."

उनकी बात सुनकर बोस बाबू बोले; "क्या समझ गए? अभी तो मैंने आपको पूरा बताया कहाँ?"

रतीराम जी मुस्कुराते हुए बोले; "समझ गए कि बाज़ार का अवस्था अईसा काहे है."

मुझे पान थमाते हुए बोले; "ई बाज़ार का अऊर का होगा?"