सब अपने-अपने मौसम को संभालते दिख रहे हैं. ब्लॉगरगण कवितायें लिखकर बसंत को संभाल रहे हैं तो कवि गण अपनी-अपनी चुटुकुले वाली कविताओं से काव्यप्रेमियों को संभालने की जुगत लगा रहे हैं. कवि सम्मलेन-ओम्मेलन का प्रोग्राम रोजई बन-बिगड़ रहा है.
हाल तो ई है कि चलते-चलते कहीं नज़र चली जाए तो हास्यास्पद रस के कवि सम्मेलनों के पोस्टर हाथ हिलाते लौक जाते हैं. जैसे कह रहे हों; "अरे आफिस के काम-धंधे तो चलते ही रहेंगे. एक-आध दिन हास्यास्पद रस में भी तो डूबकर देखो. खूब मज़ा आएगा."
कविगण कुर्ता धुलवाते और उसपर इस्तिरी देते हलकान हुए जा रहे हैं. काव्य-प्रेमी आफिस से शाम को जल्दी निकलने की जुगत भिड़ा रहे हैं. चिंता खाली मार्च के महीने की है जो हर जुगत को सल्टाता हुआ जान पड़ता है.
कारपोरेट संस्कृति काव्य संस्कृति के आड़े आ जा रही है.
वैसे अगर सबसे बढ़िया किसी की छन रही है तो ऊ हैं नेता लोग. उनको न तो बसंत-वसंत की चिंता और आफिस की परेशानी. कवि सम्मेलनों में वैसे ही नहीं जाते. कविगण नब्बे प्रतिशत कविताओं में कुत्तों और गधों को नेता से ऊंचा बताते हैं.
ऐसे में नेता जी क्या करें?
वे तरह-तरह के पोज से अखबार का पृष्ट रंग दे रहे हैं. आखिर जो मज़ा फोटो खिचाकर चुनाव प्रचार में है वो मज़ा बसंत और आफिस में कहाँ मिलेगा?
सामने अखबार रखा हुआ है. पांच-छ पेज पर खाली नेता, उपनेता, अनेता, सुनेता, कुनेता, मंत्री, उपमंत्री, राज्यमंत्री, मुख्यमंत्री, दम वाले मंत्री, बेदम वाले मंत्री छाए हैं. अखबार का पेज योजना, परियोजना, उप-योजना से लेकर अति-योजना की डिटेल से भरा पड़ा है.
भारत संचार का विज्ञापन है. विज्ञापन में बताया गया है कि हर फ़ोन-काल का रेट पचास पैसा. साथ में पार्टी अध्यक्षा, प्रधानमंत्री, सूचना मंत्री, सूचना राज्य मंत्री की फोटो लगी है. इनलोगों की फोटो के सामने ही पचास पैसा के सिक्के का फोटू छपा है. देखकर एक बार के लिए कोई भी कन्फ्यूजिया जाए. ये सोचते हुए कि ये पचास पैसे का सिक्का फ़ोन-काल का रेट बता रहा है या....
परियोजनाओं के उद्घाटन की तो पूछिए ही मत.
"मंत्री जी से मिलना था."
"भैया, मंत्री जी अगले चार दिन तक नहीं मिलेंगे. परियोजना का उद्घाटन करने गए हैं. दस दिन से बिजी हैं. तीन तारीख तक भेंट नहीं कर सकोगे. उनका टारगेट है अगले चार दिन में पौने आठ सौ परियोजनाओं के उद्घाटन करने का."
हालत यह है कि रेल का कारखाना, खेल का कारखाना से लेकर भेल का कारखाना, कुछ भी उद्घाटित होने से नहीं बच पा रहा.सड़क परियोजना से लेकर पुल परियोजना और फैक्टरी से लेकर सैक्टरी, कुछ भी नहीं छोडेंगे.
एक ही मंत्री एक दिन में चालीस-पचास उद्घाटन कर डाल रहा है. कभी-कभी पढ़कर लग रहा है जैसे अगर सबकुछ ऐसे ही चलता रहा तो अगले साल तक भारत सड़कों और पुलों का देश बन जायेगा. आदमी घर से निकला नहीं कि सड़क पर आ जायेगा. गली-कूचे तो बहुत जल्दी ही इतिहास हो जायेंगे. अब गंगा, जमुना, गोमती, घाघरा, ब्रह्मपुत्र, कोसी वगैरह को तो जाने दीजिये, नाला, नाली और तालाब पर भी पुल बन जायेंगे.
टीकाकरण के आंकडों की तो बात ही निराली है. एक दिन में लगने वाले टीकों का आंकडा पकड़ लें तो पता चलता है कि पिछले चार-पांच साल में पूरा भारत ही टीका-ग्रस्त हो गया है. फोटू-वोटू का हाल यहाँ भी वैसा ही है. पार्टी अध्यक्षा के साथ स्वास्थ्य मंत्री का फोटू छपा है. देखकर लगता है जैसे टीका-वीका इन्ही लोगों को लगा है.
जल्दी-जल्दी परियोजना के उद्घाटन के मामले में अपने मंत्रियों का नाम कल-परसों तक गिनीज बुक में आने ही वाला है. पता नहीं इन मंत्रियों को नीद आती है या नहीं. या फिर रात को बिस्तर पर पड़े-पड़े उद्घाटन और भाषण के ही सपने देखते हैं.
आज सुबह टीवी में देख रहा था. पटना के गाँधी मैदान में कल लालू जी ने एक ही मिनट में एक हज़ार परियोजनाओं का उद्घाटन कर डाला. सही बात है. कौन झमेला करे यहाँ-वहां जाकर उद्घाटन करने का? एक ही रैली में संगमरमर के एक हज़ार पत्थर ही तो इकठ्ठा करने हैं. उनपर लिखवाकर पर्दा लगा दो और भाषण देने के बाद जैसे ही जनता ताली बजाये वैसे ही पर्दा गिरा दो. बस, सिंपल.
धोया, भिगोया...हो गया टाइप.
वैसे एक हज़ार पत्थर अपने गंतव्य माने परियोजना की जगह तक भी पहुँच सकेंगे कि नहीं, किसे पता? जब पत्थरे का कोई गारंटी नहीं है त परियोजना का गारंटी कौन लेगा?
अच्छा मौका है गिनीज बुक में नाम डलवाने का.गिनीज बुक में नाम डलवाने के लिए न तो नाखून बड़े करने हैं और न ही मूंछ. ऐसा इसलिए लिख रहा हूँ कि दाढ़ी, मूंछ, नाखून, बाल वगैरह बड़ा करके अपने देश वाले गिनीज बुक में नाम दर्ज करवा लेते हैं. मंत्री जी को तो वो भी नहीं करना पड़ रहा.
लेकिन संगमरमर के इन पत्थरों की गति क्या होगी? इसका अंदाजा इस बात से लगाईये कि मुंबई मेट्रो प्रोजेक्ट जिसके उद्घाटनकर्ता माननीय प्रधानमंत्री थे और जिन्होंने नारियल फोड़कर इस प्रोजेक्ट का उद्घाटन किया था, उसका संगमरमर ही कोई उखाड़ ले गया. प्रोजेक्ट तो वैसे ही उखड़ा-उखड़ा सा है.
Saturday, February 28, 2009
लोकतंत्र का उद्घाटन
Friday, February 27, 2009
बोरियत की गिरफ्त में पाकिस्तान
पूरी दुनियाँ में शायद ही कोई देश हो, जहाँ घटनाक्रम उतनी तेजी से बदलते हों, जितनी तेजी से पकिस्तान में बदलते हैं. मजे की बात यह है कि ऐसा सालों से होता आया है. अखबारों में लेख लिखे जाते हैं, टीवी पर पैनल डिस्कशन आयोजित होते हैं. एक्सपर्ट और ज्ञानी टाइप लोग तमाम तरह की थ्योरी सामने रखते हैं. उसपर अपना ज्ञान बघारते हैं. किताबें लिखी जाती हैं. शोध किये जाते हैं.
लेकिन मुझे लगता है कि इतना सीरियस होने की ज़रुरत नहीं है. पकिस्तान में सालों जो कुछ भी होता आ रहा है, उसके लिए केवल और केवल बोरियत जिम्मेदार है. वहां के हुक्मरान से लेकर वहां की जनता तक बोरियत की मारी है.
अब देखिये न, पाकिस्तान में जिस तरह के हुक्मरान हैं, वैसे सारी दुनियाँ में और कहीं नहीं है. वैसे तो पूरी दुनियाँ में पकिस्तान जैसा 'मुलुक' ही नहीं है लेकिन वहां के हुक्मरान अनोखे हैं.
इन हुक्मरानों की बात ही निराली है. बोरियत से सबसे ज्यादा यही भाई लोग पीड़ित हैं. जनरल लोग शासन करते-करते बोर हो लेते हैं तो जनता के ऊपर जम्हूरियत का बोझ पटक देते हैं. जनता बेचारी बोझ ढोते-ढोते बोर हो जाती है तो चिल्लाने लगती है; "इससे अच्छा तो जनाब जनरल साहब का ही राज था."
इतना सुना नहीं कि जनरल साहब, जो शासन से बाहर रहते-रहते बोर हो चुके होते हैं, खिल जाते हैं. तुंरत लाग-लश्कर लेकर चढाई कर देते हैं; "ओय हटा ओय. अपना बोरिया-बिस्तर लेकर निकल ले. पूरे मुल्क में तेरी वजह से ही करप्शन फ़ैल गया है. वैसे भी ढाई साल राज कर लिया तू. ढाई साल बहुत होते हैं. चल निकल ले."
चल निकल ले से जनरल साहब का मतलब होता है कि; "मुल्क छोड़ दे."
जम्हूरियत के कर्णधार बेचारे मुल्क छोड़ देते हैं. और क्या करेंगे? दूसरे किसी मुल्क में रहते हुए स्वास्थ्य बनाने में लग जाते हैं. जिनके बाल-वाल नहीं हैं वे बाल उगा लेते हैं. साथ ही माहौल बनने का इंतजार करते हैं. विदेश में सेमिनार अटेंड करने लगते हैं.
दस-पांच सेमिनार अटेंड करके ही 'वेटरन' हो जाते हैं. दो-चार और अटेंड करते हैं तो बोर हो जाते हैं. बोरियत एक बार सेट-इन कर जाती हैं तो बताने लगते हैं कि; "पूरे मुल्क की हालत खराब कर दी इस जनरल ने. अब तो रुपया-पैसा भी ख़तम कर दिया. हे पश्चिम के खाए-पीये मुल्क वालों हमें कुछ पैसा वगैरह मुहैया करवाओ तो हम जम्हूरियत ले आयें."
पश्चिम के खाए-पीये मुल्क वाले पैसा वगैरह का इंतजाम करते हैं. डील करवाते हैं ताकि जम्हूरियत वापस आये. एक बार फिर जम्हूरियत वापस आती है तो बीच में ही कोई साइनबोर्ड लगा जाता है कि; "जनरल सर्विसेस टू बी रिज्यूम्ड सून."
जनरल सर्विसेज और जम्हूरियत सर्विसेज का ये रोलिंग प्लान चलता रहता है. चल रहा है. अनवरत चलता रहेगा. पाकिस्तान वाले बोर होकर शासक चेंज करते रहते हैं लेकिन पश्चिम के देशों द्बारा पैसे-वैसे देने में बोरियत आड़े नहीं आती.
पश्चिम वाले बड़े बे-बोर लोग होते हैं.
लेकिन एक बात है. शासन किसी का भी हो, पूरे देश का बोरियत वाला चरित्र एक जैसा ही रहता है. जनरल साहब भी बताते हैं कि उनके मुल्क में आतंकवाद नहीं है और जम्हूरियत के कर्णधार भी यही बताते हैं. यह बताते-बताते बोर हो जाते हैं तो कहना शुरू करते हैं कि; "हम आतंकवाद के खिलाफ कार्यवाई कर रहे हैं."
दोनों पग-पग पर बोर होते रहते हैं.
अब देखिये न. मुंबई हमले के बाद पहले तो बोले; "जहाँ तक अजमल कसाब का ताल्लक है, हमने इंक्वाईरी करवाई तो पता चला कि कसाब नाम का कोई है ही नहीं."
एक महीना यही बात कहते-कहते बोर हो गए तो बोले कि; "कसाब हमारे मुल्क का ही है."
पहले कहते रह गए कि; " जहाँ तक मंबई हमले का ताल्लक है तो हम कहना चाहेंगे कि इस हमले की साजिश पकिस्तान में नहीं हुई."
करीब दो महीना यह कहते-कहते बोर हो लिए तो बोल उठे कि; "हमले की साजिश के एक पार्ट को पकिस्तान में ही अंजाम दिया गया."
अरे बोरियत की हद है. इतना भी क्या बोर होना कि एक ही बात पर तीन महीने भी नहीं टिक पाते?
अब कल की ही बात ले लीजिये. पता चला कि मुंबई में जो आतंकवादी आये थे, उनलोगों ने पाकिस्तान के किसी कर्नल सदातुल्ला जी से फ़ोन पर बात की थी.
अब इस बात पर पकिस्तान के शासक कह रहे हैं कि; "जी, जहाँ तक कर्नल सदातुल्ला का ताल्लक है, तो हमारी आर्मी में ढेर सारे कर्नल सदातुल्ला हैं. आप किस सदातुल्ला की बात कर रहे हैं."
इनलोगों के कहने का मतलब शायद यह है कि "जी हमारी आर्मी सदातुल्लाओं से भरी पड़ी है. किस-किस को खोजेंगे?"
अपनी इस बात पर शायद एक महीना टिके रहे. बोर हो जायेंगे तो बोलेंगे; "हिन्दुस्तान ने जिस सदातुल्ला की बात की है, हमने तो जी उन्हें खोज निकाला है और उन्हें हाउस अरेस्ट कर दिया है. सदातुल्ला के बारे में हमने हिन्दुस्तान से दस सवाल किये हैं. अगर उसका जवाब मिल जाता है तो हम आगे की कार्यवाई करेंगे."
वैसे ये बोर होना केवल शासकों की ही बात नहीं है. यह पकिस्तान का राष्ट्रीय चरित्र बन चुका है. क्रिकेट को ही ले लीजिये. मियाँदाद साहब क्रिकेट कण्ट्रोल बोर्ड के किसी पद पर एक महीना से ज्यादा रहते हैं तो बोर हो जाते हैं और बत्तीसवें दिन इस्तीफा थमा देते हैं. किसी को कप्तान बनाकर क्रिकेट कण्ट्रोल बोर्ड छ महीने में ही बोर हो जाता है और दूसरा कप्तान खोजने लगता है. विदेशी कोच लाये जाते हैं. एक साल रहे नहीं कि खिलाड़ी से लेकर कबाड़ी तक उससे बोर होने लगते हैं. फिर क्या? फिर किसी देसी कोच को लाया जाता है.
यहाँ तक कि आतंकवादी भी बोर होते रहते हैं. अभी जनवरी में ही तालिबान वाले पकिस्तान सेना के साथ मिलकर भारत के खिलाफ जंग करने वाले थे. इनलोगों ने कई दिनों तक इस बात की घोषणा की. सेना-आतंकवादी भाई-भाई टाइप लग रहा था. जनवरी ख़तम होते-होते बोर हो गए और फरवरी में पकिस्तान सेना के खिलाफ ही लड़ने लगे.
बोरियत आतंकवादियों से भी क्या-क्या करवाती है. कुर्बान जाऊं ऐसी बोरियत पर.
कोई एक महीना में बोर होता है तो किसी को बोर होने में दो महीने लगते हैं. लेकिन देश के राष्ट्रपति जरदारी साहब की बोरियत बहुत ऊंचे दर्जे की है. वे एक-दो मिनट में ही बोर हो लेते हैं. देखा नहीं कैसे सराह पालिन से हाथ मिलाते-मिलाते एक मिनट में ही बोर हो लिए तो गले मिलने के लिए तैयार हो गए थे.
अच्छा, बोरियत एक और बात में दिखाई देती है.यही अकेला 'मुलुक' है जहाँ कभी प्रधानमंत्री सेंटर ऑफ़ पॉवर होता है तो कभी राष्ट्रपति. राष्ट्रपति पावरफुल होते-होते बोर हो लेते हैं तो अपनी सारी पॉवर प्रधानमंत्री को दे देते हैं. प्रधानमंत्री पावरफुल होते-होते बोर हो लेते हैं तो सारी पावर राष्ट्रपति को ट्रांसफर कर देते हैं. नवाज शरीफ के समय प्रधानमंत्री पावरफुल थे तो आज राष्ट्रपति.
इनकी बोरियत के किस्सों का यह हाल है कि इनके बारे में लिखते-लिखते हम बोर हो गए. इसलिए अब इन्हें छोड़कर भारत के नेताओं के बारे में कुछ लिखेंगे.
आखिर बोरियत जो न कराये.
Wednesday, February 25, 2009
रांची ब्लॉगर मीट.....आगे का हाल
आदरणीय बलबीर दत्त जी बोलकर चले गए. नीलू जी भी चले गए. अखबार वाले हैं. लिहाजा व्यस्तता तो रहती ही है.
भारती कश्यप जी ने भी सभा को संबोधित किया. उन्होंने अपने संबोधन के शुरू में ही प्रेमचंद के हवाले से बताया कि; "एक अच्छे समाज की उत्पत्ति के लिए विचारों का टकराना बहुत ज़रूरी है." प्रेमचंद जी की बात ठीक ही है. बकौल परसाई जी, "समाज अगर द्वंद्वहीन रहता तो हम अभी भी जंगल में रहते और वनबिलाव को बिना भूने खा रहे होते."
यह बात और है कि इतिहास के आचार्य को इस बात को साबित करने के लिए पुरस्कार मिलता है कि आदिकाल ही स्वर्णकाल था.
लेकिन मेरे मन में जो बात आई वो भी बताता चलूँ. मुंशी प्रेमचंद ने जब यह बात कही होगी उस समय उन्होंने नहीं सोचा होगा कि विचारों का टकराव चलाने वाले जब विचारों को लड़ाकर बोर हो जाते हैं तो खुद लड़ने लगते हैं.
वैसे प्रेमचंद जी ने तो ब्लॉग की कल्पना भी नहीं की होगी.
खैर, वापस आते हैं भारती जी के संबोधन पर. उन्होंने ब्लॉग को एक सशक्त माध्यम बताते हुए ब्लागिंग में अपनी रूचि के बारे में बताया. उन्होंने ब्लागिंग के उज्जवल भविष्य पर भी बहुत कुछ कहा. उनका मानना था कि ऐसे ही ब्लागिंग का विकास होता रहा तो हमें एक दिन एक बेहतर समाज अवश्य मिलेगा.
घनश्याम जी कार्यक्रम का संचालन कर रहे थे. उन्होंने ब्लागिंग के अपने अनुभव के बारे में बताया कि किस तरह दिल्ली में रहते हुए उन्होंने ब्लागिंग की शुरुआत की. उन्होंने पत्रकारिता के अपने अनुभवों को अपने ब्लॉग पर लिखने के बारे में बताया.
उनके संबोधन के दौरान ही हमें पता चला कि अविनाश जी कभी उनके जूनियर रह चुके हैं. यह बात सुनकर मुझे आश्चर्य हुआ. शायद इसलिए कि अविनाश जी की जूनियर वाली छवि के बारे में मैं कभी कल्पना ही नहीं कर सकता. ये सोचना भी मुश्किल है कि वे भी कभी किसी के जूनियर हो सकते हैं.
उनके संबोधन के बाद शैलेश भारतवासी जी ने ब्लागिंग की उत्पत्ति, उसके विकास और अनवरत चल रहे सफ़र के बारे में बताना शुरू किया. शैलेश जी के पास आंकड़ों की भरमार है.
किसने कब ब्लागिंग शुरू की? ब्लॉग को क्यों ब्लॉग ही कहा जाता है? कितने ब्लॉग हैं? एशिया में कितने ब्लॉग हैं? किस महाद्वीप के ब्लॉगर सबसे ज्यादा कमाऊ हैं? साल के शुरू में हिंदी के कितने ब्लॉग थे? साल के अंत में कितने हैं? अगले साल तक कितने हो जायेंगे?
शैलेश जी से इन तमाम बातों की जानकारी लेते हुए हम बहुत खुश हुए. उन्होंने इन्टरनेट पर हिंदी कैसे लिखी जाय, इसकी खूब जानकारी दी.
मुझसे भी कुछ बोलने के लिए कहा गया. मैंने अपने संक्षिप्त विचार रखे. मेरे बाद मनीष जी से बोलने के लिए कहा गया. मनीष जी ने ब्लागिंग के अपने अनुभव के बारे बताया. ढेर सारे शुरुआती ब्लागर्स के योगदान की सराहना की. मनीष सीनियर ब्लॉगर हैं. ऐसे में उनके पास बोलने के लिए बहुत कुछ था. वे खूब बोले.
हाँ, एक बात और. अपने संबोधन की शुरुआत से पहले उन्होंने हाल का दरवाजा बंद करवा दिया.
वे शायद इस बात को भांप गए कि पत्रकारों की बात तो ब्लागर्स ने ध्यान से सुनी लेकिन जब ब्लॉगर के बोले की बारी आई तो पत्रकार बंधु निकल लिए. कारण यह भी था कि तबतक इलेक्ट्रॉनिक मीडिया वाले कैमरा थामे आ चुके थे.
ऐसे में सुनना छोड़कर दिखना नीतिगत सही कर्म है. कार्यक्रम के आयोजक से लेकर प्रायोजक तक टीवी कैमरा देखने चले गए.
वे जब बोलकर खाली हुए तो खाना खाने का समय हो गया था. सबने खाना खाया. बढ़िया इंतजाम था खाने का. खाने के दौरान अनौपचारिक बातें हुईं. सब एक-दूसरे को सराह रहे थे.
लग रहा था जैसे कविताओं पर टिप्पणियों की बौछार हो रही हो.
खाने के बाद भी कई लोग बोले. लवली बोली. प्रभात जी बोले. संगीता पुरी जी बोलीं. जब घनश्याम जी ने रंजना दीदी से बोलने के लिए कहा तो उन्होंने श्यामल सुमन जी को बोलने के लिए कहा. श्यामल जी बोले. उन्होंने अपनी ताजा गजल सुनाई. तरन्नुम में. बहुत ही उम्दा गजल लगी. सबने वाह-वाह किया. तालियाँ बजाई.
श्यामल जी के बाद पारुल जी बोलीं. उन्होंने एक गजल गाकर सुनाई.
मीत जी ने अपनी गजल पढ़ी.गजल पढने से पहले और बाद में भी वे बताते रहे कि उनकी याददाश्त खराब है. इस बात को साबित करने के लिए वे गजल का एक शेर भूल गए.
ब्लागिंग के बारे में उत्सुक लोगों ने शैलेश जी कई प्रश्न पूछे. उनमें से सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न था; "ब्लागिंग करके कमाई कैसे की जा सकती है?"
शैलेश जी ने जवाब दिया.
घनश्याम जी ने हमसे मिलकर बताया कि वे जाना चाहते हैं. रविवार होने के बावजूद अखबार की जिम्मेदारी ऐसी है कि उन्हें जाना ही पडा. जिम्मेदार पत्रकारों की हमारे समाज को बहुत ज़रुरत है. ऐसे में उन्हें रोके रहना ठीक नहीं रहता.
मीट ख़तम होने वाली थी तो भारती कश्यप जी वापस आ चुकी थीं. उन्होंने अनौपचारिक बातचीत में बताया कि उन्हें ब्लागिंग बहुत पसंद है. व्यस्तता के बावजूद जब भी उन्हें मौका मिलता है तो वे ब्लाग्स देख लेती हैं. जब देखने का मौका नहीं मिलता या समय कम रहता है तो वे स्टाफ को बोलकर ब्लॉग खुलवा लेती हैं और पढ़ती हैं.
ब्लागिंग के प्रति उनकी रूचि से सारे ब्लॉगर बहुत उत्साहित हुए.
उन्होंने यह भी बताया कि कई सेलेब्रिटी ब्लॉगर से उनके परिवार वालों के बहुत अच्छे सम्बन्ध हैं. वे चाहती तो उन सेलेब्रिटी ब्लॉगर को भी बुला सकती थीं लेकिन समय के अभाव में ऐसा नहीं हो सका. उन्होंने किये गए इंतजाम की पूरी जानकारी दी कि किस तरह से बहुत ही कम समय में उन्होंने सारा इंतजाम करवाया. उन्होंने यह भी कहा कि अगले वर्ष वे इससे भी बड़ा सम्मलेन करवा सकती हैं.
उन्होंने यह भी बताया कि कैसे उनके स्टाफ के मेम्बेर्स ने इस आयोजन को सफल बनाने में मेहनत की. बातचीत के दौरान ही उन्होंने बताया कि कम ब्लागर्स के आने की वजह से उनका ढेर सारा खाना बच गया. अस्पताल के कर्मचारियों को खाना बटवाने के बावजूद अभी तक खाना बचा हुआ था.
हमें यह सुनकर बहुत दुःख हुआ. एक बार के लिए लगा कि समय होता तो हमलोग शाम तक रुक जाते और बचा हुआ खाना खाकर उसे ख़तम कर देते.
इस दुःख के साथ हमने उन्हें और उनके स्टाफ मेम्बेर्स को धन्यवाद दिया.
धन्यवाद देने के बाद हमें लगा कि कुछ और फोटो-सोटो हो जाना चाहिए. अस्पताल के सामने खड़े हम लोग फोटो लेन-देन में बिजी हो लिए. जब फोटो लेते-लेते बोर हो गए तो वहां से चलने का काम शुरू हुआ. मनीष जी ने सबसे कहा कि क्यों न हम कहीं बैठकर एक-एक कप चाय पी लें.
हम सभी चाय पीने के लिए एक रेस्टोरेंट में इकठ्ठा हुए. चाय पीते-पीते ब्लागिंग के तमाम अनुभव बाटें गए. अनुभव भी अजीब चीज होती है. खाली यही एक चीज है जो बंटवारे के लिए हमेशा तत्पर रहती है.
ब्लाग्स की बात हुई. ब्लागर्स की बात हुई. शैलेश जी से वहीँ पता चला कि वे कोलकाता में महाश्वेता देवी का इंटरव्यू अपने लैपटॉप में कैद कर लाये हैं. सुनकर अच्छा लगा.
महाश्वेता जी के इंटरव्यू के बारे में सुनकर मीत जी ने शैलेश जी की न सिर्फ प्रशंसा की बल्कि मुझसे सवाल पूछ बैठे कि; "इतने सालों से कोलकाता में रहते हैं, कभी नाम भी सुना है महाश्वेता जी का?"
हमने उन्हें बताया कि हमने महाश्वेता जी का नाम सुना है. इतना बताने के बावजूद वे हमसे प्रभावित नहीं दिखे.
मीत जी ने मुझे बताया कि वे मेरा लिखा हुआ नहीं पढ़ते. उन्होंने यह भी बताया कि वे कविताओं वाले ब्लाग्स ज़रूर देखते हैं. मैंने उन्हें आश्वासन दिया कि वे मेरा ब्लॉग भी पढें, इसके लिए मैं जल्द ही कविता लिखना शुरू कर दूंगा. ये बात सुनकर वे डर गए.
ब्लागिंग के बारे में बात करते हुए हमें आस-पास के लोग देख रहे थे. शायद यह अनुमान लगाने की कोशिश कर रहे थे कि हम कौन सी जमात के लोग हैं?
तबतक चाय ख़त्म हो चुकी थी. हमसब रेस्टोरेंट से बाहर आये और अपने-अपने स्थान के लिए रवाना हो गए.

