Show me an example

Friday, March 27, 2009

लोकतंत्र पुख्ता होता जायेगा. पुख्ता...और पुख्ता.




लोकतंत्र के कई खंबे हैं. पहला है. दूसरा है. तीसरा है. चौथा भी है जो कभी-कभी पहला बनने की कोशिश करता है. सोमनाथ बाबू हाल के वर्षों में तीसरे के पहले बनने की कोशिशों से चिंतित दीखते थे. तीसरा इसलिए चिंतित रहता है कि पहला अपने स्थान पर दिखाई नहीं देता.

ऐसी चिंता अतिक्रमण को बढ़ावा देती थी.

ये तो खंबों की बातें हैं. लेकिन लोकतंत्र की नींव क्या है? नींव समय के हिसाब से बदलती रहती है. ऐसा केवल लोकतंत्रीय नींव में होता है. जैसे चुनाव के वक्त उल्लंघन ही असली नींव होती है. नेता चुनावी-मुद्रा में आया नहीं कि हलकान होते हुए उल्लंघन करने लगता है.

चुनावी-मुद्रा को किसी हालत में छायावादी दृष्टिकोण से मत देखिये. यह न सोचिये कि चुनावी-मुद्रा का मतलब चुनाव में बाँटीं जाने वाली मुद्रा से है. मेरे कहने का मतलब केवल इतना है कि चुनावों के दौरान नेता की मुख-मुद्रा भी तो बदलती रहती हैं. सुख-मुद्रा, मतलब करेंसी तो निकलने ही लगती है. मुद्राओं की कमी थोड़े न है.

आचार संहिता का उल्लंघन करने से साबित होता है कि लोकतंत्रीय व्यवस्था पक्की है. ऐसे उल्लंघन न हों तो पता ही न चले कि लोकतंत्र के सारे खंबे खड़े हुए हैं. सबकुछ ठीक-ठाक चल रहा है.

अब देखिये न, नेता उल्लंघन करता है. चुनाव आयोग जवाब मांगता है. वकील मुकदमा दायर करता है. जज साहब एंटीसिपेटरी बेल देते हैं. मीडिया रिपोर्टिंग करता है. लोकतंत्र का वृत्तचित्र पूरा हो जाता है. ऐसी और कौन सी क्रिया होगी जिसकी वजह से लोकतंत्र के जिन्दा रहने का सुबूत मिलता है? मानते हैं न, कि नहीं होगी.

आनेवाले समय में आचार संहिता का उल्लंघन किसी भी नेता के बायोडाटा में एक ऐडेड एडवांटेज का सुबूत माना जायेगा. अब वो ज़माना धीरे-धीरे जा रहा है जब पार्टियाँ बदलने वाला नेता ही असली नेता होता था. अजीत सिंह जी तक को लोगों ने अब असली नेता मानने से इनकार कर दिया है.

आप पूछेंगे कि वो क्यों? इसका जवाब यह है कि वे बेचारे आचार संहिता का उल्लंघन नहीं कर पाते न.

आनेवाले समय में किसी भी नेता द्बारा आचार संहिता के उल्लंघन का रेकॉर्ड्स ही उस नेता को नए दलों के साथ जुड़ने का कारगर माध्यम बनेगा. नेता जी टिकट न पाकर असंतुष्ट होंगे तो किसी दूसरे दल में शामिल होने जायेंगे. जिस दल में जाना चाहेंगे उसके अध्यक्ष बोलेंगे; "कैसे लें आपको अपने दल में? आपने तो पिछले दो चुनावों में एक बार भी आचार संहिता का उल्लंघन नहीं किया?"

नेता जी यह सुनकर शरमा जायेंगे. हो सकता है मुंह लटका कर वापस आ जाएँ. यह भी हो सकता है कि बोल उठें; "ये तो हमसे गलती हो गई. लेकिन आप चिंता न करें, अब आपके दल में आ गए हैं तो अगले तीन-चार दिन में ही दस-बारह बार आचार संहिता का उल्लंघन कर डालेंगे. बस, आप हमें अपने दल में शामिल कर लें."

अध्यक्ष जी बोलेंगे; "लेकिन आपका भरोसा कैसे कर लें? कैसे मान लें कि आप जल्द ही आचार संहिता का उल्लंघन करेंगे?"

नेता जी बोलेंगे; "इतना तो विश्वास करना ही पड़ेगा आपको. आखिर मैं एक नेता हूँ. वैसे भी पहले में प्रतिक्रियावादी ताकतों के साथ था. अब मैं सेकुलर हो गया हूँ. जिसने विचार संहिता का उल्लंघन कर डाला, उसे आचार संहिता का उल्लंघन करने में कितनी देर लगेगी?"

अध्यक्ष जी यह सुनकर संतुष्ट हो जायेंगे. नेता जी को अपने दल में शामिल कर उन्हें सेकुलर बना डालेंगे.

कल्पना कीजिये कि कैसे-कैसे सीन देखने को मिल सकते हैं.

चुनाव प्रचार के दौरान पार्टी की मीटिंग हो रही है. चुनाव प्रभारी उपस्थित नेताओं को लताड़ते हुए कह रहे हैं; "लानत है. पंद्रह दिन हो गए आचार संहिता लागू हुए. विपक्षी पार्टियों के बत्तीस नेताओं ने संहिता का उल्लंघन किया. एक हमारी पार्टी है, जिसकी तरफ से एक बार भी उल्लंघन नहीं हुआ. ऐसे कैसे चलेगा?"

उपस्थित नेता सफाई देते हुए हलकान हो रहे हैं. एक नेता कह रहा है; "आप चिंता न करें. आज से ही हमारे नेता आचार संहिता का उल्लंघन करना शुरू कर देंगे."

चुनाव प्रभारी और खीज उठेंगे. बोलेंगे; " आचार संहिता का उल्लंघन सबसे पहले पैसा बांटने से शुरू होता है. फिर इलाके के कलेक्टर वगैरह को गाली देनी पड़ती है. विपक्ष के न जाने कितने नेताओं ने यह काम पहले ही कर डाला. अब चुनाव आयोग इन मामलों पर दृष्टि जमाये हुए है. हमारे हाथ से उल्लंघन करने के दो तरीके तो निकल गए न."

उपस्थिति नेताओं में से एक कहेंगा; " वो बात तो है. लेकिन अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है. एक काम करते हैं. किसी कंसल्टेंट को हायर करके यह पता लगवाने की कोशिश की जाय कि अचार संहिता के उल्लंघन के लिए क्या-क्या काम किये जा सकते हैं जो बाकी पार्टियाँ नहीं कर रही हैं. जो पैसा लगेगा उसकी चिंता न करें. फंड की कमी नहीं है."

पार्टी किसी कंसल्टेंट को हायर करने की कवायद शुरू कर देगी. कंसल्टेंट स्टडी करके अचार संहिता के उल्लंघन के कुल पैंतालीस तरीके बता डालेंगे. वो भी लिखित. पार्टी के नेता खुश होकर उल्लंघन करना शुरू कर देंगे.

पार्टियों में एक अलग ही सेल होगा. जैसे पार्टी के माएनोरिटी सेल, मेजोरिटी सेल, इकनॉमिक सेल वगैरह होते हैं वैसे ही अचार संहिता उल्लंघन सेल होगा. इस सेल के हेड ऐसे नेता बनेंगे जिनके ऊपर चुनावों के दौरान अचार संहिता उल्लंघन के कम से कम पचास मामले पहले से दर्ज हों.

उल्लंघन करने की नीति को एक अलग ही आयाम मिलेगा. लोकतंत्र पुख्ता होता जायेगा. पुख्ता...और पुख्ता.

Monday, March 23, 2009

इलाके के लोग हमें पहचानते हैं.....




भारतीय चुनावों का इतिहास बहुत गौरवशाली रहा है. यह बात विद्वान बताते हैं. वैसे विद्वानों की मानें तो इतिहास ही हमेशा गौरवशाली रहता है. वर्तमान तो ख़तम और भविष्य खतम-तम रहता है. अब जो चीज गौरवशाली रहेगी, उससे तमाम किस्से वगैरह जुड़े ही रहेंगे. लिहाजा भारतीय चुनाव और लोकतंत्र में भी किस्से-कहानियों की भरमार है.

पुराने चुनावों को ही ले लीजिये. पहले सांसद बनने के इच्छुक नेता पार्टी अध्यक्ष के पास जाते थे. अध्यक्ष जी से कहते थे; "महोदय, हमें सासाराम से ही टिकट चाहिए."

अध्यक्ष जी के पूछने पर कि सासाराम से ही क्यों टिकट चाहिए, नेता जी बताते थे कि; "वो इसलिए महोदय, कि सासाराम में हमें सब जानते हैं. इलाके के लोग हमें पहचानते हैं."

कालांतर में कुछ वर्षों बाद ही भारतीय लोकतंत्र की 'पट-कथा' से यह सीन लुप्त हो गया. बाद में ऐसी कथा लिखी जाने लगी कि वोटर पटने से इनकार करने लगा. उनदिनों सांसद बनने का इच्छुक नेता पार्टी अध्यक्ष के पास जाता तो कहता; "महोदय हमें सासाराम से टिकट मत दीजिये."

अध्यक्ष जी के पूछने पर कि सासाराम से टिकट क्यों नहीं चाहिए, नेता जी बताते कि; "वो क्या है महोदय, सासाराम में हमें सब जानते हैं. इलाके के लोग हमें पहचानते हैं. इसलिए वहां से टिकट नहीं चाहिए हमें. आप चाहें तो हमें अंडमान का टिकट दे दीजिये. हम अंडमान से चुनाव भिड लेंगे लेकिन सासाराम से भिड़ने की सजा न दें प्रभो."

वैसे यह दौर भी ज्यादा दिनों तक नहीं चला. अगर चलता तो हम देख पाते कि सासाराम के भवानी पाण्डेय उर्फ़ राजा जी अंडमान से चुनाव लड़ रहे हैं. वहां के आदिवासियों को पटाते हुए कह रहे होते; "हम आपलोगों से वादा करते हैं कि आपलोगों के लिए हर साल हम मदिरा महोत्सव करवाएंगे. इसके लिए हम सरकार से एक अलग ही डिपार्टमेंट खोलवा देंगे."

अब तो टिकट वितरण समारोह में गजब-गजब सीन होते होंगे. सांसद बनने के इच्छुक नेता अब चिरौरी करते हुए कह रहे होंगे; " आप त कहे रहे कि मिनिमम क्वालिफिकेशन के तौर पर प्रार्थी के लिए तेईस मर्डर और चालीस किडनैपिंग जरूरी है. हमारे बायोडाटा में त हम डिटेल जानकारी दिए रहे कि हमारे ऊपर सत्ताईस मर्डर और उनहत्तर किडनैपिंग का केस चल रहा है. फिर भी आप हमरा अप्लिकेशन रिजेक्ट कर दिए."

अध्यक्ष जी कहते होंगे; "वो सब तो ठीक है. आप के पास मिनिमम क्वालिफिकेशन तो है. लेकिन जिनको टिकट मिल रहा है उनका क्वालिफिकेशन आपसे ज्यादा है. ऊपर से किडनैपिंग का उनका साम्राज्य कलकत्ता तक फैला हुआ है. पिछले साल ही उन्होंने कलकत्ते से आठ व्यापारी किडनैप करवाए थे. आपका किडनैपिंग साम्राज्य तो केवल पूर्वी उत्तर प्रदेश तक फैला है. ऐसे में प्रिफरेंस तो उनको मिलना ही था."

कहीं पर सांसद बनने का इच्छुक नेता कहता होगा; "मैंने तो टिकटार्थी के नामों की घोषणा की तारीख से पहले ही पचीस लाख दे दिए थे. फिर भी टिकट महतो जी क्यों मिला?"

अध्यक्ष जी कहते होंगे; "आप पचीस दिए थे. लेकिन उन्होंने पूरे इकतालीस लाख दिए हैं टिकट के लिए. ऐसे में हम उनको टिकट नहीं देते तो उनके साथ अन्याय हो जाता. और लोकतंत्र में हम सबकुछ बर्दाश्त कर लेंगे लेकिन अन्याय कभी बर्दाश्त नहीं करेंगे."

कहीं पार्टी की चुनाव समिति के संयोजक कह रहे होंगे; "मैडम, ये फितूर जी चाहते हैं कि वे हमारी पार्टी में शामिल होकर नेता-गति को प्राप्त हो लें. आपका क्या कहना है? वैसे, मैडम पढ़े-लिखे आदमी हैं. पार्टी की ईमेज बनाने के काम आयेंगे."

"इनको कहीं से चुनाव लड़ने का तजुर्बा है?"; मैडम पूछती होंगी.

"काहे का तजुर्बा, मैडम? पिछले पचीस सालों से भारत में ही नहीं हैं. लेकिन चुनाव और लोकतंत्र पर किताब-विताब लिखा है, मैडम इन्होंने. हाँ, चुंनाव से याद आया मैडम, इन्होंने य़ूनाईटेड नेशन्स के सेक्रेटरी जनरल का चुनाव लड़ा था. देखा जाय तो तजुर्बा तो है, मैडम"; संयोजक जी बताते होंगे.

मैडम बोलती होंगी; "ठीक है. तब दे दीजिये."

"कहाँ का टिकट दूं मैडम?"; संयोजक पूछते होंगे.

मैडम सुनकर कहती होंगी; "कहीं से भी दे दीजिये. लेकिन यूपी, बिहार, दिल्ली वगैरह से मत दीजियेगा. जमानत जप्त हो जायेगी. एक काम कीजिये. इनको साउथ से कहीं का टिकट थमा दो. वैसे भी जीतना तो है नहीं, ऐसे में वहां का टिकट थमाओ जो जगह पढ़े-लिखे लोगों की चारागाह हो."

फितूर साहब को टिकट मिल जाता होगा. फितूर साहब त्रिवेंदम से चुनाव लड़ने के लिए नई टाई की खरीद के लिए निकल जाते होंगे.

कहीं-कहीं ऐसा भी सीन होता होगा.

संयोजक जी पार्टी अध्यक्ष के पास जाते होंगे. कहते होंगे; "अरे ऊ टिकट मांग रहा है."

अध्यक्ष जी कहते होंगे; "ऊ माने कौन?"

संयोजक कहते होंगे; "अरे ओही, रतीराम. आपके ऊपर चालीसा लिखा था न. ओही."

अध्यक्ष जी पूछते होंगे; "हमरे ऊपर त हर साले कोई न कोई चालीसा लिखता रहता है. ई कौन वाला है?"

संयोजक जी कहते होंगे; "अरे ओही, जिसको आप होल मीडिया के सामने 'आज का दिनकर' का उपाधी दिए थे."

अध्यक्ष जी कहते होंगे; "अरे उसको त पक्का ही टिकट दो. जो आदमी हमरे ऊपर इतना बढ़िया चालीसा लिख सकता है, उसको समाज को बदलने में जरा भी टाइम नहीं लगेगा."

'आज के दिनकर' को टिकट मिल जायेगा. वे दूसरे दिन से ही 'बन्दरकाण्ड' की रचना शुरू कर देंगे.

Saturday, March 21, 2009

चुरातत्व हीन पोस्टें





शिवकुमार मिश्र हलकायमान और हड़कायमान रहते हैं कि उनकी पोस्टें फलाने तिवारी छाप देते हैं अखबार में। छाप देना तो ठीक, उसमें कटपेस्ट का कमाल भी दिखाते हैं। और फिर लीपापोती में बुलशिट टिप्पणी करने की सीनाजोरी भी करते हैं। 

Shiv शिवकुमार मिश्र

हम ने तो कालजयी न लिखने का सवा आने का संकल्प कर रखा है – कुछ ऐसा लिखो ही मत जिसमें चुरातत्व हो। टीएसाआई (थेफ्टोलॉजिकल सर्वे ऑफ इण्डिया) उसपर अपना अधिपत्य ही न जमा सके। जब वह तत्व ही न हो तो कौन छापेगा?!

लिहाजा हमें चिरकुट टाइम्स में अपने ब्लॉग के जिक्र का डंका पीटती पोस्ट भी न बनानी पड़ेंगी और उस अखबार के आठवें कॉलम के कोने का फोटो स्कैन कर ब्लॉग पर ठेलने से भी बच सकेंगे। पर क्या बतायें, शिव ने अपने लेखन का कमाल ऐसा जमा लिया है कि उन्हें पोस्ट की सज्जा या फोटो चेंपने की जरूरत ही नहीं महसूस होती। उनकी पोस्टें कालजयी छाप होती हैं। सुयोधन की डायरी कालान्तर में एमए/एमबीए में पढ़ाई न जाने लगे – बड़ी आशंका है मुझे!

खैर हास्य-व्यंग अपार्ट, मैने पाया है कि अखबार अपना स्पेस भरने को चुरातत्व पर या सरकारी प्रेस विज्ञप्तियों पर निर्भर रहते हैं। जितना प्रेम से मेहनत हम अपनी छोटी सी पोस्ट पर करते हैं, उसका एक आना भी इन अखबारों के अधिकांश स्क्राइब्स अपनी रिपोर्टिंग/स्टिंग/फीचर में नहीं करते।

मैं फिर चाहूंगा कि शिव कुछ बेकार छाप लेखन करने लगें, जिससे तुलनात्मक रूप से मैचिंग पोस्ट इस ब्लॉग पर ठेलने में मुझे झेंप न महसूस हो।

सुन रहे हो प्यारे भाई!