क्रिकेट है तो देश है. देश है तो नेता है. नेता हैं तो उद्योगपति है. उद्योगपति है तो नेतागीरी है. नेतागीरी है तो चमचागीरी है. चमचागीरी है तो नेता हैं. और नेता हैं तो क्रिकेट है.
लीजिये वृत्त पूरा हुआ और हम वहीँ पहुँच गए, जहाँ से चले थे.
फालतू में भूगोल-विदों ने पृथ्वी को गोल साबित करने के लिए तरह-तरह के प्रयोग किये. मैं तो कहता हूँ क्रिकेट से शुरू करते नेता, चमचा वगैरह से होते आगे चले जाते तो क्रिकेट पर पहुँच जाते. साबित कर देते कि पृथ्वी गोल है.
लेकिन शायद उनदिनों क्रिकेट ऐसा नहीं था.
अब ऐसा हो गया है.
वैसे यह बात तो बहुत दिनों पहले की है. दस साल पहले की बात ही ले लीजिये. उनदिनों क्रिकेट में पैसा होता था. अब स्थिति बदल गई है. अब पैसे में क्रिकेट है. अब सच बात तो यह है कि कवि ने; "सारी बीच नारी है कि नारी बीच सारी है" नामक महान 'काव्य एक लाइना' पहले न लिखा होता तो हम ताल ठोंक कर कह देते कि उन्होंने आज के क्रिकेट को देखकर ही प्रेरणा ली कि वे ऐसी लाइन गढ़ सकें.
पैसे में क्रिकेट समा गया है. बहुत मज़ा आ रहा है. आज ही अखबार में पढ़ रहा था कि इंग्लैंड के खिलाड़ी श्री एंड्र्यू फ्लिंटाफ ने आई पी एल में खेलते हुए तीन विकेट लिए. लिए क्या कमेंटेटर की भाषा में कहें तो झटक लिए. झटक के चल दिए.
इस साल के आई पी एल में अब और नहीं खेलेंगे. तीन विकेट लेकर ही घायल हो गए. जब चले गए तब हिसाब लगाया गया. पता चला उन्होंने जो तीन विकेट लिए उसपर विजय माल्या जी का करीब ढाई करोड़ रुपया खर्च हो गया. तिरासी लाख रुपया प्रति विकेट.
सुनकर लगा जैसे इस फीस में से अगर बैट्समैन को कुछ किकबैक देने के लिए तैयार हो जाते तो बैट्समैन बेचारा बिना खेले ही अपना विकेट दे देता. न रन-अप पर दौड़ने का झमेला रहता न ही ताकत लगाकर गेंद फेंकनी पड़ती.
अब आप यह तो नहिये पूछिए कि माल्या जी कौन ठहरे? आपने अगर यह पूछ लिया तो याद रखिये ममता दी को कहकर आपके घर के सामने धरना करवा दूंगा.
खैर, वापस आते हैं माल्या जी पर. माल्या जी कुछ महीने पहले ही अड़ गए थे. नरेश गोयल जी के साथ मिलकर सरकार से लड़ गए थे. बोले; "हमारे पास पैसे नहीं हैं. अगर सरकार ने हमें बिना ब्याज वाला लोन नहीं दिया तो हम अपनी एयरलाइन्स बंद कर देंगे."
सरकारी सहारे पर या फिर मंदी पर कोई विज्ञापन तो बनता नहीं. बनता होता तो कोई लिख डालता कि;
ये बेचारा मंदी का मारा
इसे चाहिए सरकारी सहारा
अब हमदर्द का सिंकारा नहीं होता. अब हमदर्द का सहारा होता है. माल्या जी को दर्द हुआ. ऐसे में उनके हमदर्द निकले हमारे नागरिक उड्डयन मंत्री. दर्द से पीड़ित इन मंत्री जी ने माल्या जी के लिए खुलकर बैटिंग की. प्रेस कांफ्रेंस में चौकों-छक्कों की झड़ी लगा दी.
तमाम लोगों ने ताली बजाई. बोले; "क्या खेलते हैं. वाह!"
जिनके पास पैसा नहीं होता वे तीन विकेट के लिए केवल ढाई करोड़ देते हैं. पैसा रहता तो न जाने क्या दे देते. शायद पचास करोड़ दे देते. बैटिंग करके बनाये गए रनों का हिसाब अलग से होता. उसके पैसे श्री एंड्र्यू फ्लिंटाफ को अलग से मिलते.
क्रिकेट को चलनेवाले नहीं बदलते तो कोई बात नहीं, क्रिकेट तो बदल ही गया है. टेस्ट मैच होता था. वन डे होने लगा. उससे भी बोर हो लिए तो ट्वेंटी-ट्वेंटी खेलवा डाला. इससे बोर होंगे तो क्या करेंगे? वो अगले तीन-चार साल में पता चल जाएगा.
विद्वान टाइप लोग बता रहे हैं कि मंदी की मारी अर्थव्यवस्था में पैसे की कमी हो गई है. उधर विद्वान बता रहे हैं कि पैसे की कमी है और इधर अज्ञानी टाइप लोग पूछ रहे हैं कहाँ है कमी? क्रिकेट खिलाड़ियों को इतना पैसा मिल रहा है.
अरे अज्ञानियों, यह समझो कि पैसे की कमी है तब इतना पैसा मिल रहा है. नहीं तो एक-एक खिलाड़ी को एक विकेट लेने के लिए कम से कम चालीस करोड़ मिलते.
शाहरुख़ खान परेशान हैं. उन्होंने भी एक-एक विकेट के लिए कितना पैसा खर्चा किया है. पैसा खर्चा हो गया लेकिन टीम नहीं जीत पा रही है. दो मैच तक तो बोले कि; "हम स्पोर्ट्समैन स्पिरिट वाले लोग हैं." तीसरे मैच तक स्पिरिट में कमी हो गई. चौथे तक स्पोर्ट्स जाता रहा. टीम हारती रही.
अब तो खान साहब दक्षिण अफ्रीका से भारत चले आये हैं. आते-आते बोले; "अब तो तभी आऊंगा जब टीम जीतेगी."
हाय रे. इतने अमीर आदमी की टीम नहीं जीत पा रही. इतना पैसा खर्चा किया इन्होने. इसके बावजूद टीम नहीं जीत पा रही.
मेरे एक मित्र एक मैच के दूसरे दिन बोले; "कल देखा युवराज सिंह ने दो रन पर आउट होकर क्या किया?"
मैंने कहा; "नहीं तो. क्या किया उन्होंने?"
वे बोले; "आउट होते ही अपनी टीम के मालकिन का चेहरा देखने लगा. शायद देखने की कोशिश कर रहा था कि मालकिन कितनी नाराज़ है."
सही बात है. इस क्रिकेट में कोच का चेहरा ज्यादा मायने नहीं रखता. मालिक-मालकिन का चेहरा मायने रखता है. फोटोजेनिक चेहरा है न. हमेशा फोटोजेनिक चेहरे ही मायने रखते हैं.
अजीब क्रिकेट है यह ट्वेंटी-ट्वेंटी. तमाम नए तरीके इस्तेमाल होते हैं. अलग तरह का विश्लेषण होता है. स्ट्रेटजी ब्रेक होता है. मैदान में खेल रहे खिलाड़ी से कमेंटेटर भाई लोग डायरेक्ट बात कर लेते हैं. "कैसा फील कर रहे हो?"
उधर से आवाज़ आती है; "हवा चल रही है. हम ऐसा खेल रहे हैं. फील्डिंग साइड वैसा खेल रही है."
अरे प्रभु. आप कैसा खेल रहे हैं वो तो हम देख ही रहे हैं. मुंह से नहीं बताएँगे तो हमें पता नहीं चलेगा क्या?
आने वाले दिनों में नए-नए तरीके और जुडेंगे. जन टूर्नामेंट पूरा हो जाएगा तो हर खिलाड़ी की बैलेंसशीट बनेगी. देखेंगे इस बात पर बहस हो रही है कि फलाने बालर ने पॉँच विकेट तो लिए लेकिन इस पांच विकेट को अगर उनके फीस से डिवाइड करें तो देखेंगे कि प्रति विकेट एक करोड़ का खर्च आया.
कोई विद्वान यह बात भी बीच में ला पटकेगा कि इन पांच विकेट में से दो विकेट ऐसे थे जिन बैट्समैन को फीस के तौर पर दो-दो करोड़ मिले थे. बाकी के तीन को अस्सी-अस्सी लाख मिले थे. मतलब यह कि इन्होने जिन पांच बैट्समैन को आउट किया उनकी टोटल फीस चार करोड़ चालीस लाख थी.
ऐसे में यह बालर तो सस्ता साबित हुआ.......
Thursday, April 30, 2009
ऐसे में यह बालर तो सस्ता साबित हुआ.......
Tuesday, April 28, 2009
परीक्षा लेने वाले देवता और कैल्कुलेटिव मनुष्य
परीक्षा देना और लेना, दोनों बहुत महत्वपूर्ण काम है. परीक्षा के लेन-देन का यह कार्यक्रम तब से चला आ रहा है, जब देवता लोग मनुष्य को दूर बैठे देख पाते थे. ऊपर बैठे देवता मनुष्यों को देखते रहते और जब इच्छा होती परीक्षा ले डालते.
तमाम पुरानी धार्मिक कथाओं में भी यही वर्णित है. कोई मनुष्य जब सुख के सागर में कई सालों तक गोते लगा लेता तो आसमान में बैठे देवतागण इस मनुष्य के ऊपर शंका करने लगते. सोचते कि; ' क्या बात है? ये आजकल पूजा वगैरह कम करता है. हमें याद ही नहीं रखता. ये सुख पाकर अँधा तो नहीं हो गया?'
बस देवतागण परीक्षा लेना शुरू कर देते.
परीक्षा के पहले चरण में इस मनुष्य को थोड़ा और समय दिया जाता. यह सोचते हुए कि; 'थोड़े दिनों के लिए इसे बेनेफिट ऑफ़ डाऊट दे देते हैं. हो सकता है कि ये सुधर जाए.'
लेकिन जब मनुष्य सुखसागर में गोते लगाना जारी रखता और बेनेफिट ऑफ़ डाऊट देते-देते देवतागण बोर हो जाते तो टेस्ट चेंज करने के लिए इस मनुष्य की परीक्षा ले डालते. उसे दुःख-कष्ट, बीमारी, महामारी, खुमारी वगैरह से गुजारते.
अगर देवताओं का सताया हुआ यह मनुष्य देवताओं की शरण में चला जाता, उन्हें याद कर लेता, उन्हें पूज लेता तो देवतागण प्रसन्न हो जाते. कई बार तो प्रसन्नता इतनी बढ़ जाती कि इस मनुष्य का कष्ट वगैरह तो दूर करते ही, उसे ऊपर से और बहुत कुछ दे देते. कई बार तो जितना नुकशान हुआ रहता उससे चार गुना ज्यादा तक दे डालते.
पुष्पवर्षा करते सो अलग.
कुल मिलाकर बड़ी सॉलिड पटकथा रहती. मनुष्य की परीक्षा भी हो जाती और नीति-कथा वगैरह का भी निर्माण हो जाता.
कई केसेज में तो परीक्षा देने वाले मनुष्य को जब देवता बहुत सताते तो उसे बचाने के लिए उस मनुष्य की पत्नी सामने आती. देवताओं की पूजा वगैरह करती. देवताओं से क्षमा दान का आग्रह करती. कई बार १२, १६, या अट्ठारह शुक्रवार ब्रत रखती. तब कहीं जाकर देवता जी लोगों का ह्रदय पिघलता और वे उस मनुष्य को क्षमा करते.
कई बार तो देवता जी लोग इस मनुष्य या इसकी पत्नी के सामने ही प्रकट हो लेते. हाथ की हथेली से आशीर्वाद ठेलते हुए, प्रसन्न मुख देवता या देवी आकर राज खोलते कि; "पुत्री हम तुम्हारी परीक्षा ले रहे थे. तुम्हारी भक्ति देखकर हम प्रसन्न हुए. कहो, तुमको क्या वरदान चाहिए?"
देवी-देवताओं की यह बात सुनकर 'पुत्री' प्रसन्न हो जाती. अगर वह इन देवी-देवताओं से वह कुछ नहीं मांगती तो इनलोगों की प्रसन्नता और बढ़ जाती. तब तो मजाल है कि ये लोग उस 'पुत्री' को बिना कुछ दिए वहां से हिल जाएँ. ना.
अब ऐसी कथाएँ सामने नहीं आतीं. पता नहीं क्या कारण है? आजकल मनुष्य सुखसागर में गोते तो क्या, और न जाने क्या-क्या लगता रहता है लेकिन मजाल कि देवतागण वैसी परीक्षा ले लें जैसी पुराने जमाने में लेते थे.
शायद इसीलिए लोग अक्सर कहते पाए जाते हैं कि; "ज़माना पहले जैसा नहीं रहा अब."
एक मित्र से बात चली. वे बोले; "असल में देखा जाय तो नीतिकथाओं का उद्भव और विकास पूरी तरह से बहुत पहले ही हो चुका है. अब इस क्षेत्र में ज्यादा कुछ स्कोप नहीं है.
पता नहीं ऐसा उन्होंने क्यों कहा? अगर उनकी बात मान ली जाय तो क्या देवतागण परीक्षा-वरीक्षा इसलिए लिया करते थे ताकि कथाएँ लिखी जा सकें?
मुझे लगा घोर नास्तिक आदमी है जो ऐसा बोल रहा है.
मैंने उनसे पूछा; "यार, क्या तुम नास्तिक हो लिए?"
वे बोले; "नहीं ऐसी बात नहीं है. मैं तो ऐसा केवल इसलिए कह रहा हूँ कि आजकल देवता कष्ट वगैरह दें, उससे पहले ही मनुष्य चौकन्ना हो गया है. वो देवताओं को कष्ट देने ही नहीं देता."
मैंने पूछा; "मतलब?"
वे बोले; "देख नहीं रहे, आजकल मनुष्य ने देवताओं का आशीर्वाद वगैरह पहले से ही न जाने कितने कवच, कंठी, माला, रुद्राक्ष वगैरह में कैद कर लिया है. कोई देवता बचा नहीं है जिसका कवच वगैरह न मिलता हो. टीवी पर नहीं देखा क्या?"
मैंने कहा; "हाँ वो बात तो है. लेकिन फिर भी देवतागण देखते तो होंगे ही सबको."
वे बोले; "वे देखेंगे तो देखें. वैसे भी मनुष्य आजकल बहुत कल्कुलेटिव हो लिया है. वो सोचता है कि भाई तैंतीस करोड़ हमारे और बाकी के धर्मों के पचीस-पचास हज़ार ले लो. कुल मिलाकर तैंतीस करोड़ पचास हज़ार. अब तैंतीस करोड़ पचास हज़ार देवता छ सौ साठ करोड़ मनुष्यों पर कितनी नज़र रखेंगे? पर देवता बीस मनुष्य.....
Monday, April 27, 2009
हजारों साल.....एक माइक्रो पोस्ट
पिछले करीब दो महीने से जब भी कुछ दोस्तों के साथ राजनीति की बात होती है तो यह शेर हमेशा याद आ जाता है;
हजारों साल 'नर्गिस' अपनी बेनूरी पे रोती है
बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा

