एक हैं हाफिज़ सईद साहेब. हैं पकिस्तान के लेकिन अपना कार्यक्षेत्र हिन्दुस्तान को बना रखा है. ट्रेनिंग-व्रेनिंग देने में माहिर हैं. ट्रेनिंग देकर नौजवानों को स्वर्ग भेजने का पुण्य कार्य करते हैं. मुंबई पर हुए हमले में इनका नाम है. भारत ने सुबूत दिया तो अरेस्ट हो लिए. बाद में पकिस्तान ने बताया कि सुबूत पर्याप्त नहीं हैं तो छोड़ दिए गए. फिर भारत चिल्लाया कि हमने तो सुबूत दिए थे. पाकिस्तान फिर चिल्लाया कि आपके सुबूत काफी नहीं हैं. इतने नाकाफी कि हाफिज़ सईद को रोककर रखने में असफल हैं.
कल पाकिस्तान ने फिर बताया कि भारत ने पर्याप्त सुबूत नहीं दिए इसलिए हाफिज़ सईद को रोककर रखना उनके बस की बात नहीं.
पकिस्तान के बस में वैसे भी कुछ नहीं है. दिल्ली से लाहौर तक बस गई. लाहौर से दिल्ली नहीं आई.
खैर, पकिस्तान ने भारतीय सरकार को एक पत्र लिखकर खुलासा किया कि सुबूत इकठ्ठा करने के लिए पकिस्तान ने बहुत प्रयास किया लेकिन सुबूत मिले नहीं. उनकी कोशिशों का लेखा-जोखा निम्नलिखित है;
०१. हमें लगा कि अगर यह बात सच है कि मुंबई पर हमला हाफिज़ सईद साहेब ने पकिस्तान से नौजवानों को भेजकर करवाया तो उन्होंने रिक्रूटमेंट के लिए अखबारों में विज्ञापन ज़रूर दिए होंगे. यह कहते हुए कि; "ज़रुरत है साहसी नौजवानों की जो मुंबई पर हमला कर सकें."
कहते हैं इस तरह के हमलों के लिए काफी दिनों तक तैयारी की ज़रुरत है. हमने पिछले दो सालों का अखबार छान मारा लेकिन हमें हाफिज़ सईद द्बारा दिए गए इश्तिहार किसी अखबार में नहीं मिले. इससे यह साबित होता है कि मुंबई पर हुए हमले में उनका हाथ नहीं है.
०२. तमाम जुगत लगाकर हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि अगर इन नौजवानों को पकिस्तान में ट्रेनिंग दी गई है तो जिस स्कूल में ट्रेनिंग दी गई है, उस स्कूल को फीस पेमेंट करने का कोई तो सुबूत होगा. हाफिज़ सईद के घर की तलाशी में हमें किसी स्कूल की फीसबुक नहीं मिली. इससे साबित होता है कि इस हमले में हाफिज़ साहेब का हाथ नहीं है.
०३. अगर हाफिज़ सईद साहेब ने इन नौजवानों को पाकिस्तान से मुंबई भेजा होता तो उन्होंने ज़रूर कोई बड़ा मजमा लगाकर उन्हें बिदाई दी होती. मजमा लगता तो उसकी फोटोग्राफी भी हुई होती. टीवी पर दिखाया भी गया होता. हमने बहुत कोशिश की लेकिन हमें इस कार्यक्रम की विडियो रिकॉर्डिंग नहीं मिली. इससे यह साबित होता है कि मुंबई पर हुए हमले में हाफिज़ साहेब का कोई हाथ नहीं है.
०४. हिंदुस्तान का कहना है कि कसाब एंड पार्टी कराची से चलकर मुंबई तक बोट से पहुंचे. खोज करने के बाद कराची पोर्ट पर हमें यह तो पता चला कि किसी हाफिज़ सईद ने एक बोट भाड़े पर ली थी लेकिन पोर्ट के फार्म में जहाँ यह पूछा गया था कि; "बोट भाड़े पर लेने का मकसद क्या है?" वहां पर जवाब में लिखा गया था कि "बोट पर चढ़कर कुछ नौजवान मुंबई घूमने के लिए जायेंगे."
हमारा मानना है कि अगर यह बोट इस इरादे से भाड़े पर ली गई होती कि उसमें सवार नौजवान मुंबई पर हमला करने जा रहे हैं तो पोर्ट के फार्म में इस बात का डिसक्लोजर ज़रूर रहता. इससे यह साबित होता है कि मुंबई हमले में हाफिज़ साहेब का कोई हाथ नहीं है.
०५. हाफिज़ साहेब के घर से हमें रेकॉर्ड्स मिले हैं जिनसे पता चलता है कि उन्होंने कुछ सेटेलाईट फ़ोन की खरीदारी की थी. लेकिन यहाँ हम बताना चाहेंगे कि फ़ोन कंपनी को दिए गए डिसक्लोजर में यह नहीं कहा गया है कि ये फ़ोन मुंबई में हमले के लिए इस्तेमाल होने वाले थे.
०६. हाफिज़ सईद साहेब के डेरे से हमें मुंबई के नक्शे वगैरह मिले तो सही लेकिन पूछताछ के बाद पता चला कि हाफिज़ साहेब ने नक्शे इसलिए मंगवाए थे क्योंकि वे मुंबई में लैंड प्रोपर्टी में इन्वेस्ट करना चाहते थे.
०७. हमने हाफिज़ साहेब से पूछा कि; "क्या मुंबई में हुए हमले में आपका हाथ है?" इसके जवाब में उन्होंने हमें बताया कि मुंबई में हुए हमले में उनका हाथ नहीं है. इससे यह साबित होता है कि मुंबई पर हुए हमले में हाफिज़ साहेब का हाथ नहीं है.
०८. हमने हाफिज़ साहेब से यह भी पूछा कि; "क्या लस्कर-ए-तैयबा दहशतगर्दों का आरगेनाइजेशन है?" इसके जवाब में उन्होंने हमें बताया कि; "नहीं जनाब. लश्कर-ए-तैयबा तो एक कव्वाली गाने वाला आरगेनाइजेशन है."
हमारे पास उनकी बात पर विश्वास न करने का कोई कारण ही नहीं था. इससे साबित होता है कि मुंबई हमले में हाफिज़ साहेब का हाथ नहीं है.
०९. हमने नेशनल जियोग्राफी और डिस्कवरी जैसे चैनलों से भी खोज की लेकिन उनके पास भी इन नौजवानों द्बारा करांची से मुंबई तक किये गए सफ़र की विडियो रिकॉर्डिंग नहीं है. ऐसे में यह साबित होता है कि जिन लोगों ने मुंबई पर हमला किया वे पाकिस्तानी नहीं थे.
१०. हमें हाफिज़ सईद और कसाब के कुछ विडियो मिले हैं लेकिन हमने देखा कि हर विडियो में हाफिज़ साहेब कसाब को कव्वाली की बारीकियां समझा रहे हैं. इससे हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि कसाब मुंबई गया भी होगा तो कव्वाली गाने की प्रैक्टिस करने.
यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हिन्दुस्तानी सरकार ने उसे आतंकवादी समझकर अरेस्ट कर लिया.
हम हिन्दुस्तानी सरकार से यही कहेंगे कि अगर उसके पास मुंबई पर हुए हमले की प्लानिंग और हमले का शुरू से लेकर अंत तक विडियो रिकॉर्डिंग हो तो हमें मुहैय्या कराये. फिर हम सोचेंगे कि हाफिज़ साहेब से पूछताछ की ज़रुरत है या नहीं.
Wednesday, July 29, 2009
लश्कर-ए-तैयबा तो एक कव्वाली गाने वाला आरगेनाइजेशन है
Wednesday, July 15, 2009
"हम नौ-दस परसेंट की रेट से ग्रो करेंगे"
सरकार आज देश की जनता के मन में उभरने वाले सवालों का जवाब देने के लिए तैयार हो गए थे. असल में सरकार की तैयारी पर लोगों ने सवाल उठाना शुरू कर दिया था. ऐसे में सरकार के लिए यह ज़रूरी हो गया था कि वे सवालों का जवाब देने के लिए तैयार हों.
वैसे भी सरकार हमेशा विदेश यात्रा पर रहते हैं. अब विदेश यात्रा पर रहेंगे तो जनता कैसे सवाल पूछेंगी? आखिर विदेश यात्रा के दौरान सरकार का हवाई जहाज जितने पत्रकारों को लेकर उड़ सकता है, उतने ही पत्रकार तो सवाल पूछ पायेंगे. सरकार ने अपनी इसी मजबूरी के चलते देश की जनता के सवालों का जवाब देने का मन बनाया था.
सवालों को प्राप्त करने के लिए सरकारी टीवी चैनल तैयार था. सरकार आज उसी टीवी चैनल पर देश की जनता के सवाल कैच करने के लिए बैठे थे. करीब एक घंटे के डिस्कशन के बाद इस फैसले पर पहुंचा गया कि किस क्षेत्र के लोग सबसे पहले सवाल पूछेंगे?
पता चला कि मुंबई के लोग सबसे पहले सवाल पूछ सकते हैं.
लगभग पूरी मुंबई सवाल पूछने के लिए टेलीफोन लेकर तैयार थी. लेकिन इतने सारे सवाल और सरकार एक. ऐसे में सबकुछ भाग्य के भरोसे छोड़ दिया गया. बात भी ठीक थी. आखिर हम इकनॉमिक सुपर पॉवर भी बन जाएँ तो भी भाग्य के सहारे ही बनेंगे.
अँधेरी, मुंबई के मंगेश देशमुख का भाग्य बढ़िया था. सवाल वाला उनका फोन कनेक्ट हो गया. उन्होंने सवाल दाग दिया. बोले; "सरकार, आपने कहा था कि मुंबई को शंघाई बना देंगे. मैं तो कभी शंघाई गया नहीं. ऐसे में क्या यह बात कही जा सकती है कि शंघाई में दो घंटे की बरसात के बाद ही जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है? लोकल ट्रेन्स बंद हो जाती हैं? पूरा शहर पानी से भर जाता है? और ऐसा क्या वहां हर साल होता है?"
सरकार कुछ कहते इससे पहले ही संवाददाता ने कहा; "देखिये, आपको केवल एक सवाल पूछने का अधिकार है. आपने चार सवाल पूछे हैं. आप इनमें से कोई एक सवाल पूछिए."
मंगेश देशमुख कुछ कहते उसके पहले ही सरकार बोले पड़े; "कोई बात नहीं. जनता है. जनता को चार तो क्या, चालीस सवाल पूछने का हक़ है. वे चाहें तो चालीस सवाल भी पूछ सकते हैं."
मंगेश जी लाइन पर ही थे. उन्होंने कहा; "नहीं सरकार, मैं चालीस सवाल नहीं पूछूंगा. आप मेरे इन्ही सवालों का जवाब दे दें."
स्टूडियो में बैठे संवाददाता ने कहा; "ठीक है. मंगेश जी, अब आप अपने सवाल का जवाब सुनिए. हाँ, सरकार अब हमने मंगेश जी की लाइन काट दी है. अब आप उनके सवाल का जवाब दे सकते हैं."
सरकार ने जवाब दिया. बोले; "हम नौ-दस परसेंट की रेट से ग्रो करेंगे"
इतना कहकर सरकार चुप हो गए. संवाददाता ने सरकार की तरफ देखा. जैसे पूछ रहा हो; " जवाब क्यों नहीं देते, सरकार?"
सरकार उनके मन की बात शायद भांप गए. बोले; "नेक्स्ट. अगला सवाल क्या है?"
संवाददाता जी सकपका गए. उन्हें थोड़ी न पता था कि सरकार जवाब दे चुके हैं. वे कुछ सोच ही रहे थे कि घंटी बज गई. उधर से आवाज़ आई; "हलो, हम बनारस से चन्द्र मोहन मिश्रा बोल रहे हैं. नमस्कार. हमारा प्रश्न है कि मंहगाई पर लगाम लगाने के लिए सरकार क्या कर रहे हैं? धन्यवाद ."
संवाददाता ने सरकार की तरफ देखा. सरकार भी जवाब देने के लिए तैयार दिखे. वे बोले; "देखिये, हम नौ-दस परसेंट के रेट से ग्रो करेंगे."
चन्द्र मोहन जी की लाइन संयोग से कटी नहीं थी. वे बोले; "वो तो ठीक है, सरकार लेकिन हमारे सवाल का जवाब दीजिये. मंहगाई पर लगाम......."
इतने में उनकी लाइन काट दी गई. संवाददाता बोले; "ठीक है, चन्द्र मोहन जी. अब सरकार का जवाब सुनिए."
सरकार बोले; "जवाब तो हमने दे दिया. हम नौ-दस परसेंट की रेट से ग्रो करेंगे."
संवाददाता फिर से भौचक्के. मन में तो उनके भी बहुत सारे प्रश्न जन्मे. फिर उन्हें याद आया कि वे तो सरकार के मुलाजिम हैं. उनके मन में उठ रहे प्रश्न हवा हो गए. प्रश्न हवा हुए ही थे कि एक और फोनकॉल आ गया.
दूसरी तरफ से आवाज़ आई; "हेलो, सरकार मैं रायपुर से अनिल पुसदकर बोल रहा हूँ. मेरा आपसे सवाल है कि नक्सलियों के खिलाफ कार्यवाई कब होगी? हमारे राज्य में पुलिसवालों की मौत कब रुकेगी?"
सरकार बोले; "गुड क्वेश्चन. हम नौ-दस परसेंट की रेट से ग्रो करेंगे."
सरकार के पास बैठे संवाददाता बेहोश होते-होते बचे. किसी तरह से संभले. सामने रखे गिलास से पानी पीया. कुछ संभले तो बोल पड़े; "सरकार, लगता है आपको जनता के सवाल सुनाई नहीं दे रहे."
सरकार बोले; "मैं उनके सवाल न भी सुन सकूँ तो भी मुझे पता चल जाएगा कि जनता कैसे-कैसे सवाल पूछ सकती है. आप मेरे जवाब पर कम और जनता के सवाल पर ज्यादा ध्यान दें."
संवाददाता जी क्या करते, सिवाय इसके कि वे जनता का अगला सवाल कैच करते. वे कुछ सोच ही रहे थे कि स्टूडियो वालों ने फोनकॉल कनेक्ट कर दिया. उधर से आवाज़ आई; "हेलो, मैं विश्वदीपक रसिया बोल रहा हूँ. सरकार से मेरा सवाल है..."
सरकार को आवाज़ कुछ जानी-पहचानी लगी. उन्होंने विश्वदीपक जी को टोकते हुए कहा; "रसिया जी, अभी तो आपने कल हवाई जहाज में मुझसे सवाल किया था. आप तो पत्रकार हैं. यहाँ तो मैं केवल जनता के सवालों का जवाब देने के लिए बैठा हूँ. आपने तो कल ही 'शार्क' शिखर सम्मलेन के दौरान मुझे दस मिनट तक सवाल पूछ-पूछ कर बोर किया है. यह जनता का मंच है. यहाँ मैं आपके सवालों का जवाब नहीं दूंगा. आपको सवाल पूछने हैं तो हवाई जहाज में मिलें."
सरकार जब चुप हुए तब लोगों को समझ में आया कि असल में ये आवाज़ प्रसिद्द टीवी पत्रकार विश्वदीपक रसिया की थी. सरकार के पास बैठे संवाददाता जी बोले; "क्या ज़माना आ गया है. टीवी पत्रकार को भी बीच-बीच में जनता बनने की लालसा जाग जाती है."
उनकी बात सुनकर सरकार मुस्कुराने लगे.
मुस्कराहट का दौर चला ही था कि फोन की घंटी फिर बजने लगी. संवाददाता अब तक सरकार के जवाब सुनकर बोर हो चुके थे. उबासी लेते हुए उन्होंने कहा; "हाँ जी, पूछिए. सरकार से. क्या सवाल है आपका?"
दूसरी तरफ से आवाज़ आई; "सरकार, मैं दिल्ली से मुकेश बंसल बोल रहा हूँ. मेरा प्रश्न है...."
बंसल साहब ने अपना प्रश्न पूरा भी नहीं किया कि सरकार बोल पड़े; "देखिये हम नौ-दस परसेंट की रेट से ग्रो करेंगे."
बंसल साहब का सवाल पूरा नहीं हुआ था. लिहाजा उनकी लाइन कटी नहीं थी. वे बोले; " सरकार, नौ-दस परसेंट की रेट से कैसे ग्रो करेंगे? निर्माणाधीन ब्रिज टूट जाता है. लोग मर जाते हैं. मलवे को उठाने के लिए जो क्रेन आती है वो खुद ही टूट जाती है. ये राजधानी में बसे अमेरिका, इंग्लैंड, जर्मनी के एम्बेसेडर वगैरह अपने देश के निवेशकों को क्या रिपोर्ट भेजते
होंगे? आप खुद ही सोचें...."
अचानक बंसल साहब की लाइन कट गई.
सरकार बोले; " हें..हें..वो सब तो ठीक है बंसल साहब. लेकिन मैं आपको बता रहा हूँ न कि हम नौ-दस परसेंट की रेट से ग्रो करेंगे."
जवाब देकर सरकार अगले सवाल का इंतजार करने लगे. संवाददाता जी भी साथ में इंतजार करने लगे लेकिन फिर फोन की घंटी नहीं बजी.
अपने-अपने सवाल से लैस देश भर के लोग अब "हम नौ-दस परसेंट की रेट से ग्रो करेंगे"; इस कविता का भावार्थ खोज रहे हैं.
Tuesday, July 14, 2009
घुन्नन-मिलन
घुन्नन जब दफ्तर में आया उस समय मैं अपने सीनियर के दफ्तर में हो रही एक मीटिंग में था. जैसे ही खबर मिली, मैंने तुंरत मीटिंग कैंसल की और अपने दफ्तर पहुंचा. मेरे सीनियर ने मीटिंग कैंसल करते वक्त मुझसे कहा; "मिश्रा जी, मीटिंग कैंसल नहीं करनी चाहिए आपको. बहुत ज़रूरी है."
मैंने उन्हें दो टूक जवाब देते हुए कहा; "सर, अगर बाल-सखा से मीटिंग और आफिसियल मीटिंग के बीच चुनना पड़े तो मैं बाल-सखा से मीटिंग को चुनूँगा."
मेरी बात सुनकर सीनियर डर गए.
कोई नई बात नहीं है. वे ऐसे ही डरते रहते हैं. उन्हें इस बात की चिंता सताती रहती है कि मैं कहीं रिजाइन न कर दूँ. जानकारी के लिए बता दूँ कि मैं बचपन से ही बम्बईया फिल्मों के उस इंस्पेक्टर से प्रभावित रहा हूँ जो इस्तीफा लिखकर जेब में रखता है और बात-बात पर अपने सीनियर को चमकाता रहता है.
दफ्तर आया तो घुन्नन को देखकर लगा जैसे सदियों से बरसात का मुंह न देखे रेगिस्तान में सावन के बादल उमड़ आये. उन्हें अंकवारि भरे पंद्रह मिनट तक भेंटता रहा. इच्छा तो हुई कि एक घंटा तक भेंटे और न जाने कितने वर्षों से घुन्नन को न मिल पाने का मलाल निकाल दें. लेकिन ऐसा हो न सका.
पछतावा हुआ कि घुन्नन से गाँव में क्यों नहीं मिला? गाँव में मिला होता तो कम से कम एक घंटा अंकवारि में भरे रहता घुन्नन को.
खैर, उसके बाद मैंने दफ्तर से पूरे दिन के लिए छुट्टी ले ली. रास्ते से दस किस्म की मिठाइयाँ, तीन पैकेट नमकीन, एक किलो जलेबी पैक करवाई.
जलेबी की कहानी बड़ी मजेदार है. जब मैं और घुन्नन गाँव के प्राईमरी स्कूल में पढ़ते थे, उनदिनों गाँव में जलेबी की गिनती सबसे प्रिय और हमेशा उपलब्ध रहने वाली मिठाई के तौर पर होती थी.
आज भी याद है. स्कूल के पिछवाड़े मोहनलाल हलवाई की दूकान थी. ज्यादा बड़ी नहीं थी. गाँव में हलवाई की दूकान कितनी बड़ी रहेगी? छोटी सी दूकान में कांच के कुछ मर्तबान. किसी में लाई रहती थी तो किसी में चूडा. गट्टा, रेवड़ी और गुड़ से बने सेव के लिए मर्तबान अलग से होते थे. एक मर्तबान में नमकीन रखी रहती थी. मिठाई के नाम पर मोहनलाल जलेबियाँ बनाता था. दो तरह की जलेबी. गुड़ से बननेवाली जलेबी और चीनी से बननेवाली जलेबी. गुड़ से बननेवाली जलेबी को हम चोटिया जलेबी कहते थे. थोड़ी काली होती थी न. अब तो ऐसी जलेबी के दर्शन दूभर हो गए हैं. शहर से नाता क्या जुड़ा, गाँव का सबकुछ पीछे छूट गया. रास्ते तो छूटे ही, चोटिया जलेबी भी छूट गई.
अब तो यादकर के केवल आँखों को नम किया जा सकता है.
मैं और घुन्नन जब क्लास बंक करते तो मोहनलाल की दूकान में बैठकर चोटिया जलेबी खाते. मोहनलाल भी हम दोनों से बहुत प्रसन्न रहता था. उनदिनों जलेबी वजन करके बिकती थी. जब हम ढाई सौ ग्राम जलेबी की फरमाईस करते तो तौलने के बाद मोहनलाल दो जलेबियाँ और रख देता.
सरल-मना मोहनलाल. अब कहाँ मिलेंगे ऐसे लोग?
आज जब इतने वर्षों बाद घुन्नन से मिला तो अनायास ही जलेबी की याद आ गई. इच्छा तो हुई कि अगर उपलब्ध होती तो आज चाहे जितनी भी दूर जाना पड़ता, जाते और चोटिया जलेबी खोजकर जरूर लाते. जैसे ही यह बात मन में आई, मैंने दफ्तर के प्यून को फ़ोन किया. जब मैंने उससे पूछा कि चोटिया जलेबी कहाँ मिल सकती है तो उसे समझ में ही नहीं आया कि मैं कैसी जलेबी की बात कर रहा हूँ. जब मैंने उसे पूरी बात बताई तो उसने कहा कि थोड़ी देर में वो बताएगा.
प्यून से बात करके मैंने फ़ोन डिस्कनेक्ट कर दिया.
उसके बाद घुन्नन से उसके घर-परिवार के बारे में पूछा. उसी समय पता चला कि उसका बेटा अब अट्ठारह वर्ष का हो गया है. समय बीतते देर नहीं लगती. सुनकर विश्वास ही नहीं हुआ कि जिस बच्चे को तब देखा था जब वह डेढ़ वर्षों का था, अब अट्ठारह वर्षों का हो गया है.
मुझे याद है. जब घुन्नन का बेटा एक साल का था, मैं घुन्नन के घर उससे मिलने गया था. उसके बेटे को गोद में लिए बैठा था कि बच्चे ने सू-सू कर दिया. पहले के बच्चे सू-सू करते थे तो जिसकी गोद में करते थे उसके कपडे भीग जाते थे. अब तो बच्चे इतने स्मार्ट हो गए हैं कि सू-सू करते हैं तो पता ही नहीं चलता. कभी-कभी सोचता हूँ तो लगता है कि आज भी बच्चे तो बच्चे ही हैं. असल में स्मार्ट माता-पिता हो गए हैं जो बच्चों को हगीज और न जाने क्या-क्या पहना देते हैं.
ज़माने ने बच्चों को भी बच्चा नहीं रहने दिया. हाय रे सभ्यता.
बात ही बात में घुन्नन ने बताया कि लड़के का एम बी ए के एंट्रेंस एक्जाम में सेलेक्शन हो गया था लेकिन आर्थिक तंगी के कारण उसका एडमिशन अभी तक नहीं हो पाया. मैंने तुंरत घुन्नन से कहा कि वो पैसे की चिंता न करे. मैं उसकी पढ़ाई के लिए पैसे का इंतजाम कर दूंगा. घुन्नन को बहुत संकोच हुआ लेकिन मैंने अपनी बात मनवा ली.
अभी घुन्नन से और बात हो ही रही थी कि दफ्तर से प्यून का फ़ोन आया. उसने बताया कि कैसे उसने बड़ी मेहनत की लेकिन किसी दूकान का पता नहीं मिला जहाँ चोटिया जलेबी मिलती हो. मैं उसकी बात सुनकर दुखी होने ही वाला था कि उसने बताया कि उसके पड़ोस में हलवाई की दूकान है और वह हलवाई अलग से चोटिया जलेबी बनाने पर राजी हो गया है.
प्यून की बात सुनकर मुझे लगा जैसे किसी ने मरते हुए को संजीवनी बूटी खिला दी हो. अपनी हालत के बारे में सोचकर मैं कल्पना करने लगा कि श्री राम को कैसा लगा होगा जब उन्होंने हनुमान जी को संजीवनी बूटी वाले पर्वत के साथ देखा होगा.
खैर, मैंने गाड़ी तुंरत दफ्तर की और मोड़ ली. दफ्तर के नीचे ही प्यून खडा मिल गया. मैंने उसे पाने साथ लिया और उस हलवाई की दूकान की तरफ चल दिया. वहां पहुँच कर हलवाई से आधा किलो जलेबी ली. प्यून ने मजाक में कहा भी इस उम्र में इतनी जलेबी खाना ठीक नहीं लेकिन मैं नहीं माना. फिर मन में आया कि जब इतनी मेहनत करके चोटिया जलेबी खरीद ही ली है तो क्यों न फिर शहर से बाहर कोई प्राईमरी स्कूल भी खोज लिया जाय. ड्राईवर को ऐसे एक प्राईमरी स्कूल की जानकारी थी. वह हमदोनों को वहां ले गया. संयोग देखिये कि इस स्कूल के पिछवाड़े भी एक हलवाई की दूकान थी. मैंने पहले से ख़रीदी चीनी वाली जलेबी ड्राईवर के हवाले कर दी.
मैंने और घुन्नन ने उस दूकान पर बैठकर चोटिया जलेबी खाई. न जाने कितने वर्षों बाद ऐसा लगा कि बिना किसी मशीन का इस्तेमाल किये ही बचपन में पहुँच गए.
शाम को घुन्नन ट्रेन पकड़कर गाँव चला गया. अब मैं उसके वापस आने की बाट जोह रहा हूँ.
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बाल-सखा के मिलन पर ब्लाग पोस्ट यहाँ पढ़ सकते हैं. यह तो साहित्यिक पोस्ट है.

