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Wednesday, August 19, 2009

कुर्बान जाऊं आपकी महानता पर




इतिहास पुरुषों के साथ यह बड़ा बवाल है. वे दुनियाँ से कूच करने के बाद भी लोगों को चैन से नहीं रहने देते. इतिहास पुरुषों के चक्कर में न जाने कितने इतिहास बन जाते हैं. जिन्ना जी को ही ले लीजिये. क्या कहा? कहाँ मिलेंगे? अरे भैया, ले लीजिये से मेरा मतलब है उन्हें लेकर मत जाइए. मेरा मतलब है कि उनकी बात कर लीजिये. हाँ, अब समझे.

तो मैं कह रहा था कि जिन्ना जी को ही ले लीजिये. आज इस असार संसार में नहीं है तो क्या हुआ, औरों को डुबाय दे रहे हैं. देखकर लगता है जैसे उकसाते रहते हैं कि; "मेरे बारे में यह कह दो. मेरे बारे में वह कह दो. मुझे महान बता दो."

मैं पूछता हूँ, आप महान थे तो थे. लेकिन इतना भी क्या महान होना कि दूसरों को उकसाय दें कि दूसरे पग-पग पर आपको महान कहते फिरें? जिनके ऊपर साम्प्रदायिक होने के आरोप लगते रहते हैं वे भी आपको सेकुलर बताते रहते हैं. मैं पूछता हूँ, महानता की कोई लिमिट है कि नहीं?

देखकर तो यही लगता है कि आप लिमिटलेस महान थे. आखिर आज तक ऐसा नहीं हुआ कि नेहरु जी को किसी पाकिस्तानी नेता ने महान कह दिया हो और उसकी छीछालेदर हो गई हो. ऐसे में तो यही कहा जा सकता है कि महानता में आप सबसे ऊपर थे. इतने ऊपर कि न जाने कितने लोगों का बुढापा खराब कर दिया आपने. हो सकता कुछ और अभी भी लाइन में हों.

कुर्बान जाऊं आपकी महानता पर.

अब तो ऐसा लगता है कि जिसे अपना बुढापा खराब करवाना हो, वो आपको महान बता कर खराब करवा लें. अब जसवंत सिंह जी को ही ले लीजिये. फिर वही सवाल? उन्हें लेकर क्या करेंगे? क्या कहा? उन्हें पार्टी में से निकाल दिया गया? अरे भैया पार्टी में से ही निकाला गया है. पार्टी कोई अफीम पीने की थोड़े न थी. पार्टी से मतलब राजनीतिक पार्टी से है न. अफीम पीने की पार्टी होती तो पेज थ्री की खबर बनती. ये खबर तो पेज वन की है. अंतर तो है ही.

हाँ तो मैं जसवंत सिंह जी की बात कर रहा था. क्या-क्या नहीं किया उन्होंने पार्टी से निकलने के लिए. पार्टी हारी तो इलेक्शन इंचार्ज नेताओं के ऊपर आरोप लगा दिया. उससे कुछ नहीं हुआ तो चिट्ठी लिख डाली. चिट्ठी से भी जब कुछ नहीं बना तो ब्रह्मास्त्र का प्रयोग कर डाला. उन्हें लगा होगा कि पार्टी वाले ऐसे नहीं निकालेंगे. जिन्ना को महान बता दो और फिर देखो असर. जिन्ना जी की महानता पर प्रकाश डाला और असर हो गया. निकाल दिए गए.

भारतीय संस्कृति की रक्षा का दावा करने वालों के लिए ब्रह्मास्त्र का मतलब ही बदल गया है. समझ में नहीं आता कि सालों से पॉलिटिक्स में रहने वाले पोलिटिकली करेक्ट बातें करना कब सीखेंगे?

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सिंह जी की किताब के विमोचन के अवसर पर मंच पर एक सज्जन को देखा. एकदम नामवर सिंह जी जैसे. देखकर लगा जैसे उनके जुड़वा भाई हैं. एक बार के लिए लगा कि कहीं ऐसा न हो कि कोई उन्हें नामवर सिंह समझ कर ऐसी छीछालेदर न कर दे जैसी उदय प्रकाश जी की हुई.

अच्छा हुआ किसी ने नहीं देखा. हो सकता था जल्दबाजी में उन्हें नामवर सिंह ही समझ लिया जाता और फिर.....

Tuesday, August 18, 2009

वाइन फ्लू - एक भविष्यात्मक (ये क्या होता है?) पोस्ट




शुक्रवार १८ अगस्त, २०८१

पूरा अमेरिका वाइन फ्लू से परेशान है. प्राप्त ताजा समाचारों के अनुसार कल रात लास वेगास में वाइन पीकर सत्रह लोग इस फ्लू के शिकार हो गए. अभी तक लगभग सात लाख लोग इस फ्लू के शिकार हो चुके हैं. अमेरिकी गृह मंत्रालय ने कल एक प्रस्ताव पारित करके भारत के उद्योग समूह यूनाइटेड वाइन के उत्पादों पर अमेरिका में इंट्री से रोक लगा दिया है. ज्ञात हो कि यूनाइटेड वाइन प्रख्यात वाइन उद्योगपति जयजय माल्या की कंपनी है.

अमेरिकी गृह मंत्रालय द्बारा जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि भारतीय समूह की इस कंपनी के उत्पादों को जानबूझ कर इस तरह से बनाया गया ताकि ज्यादा से ज्यादा अमेरिकी नागरिक वाइन फ्लू के शिकार हो जाएँ. कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि यह भारतीय उद्योग समूह ऐसा करके अमेरिका से बदला लेना चाहता है. विशेषज्ञों के अनुसार इस भारतीय उद्योग समूह का ऐसा मानना है कि साल २००९ में भारत में स्वाइन फ्लू एक ख़ास अमेरिकी साजिश की वजह से फैला था.

अमेरिकी विशेषज्ञों की इस सोच का आधार इस बात को माना जा रहा है कि यूनाइटेड उद्योग समूह की गिनती देशभक्त उद्योग समूह में होती आई है. ज्ञात हो कि साल २००८ में इस उद्योग समूह के तत्कालीन मालिक ने तत्कालीन राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की नीलाम होने वाली वस्तुएं जैसे चश्मा, चप्पल वगैरह खरीद कर देशभक्त होने का सबूत दिया था.

भारतीय व्यापार मंत्री सुश्री डिम्पल नाथ ने अमरीकी सरकार के इस कदम की आलोचना करते हुए कहा कि इस तरह के कदम विश्व व्यापार संगठन की नीतियों के खिलाफ हैं. सुश्री नाथ ने एक प्रेस कांफ्रेंस में बयान जारी करते हुए कहा कि; " अमेरिकी सरकार के इस फैसले की वजह से भारत संयुक्त राष्ट्र संघ में अमेरिका की वाट लगा देगा."

ज्ञात हो कि संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत का दबदबा दुनियाँ के तमाम देशों से ज्यादा है.

सुश्री डिम्पल नाथ ने बताया कि वाइन फ्लू पर अमेरिकी सोच एक कम्प्लेनात्मक मुद्दा हो सकता है लेकिन यूनाइटेड ग्रुप के उत्पादों पर रोक लगाकर अमरीका ने अपने लिए मुश्किलें खड़ी कर ली हैं. भारतीय व्यापर मंत्री ने यहाँ तक कहा कि अमरीका अगर अपने फैसले पर टिका रहता है तो भारत अमेरिका को दी जाने वाली सहायता राशि कम करने पर विचार करेगा.

उधर अमरीकी खुफिया एजेन्सी का मानना है कि यूनाइटेड समूह की फार्मा कंपनी प्रिवेंटिस ने पिछले वर्ष से ही वाइन फ्लू की वैक्सिन पर खोज शुरू कर दी थी. एजेन्सी का मानना है कि यूनाइटेड ग्रुप ने एक साजिश के तहत पहले वाइन फ्लू के वायरस ईजाद किये और उसके बाद अपनी ही फार्मा कंपनी से वैक्सिन बनाने के लिए कहा.

वाइन फ्लू का आतंक अमेरिका में इस तरह से छाया है कि अभी तक अमेरिकी ब्लॉग स्फीयर में लगभग तीन लाख सत्तावन हज़ार ब्लॉग पोस्ट वाइन फ्लू, उसके कारणों और उससे बचने की तमाम विधियों पर लिखी जा चुकी हैं.

ज्ञात हो कि वाइन फ्लू की बीमारी फैलने का मुख्य कारण यह है कि वाइन फ्लू से बीमार लोग और ज्यादा वाइन पीना चाहते हैं. जहाँ डॉक्टर यह चाहते हैं कि लोग वाइन पीना छोड़ दें, वहीं वाइन फ्लू से बीमार लोग और ज्यादा वाइन पीना चाहते हैं.

इधर भारत के योग गुरु स्वामी ज्ञानदेव का मानना है कि वाइन फ्लू से बचने के उपायों में सबसे बढ़िया उपाय यह है कि पीड़ित व्यक्ति को सुबह तीन चम्मच तुलसी के पत्ते का रस आंवले के पत्ते के रस में मिलाकर पीना चाहिए. बाबा ज्ञानदेव ने यह भी बताया कि उनके कारखाने में तैयार तुलसी-आंवला पत्रक रस का व्यवहार करने से सुबह-सुबह मेहनत करने से बचा जा सकता है. अमेरिकी सरकार ने बाबा ज्ञानदेव की कंपनी को दो लाख लीटर पत्रक रस का आर्डर दिया है. विशेषज्ञों का अनुमान है कि इस बार बाबा ओंड इस कंपनी का मुनाफा पूरे साढ़े सात सौ प्रतिशत से बढ़ जाएगा. इस खबर के आने के बाद कंपनी के शेयर के मूल्य में कल बत्तीस प्रतिशत का उछाल देखा गया.

प्रिवेंशन इज बेटर दैन क्योर नामक मुहावरे से प्रभावित यूरोपीय संघ की आज बैठक होने वाली है. संघ का मानना है कि यूनाइटेड वाइन के उत्पादों पर रोक लगाने की प्रक्रिया अगर पहले ही शुरू कर दी जाय तो...........

Friday, August 14, 2009

एक मौसमी पोस्ट - स्वाइन फ्लू




ये स्वाइन फ्लू भी बड़ा जबर रोग है. इतनी दूर से चला लेकिन भारत पहुँच कर ही दम लिया. दम भी ऐसा कि भारतवासियों को दम नहीं लेने दे रहा. इससे अच्छा तो चायनीज फ्लू था जो चला तो ठीक लेकिन कहीं नहीं जा सका. जाता भी कैसे, चीन में पैदा हुई चीजें वैसे भी ज्यादा दिन नहीं चलतीं.

लेकिन स्वाइन फ्लू तो आकर ही बैठ गया. हालत यह है कि छींकना मुश्किल हो गया है. इस बात का डर रहता है कि छींक सुनकर (अब छींक को देख तो नहीं सकते न) दोस्त-यार साथ ही न छोड़ दें. किसी को एक बार खांसी आ जाए तो लोग ऐसे देखते हैं जैसे धमकी दे रहे हों कि; "अगर मुझे स्वाइन फ्लू हुआ तो मैं तुम्हें नहीं छोडूंगा."

हमारे एक मित्र स्वाइन फ्लू को लेकर अति-उत्साही हो गए. इतने उत्साही जैसे कोई नया ब्लॉगर पहली पोस्ट पर चार से ज्यादा टिप्पणियां मिलने पर होता है. उत्साह ने उनके मन में घर बसाया तो मुझसे बोले; "ऐसा करें न, कि अगले दस दिन के लिए आफिस बंद कर देते हैं."

मैंने पूछा; "क्या ज़रुरत है आफिस बंद करने की? कलकत्ते में तो अभी तक स्थिति सामान्य है."

मेरी बात सुनकर उन्होंने विश्व-प्रसिद्द कहावत ठेल दी. बोले; "प्रेवेंशन इज बेटर दैन क्योर."

जब मैंने कहा कि वे ओवर रेअक्ट कर रहे हैं तो बोले; "अच्छा, ठीक है लेकिन डॉक्टर से मिलकर स्वाइन फ्लू के बारे जानकारी तो हासिल कर ही लेना चाहिए."

इतना कहते हुए तुंरत अपने डॉक्टर को फ़ोन कर दिया. बोले; "आज मैं आपसे मिलना चाहता हूँ. मुझे स्वाइन फ्लू के बारे में जानकारी चाहिए."

उन डॉक्टर साहब को मेरे दोस्त के साथ बात करने में बड़ा मज़ा आता है. वे तुंरत राजी हो गए. एक बार भी नहीं कहा कि; "मेरे पास आने की क्या ज़रुरत है? इन्टरनेट पर उसके बारे में जानकारी हासिल कर लो. टीवी देख लो. अभी सारे चैनल स्वाइन-मय हो लिए हैं."

और तो और यह भी कह सकते थे कि हिंदी ब्लॉग पढ़ लो. स्वाइन फ्लू तो क्या, उसके बाप के बारे में भी जानकारी मिल जायेगी. लेकिन नहीं.

अब मित्र के साथ ही शाम को घर के लिए निकलता हूँ तो उनके साथ डॉक्टर के पास जाना पड़ा. साढ़े आठ बजे उन्होंने डॉक्टर साहब को फ़ोन करके बता दिया कि; "आप अपने चेंबर में ही रहें. मैं आपसे मिलने आ रहा हूँ."

नौ बजे डॉक्टर साहब के पास पहुंचे. डॉक्टर साहब से मिलने में मुझे दिलचस्पी नहीं थी. इस बात का पता मेरे दोस्त को था. इसलिए वे मुझसे बोले; "आप तो जायेंगे नहीं. गाडी में बैठिये. मैं पॉँच मिनट में आता हूँ."

चले गए. चालीस मिनट बाद आये. मैंने पूछा; "क्या-क्या सावधानी के लिए कहा डॉक्टर साहब ने?"

बोले; "अरे कुछ नहीं. वही सब कहा जो टीवी में बताता है. हाथ धोकर रखिये. ज्यादा लोगों से नहीं मिलना है. स्वीमिंग बंद कर दीजिये. और ज्यादा कुछ नहीं."

मैंने कहा; "और क्या बातें हुईं?"

मित्र बोले; "वही सब. कह रहे थे कि मुझे अपना बिजनेस और आगे बढ़ाना चाहिए. फिर बोले कि कौन सी पिक्चर देखी मैंने? फिर बोले एक दिन चलिए साथ में पिक्चर देखने चलते हैं."

लीजिये. मैंने सोचा था कि स्वाइन फ्लू के बारे में जानकारी लेने गए हैं. और यहाँ पिक्चर देखने की बातें हो रही हैं. जहाँ रात को नौ बजे घर पहुँचते हैं, वहां साढ़े दस बजे घर पहुंचे.

घर पहुंचे और टीवी देखा तो वहां भी स्वाइन फ्लू से कोई बचाव नहीं. कोई चैनल खोल लीजिये आज कल हर ब्रेकिंग न्यूज स्वाइन फ्लू के बारे में है. एक हैल्थ मिनिस्टर है. बेचारा न घर का रहा न मंत्रालय का. केवल न्यूज चैनल का होकर रह गया है. पिछले सात दिनों से बयान की सफाई करते फिर रहा है. मैंने ये नहीं कहा. मैंने वो नहीं कहा. मैंने ३३ प्रतिशत वाली बात नहीं कही. टैमीफ्लू के बारे में दिए गए मेरे बयान को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया.

बेचारा यही कहते फिर रहा है. मिनिस्ट्री का बारह तो क्या साढ़े बारह बज गया है.

टीवी चैनल के संवाददाता मास्क पहने घूम रहे हैं. बड़े क्यूट लग रहे हैं. चिरकुट संवाददाता भी डॉक्टर लग रहा है. हॉस्पिटल से रिपोर्टर लोग रिपोर्टिंग कर रहे हैं. मास्क पहने संवाददाता ऐसा लग रहा है जैसे कोई डॉक्टर हो और माइक्रोफोन से ही ऑपरेशन करने के लिए कमर कसे है.

आज नीरज भैया से बात हो रही थी. मैंने कहा; "खोपोली तो पुणे और मुंबई के बीच है. ऐसे में वहां की स्थिति क्या है?"

वे बोले; " बड़ी हालत खराब है यहाँ तो. सब डरे हुए हैं. फैक्टरी में लोगों को देखकर लग रहा है जैसे डब्लूएचओ ने डॉक्टरों का एक विशिष्ट दल हमारी फैक्टरी के लिए भेज दिया है. चश्मा पहने मजदूर भी डॉक्टर दिखाई दे रहा है."

मैंने पूछा और क्या हो रहा है तो बोले; "हमें तो डर है कि कहीं कोई बुजुर्ग वायरस बाकी के वायरसों को यह न कह दे कि खोपोली में एक शायर रहता है. जाओ उनसे तरन्नुम में गजलें सुनकर आ जाओ. हम बताते हैं बंधुवर, अगर ऐसा हो गया तो खोपोली में भी स्वाइन फ्लू फैलने की आशंका है."

अब हम तो यही कहेंगे कि ऐसा न हो.

और यह कहेंगे कि स्वाइन तो जाने से रहे. भला स्वाइन फ्लू ही चला जाए.