Show me an example

Thursday, January 28, 2010

दुर्योधन की डायरी - पेज १४०८




पुरस्कार अगर विवादास्पद न हों तो उनका महत्व घट जाता है. जिन पुरस्कारों पर विवाद न हो, ऐसे पुरस्कारों को लेने से लोग कतराने लगे हैं. कोई संस्था अगर पुरस्कार देना चाहे तो उसे पहले यह स्योर करना पड़ेगा कि पुरस्कार की वजह से विवाद पैदा होंगे ही. अगर पुरस्कार देने वाले ऐसा करने में सक्षम नहीं हैं तो ऐसे पुरस्कारों को कोई हाथ नहीं लगाएगा.

परन्तु क्या ऐसी स्थिति हाल में बनी है? उत्तर है; "नहीं. ऐसा पांच हज़ार वर्षों से होता आया है."

क्या कहा आपने? विश्वास नहीं होता?

तो फिर हाथ कंगन को आरसी क्या...........? युवराज दुर्योधन की डायरी का यह पेज पढ़िए.

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फिर से वही किचकिच. फिर से वही झमेला. हर साल इस मौसम में एक न एक झमेला होता ही है. एक बार फिर से महाराज भरत पुरस्कारों पर विवाद हो गया. फिर से बयानबाजी. फिर से थू-थू. इस मौसम में हर साल अखबारों और टीवी न्यूज़ चैनलों को और कोई काम नहीं रहता. यह मौसम केवल भरत पुरस्कारों से उत्पन्न हुए विवादों के लिए रिजर्व रख छोड़ा है इन मीडिया वालों ने.

पिछले साल एक जन-नायक को भरत श्री से सम्मानित कर दिया गया था. बाद में पता चला कि वह तो हस्तिनापुर का नागरिक ही नहीं है. खोजबीन करने पर पता चला कि वह तो म्लेच्छ है. आर्यों के बीच में एक म्लेच्छ?

राजभवन की बड़ी छीछालेदर की थी इन मीडिया वालों ने. मीडिया वालों ने पूरे दो महीने मामले को गरमाए रखा. बाद में पता चला कि इस तथाकथित जननायक को जयद्रथ की वजह से 'भरत श्री' मिला था. पूछने पर जयद्रथ ने बताया कि एक बार इस आदमी ने आखेट के दौरान जयद्रथ के लिए नाच-गाने और मदिरा का प्रबंध किया था इसलिए जयद्रथ ने उसे जन-नायक बताकर 'भरत श्री' सम्मान दिलवा दिया था.

मैं कहता हूँ दिलवा दिया तो दिलवा दिया. इसमें क्या हाय-तौबा मचाना? एक ठो मानपत्र और शाल देने को लेकर इतना बड़ा झमेला खड़ा करना कहाँ की पत्रकारिता है?

इस साल एक बार फिर से वही झमेला. मामाश्री ने गंधार के एक व्यापारी को 'भरत भूषण' क्या दिलवा दिया पांडव और मीडिया वाले पीछे ही पड़ गए. कहते हैं इस व्यापारी के ऊपर हस्तिनापुर में कोर्ट केस चल रहा है फिर भी इसे भरत भूषण जैसे पुरस्कार से सम्मानित कर दिया गया. मैं कहता हूँ कोर्ट केस ही तो चल रहा है. व्यापारी को सजा तो नहीं हुई है न. ऐसे में उसे पुरस्कार क्यों न दिए जाएँ? व्यापारी भी कुछ गलत नहीं कह रहा. बता रहा था कि वह हमेशा उज्बेकिस्तान में हस्तिनापुर के इंटरेस्ट की बात करता है. पांडवों का कहना है कि यह व्यापारी पूरी तरह से दलाल है. मैं कहता हूँ पुरस्कार ही तो दिया है. थोड़े न हस्तिनापुर उठाकर इस व्यापारी को दे दिया गया है.

हर तरफ से राजमहल पर अटैक हो रहा है. मीडिया की तरफ से. पांडवों की तरफ से. बुद्धिजीवियों की तरफ से.

कई बुद्धिजीवी इस बात से नाराज़ हैं कि पिताश्री के केशसज्जा करने वाले को 'भरत श्री' से सम्मानित कर दिया गया. साथ ही पिताश्री के उदररोग की चिकित्सा करने वाले चिकित्सक को 'भरत भूषण' से नवाज़ा गया. मैं पूछता हूँ इसमें बुराई ही क्या है? पुरस्कार क्या पिताश्री से बड़े हैं?

कई लोग यह सवाल उठा रहे हैं कि माताश्री की आँखों के लिए पट्टी की सिलाई करने वाले दरजी को कैसे 'भरत श्री' से नवाजा जा सकता है? एक पत्रकार ने अपने चैनल पर यह मुद्दा उठा रखा है कि दुशासन जिस पान दूकान पर पान खाता है उसके मालिक को व्यापार के क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान के लिए 'भरत श्री' से सम्मानित कर दिया गया है और अपने नृत्य से जयद्रथ का मनोरंजन करने वाली नर्तकी को कला में उसके योगदान के लिए 'भरत श्री' प्रदान कर दिया गया है.

मैं कहता हूँ राजमहल का पुरस्कार है तो राजमहल की चमचागीरी करने वालों को नहीं मिलेगा तो क्या पांडवों की चमचागीरी करने वालों को मिलेगा? आखिर किसी न किसी को तो पुरस्कार देना ही है. इन्हें मिल गया तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ा?

और फिर ऐसा क्या पहली बार हुआ है? काका श्री पांडु ने भी तो उस चिकित्सक को 'भरत भूषण' से सम्मानित किया था जिसने उनके पाँव के छालों की चिकित्सा की थी.

हर साल वही-वही बातें. वही-वही पैनल डिस्कशन. फिर से वही मांगें कि इन पुरस्कारों के लिए चयन का नया सिद्धांत बनाया जाय. नए लोगों को कमिटी में रखा जाय. मैं कहता हूँ क्या करेंगे नए लोग कमिटी में आकर? वे अपनी राय ही तो दे सकते हैं. आखिर में पुरस्कृत लोगों की लिस्ट को मेरे हाथ के नीचे से ही तो गुजरना है. मैं जो चाहूँगा आखिर होना तो वही है. लेकिन ये बुद्धिजीवी, पत्रकार वगैरह कुछ समझते ही नहीं. सिस्टम को ठीक करने की डिमांड का नाटक करते रहते हैं.

एक तरह से देखा जाय तो ठीक ही है. ऐसे पैनल डिस्कशन से यह भ्रम बना रहता है कि हस्तिनापुर में सिस्टम को ठीक करने के बारे में सोचा जा रहा है. बातें की जा रही हैं तो एक दिन सिस्टम में बदलाव भी आएगा. एक टीवी चैनल ने तो पैनल डिस्कशन के लिए मुझे भी इनवाईट किया है. मैंने तो सोच लिया है कि टीवी पर सिस्टम में बदलाव की बातें बोलकर विवादों को एक साल के लिए शांत कर दूंगा. उसके बाद भी अगर मामला गरमाया रहा तो पितामह की अध्यक्षता में एक कमीशन का गठन करवा देना श्रेयस्कर रहेगा. एक बार कमीशन गठित हो गया तो फिर दस साल तो ऐसे ही खिंच जायेंगे.

वैसे भी पुरस्कार हैं तो विवाद है. विवाद न हो तो पुरस्कार दो कौड़ी का.

Saturday, January 23, 2010

पकिस्तान प्रीमियर लीग




आई पी एल में खिलाड़ी बिकने के लिए तैयार थे. कुछ खरीद लिए गए तो कुछ को किसी ने पूछा ही नहीं. नहीं पूछा माने बिलकुल नहीं पूछा. जिन्हें नहीं पूछा गया ऐसे लोगों के लिए खरीदार मोल-भाव करने के लिए भी राजी नहीं हुए. वैसा भी नहीं हुआ जैसा बाज़ार ख़त्म होने के समय आनेवाला ग्राहक दुकानदारों के साथ करता है. मोल-भाव में चालीस परसेंट कम बोलता है तो भी दूकानदार उसे सबकुछ देकर चला जाता है. वैसा भी नहीं हुआ.

आस्ट्रेलिया के खिलाड़ी नहीं बिके. वेस्टइंडीज के भी पूरे नहीं बिक सके. श्रीलंका, न्यूजीलैंड, बरमूडा, कनाडा, बंगलादेश, मालदीव, अफगानिस्तान, चीन, दक्षिण अफ्रीका, केन्या, नामीविया, सूडान, इरान, ईराक, जापान, दक्षिण कोरिया, सीरिया, लीबिया और न जाने कहाँ-कहाँ के खिलाडियों को किसी खरीदार ने नहीं पूछा.

इन देशों की सरकारों ने भारत के ऊपर या फिर खरीदारों के ऊपर आरोप नहीं लगाया. किसी ने नहीं कहा कि वे भारत से रिश्ता तोड़ लेंगे. किसी ने नहीं कहा कि वे अब भारत में बना हैन्डीक्राफ्ट का सामान नहीं खरीदेंगे या अब वे भारत से आयातित चीनी का शरबत नहीं पीयेंगे. और तो और किसी ने यह भी नहीं कहा कि वे भारतीय साफ्टवेयर इंजीनीयरों को अपने देश में काम नहीं करने देंगे या वे अब भारतीय कॉल सेंटर में फ़ोन नहीं करेंगे.

लेकिन पकिस्तान एक ऐसा 'मुलुक' है जो बाकी सबसे अलग है. वहाँ की न केवल सरकार बल्कि, जनता, नेता, क्रिकेट खिलाड़ी, हॉकी खिलाड़ी, कबड्डी खिलाड़ी, डॉक्टर, इंजिनियर, ड्राईवर, कंडक्टर,अफसर, वकील, पत्रकार, पुलिस, सेना, आतंकवादी, नदी,सड़क, मस्जिद, पुल, मकान और न जाने कौन-कौन भारत से रिश्ता तोड़ने के लिए तैयार है.

कहते हैं कि ये उनके खिलाड़ियों की बेईज्जती है जो उन्हें किसी ने नहीं खरीदा. तुर्रा ये कि उनके खिलाड़ी वर्ल्ड चैपियन हैं. बता रहे हैं कि शाहिद आफरीदी विश्व के सबसे बड़े खिलाड़ी हैं. उन्हें तो कम से कम खरीदना चाहिए था. ऐसा नहीं होने से केवल खिलाडियों का ही नहीं, पूरे पकिस्तान का अपमान हुआ है.

पकिस्तान का अपमान इस बात पर निर्भर करता है कि उनके खिलाड़ियों को नहीं खरीदा गया? अगर क्रिकेट खिलाड़ियों की खरीद-बिक्री पर ही देश का मान-अपमान टिका है तो फिर पाकिस्तान का मान तब-तब चार गुना बढ़ जाना चाहिए था जब-जब इनके खिलाड़ी बिके हैं.

अरे भाई, माना कि आई पी एल में किसी ने नहीं खरीदा लेकिन पहले तो लोग पाकिस्तानी खिलाड़ियों को 'खरीदते' रहे हैं और ये खिलाड़ी बिकते भी रहे हैं. कितना मान बढ़ गया था तब, पाकिस्तान का?

जो खिलाड़ी बिके नहीं वे कह रहे हैं; "यह हमारे खिलाफ साज़िश है."

गज़ब शब्द है ये साज़िश भी. कभी-कभी लगता है जैसे इस शब्द का आविष्कार पकिस्तान में ही हुआ होगा. और पकिस्तान की वजह से ही यह शब्द अमर हो जाएगा. इस देश में या दुनियाँ में कुछ भी होता है उसे ये बेचारे साज़िश बताते हैं. यह देश ऐसा है जहाँ नेता जीता है तो साज़िश की वजह से, मरता है तो साजिश की वजह से. क्रिकेट टीम मैच जीत जाती है तो साज़िश की वजह से और हार जाती है तब तो साज़िश होनी ही है. यहाँ तक कि बाढ़ आती है तो भी साज़िश की वजह से और सूखा पड़ जाता है तो उसमें भी साज़िश है.

अब वहाँ के लोग कह रहे हैं कि इस साजिश का बदला ले लेंगे. कैसे लेंगे? कह रहे हैं कि भारत में होनेवाले हॉकी वर्ल्डकप का बहिष्कार कर देंगे. कबड्डी टीम को भारत नहीं आने देंगे. आई पी एल का टेलीकास्ट पकिस्तान में नहीं होने देंगे.

मैं कहता हूँ इतना सबकुछ करने की क्या ज़रुरत है? भारत को नीचा दिखाने का सबसे बढ़िया तरीका है कि पकिस्तान अपना एक प्रीमियर लीग शुरू कर ले.

क्या कहा? पैसा कहाँ से आएगा? अरे भाई आई एस आई ने जो नकली भारतीय नोट छापे हैं उन्हें असली डालर में कन्वर्ट कर लो. क्या कहा? ऐसा संभव नहीं है?

तो फिर भैया एक ही रास्ता है. बराक ओबामा से पकिस्तान सरकार कहे कि; "अमेरिका पकिस्तान को अपना प्रीमियर लीग शुरू करने के लिए पैसा दे."

अगर अमेरिका प्रीमियर लीग शुरू करने के लिए पैसा नहीं देता तो शिक्षा वगैरह के प्रसार के लिए अमेरिका से जो पैसा मिला है वो प्रीमियर लीग में लगा दो. एक बार शुरू कर लो जो होगा देखा जाएगा.

आखिर पहले भी तो अमेरिकी सहायता राशि से हथियार खरीदे गए हैं.

सोचिये ज़रा क्या सीन होगा? पकिस्तान प्रीमियर लीग की शुरुआत होगी. बड़े धूम-धाम के साथ. उदघाटन समारोह में गाने वगैरह गाने के लिए उन कलाकारों को बुला लो जो भारतीय रीयलिटी शो में हिस्सा ले चुके हैं. उसको तो पक्का बुलाना जिसके घर में हिमेश रेशम्मैया रोटी खाना चाहते थे.

साथ ही पाकिस्तानी स्टैंड-अप कॉमेडियन लोगों को बुला लो जो भारतीय शो में पार्टिसिपेट करके मुंबई हमले के बाद अपने 'मुलुक' वापस चले गए हैं. अताउल्लाह खान को बुला लेना. वो स्टेज पर गायेगा; "अच्छा सिला दिया तूने मेरे प्यार का..."

आतिशबाजी का कान्ट्रेक्ट तालिबानियों को दे देना. विकट आतिशबाजी करेंगे तालिबानी. क्या कहा? उनके साथ सेना लड़ रही है. कोई बात नहीं. डॉक्टर अब्दुल कादिर खान को बुला लेना. वे चार ठो न्यूक्लीयर बम फोड़ देंगे. आतिशबाजी का कोरम पूरा हो जाएगा.

कुल मिलाकर "मस्त महौल में जीने दे" टाइप वातावरण हो जाएगा. बिलकुल झक्कास उदघाटन.

अब विदेशी खिलाड़ी तो पकिस्तान में खेलने से रहे. आठ दस टीम बनेगी तब जाकर प्रीमियर लीग चालू होगा. क्रिकेटर कम पड़ेंगे ही. इमरान खान, जावेद मियाँदाद, तसलीम आरिफ वगैरह को रिटायरमेंट से वापस आने के लिए उकसा दो. सरफ़राज़ नवाज़ को तो पक्का लाना. साज़िश शब्द उनसे ही परिभाषित है. पाकिस्तानी क्रिकेट में तीन-चौथाई साज़िश का क्रेडिट उन्हें ही जाता है.

टीम का नाम भी बढ़िया रखना. जैसे वजीरिस्तान वैरियर्स, करांची बाम्बर्स, लाहौर शूटर्स, स्वात चार्जर्स, और नोर्थ-वेस्ट गनरनर्स, रावलपिंडी बादशाह...

अब सरकार पैसा दे रही है तो टीम के मालिक भी सरकारी लोगों को ही बनाना. रहमान मलिक को रावलपिंडी बादशाह का मालिक बना देना और इमरान खान को उसी टीम का कैप्टेन. टीम का मालिक और कैप्टेन एक-दूसरे से भिड़ते आये हैं. यहाँ भी भिड़ लेंगे. इमरान खान अपने क्रिकेटीय अचीवमेंट का जो डोस्सियर रहमान मलिक को देंगे, रहमान मलिक उसे रिजेक्ट कर देंगे. यह कहते हुए कि डोस्सियर पूरा नहीं है.....

एक टीम शेरी रहमान को ज़रूर देना. उन्हें सरकार में लाने का यही तरीका है कि उन्हें किसी चीज की मालकिन बना दिया जाय.

कुल मिलाकर विकट प्रीमियर लीग बनेगी. जितनी टीमें होंगी और जितने खिलाडियों की खरीदारी होगी सब का दस परसेंट मिस्टर टेन परसेंट को घर पहुंचा देना.....

अब पूरा प्रोजेक्ट रिपोर्ट बनावावोगे क्या?

जितना दिमाग भारत पर हमला करवाने के लिए लगाते हो, उसका आधा भी लगा दोगे तो बड़ी झक्कास प्रीमियर लीग बनेगी...

मेरी तरफ से आल द बेस्ट!!

Friday, January 22, 2010

कोहरा-प्रधान जीवन




पिछले कई दिनों से जीवन कोहरा-प्रधान हो गया है. चारों तरफ कोहरा ही कोहरा है. इधर कोहरा, उधर कोहरा. आसमान में कोहरा जमीन पर कोहरा. सड़क पर कोहरा. पगडंडी में कोहरा. मैदान में कोहरा पेड़ पर कोहरा. कोहरे के ऊपर कोहरा और कोहरे के नीचे कोहरा.

कुल मिलाकर जीवन में कोहरे का महत्व बढ़ गया है. जिनके इलाके में कोहरा नहीं है वे बेचारे निराश होते हुए कह रहे हैं कि; "कितने लकी हैं वे लोग जिनके इलाके में कोहरा पड़ा है. एक हम हैं जो कोहरे के लिए तरस गए हैं."

जो कोहरे की वजह से देर से आफिस पहुँच रहे हैं वे संतुष्ट हैं कि उनका जीवन कोहरे से प्रभावित है. उनके पास कल तक जितनी कहानियां थीं उसमें कोहरे की कहानी और जुड़ गई. वे इस बात से मन ही मन प्रमुदित च किलकित हैं कि कोहरे की इस कहानी को अपने नाती-पोतों को सुना सकेंगे.

आज से बीस-पचीस साल बाद जब कभी कोहरा पड़ेगा तो वे कहेंगे; "अब कहाँ पड़ता है कोहरा? ये कोहरा भी कोई कोहरा है? कोहरा तो पड़ा था साल २०१० के जनवरी महीने में. हाथ को हाथ नहीं सूझ रहा था. खाने बैठे थे. रोटी के साथ सब्जी की जगह जगह अचार उठा लिया और मुंह की जगह नाक में डाल लिया. ऐसा कोहरा पड़ा था उस साल. ये कोहरा तो उस कोहरे के सामने कुछ नहीं है."

मुझे पूरा विश्वास है कि ऐसे लोग उन लोगों को हेयदृष्टि से देखते होंगे जिनके इलाके में कोहरा नहीं पड़ रहा है.

टीवी न्यूज़ चैनल पर तो कल से हालात बहुत खराब हो गए हैं. संवाददाता बेचारे कोहरे को कवर करते हलकान हुए जा रहे हैं. कोई रेलवे स्टेशन पर कोहरा कवर कर रहा है तो कोई हवाई अड्डे पर. संवाददाता कैमरे के सामने खड़े हुए बता रहा है; " आप देख सकती हैं सोनिया कि विजिबिलिटी जीरो है."

उधर टीवी स्टूडियो में बैठी सोनिया चाहकर भी नहीं पूछ पा रही हैं कि; " सौरभ, विजिबिलिटी अगर जीरो है तो तुम कैसे दिखाई दे रहे हो?"

रेलगाड़ियाँ लेट चल रही हैं. हवाई जहाज लेट उड़ रहे हैं. कुछ तो कैंसल हो जा रहे हैं. लेट चलते-चलते रेलगाड़ियाँ बोर हो जा रही हैं तो आपस में भिड़ जा रही हैं. रेल विभाग पर कोहरे की मार बहुत जोर से पड़ी है. अधिकारियों को घर से भी काम करना पड़ रहा है. जो नहीं कर पा रहे हैं वे भी काम कर रहे हैं. कुल मिलाकर विकट कोहरामय है सबकुछ.

कोहरे से हो रहे नुक्सान का हिसाब लगाया जा रहा है. न जाने कितने लोग कैलकुलेटर पर अंगुलियाँ फेरते बिजी हैं. एयरलाइंस की फ्लाईट कैंसल हो गई? आज कुल पचास करोड़ का नुक्सान हुआ. कैंसिलेशन के वजह से पेट्रोल-डीजल नहीं बिका सो अलग. सबकुछ जोड़ लें तो कुल मिलाकर सुबह से ग्यारह बजे तक सत्तावन करोड़ चौबीस लाख का नुक्सान हो चुका है. युवराज को आज छत्तीसगढ़ जाकर छात्रों से मिलना था. फ्लाईट कैंसल होने की वजह से वे नहीं जा सके. छात्र उनका इंतज़ार करके अपने-अपने घर चले गए. कुल ढाई सौ छात्रों ने अगर चार घंटा इंतज़ार किया तो कुल मिलाकर १००० छात्र घंटे का नुक्सान हो गया. उधर युवराज का सात घंटे का नुक्सान सो अलग.

इतनी सर्दी के बीच बसंत आ गया. बसंत को सर्दी से डर नहीं लगा होगा इसलिए आ गया. अन्य वर्षों के मुकाबले जल्दी आ गया. सर्दी उसके आने से वैसे ही खफा थी जैसे रोज रात को साढ़े नौ बजे सोने वाले किसी नियम के स्ट्रिक्ट आदमी के घर में अचानक कोई बिना बताये आ जाए.

लेकिन सर्दी भी इतनी जल्दी हार मानने वाली थोड़े न है. सत्ता हस्तांतरण इतना ईजी नहीं होने देना चाहती. बसंत के आने से सर्दी इस कदर गुस्सा हुई कि उसने कोहरे के साथ हाथ मिलाया और उसे लाकर बसंत के सामने खड़ा कर दिया. लो झेलो अब. हमें नहीं समझते न. अब इससे निपटो. बसंत की गाड़ी पटरी से उतर गई है.

अब कोहरा केवल बसंत को ही नहीं बल्कि साथ-साथ कुलवंत, यशवंत और हनुमंत को भी हलकान किये है.

कल तक बसंत पर कविता लिखने वाले कवियों ने अब कोहरे पर कविता लिखनी शुरू कर दी है. कोई कवि आसमान को कोहरे की मोटी चादर में लपेट दे रहा है तो कोई अपनी गाड़ी को कोहरे के कम्बल में लपेट कर सुला दे रहा है. कोई तो समय को ही कोहरे में लिपटा बता दे रहा है. कुल मिलाकर विकट कविताई करवा रहा है यह कोहरा.

कविताई का वातावरण ऐसा चौचक बना है कि वीर-रस का कवि बसंत और कोहरे के युद्ध का वर्णन करते हुए कविता लिख सकता है.

लेकिन ऐसा नहीं है कि कोहरे की वजह से केवल और केवल नुक्सान ही हो रहा है. अगर कोहरे के बीच दिमाग से काम लिया जाय तो कुछ लोगों के लिए कोहरा वरदान भी साबित हो सकता है. शर्त केवल एक ही है वे कोहरे का सही इस्तेमाल करें. अब अपने पचौरी साहब को ही ले लीजिये. उनके संस्थान ने बताया कि हिमालय के ग्लेशियर २०३५ तक पिघल जायेंगे. अब जब नए आंकड़े इकठ्ठा करके वैज्ञानिक और रमेश बाबू उनके पीछे पड़ गए तो वे परेशान हो गए. समझ में नहीं आ रहा कि क्या कहें?

लेकिन अगर वे थोड़ा धीरज से काम लें तो कह सकते हैं कि; " हम क्या करें? कोहरे की वजह से विजिबिलिटी जीरो हो गई थी. रिपोर्ट ठीक से नहीं पढ़ पाए. ३०३५ को २०३५ पढ़ गए. या यह भी कह सकते हैं कि इस विकट कोहरे में कुछ भी ठीक से दिखाई नहीं दिया और मिट्टी वाले पहाड़ को ही ग्लेशियर समझ गए और साल २०३५ वाली भविष्यवाणी कर गए. "

नई पोस्ट लिख कर अगर कोई ब्लॉगर अपने साथी ब्लॉगर से उसे पढ़ने और कमेन्ट करने के लिए कहे तो साथी ब्लॉगर कह सकता है कि; "भैया हमारे इलाके में कोहरे की वजह से विजिबिलिटी जीरो है. या फिर केवल तीन इंच है. ऐसे में पोस्ट पढ़ना और कमेन्ट करना तो संभव नहीं है. अग्रीगेटर पर पसंद बढ़ाने के लिए भी मत कहना. अग्रीगेटर पर विजिबिलिटी माइनस में चल रही है."

इतना कहने के बावजूद फिर भी अगर पोस्ट लिखने वाला ब्लॉगर पोस्ट पढ़ने और कमेन्ट करने के लिए अडिग रहे तो सामने वाला कमेन्ट में जय हो की जगह क्षय हो लिख डालेगा और हाय-तौबा मचाने पर कह देगा कि; "तुम्हें विश्वास नहीं हो रहा था न कि हमारे इलाके में विजिबिलिटी जीरो हो गई है. कमेन्ट पढ़कर अब तो विश्वास हो गया होगा. सही में कुछ दिखाई नहीं दे रहा है."

कुल मिलाकर यही कहना है कि भैया सर्दी के मौसम में कोहरा, ओस वगैरह तो रहेगा ही. इतना हलकान होने की क्या ज़रुरत है? वैसे भी ग्लोबल वार्मिंग की बात सच साबित हुई तो कुछ ही सालों में कोहरा और ओस तो केवल म्यूजियम में रखने की चीजें हो जायेंगी. इसलिए जब तक कोहरा वगैरह के दर्शन हो रहे हैं करते जाइए. मस्त रहिये.