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Friday, October 15, 2010

रीयल इन्टरनल ऑडिट रिपोर्ट




ब्लागिंग के सबसे महत्वपूर्ण अलिखित सिद्धांत के अनुसार ब्लॉगर एक अति सजग प्राणी होता है. लेकिन यह सजगता इसलिए नहीं कि तन कर बैठे हैं कि अपने पास सांप, बिच्छू, मच्छर वगैरह को नहीं फटकने देंगे. वह तो इसलिए रहती है कि हमेशा सजग रहने से कहीं से भी पोस्ट बन सकती है.

एक ब्लॉगर को और क्या चाहिए? एक नई पोस्ट.

पिछले ५-६ दिनों से एक अस्पताल में हूँ. आते-जाते, उठते-बैठते यही सोचते रहते है कि कहाँ से एक अदद पोस्ट निकल सकती है? और रहना भी चाहिए. एक ब्लॉगर के लिए एक नई पोस्ट नारायण के सामान है. किस वेश में नारायण मिल जाएँ, कौन जानता है?

कभी-कभी मन में यह भी आता है कि; "यार आदमी हो या ब्लॉगर?"

हाँ तो मैं हॉस्पिटल की बात कर रहा था. हॉस्पिटल के सबसे बड़े डॉक्टर और मालिक के आफिस में बैठा था. टेबिल पर उनके नाम आये तमाम निमंत्रण पत्र, क्रेडिट कार्ड स्टेटमेंट, पत्रिका में छपी उनकी तस्वीरें, इधर-उधर बिखरे पड़े थे. ध्यान चला ही जाता है. पहले ऐसा केवल ऑडिट करने की पुरानी आदत की वजह से था लेकिन अब ब्लागिंग की वजह से है. खैर, ध्यान गया तो देखा कि इन सब चीजों के अलावा वहीँ पर एक मोटा चिट्ठा रखा था. उत्सुकता वस खोल लिया.
पिछले सप्ताह की हॉस्पिटल की इन्टरनल ऑडिट रिपोर्ट थी. पहली बार मन में आया कि इसे पढ़ना पाप है. इसलिए नहीं पढ़ा. डॉक्टर साहब से मुलाकात करने के लिए जैसे-जैसे इंतज़ार बढ़ता जाता वैसे-वैसे गुस्सा आता. अंत में सोचा कि कुछ न कुछ तो पढ़ना होगा नहीं तो इतनी देर तक यहाँ बैठेंगे कैसे? समय कैसे कटेगा? काफी उधेड़-बुन के बाद मन में विचार आया कि जब पढ़ना ही है तो उनके क्रेडिट कार्ड स्टेटमेंट को नहीं पढ़कर यह इन्टरनल ऑडिट रिपोर्ट ही पढ़ डालूँ.

उलट-पलट कर सरसरी निगाह डाली. पता चला कि यह तो ब्लॉग पोस्ट का मैटेरियल है. जितना पढ़ा था उसका अनुवाद छाप रहा हूँ. आपलोग भी पढ़िए.



रीयल इन्टरनल ऑडिट रिपोर्ट फॉर द पीरियड फ्रॉम फोर्थ ऑफ अक्टूबर टू टेंथ ऑफ अक्टूबर.

गिवेन अंडर द सील ऑफ मिस्टर अशोक दीवान, हेड, इन्टरनल ऑडिट डिपार्टमेंट


कार्डियेक डिपार्टमेंट

तमाम डिपार्टमेंटल रेकॉर्ड्स की जांच करने के बाद हम रिपोर्ट करते हैं कि डॉक्टर कौल ने बाहर से आये एक मरीज को ईको की सही रीडिंग बता दी. सात अक्टूबर को जिस मरीज के ग्रैडिएंट की रीडिंग डॉक्टर माखन लाल ने एक सौ सात और तिरासी बताई थी उसी मरीज की रीडिंग को दूसरे ही दिन डॉक्टर कौल ने केवल चौरासी और पैतालीस बताई. पहली बार ईको करते हुए डॉक्टर माखन लाल ने एक सौ सात की रीडिंग बताकर उस मरीज को डराकर ऑपरेशन के लिए राजी कर लिया था लेकिन जब डॉक्टर कौल ने उसे अपनी रीडिंग बताई तो मरीज यह कहकर हॉस्पिटल छोड़ गया कि उसे अभी ऑपरेशन की ज़रुरत नहीं है. डॉक्टर कौल की इस हरकत से हॉस्पिटल को पूरे साढ़े तीन लाख रूपये का नुक्सान हो गया.

कुछ मरीज बड़े घाघ होते हैं. यह मरीज भी घाघ टाइप ही था. काफी रिसर्च करने के बाद हम इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि गूगल ने सुई से लेकर हार्ट प्रोंबलम्स तक पर विकिपीडिया का निर्माण कर डाला है. ऐसे में कुछ मरीजों को हर चीज की जानकारी रहती है. वह वीकीपीडिया घोंटकर और यू-ट्यूब पर हर तरह की सर्जरी के विडियो देखकर ही हॉस्पिटल में प्रवेश करता है.

ऐसे में हर डिपार्टमेंट के डॉक्टरों के बीच को-आर्डिनेशन की बहुत ज़रुरत है.

ऑडिट रिपोर्ट्स ऑन असिस्टेंट्स डाक्टर्स टू डॉक्टर रेहान

पिछले सप्ताह लिए गए सी सी टीवी फूटेज देखकर हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि डॉक्टर बोस अपनी एक्टिंग क्षमता को और निखारने पर ध्यान नहीं दे रहे हैं. तमाम मरीजों के साथ उनकी बातचीत की सी सी टीवी फूटेज को देखने के बाद हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि उन्हें अपनी एक्टिंग क्षमता को जल्द से जल्द निखारने पर ध्यान देना चाहिए. मरीजों की ईको रिपोर्ट, ब्लड रिपोर्ट, एक्स-रे वगैरह देखते हुए वे केवल तीन-चार तरह की मुख-मुद्राएं (बोले तो फेसियल एक्सप्रेशन) बनाकर ही मरीज को डराते हैं. रिपोर्ट देखते समय उनके माथे पर केवल दो बल पड़ते हैं. वे केवल एक तरह से ही मुँह बिचकाते हैं. ऐसा करने से मरीज के पूरी तरह से डरने के चांसेज कम रहते हैं. हम मैनेजमेंट को सलाह देते हैं कि डॉक्टर बोस को जल्द से जल्द रोशन तनेजा के एक्टिंग स्कूल में भेजा जाय ताकि वे मरीजों को डराने के और फेसियल एक्श्प्रेसन सीख पाएं.

अगर इसपर ध्यान नहीं दिया गया तो आनेवाले दिनों में मरीजों को सर्जरी के लिए राजी करने के लिए तमाम मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा.

बिलिंग डिपार्टमेंट

पिछले सप्ताह बिलिंग डिपार्टमेंट में मरीजों और उनके घरवालों की तरफ से कुल आठ शिकायतें मिलीं. आठ में सात शिकायतें एक्स्ट्रा बिलिंग को लेकर की गईं थीं. यह एक नॉर्मल रूटीन है. इन शिकायतों को ज्यादा महत्व देने की ज़रुरत नहीं है. हाँ जिस शिकायत को महत्व देने की ज़रुरत है वह इस बारे में है कि ऑपरेशन थियेटर में एक मरीज को छोटे से ऑपरेशन जिसमें केवल पंद्रह मिनट लगते हैं उसके लिए कुल एक सौ चौदह इंजेक्शन का बिल बना दिया गया. कान के इस ऑपरेशन के लिए एक सौ चौदह इंजेक्शन कुछ ज्यादा ही है. बिलिंग करते समय इस बात का ध्यान दिया जाना चाहिए ऐसा कुछ न लिखा जाय जिससे मरीज के घर वाले बिलिंग डिपार्टमेंट में गाली-गलौज शुरू कर दें.

इस तरह की तू-तू मैं-मैं वहाँ उपस्थित प्रोस्पेक्टिव कस्टमर के ऊपर गलत असर डालती हैं.

फिनांस डिपार्टमेंट

पिछले सप्ताह फिनांस डिपार्टमेंट ने बाहर से आये एक मरीज से मानवता के नाते चेक से पेमेंट लेने के लिए हामी भर दी. हालाँकि चेक 'ऐट पार' था और उसी दिन हॉस्पिटल के अकाउंट में क्रेडिट भी हो गया लेकिन मानवता के नाते मरीजों को इस तरह की छूट देना ठीक नहीं है. मरीजों की आदत खराब होते देर नहीं लगेगी. तमाम रेकॉर्ड्स देखने के बाद हम रिपोर्ट करते हैं कि इस चेक से पेमेंट एक्सेप्ट करने से पहले मरीज से केवल एक लेटर लिखवाया गया. अगर तीन-चार बार उसे इधर से उधर दौड़ाया गया होता तो हारकर कहीं न कहीं से कैश का इंतजाम करके कैश ही जमा करता.

हमारी सलाह है कि आगे से इस तरह की हरकतों को बढ़ावा नहीं दिया जाना चाहिए.

कैफेटेरिया एंड फ़ूड स्टेशन

हमारी सलाह पर ही हॉस्पिटल के अन्दर हाल ही में तीसरा कैफेटेरिया खुला जिसमें थाई और चायनीज फ़ूड मिलता है. हमरे डिपार्टमेंट का शुरू से ही मानना है कि हॉस्पिटल बिजनेस का असली फॉरवर्ड इंटीग्रेशन फ़ूड स्टेशन और कैफेटेरिया ही हो सकता है. ऐसे में हाल ही में अरब देशों से आनेवाले मरीजों की बढ़ती संख्या को देखते हुए हम रेकमेंड करते हैं कि हॉस्पिटल मैनेजमेंट यमनी, सउदी और ईरानी फ़ूड के लिए एक अलग फ़ूड स्टेशन खोले. वैसे तो नए फ़ूड स्टेशन के लिए ढाई एकड़ ज़मीन की जरूरत है लेकिन सरकार बावन एकड़ ज़मीन देने के लिए तैयार है. हमें सरकार द्वारा दी जाने वाली ज़मीन ले लेनी चाहिए. आगे यह ज़मीन और किसी काम आ सकती है.

कार पार्किंग

पिछले सप्ताह का काम देखने वाली एजेंसी ने पार्किंग से होनेवाले इनकम पर कमीशन बढ़ाने के लिए एक बार फिर से मैनेजमेंट को पत्र लिखा है. हमारी सलाह है कि मैनेजमेंट अब कार पार्किंग का बिजनेस आउटसोर्स न करके खुद ही करे. ऐसा करने से कंपनी को करीब बासठ करोड़ का एडीशनल रेवेन्यू मिलेगा.

न्यू एवेन्यू ऑफ रेवेन्यू

शुरुआत में हॉस्पिटल मैनेजमेंट ने बाहर से आनेवाले मरीजों के रिश्तेदारों को ठहराने के लिए गेस्ट हाउस सर्विस चला रखा था. बाद में उसे यह कहकर बंद कर दिया गया कि उस बिजनेस को हॉस्पिटल के बिजनेस के साथ कन्वर्ज करने में मुश्किलें आ रही थीं. पिछले सप्ताह हॉस्पिटल के इन्क्वाइरी काउंटर पर गेस्ट हाउस के लिए कुल तेरह सौ बासठ इन्क्वाइरी आई. वैसे तो हम पहले भी कह चुके हैं लेकिन एक बार फिर से सलाह देते हैं कि मैनेजमेंट गेस्ट हाउस बिजनेस को फिर से शुरू करने के बारे में विचार करे. ऐसा करने से करीब बत्तीस करोड़ .....

पढ़ ही रहा था कि अन्दर से किसी ने पुकारा; 'हंजी, कलकत्ते से जो आये हैं....."

इतना सुनकर रिपोर्ट को छोड़ देना पड़ा. दो मिनट बाद ही डॉक्टर रुपी भगवान के सामने थे.....

Thursday, October 7, 2010

अमेरिका बिग बॉस हाउस को इनवेड करेगा?




कोहराम सा मचा हुआ है. बंटी चोर को बिग बॉस हाउस से निकाल दिया गया. पता चला कि बंटी ज़ी ने बिग बॉस को माँ-बहन की गालियाँ दीं. इतनी मंहगाई के ज़माने में अगर कुछ सस्ता है तो वह है गालियाँ. जब चाहे दे डालो. वैसे बंटी ज़ी के बिग बॉस हाउस से निकाले जाने के मामले ने जल्द ही तूल पकड़ लिया. आजकल मामले जल्द तूल पकड़ते हैं. अब वह ज़माना नहीं रहा जब मामले धीरे-धीरे तूल पकड़ते थे.

आज सुबह ही मॉर्निंग-वाक के दौरान एक जगह बैठकर सुस्ता रहा था. वहीँ कुछ लोगों को इस मामले पर बात करते सुना. आप भी बांचिये कि वे क्या बात कर रहे थे?

- नहीं-नहीं. मैं तुम्हारी बात से सहमत नहीं हूँ. भाई, यह तो हद है. अगर उसे निकलना ही था तो उसे बुलाया क्यों? अपने घर किसी को बुलाते हो और उसका अपमान करते ही?

- लेकिन उसे भी तो सोचना चाहिए. किसी को ऐसे गाली देते हैं क्या? माँ-बहन की गाली?

- अरे गाली दे दी तो कौन सा गुनाह कर दिया? और फिर गाली टीवी पर तो किसी ने सुनी नहीं. आपके पास सुविधा है कि आप गाली को सुनाएं ही नहीं.

- अरे वैसे तो मैंने देखा की गाली देते समय चैनल वालों ने पी की आवाज़ वाला शंख बजा दिया था.

- पी की आवाज़ वाला शंख?

- मेरा मतलब वही आवाज़ जो गाली-फक्कड़ को ढांपने के काम आती है.

- लेकिन इस मुद्दे पर दिग्विजय सिंह ने कुछ नहीं कहा?

- दिग्गी राजा इस मुद्दे पर क्यों बोलें? वो भी तब जब चिदंबरम ज़ी ने अभी तक कुछ भी नहीं कहा है.

- और राहुल गाँधी ज़ी?

- वे बोले हैं. उन्होंने बंटी चोर को बिल क्लिंटन से कम्पेयर करते हुए बताया कि दोनों एक ही हैं.

- क्या बात करते हो? ये कब हुआ?

- अरे ये मत पूछो. जबसे राहुल ज़ी कम्पेयरिंग मोड में आये हैं, तब से गज़ब ढा रहे हैं. कल रात को ही उन्होंने बिल क्लिंटन से बंटी चोर को कम्पेयर कर दिया. वे तो बंटी ज़ी को बराक ओबामा से कम्पेयर करने जा रहे थे. वो तो भला हो सतीश शर्मा का जिन्होंने उन्हें याद दिलाया कि ओबामा अगले महीने ही इंडिया आ रहे हैं.

- वैसे तुम्हें क्या लगता है? बंटी वाले मामले में अमेरिका हस्तक्षेप करेगा? अमेरिका क्या बिगबॉस हाउस को इनवेड करेगा?

- अमेरिका क्यों इनवेड करेगा? वह ऐसी किसी जगह इनवेजन नहीं करता जहाँ किसी का डेमोक्रेटिक राइट्स वायलेट नहीं हो.

- अरे इसीलिए तो मैं कह रहा हूँ. बंटी का डेमोक्रेटिक राइट्स वायलेट तो हुआ ही है. उसे गाली देने से न सिर्फ रोका गया बल्कि हाउस से भी निकाल दिया गया.

- मुझे तो चांस कम ही लगता है.

- क्यों? मैं तो सोचा रहा हूँ कि अमेरिका ने ईराक से भी सेना बुलाना शुरू कर दिया है. ईराक से जो सैनिक निकलेंगे वे खाली बैठेंगे. ऐसे में बिग बॉस हाउस को इनवेड करना बुरा प्रपोजीशन नहीं है.

- नहीं-नहीं. मुझे ऐसा नहीं लगता. मुझे लगता है अमेरिका अपने नेटो अलाईज के साथ बात किये बिना इस मामले में हस्तक्षेप नहीं करेगा. अभी हाल ही में पकिस्तान सैनिकों पर जो ड्रोन अटैक हुआ उसके बाद जो स्थिति उत्पन्न हुई है, उससे तो मुझे यही लगता है कि उसके नेटो अलाईज बंटी वाले मामले में हस्तक्षेप नहीं करना चाहेंगे. वे चाहेंगे कि अभी उनका अटेंशन पूरी तरह से अफगानिस्तान पर ही रहे.

- लेकिन अगर कुछ देशों ने अमेरिका को समर्थन दे दिया तो?

- तब कुछ चांस बनता है. लेकिन अभी ब्रिटेन की इकॉनोमी ठीक नहीं है. और टोनी ब्लेयर के जाने के बाद अमेरिका को समर्थन मिलना उतना ईजी नहीं रहा. हाँ, अगर स्पेन और ऑस्ट्रेलिया अपना समर्थन अमेरिका को दें तो फिर शायद नेटो वाले अपनी सेना भेजकर बिग बॉस हाउस को इनवेड कर सकते हैं.

- लेकिन इकॉनोमी तो स्पेन की भी ठीक नहीं चल रही है. ऐसे में स्पेन समर्थन देगा?

- हा हा हा...मुझे तो लगता है कि इकॉनोमी ठीक नहीं चल रही है ऐसे में समर्थन देना ज़रूरी हो जाएगा. वैसे ऑस्ट्रेलिया समर्थन देगा या नहीं, यह इस बात पर डिपेंड करता है कि ब्रेट ली प्रधानमंत्री जूलिया गिलार्ड को क्या सलाह देते हैं? भारतीय सेलेब्रिटी को उनसे बेहतर कोई ऑस्ट्रेलियन नहीं जानता.

- हा हा हा..सही कहा. लेकिन अगर अमेरिका बिग बॉस हाउस को इनवेड करेगा तो पकिस्तान का क्या रोल रहेगा?

- पकिस्तान का क्या रोल रहेगा? पकिस्तान तो केवल अमेरिका से इतना चाहेगा कि इन्वेजन से पहले वह वीना मलिक और नवाजिश बेगम को वहाँ से निकाल ले.

- अमेरिका मान जाएगा यह बात?

- क्यों नहीं मानेगा? भूल गए जब अफगानिस्तान से चार हज़ार पाकिस्तानी लड़ाकों को मुशर्रफ ने अमेरिका से बात करके निकाला था?

- हाँ, सही कह रहे हो. कुछ लोग़ तो यहाँ तक मानते हैं कि उन्ही लड़ाकों के साथ ही ओसामा और मुल्ला ओमर भी अफगानिस्तान से निकल गए थे.

- तब? वैसे तुम्हारा क्या मानना है? बंटी चोर को वापस बिग बॉस हाउस में भेजने के लिए स्वामी अग्निवेश बिग बॉस और बंटी के बीच समझौता करवाएंगे?

- इस मामले में अभी तक तो अग्निवेश ज़ी ने कुछ नहीं कहा है. वैसे वे यह काम करवा सकते हैं. आजकल वही भारत के सबसे बड़े बिचौलिए हैं. ऐसे में इतनी बड़ी समस्या जब उभर कर आई है तो....

- हम तो मना रहे हैं कि स्वामी ज़ी जल्द ही टीवी चैनल पर कुछ बोलें.

- लेकिन इस समस्या को सुलझाने में सरकार को भी कुछ कदम उठाने चाहिए. मैं कहता हूँ अगर अयोध्या मुद्दे पर सरकार बातचीत करवा सकती है तो फिर....

- नहीं-नहीं. इस मुद्दे पर सरकार बातचीत करवाएगी, मुझे तो ऐसा नहीं लगता. हाँ अगर एक ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स बना दे तो शायद कुछ...

- न-न. वो कैसे होगा? प्रणब दा तो अगले दस दिन कलकत्ते और उसके आस-पास दुर्गापूजा में व्यस्त रहेंगे. ऐसे में ज़ी ओ एम की अध्यक्षता कौन करेगा?

- अरे कोई और कर लेगा. मणिशंकर ऐय्यर तो आजकल खाली चल रहे हैं...ओह, लेकिन वे तो मिनिस्टर नहीं हैं...सॉरी सॉरी. लेकिन शरद पवार भी तो कर सकते हैं.

- ना-ना. हाँ, एक आदमी है जो करवा सकता है. जयपाल रेड्डी.

- लेकिन वे तो कामनवेल्थ में बिजी हैं. वैसे जल्द ही सरकार को कुछ करना चाहिए. कहीं ऐसा न हो कि बंटी ज़ी यह मामला अंतर्राष्ट्रीय न्यायलय में लेकर चले जाएँ. भारत की भद्द पिट जायेगी.

- भद्द तो पिटती रहेगी. कामनवेल्थ में नहीं पिटी क्या?

- हाँ, वो तो है. मज़ा तो तब आता अगर कलमाडी ज़ी को वाइल्ड कार्ड इंट्री मिल जाती बिग बॉस में.

- सही कह रहे हो. बहुत मज़ा आता. मुझे तो लगता है कि कलमाडी ज़ी वहीँ पर वकील कर लेते. अगर ख़ुदा न खास्ता आगे भ्रष्टाचार को लेकर कोई लोचा...

- तुम भी न. भ्रष्टाचार को लेकर और लोचा...वो भी भारत में. वैसे कहीं ऐसा न हो कि पकिस्तान बंटी को समर्थन देते हुए कहीं मामला यू एन में ले जाकर भाषणबाजी न शुरू कर दे...

- ठीक कह रहे हो. ये चिंता तो मुझे भी है. पकिस्तान कहीं यह न कहे कि बंटी चोर घर में रहेगा या नहीं उसके लिए एक प्लेबिसाईट करवाना पड़ेगा.

इच्छा तो थी कि कुछ देर और बैठूं और इतने महत्वपूर्ण मुद्दे पर उनकी बातचीत सुनूँ लेकिन देर हो रही थी. लिहाजा मैं वहाँ से उठकर चल दिया. नहीं चलता तो आफिस आने में बहुत देर होती....

Saturday, October 2, 2010

गाँधी जी हम सभी का थैंक्स डिजर्व करते हैं....




आज गाँधी जयन्ती है. होनी भी चाहिए. आज २ अक्टूबर है. आज सोच रहा था कि देश को स्वंतंत्र कराने के लिए किए गए आन्दोलन में भी गाँधी जी ने उतना भाषण नहीं दिया होगा, जितना पिछले पचास सालों में तमाम नेताओं ने उनके जन्मदिन पर दे डाला है. ऐसे ही भाषणों में से एक भाषण पढिये.

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सभा में उपस्थित देशवासियों, आज आपको यह बताते हुए मुझे अपार हर्ष हो रहा है कि आज गांधी जी का जन्मदिन है. ये अच्छा हुआ जो गाँधी जी दो अक्टूबर को पैदा हुए. वे अगर आज के दिन पैदा न हुए होते तो हम उनका जन्मदिन नहीं मना पाते. तो हम कह सकते हैं कि आज के दिन पैदा होकर गांधी ज़ी ने हमें उनका जन्मदिन मनाने का चांस दिया.

देखा जाय तो मौसम के हिसाब से भी अक्टूबर महीने में पैदा होकर उन्होंने अच्छा ही किया. अगर वे मई या जून के महीने में पैदा हुए होते तो गरमी की वजह से मैं शूट नहीं पहन पाता. बिना शूट के इतने महान व्यक्ति का जन्मदिन बहुत फीका लगता. सच कहें तो बिना शूट पहने तो मैं गाँधी जी का जन्मदिन मना ही नहीं पाता. जन्मदिन नहीं मनाने से कितना नुक्सान होता. हमें आज भाषण देने का चांस नहीं मिलता और आपको भाषण सुनने का. ऐसे में हमारी और आपकी मुलाकात ही नहीं हो पाती.

इस तरह से देखा जाय तो गाँधी जी हम सभी का थैंक्स डिजर्व करते हैं.

हमें बचपन से यही सिखाया गया है कि हमें गाँधी ज़ी के रास्ते पर चलना चाहिए. और जब तक हम गाँधी ज़ी के बारे में पूरी तरह से नहीं जानेंगे उनके रास्ते पर कैसे चलेंगे? इसलिए अब मैं आप सब को गाँधी जी के बारे में बताता हूँ.

गाँधी जी ने वकालत की पढ़ाई की थी. आप पूछ सकते हैं कि वे डॉक्टर या इंजिनियर क्यों नहीं बने? असल में गाँधी जी शुरू से ही इंटेलिजेंट थे. उन्हें पता था कि उनदिनों डाक्टरी में उतना पैसा नहीं था जितना वकालत में था. दूसरी बात यह थी उस जमाने में वकालत एक फैशन की तरह था. वकालत के पैसे के कारण ही गाँधी जी उनदिनों फर्स्ट क्लास में सफर कर पाते थे.

वकालत पास करने के बाद उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में अपनी प्रैक्टिस शुरू की. वही दक्षिण अफ्रीका जहाँ के हैन्सी क्रोनिये थे. हैन्सी क्रोनिये से याद आया कि जब मैं क्रिकेट बोर्ड का अध्यक्ष था उनदिनों वे भारत के दौरे पर आए थे. मेरी उनके साथ क्रिकेट को लेकर काफी बातचीत हुई थी.....(पब्लिक शोर करती है)

अच्छा अच्छा. वो मैं ज़रा अलग लैन पर चला गया था..... नहीं-नहीं ऐसा न कहें. दरअसल मैंने तो सोचा मैं आपलोगों के बीच अपना अनुभव बाटूंगा तो आपलोगों को प्रेरणा मिलेगी. कोई बात नहीं..आप चाहते हैं तो मैं मुद्दे पर वापस आता हूँ.

हाँ तो मैं कह रहा था कि गाँधी जी ने दक्षिण अफ्रीका में अपनी वकालत शुरू की थी. दक्षिण अफ्रीका सोने की खानों के लिए प्रसिद्द है. वहां सोना बहुत मिलता है. मुझे तो सोना बहुत पसंद है. यही कारण है कि मैं न सिर्फ़ सोना पहनता हूँ बल्कि संसद में सोने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देता.

दक्षिण अफ्रीका की बात चली है तो आपको एक संस्मरण सुनाता हूँ.

गाँधी जी दक्षिण अफ्रीका में ट्रेन के 'फस्ट क्लास' में चलते थे. एक बार 'फस्ट क्लास' में बैठे कहीं जा रहे थे तो वहां के अँगरेज़ टीटी ने उन्हें 'फस्ट क्लास' से उतार दिया. उतार क्या दिया उन्हें डिब्बे से बाहर फेंक दिया. आपके मन में उत्सुकता होगी कि उस टीटी ने गाँधी जी को कैसे फेंका था? सभा में उपस्थित जिनलोगों ने गाँधी फिलिम देखी है, उन्हें तो पता ही होगा. लेकिन जिनलोगों ने ये फिलिम नहीं देखी है उनलोगों के मन में प्रश्न उठते होंगे कि इस टीटी ने गाँधी जी को डिब्बे के बाहर कैसे फेंका होगा?

अब आपको कैसे बताएं कि किस तरह से फेंका था. अच्छा ये समझ लीजिये कि ठीक वैसे ही फेंका था जैसे कई बार हमलोग सीट लेने के लिए फर्स्ट क्लास और एसी के यात्रियों को डिब्बे के बाहर फेंक देते हैं. हमने इतना बता दिया बाकी आपलोग थोड़ा कल्पना कर लीजिये.

असल में उनदिनों वहां अँगरेज़ रहते थे न. अँगरेज़ लोग बहुत ख़राब होते थे. बहुत ख़राब माने बहुत ख़राब. लेकिन इसका मतलब ये नहीं था कि वे कुछ भी करते और गाँधी ज़ी बर्दाश्त कर लेते? अब अगर वे लोग गाँधी जी को डिब्बे से बाहर फेंकेंगे तो गाँधी जी चुप थोड़े ही रहेंगे. बस, उनलोगों ने जब उन्हें फेंका तभी से गाँधी जी का अंग्रेजों से लफड़ा शुरू हो गया.

गाँधी जी ने कसम खाई कि वे अंग्रेजों को भारत से बाहर खदेड़ देंगे. उन्हें पता था कि जो अँगरेज़ दक्षिण अफ्रीका में राज करते थे वही अँगरेज़ भारत में भी राज करते थे. बस फिर क्या था. उनसे बदला लेने के लिए गाँधी जी भारत वापस आ गए. भारत वापस आकर उन्होंने अंगरेजों के ख़िलाफ़ आन्दोलन छेड़ दिया. जाकर सीधा-सीधा बोल दिया कि "अंगरेजों, भारत छोड़ दो."

पहले तो अंगरेजों ने आना-कानी की. लेकिन गाँधी जी भी छोड़ने वाले थोडी न थे. उन्होंने अंगरेजों को भारत से भगाकर ही दम लिया. ऊ गाना सुना ही होगा आपलोगों ने कि; "दे दी हमें आज़ादी बिना खडग बिना ढाल...आं? क्या कहा? हाँ, मैं जरा भूल गया था. गाना है कि; दे दी हमें आज़ादी बिना खडग बिना ढाल, साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल..." अरे ऊ साबरमती इसलिए कि ओहीं पर उनका आश्रम था.

अब हम आपको गाँधी जी के अन्य पहलुओं के बारे बताते हैं. आपको ये जानकर हैरत होगी कि गाँधी जी को बंदरों से बहुत प्यार था. आप पूछ सकते है कि बन्दर भी कोई प्यार करने की चीज हैं? दरअसल गाँधी जी राम चन्द्र ज़ी को बहुत मानते थे. और जैसे रामचंद्र ज़ी भी बंदरों को बहुत चाहते थे उन्ही से प्रेरित होकर गाँधी ज़ी भी बंदरों को चाहने लगे. उन्हें बंदरों से उतना ही प्यार था जितना हमें कुत्तों और गधों से है. जैसे हमलोग अपने घर में कुत्ते और घाट पर गधे पालते हैं, वैसे उन्होंने अपने पास तीन बन्दर पाल रखे थे. आप पूछ सकते हैं बन्दर ही क्यों? कुत्ते या गधे क्यों नहीं?

इसका जवाब जानने के लिए आपको इतिहास की पढ़ाई करनी पड़ेगी. वैसे तो इस बात पर इतिहासकारों में भिन्न मत हैं लेकिन जितनी पढ़ाई हमने की है उससे आपको इतना ही बता सकता हूँ कि उनदिनों देश में कुत्तों और गधों की संख्या बहुत कम थी. देश के सारे कुत्ते और गधों के ऊपर उनदिनों नवाबों और राजाओं का कब्ज़ा था. यही कारण था कि गाँधी जी ने बंदरों को चुना.

मित्रों, वैसे तो लोगों के अन्दर गाँधी जी के बंदरों के प्रति अपार श्रद्धा है. लेकिन मुझे तो ये बन्दर कोई बहुत इम्प्रेसिव नहीं लगे. सो सो लगे. लोग इन बंदरों की सराहना करते हुए नहीं थकते कि ये बन्दर न तो बुरा देखते थे, न बुरा सुनते थे और न ही बुरा बोलते थे. लेकिन एक बात पर हमें बहुत एतराज है. हमारा मानना है कि जब इन बंदरों को आँख, कान और मुंह मिला ही था, तो उसका उपयोग करने में क्या जाता है? कौन सा पैसा खर्च होता?

मित्रों, वैसे तो गाँधी जी महान थे, लेकिन एक बात में बहुत ढीले थे. वे अपने बेटों को आगे नहीं बढ़ा सके. एक पिता का कर्तव्य नहीं निभा सके. उन्हें लगता होगा कि बच्चों का लालन-पालन करके ही एक पिता का कर्तव्य निभाया जाता है. बुरा न मानें लेकिन सच कहूं तो इस मामले में वे थोड़े कच्चे थे. सोचिये जरा कि वे राष्ट्रपिता थे. अब देखा जाय तो एक तरह से पूरा राष्ट्र ही उनका था. ऐसे में उन्हें चाहिए था कि वे अपने बेटों को राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, गृहमंत्री वगैरह बनाते. बच्चों का भला करना हर पिता का कर्तव्य है. लेकिन वे ऐसा नहीं कर सके.

फिर मैं सोचता हूँ कि मैं भी तो उन्हीं की संतान हूँ. देखा जाय तो जिसे राष्ट्रपिता कहा जाता हो, उसकी संतान तो पूरा राष्ट्र है. ऐसे में मैं ये सोचकर संतोष कर लेता हूँ कि मैं तो आगे बढ़ ही रहा हूँ. आजतक कैबिनेट में मंत्रीपद पर जमा हुआ हूँ. कल को प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति भी बन सकता हूँ. जब मैं इस लिहाज से देखता हूँ तो लगता है जैसे उन्होंने बेटों के प्रति अपने कर्तव्य का पालन उचित ढंग से ही किया.

दोस्तों गाँधी जी तो महान थे. उनकी गाथा का तो कोई अंत ही नहीं है. उनके बारे में जितना भी कहा जाय, कम ही होगा. मुझे आशा है कि उनके अगले जन्मदिन पर हमलोग फिर इसी मैदान में मिलेंगे और मैं आपको गाँधी जी के बारे में और भी बहुत सारी बात बताऊंगा. अभी तो मुझे कामनवेल्थ गेम्स के उद्घाटन समारोह की तैयारी करनी है. इसलिए मैं अपना भाषण यहीं समाप्त करता हूँ. हाँ, मैं आपसे वादा करता हूँ कि अगले वर्ष हम गाँधी जी का जन्मदिन और धूमधाम से मनाएंगे. तब मैं पूरे तीन घंटे का भाषण दूँगा. तब तक के लिए आपसे विदा लेता हूँ.

अगले एक साल के लिए बोलो गाँधी जी की

जय!