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Thursday, October 28, 2010

भारतीय चुनाव - एक निबंध




हम लाख शिकायत करें, लेकिन एक विषय के तौर पर हिंदी पढ़ने का फायदा भी है. अब इस छात्र को ही ले लीजिये. स्कूल के दिनों में निबंध लिखने की ऐसी आदत पड़ी कि पोस्टमैन, रेलयात्रा, गाँव की सैर और मेरा प्रिय खेल जैसे विषयों पर निबंध लिखते-लिखते इसने अपनी इस आदत को अपना प्रोफेशन बना लिया. आजकल यह छात्र निबंध-लेखन की एक कम्पनी चला रहा है और यूरोपीय तथा अमेरिकी देशों में रहने वाले शिक्षकों और छात्रों के लिए भारतीय मुद्दों पर निबंध-लेखन की केपीओ (नॉलेज प्रॉसेस आउटसोर्सिंग) सर्विस देता है.

एक दिन मेरी नज़र इस छात्र द्वारा लिखे गए निबंध पर पड़ी जो भारतीय चुनावों के बारे में था. बिहार में लोग़ आजकल चुनावी दिन काट रहे हैं. ऐसे में मैंने सोचा कि यह निबंध अपने ब्लॉग पर पब्लिश करूं. आप निबंध बांचिये.

मैंने कंपनी चलाने वाले इस निबंध लेखक से परमीशन ले ली है.


भारत चुनावों का देश है. पहले यह किसानों का देश भी हुआ करता था लेकिन परिवर्तन सृष्टि का नियम है, इस सिद्धांत पर चलकर भारतवर्ष वाया नेताओं का देश होते हुए चुनावों का देश बन बैठा. जिन्हें चुनाव शब्द के बारे में नहीं पता, उनकी जानकारी के लिए बताया जाता है कि चुनाव शब्द दो शब्दों को मिलाकर बनाया गया है, चुन और नाव. चुनाव की प्रक्रिया के तहत जनता एक ऐसे नेता रुपी नाव को चुनती है जो जनता को विकास की वैतरणी पार करा सके.

(चुनाव शब्द के बारे में मेरा ज्ञान इतना ही है. इस शब्द के बारे में ज्यादा जानकारी के लिए पाठकों को अग्रिम अर्जी देने की जरूरत है जिससे प्रसिद्ध शब्द-शास्त्री श्री अजित वडनेरकर की सेवा ली जा सके. ऐसी सेवा की फीस एक्स्ट्रा ली जायेगी.)

भारत में चुनावों का इतिहास पुराना है. वैसे तो हर चीज का इतिहास पुराना ही होता है लेकिन चुनावों का इतिहास ज़रुरत से ज्यादा पुराना है. देश में पहले जब राजाओं और सम्राटों का राज था, उस समय भी चुनाव होते थे. राजा और सम्राट लोग भावी शासक के रूप में अपने पुत्रों का चुनाव कर डालते थे. उदाहरण के तौर पर राजा दशरथ ने अपने ज्येष्ठ पुत्र श्री राम का चुनाव किया था जिससे वे गद्दी पर बैठ सकें. यह बात अलग है कि कुछ लोचा होने के कारण श्री राम गद्दी पर नहीं बैठ सके.

राजाओं और सम्राटों द्वारा ऐसी चुनावी प्रक्रिया में जनता का कोई रोल नहीं होता था.

देश को जब आजादी नहीं मिली थी और भारत में अंग्रेजी शासन का झोलझाल था, उनदिनों भी चुनाव होते थे. तत्कालीन नेता अपने कर्मों से अपना चुनाव ख़ुद ही कर लेते थे. बाद में देश को आजादी मिलने का परिणाम यह हुआ कि जनता को भी चुनावी प्रक्रिया में हिस्सेदारी का मौका मिलने लगा. नेता और जनता, दोनों आजाद हो गए. जनता को वोट देने की आजादी मिली और नेता को वोट लेने की. वोट लेन-देन की इसी प्रक्रिया का नाम चुनाव है जो लोकतंत्र के स्टेटस को मेंटेन करने के काम आता है.

परिवर्तन होता है इस बात को साबित करने के लिए सन् १९५० से शुरू हुआ ये राजनैतिक कार्यक्रम कालांतर में सांस्कृतिक कार्यक्रम के रूप में स्थापित हुआ.

सत्तर के दशक के मध्य तक भारत में चुनाव हर पाँच साल पर होते थे. ये ऐसे दिन थे जब जनता को चुनावों का बेसब्री से इंतजार करते देखा जाता था. बेसब्री से इंतज़ार के बाद जनता को एक अदद चुनाव के दर्शन होते थे. पाँच साल के अंतराल पर हुए चुनाव जब ख़त्म हो जाते थे तब जनता दुखी हो जाती थी. जैसे-जैसे समय बीता, जनता के इस दुःख से दुखी रहने वाले नेताओं को लगा कि पाँच साल में केवल एक बार चुनाव न तो देश के हित में थे और न ही जनता के हित में. ऐसे में पाँच साल में केवल एक बार वोट देकर दुखी होने वाली जनता को सुख देने का एक ही तरीका था कि चुनावों की फ्रीक्वेंसी बढ़ा दी जाय.

नेताओं की ऐसी सोच का नतीजा यह हुआ कि नेताओं ने प्लान करके सरकारों को गिराना शुरू किया जिससे चुनाव बिना रोक-टोक होते रहें. नतीजतन जनता को न सिर्फ़ केन्द्र में बल्कि प्रदेशों में भी गिरी हुई सरकारों के दर्शन हुए.

नब्बे के दशक तक जनता अपने वोट से केवल नेताओं का चुनाव करती थी जिससे उन्हें शासक बनाया जा सके. तब तक
चुनाव का खेल केवल सरकारों और नेताओं को बनाने और बिगाड़ने के लिए खेला जाता रहा. वोट देने और भाषण सुनने में बिजी जनता को इस बात का भान नहीं था कि वोट देने की उनकी क्षमता में आए निखार के साथ-साथ टैक्स और मंहगाई की मार सहने की उसकी बढ़ती क्षमता पर टीवी सीरियल बनाने वालों की भी नज़र थी. नतीजा यह हुआ कि इन लोगों ने जनता को इंडियन आइडल, स्टार वायस ऑफ़ इंडिया और नन्हें उस्तादों के चुनाव का भी भार दे डाला.

जिस जनता का वोट पाने के लिए नेता ज़ी लोग पैसे, शराब और बार-बालाओं के नाच वगैरह का लालच देते थे, उसी जनता को ऐसे प्रोग्राम बनाने वालों ने उन्ही का पैसा खर्चकर वोट देने को मजबूर कर दिया. वोट देकर और पैसे खर्च कर जनता खुश रहने लगी.

कुछ चुनावी विशेषज्ञ यह मानते हैं कि इतिहास अपने आपको दोहराता है, इस सिद्धांत का मान रखते हुए चुनाव की प्रक्रिया का वृत्तचित्र अब पूरा हो गया है. ऐसे विशेषज्ञों के कहने का मतलब यह है कि आज के नेतागण पुराने समय के राजाओं जैसे हो गए हैं और अपने पुत्र-पुत्रियों को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर लेते हैं. वैसे इस विचार के विरोधी विशेषज्ञ मानते हैं कि नेताओं के पुत्र-पुत्रियों को जिताने के लिए चूंकि जनता वोट कर देती है इसलिए आजकल के नेताओं को पुराने समय के राजाओं और सम्राटों जैसा मानना लोकतंत्र की तौहीन होगी.

अब तक भारतीय चुनावों को देश-विदेशों में भी काफी ख्यात-प्राप्ति हो चुकी है. लोकतंत्र और राजनीति के कुछ देशी विशेषज्ञों का मानना है कि देश की मजबूती के लिए चुनाव होते रहने चाहिए. हाल ही में कुछ मौसम-शास्त्रियों ने गर्मी, वर्षा, और सर्दी के साथ-साथ चुनावों के मौसम को एक नए मौसम के रूप में स्वीकार कर लिया है. टीवी न्यूज़ चैनल वालों ने चुनावों को जंग और संग्राम के पर्यायवाची शब्द के रूप में स्वीकार कर लिया है. कुछ न्यूज़ चैनलों ने चुनावों को महासंग्राम तक कहना शुरू कर दिया है. स्वीडेन में नाव बनाने वाली एक कंपनी ने 'भारतीय चुनाव' ब्रांड से एक नई नाव बाज़ार में उतारा है.

चुनावों की लोकप्रियता और बढ़ते बाज़ार को देखते हुए देश के बड़े औद्योगिक घरानों ने 'चुनावी विशेषज्ञ' बनाने के लिए एस ई जेड खोलने का प्रस्ताव रखा है. पगली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी ने अपने जालंधर कैम्पस में चुनावी विशेषज्ञ बनाने के लिए एक नया डिपार्टमेंट खोल लिया है जहाँ लोकसभा के कुछ सांसद लेक्चर भी डेलिवर करते हैं. आई आई सी एम को चुनाव की पढ़ाई के लिए एक नया इंस्टीच्यूट खोलने के लिए हाल ही में सरकार पचास एकड़ ज़मीन अलाट की है. कुछ आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि साल २०११-१२ से सरकार चुनावी शिक्षा में फ़ारेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट की सीमा बढ़कर साठ प्रतिशत करने वाली है...........

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि भारतीय चुनाव दुनियाँ का सर्वश्रेष्ठ चुनाव है.

Tuesday, October 26, 2010

हिंदी ब्लॉग जगत के लिए मेरा सबसे बड़ा योगदान





विजयादशमी के अवसर पर कोलकाता में नहीं था. कुछ कारणों से गुडगाँव में था. न तो किसी से मुलाकात हो सकी और न ही इस शुभ अवसर पर किसी को बधाई दे सका. वापस आया तो पता चला कि दशमी के दिन हलकान भाई घर पर आये थे. मुझे न पाकर काफी दुखी हुए.

मैंने सोचा कि देर से ही सही उनसे मिल लूँ. यही कारण था कि रविवार को उनसे मिलने गया. मैंने सोचा कि उन्हें दशमी की बधाई दे डालूँ और साथ ही ब्लागिंग पर कुछ चर्चा वगैरह करके एक पोस्ट लिख मारूं और हिंदी ब्लागिंग के प्रति अपने कर्त्तव्य का निर्वाह कर डालूँ.

शाम को उनके घर पर पहुँचा. घर के भीतर कुछ शोर सुनाई दे रहा था. एक बार के लिए समझ में नहीं आया कि क्या कारण हो सकता है?

डोर-बेल बजाया. थोड़ी ही देर में हलकान भाई आये. देखकर लगा कुछ क्रोधित थे. हिम्मत नहीं हुई कि उन्हें तुरंत विजयादशमी की शुभकामनाएं दे डालूँ. फिर मन में आया कि कहीं पूछ न लें कि; "तुम मेरे घर किस लिए आये हो?"

मैंने उनसे धीरे से कहा; "विजयादशमी की शुभकामनाएं, हलकान भाई."

मेरी तरफ देखते हुए बोले; "काहे की शुभकामनाएं? विजयादशमी शुभ कहाँ रही इसबार?"

मैंने कहा; "ऐसा क्यों कह रहे हैं हलकान भाई? विजयादशमी तो हमेशा शुभ ही होती है."

वे बोले; "क्या शुभ होगी? इन जाहिलों के साथ रहकर विजयादशमी मेरे लिए कैसे शुभ होगी?"

मैंने कहा; "कुछ समस्या हो गई क्या हलकान भाई?"

वे बोले; "अरे, अब क्या कहूँ तुमसे? ऐसा जाहिल परिवार मिला है कि समस्या हुई नहीं है, समस्या मेरे घर में बिछौना बिछाकर बैठ गई है."

मैंने कहा; "ऐसा क्यों कह रहे हैं हलकान भाई? लगता है कुछ गंभीर बात हो गई घर वालों से?"

वे बोले; "अब तुमसे क्या बताएं? जब घरवालों का यह हाल है तो बाहर वालों के बारे में क्या कहें?"

मैंने कहा; "पहेलियाँ न बुझायें हलकान भाई. बताएं तो सही कि हुआ क्या?"

अभी मैंने अपनी बात कही ही थी कि भाभी ज़ी आ गईं. बोली; "हमसे सुनो. हम बता रहे हैं. सब मामला ऊ कबिता की बजह से हुआ है."

मैंने कहा; "कौन कविता?"

वे बोलीं; "अरे कौन कबिता क्या? ओही कबिता जो ई अपने ब्लॉग पर लिखते हैं."

मैंने कहा; "क्या हुआ हलकान भई? ऐसा तो नहीं हुआ कि आपने कविता लिखी थी और किसी की गलती से वह डिलीट हो गई?"

हलकान भाई को शायद लगा कि उन्हें पूरी बात बता देनी चाहिए. वे बोले; "अब क्या कहें तुमसे? पिछले सप्ताह मैंने एक कविता अपने ब्लॉग पर पब्लिश की थी. अपने ब्लॉगर भाई-बंधु ने उसे बहुत बढ़िया कविता बताया और उसकी सराहना की. सराहना के कुल छत्तीस कमेन्ट मिले थे. सबकुछ ठीक चल रहा था तबतक मेरी माता ज़ी ने अपना कमेन्ट देकर उस कविता को घटिया बता दिया. मैं कहता हूँ, जब बाकी लोग़ उसे बढ़िया बता रहे हैं तो क्या ज़रुरत थी इनको घटिया बताने की? इनकी देखा-देखी तीन-चार लोग़ और उस कविता को घटिया बता गए. अब तुम्ही बताओ इन जाहिलों के ऊपर गुस्सा नहीं आएगा? ऊपर से माताजी की देखा-देखी हमारे भाई साहब ने भी कमेन्ट कर डाला कि माँ का कहना सही है. कविता घटिया है. ये मेरे परिवार वाले हैं कि मेरे दुश्मन हैं?"

उनकी बात सुनकर भाभी ज़ी ने कहा; "अरे त एही बास्ते कोई अपनी माँ से झगड़ता है? कोई अपना भाई से झगड़ता है? हम कहते हैं ऐसा कबिता लिखना ही काहे जो घर में झगड़ा करवा दे?"

भाभी ज़ी की बात सुनकर हलकान भाई बोले; "आपको कुछ पता नहीं है चीजों के बारे में. आप कुछ मत बोलिए. चुप रहिये. ब्लागिंग में एक एड्भर्स कमेन्ट का मतलब बुझाता है आपको?"

उनकी बात सुनकर भाभी ज़ी बोलीं; "का होगा? पहाड़ टूट जाएगा? कौन सा कैरियर ख़राब हो जाएगा आपका? ब्लागिंग ही पेट भरता है का आपका?"

उनकी बात सुनकर हलकान भाई बोले; "आपसे त बात करना ही अपराध है. आप जाइए चाह बनाइये."

भाभी ज़ी वहाँ से चली गईं.

मैंने कहा; "जाने दीजिये हलकान भाई. जो हो गया सो हो गया. ऐसा हो ही जाता है कभी-कभी."

वे बोले; "अब क्या कहें तुमसे? आजतक कभी भी हमको कविता पर एक भी एड्भर्स कमेन्ट नहीं मिला था लेकिन ई घर वालों की वजह से पहली बार दाग लग गया. ऊपर से नंबर ऑफ कमेन्ट गिरकर सत्तासी से सीधा बयालीस. इसके पहले वाली पोस्ट पर मुझे सत्तासी कमेन्ट मिले थे. और इस पोस्ट पर केवल बयालीस. क्या बताऊँ शिव तुमको? इच्छा तो हो रही है कि ब्लागिंग ही छोड़ दूँ."

मैंने कहा; "ऐसी बात न कहें हलकान भाई. एक छोटी सी बात के लिए ब्लागिंग छोड़ने की क्या ज़रुरत है? आप यह देखिये न कि बच्चन, निराला और दिनकर ज़ी की तरह आपकी सभी कवितायें बहुत बढ़िया हैं. बस इतनी सी बात है कि उन महान कवियों की तरह ही आपकी भी कुछ कवितायें केवल बढ़िया है. कवियों को उनकी बहुत बढ़िया कविताओं के लिए याद किया जाता है. बढ़िया कविताओं के लिए नहीं. आप ब्लागिंग छोड़ने का अपना ख्याल दिल से निकाल दें. ऐसी उंच-नीच हो ही जाती है."

मेरी बात सुनकर बोले; "अब क्या कहें तुमसे? हम तो पोस्ट भी लिख लिए थे कि अब और ब्लागिंग नहीं करेंगे. बाकी तुम कहते हो तो ठीक है. वो पोस्ट पब्लिश करने के लिए शिड्यूल में डाल दिया था...."

मैंने कहा; "आप उस पोस्ट को डिलीट कर दीजिये हलकान भाई. आपसे बहुत उम्मीद है ब्लॉग जगत को. हिंदी ब्लागिंग को ऊपर पहुँचाने में आपकी भूमिका अविस्मरणीय है. आज हिंदी ब्लागिंग जहाँ पर है अगर वहाँ पर आप छोड़ देंगे तो उसे जिस जम्प की ज़रुरत है वह उसे नहीं मिलेगी........"

मैंने बहुत मनाया तो वे मान गए. दोनों ने चाय पी. मैं उनसे विदा लेकर अपने घर आ गया.

हलकान भाई ने ब्लागिंग छोड़ने का अपना फैसला वापस ले लिया. मेरे कहने से उन्होंने ऐसा किया. आशा है हिंदी ब्लॉग जगत मेरे इस प्रयास को स्वर्णाक्षरों में लिखेगा. हिंदी ब्लॉग जगत के लिए मेरा यह सबसे बड़ा योगदान है.

आप बताइए, मेरा यह योगदान याद रखेंगे तो?

Monday, October 25, 2010

टैलेंट की नदी खतरे के निशान से ऊपर बह रही है




टैलेंट का बांध टूट गया सा प्रतीत होता है. अगर ऐसा नहीं भी है तो यह ज़रूर कहा जा सकता है कि पूरे देश में टैलेंट की नदी खतरे के निशान से ऊपर बह रही है. जब भी टीवी देखता हूँ, लगता है जैसे टैलेंट टीवी स्क्रीन फोड़कर बाहर निकलने के लिए बेताब है. बाज़ार में आने-जाने वालों पर नज़र पड़ती है तो फट से मन में बात आती हैं कि इस लड़के को या इस लड़की को शायद किसी टैलेंट शो में या रीयलिटी शो में देखा है?

हाल यह है कि किसी नए व्यक्ति से मुलाकात होती है तो लगता है कि अरे इन्हें तो शायद सिंगिंग कम्पीटीशन में देखा था. ज़ी करता है कि लगे हाथ पूछ ही डालूं कि; "भाई साहब आपको देखकर लगता है जैसे पहले भी कहीं देखा है. क्या आप वही हैं जो सा रे ग मा पा के सेमीफाइनल में पहुँच गए थे?"

क्या करूं? वैसे भी अब टैलेंट नाचने-गाने वाले कार्यक्रमों से आगे बढ़ गया है. अब तो रोज नए तरह के टैलेंट की खोज शुरू हो चुकी है.

एक प्रोग्राम देखा. नाम है गर्ल्स नाइट आउट - फटेगी.


अद्भुत नाम है. इस प्रोग्राम में तीन टैलेंटेड लड़कियाँ एक रात किसी ऐसी जगह पर बिताती हैं जहाँ भूत-प्रेत रहते हैं. भूत-प्रेतों के बीच रात भर रहती हैं. उनकी बातें सुनती हैं. डरती हैं. रोती हैं. और फिर अगले स्टेज में पहुँच जाती हैं. मन में आया कि ये लड़कियाँ कभी मिलें तो पूछ लूँ कि; "बहन ज़ी, भारत अब केवल कच्चे मकानों का देश नहीं रहा. अब हमारे शहरों में चालीस-चालीस करोड़ के फ़्लैट बनने लगे हैं. मुकेश अम्बानी ने अपना मकान चार हज़ार करोड़ खर्च करके बनवाया है. रीयल-इस्टेट के मामले में हम इतना आगे बढ़ चुके हैं कि हमारे देश में रीयल इस्टेट बबल पहले ही एक बार फूट चुका है. इतना सब होने बावजूद आप जंगल में भूतों और चुड़ैलों के साथ रात गुजरना चाहती हैं? मैं कहता हूँ अगर आपको डुप्लेक्स पसंद न हो तो ट्रिप्लेक्स में रह लो लेकिन भूतों के बीच? यह बात समझ नहीं आई. घरों और फ्लैटों की इतनी सुविधा के बावजूद अपना घर-बार छोड़कर भूतों के बीच क्यों रहना?"

तमाम शो हैं जहाँ कंटेस्टेंट दांत के नीचे रस्सी दबाकर भरी बसें खींच ले रहे हैं. देखकर अजीब लगता है. मन में आता है कि आधा लीटर डीजल का करीब बीस-इक्कीस रुपया लगता है. आधा लीटर डीजल से बस उससे भी ज्यादा दूर तक चली जायेगी जितनी दूर तक आप दांत से खींच लेते हैं. दूसरी बात यह है कि अपने देश में डीजल से बस चलाने पर न ही इन्डियन पीनल कोड में और न ही क्रिमिनल प्रोसीजर कोड में मनाही है. फिर ये इक्कीस रुपया बचाने के लिए काहे इक्कीस दाँतों को खतरे में डालना?

जो लोग़ रस्सी से बालों को बांधकर भरी बस खींच रहे हैं उनसे मेरा सवाल है कि "हे भाई साहब ज़ी लोग़ और हे बहन ज़ी लोग़, बाल बहुत कीमती होते हैं. जिनके पास नहीं है उनसे पूछो कि कितने कीमती होते हैं? और आप हैं कि आधा लीटर डीजल बचाने के लिए बालों के बलिदान पर उतारू हैं? क्यों?"

कहीं किसी प्रोग्राम में बाइक चलाने वाले जाबांज टाइप लोग तरह-तरह के करतब दिखा रहे हैं. कहीं बाइक को केवल एक पहिये पर चला रहे हैं तो कहीं उसे उठाकर उफान पर बह रही नदी क्रॉस कर रहे हैं. मजे की बात यह की नदी के पास से ही सड़क गुजरती है और उसी नदी पर पुल भी है.

मैं कहता हूँ;"हे जांबाजों जब बाइक में दो पहिये हैं और आपने दो पहियों की कीमत दे करके बाइक खरीदी है तो फिर क्या ज़रुरत है एक पहिये पर चलाने की? कहीं आप एक पहिये पर बाइक चलाकर टायर को घिसने से तो नहीं बचाना चाहते? और फिर क्या ज़रुरत है बाइक उठाकर नदी पार करने की? आप जहाँ से नदी पार कर रहे हैं वहां तो ट्रैफिक कांस्टेबल भी नहीं खड़ा है जो आपका चालान काटने पर अड़ा हो.काहे अपनी जान जोखिम में डाल रहे हैं?"

कई प्रोग्राम्स में देखा कि अचानक देश के तमाम कोनों में कुछ ऐसे लोग़ उभरे हैं जो आँखों पर पट्टी बांधकर हाथ में तलवार लेकर स्टेज पर आते हैं और सामने लेटे व्यक्ति के अगल-बगल या फिर हाथों में रखे सब्जियों को जैसे खीरा, लौकी, बैंगन इत्यादि को काट डालते हैं. न जाने कितनी बार मैंने देखा. कई टन सब्जियां ये लोग़ काटकर बर्बाद कर दे रहे हैं. ऊपर से जितनी सब्जियां ये लोग़ परफार्मेंस में बर्बाद करते हैं उससे कहीं ज्यादा रिहर्सल में करते होंगे.

मैं कहता हूँ कि भाई ज़ी लोग़, अपने कल्चर में अभी तक किचेन वाले चाकू से खीरा, बैंगन और लौकी वगैरह काटते हैं. वो भी खुली आँखों से. ऊपर से केद्रीय कृषि और खाद्यान्न आपूर्ति मंत्रालय ने ऐसा कोई कानून नहीं बनाया जिसके तहत आँखों पर पट्टी बांधकर तलवार से सब्जियां नहीं काटने पर सजा का प्रावधान है. फिर क्या ज़रुरत है आँखों पर पट्टी बांधकर तलवार से सब्जियां काटने की?

ऊपर से मुझे तो लगता है कि पिछले दो-ढाई वर्षों में देश में सब्जियों की जो कीमतें बढ़ी हैं, उसके पीछे इन्ही लोगों का हाथ है. टनों सब्जियां टैलेंट दिखाने के चक्कर में बर्बाद हो जाती होंगी. पता नहीं क्यों सरकार का ध्यान इस बात पर नहीं जा रहा है? इन्फ्लेशन रोकने के लिए सरकार इंटेरेस्ट रेट्स बढ़ाने के अलावा कुछ जानती ही नहीं. मैं कहता हूँ कि मंहगाई रोकने के लिए बने ज़ी ओ एम ने अपना काम ठीक से किया होता तो पहले इन टैलेंटेड लोगों को तलवार चलाकर सब्जियां बरबाद करने से रोकता.

वैसे मेरा मानना है कि अभी भी कुछ बिगड़ा नहीं है. जस्टिस लिब्रहान की अध्यक्षता में एक कमीशन बना देना चाहिए जो इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर अपनी रिपोर्ट दे. भले ही दस साल लग जाएँ.

अब समय आ गया है कि सरकार कुछ न कुछ करे. समय रहते अगर कुछ नहीं किया गया तो टैलेंट की इस बाढ़ में देश की लुटिया डूब जायेगी. ऊपर से अगर सारा टैलेंट सब्जी काटने, बस खीचने और भूत-प्रेतों के बीच रहने चला जाएगा तो फिर देश के लिए बहुत बड़ा खतरा पैदा हो जाएगा. कहाँ मिलेंगे हमें डॉक्टर? इंजिनियर? आईएएस अफसर? और तो और कहाँ मिलेंगे हमें नेता? सोचिये अगर टैलेंट के इस उफान को नहीं रोका गया तो देश न सिर्फ नेता विहीन हो जाएगा बल्कि साथ ही साथ देश के घोटाला विहीन हो जाने का चांस रहेगा.

सोचिये कि बिना नेता और उनके घोटालों के देश कैसा लगेगा?