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Wednesday, December 29, 2010

दुर्योधन की डायरी - पेज २०८०




जिन्हें यह शिकायत है कि नए साल का जश्न मनाने का काम हमारी संस्कृति के खिलाफ है उन्हें यह जानने की ज़रुरत है कि नए साल का जश्न हमारी संस्कृति में हज़ारों सालों से मनाया जा रहा है. क्या कहा? विश्वास नहीं होता? पता था यही कहेंगे. इसीलिए तो मैं दुर्योधन की डायरी का वह पेज छाप रहा हूँ जिसमें युवराज नए साल का जश्न मनाने की तैयारी के बारे में लिखते हैं;

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नया साल आने को है. नया साल आने के लिए ही होता है. जाने का काम तो पुराने के जिम्मे है. काश कि ये बात पितामह और चाचा बिदुर जैसे लोग समझ पाते. सालों से जमे हुए हैं. हटने का नाम ही नहीं लेते. कम से कम आते-जाते सालों से ही कुछ सीख लेते. सीख लेते तो दरबार में बैठकर हर काम में टांग नहीं अड़ाते.

रोज नीतिवचन ठेलते रहते हैं. ये करना उचित रहेगा. वो करना अनुचित रहेगा. कदाचित ऐसा करना नीति के विरुद्ध रहेगा. कान पक गए हैं इनलोगों की बातें सुनकर. और इन्हें भी समझने की ज़रूरत है कि अब इनके दिन बायोग्राफी लिखने के हैं. दरबार में बैठकर हर काम में टांग अड़ाने के नहीं.

मैं तो कहता हूँ कि ये लोग पब्लिशर्स खोजें और अपनी-अपनी बायोग्राफी लिखकर मौज लें. पब्लिशर्स नहीं मिलते तो मुझसे कहें. मैं एक पब्लिशिंग हाउस खोल दूँगा. बस ये लोग राज-काज के कामों में दखल देना बंद कर दें. बायोग्राफी लिखने के दिन हैं इनके. ये उन कार्यों में अपना समय दें न. ये बात अलग है कि उनकी बायोग्राफी की वजह से तमाम लोगों की बखिया उधड़ जायेगी.

खैर, ये आने-जाने वाले सालों से कुछ नहीं सीखते तो हम कर भी क्या सकते हैं?

हमें तो नए साल का बेसब्री से इंतजार रहता है. आख़िर नया साल न आए और पुराना न जाए तो पता ही न चले कि पांडवों को अभी कितने वर्ष वनवास में रहना है? पड़े होंगे कहीं भाग्य को रोते. और फिर रोयेंगे क्यों नहीं? किसने कहा था जुआ खेलने के लिए?

जुआ खेला इसलिए वनवास की हवा खानी पडी. जुआ की जगह क्रिकेट खेलते तो ये नौबत नहीं आती. बढ़िया खेलते तो इंडोर्समेंट कंट्रेक्ट्स ऊपर से मिलते. लेकिन फिर सोचता हूँ कि वे तो क्रिकेट खेल लेते लेकिन हम कैसे खेलते? हम तो खेल ही नहीं पाते. आख़िर क्रिकेट इज अ जेंटिलमैन्स गेम.

दुशासन नए साल की तैयारियों में व्यस्त है. व्यस्त तो क्या है, व्यस्तता दिखा रहा है. कभी इधर तो कभी उधर. मदिरा का इंतजाम हुआ कि नहीं? नर्तकियों की लिस्ट फाईनल हुई कि नहीं? काकटेल पार्टी में कौन सी मदिरा का इस्तेमाल होगा? चमकीले कागज़ कहाँ-कहाँ लगने हैं? अतिथियों की लिस्ट रोज माडीफाई हो रही है. नर्तकियों का रोज आडीशन हो रहा है. इसकी तत्परता और मैनेजेरियल स्किल्स देखकर लगता है जैसे गुरु द्रोण ने इसे पार्टी आयोजन पर पी एचडी की डिग्री अपने हाथों से दी थी.

वैसे दुशासन को देखकर आश्वस्त भी हो जाता हूँ कि ये भविष्य में होटल इंडस्ट्री में हाथ आजमा सकता है.

कल उज़बेकिस्तान से पधारी दो नर्तकियों को लेकर आया. कह रहा था ये दोनों वहां की सबसे कुशल नर्तकियां हैं. पोल डांस में माहिर. उनकी फीस के बारे में पूछा तो पता चला कि बहुत पैसा मांगती हैं. कह रही थीं सारा पेमेंट टैक्स फ्री होना चाहिए. उनकी डिमांड सुनकर महाराज भरत की याद आ गई. एक समय था जब उज़बेकिस्तान भी महाराज भरत के राज्य का हिस्सा था. आज रहता तो इन नर्तकियों की हिम्मत नहीं होती इस तरह की डिमांड करने की. लेकिन अब कर भी क्या सकते हैं?

वैसे इन नर्तकियों की नृत्य प्रतिभा देखकर मुझे बहुत प्रसन्नता हुई. अब तो मैंने दृढ़ निश्चय किया है कि जब मैं राजा बनूँगा और अपने राज्य का विस्तार एक बार फ़िर से उज़बेकिस्तान तक केवल इसलिए करूंगा क्योंकि वहां की नर्तकियां बहुत कुशल होती हैं.

शाम को कर्ण आकर गया. मैंने नए साल की तैयारियों के बारे में जानकारी देने की कोशिश की तो उसने कोई उत्सुकता ही नहीं दिखाई. पता नहीं कैसा बोर आदमी है. न तो मदिरापान में रूचि है और न ही नाच-गाने में. इसे देखकर तो नया साल भी बोर हो जाता होगा. मैंने रुकने के लिए कहा तो ये कहकर टाल गया कि सुबह-सुबह पिताश्री के दर्शन करने जाना है. रात को पार्टी में देर तक रहेगा तो सुबह आँख नहीं खुलेगी.

खैर, और कर भी क्या सकते है. कभी-कभी तो लगता है कि कितना अच्छा होता अगर कर्ण इन्द्र का पुत्र होता. इन्द्र के गुण इसके अन्दर रहते और इसके साथ नया साल मनाने का मज़ा ही आ जाता.

जयद्रथ भी बहुत खुश है. शाम से ही केश- सज्जा में लगा हुआ है. दर्पण के सामने से हट ही नहीं रहा है. कभी मुकुट को बाईं तरफ़ से देखता है तो कभी दाईं तरफ़ से. शाम से अब तक मोतियों की सत्रह मालाएं बदल चुका है. चार तो आफ्टरसेव ट्राई कर चुका है. उसे देखकर लग रहा है जैसे उसने आज ऐसा नहीं किया तो नया साल आने से मना कर देगा.

दुशासन ने अवन्ती से मशहूर डीजे केतु को बुलाया है. आने के बाद ये डीजे फिल्मी गानों की सीडी परख रहा है. कौन से गाने के बाद कौन सा गाना चलेगा. दुशासन और जयद्रथ ने अपनी-अपनी फरमाईश इसे थमा दी है. आख़िर एक सप्ताह से ये दोनों डांस की प्रक्टिस करते हलकान हुए जा रहे हैं.

कवियों ने भी नए साल के स्वागत में कवितायें लिखनी शुरू कर दी है. इन कवियों को भी लगता है कि ये कविता नहीं लिखेंगे तो नया साल आएगा ही नहीं. ऐसे क्लिष्ट शब्दों का इस्तेमाल करते हैं कि उनके अर्थ खोजने के लिए शब्दकोष की आवश्यकता पड़ती है. नए साल को नव वर्ष कहते हैं. एक कवि ने नए साल के दिनों को नव-कोपल तक बता डाला.

पता नहीं कब तक इन शब्दों और उपमाओं को ढोते रहेंगे? वो भी तब जब परसों ही हस्तिनापुर के सबसे वयोवृद्ध साहित्यकार ने घोषणा कर दी कि इस तरह की उपमाएं और साहित्य अब अजायबघर में रखने की चीजें हो गईं हैं. लेकिन इन कवियों और साहित्यकारों की आंखों पर तो काला चश्मा पड़ा हुआ है.

खैर, हमें क्या? कौन सा हमें कविताओं पर डांस करना है? हमारे लिए अवन्ती का डीजे फिल्मी गाने चुनने में सुबह से ही लगा हुआ है.

हम भी चलते हैं अब. जरा केश-सज्जा वगैरह कर ली जाय. दुशासन आज ही नया बॉडी-शैम्पू लाया है. देखें तो कैसा है?


पुनश्च: अच्छा हुआ आज शाम को सात बजे ही डायरी लिख ली. सोने से पहले लिखने की सोचता तो शायद आज का पेज लिख ही नहीं पाता. आख़िर आज तो सोने का दिन ही नहीं है. आज तो सारी रात जागना है.

Monday, December 27, 2010

सिंगिंग रिअलिटी-शो ला रा लप्पा ला का फिनाले





मुंबई से एन टी एम एन संवाददाता चंदू चौरसिया

कल मुंबई में हुआ ला रा लप्पा ला नामक सिंगिंग रिअलिटी शो का फायनल तमाम अस्वाभाविक घटनाओं के लिए वर्षों तक याद किया जाएगा. ज़ीहाँ टीवी द्वारा आयोजित इस टैलेंट हंट के फिनाले में शुरुआत ही अच्छी नहीं रही. तब हंगामा मच गया जब महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के कार्यकर्ताओं ने यह कहते हुए बवाल कर दिया कि फिनाले के पहले तक जो हुआ सो हुआ लेकिन फिनाले में प्रतियोगियों को केवल मराठी गीत ही गाना पड़ेगा. इन कार्यकर्ताओं ने अपनी मांग को एक कदम आगे बढ़ाते हुए कहा कि कार्यक्रम को प्रजेंट करने वाले एंकर को भी केवल मराठी में ही अनाऊँसमेंट करना होगा.

तमाम बड़े और गणमान्य व्यक्तियों के हस्तक्षेप के बाद मामला सुलझा और कार्यक्रम की शुरुआत हो सकी.

कार्यक्रम शुरू होने के बाद फिर से तब बवाल शुरू हुआ जब कार्यक्रम में अथिति के रूप में आये अक्षय कुमार अपनी कार से उतरकर पैदल चलते हुए अपनी सीट तक गए. उनके ऐसा करने से निराश तमाम दर्शकों ने यह कहते हुए हंगामा शुरू कर दिया कि उन्हें ठग लिया गया. अपनी बात को स्पष्ट करते हुए इन लोगों ने बताया कि उन्हें आशा थी कि अक्षय कुमार ज़ी उड़ते हुए, कूदते हुए या फिर तार के सहारे आसमान से उतरेंगे और उनके ऐसा नहीं करने की वजह से इन दर्शकों का पैसा वसूल नहीं हुआ.

जहाँ ये दर्शक इस बात से नाराज़ थे वहीँ अक्षय कुमार फैन्स क्लब के महासचिव मिलिंद खेलकर ने यह कहकर सबको चौंका दिया कि अक्षय कुमार का पैदल चलकर अपनी सीट तक आना उनके खिलाफ साजिश है. खेलकर ज़ी ने अपनी बात को स्पष्ट करते हुए बताया कि चैनल ने जानबूझकर अक्षय को स्टेज पर उड़ते हुए नहीं आने दिया. खेलकर ज़ी की बात को उस समय और बल मिला जब अक्षय कुमार के मित्र और प्रोड्यूसर विपुल शाह ने कहा; "अक्षय को पैदल चल कर अपनी सीट तक जाने से बचना चाहिए. पैदल चलना उनकी ईमेज के लिए हानिकारक है. अगर वे ऐसे ही पैदल चलेंगे तो फिर उनके और फिल्म इंडस्ट्री के खानों के बीच कोई अंतर नहीं रह जाएगा और अक्षय के फैन्स कम हो जायेंगे."

विपुल शाह की इस बात को अक्षय कुमार ने गाँठ बांधकर रख ली और उन्होंने फैसला किया कि भविष्य में वे स्टेज पर उड़ते हुए, कूदते हुए या फिर गिरते हुए ही प्रकट होंगे और पैदल चलकर अपनी सीट तक पहुँचने की गलती फिर नहीं करेंगे.

कार्यक्रम आगे बढ़ा और प्रतियोगियों के अलावा उनके मेंटोर्स ने भी गाने गाये.

एक स्पेशल प्रजंटेशन में विख्यात गजल गायक गुलाम अली साहब ने एक ग़ज़ल सुनाई. सबकुछ ठीक चल रहा था. तभी एक और घटना हो गई. जब गुलाम अली साहब ने ग़ज़ल ख़त्म की तभी विख्यात मेंटोर और कुख्यात गायक श्री दलेर मेंहदी ने गुलाम अली साहब से कहा; "रब्ब राखां पुत्तर. चक दे फटे. जिन्दा रह पुत्तर."

उनकी इस बात पर वहाँ उपस्थित लोगों में हडकंप मच गया. सब इस बात से आश्चर्यचकित थे कि प्रतियोगियों के लिए रिजर्व इस लाइन को दलेर मेंहदी ने गुलाम अली के लिए कैसे कह दिया. बाद में तमाम भूतपूर्व गायकों ने दलेर मेंहदी से कहा कि गुलाम अली साहब से माफी मांग लें. पहले तो दलेर मेंहदी ने ऐसा करने से इन्कार कर दिया लेकिन वे बाद में मान गए और उन्होंने गुलाम अली से माफी मांग ली.

ज्ञात हो कि "रब्ब राखां पुत्तर. चक दे फटे" नामक लाइन दलेर मेहंदी के साथ वैसे ही चिपक गई है जैसे देवर्षि नारद के साथ "नारायण नारायण". यह भी ज्ञात हो कि इंटरनेशनल रिअलिटी शोज जजेज युनियन ने दलेर मेहंदी की इस लाइन को वर्ष २०१० की सर्वश्रेष्ठ लाइन घोषित किया है.

कार्यक्रम आगे बढ़ा और सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था. कुछ ही देर बाद महान गायक मीका और महान संगीतकार साजिद में इस बात को लेकर कहा-सुनी हो गई कि हर किसी को सन-ग्लास पहनने का अधिकार नहीं है. जहाँ मीका ज़ी का कहना था कि सन-ग्लास पहनने का अधिकार बप्पी लाहिड़ी ज़ी के अलावा सिर्फ उन्हें है, वहीँ साजिद का मानना था कि वे भी अब इस एक्सक्लूसिव क्लब के मेंबर बन गए हैं. बात हाथ-पाई तक पहुँचती इससे पहले ही कुछ लोगों ने मध्यस्थता करके मामले को सुलझा लिया.

कार्यक्रम के अंत में स्टेज पर उदित नारायण और सुरेश वाडकर को बुलाया गया. वे स्टेज पर आये और उन्हें विनर का नाम बताने का जिम्मा सौंपा गया. बाद में जब एंकर ने यह कहा कि "अब वह घड़ी आ गई है" तभी से उदित नारायण ज़ी ने स्टेज के चारों तरफ देखना शुरू किया. सब यह सोच रहे थे कि वे शायद किसी को खोज रहे हैं. बाद में जब एंकर ने चौथी बार कहा कि "अब वह घड़ी आ गई है" तब उदित नारायण ज़ी से रहा नहीं गया और उन्होंने एंकर को गाली देना शुरू कर दिया.

जब उनसे इसका कारण पूछा गया तो उन्होंने कहा; "चार बार यह सुनने के बाद भी कि अब वह घड़ी आ गई है, मुझे जब स्टेज पर कोई घड़ी दिखाई नहीं दी तो मुझे गुस्सा आ गया."

बाद में लोगों ने उन्हें समझाया कि एंकर जिस घड़ी की बात कर रहा था वह घड़ी कुछ और ही थी.

अंत में विनर का नाम अनाऊँस किया गया. मगर जैसे ही एंकर ने कहा; "और दुनियाँ के पहले सिंगिंग सुपर स्टार हैं जमाल खान" तभी करीब सत्रह अट्ठारह लोगों ने स्टेज पर धावा बोल दिया. उनका कहना था कि दुनियाँ के पहले सिंगिंग सुपर स्टार कुमार सानू हैं. ऐसे में किसी और को दुनियाँ का पहला सिंगिंग सुपर स्टार कैसे कहा जा सकता है? काफी खोजबीन के बाद पता चला कि ये लोग़ महान गायक कुमार सानू के फैन्स थे और यह मानने के लिए तैयार नहीं थे कि
कुमार सानू के जीते ज़ी कोई और सिंगिंग सुपर स्टार हो सकता है.

कुल मिलाकर कार्यक्रम हंगामाखेज रहा. चैनल 'जीहाँ' की तरफ से लोगों से यह वादा किया गया कि अगले वर्ष ऐसी घटनाएं न हों, चैनल इसका ख़याल रखेगा.


नोट: यह पोस्ट मैंने कल न्यूज दैट मैटर्स नॉट के लिए लिखी थी.

Saturday, December 25, 2010

बापी दास का क्रिसमस




यह निबंध नहीं बल्कि कलकत्ते में रहने वाले एक युवा, बापी दास का पत्र है जो उसने इंग्लैंड में रहने वाली अपने एक नेट-फ्रेंड को लिखा था. इंटरनेट सिक्यूरिटी में हुई गफलत के कारण यह पत्र लीक हो गया. ठीक वैसे ही जैसे सत्ता में बैठी पार्टी किसी विरोधी नेता का पत्र लीक करवा देती है. आप पत्र पढ़ सकते हैं क्योंकि इसमें ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे 'प्राइवेट' समझा जा सके.

दिसम्बर २००७ में लिखा था. फिर से पब्लिश कर दे रहा हूँ. जिन्होंने नहीं पढ़ा होगा वे पढ़ लेंगे:-)

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प्रिय मित्र नेटाली,

पहले तो मैं बता दूँ कि तुम्हारा नाम नेटाली, हमारे कलकत्ते में पाये जाने वाले कई नामों जैसे शेफाली, मिताली और चैताली से मिलता जुलता है. मुझे पूरा विश्वास है कि अगर नाम मिल सकता है तो फिर देखने-सुनने में तुम भी हमारे शहर में पाई जाने वाली अन्य लड़कियों की तरह ही होगी.

तुमने अपने देश में मनाये जानेवाले त्यौहार क्रिसमस और उसके साथ नए साल के जश्न के बारे में लिखते हुए ये जानना चाहा था कि हम अपने शहर में क्रिसमस और नया साल कैसे मनाते हैं. सो ध्यान देकर सुनो. सॉरी, पढो.

तुमलोगों की तरह हम भी क्रिसमस बड़े उत्साह के साथ मनाते हैं. थोडा अन्तर जरूर है. जैसा कि तुमने लिखा था, क्रिसमस तुम्हारे शहर में धूम-धाम के साथ मनाया जाता है, लेकिन हम हमारे शहर में घूम-घाम के साथ मनाते हैं. मेरे जैसे नौजवान छोकरे बाईक पर घूमने निकलते हैं और सड़क पर चलने वाली लड़कियों को छेड़ कर क्रिसमस मनाते हैं. हमारा मानना है कि हमारे शहर में अगर लड़कियों से छेड़-छाड़ न की जाय, तो यीशु नाराज हो जाते हैं. हम छोकरे अपने माँ-बाप को नाराज कर सकते हैं, लेकिन यीशु को कभी नाराज नहीं करते.

क्रिसमस का महत्व केक के चलते बहुत बढ़ जाता है. हमें इस बात पर पूरा विश्वास है कि केक नहीं तो क्रिसमस नहीं. यही कारण है कि हमारे शहर में क्रिसमस के दस दिन पहले से ही केक की दुकानों की संख्या बढ़ जाती है. ठीक वैसे ही जैसे बरसात के मौसम में नदियों का पानी खतरे के निशान से ऊपर चला जाता है.

क्रिसमस के दिनों में हम केवल केक खाते हैं. बाकी कुछ खाना पाप माना जाता है. शहर की दुकानों पर केक खरीदने के लिए जो लाइन लगती है उसे देखकर हमें विश्वास हो जाता है दिसम्बर के महीने में केक के धंधे से बढ़िया धंधा और कुछ भी नहीं. मैंने ख़ुद प्लान किया है कि आगे चलकर मैं केक का धंधा करूंगा. साल के ग्यारह महीने मस्टर्ड केक का और एक महीने क्रिसमस के केक का.

केक के अलावा एक चीज और है जिसके बिना हम क्रिसमस नहीं मनाते. वो है शराब. हमारी मित्र मंडली (फ्रेंड सर्कल) में अगर कोई शराब नहीं पीता तो हम उसे क्रिसमस मनाने लायक नहीं समझते. वैसे तो मैं ख़ुद क्रिश्चियन नहीं हूँ, लेकिन मुझे इस बात की समझ है कि क्रिसमस केवल केक खाकर नहीं मनाया जा सकता. उसके लिए शराब पीना भी अति आवश्यक है.

मैंने सुना है कि कुछ लोग क्रिसमस के दिन चर्च भी जाते हैं और यीशु से प्रार्थना वगैरह भी करते हैं. तुम्हें बता दूँ कि मेरी और मेरे दोस्तों की दिलचस्पी इन फालतू बातों में कभी नहीं रही. इससे समय ख़राब होता है.

अब आ जाते हैं नए साल को मनाने की गतिविधियों पर. यहाँ एक बात बता दूँ कि जैसे तुम्हारे देश में नया साल एक जनवरी से शुरू होता है वैसे ही हमारे देश में भी नया साल एक जनवरी से ही शुरू होता है. ग्लोबलाईजेशन का यही तो फायदा है कि सब जगह सब कुछ एक जैसा रहे.

नए साल की पूर्व संध्या पर हम अपने दोस्तों के साथ शहर की सबसे बिजी सड़क पार्क स्ट्रीट चले जाते हैं. है न पूरा अंग्रेजी नाम, पार्क स्ट्रीट? मुझे विश्वास है कि ये अंग्रेजी नाम सुनकर तुम्हें बहुत खुशी होगी. हाँ, तो हम शाम से ही वहाँ चले जाते हैं और भीड़ में घुसकर लड़कियों के साथ छेड़-खानी करते हैं.

हमारा मानना है कि नए साल को मनाने का इससे अच्छा तरीका और कुछ नहीं होगा. सबसे मजे की बात ये है कि मेरे जैसे यंग लड़के तो वहां जाते ही हैं, ४५-५० साल के अंकल टाइप लोग, जो जींस की जैकेट पहनकर यंग दिखने की कोशिश करते हैं, वे भी जाते हैं. भीड़ में अगर कोई उन्हें यंग नहीं समझता तो ये लोग बच्चों के जैसी अजीब-अजीब हरकतें करते हैं जिससे लोग उन्हें यंग समझें.

तीन-चार साल पहले तक पार्क स्ट्रीट पर लड़कियों को छेड़ने का कार्यक्रम आराम से चल जाता था. लेकिन पिछले कुछ सालों से पुलिस वालों ने हमारे इस कार्यक्रम में रुकावटें डालनी शुरू कर दी हैं. पहले ऐसा ऐसा नहीं होता था. हुआ यूँ कि दो साल पहले यहाँ के चीफ मिनिस्टर की बेटी को मेरे जैसे किसी यंग लडके ने छेड़ दिया. बस, फिर क्या था. उसी साल से पुलिस वहाँ भीड़ में सादे ड्रेस में रहती है और छेड़-खानी करने वालों को अरेस्ट कर लेती है.

मुझे तो उस यंग लडके पर बड़ा गुस्सा आता है जिसने चीफ मिनिस्टर की बेटी को छेड़ा था. उस बेवकूफ को वही एक लड़की मिली छेड़ने के लिए. पिछले साल तो मैं भी छेड़-खानी के चलते पिटते-पिटते बचा था.

नए साल पर हम लोग कोई काम-धंधा नहीं करते. वैसे तो पूरे साल कोई काम नहीं करते, लेकिन नए साल में कुछ भी नहीं करते. हम अपने दोस्तों के साथ ट्रक में बैठकर पिकनिक मनाने जरूर जाते हैं. वैसे मैं तुम्हें बता दूँ कि पिकनिक मनाने में मेरी कोई बहुत दिलचस्पी नहीं रहती. लेकिन चूंकि वहाँ जाने से शराब पीने में सुभीता रहता है सो हम खुशी-खुशी चले जाते हैं. एक ही प्रॉब्लम होती है. पिकनिक मनाकर लौटते समय एक्सीडेंट बहुत होते हैं क्योंकि गाड़ी चलाने वाला ड्राईवर भी नशे में रहता है.

नेटाली, क्रिसमस और नए साल को हम ऐसे ही मनाते हैं. तुम्हें और किसी चीज के बारे में जानकारी चाहिए, तो जरूर लिखना. मैं तुम्हें पत्र लिखकर पूरी जानकारी दूँगा. अगली बार अपना एक फोटो जरूर भेजना.

तुम्हारा,
बापी

पुनश्च: अगर हो सके तो अपने पत्र में मुझे यीशु के बारे में बताना. मुझे यीशु के बारे में जानने की बड़ी इच्छा है, जैसे, ये कौन थे?, क्या करते थे? ये क्रिसमस कैसे मनाते थे?