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Thursday, April 28, 2011

दुखीराम ज़ी का इंटरव्यू




कई महीनों से उनसे आग्रह कर रहा था कि वे मेरे ब्लॉग के लिए एक इंटरव्यू दें. वे राजी तो हो जाते लेकिन फिर दुखी होकर ना कह देते. आप कह सकते हैं कि इंटरव्यू के लिए दुखी होकर ना कहने वाली बात समझ में नहीं आई. तो मेरा जवाब यह है कि सारी समस्या दुःख की ही है. आपको बता दूँ कि आज उनकी गिनती टॉप के दुखियारों में होती है. वे जब-तब दुखी हो लेते हैं. दुखी होने के लिए उन्हें किसी कारण की ज़रुरत नहीं पड़ती. हालाँकि उनके ऊपर आरोप भी लगते रहते हैं. कि उनका दुःख प्रायोजित होता है. कि वे बिना मतलब के दुखी रहते हैं. कि उनका दुःख दिखावा है. कि वे इसलिए दुखी रहते हैं क्योंकि दुःख को आसानी से भजाया जा सकता है. कि....

खैर, आज पता नहीं क्या हुआ कि जब मैंने उन्हें इंटरव्यू के उनके वादे की याद दिलाई तो दुखी होते हुए तैयार हो गए. बोले; "देखो जो भी कहूँ या करूँगा वह बिना दुःख के तो हो नहीं सकता. पहले दुखी होकर इंटरव्यू के लिए मना कर देता था लेकिन आज दुखी होकर इंटरव्यू के लिए तैयार हो गया हूँ. तो इससे पहले कि मुझपर दुःख का एक नया दौरा पड़े, आज ले ही लो मेरा इंटरव्यू."

तो पेश है उनका इंटरव्यू. आप बांचिये.

शिव: नमस्कार दुखीराम जी. इंटरव्यू के लिए धन्यवाद. ये बताइए कि कैसा लग रहा है?

दुखीराम जी: दुखी हूँ. इस बात पर दुखी हूँ कि लोग़ एक इंटरव्यू के लिए इतना हलकान किये रहते हैं. ज़रूरी है कि किसी को इंटरव्यू के लिए इतना परेशान किया जाय कि वह दुखी होकर इंटरव्यू देने के लिए हाँ कर दे?

शिव: नहीं ज़रूरी तो नहीं है लेकिन चूंकि आपने वादा किया था इसलिए....वैसे मेरा सवाल यह है कि कितने साल हो गए आपको दुखी रहते? मेरा मतलब आप पहली बार दुखी कब हुए?

दुखीराम जी: ये मैं कैसे बताऊँ? अब देखिये कोई हिसाब रखकर तो दुखी होता नहीं है? दुःख का कोई लॉगबुक होता है क्या? नहीं न? ऐसा तो है नहीं कि आदमी किसी सरकारी कोटे के तहत दुखी होगा. कि भइया सरकार ने मुझे दिन में केवल ढाई घंटे का दुःख-कोटा अलॉट किया है इसलिए मुझे केवल ढाई घंटे दुखी रहना है. उससे ज्यादा दुखी हुए तो सरकार दुःख का कोटा जब्त कर लेगी..... देखा जाय तो दुःख अपने आप में इतना बड़ा होता है कि मनुष्य को यह सुध-बुध नहीं रहती कि वह दुखी है. ऐसे में इस तरह का सवाल बेमानी है. वैसे अगर मुझे इसका उत्तर देना ही पड़े तो मैं कहूँगा कि करीब छियालीस वर्षों से मैं दुखी रहता आया हूँ. दो-चार महीने इधर-उधर हो सकते हैं लेकिन....

शिव: अच्छा ये बताइए कि पहली बार कब दुखी हुए?

दुखीराम ज़ी: वैसे कुछ ठीक से याद नहीं लेकिन मुझे लगता है कि पहली बार मैं नौ साल की उमर में दुखी हुआ था जब दादाजी ने मुझे गधा कहा था. उसके बाद मुझे याद है कि मेरे भाई साहब ने जब सबके सामने मुझे अच्छा बच्चा बताया था तब मैं दुखी हुआ था. लेकिन हाँ, पहली बार दुखी होने का सारा श्रेय मैं दादाजी को ही दूंगा.

शिव: भाई साहब ने आपको अच्छा बच्चा बताया उसके लिए आप दुखी हो गए?

दुखीराम जी: यह दुखी होने की बात ही है. अगर किसी बच्चे को अच्छा बता दिया जाय तो उसके साथ उससे बुरा और क्या हो सकता है? इतने लोगों के सामने अच्छा बता देने से उसके ऊपर परफ़ॉर्म करने का प्रेशर बन जाता है. मेरे ऊपर अच्छा दिखने, अच्छा करने, अच्छा कहने का प्रेशर आया तो मैं दुखी रहने लगा.

शिव: फिर?

दुखीराम ज़ी: फिर क्या? धीरे-धीरे दुखी रहने की आदत पड़ गई.

शिव: वैसे यह बताइए कि दुखी रहने के लिए प्रैक्टिस करना कितना ज़रूरी है?

दुखीराम जी: देखिये वह तो आपके ऊपर डिपेंड करता है कि आप कितने जल्दी दुःख को अपने अन्दर समो लेते हैं. जैसे पहले-पहल मुझे सुबह-शाम कम से कम दो घंटे दुःख दुखी होने की प्रैक्टिस करनी पड़ती थी लेकिन अब ऐसा नहीं है. अब मैं कहीं भी कभी भी दुखी हो सकता हूँ.

शिव: अच्छा यह बताइए कि आप दुखी रहने की प्रैक्टिस कैसे करते थे?

दुखीराम ज़ी: दुखी होने की प्रैक्टिस के लिए तमाम इक्विपमेंट्स टाइप मुद्दे हैं जिनका इस्तेमाल करके आदमी एक दुखियारे का अपना जीवन शुरू कर सकता है. जैसे मैं शुरू-शुरू में यह कहकर दुखी होता था कि ज़माना बड़ा खराब है. फिर यह कहकर दुखी रहने लगा कि हमारा ज़माना बड़ा अच्छा था. बाद में यह कहकर रहने लगा कि जो ज़माना चला गया वह दोबारा लौट कर नहीं आएगा. फिर बेटों की दशा और दिशा को लेकर दुखी रहने लगा. जीवन आगे बढ़ा तो पोतों के चाल-चलन पर दुखी रहने लगा. कुल मिलाकर भगवान के आशीर्वाद से दुखी होने के लिए कम से कम मुझे तो मुद्दों की कमी कभी नहीं रही. आज जब मैं उम्र के इस पड़ाव पर खड़ा हूँ तो गर्व से कह सकता हूँ कि दुखी होने के लिए अब मुझे किसी बहाने की ज़रुरत नहीं रहती. दुःख के मामले में मैं अब आत्मनिर्भर हो गया हूँ.

शिव: आपसे मेरा एक सवाल यह है कि जो दुखियारा बनना चाहते हैं उनके लिए आप और क्या-क्या मुद्दे सजेस्ट कर सकते हैं जिसका इस्तेमाल करके दुखी होने की प्रैक्टिस की जा सकती है? मेरे कहने का मतलब यह है कि सभी आप जैसे भाग्यशाली तो नहीं हैं. सभी के बड़े भाई साहब नहीं होंगे जो उन्हें अच्छा बच्चा बता दें. या कह सकते हैं कि सभी के बेटे-बेटियां नहीं हो सकती या फिर सभी के पोते नहीं हो सकते जिनके सहारे वह दुःख की प्रैक्टिस करते रहें. आज जैसे...

दुखीराम ज़ी: समझ गया. समझ गया. मैं आपकी बात पूरी तरह से समझ गया हूँ. आप को सच बताऊँ तो दुखी होने के लिए मुद्दों की कमी कभी नहीं रही. आज भी नहीं है. आप छोटे से छोटे और बड़े से बड़े मुद्दे के सहारे दुखी हो सकते हैं. जैसे एक तरफ दुखी होने के लिए आप भ्रष्टाचार का सहारा ले सकते हैं तो दूसरी तरफ आप इस बात से दुखी हो सकते हैं कि आप इस देश के प्रधानमंत्री नहीं बन सके. आप इस बात से दुखी हो सकते हैं कि मसालों में मिलावट बढ़ गई. मिलावट का बहाना बड़ा व्यापक है. जैसे आप मिलावटी दूध, मिठाई, दाल, सब्जी, मसाला, हल्दी, धनियाँ वगैरह की बात करके दुखी हो सकते हैं. आपकी इच्छा हो तो आप इन्ही चीजों के मंहगे होने की बात करके दुखी हो सकते हैं. आप चाहें तो यह कहकर दुखी हो लें कि एक तरफ तो चीजें मिलावटी हैं और दूसरी तरफ इतनी दामी भी हैं....... जो बड़े दुखियारे होते हैं उनके लिए विषय और बड़े हो सकते हैं. जैसे आप इजराइल और फिलिस्तीन या चीन और तिब्बत के झगड़े को लेकर दुखी हो सकते हैं. जापान के ऊपर चीन की दादागीरी को लेकर दुखी हो सकते हैं. ईराक और अफगानिस्तान पर अमेरिकी दादागीरी एक बहुत बड़ा मुद्दा हो सकता है. साहित्य वाले भाषा की गिरावट को लेकर दुखी हो सकते हैं. आज से सत्तर साल बाद भाषा का स्वरुप अच्छा नहीं रहेगा, यह बात अपार दुःख का विस्तार कर सकती है. चूंकि दुःख जो है वह एक साधन है...

शिव: मैं समझ गया. आपकी बात मैं समझ गया. लेकिन ये बताइए कि सामाजिक बदलाव दुखी होने में कितना मदद करता है?

दुखीराम ज़ी: गुड क्वेश्चन. देखिये सामाजिक बदलाव के सहारे भारी मात्रा में दुःख पैदा किया जा सकता है. सामाजिक बदलाव का सहारा लेकर युवाओं की बात करके दुखी हो सकते हैं. भरी जवानी में अपने बुढापे के खराब होने की बात पर दुखी होने की प्रैक्टिस की जा सकती है. आपको मैं यह बताना ज़रूरी समझता हूँ कि जब जवानी में बुढापे के खराब होने की बात की जाती है तब सैकड़ों लोग़ धीरज बंधाते हैं. यह प्रोसेस अपार दुःख का संचार करता है. धार्मिक अनेकता की बात करके दुखी हुआ जा सकता है. अब तो ब्लॉग वगैरह लिखकर भी लोग़ दुखी हो लेते हैं. कवितायें लिख कर भी दुखी हुआ जा सकता है. कविता का तो यह समझिये कि आचार्यों के अनुसार पुराने जमाने से ही कविता दुःख से उपजती आयी है. लेकिन असली दुखियारा वह है जो अपनी काबिलियत दिखाते हुए कविता से दुःख निकाल लें. जैसे आप यह कहकर दुखी हो सकते हैं कि हाय मैं कविता लिखना बंद कर दूंगा तो अच्छी कवितायें कहाँ मिलेंगी?....... कुल मिलाकर यह समझिये कि दुखी होने के लिए मुद्दे तैयार करने पड़ते हैं. आपको अपने कान, आँख, नाक वगैरह का सहारा लेते रहना पड़ेगा. हमेशा तैनात रहना पड़ेगा. दुखी होने का मुद्दा आपको कहीं से भी मिल सकता है. इसके लिए बस आपको...

शिव: समझ गया. जैसा कि आपने बताया अब आपको दुखी होने के लिए प्रैक्टिस करने की ज़रुरत नहीं पड़ती. इसके क्या कारण हैं?

दुखीराम जी: देखिये यह तो परिपक्वता से हुआ है. अब दुखी होने के लिए मुझे किसी आउट-साइड सपोर्ट की ज़रुरत नहीं पड़ती. अब मैं बिना प्रैक्टिस के दुखी हो लेता हूँ. दुखी होने के मामले में अब मैं आत्मनिर्भर हो गया हूँ. और आपको सच बताऊँ तो अब मैं पाँच मिनट तक की शॉर्ट नोटिस पर दुखी हो सकता हूँ. एक दुखी आदमी के जीवन में यह स्टेज बड़ी मुश्किल से आता है. आपको यह बताते हुए मुझे अपार दुःख हो रहा है कि आज इस स्टेज पर पहुँचने वाले देश में कुछ गिने-चुने लोग़ ही हैं. पिछले वर्ष की रैंकिंग के हिसाब से मेरा नाम देश के टॉप टेन दुखी लोगों में शुमार है.

शिव: सर, आपने कविता की बात करके मुझे एक बात याद दिलाई. अच्छा ये बताइए कि आप अपनी कविताओं के सहारे भी काफी दुखी होते रहे हैं. कुछ लोगों का आरोप है कि आप ताज़ा लिखी दुःख वाली कविताओं को वर्षों पुरानी बताते हैं. क्या यह सही है? और अगर सही है तो इन कविताओं को पुरानी बताने से क्या दुःख की मात्रा में बढ़ोतरी होती है?

दुखीराम जी: यह सवाल पूछकर आपने अच्छा किया. देखिये इस सवाल के जवाब में भावी दुखियारों के के लिए एक गाइड-लाइन छिपी हुई है. होता क्या है? समझिये आपने कोई दुखी कर देने वाली कविता कल ही लिखी है. अगर आप यह बताते हैं कि आपने वह कविता कल ही लिखी है तो जो लोग़ उसे पढेंगे वे उसपर थोड़ा दुखी होंगे. यह सोचकर थोड़ा दुखी होंगे कि मैं कल से याने कविता की उम्र से दुखी हूँ. लेकिन उसी जगह अगर आप यह बता देते हैं कि मैंने यह कविता आज से बाईस साल पहले लिखी थी तो उससे उपजने वाला दुःख कई गुना बढ़ जाती है. कारण क्या है? कारण यह है कि पाठक समझता है कि अगर मैंने यह कविता बाईस साल पहले लिखी थी तो इसका मतलब यह है कि मैं पूरे बाईस साल से दुखी हूँ. दरअसल इसे ही दुःख की दुनिया में डोमिनो पिज्जा... सॉरी सॉरी डोमिनो इफेक्ट कहते हैं. तो इससे आप समझ ही....

शिव: यह आपने बहुत अच्छी बात बताई. वैसे दुखी होने का ऐसा और कोई साधन जिसकी चर्चा अभी तक इस इंटरव्यू में नहीं हो सकी?

दुखीराम ज़ी: हाँ, हैं न. बिलकुल है. आप सोच रहे होंगे कि वह क्या है? तो मेरा जवाब है कि जहाँ भी दो-चार ही-ही, ठी-ठी करने वाले इकट्ठे होते हों वहाँ एक दुखियारे को ज़रूर जाना चाहिए. वहाँ जाने का असर यह होता है कि दुखी आदमी और दुखी हो सकता है. ऊपर से अगर वहाँ जाकर उसने अपने दुःख की अभिव्यक्ति कर दी तो समझिये कि उसके दुःख का ईमेज बड़ा धाँसू होकर उभरता है. इसलिए दुखी होने के इच्छुक लोगों को ही-ही, ठी-ठी करने वालों 'उजड्डों' के बीच अवश्य जाना चाहिए. यह एक ऐसी सीख है जो मैंने दुखी होने एक हज़ार तरीके नामक किताब में पढ़ी थी इसलिए सोचा कि.....

शिव: कुछ लोगों का कहना है कि आपके ऊपर दुखी होने के दौरे पड़ते हैं. क्या यह सच है?

दुखीराम जी: अब नहीं पड़ते. अब आपसे क्या छिपाना. करीब बारह साल पहले तक पड़ते थे लेकिन अब मैं दुःख के ऐसे शिखर पर जा पहुँचा हूँ कि मुझे दुखी होने के लिए दौरों की ज़रुरत नहीं पड़ती.

शिव: कुछ लोगों का मानना है कि आपका दुःख प्रायोजित दुःख है. आप इससे कितना सहमत हैं?

दुखीराम ज़ी: देखिये इसका जवाब मैं क्या दूँ? अब देखा जाय तो आज के ज़माने में कौन सी बात प्रायोजित नहीं है? वैसे दुःख प्रायोजित हो ही सकता है. इसका बाज़ार बहुत बड़ा है. वैसे सच कहूँ तो अब ज्यादातर मेरे दुःख आयोजित ही होते हैं. अब दुःख और दुःख मिलाकर ऐसा वातारवरण बना है कि प्रायोजित होने का कोई केस ही नहीं बनता.

शिव: कोई संदेश जो आप भावी दुखियारों को देना चाहते हों?

दुखीराम जी: यही कि दुखी होने की प्रैक्टिस करते रहें. दुःख के बाज़ार को कभी छोटा न समझें. दुखी होने में बड़ी बरक्कत है. एक और बात यह कि आप हमेशा अपना दुःख बाँटते रहिये. मतलब सार्वजनिक तौर पर दुःख की नुमाइश का असर यह होता है कि दुःख बढ़ता जाता है. एक दुखियारे के लिए यह ज़रूरी है कि वह अपनी जमात में में नए-नए लोगों को शामिल करता जाए. देखिये सुख आता है तो फट से चला जाता है. क्यों? क्योंकि वह एक और बड़े सुख की तमन्ना लिए रहता है. लेकिन दुःख के साथ ऐसा नहीं है. छोटा दुःख कभी भी बड़े दुख की तमन्ना नहीं रखा. दर्शनशास्त्र के अनुसार.....

शिव: समझ गया. समझ गया. सर, आज आपने मेरी वर्षों की तमन्ना पूरी कर दी. आपने अपने बहुमूल्य समय से कुछ क्षण निकाले और यह इंटरव्यू दिया. इसके लिए मैं आपका आभारी हूँ.

दुखीराम ज़ी: वह सब तो ठीक है. आप तो आभारी हो गए लेकिन जितनी देर इंटरव्यू लेते रहे उतनी देर के लिए तो दुखी होने का मौका मेरे हाथ से जाता रहा. आज शाम को कुल बावन मिनट एक्स्ट्रा दुखी होना पड़ेगा.

तो यह था दुखीराम ज़ी का इंटरव्यू. आज चंदू चौरसिया के छुट्टी पर जाने की वजह से मुझे ही दुखीराम ज़ी का इंटरव्यू लेना पड़ा. लेकिन मैं दुखी नहीं हूँ.

Tuesday, April 26, 2011

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की कीमत




हम ब्लॉगर लोग आम आदमी हैं इसलिए ब्लॉग लिखते हैं. आते-जाते जो कुछ भी देखते हैं, ब्लॉग पर टांक देते हैं. ई ससुर गूगल ने सर्वर क्या दिया हमारी तो खिल गईं. अरे मैं बाँछों की बात कर रहा हूँ. खिल गईं. एक आईडी क्रियेट किया और शुरू हो गए.

क्या-क्या नहीं लिख डाला?

आज हमको रास्ते में यह दिखा. कल शाम को वह दिखा था. ई राजनीति बहुत गंदी हो गई है. आतंकवाद बहुत बढ़ गया है. मंहगाई बढ़ गई है. अंग्रेजी बढ़ गई है. हिंदी कम गई है. अंग्रेजी को बढावा देना गुलामी की निशानी है. आतंकवादी से सख्ती से निबटना होगा. कसाब को डायरेक्ट फांसी काहे नहीं दे देती सरकार? अफ़ज़ल गुरु की फांसी में इतना दिन काहे लग रहा है? वर्ण व्यवस्था कब ख़तम होगी? किसान काहे आत्महत्या कर रहा है? महिला आरक्षण को लेकर इतना हंगामा क्यों है? कसाब अपना बयान काहे बदल दिया? हम सेकुलर हैं, तो तुम कम्यूनल काहे हो? साध्वी प्रज्ञा के साथ इतनी बदसलूकी काहे हो रही है? हिन्दू आतंकवाद शब्द काहे इस्तेमाल किया जा रहा है? कम्यूनिष्ट इतनी बुरी तरह से काहे हारे? क्या दुनियाँ से कम्यूनिज्म के ख़तम होने की शुरुआत हो गई है? उड़ीसा में चर्च पर काहे हमला हो रहा है? मुतालिक जैसों की धुलाई काहें नहीं होनी चाहिए?

भारतीय भुजंग काट लेगा तो क्या होगा? वेद में व्यवस्था को लेकर ई कहा गया है. जंगल की आग से छुटकारा कैसे पाया जा सकता है? पर्यावरण खराब क्यों हो रहा है? हबीब तनवीर को श्रद्धांजलि. आदित्य जी को श्रद्धांजलि. गत्यात्मक ज्योतिष खराब है. फलित ज्योतिष अच्छा है. जलित ज्योतिष उससे भी अच्छा है. हम ऐसा मानते हैं तुम क्या कर लोगे? हिन्दू कौन थे? हिंदी भाषा किधर जा रही है? किस रफ़्तार से जा रही है? परसों तक कहाँ पहुँच जायेगी? कविता क्या है? कविता इंसान को जगाती है या फिर गौरैया के लिए लिखी जाती है?

काहे? काहे? काहे?

मतलब यह है कि आम आदमी हैं तो यही सब लिखेंगे न. ख़ास होते तो किसी मैगजीन में लिख रहे होते. केंचुकी फ्रायड चिकेन और मैकडोनाल्ड की वजह से एक ख़ास समाज किस दिशा में जा रहा है उसका विश्लेषण कर रहे होते. तब अगर कसाब के मुक़दमे की बात करते तो इस बात को ध्यान में रखकर करते कि अंतर्राष्ट्रीय कूटिनीति का इस मुक़दमे पर क्या असर पड़ता है. अमेरिका का मीडिया क्या चाहता है? एमनेस्टी इंटरनेशल के लोग इस मुद्दे पर क्या विचार रखते हैं? अफ़ज़ल गुरु को फांसी देने की बात करते तो यह ध्यान में रखते कि यूरोपियन यूनियन भारत से क्या चाहता है? मैकडोनाल्ड की किसी खास वर्ग के लोगों पर पड़े प्रभाव को देखते तो उससे उपजने वाली आर्थिक नीतियों का अध्ययन करते हुए लिखते.

लेकिन भैया, हम तो आम आदमी हैं. ऐसे में जो कुछ लिखेंगे वह सब आम आदमी की भाषा में ही होगा. हम तो यह सुनकर लिखना शुरू किये थे कि; "ब्लॉग अभिव्यक्ति का सबसे सशक्त माध्यम है."

किसी ब्लॉग विशेषज्ञ ने यह लाइन गढी होगी. लेकिन हमें तो मरवाने पर उतारू दीखता है यह ब्लॉग विशेषज्ञ. यह वाक्य सुनकर हम तो उड़ने लगे. जो मन में आया, लिख डाला. ऊपर से संविधान ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी वाला सर्टिफिकेट दिया है. अब इस सर्टिफिकेट और कुछ टूटे-फूटे विचारों से लैस हम निकल लिए ब्लॉग लिखने. आम आदमी छोटे-छोटे काम कर के महान होने के सपने देखता रहता है. वही बात हम ब्लॉगर लोगों के साथ है. सोचते हैं;"चलो ब्लॉग लिखकर महान हो लेते हैं."

अब ऐसे में अगर कोई आकर यह कहे कि ऐसा करने से फंस जाओगे तो? हमें तो लगेगा न कि यहाँ हम ब्लॉग लिखकर महान हुए जा रहे थे और आप आ गए बीच में हमारी महानता पर ताला लगाने? महान होने का हमारा प्लान चौपट करने? आम आदमी को महान होने का हक़ नहीं है क्या?

हम ब्लॉग लिखेंगे तो आम आदमी की तरह. इसलिए जब अफ़ज़ल गुरु की बात करते हैं तब केवल यह याद रहता है कि उसे फांसी की सज़ा हो गई है. यह भी याद रहता है कि कुछ नेताओं ने और कुछ मानवाधिकार वालों उसे बचाने की मुहिम छेड़ रखी है. हमें इस बात से क्या लेना-देना कि यूरोपियन यूनियन अफ़ज़ल गुरु के मामले में भारत पर क्या दबाव डाल रहा है?

ऐसे में हम क्या लिखें?

हम जब किसानों की आत्महत्या की बात करेंगे तो यही न लिखेंगे कि सरकार की नीतियों की वजह से किसान मारा जा रहा है? हमें नहीं मालूम कि विदर्भ और बुंदेलखंड की आर्थिक दशा क्या है? किसान किस फसल की खेती करता है? वहां उपलब्ध साधन क्या हैं? हम तो जी आम आदमी की तरह यही सोचते मरे जा रहे हैं कि न जाने कितने लोग अपना जीवन ख़त्म कर ले रहे हैं.

हम जब न्याय-व्यवस्था पर लिखेंगे तो एक आम आदमी की धारणा लिए लिखेंगे. हमें तो केवल इतना पता है कि अदालतें न जाने कितने वर्षों से चल रहे न जाने कितने मुकदमें निबटा नहीं पा रही. क्यों नहीं निबटा पा रही, उसपर दिया जलाकर रौशनी दिखाना ख़ास लोगों का काम है. हमें केवल इतना जानते हैं कि वकील अपने दांव-पेंच कैसे चलाते हैं. हमें केवल इतना पता है कि इसकी वजह से मुकदमें कैसे खिंचते हैं.

हमें क्या पता कि आम आदमी की सोच लिए हम अगर कुछ लिख देंगे तो उससे अदालत की अवमानना होगी? हमें तो बस इतना मालूम है कि नेता टाइप लोग न जाने कितनी बार उच्चतम न्यायालय तक की अवमानना करते नहीं अघाते. लेकिन उनके खिलाफ कुछ नहीं होता. हमें तो बस इतना पता है कि आये दिन न्याय पालिका में भ्रष्टाचार की बातें होती रहती हैं.

इन मुद्दों के फ़ाइनर पॉइंट्स पर प्रकाश डालने का काम किसी प्रशांत भूषण, किसी फली नारीमन या किसी सोली सोराबजी के जिम्मे है.

ऐसे में हम और क्या लिखेंगे? ब्लॉग लिखने से बदलाव होता है, ऐसा कोई गुमान नहीं पाल रक्खा है हमने. हमें तो यही समझ में आता है कि टीवी के पैनल डिस्कशन या फिर सेमिनार आयोजित करने से अगर बदलाव नहीं आ पाया तो फिर शायद ब्लॉग का नंबर आये..:-)

लेकिन अब क्या अनिवार्य हो जाएगा कि ब्लॉग लिखने से पहले भारतीय अचार संहिता की धाराएं रट लो? साइबर कानूनों को घोंट डालो. हमारे लेख से किस-किस को नाराजगी होगी उसकी एक लिस्ट बना लो. इतना सबकुछ कर लो उसके बाद लिखना. चार साल लग जायेंगे सारी तैयारी करने में. हो सकता है उसके बाद जब लिखने की बारी आये तो पता चले कि गूगल जी ने फ्री की सुविधा हटा ली. ऐसे में हमारा ब्लॉग कैरियर तो शुरू होने से पहले ही ख़त्म हो जाएगा.

अभिव्यक्ति का माध्यम क्या केवल ब्लॉग ही है?

यह तो अभी आया है. हाल ही में. इससे पहले जो लोग व्यंग वगैरह लिख डालते थे उन्हें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं थी? क्या होता अगर कोई अधिकारी, कोई मास्टर, कोई नेता, कोई राजनीतिक पार्टी, कोई डॉक्टर, कोई वकील, कोई थानेदार, कोई गवर्नर, कोई मुख्यमंत्री किसी परसाई जी, किसी शरद जोशी जी या किसी श्रीलाल शुक्ल जी से नाराज़ हो जाता तो?

समाज में न जाने किन-किन विसंगतियों पर इन लोगों ने लिखा. किसी को छोड़ा नहीं. लेकिन मैंने तो नहीं सुना कि किसी ने इन्हें अदालत में घसीट लिया हो. ऐसा होता तो क्या-क्या हो सकता था?

देखते कि सन पचहत्तर से ही परसाई जी केवल अदालतों के चक्कर काट रहे हैं. किसी दिन जबलपुर में मुक़दमे की सुनवाई रहती तो यह कहते सुने जाते कि;"क्या कहें, वकालत में व्याप्त विसंगतियों के बारे में लिख दिया था. गवाह कैसे तोडे जाते हैं. तारीख कैसी ली जाती है. जबलपुर बार असोसिएशन ने मुकदमा ठोक दिया. अब तो झेलना पड़ेगा ही. मेरी भी मति मारी गई थी. काहे व्यंग लिखने गए?"

कोई कहता कि; " कोई बात नहीं. ऐसा होता रहता है. सब ठीक हो जाएगा."

इस बात पर शायद बोलते; "अरे क्या ख़ाक ठीक हो जाएगा? अभी कल ग्वालियर में मुक़दमे की सुनवाई है. रानी नागफनी की कहानी में डॉक्टर भाई लोगों के बारे में लिख दिया था कि कैसे जब मार्केट में कोई दवाई भारी मात्रा में आ जाती है डॉक्टर लोग हर रोग में मरीज को वही दवाई प्रिस्क्राईब कर देते हैं. कल की तारीख निबट जाए तो अगले मंगलवार को हैदराबाद जाना है. राजनीति पर लिखे गए एक लेख में चेन्ना रेड्डी को खींच लिए थे. भाई ने आंध्रप्रदेश हाई कोर्ट में मुकदमा दायर कर दिया है."

देखते कि सन पचहत्तर के बाद उन्होंने कुछ लिखा ही नहीं. तब से सन पंचानवे तक बेचारे मुकदमों में उलझे-उलझे इस असार संसार से कूच कर जाते.

कैसा लगता अगर ऐसा कुछ हो जाता तो?

संजय गांधी की खिंचाई न जाने कितनी बार की होगी उन्होंने. अशोक मेहता से लेकर राम मनोहर लोहिया, और जय प्रकाश नारायण से लेकर राज नारायण तक किसी को नहीं छोड़ा. लेकिन क्या इन लोगों ने उनको मुकदमों में फंसाकर जोत डालने की कसम खाई?

या फिर उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के कुछ और मायने थे? या कहीं ऐसा तो नहीं कि परसाई जी अपने समय के बाहुबली थे जिनसे सब डरते थे इसलिए किसी ने डर के मारे मुकदमा नहीं दायर किया?

आखिर एक आम आदमी की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की कीमत क्या है? जेलयात्रा?

Monday, April 25, 2011

जनलोकपाल बिल की ड्राफ्टिंग कमिटी में हलकान भाई




"ड्राफ्टिंग कमिटी में ब्लॉगर समाज के प्रतिनिधि को जगह दिए जाने की आपकी मांग क्या उचित है?"; एक पत्रकार ने सवाल किया.

हलकान भाई ने सवाल को धीरज-मुद्रा में सुना. कुछ सोचा और बोले; "क्यों नहीं? हमारी मांग को अनुचित कैसे ठहराया जा सकता है? आज ब्लॉगर समाज का इस देश की सिविल सोसाइटी में महत्वपूर्ण योगदान है. अगर अनुसूचित जाति और जन-जाति के प्रतिनिधियों को शामिल करने की मांग की जा सकती है तो फिर ब्लॉगर समाज ऐसा क्यों नहीं कर सकता?"

उनकी बात सुनकर एक और पत्रकार ने सवाल दागा; "आपको लगता है कि ब्लॉगर समाज में योग्य व्यक्ति हैं जिन्हें इस कमिटी में शामिल किया जा सकता है?"

"क्यों नहीं? एक से बढ़कर एक योग्य ब्लॉगर हैं जो इस ड्राफ्टिंग कमिटी के मेम्बर होने लायक हैं. कितने लोग़ हैं जो बड़े ब्लॉगर एशोसियेशन के हेड हैं. कई लोग़ हैं जो ब्लॉगर पुरस्कार वितरण संस्था के मालिक हैं. कई ब्लॉग इतिहासकार हैं. पत्रकार, लेखक, वकील हैं. हजारों की संख्या में कवि हैं. इतिहास बताता है कि जब-जब देश पर संकट आया है तब-तब कवि ने देश को जगाया है. और फिर ये लोग़ तो हैं ही, मैं खुद भी हूँ. मैंने अपने ब्लॉग पर भ्रष्टाचार के ऊपर कई बार हमला किया है. करीब अट्ठारह-उन्नीस ब्लॉग पोस्ट लिखकर भ्रष्टाचारियों पर करारा 'पोस्टिक' प्रहार किया है. आपको यह जानकार ख़ुशी होगी कि मेरा नाम हिंदी ब्लागिंग की इतिहास नामक पुस्तक में पेज ४ पर है. इंडीब्लॉगर ने मुझे इकहत्तर की रैंकिंग दी है. मेरी एक कविता वाली पोस्ट पर सतहत्तर कमेन्ट मिले थे. आपको नहीं लगता कि मेरे ये अचीवमेंट मुझे इस लायक बनाते हैं कि मैं इस कमिटी में शामिल हो सकूँ?"; हलकान भाई ने पत्रकार से उल्टा सवाल कर डाला.

उनका सवाल सुनकर पत्रकार सकपका गया. कुछ कहने के लिए अपने मन में शब्दों को गूंथकर कोई वाक्य बना ही रहा था कि किसी और पत्रकार ने पूछा लिया; "लेकिन यह भी सुनने में आ रहा है कि आपको पीलीभीत हिंदी ब्लॉगर महासभा का समर्थन नहीं मिला है?"

"ऐसी बात नहीं है. मतभेद कहाँ नहीं होते? ब्लॉगर समाज में मतभेद उसमें मज़बूत लोकतंत्र का एक बड़ा उदहारण है. वैसे आपको बता दूँ कि झारखण्ड ब्लॉगर एशोसियेशन, धनबाद आंचलिक ब्लॉगर एशोसियेशन, छत्तीसगढ़ हिंदी ब्लॉगर महासभा, पानीपत ब्लॉगर एशोसियेशन, दिल्ली हिंदी ब्लॉगर एशोसियेशन, गाजियाबाद ब्लागिंग कम्यूनिटी, अखिल भारतीय सॉफ्टवेयर डेवलपर्स ब्लॉगर एशोसियेशन, आल इंडिया न्यू जनरेशन इंडस्ट्री ब्लॉगर एशोसियेशन, बैंक एम्प्लोयीज ब्लॉगर एशोसियेशन और ऐसे ही भारत भर से करीब अठहत्तर ब्लॉगर एशोसियेशन का समर्थन हासिल है मुझे. जहाँ तक पीलीभीत ब्लॉगर महासभा के समर्थन ना मिलने की बात है तो उसके बार में यही कहूँगा कि यह सरकार के कुछ मंत्रियों द्वारा फैलाई गई अफवाह है और इसमें कोई तथ्य नहीं है. दरअसल मैं यह बता देना उचित समझता हूँ कि सरकार चाहती है कि ब्लॉगर समाज की डिमांड को दफन कर दिया जाय"; हलकान भाई से स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा.

हलकान भाई हिंदी ब्लाग समाज के प्रतिनिधि के रूप में एक प्रेस कांफ्रेंस कर रहे थे और पत्रकार उनसे सवाल पूछ रहे थे.

जनलोकपाल बिल की ड्राफ्टिंग कमिटी को और व्यापक बनाने के लिए देश भर के तमाम तथाकथित समाज से आवाजें उठनी लगी थीं. सूचित जाति, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जन-जाति, ब्राह्मण महासभा, अखिल भारतीय क्षत्रिय अन्तराष्ट्रीय महासभा, भोजपुर इंटरनॅशनल सिटिज़न्स फोरम, इस्टर्न यूपी बाहुबली एशोसियेशन, तमिल क्लैशिकल इंटरनेशनल कांफ्रेंस, रेड्डी ब्रदर्स माइंस एम्प्लोयीज एशोसियेशन, आल इंडिया पब्लिक रिलेशंस ऑपरेटर्स फोरम, राडिया ट्रस्ट, टीवी न्यूज ऐंकर्स एशोसियेशन और ऐसे ही ना जाने कितने संगठनों ने अपने प्रतिनिधियों की भर्ती के लिए आन्दोलन शुरू कर दिया था. जाट महासभा ने एयरपोर्ट के रन-वे पर चक्का जाम कर दिया था और गुर्जर महासभा ने रेल लाइंस अपने नाम कर ली थी.

कई देसी-विदेशी पत्रकार यह कल्कुलेशन करने में बिजी थे कि अगर इस तरह का व्यापक आन्दोलन किया जा रहा है तो भारत में भ्रष्टाचार कैसे पनपा? लोग़ दंग थे. सबको इस बात का आश्चर्य था कि इतने ईमानदारों के बावजूद देश में भ्रष्टाचार फैला तो कैसे फैला? पी एचडी के लिए रजिस्ट्रेशन करवाने के इच्छुक कुछ छात्र इसी विषय पर पी एचडी करने के लिए कमर कस रहे थे. इन तमाम सभा, जनसभा और महासभा को देखकर हलकान भाई ने ब्लॉगर समाज का प्रतिनिधित्व अपने हाथ में ले लिया था और इस बात पर अड़े थे कि उन्हें ड्राफ्टिंग कमिटी में भर्ती मिलनी ही चाहिए.

सरकार इन तमाम समाज और महासभाओं के प्रतिनिधि को ड्राफ्टिंग कमिटी में जगह ना देने पर कमर कसी बैठी थी. कारण यह नहीं था कि इन संस्थाओं के प्रतिनिधियों के बैठने के लिए कुर्सी की कमी थी. असली कारण यह था सरकार का काम करने का तरीका. अगर इन संस्थाओं के प्रतिनिधियों को जगह दे दी जाती तो फिर सरकार को उतनी ही संख्या में मंत्री भिडाने पड़ते और यहाँ सरकार के लिए मुश्किल खड़ी हो जाती. हज़ारों मंत्रियों की खोज आखिर बहुत बड़ी समस्या थी.

सरकार के ज़ीओएम की एक मीटिंग हुई. मीटिंग का एजेंडा यह था कि इतने प्रतिनिधियों को कैसे टरकाया जाय? मीटिंग में कानून मंत्रालय के सेक्रेटरी को भी बुलाया गया था. कानून मंत्रालय में यह सेक्रेटरी ताजा-ताजा अर्बन डेवेलपमेंट मिनिस्ट्री से ट्रान्सफर हुआ था. सरकार के माथे से पसीना पोंछते हुए उसने तुरंत अपना आईडिया दे डाला. बोला; "सर, बड़ा मुँह और बड़ी बात होगी. इन संस्थाओं को टरकाने का एक तरीका यह है कि ड्राफ्टिंग कमिटी में जगह केवल एक संस्था को दी जाय और उसके लिए हमें लॉटरी का सहारा लेना चाहिए. मैंने अर्बन डेवेलपमेंट मिनिस्ट्री में रहते हुए सरकारी फ़्लैट अलाटमेंट में यह सीखा है. क्या बोलते हैं?"

उसकी बात सुनकर कानून मंत्री ने उसका माथा चूम लिया. बोले; "हर बात की तरह ही इस बात पर भी हमें तुमपर गर्व है."

दूसरे दिन सरकार ने लॉटरी कर डाली. लॉटरी में ब्लॉगर समाज के प्रतिनिधि को ड्राफ्टिंग कमिटी में जगह मिल गई. हलकान भाई बहुत खुश थे. इतिहास का निर्माण हो रहा था. उधर हिंदी ब्लागिंग का इतिहास लिखा जा रहा था और इधर उसी समाज का एक ब्लॉगर देश से भ्रष्टाचार मिटाने के लिए अपने हथियार चमका रहा था. हलकान भाई अब अक्सर भारतीय संविधान, लोकपाल, लोकतंत्र, जनतंत्र, अम्बेदकर, भ्रष्टाचार, टू ज़ी स्कैम, प्रधानमंत्री के कर्त्तव्य, राष्ट्रपति के अधिकार, स्पेन की राजनीति में लोकपाल जैसे विषयों के बारे में बात करते पाए जाते. वे अपना ज्ञान भी बढ़ाते जा रहे थे.

ड्राफ्टिंग कमिटी की पहली मीटिंग में करीब दस दिन बाकी थे. सबकुछ प्लान के मुताबिक़ चल रहा था कि कांग्रेस के एक महामंत्री ने हलकान भाई के ऊपर एक प्रेस कांफ्रेंस में आरोप लगा दिया. बोले- ब्लॉगर हलकान 'विद्रोही' को भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठाने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है. जब पत्रकारों ने इस बात पर उनसे रौशनी डालने के लिए कहा तो उन्होंने कहा - हमारे पास प्रूफ है कि हलकान 'विद्रोही' ने अपने ब्लॉग पर कमेन्ट करने के लिए फर्जी आईडी बनाई. उनके ब्लॉग पर कुल अट्ठाईस हज़ार चार सौ चौंसठ कमेन्ट हैं जिनमें से कुल तीन हज़ार पाँच सौ सोलह कमेन्ट हलकान 'विद्रोही' ने खुद बनाई गई फर्जी आई डी से किये हैं. उन्होंने श्री अमर सिंह के हिंदी ब्लॉग पर उनकी बुराई भी की है. पिछले साल ही एक ब्लॉगर एशोसियेशन के महामंत्री ने उनके ऊपर ब्लॉगर सम्मलेन के दौरान इकठ्ठा किये चंदे की रकम में हेर-फेर का आरोप लगाया था. उनके ऊपर एक एशोसियेशन के चुनाव के दौरान.....

अमनेस्टी इंटरनेशनल और ऐसी ना जाने कितनी संस्थाएं हलकान 'विद्रोही' समर्थन में आगे आ रही थीं.

दूसरे दिन ही टीवी चैनलों के पत्रकारों ने हलकान 'विद्रोही' के खिलाफ एक पुराना केस निकाला जब स्कूल की एक पिकनिक में उन्होंने दो समोसे और दो जलेबियाँ ज्यादा खा ली थीं. अब उनके ऊपर आरोपों की झड़ी लगने लगी थी. वे प्रेस कांफ्रेंस करके सफाई देते फिर रहे थे. देश के कई ब्लॉगर एशोसियेशन से उन्हें हताश ना होने की सलाह मिल रही थी. वे एक प्रेस कन्फ्रेसं कर रहे थे. मैं उन्हें टीवी पर देख रहा था. टीवी देखते-देखते मैंने घर से आवाज़ लगाई हलकान तुम संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं. इतना कहकर मैंने हाथ उठाया ही था कि चाय की बढ़िया खुशबू मेरे नाक में घुसी. अचानक नींद खुल गई.

पता चल चुका था कि मैं सपना देख रहा था.