बजटोत्सव आया. पूरे देश में लोगों ने अपने-अपने बजटोत्सव धर्म का पालन किया. मीडिया ने उसे को सबसे बड़ा इवेंट बनाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी. मैंने मीडिया की इस उपलब्धि पर उसे बधाई दी. ये अलग बात है कि ज्यादातर मीडिया वाले आजकल बधाई-वधाई में इंटरेस्ट नहीं दिखाते. उन्हें प्रिंसिपल की ज्यादा फिक्र रहती है. बजट लोकसभा में प्रस्तुत होता है लिहाजा लोकसभा स्पीकर ने सांसदों को बैठ जाने के लिए कहा. सांसद उनका कहना मानते हुए बैठे. वित्तमंत्री श्री प्रनब मुख़र्जी ने बजट पढ़ा. बजट पाठन कार्यक्रम के दौरान सांसदों ने प्रैक्टिसानुसार मेजें थपथपाई. कुछ सांसदों ने हो-हो का शोर मचाया. हमेशा की तरह ही प्रधानमंत्री डॉक्टर सिंह ने संसद में शिला-धर्म का पालन किया.
वित्तमंत्री ने इस बार कविता नहीं पढ़ी. बजट के साथ कविता फ्री न मिले तो बड़ा अजीब सा लगता है. मेरे ख़याल से बिना कविता के बजट अधूरा रहता है. मैंने तो आजतक वित्त और रेलमंत्रियों को बिना कविता वाला बजट पढ़ते हुए नहीं देखा. देखा जाय तो कुछ मौके ऐसे भी आये जब लगा कि वित्तमंत्री हमें कविता के साथ बजट फ्री में दे गए. लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ. वित्तमंत्री शायद पिछले कई महीनों से बिजी थे इसलिए बजट के लिए कविता की खोज नहीं हो सकी. १९९१ के बाद विपक्षी पार्टियों ने हमारे वित्तमंत्रियों पर हमेशा पश्चिमी देशों का अजेंडा लागू करने का आरोप लगाया है. शायद इसीलिए इस बार वित्तमंत्री ने भारतीय कवियों की कवितायें नहीं कोट की और सीधा शेक्सपीयर को कोट किया. बोले; "आई मास्ट बी क्रूएल, ओनोली टू बी काइंड."
अपने वादे के मुताबिक़ वे किसी के साथ क्रुएल तो किसी के साथ काइंड. किसी-किसी के साथ तो क्रुएल और काइंड दोनों हुए. उनके बजट प्रपोजल सुनकर एक स्टॉक ट्रेडर बोला; "हम बहुत लकी हैं कि वित्तमंत्री हमारे साथ क्रुएल और काइंड दोनों रहे. सर्विस टैक्स का रेट बढ़ाकर क्रुएल हुए ही थे कि फट से एसटीटी का रेट घटाकर काइंड हो लिए."
आखिर में हमें एक अदद बजट की प्राप्ति हो ही गई.
उसके बाद बजट की रेटिंग हुई. मजाक हुआ. टीवी पैनल डिस्कशन हुए. टीवी स्क्रीन पर घरेलू और इम्पोर्टेड दोनों तरह के विशेषज्ञों के दर्शन हुए. अरनब गोस्वामी की मानें तो हाल ही में हुए चुनावों में उनका चैनल (वैसे कुछ लोग़ उसे अदालत कहते हैं) टाइम्स नाऊ विजयी रहा था. अभी तक यह नहीं पता चल सका है कि बजट में किसकी विजय हुई? खैर, आपने तमाम लोगों के वक्तव्य सुने और देखे. लेकिन मुझे लगता है कि टीवी स्टूडियो में बजट के ऊपर जो रिएक्शन दिखाई देता है वह उतने महत्वपूर्ण नहीं हैं जो वे रिएक्शन हैं जो प्राइवेटली दिए जाते हैं. इसीलिए हमारे ब्लॉग पत्रकार चंदू चौरसिया ने पिछले ३ दिनों तक देश भर की यात्रा की और बजट पर तमाम लोगों के रिएक्शन इकठ्ठा किये. आप बांचिये.
वित्तमंत्री प्रनब मुखर्जी: "लूक, दीस इज हाऊ ईट भार्क्स. नो-बोडी ईज एभर आबसोलुटाली सैटिस्फाइड उविथ दा बाजेट. आई मास्ट रिमाइंड इयु दैट उइ हैभ लिमिटेड मैंडेट. सो उइ उविल हैभ टू टेक आभार एलाइज इनटू कोंफ़िडेंस. सो, उइ डीड नोट टाक एबाऊट मेजोर रिफोर्म्स. बाट लेट मी टेल इयु दैट ओन दा मैटर आफ फिस्कोल डेफिसिट उइ उविल डू सामथिंग आउट साइड ओफ दा बाजेट. पीपुऊल उवांटेड मी टू बाईट दा बुलेट बाट दे मास्ट टेक माई एज ऐंड माई टीथ ईन टू कोंसीडारेशोंन."
प्रधानमंत्री: "वी हैव द नम्बर्स. जो बजट श्री प्रनब मुख़र्जी ने प्रस्तुत किया है वह न सिर्फ ग्रोथ को बढ़ाएगा बल्कि वह देश को नई दिशा देगा. वी हैव द नम्बर्स. जब भी जरूरत पड़ेगी हम संसद में नम्बर्स प्रूव करेंगे. हमारे पास नम्बर्स हमेशा रहे. आपको याद हो तो अभी एक साल पहले तक हमारे पास आठ परसेंट था. जो कि एक बड़ा सेक्रेड नम्बर था. उसके पहले जुलाई २००८ में हमारे पास २७२ की संख्या थी, जो अपने आप में सबसे बड़ा डेमोक्रेटिक नंबर है. तो मैं यही कहना चाहूँगा कि हमारे पास नम्बर्स है. आप लगे हाथों यह भी बताता चलूं कि हमारे पास सी बी आई भी है."
मायावती जी: "यह बजट देश के गरीब और दलित वर्ग के खिलाफ है. हमने सोचा था कि नोटों का हार बनाने वालों के लिए इस बजट में ऋण माफी योजना की घोषणा की जायेगी प्रंतू ऐसा नहीं हुआ. न ही केंद्र सरकार ने पत्थर की मूर्तियाँ बनानेवालों को आयकर की सीमा में कोई छूट दी. मैंने अपने सुझाव में कहा था कि जैसे अभियान चलाकर शेरो और बाघों की रक्षा की जा रही है वैसे ही एक अभियान चलाकर हाथियों की रक्षा की जानी चाहिए. मैंने सोचा था कि वित्तमंत्री इसी बजट में "बाबा साहेब अम्बेदकर हाथी रक्षा अभियान" की घोषणा करेंगे लेकिन वह भी नहीं हुआ. यह बजट दलित विरोधी है. इसलिए बहुजन समाज इसका विरोध करता हैं."
ममता जी: "जोब रेल बाजेट हुआ तोभी हामको लगा कि जोनोराल बाजेट भी खाराब होगा. होमारा पाटी पार्लामेंट में जैसा रेल बाजेट का बिरोधिता किया ओइसा ही एहि बाजेट का भी करेगा. देखो, हाम कोमोन मैन का बात कारता है. गोरीब, मोज्दूर, पूअरेस्ट ओफ दा पुआर का बात कारता है. इस बाजेट में उसका लिए कुछ भी नेही है? होम डीमांड किया था कि सोरकार को आर्ट औउर काल्चर को प्रोमोट करना है. उसका बास्ते सोरकार ऊ सब लोगों को इन्काम टैक्स में छूट देना चाहिए जो नेता लोगों का पेंटिंग्स ख़रीद करता है वो भी इसी सोरकार ने नेही किया. हाम ए भी डीमांड किया था कि ह्वाईट और ब्लू पेंट पार सोरकार एक्साइज ड्यूटी कोम करे. वो भी नेही हुआ. अपना साथी दोल का साथ सोरकार ऐसा करेगा तो फीर तो मुश्कील है. होम दिल्ली जा रहा है. वित्तमोंत्री से एक बार फीर बात करेगा."
राम जेठमलानी, कानूनविद : "उच्चतम न्यायालय के लिए सरकार और उसके मंत्रियों के मन में कोई आदर नहीं रहा. वोडाफ़ोन केस में उच्चतम न्यायालय के निर्णय को सरकार ने एक नियम लाकर निरस्त्र कर दिया. ऊपर से वित्तमंत्री कहते हैं कि वोडाफोन जैसे केस पर आयकर लगाने के लिए लाया गया कानून १९६१ से लागू होगा और यह माना जाएगा कि सरकार इस तरह का आयकर १९६१ से लगाना चाहती है. अगर ऐसा ही है तो हम मांग करते हैं कि आज़ादी के बाद पाकिस्तान को दिए गए ७५ करोड़ रूपये को भी रेट्रोस्पेक्टिव इफेक्ट से देखा जाय और सरकार उसपर पाकिस्तान से टी डी एस का पैसा वापस ले. ब्याज के साथ. हम बाबा रामदेव से कहेंगे कि वे इस मुद्दे को लेकर आन्दोलन करें."
बी एस येदुइराप्पा : "बजट अच्छा नहीं है. सरकार को चाहिए था कि बजट में ऐसा प्रावधान करती जिससे प्राइवेट ट्रस्ट को मिलने वाले कंट्रीब्यूशन पर इनकम टैक्स डिपार्टमेंट कोई जांच न कर सके. और यह प्रावधान भी लाना चाहिए था कि प्राइवेट ट्रस्ट को खाता-बही रखने की ज़रुरत नहीं हो. दूसरा जो सबसे महत्वपूर्ण बात है वह है कि सरकार ऐसे रेसोर्ट और होटल को टैक्स में छूट दे जो असंतुष्ट विधायकों को अपने रेसोर्ट में रहने और ज़रुरत पड़ने पर छिपने में सहायता करते हैं. कम से कम फिनांस मिनिस्टर ये तो कर ही सकते थे कि क्राइसिस के समय असंतुष्ट विधायकों से होने वाले आय पर दस साल के लिए छूट दे. नए रेसोर्ट खुलने पर उन्हें सर्विस टैक्स होलीडे भी दिया जा सकता था. आई कम्प्लीटली अपोज दिस बजट."
रॉबर्ट वाडरा : "ऑफिसियली तो नहीं बट अन-ऑफिसियली मैं इस बजट से खुश नहीं हूँ. इसमें प्रोस्पेक्टिव पॉलीटिशियन के लिए कुछ है ही नहीं. आज पोलिटिक्स में अच्छे लोगों की ज़रुरत है. इसीलिए मैं खुद पोलिटिक्स में आना चाहता हूँ. ऐसे में सरकार की ड्यूटी है कि वह नए पॉलीटिशियन को एनकरेज करने के लिए कुछ छूट वगैरह दे. जैसे सरकार यह कर सकती है कि अगर कोई पोलिटिक्स ज्वाइन करता है तो उसे दस सालों तक इनकम टैक्स का रिटर्न फ़ाइल करने की ज़रुरत ही न हो. फिनांस मिनिस्टर एक काम और कर सकते थे. अगर कोई अपनी वाइफ के साथ पोलिटिक्स में आना चाहे तो उसे २० साल तक इनकम टैक्स रिटर्न फ़ाइल करने की ज़रुरत न रहे. अगर ऐसा हुआ तो अच्छे हसबंड-वाइफ एक साथ पोलिटिक्स ज्वाइन करेंगे और फिर इस देश का भला होने से कोई रोक नहीं पायेगा."
रंजना कुमारी, डायरेक्टर ऑफ द सेंटर फॉर सोशल रिसर्च: "देश को आज़ाद हुए पैंसठ बरस हो गए लेकिन आज भी बजट आम आदमी के लिए ही बनता है. मुझे आश्चर्य होता है कि जिस कोलीशन की चेयर-परसन एक महिला हो वह कोलीशन कम से कम अपना बजट तो आम औरत के लिए बना सकता है. ऐसी तरक्की किस काम की जो आज़ादी के पैंसठ साल बाद भी आम औरत के लिए बजट न बनवा सके. मेरा विरोध इसी मुद्दे पर है. बाकी बातें बजट में ठीक है."
राहुल गाँधी: "हमने तय किया था कि इस बजट में हम उन गाँव वालों को मेहमान भत्ता देने का प्रावधान लायेंगे जिनके यहाँ मैंने खाना खाया और पानी पीया था लेकिन यूपी में चुनाव नहीं जीत पाने से हमने वह प्रोग्राम ड्रॉप कर दिया. हाँ, मैं ऐसा मानता हूँ कि वित्तमंत्री उन एडवरटाइजिंग एजेंसियों के लिए कुछ टैक्स होलीडे की घोषणा कर सकते थे जो नेताओं की इमेज बिल्डिंग का काम करती हैं. खैर, हम अमेंडमेंट लाकर भी ऐसा कर सकते हैं. और हम चाहेंगे कि बजट सेशन में हि ऐसा हो."
मनोहर भइया कांग्रेसी: "प्रनब दा ने शानदार बजट दिया है. वे हमारे सचिन तेंदुलकर हैं. आई टेल यू, दिस बजट विल फुएल ग्रोथ टिल वी रन आइदर आउट ऑफ फुएल ऑर आउट ऑफ बजट."
बप्पी लाहिरी: "सुना है बाजेट का बजह से सोना आब कॉस्टली हो जाएगा. ऐसा हुआ तो हमारा नेटवर्थ बाढ़ जाएगा. हाम अपना इश्टाइल में प्रानब दा के लिए कुछ कहेगा कि प्रानब दा आआआआ, वी लाभ यू.
मुलायम सिंह जी; "बजट जो है वो हमें नई देखा. केंद सअकार से आशा ही कि अखियेश के औजवानों को दिए आने वाले भत्ता घोषणा में कुछ जो है वो सहायता कएगी. लेकिन पनब दा ने कुछ किया ही नई. ये सअकार अपसंखक, गईब, केसान के लिए काम ही नई कअती. हम तो आहते थे कि यूपी में जो बाहुबई सब मंती बने हैं, उनको बाहुबई भत्ता मिलता तो ठीक रअता."
सीताराम बजरंगी, दूधवाले; "हम सरकार को धन्यवाद देते हैं जो यूरिया क दाम घटाए हैं. यूरिया से दूध तैयार करने में लागत बढ़ गया था. प्राफिट मार्जिन कम हो गया था. अब एही डिमांड है कि जैसे यूरिया क दाम घटायें हैं ओइसे ही डिटर्जेंट और बाकी केमिकल क दाम भी घटा दें त ठीक रहेगा. बड़ा राहत मिला है यूरिया का दाम घटने से. हम तो कहते हैं कि वित्तमंत्री राजी हों त हमसब मिलि के उनका सार्वजनिक अभिनन्दन कर दें."
लॉर्ड इन्द्रजीत देसाई, लन्दन वाले ; "यूरिया प्रोड्यूस करने वाली मशीन पर कस्टम्स ड्यूटी कम करने से फार्मर्स क इनकम बढ़ेगा. अब फार्मर्स के बेटर डेज आयेंगे. ये फिनांस मिनिस्टर ने ठीक ही किया. कभी-कभी फार्मर्स के बारे में भी सोचना चाहिए और उसका भी इनकम बढ़ाना चाहिए."
श्री पी चिदंबरम: "आई थैंक, फिनांस मिनिस्टर फॉर नॉट रेजिंग एक्साइज ड्यूटी ऑन चेविंग गम्स एंड बगिंग इक्विपमेंट. दिस विल गो अ लॉन्ग वे टू एनकरेज बगिंग..."
सुब्रमनियम स्वामी; "मैं किसी भी मुद्दे पर अपने विचार ट्वीट करके व्यक्त करता हूँ. बजट पर मेरे रिएक्शन के लिए ट्विटर पर मेरी टाइम-लाइन देखें."
Monday, March 19, 2012
बजट २०१२ - कुछ अन-ऑफिशियल रिएक्शन...
Wednesday, February 29, 2012
दुर्योधन की डायरी - पेज २९९३
फिर से बहस शुरू हो गई कि क्या क्रिकेट की वजह से हॉकी और बाकी के खेलों की दुर्गति हो रही है? हर एक-दो साल पर ऐसी बहस छेड़ी जाती है ताकि हमारी बहस प्रधान संस्कृति की रक्षा होती रहे. क्या कहा आपने? यह हमारी संस्कृति कैसे हुई? तो फिर मैं आपको बता देता हूँ कि हमारी संस्कृति में एक खेल दूसरे खेलों को हजारों साल से दबाता आया है. अगर यकीन नहीं आये तो युवराज दुर्योधन की डायरी का यह पेज बांचिये.
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फिर से वही बवाल खड़ा हो गया है. फिर से लोग़ इस बात पर हलकान हुए जा रहे हैं कि एक खेल के रूप में तीरंदाजी को जितनी प्राथमिकता मिल रही है उतनी न तो तलवारबाजी को मिल रही है और न ही कुश्ती को. गुप्तचर बता रहे थे कि मीडिया, प्रजा, बुद्धिजीवी, पत्रकार, कलाकार, तक आजकल इतने हलकान हैं कि उन्हें भूख भी देर से लग रही है. एक गुप्तचर तो मुझसे यह बताकर मेरे गले में पड़ा हार उतरवा ले गया कि मंहगाई के बवाल को भी भुलाकर पूरा हस्तिनापुर इसी एक मसले पर बहस किये जा रहा है. चाय-पान की दूकान से लेकर अखबारों के सम्पादकीय पृष्ठों तक में बस यही मसला छाया हुआ है. यह सब देखकर लगता है कि लोगों को बवाल खड़ा करने के लिए विषयों की कमी न तो पहले थी और न ही आज है. अपने अनुभवों से लिख सकता हूँ कि हस्तिनापुर में जब खड़े होने की बात आती है तो मार्ग में बैठा बैल और राजमहल में बैठा राजकुमार भी बवाल का मुकाबला नहीं कर सकता. मार्ग में बैठे बैल को खड़ा करने के लिए पुचकार से लेकर गुस्सा और डंडा तक दिखाना पड़ता है लेकिन बवाल ऐसे ही खड़ा हो जाता है. राजमहल में बैठे राजकुमार को उठाने के लिए कहीं किसी मामे या कहीं किसी जीजे को मशक्कत करनी पड़ती है लेकिन बवाल खड़ा कर देना चुटकी बजाने का काम हो गया है.
कोई भी कभी भी और कहीं भी बवाल खड़ा कर सकता है.
राजमहल के गुप्तचर से लेकर विशेषज्ञ तक इस बात पर खुश हैं कि बवाल खड़ा करने जैसे कर्म पर अब बुद्धिजीवियों, लेखकों, कवियों और गुरुओं का एकतरफ़ा अधिकार नहीं रहा. हालत यह हो गई है कि प्रजा के दो-चार चिरकुट भी किसी पत्रकार के साथ मिलकर बवाल खड़ा कर सकते हैं. अभी तीन-चार महीने पहले ही इनलोगों ने मंहगाई की समस्या पर बवाल खड़ा कर दिया था और अब इस तीरंदाजी को मिलने वाली प्राथमिकता पर. मुझे तो यहाँ तक लगता है कि ये लोग़ एक बवाल से जल्दी ही बोर भी हो जाते होंगे नहीं तो हर दो महीने पर नए मसलों पर बवाल कैसे खड़ा होता? पिछले कई वर्षों से खेलों में तीरंदाजी को मिलने वाली प्राथमिकता पर छुट-पुट बहस हो जाया करती थी और लोग़ बहस-धर्म का पालन करके चुप हो जाया करते थे. लेकिन पता नहीं क्यों इस बार मामला कुछ ज्यादा ही छाया हुआ है.
सभी को यह शिकायत है अन्य खेलों के मुकाबले में तीरंदाजी को बहुत ज्यादा तवज्जो मिल रही है. न सिर्फ विशेषज्ञों, पत्रकारों और बुद्धिजीवियों का बल्कि प्रजा का भी मानना है कि तीरंदाजी की वजह से बाकी के खेल जैसे तलवारबाजी, भाला-फेंक, ऊंची कूद, लम्बी कूद, लंगड़ी, लबेद, ढेला-फेंक, कुश्ती वगैरह बैकसीट पर चले गए हैं. कोई न तो ऐसे खेल खेलना चाहता है और न ही इनके बारे में बात करता है. लोगों को इस बात की शिकायत भी है कि हस्तिनापुर की मीडिया भी केवल तीरंदाजी को ही तवज्जो दिए जा रही है.
कई बार तो मन में आया कि ऐसी बहस को रोकने का जो फूलप्रूफ तरीका है उसको लगाकर इस बहस पर विराम डलवा दूँ. मन में आया कि चचा विदुर से कहकर गुरु द्रोण, कृपाचार्य और पितामह वाली एक थ्री मेम्बर कमिटी का गठन करवा दिया जाय जो यह पता लगाए कि क्या सच में तीरंदाजी को बाकी खेलों के मुकाबले ज्यादा तवज्जो मिल रही है? अगर ऐसा है तो क्यों है, कब से है और कैसे इसे दूर किया जा सकता है? वह तो भला हो मामाश्री का जिन्होंने मेरे मन में उपजे इस विचार को अपनी आज्ञा का बाण चलाकर धरासायी कर दिया.
मामाश्री का कहना था कि ऐसा करने की ज़रुरत नहीं है. कमिटी बैठाने से प्रजा शांत हो जायेगी और फिर से महंगाई का मसला लेकर आवाज़ उठाना शुरू कर देगी. ऊपर से एक बार कमिटी के गठन की सूचना प्रजा तक पहुंची तो फिर वह कमिटी के रिपोर्ट की प्रतीक्षा करने लगेगी. और फिर प्रजा का क्या भरोसा? कहीं द्रौपदी के गुप्तचरों ने भड़का दिया तो फिर रिपोर्ट न आने पर जुलूस से लेकर नारेबाजी तक कर सकती है. ऊपर से आजकल कमिटी की रिपोर्ट चचा विदुर के पास जाने से पहले ही लीक भी होने लगी हैं. हमेशा इस बात का खतरा रहता है कि कहीं किसी अखबार का सम्पादक कमीशन रिपोर्ट को लीक करवाने का प्लान बना रहा होगा. मामाश्री के सुझाव पर इच्छा हुई कि फट से नारा लगा दूँ कि; "जब तक सूरज चाँद रहेगा, मामा तेरा नाम रहेगा" लेकिन कर्ण वहीँ बैठा था इसलिए नारा नहीं लगा सका.
ऐसा सीरियस मित्र मिला है कि इसके सामने बचकानी हरकतें भी नहीं कर सकता.
एक दिन मैंने मामाश्री से पूछा था कि तीरंदाजी ने बाकी खेलों को पीछे छोड़ दिया है तो इसका क्या कारण हो सकता है? बिफर पड़े. बोले कि मैं युवराज हूँ मुझे ऐसी चिरकुट बातों के बारे में नहीं सोचना चाहिए. अगर मैं ऐसी बातों पर अपना समय देने लगा तो फिर पांडवों के खिलाफ साजिश कौन करेगा? उन्हें सताने क प्लान कौन बनाएगा? अगर मैं ऐसी बातों के बारे में सोचने लगा तो फिर बन चुका युवराज. उन्होंने बात को आगे बढ़ने ही नहीं दिया. यह बोलकर कमरे से निकल
गए कि इस तरह के प्रश्न एक युवराज को शोभा नहीं देते. युवराज अगर खेलों के बारे में चिंतित होने लगे तो फिर लड़ाई-झगड़ा, राज-हड़प, साजिश-वाजिश के बारे में कौन सोचेगा?
लेकिन मन ही तो है. जो सवाल मन में आया तो जाने क नाम ही नहीं ले रहा था. शाम को तीन पत्ते खेलने समय भी यह बात मन से नहीं गई. विचार किया. फिर काफी विचार किया. और किया. करता गया. जितना सोचता, बार-बार आँखों के सामने धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाये मछली की आँख पर निशाना साधे अर्जुन दिखाई दे रहा था.
फिर मन में यह आया कि ऐसा क्यों न हो? तीरंदाजी में जो ग्लैमर है वह किसी और खेल में कहाँ है? धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाए योद्धा को तो जाने ही दीजिये ऐसा करते हुए मनुष्य भी बड़ा स्मार्ट लगता है. कोई योद्धा प्रत्यंचा न भी चढ़ाए और अपना धनुष-बाण लिए कहीं बैठे-बैठे अगर उसे निहारता भी है तो भी बड़ा क्यूट लगता है. जैसे हाथ का कमंडल और सिर पर कच्चे-पक्के केश का जूड़ा टुटपुन्जिये ऋषि को भी महान बना देता है वैसे ही धनुष-बाण किसी भी आदमी को योद्धा या राजकुमार के रूप में प्रस्तुत कर सकता है.
धनुष-बाण से लैश कोई राजकुमार जब राजमहल से निकलता है तो देखते ही बनता है. कई बार तो मैं खुद जब कंधे पर धनुष और तरकश टाँगे चलता हूँ तो मन में एक ही विचार आता है कि मुझे देखकर इस समय देवतागण न सिर्फ प्रसन्न हो रहे होंगे बल्कि पुष्पवर्षा भी कर रहे होंगे. यह बात और है कि आजतक कोई भी पुष्प मुझसे आकर नहीं टकराया. मेरी बड़ी तमन्ना है कि एक बार देवताओं द्वारा बरसाया गया पुष्प आकर मुझसे टकराए. सिर पर गिरकर घायल भी कर जाएगा तो भी कोई गम नहीं.
यह ऐसा अस्त्र है जो किसी भी राजकुमार के व्यक्तित्व में चार-चाँद लगा देता है. इधर राजकुमार ने कंधे पर धनुष टांगा नहीं कि उधर उसकी चाल में अंकड़ अपने आप आ जाती है. कई बार तो मैंने खुद महसूस किया है कि दुशासन की चाल में आई अकड़ उसके कंधे पर रखे धनुष-बाण का नतीजा है. जब भी वह धनुष-बाण लिए चलता है तब द्रौपदी की साड़ी न उतार पाने की वजह से उसके मन में पैदा हुआ डिप्रेशन भी फट से गायब हो जाता है.
दूसरी बात यह है कि धनुष-बाण हर तरह के साज-सज्जा के साथ फबता है. किसी दिन राजकुमार अगर मुकुट, आभूषण, माला, केश-सज्जा, मेक-अप वगैरह न भी करे और केवल श्वेत वस्त्र पहने सन्यासी के वेश में भी निकले तो भी ग्लैमरस दिक्खेगा बस शर्त यह है कि वह कंधे पर धनुष-बाण रख ले. कंधे पर रक्खा धनुष-बाण लप्पू से लप्पू राजकुमार को भी फोटोजेनिक बना देता है. वहीँ शरीर पर लपेटी गई धोतिका के साथ अगर राजकुमार तलवार या गदा लेकर चले तो कोई भी उसे राजकुमार मानने के लिए राजी नहीं होगा. सबको यही लगेगा कि कोई गरीब ब्रह्मण किसी राजकुमार की गदा और तलवार चुराकर लिए जा रहा है. ऊपर से धोतिका लपेटे राजकुमार अगर भाला लेकर चले तो लगेगा कि कोई ऐसा सैनिक है जिसे दो-चार दिन पहले ही सेना में भर्ती किया गया है और उसकी पोशाक अभी तक सिलाई होकर नहीं आई है.
वैसे भी तीरंदाजी की एक सबसे बढ़िया बात यह है कि छोटा-मोटा योद्धा भी महीने-दो महीने की प्रैक्टिस कर ले तो वह भी धनुर्धारी बन सकता है. आखिर दूर से ही तो बाण छोड़ना है. लगा तो लगा और नहीं लगा तो दूसरा बाण है. उसे चला लेगा. अब यह कोई गदा या तलवार तो है नहीं कि आमने-सामने युद्ध करना पड़ेगा और अगर वार चूक गया तो कर्म के अनुसार स्वर्ग या नरक की यात्रा करनी पड़ जायेगी. धनुष-बाण चलाना सबको सरल लगता है. उसके आगे भी देखा जाय तो फिर सभी अपने कर्मों से तीरंदाजी को ही प्रमोट करते रहे हैं. गुरु द्रोण को ही ले लो. अर्जुन की ऐसी ईमेज बना दी है इन्होने कि छोटे-छोटे बच्चे अर्जुन ही बनना चाहते हैं. कोई भीम नहीं बनना चाहता. यहाँ तक कि एकलव्य के मन में गुरु द्रोण की चेलाई का ख़याल आया तो उसने भी उनकी प्रतिमा बनाने के बाद हाथ में धनुष-बाण ही उठाया. पाठशाला में प्रतियोगिता हुई तो वह भी चिड़िया की आँख में बाण मारने की. द्रौपदी के स्वयंवर में भी प्रतियोगिता हुई तो वहाँ भी मछली की आँख को बाण से बेध देने की ही प्रतियोगिता हुई. यहाँ तक कि एकलव्य को भी जब परफॉर्म करने का मौका मिला तो उसने भी स्वान के मुँह की सिलाई तलवार से नहीं बल्कि बाणों से ही की.
पता नहीं हम कबतक संस्कृति को ढोते रहेंगे. मुझे तो लगता है कि हमारा धनुष-बाण प्रेम श्री राम के जमाने से शुरू हुआ जब सीता जी के स्वयंवर में भी कुछ उठाने की बात आई तो वहाँ भी धनुष को प्राथमिकता दी गई. मैं कहता हूँ वहाँ क्यों नहीं कोई गदा या तलवार रखी गई? अगर ऐसा हुआ होता तो शायद आज हस्तिनापुर में और भी खेलों को महत्वपूर्ण माना जाता. केवल तीरंदाजी पर ही जाकर सबकुछ ख़तम नहीं होता.
Tuesday, February 21, 2012
दिल्ली काण्ड...
यह केवल एक पैरोडियात्मक और जुगाडू पोस्ट है. इसे किसी भी तरह से गोस्वामी तुलसीदास का अपमान न समझा जाय. इसलिए लिख रहा हूँ कि प्रशंसक कई बार नाराज़ हो जाते हैं.
यह दिल्ली-कांड का प्रथम भाग है. अगर पाठकों को अच्छा लगा तो फिर आगे का वर्णन दिया जाएगा.फिलहाल इसे बांचिये...
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एक भोर सब सहित समाजा, दस जनपथ परधान बिराजा.
सकल कुटिल मंत्री, नरनाहू, राहुल जसि सुनु अतिहि उछाहू.
राहुल रहहि कृपा अभिलाषे, चमचे करहिं प्रीति रुख लाखे.
एहि जुबराज बने अब राजा, दस जनपथ पे बाजहि बाजा.
पणियप्पन के वचन सुहाए, सुनि के सिबल हृदय अति भाये.
अब अभिलाषु एक मन मोरे, राहुल पूजि अनुग्रह तोरे.
कहइ प्रधान सुनिअ जननायक, राहुल हैं सब बिधि सब लायक.
दिग्गी सह परिवार ओ माई, करहिं छोह सब रौरिहि नाई.
सुनि परधानाहि बचन सुहाए, दंगल दोदि मूल मन भाये
जौं चमचौ मत लागहि नीका, करहु हरिष हिय राहुल-टीका.
हरषि जमाइ कहेउ मृदु बानी, नापेहु कूपहि केतना पानी.
सब पूजहि स्कैमहि देवा, बिनु पूजा न करहि कलेवा.
जेह बिधि होइ कुटुंब कल्याना, तंत्र, मन्त्र सब बिधि कर नाना.
बाजा बाजेहि बिबिधि बिधाना, सुनि सब चमचे गावहि गाना.
हरषित हृदय लिए महतारी, बिटिया संग जमाइ पुकारी.
सब बिधि होइ प्रसन्न सब नेता, देखि सबइ जुबराज प्रणेता.
रहि रहि होइ प्रसन्न सब भांती, सेवक मिलिहि बनावहिं पांती.
चमचे सब पूजत जुबराजा, उनको कहाँ अउर कछु काजा.
दरस लिए बेनी सलमाना, श्रीप्रकाश दिग्गी सह नाना.
हाथ जोडि दिग्गी तब बोले, मुख पे शबद शबद सब तोले.
कोहु नृप होहि हमहि का हानी, सूखा पड़इ कि बरसइ पानी.
जानत सभै सुभाऊ हमारा, राहुल ही हैं मोर करतारा.
वे प्रसन्न जबतक हे माई, जीयत करबि ताहि सेवकाई.
आग्रह मोर बस एक बिशेषा, यूपी ठहरौ कुटुंब प्रदेशा.
बाईस बरस भये करतारा, यूपी में नहिं राज हमारा.
उधर मुलायम माया नाचे, पुनि पुनि आपन नीयम बांचे.
मातु दीन्हि जदि मोहि अधिकारा, जाऊं यूपी लइ लस्कारा.
हायर करेहु साथ 'लिंटासा', जौ से बढौ विजय को आशा.
राजपाट यूपी में लाऊँ, राहुल जस जिनगी भरि गाऊं.
मोर मने उपजहु एहि चित्रा, मैं कलियुग को विश्वामित्रा.
दिग्गी बचन हृदय अति तारी, मगन हुई सुनि के महतारी.
हामी भरेहु साथ परधाना, ताहि संग चमचे सब नाना.
आज्ञा आज तोहि मैं दीन्हा, सकल उपाय विजय को कीन्हा.
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