बवाल काटने के दिन हैं. जिसको जब इच्छा हो वह बवाल काट सकता है. उधर पैंसठ सांसदों ने अमेरिकी राष्ट्रपति को चिट्ठी लिखकर नरेन्द्र मोदी को वीजा न देने का बवाल उठाया. बवाल उठा तो उन्हें पता चला कि लोग मीर जाफर और जयचंद को याद करने लगे. ऐसे में जरूरी था कि कुछ ऐसा कहा जाय जिससे लोग किसी और को याद करने लगें. इसी प्रयास के तहत राज बब्बर, रशीद मसूद और फारुख अब्दुल्ला ने क्रमशः १२ रूपये, ५ रूपये और १ रूपये में लोगों को खाने की थाली परोस दी. नया बवाल खड़ा हुआ. लोगों ने जयचंद वगैरह को भुलाकर फ्रांस की रानी साहिबा मारिया एंटोनिया को याद करना शुरू कर दिया. कुछ न्यूज़ चैनल्स की चाँदी और कुछ का सोना हो गया.
ऐसे में हमारे ब्लॉग संवाददाता चंदू चौरसिया ने इस मुद्दे पर तमाम लोगों के विचार इकठ्ठा किये. पेश है उन्ही विचारों से कुछ चुने हुए विचार. आप बांचिये.
लालू जी; "का मिलता है पाँच रुपिया में? ई देश के बुरबक बना रहा है लोग. आ ऊ बोल दिया अउर तुमलोग भी उसको लेकर बतियाने लगा. आज का ज़माना में मंहगाई जइसा बढ़ा है, पाँच रुपिया में त गाय का एक बखत का चारा नै मिलेगा आ ई लोग आदमी का चारा … कहने का मतलब आदमी का खाना का बात कर रहा है सब? सरकार अपना तरफ से कुछ देगा तब न मिलेगा जी? बाकी हमारा सरकार आया त हम दू रुपिया में खाना देंगे पब्लिक सब को. गरीब-गुरबा, माइनोरिटी भाई लोग के, वोमेन चिल्ड्रेन एंड भीकर सेक्शन आफ़ द सोसाइटी को खाली हमारा सरकार जो है सो दू रुपिया में खाना देगी …. अरे बीच में मत टोको … आ इधर देखो इधर … ई केतना अंगुली दिखाई दे रहा है? है न दू गो? त हमको कांग्रेस का नेता सब पर शक है बाकी हमारा सरकार एही दू रुपिया में पेटभर के खान देगा …. "
अमिताभ बच्चन; "देखिये हम नेता नहीं हैं. हम ठहरे अभिनेता. लोग बारह रुपया में खाना क्यों खाना चाहते हैं जब वे कौन बनेगा करोड़पति पर आकर पाँच करोड़ जीत सकते हैं? तो फिर फ़ोन उठाइये … और चंदू जी, आप भी पांच करोड़ जीत सकते हैं. क्योंकि बारह रूपये या पाँच रूपये में भोजन मिले या न मिले, लेकिन आपका ज्ञान जो है बस वही आपको ढंग का भोजन खिला सकता है. वैसे इस बारह रूपये वाले बयान पर मुझे पूजनीय बाबूजी की मधुशाला की एक रुबाई याद आ रही है. उन्होंने लिखा था;
बारह रुपये रख पॉकेट में निकला है खानेवाला
पस्त हो गया, नहीं मिला उसको फिर भी भोजन आला
बारह घंटे बीत चुके हैं, भूख गई, अब प्यास गई
इन रुपयों को खर्च करेगा अब जाकर वह मधुशाला
मुलायम सिंह जी; "अखियेश से जो है हमयें पूछा कि किसी अफसअ से पता लगाकअ बताएं कि बाअह में खाआं मिअ सकता ऐ? अखियेश एं बताआ कि नई मिएगा. राअ बब्बअ जब समाअवादी पाअटी में थे तो केवअ अमअ सिंअं जी के खिआफ़ बोअते थे कांगेस में गए ऐं तो पब्बइक के खिआफ बोअ अहे ऐं. केंद सअकाअ के लोग जनता से कट गए ऐं. ऐसा कएंगे तो संपदाइक शक्तिओं को बहावा मिएगा. हमाआ समअथन इस सअकाअ को सांपदाइक शक्तिओं को ओकने के लिए अहेगा "
भाग मिल्खा भाग वाले मिल्खा सिंह जी; "हम अभी बात नहीं कर सकते. हमसे हमारे डायरेक्टर राकेश ओमप्रकाश मेहरा जी ने कहा कि भाग मिल्खा भाग और जाकर देख कि कहाँ बारह रूपये में भोजन मिल रहा है? उन्होंने मुझे चार रूपये पानी के लिए एक्स्ट्रा दिए और अब हम सोलह रूपये लेकर पूरे इंडिया में भाग रहे हैं. यह जानने के लिए इन रुपयों में कहाँ भोजन और पानी मिलेगा? मैंने इसीलिए जर्सी भी सोलह नंबर की पहन रखी है और जर्सी पर लिखा इंडिया यह बता रहा है कि हमें वह जगह पूरे इंडिया में भागकर देखना है. परसों मिलोगे तब हम बता पाएंगे कि वह ढाबा मिला या नहीं."
बरखा दत्त जी ; "टू से दैट वन कैन गेट अ मील फॉर ट्वेल्व रुपीज वाज सर्टेनली ऐन एरर ऑफ़ जजमेंट ह्विच राज बब्बर डिड नॉट रियेलाइज. हाउएवर आई ऐम स्योर दिस इज नॉट ऐन ऑफिसियल स्टैंड ऑफ़ द कांग्रेस पार्टी एंड वी गिव इट अ बेनिफिट ऑफ़ डाऊट हीयर "
मिथुन दा; "राज बब्बर के बयान पर मैं कहूँगा; क्या बात! क्या बात! क्या बात!
संजय झा; "मैं राज बब्बर के बयान पर कुछ नहीं कहना चाहूँगा. जरूर उनका कोई फेवरिट रेस्टोरेंट होगा जिसमें बारह रूपये में खाना मिलता होगा. वे झूठ नहीं बोल सकते. वे तो क्या कोई कांग्रेसी कभी झूठ नहीं बोलता. हाँ, मैं रशीद मसूद के बयान पर जरूर कहूँगा कि बारह रूपये में खाना मिले या न मिले पाँच रूपये में खाना पक्का मिलेगा क्योंकि पंजे में पाँच अंगुलियाँ होती हैं. आप तो देख ही रहे हैं कि मेरे पीछे मेरी पार्टी का हाथ है. वैसे मैं यहाँ आपको डेल कार्नेगी का एक प्रसिद्द कोट बताना चाहूँगा. डेल ने कहा था ; हैपीनेस डजन्ट डिपेंड ऑन एनी एक्सटर्नल कंडीशंस. इट इज गवर्रन्ड बाई आवर मेंटल ऐटीच्यूड. डेल और मेरे कहने का मतलब है कि खुश होने के लिए खाने की क्या जरूरत है? अगर आप आप अपने मन में सोच लें कि आपने खाना खा लिया है तो फिर आपको पाँच रूपये खर्च करने की जरूरत नहीं. अब जो लोग यह रहस्य समझ जायेंगे उन्हें किसी भोजन से क्या लेना-देना?"
नितीश कुमार जी; "आ पाँच रुपया वाला आदमी त स्पेशल स्टेटस का हकदार हो जाता है. आप हमारे बिहार को ही ले लें. हमारे इहाँ त बिना पइसा के ही मिड डे मील मिलता है. त जब बिना खर्च किये ही भोजन मिल रहा है त ई पाँच रुपया या बारह रुपया पर बहस जो है ऊ बेमानी है. और देखने वाली बात यह है कि ये सब बात बोल कौन है? तीनो लीडर सेक्युलर हैं. आ सेक्युलर कभी गलत बोल ही नहीं सकता."
रॉबर्ट वाड्रा ; "इफ यू हैव प्रॉपर चैनल, यू कैन बाई टू बनानाज फॉर फ़ाइव रुपीज. एंड ह्वाट वुड बी बेटर फ़ूड दैन बनाना इन अ बनाना रिपब्लिक? रशीद मसूद इज राईट."
राहुल गाँधी; "यूथ कांग्रेस ने मुझे बताया है कि बारह रूपये में चार किलो आलू मिलता है. और क्या चाहिए आपको? चार किलो आलू आप चार दिन तक खा कर भी ख़तम नहीं कर सकते. मुझे तो लगता है कि राज बब्बर ने जो कुछ भी कहा है वह सही कहा है. और अब हम डायरेक्ट आलू ट्रान्सफर प्रोग्राम ला रहे हैं. जिसके पास भी आधार कार्ड है उसके आलू अकाउंट में रोज सुबह चार किलो आलू डायरेक्टली ट्रान्सफर हो जायेगा. इससे यह होगा कि जिसका आलू है वह उसके पास पहुंचेगा और बिचौलिये उसमें से कुछ भी नहीं ले सकेंगे. अभी परसों मैंने पार्टी प्रवक्ताओं को बताया कि अगर यह डायरेक्ट आलू ट्रान्सफर प्रोग्राम सक्सेसफुली लागू कर लेते हैं तो अगला तीन चुनाव जीत सकते हैं."
चन्दन मित्रा; "राज बब्बर का यह बयान भारत के गरीबों का अपमान है. बीजेपी २०१४ में चुनाव जीत जाएगी तो हमलोग उनको मिला हर अवार्ड वापस ले लेंगे."
अडवाणी जी; "देखें इतने महत्वपूर्ण मुद्दे पर मैं कुछ कह नहीं सकता. इसपर कल मैं एक ब्लॉग पोस्ट लिखूंगा. आप मेरे विचार वहीँ से ले लीजियेगा."
योगेन्द्र यादव; "मैं हमेशा से कार्टूनों के द्वारा फ्री स्पीच का हिमायती रहा हूँ. जिन्होंने जो बयान दिया है वह देने का उनका अधिकार उनसे कोई छीन नहीं सकता. जहाँ तक मेरी पार्टी के स्टैंड का सवाल है तो मैं यही कहना चाहूँगा कि बारह रूपये में एक फ्रूटी भी नहीं आती जिसे पीकर हमारे नेता अरविन्द केजरीवाल अनशन तोड़ सकें. अब आ जाते हैं इन बयानों से होने वाले फायदे और नुक्सान पर. मेरा मानना है कि आनेवाले विधानसभा चुनावों में इन बयानों का असर साफ़ दिखाई देगा. राज बब्बर के बारह रूपये वाले बयान से निश्चित तौर पर कांग्रेस को यादवों और कुर्मियों के वोट कम मिलेंगे. राजपूत वोट की जहाँ तक बात है वह बंटने के आसार हैं. अगर राज बब्बर ने पाँच रुपया कहा होता तो कांग्रेस को ब्राह्मणों का वोट मिलता क्योंकि ब्राह्मण पांच की संख्या को शुभ मानते हैं. जहाँ तक दलितों का सवाल है तो मुझे लगता है कि दलित मायावती को ही वोट देंगे."
दिग्विजय सिंह; "हिंदुस्तान के कोने-कोने से लोगों ने मुझे फोन करके बताया कि बारह रूपये में बहुत अच्छा भोजन मिलता है. अगर कहीं न मिलता हो तो समझ जाइये कि उस जगह पर आरएसएस वालों ने साजिश के तहत खाने को मंहगा कर दिया होगा. जैसे मैं बटला हाउस पर अपने बयान पर कायम हूँ वैसे ही राज बब्बर के बयां पर भी कायम हूँ."
मायावती जी; "राज बब्बर का बयान दलितों के खिलाफ है. बारह रूपये में खाने की जहाँ तक बात है तो वह कहीं नहीं मिलेगा. ये देखिये मेरे हार तक में एक भी नोट दस रूपये का नहीं है. सारे हज़ार के नोट हैं. इसलिए मुझे लगता है कि खाना हज़ार रूपये में ही मिल सकता है."
अरनब गोस्वामी; "तमाम रिकार्ड्स, रेट-चार्ट, एक्सपर्ट्स ओपिनियन, बयान पढने के बाद और हमारी पोलिटिकल एडिटर नाबिका से सलाह लेने के बाद अदालत इस नतीजे पर पहुंची है कि बीजेपी भी इन बयानों के लिए उतनी ही जिम्मेदार है जितना कांग्रेस के नेता राज बब्बर, रशीद मसूद और फारुख अब्दुल्ला हैं. अदालत पोलिटिकल पार्टीज को यह सलाह भी देती है कि इन मुद्दों को पोलिटिसाइज न किया जाय और न ही अदालत ऐसा होने देगी. और चूंकि आज न्यूज़-आवर पर राज बब्बर नहीं आये और बिकॉज नेशन वांट्स टू नो द ट्रुथ, हम इस मुद्दे पर तबतक न्यूज-आवर करते रहेंगे जबतक कोई और मुद्दा ……"
Friday, July 26, 2013
आइये बवाल काटें
Wednesday, June 26, 2013
भारतीय राजनीति का शेरकाल
नेताजी जी गठबंधन टूटने की ब्रेकिंग न्यूज दान में देते हुए पत्रकारों से बोले; "ऊ लोग त दवा देते मरने की, आ दुआ देते हैं जीने की।"
पत्रकार लोग उन्हें लगातार देखे जा रहे थे। शायद इस आशा के साथ की वे शेर की दूसरी लाइन भी बोलेंगे जो शायद "टीने की" या फिर "पीने की" पर आ रुके। खैर, ऐसा हुआ नहीं और पत्रकार लोग निराश हो गए। कईयों ने अपनी रपट में लिखा तो नहीं लेकिन मन ही मन जरूर सोचा होगा कि कैसा नेता है जो शेर भी पूरा नहीं करता? जो नेता पत्रकारों के सामने शेर पूरा नहीं कर सकता वह जनता को किया गया वादा कैसे निभाएगा? जो पत्रकारों का नहीं हुआ वह जनता का क्या होगा? अगर यही हाल रहा तो न ही पालिटिक्स मजबूत रहेगी और न ही सेकुलरिज्म। क्या होगा इस देश का? आखिर आज पॉलिटिक्स में शेर के अलावा बचा ही क्या है जिसे थाम के रक्खेगा ये नेता?
वैसे देखा जाय तो इसमें पत्रकारों की भी क्या गलती है? नेता कहीं भी जाता है तो शेर से लैस होकर जाता है। पार्लियामेंट में बजट पढ़ रहा है तो टैक्स का प्रपोजल देते हुए शेर दे मारता है। टैक्स रिबेट अबोलिस कर रहा है उसपर भी शेर बक डालता है। नया गठबंधन बना रहा होता है तो उसके जस्टिफिकेशन के सवाल को शेर मारकर धरासाई कर डालता है। किसी दूसरे नेता की प्रशंसा करना चाहता है तो उसपर शेर कुर्बान कर देता है। किसी नेता की बुराई करनी हो तब भी एक शेर पिला देता है। संसद में घोटाले की बात होती है तो उसका जवाब शेर से देता है। स्कैम पर शेर, कैम पर शेर।
उधर विपक्ष का नेता भी शेर का जवाब देने के लिए शेर ठोंक देता है। प्रेस कांफ्रेंस की शुरुआत शेर से करता है। प्रेस कांफ्रेंस के बीच में शेर भर देता है। प्रेस कांफ्रेंस का अंत शेर से कर देता है। पिछले कई वर्षों से शेर ही भारतीय नेताओं का कवच-कुंडल बना हुआ है।
कुल मिलकर कहा जा सकता है कि फिलहाल भारतीय राजनीति का शेरकाल चल रहा है।
कई बार सोचता हूँ कि मंत्री जी संसद में प्रश्नकाल के लिए तैयारी करते हुए अपने पीए से बोलते होंगे; "अरे भाई, आज संसद में सड़क घोटाले पर प्रश्न का जवाब देना है। आंकड़ों के साथ शेर वाले पेज रक्खे या नहीं?"
पीए बोलेगा; "सर, मैंने ग़ालिब के तीन शेर चुने थे। आप उन्हें देख लेते तो ठीक रहता। अगर आपको पसंद न हों तो फिर मीर के शेर चुनकर रख देता। मैं मीर का दीवान साथ ही लाया हूँ। कोई टेंशन की बात नहीं है, बस मुझे पंद्रह मिनट लगेंगे।"
पीए की बात सुनकर मंत्री जी कहेंगे; "अरे, ये मीर और ग़ालिब के शेर समझने में मुश्किल होती है। ऐसा शेर दो जो मुझे भी समझ में आये और विपक्षी सांसद को भी।"
पीए बोलेगा; "सर, फिर तो मेरा सुझाव है कि बशीर बद्र साहब के शेर इसके लिए उपयुक्त रहेंगे। उनका लिखा समझ में आ जाता है। अपने शेर सलाहकार राशिद साहब भी यही कह रहे थे।"
मंत्री जी हाँ कर देंगे और पीए नए शेर चुनने निकल जाएगा। यह हिदायत देते हुए कि; "सर, आप पिछले दो प्रश्नकाल के दौरान "मैं तो दरिया हूँ मुझे अपना हुनर मालूम है, जिस तरफ से चल पडूँगा रास्ता हो जायेगा" कह चुके है। इसलिए इसको इसबार मत कहियेगा क्योंकि अमर सिंह ये दो लाइनें इतनी बार बोल चुके हैं कि कुछ लोग समझते हैं कि ये उन्ही का शेर है।"
हाल यह है कि प्रधानमंत्री, मंत्री और सांसद ही नहीं, राजनीतिक दलों के प्रवक्ता भी जब-तब शेर ठेलते रहते हैं। कोई सी एम पार्टी अध्यक्ष से नाराज है या नहीं इसका जवाब शेर से देते हैं। सी एम के ऊपर अध्यक्ष का हाथ है या नहीं, इस सवाल का जवाब भी शेर में ही दिया जाता है। पार्टी के भीष्मपितामह कोप भवन में हैं या शरशैय्या पर, यह बताने के लिए शेर का इस्तेमाल किया जाता है। और सी एम को अमेरिकी वीजा की जरूरत है या नहीं यह बताने के लिए भी शेर ही ठोंका जाता है। मुझे तो लगता है की पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में कुछ इस तरह की बातें होती होंगी;
अध्यक्ष; "देखिये, उनको प्रवक्ता बनाने के आपके प्रस्ताव से मैं सहमत हूँ लेकिन मेरे लिए यह जानना जरूरी है कि उनका शायरी और गजलों का ज्ञान कैसा है?"
महासचिव; "अध्यक्ष जी, उनका शायरी और ग़ज़लों का ज्ञान कमाल का है। अभी हाल ही में एक टीवी पैनल डिस्कशन में उन्होंने विपक्षी प्रवक्ता को ऐसे-ऐसे शेर खींच कर मारे कि मैं भी हथप्रभ रह गया। यह सोचते हुए कि ये बिजनेसमैन होते हुए भी इतना टाइम कब निकाल पाए कि ऐसे-ऐसे शेर याद कर लिया? माने इनकी शेरो शायरी का टैलेंट देखकर एंकर की भी बोलती बंद हो गई थी।"
अध्यक्ष; "फिर तो ये कमाल के प्रवक्ता साबित होंगे। आखिर एक प्रवक्ता को और किस चीज का ज्ञान चाहिए? ग़ज़लों और शेरो का ज्ञान ही सबसे उत्तम ज्ञान है।"
अध्यक्ष जी उनको पार्टी प्रवक्ता बना देंगे।
हालात ऐसे हैं कि आनेवाले समय में पार्टियों की प्राइमरी मेम्बरशिप देते हुए पार्टी की सारी कवायद इसबात पर टिकी होगी कि मेंबर का कविताओं और ग़ज़लों का ज्ञान कैसा है? इस ज्ञान को जांचने परखने के लिए पार्टियाँ समय-समय पर ग़ज़ल ऑडिशन करवाएंगी। उसके लिए पार्टी के मेंबर दिनों तक ग़ज़लों और कविताओं की किताबें रटेंगे। हर मौके के लिए चुनचुन कर शेर नोट करेंगे और रात-रात भर उन्हें याद करेंगे ताकि पार्टी नेताओं को खुश किया जा सके। उधर नेता खुश हुआ और इधर मेंबर का प्रवक्ता बनना तय।
पार्टियाँ अपने-अपने कार्यालय में नए-नए शायर रिक्रूट करेंगी ताकि जिन सदस्यों को मीर, ग़ालिब, जौक वगैरह के शेर समझ में नहीं आते उन्हें उनका मतलब समझाया जा सके। मंत्री, सांसद और महासचिवों के लिए कम्पलसरी हो जायेगा कि सीनियोरिटी को ध्यान में रखते हुए वे जब भी कोट करें किसी बड़े शायर के शेर ही कोट करें। अगर भूल से भी वे कम मशहूर शायरों के शेर कहें तो उन्हें अगली कार्यकारिणी में वार्निंग दे दी जाएगी कि अगर वे दूसरी बार ऐसा करेंगे तो अप्रेजल के समय इसबात को ध्यान में रखते हुए उन्हें डिमोट भी किया जा सकता है। वहीँ अगर छोटा नेता बड़े शायरों के शेर कोट करेगा तो चाहे वे शेर उसकी समझ कें आये या न आये, उसके इस कृत्य को अप्रेजल के समय ध्यान में रखा जाएगा और अगर उसके ग्रहों का संयोग ठीक रहा तो उसे प्रमोशन भी दिया जायेगा।
अगर कोई प्रवक्ता या नेता प्रेस कांफ्रेंस में या टीवी पैनल डिस्कशन में शेर को गलत ढंग से पढ़ेगा तो पार्टी उपाध्यक्ष को अधिकार रहेगा की वह उस प्रवक्ता या नेता को मेमो इश्यू करे और उससे जबाब-तलब करे। बड़े मजेदार दृश्य दिखाई देंगे। जैसे;
उपाध्यक्ष; "ये क्या सुन रहा हूँ मैं? कल आपने प्रेस कांफ्रेंस में शेर पढ़ते हुए गलती कर दी?"
प्रवक्ता; "वो क्या था कि गलती हो गई।"
उपाध्यक्ष; "इस तरह की गलती की अपेक्षा आपसे नहीं थी मुझे। आपको पता है कि पूरा मीडिया हंसी उड़ा रहा है। आपकी भी और पार्टी की भी।"
प्रवक्ता; "दरअसल वो शेर पढने से पहले पत्रकार ने कोल स्कैम की बाबत सवाल पूछा और उसमें कानूनमंत्री को दोषी साबित करने की कोशिश की, इसलिए मुझे गुस्सा आ गया। आप तो जानते ही हैं कि विज्ञान ने भी साबित कर दिया है कि गुस्से में मनुष्य का दिमागी संतुलन खराब हो जाता है। इसलिए मैं शेर पढ़ते हुए गलती कर बैठा।"
उपाध्यक्ष; "देखिये बहाने मत बनाइये। शेर कहना एक कला है। जब मैं कला की बात कर रहा हूँ तो आप विज्ञान की बातें कर के मुझे बहकाने की कोशिश न करें।"
प्रवक्ता; "मैं आपके सामने ऐसी धृष्टता कदापि नहीं कर सकता।"
उपाध्यक्ष; "पहले तो आप ऐसे शब्द न बोलें जो मुझे समझ में न आयें। और सबकुछ छोड़कर पहले मुझे धृष्टता और कदापि का मतलब समझाइये। वैसे आपसे गलती क्या हुई थी?"
प्रवक्ता; "वो दरअसल हुआ ऐसा कि माना कि तेरी दीद के काबिल नहीं हूँ मैं की जगह मैं माना कि तेरी ईद के काबिल नहीं हूँ मैं पढ़ गया।"
उपाध्यक्ष; "अरे तो यह तो छोटी से गलती थी। इसको आप संभाल नहीं पाए?"
प्रवक्ता; "मैंने कोशिश की थी कि ईद की बात करके इसे सेकुलरता का मोड़ दे दूँ लेकिन आप तो जानते ही हैं कि कई पत्रकार आजकल विरोधी पार्टी की तरफ से भी काम करने लगे हैं।"
उपाध्यक्ष प्रवक्ता को मेमो इश्यूं कर देगा जिसमें लिखा होगा; "आप मुझे एक सप्ताह के अन्दर जवाब दें कि प्रेस कांफ्रेंस में शेर को गलत ढंग से बोलने के लिए आपको सस्पेंड क्यों न किया जाय? जबतक आप जवाब नहीं देते, आपकी जगह माखनलाल जी पार्टी प्रवक्ता का काम करेंगे।"
कुल मिलाकर पूरी भारतीय राजनीति शेर-ओ-शायरी प्रधान होगी।
मोहल्ले के वे शायर जिन्हें मुशायरों में कोई नहीं सुनता और जिनके माँ-बाप उन्हें उठते-बैठते शायर बनने के नुकशान गिनाते रहते हैं वे राजनीतिक पार्टियों द्वारा रिक्रूट कर लिए जायेंगे। जाहिल जौनपुरी, नवाब आसनशोला और कट्टा कानपुरी को रोजगार मिल जाएगा। उन्हें सफल होने के लिए मोहल्ले के लोकल मुशायरों का मुंह नहीं ताकना पड़ेगा। अमेरिकी प्रेसिडेंशियल एलेक्शन में होने वाले डिबेट की तर्ज पर राजनीतिक पार्टियाँ शेर डिबेट करवाएंगी। पूरा भारत तुकबंदी की गिरफ्त में आ जायेगा।
लोकतंत्र को मजबूत करने का एक और रास्ता मिल जाएगा।
इस मौके पर आपको कट्टा कानपुरी के एक शेर के साथ छोड़ जाता हूँ। वे लिखते हैं;
जो चाहो कर बैठो स्कैम या घोटाला
क्यों डरना जब साथ है ये शेर-ओ-शायरी।
--कट्टा कानपुरी
Monday, June 17, 2013
नितीश कुमार जी की ट्विटर टाइमलाइन - Nitish Kumar's Twitter Timeline
ममता बनर्जी की ट्विटर टाइमलाइन।
राष्ट्रपति चुनाव बमचक पर एक ट्विटर टाइमलाइन।
अरविन्द केजरीवाल की ट्विटर टाइमलाइन।
राहुल गांधी जी की पहली ट्विटर टाइमलाइन

