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Wednesday, November 13, 2013

चंदू इन एक्सक्लूसिव चैट विद सचिन'स बैट




सचिन रिटायर हो रहे हैं. मुम्बई में होनेवाले टेस्ट मैच के बाद क्रिकेट नहीं खेलेंगे. मीडिया के कार्यक्रमों को देखकर लग रहा है जैसे किसी ने उनसे कह दिया है कि; "बस सात दिन, सचिन के क्रिकेटीय जीवन के सात दिन हैं तुम्हारे पास. जो लिख सकते हो लिख दो. जो कह सकते हो कह दो. जो दिखा सकते हो दिखा दो. प्राइम टाइम, लंच टाइम, टी टाइम, हर टाइम सचिन के नाम लिख दो. पिछले बीस वर्षों से जो भी दिखाते आये हो, फिर से आख़िरी बार के लिए दिखा डालो"

सब लगे हुए हैं. कोलकाता टेस्ट के ख़त्म हो जाने के बाद चंदू ने मुझसे कहा; "सब सचिन का इंटरव्यू ले रहे हैं, आप कहें तो मैं भी ले लूँ."

मैंने कहा; "बिल्कुल ले लो. सचिन के रिटायरमेंटी यज्ञ में ब्लॉगरीय हवन हो जायेगा."

वो गया. शाम को वापस आया तो मुंह लटका हुआ था. मैंने पूछा; "क्या हुआ? मुंह लटकाये खड़े हो?"

वो बोला; "लोगों ने सचिन को पुरस्कार लेने के लिए, फ़ोटो सेशन के लिए, डिनर के लिए और न जाने क्या-क्या के लिए बिजी कर दिया. उनका इंटरव्यू मिला ही नहीं."

मैंने पूछा; "फिर?"

वो बोला;"फिर क्या? ड्रेसिंग रूम के एक कोने में उनका बैट पड़ा था. मैंने कहा इसी का इंटरव्यू ले लिया जाय. वैसे भी उनके ड्राइवर, पड़ोसी, सास, बचपन के दोस्त वगैरह टीवी वालों को इंटरव्यू देंगे कि किसी ब्लॉग पत्रकार को? अब लीजिये यही छाप दीजिये. वैसे भी आपने बहुत दिनों से ब्लॉग पर कोई इंटरव्यू नहीं छापा."

तो पेश हैं सचिन के बैट का इंटरव्यू. बांचिये.

चंदू : नमस्कार बैट जी. स्वागत है आपका इस इंटरव्यू में.

बैट : आदाब चंदू भाई. आपका शुक्रिया कि आपने मुझे इस इंटरव्यू में मधो किया. कोई मुझे मुँह नहीं लगाता लेकिन आपने मुझे जो इज्जत दी है उसके लिए मैं आपका मशकूर हूँ."

चंदू : अरे आप तो उर्दू भी जानते हैं!

बैट : कैसे नहीं जानेंगे जनाब? मेरी पैदाइश कश्मीर की है. वैसे अगर आपको उर्दू के शब्द अटपटे लग रहे हों तो मैं हिंदुस्तानी जबान में इंटरव्यू दे लूँगा.

चंदू : शुक्रिया शुक्रिया. मेरा पहला सवाल है कि आपको कैसा लग रहा है?

बैट : आप क्या पहले टीवी पत्रकारिता में थे चंदू जी?

चंदू : अरे आपको कैसे पता?

बैट : यह घटिया सवाल तो टीवी वाले पूछते थे. आप तो बोले कि आप ब्लॉग पत्रकार हैं.

चंदू : अरे ऐसा नहीं है. वैसे मेरा अगला सवाल यह है कि चौबीस साल तक सचिन के साथ रहने के बाद अब आप भी रिटायर होने वाले हैं ऐसे में कैसा महसूस कर रहे हैं?

बैट : वैसा ही जैसा सचिन महसूस कर रहे हैं. अब मैं भी घरवालों के लिए समय दे सकूँगा। बेटे की शिकायत रहती थी कि पापा पैरेंट्स डे पर भी स्कूल नहीं गए कभी. अब उसके स्कूल जा सकूँगा. उसे एक सफल बैट बनने के गुर सिखा सकूँगा। लगातार इतने सालों तक गेंदो से लड़ा. अब थोडा आराम करूँगा.

चंदू : हाँ, आपने गेंदों से बहुत लड़ाई की. वैसे ये बताइये कि आपको क्या पहले से ही पता था कि आप सचिन के बैट बनेंगे?

बैट : यह अच्छा सवाल किया आपने. देखिये मैं जिस पेड़ से निकला शायद उसको पता था. बड़ी इंटरेस्टिंग स्टोरी है. कहते हैं कि जब वह छोटा था तो एकबार जंगल का एक ठेकेदार उसको काटने आया. उसने ठेकेदार से विनती करते हुए कहा मुझे इतनी कच्ची उम्र में मत काटो. मुझे भगवान के लिए छोड़ दो. और देखिये कि ठेकेदार ने उसे सचमुच भगवान के लिए ही छोड़ दिया. मेरा जनम उसी पेड़ से हुआ.

चंदू : अच्छा ये बताइये कि किस बॉलर का बाल ठोंकने में आपको खूब आनंद आता था.

बैट : चंदू जी, ये किस तरह का अश्लील सवाल कर रहे हैं आप?

चंदू : अरे बैट जी, मेरा मतलब वो नहीं था जो आप समझ रहे हैं.

बैट : नहीं, आपको सवाल पूछने से पहले याद रखना चाहिए कि आप सचिन तेंदुलकर के बैट से सवाल पूछ रहे हैं, हरभजन सिंह के बैट से नहीं. वैसे मैं आपका आशय समझ गया मैं और आपको बताऊँ कि मुझे शेन वार्न और मैग्रा का बाल पीटने में खूब मजा आता था. यू कैन से आई हैड बाल ऑफ़ अ टाइम हिटिंग वार्न एंड मैग्रा.

चंदू : और किस बॉलर के बॉल से आपको खीज होती थी?

बैट : शोएब अख्तर के बॉल से. वो इतनी दूर से दौड़ के आता था कि बॉल फेंकने से पहले जो इंतज़ार करना पड़ता था उससे मैं बोर हो जाता था.

चंदू : अच्छा ये बताएं कि आपने तो दुनियाँ भर घूम के बॉल की पिटाई की है. कौन सा शहर आपको सबसे अच्छा लगा?

बैट : सिडनी. सिडनी मुझे सबसे अच्छा लगता था. वैसे चेन्नई भी काफी अच्छा लगा मुझे.

चंदू : अच्छा ये बताइये कि चौबीस सालों में आपकी बात ड्रेसिंग रूम में और भारतीय खिलाड़ियों के बैट से होती रही होगी. किस खिलाडी के बैट से आपकी नहीं बनती थी?

बैट : अज़हरुद्दीन के बैट से. वो हमेशा हल्का रहा और जब भी बात करता, मुझे मोटू कहकर चिढ़ाता था. कहता था वेट कम कर मोटू अपना वेट कम कर मोटू अपना. बहुत चिढ़ाया उसने मुझे. फिर एक दिन मैंने दो टूक सुना दिया तब जाकर बंद हुआ.

चंदू : क्या कहा आपने उससे?

बैट : मैंने उससे कहा कि मैं वजनदार खिलाडी का बैट हूँ बे इसलिए वजनदार हूँ तू हलके खिलाडी का बैट है इसलिए हल्का है.

चंदू : और किस खिलाडी के बैट से आपकी खूब जमती थी?

बैट : धोनी के बैट से. वो भी वजनी और मैं भी वजनी. इसलिए दोनों में खूब बनती थी.

चंदू : अच्छा ये बताएं कि आपको क्या ऐसा भी लगता था कि आप का मैदान में जाना निरर्थक रहा?

बैट : हाँ, जब भी सचिन बॉल को पैड से खेलते थे तो मेरे मन में आता था कि मेरा जीवन किस काम का जब पैड से ही खेलना है तो?

चंदू: अच्छा ये बताएं कि आपको कौन सा शॉट लगाने में सबसे ज्यादा मज़ा आता था?

बैट : स्ट्रेट ड्राइव. जब वे स्ट्रेट ड्राइव लगाते थे तो मैं बॉल के साथ खुल के मिलता था. लगता था जैसे बॉल से गले मिल रहे हैं. आप खुद ही सोचिये कि खुल के गले मिलने में जो मज़ा है वह हाथ जोड़ के मिलने में कहाँ मिलेगा? हाँ जब वे डिफेंसिव शॉट खेलते थे तो मुझे लगता था जैसे मैं बॉल से हाथ जोड़ के मिलना पड़ रहा है. और बॉल से हाथ जोड़ के मिलना मुझे बिलकुल पसंद नहीं था.

चंदू : अच्छा ऐसा भी कोई शॉट था जिसकी वजह से आपको तकलीफ होती थी?

बैट : पैडल-स्वीप, वे जब पैडल-स्वीप मारते थे तो कई बार मुझे ज़मीन से घिसटना पड़ता था. फिर भी ये सोच के घिसट लेता था कि कोई बात नहीं इसबार घिसट ले. अगली बार बॉल से खुल के मिलेंगे.

चंदू : अच्छा बैट जी, ये बताइये कि सचिन की कोई आदत जिससे आपको कोफ़्त होती थी?

बैट : हाँ जब ओवर के दौरान वे मुझी पटक पटक कर क्रीज समतल बनाते थे तब थोड़ी कोफ़्त होती थी. वैसे मुझे गुस्सा उनके ऊपर नहीं आता था, मुझे पिच क्यूरेटर के ऊपर गुस्सा आता था. मुझे लगता था कि पिच क्यूरेटर ने अपनी ड्यूटी सही तरह से क्यों नहीं की?

चंदू : और कभी किसी बात के लिए आपको बुरा लगता था?

बैट : हाँ लगता था न. जब कमेंटेटर लोग सचिन के बॉटम ग्रिप की बात करते थे. मुझे लगता था कैसी अश्लील बातें कर रहे हैं ये लोग? बॉटम ग्रिप। छि.

चंदू : हा हा हा. अच्छा और कोई मौका जब आपको कुछ अच्छा नहीं लगा हो?

बैट : हाँ ऐसे कई मौके आये. जैसे टेस्ट मैच के पहले वाली रात वे होटल रूम में बॉल लटका कर प्रैक्टिस करते थे तो मुझे अच्छा नहीं लगता था. अरे कल सुबह टेस्ट मैच है और रात भर बैट को सोने नहीं दोगे तो वह सुबह जाकर कैसे परफॉर्म करेगा?

चंदू : अच्छा कोई ऐसी इनिंग जब उसके दौरान आपको कष्ट हुआ हो?

बैट : कष्ट कभी नहीं हुआ मुझे. मैं सचिन का बैट था, किसी आम खिलाडी का नहीं. हाँ वैसे आपने पूछ ही लिया है तो बता दूँ कि शारजाह वाली इनिंग में जब आंधी आ गई थी तब सचिन ने मुझे पिच पर लिटा दिया था और मेरी आँख में रेत घुस गई थी. मैंने उनको बताया तो बोले कि नाराज मत हो, अभी होटल चलेंगे तो तुझे नहला देंगे और सब ठीक हो जाएगा.

चंदू : और कोई यादगार दिलचस्प बात जो आपको हमेशा याद रहेगी?

बैट : एक-दो नहीं, बहुत सी बातें हैं. वैसे एक बात बड़ी हंसने वाली बताता हूँ आपको. जब उनको टेनिस एल्बो हुआ तो मैंने उनसे कहा कि आप क्रिकेट के इतने बड़े खिलाडी हैं. मैं आपके साथ हमेशा से रहा हूँ. मैंने आजतक चलने से कभी मना नहीं किया. ऐसे में आपको टेनिस खेलने की क्या जरूरत थी जिससे आपका एल्बो हर्ट हो गया. मेरी बात सुनकर खूब हँसे. तब जब उन्होंने मुझे बताया कि टेनिस एल्बो क्या होता है तो मुझे भी अपनी बेवकूफी पर पर बड़ी हंसी आई.

चंदू : हा हा हा. अच्छा ये बताएं कि सचिन के रिटायर होने से इफेक्टिवेली आप भी रिटायर हो जायेंगे. कैसे बीतेंगे आपके दिन अब?

बैट : सच कहें तो सचिन के बिना मेरा कोई वजूद ही नहीं है चंदू जी. जैसे सचिन कई बार कह चुके हैं कि क्रिकेट के बिना वे अपना जीवन अधूरा मानते हैं वैसे ही मैं आपको बता दूँ कि मुझे सचिन के हाथों में रहने के अलावा और कुछ नहीं आता. फिर भी वे रिटायर हो जायेंगे तो मैं भी पहले कुछ दिन आराम करूँगा. अपना समय अपने परिवार को दूँगा. वैसे मैंने उनसे कहा कि मुझे अर्जुन की सेवा में लगा दें. लेकिन अगर वे नहीं लगाएंगे तो मैं अपने बेटे को एक सफल बैट बनाकर अर्जुन की सेवा में अर्पित कर दूँगा. मैंने सचिन के लिए काम किया. मेरा बेटा अर्जुन के लिए काम करेगा. हो सकता है उसका बेटा आगे चलकर अर्जुन के बेटे के लिए काम करे. तो जीवन तो देखिये किसी तरह से कट ही जायेगा. सचिन के घर में ही एक कोने में पड़ा रहूँगा. अब इस उमर में कहाँ जाऊँगा?

चंदू : चलिए मेरी भी शुभकामनाएं आपके साथ हैं. हम सभी यह चाहेंगे कि आपका आगे का जीवन अच्छे से कटे. इस इंटरव्यू के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद.

बैट : आपका भी इंटरव्यू लेने के लिए धन्यवाद चंदू जी.


Tuesday, October 1, 2013

गाँधी जी थैंक यू





हर साल की तरह इस साल भी २ अक्टूबर आ ही गया. हर साल की तरह इस साल भी भाषणों की झड़ी लगेगी, टीवी पर गाँधी फिल्म दिखाई जाएगी, रेडिओ पर "दे दी हमें आज़ादी बिना खडग बिना ढाल.…." बजेगा और टीवी पर चल रहे रियलिटी शो में लोग गाँधी जी के बहाने ऐ मेरे वतन के लोगों ………….गायेंगे. ऐसे में पेश है एक नेता का भाषण जो उसने २ अक्टूबर २०१२ के दिन अपनी जनता पर चेंप दिया था. आप बांचिये.

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सभा में उपस्थित देशवासियों, आज गाँधी जी का जन्मदिन है. यह न सिर्फ गाँधी जी के लिए बल्कि हमारे लिए भी सौभाग्य की बात है कि आज यानि २ अक्टूबर को गाँधी जी का जन्मदिन है. आज अगर उनका जन्मदिन नहीं होता तो न ही हमारे लिए यह सौभाग्य की बात होती और न ही हम उनका जन्मदिन मना पाते. ऐसे में हम कह सकते हैं कि आज के दिन जन्म लेकर उन्होंने हमसब को उनका जन्मदिन मनाने का चांस दिया जिसके लिए हम उनके आभारी हैं. भाइयों, देखा जाय तो मौसम के हिसाब से भी अक्टूबर के महीने में जन्म लेकर उन्होंने हमें एक तरह से उबार लिया. फर्ज करें अगर वे मई या जून के महीने में पैदा हुए होते तो गरमी की वजह से उनके जन्मदिन पर मैं शूट नहीं पहन पाता. अब आप खुद ही सोचिये कि बिना शूट के गाँधी जी जैसे महान व्यक्ति का जन्मदिन समारोह कितना फीका लगता. सच बताऊँ तो बिना शूट के मैं गाँधी जी का जन्मदिन मना ही नहीं पाता और अगर ऐसा नहीं होता तो बहुत बड़ा नुक्सान हो जाता. मुझे भाषण देने का चांस नहीं मिलता और आपको भाषण सुनने का चांस नहीं मिलता. ऐसे में हमारी और आपकी मुलाक़ात नहीं हो पाती. और आपतो जानते ही हैं कि नेता और जनता की मुलाकात न हो तो लोकतंत्र को क्षति पहुँचती है. इससे साबित होता है कि २ अक्टूबर लोकतंत्र के लिए भी शुभ है.

इन सारे संयोंग पर गहरे से सोचें तो कह सकते हैं कि गांधी जी हमसब का थैंक्स डिजर्व करते हैं. आइये लगे हाथ हम उन्हें थैंक्स कह ही दें. मैं कहूँगा गांधी जी और आपसब एक स्वर में कहेंगे थैंक यू.

गांधी जी
थैंक यू

गाँधी जी
थैंक यू

भाइयों, आपका तो नहीं पता लेकिन हमें बचपन से ही सिखाया गया कि हमें गांधीजी के रस्ते पर चलना है. हमारे पिताजी ने तो हमें यह सीख चार वर्ष की उम्र में ही दे दी थी कि हमें गाँधीजी के रस्ते पर चलने की जरूरत है. यह मैं आपको तब की बात बता रहा हूँ जब वे अपने एरिया के म्यूनिसिपल काउंसिलर थे. मुझे अच्छी तरह से याद है उन्होंने म्यूनिसिपल कारपोरेशन में संघर्ष करके हमारे मोहल्ले में पाँच सौ मीटर की एक सड़क बनवाई और उसका नाम गाँधी जी के नाम पर एम जी रोड रखा. मैं और मेरा छोटा भाई दोनों उस रोड पर चलकर स्कूल जाते थे. बाद में जब पिताजी ने म्यूनिसिपल कारपोरेशन में मेयर का पद हथिया लिया तब हम दोनों भाई उनकी आफिसियल कार में बैठकर उसी एम जी रोड के ऊपर से जाते थे. वैसे मोहल्ले के कुछ दुष्ट लोगों ने कानाफूसी करके यह बात फैला दी थी कि चूंकि मेरे दादाजी का नाम मुकुंदीलाल गुप्ता था इसलिए पिताजी ने रोड का नाम एम जी रोड रखा था. पिताजी और भगवान को पता है कि यह सच नहीं है.

भाइयों, आप खुद देखें कि अपने पिताजी के पढाये पाठ पर हम कितनी छोटी उम्र से अमल कर रहे हैं.

भाइयों, यह तो हुई मेरे पिताजी और मेरी बात. लेकिन आपलोग उनके रस्ते पर चलें उसके लिए सबसे पहले जरूरत है कि आप गाँधी जी के बारे में जानें. आखिर उनके बारे में बिना जाने आप उनके रस्ते पर कैसे चलेंगे? इसलिए मैं अब आपको गाँधी जी के बारे में बताता हूँ. भाइयों, गांधी जी ने वकालत की पढाई की थी जिससे वे वकील बन सकें. आप पूछ सकते हैं वे डॉक्टर या इंजिनियर क्यों नहीं बने? तो इसका जवाब यह है कि उन दिनों वकालत में जितना पैसा था, उतना डाक्टरी में नहीं था. दूसरी बात कह सकते हैं कि वकालत करना उस ज़माने में फैशन की तरह था. ऊपर से गाँधी जी इंटेलिजेंट थे और उनको पता था वकालत में बहुत पैसा था. भाइयों, वकालत में पैसा था तभी गांधी जी उस जमाने में फर्स्ट क्लास में चलते थे.

भाइयों, वकील बनकर उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में अपनी प्रैक्टिस शुरू की. वही दक्षिण अफ़्रीका जहाँ के हैन्सी क्रोनिये थे. हैन्सी क्रोनिये से याद आया कि जब मैं क्रिकेट बोर्ड का अध्यक्ष था तब एकबार दक्षिण अफ्रीकी टीम भारत के दौरे पर आई और मुझे हैन्सी क्रोनिये से मुलाकात करने का सौभाग्य प्राप्त …… (पब्लिक शोर करती हैं)

अच्छा अच्छा मैं मुद्दे पर आता हूँ. मैं जरा अलग लैन पर चला गया था. नहीं.. नहीं.. ऐसा न कहें, मैंने सोचा कि मैं आपसे अपना अनुभव बाटूंगा तो आपलोगों को प्रेरणा मिलेगी. वैसे आप चाहते हैं तो मैं वापस मुद्दे पर आता हूँ. तो भाइयों मैं कह रहा था कि गाँधी जी ने दक्षिण अफ्रीका में अपनी वकालत की प्रैक्टिस शुरू की. आप तो जानते ही हैं कि दक्षिणी अफ्रीका सोने की खानों के लिए प्रसिद्द है. इसीलिए मैंने गाँधी जी से प्रेरणा ली और आज आप खुद ही देखिये कि सोना मुझे कितना प्रिय है. मैं न सिर्फ सोना पहनता हूँ बल्कि संसद में भी सोने का कोई चांस हाथ से जाने नहीं देता.

भाइयों दक्षिणी अफ्रीका की बात चली हैं तो मैं आपको गांधी जी से संबंधित एक संस्मरण सुनाता हूँ. गाँधी जी हमेशा फर्स्ट क्लास में ही सफ़र करते थे. पैसे की कोई कमी तो थी नहीं उनको. तो एकबार वे फर्स्ट क्लास में बैठे कहीं जा रहे थे तो हुआ क्या कि वहां के एक अँगरेज़ टीटी ने उन्हें डिब्बे से बाहर फेंक दिया. मुझे पता है आपके मन में यह उत्सुकता होगी कि उस टीटी ने गाँधी जी को डिब्बे से बाहर कैसे फेंका? तो मैं कहना चाहूँगा कि जिन्होंने गाँधी फिल्म देखी है उन्हें तो पता होगा ही कि उस टीटी ने गाँधी जी को डिब्बे के बाहर कैसे फेंका था लेकिन जिन्होंने वह फिल्म नहीं देखी है उनके लिए मैं बताता चलूँ कि उस टीटी ने उन्हें वैसे ही फेंका जैसे हमलोग कई बार इमरजेंसी पड़ने पर फर्स्ट क्लास या सेकंड क्लास के यात्रियों को डिब्बे से बाहर फेंक देते हैं. अब देखिये हमने इतना बता दिया. जो नहीं बताया वो आपलोग कल्पना कर लीजिये.

तो मैं कह रहा था कि उस अँगरेज़ टीटी ने गाँधी जी को डब्बे से बाहर फेंक दिया. सच तो ये है कि उन दिनों वहां अंग्रेजों का राज था. और अँगरेज़ बहुत ख़राब होते थे. बहुत ख़राब माने बहुत खराब. लेकिन इसका मतलब क्या वे कुछ भी करते और गाँधी जी बर्दाश्त कर लेते? कदापि नहीं. अब वे अगर गाँधी जी को डिब्बे से बाहर फेंकेंगे तो क्या गाँधी जी चुप रहते? क्यों चुप रहते? क्या कोई विदाउट टिकेट चल रहे थे जो चुप रहते? बस जब टीटी ने उन्हें बाहर फेंका उसी दिन से गाँधी जी का अंग्रेजों से लफड़ा शुरू हो गया. उन्होंने उसी दिन कसम खाई कि वे अंग्रेजों को भारत में नहीं रहने देंगे. उनको पता था कि जो अँगरेज़ दक्षिण अफ्रीका में राज करते थे वहीँ अँगरेज़ भारत में भी राज करते थे. फिर क्या था, अंग्रेजों से बदला लेने के लिए वे भारत वापस आ गए. भारत आकर उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया. जाकर उनसे सीधा-सीधा कह दिया कि अंग्रेजों भारत छोड़ दो. अँगरेजों ने आना-कानी तो की लेकिन गाँधी जी भी कहाँ छोड़ने वाले थे? उन्होंने उनको भारत से भगा कर ही दम लिया. वो गाना तो सुना ही होगा आपने. अरे वही जो आज के दिन खूब बजता है. अरे वही बस मुंह में है याद नहीं ……हाँ, याद आ गया. वो गाना था न कि दे दी हमें आजादी बिना खडग बिना ढाल साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल.

मुझे पता है आपके मन में सवाल उठा रहा होगा कि ये साबरमती का संत कौन है? तो मैं आपको बता ही देता हूँ कि ये और कोई नहीं खुद गाँधी जी ही थे. वो क्या था कि साबरमती में ही उनका आश्रम था और आपतो जानते ही हैं कि आश्रम में संत रहते हैं इसलिए उनको साबरमती का संत कहा जाता है.

भाइयों, अब मैं आपको गांधी जी से सम्बंधित अन्य पहलुओं के बारे में बताता हूँ. आपको जानकर हैरानी होगी कि उनको बंदरों से बहुत प्यार था. आपके मन में बात आती होगी कि बन्दर भी कोई प्यार करने की चीज हैं? तो इसका जवाब मैं ये दूंगा कि दरअसल गाँधी जी श्री रामचन्द्र से बहुत प्रभावित थे इसलिए वे कई बार न सिर्फ रामराज की बात करते थे बल्कि वे श्री रामचन्द्र जी की तरह ही बंदरों से प्यार भी करते थे. सच तो ये हैं कि उन्हें बंदरों से उतना ही प्यार था जितना आजकल हम कुत्तों, गधों वगैरह से करते हैं.

आप पूछ सकते हैं कि गाँधी जी को बन्दर ही प्रिय क्यों थे? हमारी तरह उन्हें कुत्ते या गधे प्रिय क्यों नहीं थे? भाइयों, इस सवाल का जवाब जानने के लिए आपको थोडा इतिहास की पढाई करनी पड़ेगी. लेकिन चूँकि पढाई करने के लिए आपका साक्षर होना जरूरी है और हमने आपको साक्षर होने नहीं दिया इसलिए हमारी जिम्मेदारी बनती है कि हम आपको बताएं कि इतिहास में क्या लिखा गया गया है या फिर गाँधी जी के इस पहलू को लेकर इतिहासकार क्या कहते हैं? क्या विचार रखते हैं? तो भाइयों वैसे तो इतिहासकारों में इसको लेकर भिन्न-भिन्न मत हैं लेकिन ज्यादातर इतिहासकार यह मानते हैं कि उन दिनों देश के कुत्तों और गधों पर राजाओं और नवाबों का कब्ज़ा था. उन लोगों ने ही सारे कुत्तों और गंधों को पाल रखा था.

ऐसे में गाँधी जी ने बंदरों को चुना. आप ने देखा भी होगा कि उनके तीन बन्दर थे जो अपना कान, मुंह और आँख बंद रखते थे. भाइयों, वैसे तो बहुत लोग इन बंदरों से बहुत इम्प्रेस्ड रहते हैं लेकिन मैं आपको अपना पर्सनल विचार बताऊँ तो मुझे ये तीनों बन्दर कोई बहुत इम्प्रेसिव नहीं लगे. मैं पूछता हूँ कि जब भगवान ने आँख, कान, मुंह वगैरह दिए हैं तब उनको बंद रखने का क्या तुक है? मैं पूछता हूँ कि खुला रखने में कौन सा पैसा खर्च हो जाता? ऊपर से अगर आप साइंस के लिहाज से देखें तो वैज्ञानिक बताते हैं कि अगर अंगों का इस्तेमाल न हो तो उनके नष्ट हो जाने का भय रहता है. अब इन सब बातों को देखा जाय तो ये बन्दर सच में कोई इम्प्रेसिव बन्दर नहीं थे.

भाइयों, वैसे तो गाँधी जी महान थे लेकिन एक बात में वे कच्चे थे. वे अपने बेटों को आगे नहीं बढ़ा सके. देखा जाय तो एक पिता का असली कर्त्तव्य नहीं निभा सके. आप तो जानते ही हैं कि वे राष्ट्रपिता थे. मतलब भारत उनका था. ऐसे में उन्हें चाहिए था कि वे अपने बेटों को, पोतों को आगे बढाते. उन्हें प्रेजिडेंट, प्राइम मिनिस्टर, मिनिस्टर बनाते. लेकिन वे ऐसा नहीं कर पाए. मैं पूछता हूँ कि एक पिता का कर्त्तव्य क्या केवल अपने बच्चों का लालन पालन ही होता है? क्या पिता का यह कर्त्तव्य नहीं कि वह उसे पद दिलाये? अपने प्रभाव से जमीन का प्लाट दिला दे? कोई कंपनी खोल दे? यह सब वे नहीं कर सके तो यही एक बात है जहाँ वे न सिर्फ कच्चे साबित हुए बल्कि हमलोगों से पीछे रह गए. आखिर बच्चों का भला करना एक पिता का कर्त्तव्य है. आज मुझे ही देख लीजिये. मैं खुद केन्द्रीय मंत्री हूँ. मेरा एक बेटा सांसद है. दूसरा बेटा स्टेट कैबिनेट में है. उसका बेटा अपने शहर का मेयर …… भाइयों अब आप ही बताइए, इस मामले में हम बड़े कि वे?

फिर मैं यह सोचकर संतोष कर लेता हूँ भाइयों कि मैं भी तो उन्ही की संतान हूँ. अरे जो राष्ट्रपिता है उसकी संतान तो उस राष्ट्र का एक-एक नागरिक है. अब मैं आगे बढ़कर नेता बन गया तो समझ लीजिये कि उन्होंने मुझे आशीर्वाद दिया. आप वहीँ रह कर जनता बने रहे तो समझ लीजिये कि उन्होंने आपको आशीर्वाद नहीं दिया. सब आशीर्वाद का खेल है. मुझे तो गाँधी जी के अलावा मेरे पूज्यनीय पिताजी का भी आशीर्वाद प्राप्त था.

भाइयों, गाँधी जी तो महान थे. इतने महान थे कि उनकी गाथा का कोई अंत नहीं है. खुद मैं पिछले चालीस साल से आज के दिन उनके बारे में भाषण देता आ रहा हूँ लेकिन हर साल मुझे लगता है कि अभी कितना कुछ है उनके बारे में कहने को. हर साल मुझे सुनाने में मज़ा आता है और आपको सुनने में. इसका एक फायदा यह है कि उनकी गाथा पीढ़ी दर पीढ़ी चलती जा रही है. मुझे आशा है कि अगले वर्ष भी हमलोग इसी मैदान में मिलेंगे और मैं आपको उनके बारे में और बहुत सारी बातें बताऊँगा. तबतक चांस यह है कि मैं गृहराज्य मंत्री से प्रमोट होकर कोल मिनिस्ट्री में चला जाऊं. आजकल सबसे मलाईदार मिनिस्ट्री वही है. मैं कोयला मंत्री बन गया तो फिर गाँधी जी के बारे में कहानियां सुनाने का मजा और आएगा. भाइयों, कहानी जितनी पुरानी हो, उतनी मज़ा देती है. इसलिए मैं अपने इस वादे के साथ कि अगले साल इसी मैदान आपको फिर से कहानी सुनाऊंगा, आपसे विदा लेता हूँ.

तबतक के लिए बोलो गाँधी जी की जय!


डिस्क्लेमर: मैंने गाँधी-जयंती पर एक नेता का भाषण साल २००८ में लिखा था. अब आप नेताओं के स्पीच राइटर्स को तो जानते ही हैं. किसी ने उस नेता के भाषण को ब्लॉग से कॉपी कर के थोड़ी-बहुत हेर-फेर करके अपने मंत्री को दे दिया और उस मंत्री ने यह भाषण अपनी जनता पर २ अक्टूबर २०१२ के दिन चेंप दिया. यह वही भाषण है. यह डिस्क्लेमर मैंने उन लोगों के लिए लिखा है जिन्होंने २००८ वाला भाषण पढ़ रक्खा है:-)



Tuesday, September 24, 2013

दुर्योधन की डायरी - पेज १३७७




आज दिन भर बहुत व्यस्त रहा. प्रजा के लिए बनी महाराज भरत मुफ्त में पेट भरो योजना का उद्घाटन करने के लिए पिताश्री के साथ जाना पड़ा. जयद्रथ और दुशासन ने उद्घाटन समारोह के सारे इंतजाम बहुत मस्त किये थे. राजकवि तो काशीनरेश द्वारा आयोजित किसी कवि सम्मलेन में गए थे इसलिए योजना के लिए नारा लिखने का काम उप राजकवि ने किया. उन्होंने जो नारा लिखा वह भी ठीक-ठाक ही लगा. वैसे सिस्टर दुशाला ने सजेस्ट किया कि मुफ्त का गेंहू दो किलो, कार्ड दिखाओ और ले लो की जगह अगर दान का गेंहू दो किलो, कार्ड दिखाओ और ले लो होता तो अच्छा रहता. उसका कहना था कि ऐसा करने से बिना किसी मेहनत के यह बात प्रजा के बीच साबित हो जाती कि हमलोग दानी भी हैं. साथ ही यह बात एकबार फिर से बता दी जाती कि हम राजा है.

वह कह रही थी कि यह बात बीच बीच में प्रजा पर जाहिर करते रहना चाहिए क्योंकि कई बार प्रजा की हरकतों से लगता है जैसे वह हमारे राजत्व पर सवाल कर रही है.

राजमहल ने योजना के विज्ञापन के लिए कुल सत्रह अखबारों का फ्रंट पेज बुक कर लिया था. हस्तिनापुर एक्सप्रेस का तो फ्रंट और बैक-पेज दोनों ही बुक कर लिया गया था. एक समय था जब यह अखबार राजमहल के विरुद्ध खूब लिखा करता था. वो तो भला हो मामाश्री का जिन्होंने इसके नए संपादक को साध लिया और तब से अखबार हमारे पक्ष में लिखने लगा. मुझे याद है पहली बार इसी संपादक के साथ मिलकर मैंने और मामाश्री ने भीम को बदनाम किया था. गुप्तचरों द्वारा खींचकर लाई गई भीम और हिडिम्बा के विवाह की तस्वीरें सबसे पहले इसी संपादक के लिए लीक की गई थीं. साथ ही इस संपादक ने तमाम संपादकीय लिखकर साबित कर दिया था कि कैसे एक आर्य ने राक्षस कुल की एक कन्या के साथ विवाह कर घोर अपराध किया है. बड़ी थू थू हुई थी भीम की.

लिखना पड़ेगा कि प्रेस मैनेजमेंट के जो गुर मामाश्री ने तब सिखाये वह आजतक काम आ रहा है. आज ये अखबार न होते तो प्रजा को यह बताना कितना मुश्किल होता कि हाल ही में हमने चाय-पान की दुकानों पर जो स्पेशल मनोरंजन कर लगाया है वह कितना जरूरी था. इसी अखबार ने लोगों में यह बात फैलाई कि राजमहल का घाटा किस तरह से इतना बढ़ गया है कि नए कर जरूरी हो गए हैं. कैसे नहीं लगाता चाय-पान की दुकानों पर कर? प्रजा के लोग इन्हीं दुकानों पर बैठकर राजमहल और उसके लोगों की आलोचना करते हैं. जिसे देखो वह मुझे गाली देता है. मुझे अत्याचारी कहता है. दुशासन को अधर्मी कहता है. जयद्रथ के बारे में अनाप-सनाप बकता है. दुशासन ने यहाँ तक सुझाव दिया कि हस्तिनापुर में चाय-पान की दुकानों पर बैन लगा देना चाहिए. मैं तो तैयार हो गया था, वो तो कर्ण और मामाश्री ने बताया कि अगर इन दुकानों पर बैन लगा दिया गया तो लोगों में असंतोष बढ़ेगा. मामाश्री ने उसी दिन यह रहस्योद्घाटन किया कि प्रजा को आपस में बात करने से कभी रोकना नहीं चाहिए. बातचीत करने से उनके मन की भड़ास निकल जाती है. बोले; "हमें चाय और पान की दुकानों का आविष्कार करने वाले को धन्यवाद कहना चाहिए भांजे जिसने बहुत सोच समझकर इसका आविष्कार किया. अगर ये दुकानें न होंगी तो प्रजा अपनी भड़ास कहाँ निकालेगी? और यदि भड़ास न निकली तो उसके आन्दोलन का रूप लेने का खतरा हमेशा मंडराता रहेगा"

मामाश्री द्वारा सिखाये गए इसी पाठ का कमाल है कि प्रेस मैनेजमेंट में आजतक कोई दिक्कत नहीं आई. मुझे याद है, एकबार दुशासन ने पितामह और काकाश्री विदुर के हस्ताक्षर फोर्ज कर काशीनरेश को पत्र लिखकर आग्रह किया कि वे भीम को काशी नगरी में प्रवेश की अनुमति न दें क्योंकि उसने गुरु द्रोण की पाठशाला में मेरी और दुशासन की कुटाई की थी. पता नहीं कैसे वह पत्र हस्तिनापुर टाइम्स के हाथों लग गया और जब बात प्रजा के बीच निकल आई तब इसी संपादक ने अपने अखबार में तरह तरह से सम्पादकीय लिखकर यह बात फैलाई कि दरअसल वह पत्र दुशासन ने नहीं बल्कि पांडवों के दल में से ही किसी ने लिखा था क्योंकि पांडव एक-दूसरे को पसंद नहीं करते थे. जब यह लगा कि प्रजा को इसबात का विश्वास नहीं हो रहा है तब इस मामले को दबाने के लिए यह बात फैलाई गई कि माताश्री मुझसे, दुशासन और मामाश्री से बहुत रुष्ट हैं. खुद मामाश्री ने सम्पादक को यह आईडिया दिया कि वह ऐसा छापेगा तो लोगों का ध्यान उसपर चला जायेगा और काशीनरेश के नाम लिखे जाने वाले पत्र की बात दब जायेगी।

वैसे तो आज के कार्यक्रम के समय लिए जाने वाली तस्वीरों से कल के अखबार भरे रहेंगे लेकिन सुनने में यह भी आया है कि कुछ लोग इस योजना का विरोध कर रहे हैं. इन लोगों से निपटना मुझे अच्छी तरह से आता है. अगर यह भी नहीं कर सका तो फिर मामाश्री के रहने का क्या फायदा? मामाश्री ने चुनकर इक्यावन अर्थशास्त्री, इक्कीस अख़बारों के सम्पादक, ग्यारह बुद्धिजीवी, पाँच नाट्यकर्मी और एक सौ एक गुप्तचर को भाड़े पर ले लिया है जो यह फैलायेंगे कि यदि यह योजना लागू नहीं हुई तो प्रजा भूख से मर जाएगी और किस तरह से यह योजना महाराज भरत को असली श्रद्धांजलि होगी। मामाश्री ने प्लान बनाया है कि चूंकि आगे चलकर मुझे ही हस्तिनापुर का राज बनना है इसलिए प्रजा में यह सन्देश जाना जरूरी है कि इस योजना की रूपरेखा न सिर्फ मैंने तैयार की है बल्कि मैं ही यह निश्चित करूंगा कि यह योजना पूरी तरह से लागू हो और हर हस्तिनापुरवासी का कल्याण हो.

अब सोने चलता हूँ क्योंकि कल सुबह ही इन अर्थशास्त्रियों, संपादकों और बुद्धिजीवियों की क्लास लेकर उन्हें बताना है कि इस योजना के बारे में क्या-क्या बातें फैलानी हैं.