Show me an example

Monday, October 20, 2008

विश्वामित्र की तपस्या फिर से भंग हो गई.....




रात (या सुबह?) के तीन बजे थे. इन्द्र अपने कमरे में कंप्यूटर टेबल के सामने लगी कुर्सी पर बैठे कुछ सोच रहे थे. सोचते-सोचते कुर्सी पर पालथी मार कर बैठ गए. कुछ देर कमरे की सीलिंग को निहारा. सीलिंग निहार कर बोर हो लिए तो टेबल पर रखी थैली उठा ली. थैली में से पान मसाला निकाल हथेली पर रखा. कुछ क्षण बाद हथेली को नाक के पास ले गए. कुछ सोचते हुए बोले; "लगता है नकली है."

तीन बजे कमरे में उनकी बात सुनने वाला कौन होगा? कोई नहीं. इसलिए तुंरत ही मन मारते हुए चेहरे पर कोम्प्रोमाईज मुद्रा लाते हुए सोचा कि हाय-तौबा मचाकर भी कुछ नहीं मिलने वाला.

संकठा प्रसाद के ऊपर बहुत गुस्सा आया. मन में सोचने लगे; "सबेरा होने दो, संकठा प्रसाद की ठुकाई कर दूँगा. कितनी बार इसे मना किया है कि सेठ ब्रदर्स की दूकान से मसाला न लाया करे लेकिन ये जगरचोर वहीँ से ले आता है. सौ मीटर और आगे जाने में पता नहीं इसका क्या बिगड़ता है?"

मन मारकर ज़र्दे का पाउच खोला. पता नहीं क्यों आज ज़र्दा का डबल डोज़ हथेली पर उलट लिया. पान मसाला के साथ ज़र्दा रगड़ते हुए मिश्रण तैयार करने में जुट गए.

मिश्रण तैयार करते हुए बार-बार टेबल पर रखे लैपटॉप को निहारते जा रहे थे. लैपटॉप पर उनका ब्लॉग खुला था. अपनी पिछली पोस्ट पर आए कमेन्ट को अब तक सात बार देख चुके थे. भगवान विष्णु के साथ-साथ वृहस्पति और शुक्राचार्य के कमेन्ट भी थे. साथ में कुछ और बड़े, मझोले और टुटपुजिया देवताओं के अथाह बड़ाई वाले कमेन्ट भी थे.

जहाँ भगवान विष्णु ने अपने कमेन्ट में लिखा था; "बेहतरीन" वहीँ शुक्राचार्य ने देवराज का मजाक उड़ाते हुए लिख दिया था; "सही जा रहे हो. आजकल उर्वशी से पोस्ट लिखवाने लगे हो या फिर कथक देखते-देखते सोमरस के प्रभाव में ये पोस्ट लिखी है? यही हाल रहा तो मुझे अपने चेलों को युद्धविद्या सिखाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी."

शुक्राचार्य का कमेन्ट पढ़ते हुए सोच रहे थे; "पता नहीं ख़ुद को क्या समझता है? हर पोस्ट पर कुछ न कुछ तीखी टिप्पणी कर के ही जाता है. एक तरफ़ वृहस्पति जैसे विद्वान हैं जो मेरी हर पोस्ट की बड़ाई करते हैं और दूसरी तरफ़ ये कानिया है जो हर पोस्ट पर गाली देता है. इसका कुछ न कुछ इलाज करना पड़ेगा."

ये बातें सोचते हुए वे पान मसाला और ज़र्दे का मिश्रण तैयार कर ही रहे थे कि नारद प्रकट हुए. असल में अपनी वीणा से लैश नारद एक गीत गुनगुनाते चले जा रहे थे. सुबह-सुबह पृथ्वीलोक जा रहे थे लेकिन तीन बजे देवराज के कमरे में लाईट जलती देख इधर मुड लिए. इन्द्र को मिश्रण तैयार करता देख बोले; "नारायण नारायण. ये क्या देख रहा हूँ प्रभो? आप खैनी का सेवन कब से करने लगे?"

उनका सवाल देवराज को पसंद नहीं आया. बोले; "देखिये देवर्षि, इस समय मेरा मूड बहुत ख़राब है. अगर आप मज़ाक करने का प्लान बनाकर आए हैं तो चले जाइये. आपको मालूम है, मैं खैनी नहीं बल्कि पान मसाला और ज़र्दे का मिश्रण खाता हूँ."

इन्द्र का जवाब सुनकर नारद को पता चल गया कि मामला कुछ गड़बड़ है. यही सोचते हुए बोले; " लेकिन प्रभो, आप पान मसाला और ज़र्दा भी क्यों खाते हैं? ये अच्छी चीजें नहीं हैं."

इतना कहकर वे रुक गए. फिर उन्हें अचानक याद आया कि उन्होंने नारायण नारायण तो कहा ही नहीं. यही सोचते हुए उन्होंने ख़ुद को करेक्ट करते हुए "नारायण नारायण" कह डाला.

नारद के मुंह से नारायण नारायण सुनकर इन्द्र को बड़ा अजीब लगा. वे सोचने लगे कि इन्होने अलग से नारायण नारायण क्यों कहा?

एक बार तो सोचा कि नारद से पूछ लें लेकिन दूसरे ही क्षण उन्होंने अपना ये विचार त्याग दिया और बोले; "मुझे भी मालूम है ये अच्छी चीजें नहीं हैं. लेकिन मैं क्या करूं? पिछले पन्द्रह दिन से टेंशन डिजाल्व करने वाली गोली काम ही नहीं कर रही है. इसलिए डॉक्टर ने कहा कि पान मसाला और ज़र्दे का मिश्रण ट्राई करूं. कह रहे थे, अब यही दो चीजें खालिश हैं. दवाई तो नकली बिक रही हैं";

इन्द्र ने अपनी समस्या के बारे में बताते हुए कहा.

उनकी बात सुनकर नारद भी सोच में पड़ गए. उन्हें एकदम से समझ में नहीं आया कि इन्द्र के टेंशन का कारण क्या है. उन्हें लगा कि अनुमान लगाकर कौन दिमाग खर्च करे? इन्ही से पूछ लो. यही सोचते हुए उन्होंने पूछ लिया; " लेकिन आप टेंशनग्रस्त क्यों हैं प्रभो? क्या मेनका आजकल डांस स्टेप भूल जाती है?"

"नहीं देवर्षि, ऐसी बात नहीं है. वैसे भी मेनका अगर डांस स्टेप भूल भी जायेगी तो क्या हो जायेगा? आडिशन करके नई डांसर्स भर्ती कर लेंगे"; इन्द्र ने सफाई देते हुए कहा.

"तो फिर आप क्या ब्लॉग पर शुक्राचार्य के कमेन्ट से दुखी हैं?"; नारद ने अनुमान लगाते हुए पूछा.

अब तक इन्द्र का मुंह पान मसाला और ज़र्दे के मिश्रण से पूरी तरह से भर गया था. वे और बात करने में असमर्थ थे. इसलिए टेबल के नीचे से डस्टबिन उठाकर उसमें थूकते हुए बोले; "नहीं देवर्षि, शुक्राचार्य से तो कभी भी निबट लूँगा. असल में मेरी टेंशन की वजह एक बार फिर से विश्वामित्र हैं. आपके कहने से मैंने ब्लॉग बनाकर पिछली बार उनकी तपस्या भंग की थी. लेकिन पता नहीं क्यों वे पिछले बीस दिन से ब्लॉग पर पोस्ट ही नहीं डाल रहा है. न ही मेरी पोस्ट पर कमेन्ट कर रहा है."

नारद उनकी बात सुनकर मंद-मंद मुस्कुराने लगे. बड़े सरकास्टिक लहजे में बोले; "नारायण नारायण. ये आप क्या कह रहे हैं प्रभो? आप ही तो कहते थे कि अब विश्वामित्र के ब्लॉग पर जाने का मन नहीं करता. और आज आपको ये चिंता सता रही है कि वे पोस्ट नहीं लिख रहे हैं? ये क्या बात हुई, देवाधिदेव?"

"वो तो मैं ऐसे ही कहता था, देवर्षि. असल में मैं रोज ही उसके ब्लॉग पर जाकर देखता था कि उसने क्या लिखा. अगर नहीं देखता तो फिर से गाली देते हुए पोस्ट कैसे लिखता? और फिर, जब वो मेरी पोस्ट पर गाली देते हुए कमेन्ट लिखता था तो मैं आश्वस्त रहता था कि ये तपस्या नहीं कर रहा है"; इन्द्र ने पूरी बात का खुलासा करते हुए कहा.

इतना कहते हुए वे फिर से पान मसाला हाथ पर रखने लगे. हथेली पर ज़र्दा रखते हुए बोले; "मुझे तो लग रहा है कि विश्वामित्र एक बार फिर से तपस्या करने में जुट गया है. मैं हर घंटे अपना ब्लॉग खोलकर देख लेता हूँ कि उसका कोई कमेन्ट आया कि नहीं? लेकिन पिछले बीस दिन से वो कहीं दिखाई ही नहीं दे रहा है. अब तो आप ही कोई रास्ता दिखायें देवर्षि. अगर ये विश्वामित्र फिर से तपस्या करने बैठ गया तो बड़ी मुश्किल हो जायेगी."

इन्द्र की व्यथा-कथा सुनकर नारद को दया आ गयी. सोचने लगे कि इनकी मदद कैसे करें? ये इस तरह से टेंशनग्रस्त हो गए तो सोमरस कौन पीयेगा? स्वर्गलोक में डांस का प्रोग्राम ही बंद हो जायेगा. देवता तो त्राहि-त्राहि करने लगेंगे. देवता अगर देवताई न कर सके तो और ही कर्म पर उतर आयेंगे.

यही सब सोचते हुए नारद ने ब्रेन-स्टार्मिंग सेशन शुरू कर दिया.

सोचते-सोचते सुबह हो गयी. मुर्गा भी बोल उठा. मुर्गा बोला ही था कि मुर्गे की बांग सुनकर कौआ भी बोल उठा. साथ में कुत्तों ने भी भौकना शुरू कर दिया. इतनी सारी आवाजें सुनकर नारद को ब्रेनवेव आ गयी. अचानक बोल उठे; "नारायण नारायण."

उनके मुंह से नारायण नारायण सुनकर इन्द्र की आँखें चमक उठी. उन्हें आभास हो गया कि देवर्षि के दिमाग में कोई समाधान आया ज़रूर है. वे नारद की तरफ़ याचक भाव से देख रहे थे. जैसे कह रहे हों; " जल्दी अपने आईडिये के बारे में बताएं देवर्षि.ट्राई मेक इट फास्ट, प्लीज."

नारद मुस्कुराते हुए बोले; " नारायण नारायण. समाधान मिल गया प्रभो. अब आपको चिंतित होने की ज़रूरत नहीं है."

उनकी बात सुनकर इन्द्र पान मसाला से अपना मुंह खाली करते हुए इन्द्र ने कहा; "जल्दी बताईये देवर्षि. आपके हिसाब से क्या किया जा सकता है?"

नारद बोले; "हे देवराज, आज ही आप एक कम्यूनिटी ब्लॉग बनाईये. इस कम्यूनिटी ब्लॉग के मेम्बेर्स के नाम पर आप विश्वामित्र, शुक्राचार्य और तमाम राक्षसों का नाम दे दीजिये. इस ब्लॉग पर ख़ुद ही देवताओं को गाली देते हुए तीन-चार पोस्ट लिखिए. और कल ही अपने असली ब्लॉग पर इस ब्लॉग के ख़िलाफ़ पोस्ट लिखते हुए हल्ला मचा दीजिये कि विश्वामित्र तो राक्षसों के साथ मिल गए हैं. आप देखियेगा, दूसरे ही दिन विश्वामित्र सफाई देने के लिए अपने ब्लॉग पर न केवल पोस्ट लिखेंगे बल्कि आपके पोस्ट पर कमेन्ट भी लिखेंगे."

ऐसा ही हुआ. इन्द्र ने एक कम्यूनिटी ब्लॉग बनाया. ब्लॉग के मेंबर के रूप में विश्वामित्र के साथ-साथ शुक्राचार्य और राहु-केतु के नाम से पोस्ट भी लिख डाली जिनमें देवताओं को गाली दी गई थी.

इस कम्यूनिटी ब्लॉग को देखकर विश्वामित्र को अपनी सफाई देने के लिए अपने ब्लॉग पर पोस्ट लिखनी पडी. अब वे सफाई देने में जुट गए थे. उनकी तपस्या एक बार फिर से भंग हो चुकी थी.


.....................................................................................
२०० वीं पोस्ट
वो क्या है जी, कि ये मेरे ब्लॉग पर पब्लिश होने वाली २०० वीं पोस्ट है. मुझे किसी भी हाल में ऐसी-वैसी, जैसी-तैसी एक पोस्ट लिखकर ये २०० वीं पोस्ट की ख़बर देकर बधाई लेनी थी. इसीलिए इस तरह की अगड़म-बगड़म पोस्ट लिख डाली.

मुझे पता है कि आपलोग ऐसी पोस्ट पढ़कर हलकान च परेशान होंगे. और सुबह-सुबह मन में गाली देंगे. लेकिन मैं क्या कर सकता हूँ? मुझपर जल्दी से जल्दी २०० वीं पोस्ट लिखने की धुन सवार थी.

इसलिए मन में गाली भले ही दें, टिपण्णी में बधाई देते जाईयेगा.

Saturday, October 18, 2008

तुरत लिखा, फुरत आलोचक मिले और 'धुरत' फ़ैसला....




न जाने कितने लोग सामान्य सी लगने वाली दुर्घटनाओं के चलते साहित्यकार हो लेते हैं. ओ हेनरी गबन की सजा में जेल जाने से लेखक बन गए थे. चार्ल्स सोभराज ने जेल में बैठे-बैठे किताब लिख डाली. किताब छप गई और उन्हें साहित्यकार की पदवी मिल गई तो अपनी वकील की आंखों में झांकते हुए कविता लिख डाली और कवि बन गए. वैसे ही बबलू श्रीवास्तव ने पुलिस की हिरासत में रहते हुए साहित्य रचना कर डाली. नरसिम्हा राव भी अपने अन्तिम राजनैतिक दिनों में लेखकगति को प्राप्त हो गए थे.

लेकिन इतिहास गवाह है कि दिवाली के सफाई कार्यक्रम ने आजतक किसी को कवि घोषित नहीं करवाया. इस लिहाज से हमारे ज्ञान भइया ने अलग ही मुकाम हासिल कर लिया. दिवाली के लिए चल रहे सफाई समारोह में उनके घर के कबाड़ से उनकी लिखी हुई ग्यारह साल पुरानी कविता बरामद हुई. मजे की बात ये कि कविता ब्लॉग पर भी छप गई. कवि छपास के लिए हमेशा तैयार रहता है.

अब अगर अचानक लोगों को पता चले कि सीरियस बातें करने वाला कविता भी लिखता है तो लोगों को आश्चर्य से लेकर सुखद आश्चर्य तक होगा. लोगों को हुआ भी. लगभग चालीस-पैंतालीस लोगों ने इस कविता को शानदार कविता बताया. अनूप जी ने कविता में छिपी हुई कवि की सोच पर पर शंका जाहिर की. कुछ लोगों ने कबाड़ को और खंगाले जाने का अनुरोध भी कर डाला.

कवि के लिए कुछ भी ठीक नहीं जा रहा था. जो भी आता, कविता को शानदार बता कर चला जाता.कविता की इतनी विकत बड़ाई सुनकर कवि बोर हुए जा रहे थे.

लेकिन कवि की आँखें तब चमक उठी जब उसे एक टिपण्णी मिली जिसमें कविता और कवि की आलोचना की गई थी. जरा सोचिये कि कवि की सफलता की पहली सीढ़ी क्या हो सकती है? आलोचक की प्राप्ति. और इस लिहाज से देखें तो हमारे ज्ञान भइया एक सीढ़ी चढ़ लिए. कारण? उन्हें आलोचक के रूप में मिल गए अरुण कुमार जी. अरुण कुमार जी ने ज्ञान भइया की कविता पढ़ी और उसे कूड़ा घोषित कर दिया.

यही होना ही था. कविता कबाड़ से बरामद हुई थी. वो भी स्क्रैप बुक में लिखी हुई. अब कबाड़ से निकली कविता को और क्या कहेंगे? वही, जो अरुण कुमार जी ने कहा.

बड़े-बड़े महाकवि कविता 'राइट' करके आलोचक को भेजते हैं. आलोचक जी का मुंह ताकते हैं. महीनों इंतजार करते हैं. आलोचक जी से दो-चार बार तगादा करते हैं. रिमाइन्डर देते हैं. रिमाइन्डर से आलोचक जी अगर खीज गए तो कविता लौटा भी देते हैं. ये कहते हुए कि; "परसों ही मैंने रविंद्रनाथ की गीतांजलि को नए बिम्बों को आधार बनाते हुए टेस्ट किया है. आज से मैं कीट्स की कविताओं के हिन्दी अनुवाद की समालोचना में व्यस्त हूँ. अभी हमें डिस्टर्ब मत करो. मैं तुम्हारी कवितायें वापस भेज रहा हूँ. तीन साल बाद हमें ये कवितायें दुबारा भेजना तब देखेंगे."

जो 'असली' कवि होते हैं वे कागज़ पर तो लिखते हैं, लेकिन ब्लॉग पर नहीं डालते. और यहीं उनसे चूक हो जाती है. ब्लॉग पर डाल दें तो आलोचक को रिमाइन्डर भेजने की जहमत उठानी ही न पड़े. ब्लॉग पर डालने का फायदा ये है कि न जाने कितने ही आलोचक तुंरत टूट पड़ते हैं उन कविताओं पर. दो घंटे के अन्दर साधुवाद, बधाई, खूबसूरत और बेहतरीन से लेकर कूड़ा तक बता डालते हैं.

इस मामले में 'ब्लॉग-साहित्य' जो है वो 'कालजई' साहित्य से आगे है. इसे कहते हैं जेट एज में साहित्य साईकिल का घूमना. तुरत लिखा. फुरत आलोचक मिले और धुरत फ़ैसला. (ये धुरत शब्द का मतलब नहीं पता. असल में आजकल तुकबंदी में हाथ आजमा रहा हूँ न, इसलिए जो मन में आ रहा है, लिख डालता हूँ.)

लेकिन जी, मैं एक बात कहना चाहता हूँ. ये काव्य दुर्घटना तो ग्यारह साल पहले हुई थी. दुर्घटना होने पर दवाई- दरपन तुंरत करवाना चाहिए. जब ये हुआ, उसी समय कवि का कर्तव्य था कि मुहल्ले में किसी को सुना लेता. मुहल्ले में श्रोता न मिलते तो आफिस में सुना डालते. अफसर सुनने को तैयार न होते तो प्यून को सुना लेते. प्यून न सुनता तो भारत लाल को सुना लेते. कोई न कोई तो ज़रूर ही मिलता जो ऑन स्पॉट उसे कूड़ा कह डालता. बात ख़तम होती और कागज़ हज़म होता. सोचता हूँ तो लगता है कि ग्यारह साल तक छिपाकर रखी गई कविता न्यूक्लीयर डील पास होने वाले वर्ष में ब्लॉग पर ठेलेंगे तो और क्या होगा?

शुकुल जी ने अभी परसों ही तरमाल अपने ब्लॉग पर ठेला. मौज वाली कविता. सही निशाने पर लगी. साधुवाद से लेकर बधाई तक समेटते हुए जेब के हवाले कर चलते बने. असली कवि-कर्म तो वही है जिसमें 'तरमाल' को तुंरत पाठकों और आलोचकों के हवाले करो और जो कुछ भी मिले, लेकर निकल लो.

दो दिन पहले हुई इस 'साहित्यिक दुर्घटना' पर तमाम चिट्ठाकारों ने अपने विचार व्यक्त किए. प्रस्तुत है उन्ही विचारों में से कुछ 'तर विचार'.

फुरसतिया जी:

अपनी कविता को कूड़ा बताने का काम स्वयं ज्ञान जी ने किया है. उन्होंने कल ही अरुण कुमार के नाम से एक फर्जी आई डी बनाई और अपनी कविता को कूड़ा बता डाला. साथ में ख़ुद को ही सलाह दे डाली कि; "सब्जी-मंडी में बैठकर घास बेंचों." घास की बड़ी डिमांड है जी. हाल ही में पता चला कि देश में घास की कमी हो गई है. ऐसे में बीच बजरिया घास बेचना देश के हित में है.

अलोक पुराणिक जी

कविता तो घणी चोखी थी जी. मैंने अपने कमेन्ट में भी लिखा था; "क्या केने क्या केने." लेकिन अब जब उसे कूड़ा बता दिया गया है लगा कि एक बार फिर पुनर्विचार करने की ज़रूरत है. मैंने सोचा कि उस छात्र का विचार ले लूँ जिसने पिछले महीने कविता पर निबंध लिखकर टॉप किया था. उसका कहना था; "आजकल ज्यादातर कवितायें कूड़ा ही होती हैं, ठीक वैसे ही जैसे कम्यूनिष्टों द्बारा दिए जानेवाले ज्यादातर वक्तव्य कूड़ा होते हैं."

उसकी बात सुनकर मुझे लगा कि अच्छा हुआ जो मैं कविता नहीं लिखता.

समीर लाल जी उड़न तश्तरी वाले

हाल ही में वॉशिंगटन से लौटा. वहां राकेश खंडेलवाल जी के काव्य संकलन के विमोचन के लिए गया था. वहां जाकर लगा कि पूरी दुनियाँ ही कविता है. ऐसे में ज्ञान जी की कविता भी मुझे प्यारी ही लगी. साधुवाद की हकदार कविता. मैंने साधुवाद समर्पित किया. लेकिन अब उस कविता को एक बार फिर देखने की ज़रूरत है.

मैं अभी सोच रहा हूँ कि पुनर्विचार को क्षणिकाएं लिखकर बताऊँ या दोहे लिखकर. थोड़ा और इंतजार कीजिये मैं जल्दी ही अपने ब्लॉग पर अपने विचार व्यक्त करूंगा. हो सकता है कि मैं अपनी प्रतिक्रिया विडियो के थ्रू दूँ. फिर सोचता हूँ कि नवम्बर में तो भारत आऊंगा ही. वहां पहुंचकर वक्तव्य दे दूँगा.

Wednesday, October 15, 2008

ब्लागिंग पर धोये...सॉरी दोहे




बहुत दिनों बाद सोचा आज कुछ तुकबंदी इकठ्ठा करूं. कोशिश की तो करीब डेढ़ सौ ग्राम तुकबंदी जुट गयी. नतीजा ये दोहे हैं. आप भी झेलने की कोशिश करें.


चिट्ठाकारी वोहि भली, रहती बहस चलाय
बहस चले, हड़कंप हो, सारे जन टिपियाय

बेनामी की खाल से टिप्पणियों में ज़ोर
वाद चले, प्रतिवाद हो, मचे जोर का शोर

चिट्ठों के संसार का है अद्भुत बाज़ार
धूल उड़ाते घूमते सारे चिट्ठाकार

टिप्पणियों से मिल रही हमें प्राण की वायु
गर टिप्पणियां न मिलें, घटती जाए आयु

बातें कर के धर्म की करते बड़ा अधर्म
दें गाली समुदाय को, कुछ चिट्ठों का कर्म

बटला हाउस, जामिया, औ हिंसा का मंत्र
इतनी बातों से चले कुछ चिट्ठों का तंत्र

एग्रीगेटर पर करें अपनी पोस्ट पसंद
ऊपर बस चढ़ते रहें, आए परमानंद

टीवी, चिट्ठा दोनों पे 'इस्टाईल'है एक
लोग हँसें, फब्ती कसें, नहीं इरादे नेक

पत्रकार से पूछते बाकी चिट्ठाकार
"हिन्दू को गाली प्रभो, कैसा अत्याचार?"

त्यागो जो संजीदगी, आए अद्भुत मौज
सारा चिट्ठाजगत ही लगे भंग का हौज

टिप्पणी में इन्वेस्ट का मिलता अच्छा ब्याज
खुजलायें गर पीठ तो, मिटती जाय खाज

कविता, गजल औ हायकू लिख के पोस्ट चढाय
'अद्भुत', 'बढ़िया', 'साधुवाद' और 'बधाई' पाय

नव चिट्ठे जो आ गए, हमें मिले संदेश
चिट्ठों से भर जायेगा, एक दिन भारत देश

गाली, फब्ती से सजे टिप्पणियों का बैंक
मन में गर दुःख आए तो चढ़ जाओ फिर टैंक

भाषा को भी मिल रहा नित्य नया आयाम
हिन्दी में अंग्रेज़ी जोड़ खूब कमाओ नाम

ऐडसेंस का सेंस भी, नहीं समझ कोई पाय
दो रूपये भी न मिलें, कहाँ मिले फिर आय

गुटबाजी की भी चले बढ़िया यहाँ बयार
लेकिन ये तो होना है आख़िर है परिवार

चिट्ठापथ पर चलने का अपना ही आनंद
हम यूँ ही चलते रहें, जैसे देवानंद