Show me an example

Wednesday, September 30, 2009

ब्लॉगर हलकान 'विद्रोही' की डायरी से कुछ....




रिश्ते बन ही जाते हैं. बहाना कोई भी हो सकता है. हलकान भाई याद हैं आपको? अरे वही, हलकान 'विद्रोही', अपने स्टार ब्लॉगर. वही जिनकी वसीयत छाप दी थी मैंने. उसके बाद उनकी डायरी भी. ब्लागिंग की वजह से ढेर सारे लोगों से जान-पहचान हुई. हलकान भाई उनमें प्रमुख हैं.

विजयादशमी के दिन उनसे मिलने गया था. हमेशा की तरह ब्लागिंग के बारे में सोचते हुए बिजी थे. मुद्दा वही. हिंदी ब्लागिंग को कैसे बढ़ाया जाय? खैर, विजयादशमी की बधाई लेन-देन के लिए उन्होंने समय निकाला. बधाई दी. बधाई ली.

बधाई लेन-देन के बाद फिर उसी बात पर चिंतन. ब्लागिंग के बारे में क्या-क्या किया जा सकता है? ठीक वैसे ही जैसे कई साहित्यकार इस बात पर चिंतित रहते हैं कि आज से बासठ साल बाद हिंदी की दशा क्या होगी?

बात शुरू हुई तो बोले; "तुम भी टिक गए ब्लागिंग में. वो भी दो साल."

मैंने कहा; "हाँ. सोचा तो कभी मैंने भी नहीं था लेकिन सच तो यही है कि टिक गया. सब आपका आर्शीवाद है."

वे बोले; " आर्शीवाद काहे का? असल कारण कुछ और है. तुम्हें अपना तो कुछ मौलिक लिखना है नहीं. दूसरों की लिखी डायरी छाप देते हो. उसी से काम चला रहे हो. पता नहीं डायरी के पन्ने भी खुद टाइप करते हो या उसके लिए भी टाइपिस्ट रखा है."

मैंने कहा; "ऐसा मत कहिये हलकान भाई, मैं खुद ही टाइप करता हूँ. मेरे लिए ब्लागिंग उतनी महत्वपूर्ण नहीं है कि मैं तनख्वाह देकर केवल ब्लागिंग के लिए टाइपिस्ट रख लूँ."

वे बोले; "इसी बात का तो रोना है. हिंदी ब्लागिंग के ज्यादातर ब्लागर के लिए ब्लागिंग महत्वपूर्ण नहीं है. जिस तरह का समर्पण चाहिए वह दिखाई नहीं देता. तुम्हारे अन्दर भी वह भावना नहीं है कि हिंदी ब्लागिंग फूले-फले. समर्पण चाहिए ब्लागिंग के लिए. दूसरों की डायरी छाप कर कितने दिन चलाओगे?"

मैंने कहा; "हाँ, वह तो है. आप ठीक ही कह रहे हैं."

वे बोले; "मुझे ही देखो. हमेशा यह प्रयास रहता है कि हिंदी ब्लागिंग को कैसे समृद्ध किया जाय? कह सकते हो कि मैं ब्लागिंग ही खाता हूँ, ब्लागिंग ही पीता हूँ और ब्लागिंग ही सोता हूँ."

मैंने कहा; "सही कह रहे हैं. अपने ब्लॉग बारूद पर आपने जितना कुछ लिखा है, वह हिंदी ब्लागिंग के लिए संजीवनी है. जब तक आपका ब्लॉग है तब तक समझिये हिंदी ब्लागिंग का स्वर्णकाल चलता रहेगा."

वे बोले; "हा हा.....असल में बारूद तो कुछ नहीं. बारूद ब्लॉग तो हिंदी ब्लागिंग के लिए मेरे योगदान का दस प्रतिशत भी नहीं है. असल योगदान तो मेरे वे ब्लॉग हैं जो मैं अपने नाम से नहीं लिखता."

सुनकर मुझे बड़ा अजीब लगा. मतलब यह कि हलकान भाई किसी और नाम से लिखते हैं?

मैं प्रश्नचिन्ह लिए उनसे कुछ कहने ही वाला था कि उन्होंने मेरे सामने एक डायरी खिसका दी. बोले; "अपने हो. यह पढ़ लो, सब समझ में आ जाएगा."

डायरी पढना शुरू किया. जैसे-जैसे पढता गया, दंग होता गया. मेरी हालत देखकर वे बोले; " आज समय आ गया है कि मेरे योगदान को लोग जानें. पढ़ लो. नोट कर लो. छाप देना अपने ब्लॉग पर. इसी बहाने तुम्हारी एक पोस्ट हो जायेगी. वैसे भी तुम्हें क्या चाहिए? एक डायरी के कुछ पन्ने."

उनके कहने के अनुसार मैं उनकी डायरी की कुछ प्रविष्टियाँ छाप रहा हूँ. चिंता न करें, उन्होंने परमीशन दे दी है. आप पढें और हिंदी ब्लागिंग के लिए उनके योगदान को सराहें.

६ नवम्बर, २००८

अजीब बात है. कोई भी आईडिया मन में आता है. सोचता हूँ कि उस आईडिया को लेकर ब्लॉग बनाऊंगा और यहाँ पता चलता है कि उसी आईडिया को लेकर मुझसे पहले ही किसी ने ब्लॉग बना लिया. पहले सोचा कि ब्लॉगरगण की जीवनी के कुछ हिस्से उनसे लिखवाकर अपने ब्लॉग पर छापूंगा. लेकिन अजित जी को पता नहीं कैसे मेरे आईडिया के बारे में पहले ही पता चल गया. वे मेरा आईडिया ले उड़े. फिर सोचा कि हिंदी ब्लागरों के जन्मदिन पर बधाई देते हुए एक ब्लॉग बना लूँ लेकिन वह आईडिया पाबला जी ले उड़े. फिर सोचा कि सांपों के बारे में जानकारी के लिए एक ब्लॉग बना लूँ लेकिन लवली जी को मेरे आईडिया का पता चल गया और उन्होंने...............पता नहीं ऐसा मेरे साथ ही क्यों होता है?

२ मार्च २००९

आज एक ब्लॉग कंसल्टेंट अप्वाइंट किया. ध्येय एक ही है. हिंदी ब्लागिंग को समृद्ध करना है. उसे आगे ले जाना है. कंसल्टेंट अच्छा है. आईडियावान कंसल्टेंट. जब मैंने उसे यह बताया कि कैसे लोगों को मेरे आईडिया के बारे में पता चल जाता है और वे ब्लॉग बना लेते हैं तो उसने कहा कि यह टेलीपैथी की वजह से होता है. इसलिए मुझे टेलीपैथी पर एक ब्लॉग शुरू कर देना चाहिए. मैंने आज ही त्रिशंकु नाम से एक आई डी बनाई और टेलीपैथी पर एक ब्लॉग शुरू कर दिया......

७ अप्रैल, २००९

कंसल्टेंट के कहने पर आज मैंने एक नया ब्लॉग बनाया जो सरकारी रोडवेज के कंडक्टरों के लिए समर्पित है. मैं इस ब्लॉग पर केवल रोडवेज के कंडक्टरों और उनकी नौकरी और समस्याओं के बारे में लिखूँगा....

१६ अप्रैल, २००९

पिछले सोमवार मैंने एक नया ब्लॉग बनाया. नाम है, "मैं चन्दन तुम पानी". मैं इस ब्लॉग पर हिंदी ब्लागरों की खिचाई करूंगा. पहली पोस्ट में मैंने एक ब्लॉगर की पोस्ट का जिक्र करते हुए पांच लाइन की एक पोस्ट लिखी. उस ब्लॉगर ने 'छात्र' की जगह 'क्षात्र' लिखा था. पांच लाइन की पोस्ट पर मुझे ब्लॉगवाणी पर कुल सत्रह पसंद मिली. टिप्पणियां कुल बाईस. असली ब्लागिंग तो यही है कि पांच लाइन लिखो और बाईस टिप्पणियां मिलें. चिरकुट हैं वे जो बड़ी-बड़ी पोस्ट लिखते हैं और उन्हें कुल तीन पसंद मिलती है.

२३ अप्रैल, २००९

आज मेरे ब्लॉग "मैं चन्दन तुम पानी" पर एक ब्लॉगर ने फर्जी आई डी से मेरे खिलाफ कमेन्ट किया. तकनीकि में अपनी कुशलता के कारण मुझे पता चल गया कि यह ब्लॉगर कौन था लेकिन मैं उसका नाम कैसे लेता? मैं अगर उसका नाम ले लेता तो वह भी मुझे लताड़ के चला जाता कि मैं खुद फर्जी आई डी क्रीयेट करके ब्लॉग लिखता हूँ. ऐसे ही कुछ समय होते हैं जब फर्जी नाम बहुत खलता है.....

१६ मई, २००९

झूठे हैं सब. मिश्रा को फ़ोन करके कहा कि मेरी पोस्ट पर एक पसंद क्लिक कर दो. उसने कहा कि उसने कर दिया और पसंद तेरह से चौदह हो गई. बाद में पता चला किसी और ने वह पसंद दी थी. हद है. एक पसंद भी नहीं दे सकते....

२८ मई, २००९

आज एक ब्लॉग बनाया. 'हिंदी ब्लागरों के चरम दिन' के नाम से. मैंने सोचा है कि इस ब्लॉग पर मैं पोस्ट लिख करा बताऊंगा कि किस हिंदी ब्लॉगर को किस दिन सबसे ज्यादा टिप्पणी और पसंद मिली.

३ जून, २००९

बहुत मज़ा आ रहा है. मेरे हर ब्लॉग के कम से कम एवरेज ९० फालोवर हो गए हैं. सब जलने लगे हैं मेरे ब्लॉग की प्रगति से. मुश्किल एक ही है. किसी को नहीं मालूम कि ये ब्लॉग किसका है. ऐसे में नाम न होने की कसक तो रहेगी लेकिन कुछ किया नहीं जा सकता.

११ जून, २००९

आज मैंने अपनी एक सूक्ति, "ब्लागिंग ही जीवन है" को ढाई बाई तीन फुट के बोर्ड पर लिख कर अपने कम्यूटर के सामने वाली दीवार पर टांग दिया है. यह बोर्ड मुझे ब्लागिंग के लिए मोटिवेट करता रहेगा. लेकिन वही बात है न. एक पत्नी है जिसे मेरी प्रगति फूटी आँखों नहीं सुहाती. बोर्ड देखकर नाराज़ हो गई. कहती है कि घर के लिए सोफे का कवर खरीदने के लिए आना-कानी करता हूँ और बोर्ड पर कुल उन्नीस सौ पचास रूपये खर्च कर आया. अब इसपर कोई क्या कहे? उसे क्या पता कि "ब्लागिंग ही जीवन है" नामक सूक्ति हिंदी ब्लागिंग को आगे बढाने में किस तरह का रोल.....

१२ जुलाई, २००९

कंसल्टेंट के कहने पर आज मैंने एक नया ब्लॉग बनाया है जिसमें मैं उन ब्लॉग का जिक्र करते हुए पोस्ट लिखूँगा जिनके बारे में विदेशी अखबारों और पत्रिकाओं में छपेगा. वो दिन दूर नहीं जब मेरे इस ब्लॉग का जिक्र टाइम मैगजीन में होगा. यह पूरी तरह से एक नया आईडिया है. वैसे तो मैंने सोचा था कि भारतीय अखबारों में हिंदी ब्लॉग के जिक्र को लेकर मैं एक ब्लॉग बनाऊंगा लेकिन पता नहीं पाबला जी को कैसे मेरे आईडिया के बारे में........

२८ अगस्त, २००९

आज कंसल्टेंट ने एग्रीगेटर बनाने का आईडिया दिया. एग्रीगेटर का आईडिया मेरे दिमाग में.........

मैं अभी पढ़ ही रहा था कि उन्होंने मुझसे डायरी लेते हुए कहा; "जितना पढ़ लिए हो, उतना काफी है एक पोस्ट लिखने के लिए. लेकिन पोस्ट लिखना ज़रूर. अब समय आ गया है कि लोग मेरे योगदान के बारे में जानें और हिंदी ब्लागिंग पर किये गए मेरे एहसान को तौलने के लिए तराजू खरीदना शुरू करें.

मैं उनसे मिलकर चला आया. यह सोचते हुए कि आगे की डायरी पढ़ते तो क्या-क्या और पता चलता? कहीं यह तो नहीं लिखा रहता कि;

आज मैं बहुत खुश हूँ. आज से ठीक दस साल पहले मैंने ब्लॉगर बनाया था. कोई नहीं जानता कि एवन विलियम्स के नाम से मैंने ही ब्लॉगर का निर्माण किया था.........

Monday, September 21, 2009

आये हैं तो कुछ रंग डालिए




रतिराम जी की दूकान पर गया कल. बहुत भीड़ थी. पूजा के मौसम में भीड़ जायज भी है. एक दम अंतिम लाइन में कुछ देर खड़े रहे. लगा पान पाने के लिए बहुत टाइम लगेया, सो चले आये. दो घंटे बाद फिर गए. मैंने कहा पान लगाइए.

वे बोले; "पिछला बार आये थे, रुके, फिर चले काहे गए? आप चले गए त लगा जईसे चीन वाले सैनिक सब जैसी सोच काहे नहीं रखते हैं?"

मैंने कहा; "नहीं, वो बात नहीं है. लेकिन आप चीन के सैनिकों से मेरी तुलना कर रहे हैं?"

वे बोले; "त औउर का करें? हमको लगा आप चीनी सैनिकों की तरह आये, पता नहीं का देखा औउर वापस चले गए. औउर कुछ नहीं त एगो पान खाते और इहाँ का जमीने रंग देते."

उनकी बात सुनकर हंसी आ गई. वे बोले; "हंसिये मत. ऊ लोग भी त एही किया न. आया था लोग और कुछ नहीं त पत्थरे रंग कर चला गया."

मैंने कहा; "हम तो पान खाने आये थे. यहाँ जब पान नहीं मिला तो कुछ रंगने का सवाल ही नहीं था."

वे बोले; "आ नहीं. अईसा नहीं होना चाहिए. जब आये हैं त कुछ कर के जाइए. देखिये चीन का सैनिकवा सब आया. औउर कुछ नहीं त पत्थरे रंग दिया. लालरंग से. इसको कहते हैं रंगबाज सैनिक."

मैंने कहा; "हाँ वो तो है. लेकिन इतनी भीड़ देखकर..."

वे बोले; "सीखिए कुछ ऊ लोग से. आपका तरह ऊ लोग भी भीड़ देखता त बिना रंगे ही चला जाता. सोचिये, ऊ लोग सोचता कि अभी त पाकिस्तानी सब भीड़ लगा कर रक्खा है. कहीं-कहीं बंगलादेशी भी है. अईसे में चलो वापस. जब ई लोग चल जाएगा, त फिर आयेंगे और रंग डालेंगे. लेकिन नाही. ऊ लोग आया, पत्थर सब को रंगा तब गया."

मैंने कहा; "हाँ वो तो है. ऐसा पहली बार देखने को मिला कि दूसरे देश के लोग पत्थर रंगने के लिए आये."

वे बोले; "आप भी न. अईसा का पहला बार हुआ है. औउर जो लोग को ऊ लोग पहले ही रंग दिया है, ऊका हिसाब नहीं रखते आप?"

मैंने कहा; "आप के कहने का मतलब?"

वे बोले; "मतलब का आपको नहीं बुझाता है? अपना देश का न जाने केतना सब के ऊपर चीन का रंग पाहिले से ही चढ़ा हुआ है. ऊ लोग पूरा सराबोर है चीन के रंग में. का सत्ता वाला औउर का भत्ता वाला. नीलोत्पल बसु को नहीं देखे का टीवी पर? देखते तो पता चलता कि लाल रंग से केतना नहाये हुए हैं."

मैंने कहा; "हाँ एक दिन देखा था मैंने उनको."

वे बोले; "सोचिये कैसा चिरकुट है. कह रहा था कि कौनो सीरियस बात नहीं है."

मैंने कहा; "हाँ. लेकिन यही बात तो सरकार के विदेश मंत्री भी कह रहे हैं."

वे बोले; "ऊ काहे नहीं कहेंगे? जो मनई सब फाइभ इस्टार का पर्शीडेनशियल सूट में ठहरेगा ऊ को त सब हरियाली ही दिखेगा न. ऊ तो डेढ़ लाख रोज का भाड़ा दे रहा है. अईसे में उसको मन में शिकायत का भाव नहीं न आएगा."

मैंने कहा; "आपकी इस बात में दम है."

वे बोले; "खाली इस बात में? आपको नहीं लगता कि हमरा हर बात में दम ही रहता है?"

मैंने कहा; "मैं मानता हूँ कि आपकी हर बात में दम है. लेकिन सरकार कह रही है कि ज्यादा चिंता करने की ज़रुरत नहीं है."

वे बोले; " सरकार वाला बड़ा आदमी है सब. उन लोगों को चिंता काहे होगा?"

मैंने कहा; "सरकार का कहना है कि सब मीडिया का क्रिएट किया हुआ है."

वे बोले; "बस अब एक ही बात बाकी है. ऊ भी बोल ही देना चाहिए."

मैंने पूछा; "कौन सी बात?"

वे बोले; "एही कि चीन का सैनिक सब को मीडिया बोलाता है ताकी न्यूज बनाया जा सके."

मैं उनकी बात सुनकर मुस्कुरा दिया. मैंने कहा; "चलिए अब जो होगा सो देखा जाएगा. पान खिलाइए."

वे बोले; "अभिये खाइए."

पान खाकर चला आया. चीनी से परेशानी नाप रहा हूँ अब. क्या करूं? त्यौहार का मौसम है न.

Friday, September 18, 2009

हलवा-प्रेमी राजा का त्याग




कंधे पर लटकते झोले को महामंत्री के हवाले कर हलवा-प्रेमी राजा गद्दी पर बैठ गया. गद्दी पर बैठते ही उसकी समझ में आ गया कि कंधे पर बिना कोई भार लिए अगर गद्दी पर बैठा जाय, तो बड़ा मज़ा आता है. इसे भी मज़ा आने लगा.

धाँसू गद्दी थी. उसके बैठते ही धंस गई.

उसे अपने भाग्य पर विश्वास ही नहीं हो रहा था. उसकी इच्छा तो हुई कि दरबारियों के सामने ही गद्दी पर बार-बार उछले लेकिन फिर मन में विचार आया कि सब हँसेंगे. आखिर अब वह एक राजा था. एक राजा को सार्वजनिक तौर पर इस तरह से उछलना अलाऊ नहीं था. यही सोचकर वह ऐसा न कर सका.

लोक लाज के चलते राजा उछल तो नहीं सका लेकिन गद्दी पर उछलने की उसकी इच्छा मन से जा ही नहीं रही थी. हारकर उसने अपने मन की बात सुनी. महामंत्री से कहा; "हमारे ध्यान लगाने का समय हो गया है. हम अब मेडीटेट करेंगे इसलिए दरबारियों को छुट्टी दे दी जाय."

दरबारियों को छुट्टी दे दी गई. महामंत्री भी दरबार से निकल लिए.

खुद को अकेला पाकर राजा की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा. वह गद्दी पर बन्दर की तरह कूदने लगा. उसे बड़ा मज़ा आ रहा था. जब कूदकर थक गया तो बैठ गया. फिर ताली बजाई. जैसा कि हर राजा की ताली के साथ होता है, इसके साथ भी हुआ. नौकर हाज़िर हुआ. राजा ने कहा; "हमारे लिए हलवा पेश किया जाय."

नौकर चला गया. थोडी देर बाद ही राजमहल की रसोई हलवे के सुगंध से सराबोर हो गई. उसके बाद दरबार और रसोई को जोड़ने वाली गैलरी ने भी खुद को भाग्शाली महसूस किया. सुगंध का एक निश्चित हिस्सा उसे भी मिला. थोड़ी देर बार दरबार भी हलवे की सुगंध से भर गया. राजा के सामने हलवा पेश किया गया. सोने की कटोरी में स्वादिष्ट हलवा. घी और सूखे मेवे की जुगलबंदी वाला.

राजा और दरबारियों ने खाना शुरू किया. ऐसा हलवा उसने कभी सपने में भी नहीं खाया था. यह अलग बात थी कि हलवा के पीछे दीवाना था और हलवे का ही सपना भी देखता था लेकिन ऐसा हलवा उसे सपने में भी न मिला था. उसे हलवा इतना पसंद आया कि उसने एक कटोरी हलवा और मंगवाया.

हलवा खाने से उसे असीम स्वाद और ख़ुशी, दोनों की प्राप्ति हुई.

राजा और दरबारियों के दिन हलवामय होने लगे. एक्सपेरिमेंट के तौर पर तरह-तरह के हलवे बनने लगे. अपने घर में रहते हुए उसने केवल सूजी का हलवा खाया था लेकिन राजमहल आने के बाद उसे किस्म-किस्म के हलवे खाने का मौका मिला.

राजा के हलवा प्रेम ने उसके तमाम मंत्रियों को हलवे पर शोध करने के लिए प्रेरित किया. कभी कोई सिघाडे के हलवे पर बात करते पाया जाता तो कभी बेसन के हलवे पर. कई बार तो ऐसा भी देखा जाता कि कोई होनहार दरबारी पालक और जलकुम्भी के हलवे पर बात करते हुए बरामद होता.

तमाम देशों से बुलाकर हलवा बनानेवाले बड़े-बड़े रसोईये अप्वाइंट किये गए. एक अरबी कंपनी को सूखे मेवे सप्लाई करने का ठेका मिला. राज दरबार में जब भी दरबारियों की मीटिंग होती हमेशा हलवे को लेकर ही बातें की जातीं. हर दरबारी और मंत्री दरबार में रहकर हलवा खाता और दरबार से बाहर रहते हुए हलवे पर रिसर्च करता.

राजा और उसके दरबारियों की हलवा-चर्चा प्रिंट और विजुअल मीडिया के पत्रकारों के लिए तरह-तरह के अमेजिंग न्यूज और गॉसिप का साधन बनने लगी. जिन पत्रकारों और न्यूज चैनलों से राजा खुश रहता था और जिन्हें उसने जमीन-वमीन दे दी थी, वे राजा के इस हलवा-भक्षण कार्यक्रम और उससे होने वाले फायदे के बारे में बढ़ा-चढ़ा कर लिखते. उसके हलवा प्रेम को राष्ट्रप्रेम से भी बड़ा बताते. कई न्यूज चैनल तो राजा और उसके दरबारियों के बारे में खोज-खोज कर अच्छी बात दिखाना शुरू कर दिया था. कुछ तो राजा और उसके मंत्रियों को सम्मानित करने लगे.

हलवा खाने में मस्त राजा और उसके दरबारियों को बाकी किसी बात से कोई मतलब नहीं रह गई थी. ज्यादा हलवा खाने से राज्य में चीनी मंहगी होने लगी. फिर बेसन, सूजी, और फल. देखते-देखते खाने-पीने की चीजों के दाम आसमान छूने लगे. अगर कोई समस्याओं को उठाता तो समस्या के समाधान का उपक्रम करने के लिए राजा दरबारियों की मीटिंग करवाता और हलवा खाते हुए मीटिंग ख़त्म हो जाती.

पड़ोसी राज्य के राजा को भी न्यूज चैनल और अखबारों से पता चला कि हलवा-प्रेमी राजा हलवे में किस तरह से डूबा हुआ है. वह अपने सैनिकों और गुप्तचर वगैरह भेजकर इस राजा के इलाके का हालचाल लेने लगा. जब पड़ोसी राजा के सैनिक और गुप्तचर कई बार इस राज्य की सीमा में देखे जाने लगे तो वे न्यून चैनल जिनकी राजा से नहीं पटती थी, उन्होंने पड़ोसी राजा द्बारा अपने सैनिकों के भेजने की खबरें दिखाना शुरू किया. साथ में यह भी दिखाना शुरू किया कि किस तरह से राजा और उसके दरबारियों द्बारा हलवा-भक्षण कार्यक्रम की वजह से चीनी का दाम बढ़ गया है.

मीडिया में शोर-शराबा हुआ. ये शोर-शराबा सुनकर राज्य की प्रजा चिंतित रहने लगी. जब गुप्तचरों ने इस बात की सूचना राजा तक पहुंचाई तो उसने एक दिन दरबारियों की मीटिंग बुलाई गई. हलवा खाते हुए राजमहल ने एक प्रेस वक्तव्य जारी किया जिसमें लिखा था;

"प्रजा में व्याप्त चिंता से महाराज बहुत चिंतित हैं. उन्होंने अपने तीन दरबारियों को दिन में केवल एक बार हलवा खाने की हिदायत दी है. महाराज ने थाईलैंड से लाये गए हलवा बनानेवाले एक रसोइए की तनख्वाह में पूरे आठ परसेंट की कटौती की हिदायत दी है. साथ ही हमें यह बताते हुए प्रसन्नता हो रही है कि अब से महाराज हलवे में कम चीनी खाएँगे."

सारा राज्य महाराज के त्याग से गदगद हुआ.